Home Blog Page 62

घर में लोगों को जमा कर नहीं पढ़ सकते नमाज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूँ हीं नहीं दिया फैसला, जानिए- इसके खतरे कितने बड़े?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निजी संपत्ति में भीड़ जुटाकर नमाज अदा करने पर रोक लगा दी है। जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की बेंच ने 25 मार्च 2026 को यह फैसला दिया। यह मामला बरेली में एक मुस्लिम शख्स द्वारा अपने घर में नमाज के लिए भीड़ जुटाने से जुड़ा था और याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि वह निजी संपत्ति में नमाज के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा।

हाईकोर्ट के इस फैसले को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि खाली जगह पर नमाज पढ़ने या प्रेयर करने की आड़ में धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने का एक पैटर्न रहा है। हाईकोर्ट का यह फैसला अगर नजीर की तरह लिया जाता है और देशभर में इस पर अमल किया जाता है तो यह डेमोग्राफी में बदलाव और धर्मांतरण से जुड़ी कई समस्याओं पर लगाम लग सकती है।

‘शांति-व्यवस्था को खतरा’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

आरोपित अपने घर में दर्जनों लोगों को बुलाकर नमाज पढ़वा रहा था और इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई थी। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई हुई और यह मामला कोर्ट में पहुँच गया। इस मामले के याचिकाकर्ता का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई सही नहीं है। वहीं पुलिस ने इस कार्रवाई को कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी बताया।

25 मार्च को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने वचन दिया कि वह इस मामले से जुड़ी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा नहीं करेगा। वहीं, इस मामले में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के वचन का उल्लंघन करने पर पुलिस को कार्रवाई करने की छूट दी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “अगर याचिकाकर्ता इस वचन का उल्लंघन करता है और बड़ी संख्या में लोगों को वहाँ नमाज के लिए इकट्ठा करता है, जिससे इलाके में शांति और व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है तो संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”

वहीं, कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और अन्य लोगों के खिलाफ जारी चालान वापस लिया जाए। साथ ही, अवमानना (कंटेम्प्ट) के जो नोटिस जारी किए गए थे उन्हें भी कोर्ट ने समाप्त कर दिया है। याचिकाकर्ता की सुरक्षा को वापस लेते हुए कोर्ट ने यह याचिका निस्तारित कर दी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का एक हिस्सा

क्या है यह पूरा मामला?

इस मामले की शुरुआत 16 जनवरी 2026 को बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गाँव से हुई। वहाँ एक निजी खाली घर में सामूहिक नमाज पढ़े जाने से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए और पुलिस ने शिकायत के आधार पर कार्रवाई करनी शुरू की। पुलिस ने इसे बाद 18 जनवरी 2026 को नमाज अदा करने के आरोप में 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया।

इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरु हो गई। लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने सोशल मीडिया पर यह दावा करना शुरू कर दिया कि इन लोगों को नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया है। दावा किया जाने लगा कि पुलिस अब घरों के अंदर इबादत करने वाले नागरिकों को परेशान कर रही है। मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने के लिए ‘विक्टिमहुड’ का एजेंडा सोशल मीडिया पर चलाया जाने लगा। हालाँकि, अधूरा सच और प्रोपेगेंडा था।

पुलिस ने बताया कि इन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि एहतियाती तौर पर हिरासत में लिया गया है। एसपी अंशिका वर्मा ने स्पष्ट किया कि संदिग्ध मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेना केवल एहतियातन उठाया गया कदम था। यह कार्रवाई उस समय की गई जब पुलिस को मोहम्मदगंज गाँव के निवासियों से जानकारी मिली कि पिछले कुछ हफ्तों से एक खाली पड़े घर का उपयोग मदरसे के रूप में किया जा रहा है। ग्रामीणों ने यह भी शिकायत की थी कि बिना प्रशासनिक अनुमति के वहाँ नियमित रूप से सामूहिक नमाज अदा की जा रही थी।

‘अवैध मदरसे’ से परेशान थे ग्रामीण

पुलिस ने यह कार्रवाई ऐसे ही नहीं कर दी थी। पुलिस ने ग्रामीणों की लगातार चिंता पर यह कदम उठाया था। ग्रामीणों ने इस मामले में पुलिस-प्रशासन को 29 दिसंबर 2025 को ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को दी शिकायत में बताया कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अवैध रूप से मदरसा का निर्माण करा लिया है जो गलता है क्योंकि इसके लिए किसी से कोई अनुमित नहीं ली गई है। ग्रामीणों ने शिकायत में कहा कि उन्हें धमकाया भी जा रहा है और उन्होंने इसकी जाँच कराए जाने की माँग की।

29 दिसंबर 2025 को दिया गया पत्र

ग्रामीणों ने 8 जनवरी 2026 को बरेली के SSP को भी पत्र लिखा था। ग्रामीणों ने अवैध मदरसे का निर्माण कराए जाने पर कार्रवाई करने की माँग की थी। इसमें कहा गया कि मुस्लिम लोगों ने गाँव में मकान का बहाना बनाकर मदरसा का निर्माण करा दिया है।

8 जनवरी 2026 को SSP को लिखा गया पत्र

16 जनवरी को नमाज पढ़े जाने के बाद भी उसके अगले दिन यानी 17 जनवरी 2026 को ग्रामीणों ने पत्र लिखकर कार्रवाई की माँग की। ग्रामीणों ने उप-जिलाधिकारी को लिखे पत्र में कहा, “मुस्लिम समुदाय के लोगों ने गाँव में मदरसा का निर्माण करा लिया है जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं और किसी से कोई अनुमति नहीं ली गई है।”

उन्होंने आगे लिखा, “विरोध करने पर हनीफ के मकान में अवैध रूप से नमाज अदा करते हुए पकड़े गए हैं। 15 लोगों को पुलिस ने पकड़ा है और कई भाग गए हैं। मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अवैध रूप से नमाज अदा की जा रही है, उसे रुकवाया जाए और अवैध रूप से बने मदरसे को ध्वस्त किया जाए।”

17 जनवरी को उप-जिलाधिकारी को दिया गया पत्र

तारिक खान नामक शख्स ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका डाली थी। जिसेक बाद अदालत ने बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह और SSP अनुराग आर्य के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। कोर्ट ने इस मामले में यूपी सरकार को फटकार भी लगाई और अब जुर्माना भी लगाया है। हालाँकि, यूपी सरकार ने कोर्ट में दावा किया है कि उस जगह पर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाई गई है।

घरों में नमाज-प्रेयर: मस्जिद-चर्च की नींव

इस विषय पर तर्क रखें उससे पहले जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश उदाहरणों के जरिए करते हैं। दिल्ली के ब्रह्मपुरी में एक मस्जिद है ना है अल-मतीन। यह मस्जिद बनने की प्रक्रिया इस साजिश को दिखाने के लिए काफी है। 2013 में यहाँ मुस्लिमों ने एक फ्लैट खरीदा, धीरे-धीरे वहाँ लोग नमाज पढ़ने आने लगे जैसा बरेली में हो रहा है। बाद में यह मस्जिद बन गई और कुछ समय बाद यह मस्जिद 4 मंजिला बना दी गई। कुछ वर्षों बाद बगल के प्लाट को खरीदकर इसे विस्तार देने और मंदिर के ठीक सामने इसका गेट बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। ये कहानी राष्ट्रीय राजधानी की है लेकिन देशभर में हालात यहीं है।

गुजरात के सूरत में 2022 में एक ऐसा ही मामला सामने आया था। वहाँ ‘शिव शक्ति सोसाइटी’ में कुछ प्लॉट्स मुस्लिमों ने खरीदे और वहाँ भी यही सिलसिला शुरू हुआ। लोग आते, नमाज पढ़ते और बात आगे बढ़ती रही। बाद में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो मुस्लिमों ने दावा किया गया कि यह जमीन वक्फ बोर्ड की है और यहाँ अब मस्जिद-मदरसा है। यह प्लॉट की जमीन मुस्लिमों के लिए पवित्र हो गई। इस जमीन को वक्फ को मिली असीम ताकत के जरिए मस्जिद बना दिया गया और शिकायत करने वालों के लिए मुँह ताकते के अलावा कोई चारा नहीं बचा था।

ऐसा ही मामला हिमाचल प्रदेश के शिमला से भी सामने आया। मोहम्मद सलीम नाम का एक व्यक्ति 1990 में संजौली आया। उसने उस सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया, जहाँ पहले एक स्कूल था जिसे बाद में कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया था। उसने वहाँ एक मंजिला ढाँचा बनाया, जो धीरे-धीरे कई मंजिलों की इमारत में बदल गया। बाद में उसने इसे मस्जिद का रूप दे दिया और वक्फ बोर्ड से NOC भी हासिल कर ली। यह एक मंजिला ढाँचा बढ़कर 5 मंजिला मस्जिद बन गया और नमाज पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी। इसके साथ ही टकराव भी शुरू हो गया।

ईसाइयों में भी यह ट्रेंड देखने को मिलता है। वहाँ भी घरों में प्रार्थना सभाओं और उनकी आड़ में धर्मांतरण के खूब मामले सामने आते हैं। शुरुआत अक्सर बहुत साधारण तरीके से होती है।

किसी व्यक्ति के घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर प्रार्थना करते हैं। यह आयोजन छोटा होता है और स्थानीय स्तर पर ज्यादा ध्यान नहीं खींचता। धीरे-धीरे इसमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ने लगती है। नियमित तौर पर लोग जुटने लगते हैं और वहाँ लाउडस्पीकर, कुर्सियां, बैनर और अन्य व्यवस्थाएँ होने लगती हैं, जिससे वह स्थान एक चर्च का रूप ले लेता है। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और छत्तीसगढ़ तक ऐसे हजारों मामले सामने आए हैं।

क्यों खतरनाक है घरों में नमाज-प्रेयर का ट्रेंड?

आपने उदाहरण देखे हैं कि किस तरह घर से शुरू होने वाली ये मजहबी गतिविधियाँ धीरे-धीरे स्थायी मजहबी ढाँचों में बदल जाती हैं। यह बहस आस्था से आगे बढ़कर कानून से लेकर डेमोग्राफी के संतुलन और धर्मांतरण की भी है।

शुरुआत अक्सर बेहद सामान्य दिखती है। किसी घर में कुछ लोग इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं या प्रार्थना सभा करते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है तो इन सभाओं का स्वरूप बदलने लगता है। लोगों की संख्या बढ़ती है और यह नियमित होने लगता है। धीरे-धीरे घर मजहबी स्थल बन जाता है। इसके बाद अगला चरण आता है और फिर बाहर से मौलवियों-उलेमाओं या पादरियों का आना शुरू हो जाता है। फिर तकरीरों और प्रवचनों का दौर शुरू होता है।

जैसे जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो डेमोग्राफी असंतुलन की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। पहले मस्जिद या चर्च के आस-पास मुस्लिमों और ईसाइयों को बसाया जाता है और फिर वहाँ रहने वालें हिंदुओं के साथ टकराव होने लगता है। धीरे-धीरे वहाँ पर अल्पसंख्यक हो गए हिंदू समुदाय को परेशान किया जाता है और फिर मजबूर कर दिया जाता है कि वो वहाँ से चले जाएँ। या अपना मजहब बदल लें। लालच देकर और ताकत के जरिए मतांतरण की खूब कोशिशें होती हैं। मकानों के बाहर बिक्री के पोस्टर लगाए जाने से जुड़ी खूब खबरें आपने पढ़ी होंगी।

हिंदुओं के हितों को देखना भी अदालत की जिम्मेदारी

अदालत के सामने यह सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है बल्कि भारत के सामाजिक संतुलन और हिंदुओं के अधिकारों से जुड़ा सवाल भी था। इस फैसले से लगता है कि कोर्ट को जमीनी वास्तविकताओं का शायद अंदाजा रहा होगा। कोर्ट सिर्फ कानून की व्याख्या नहीं करती बल्कि उस फैसले का सीधा असर आम लोगों के जीवन, उनकी सुरक्षा, उनकी आस्था और उनके अधिकारों पर पड़ता है।

दिल्ली, गुजरात और हिमाचल प्रदेश के उदाहरण बताते हैं कि समस्या वास्तविक है। इस समस्या की शुरुआत में ही अगर हिंदू समाज प्रशासन के पास जाता है तो उसे कह दिया जाता है कि अभी कोई जमीनी परिवर्तन नहीं दिख रहा है तो अभी खतरा भी नहीं है।

वहीं, जब वही गतिविधियाँ आगे चलकर स्थायी हो जाती हैं और तब अगर कोई शिकायत करने जाता है तो कहा जाता है कि एक स्थापित चर्च, मस्जिद है या वक्फ संपत्ति है तो इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। यह एक तरह का ‘कानूनी चक्रव्यूह’ बन जाता है जिसमें आम हिंदू समाज फँस जाता है। यदि किसी विशेष इलाके में हिंदू समुदाय खुद के लिए खतरा देखता है, खुद को असुरक्षित नजर पाता है तो यह भी अदालत का ही काम है कि उसे सुरक्षित महसूस हो। उसके साथ न्याय हो।

क्या विपक्ष की कठपुतली है मेटा इंडिया? फेसबुक पर मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा की बाढ़ में विश्वसनीयता बही, शीर्ष नेतृत्व के कॉन्ग्रेसी झुकाव पर उठे सवाल

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि मेटा (Meta) इंडिया की कंटेंट मॉडरेशन और पॉलिसी से जुड़े फैसले अब तक एरह से मोदी सरकार के खिलाफ नजर आने लगे हैं। यह बहस तब और आग की तरह फैल गई जब लोगों ने अपने अनुभव साझा करते हुए पोस्ट डालने शुरू किए।

नेटिजन्स का कहना था कि उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम फीड पर ज्यादातर ऐसे पोस्ट दिखाई दे रहे हैं, जिनमें सरकार की आलोचना की जा रही है। इन दावों के बाद इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई, जहाँ कुछ लोग इसे एल्गोरिदम (Algorithm) का असर बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं।

सबसे वायरल ‘हिंदुत्व नाइट’ नाम की सोशल मीडिया यूजर की एक पोस्ट में कहा गया, “पिछले 6 से 8 महीनों में पूरा फेसबुक एंटी-मोदी हो गया है… जब भी मैं फेसबुक खोलती हूँ, मुझे 50 हजार लाइक्स वाले एंटी-मोदी पोस्ट ही दिखाई देते हैं।”

यूजर ने यह भी दावा किया कि यह सिर्फ उनके साथ नहीं बल्कि उनके मोदी सरकार का समर्थन करने वाले दोस्तों ने भी अनुभव किया है। यूजर ने लिखा, यहाँ तक की मेरे पुराने मोदी समर्थक दोस्त भी मोदी-विरोधी पोस्ट शेयर कर रहे हैं। मैं यह नहीं पूछ रही कि क्या बदल गया, क्योंकि सबके अपने-अपने कारण होते हैं। BJP नेतृत्व इस भ्रम में जी रहा है कि सब कुछ ठीक है क्योंकि BJP कल्याणकारी योजनाओं के दम पर चुनाव जीतती है।।”

इस पोस्ट पर एक यूजर ने जवाब देते हुए मेटा इंडिया पब्लिक पॉलिसी एग्जिक्यूटिव प्रियंका राव खान के नाम का जिक्र किया गया था। इस जवाब के बाद पोस्ट को लेकर चर्चा तेज हो गई और मेटा इंडिया में पॉलिसी से जुड़े पदों पर काम करने वाले लोगों को लेकर एक लंबा थ्रेड शुरू हो गया। धीरे-धीरे प्रियंका खान की सोशल मीडिया गतिविधि, प्रोफाइलट डिटेल्स से लेकर उनकी प्रोफेशनल जानकारी के स्क्रीनशॉट भी वायरल हो गए, जिससे नेटिजन्स ने मामले में वैचारिक निष्कर्ष तक पहुँचने की कोशिश की।

खास बात यह भी सामने आई कि प्रियंका राव खान के सोशल मीडिया अकाउंट्स लॉक या प्राइवेट हैं। पहले प्रियंका के ‘एक्स’ प्रोफाइल पर एक बैनर लगा था, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘नाजी’ कहने वाले पोस्टर छपे थे। इसी साल फरवरी में उनके प्रोफाइल के स्क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिसके बाद उन्होंने वह बैनर हटा दिया।

विवाद शुरू करने वाला सोशल मीडिया थ्रेड

झुनझुनवाला नाम के ‘एक्स’ हैंडल का यूजर अनुराग पोस्ट करता है, उसने फरवरी में एक थ्रेड साझा किया था और फिर ‘हिंदुत्व नाइट’ की पोस्ट पर कमेंट के रूप में भी वही बातें दोहराईं, जिसमें उसने प्रियंका राव खान के बैकग्राउंड, उनके ऑक्सफॉर्ड ब्लावात्निक स्कूल एसोसिएशन से जुड़े होने और उनके प्रोफाइल हेडर पर पहले मौजूद और अब हटाए जा चुके बैनर का उल्लेख किया था।

उनकी इस पोस्ट को वरिष्ठ पत्रकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने भी क्वोट किया, जिससे इस चर्चा को और अधिक महत्व मिला। फरवरी में एक पोस्ट में कंचन गुप्ता ने लिखा था कि प्रियंका राव खान ने “ऑक्सफोर्ड में अपना समय नेतृत्व की ट्रेनिंग लेने में नहीं, बल्कि हिंदू विरोधी और भारत विरोधी विचार फैलाने वाले एक एक्टिविस्ट के रूप में बिताया” और आगे उन्होंने यह भी जोड़ा कि बाद में मेटा प्लेटफ़ॉर्म ने उन्हें भारत में पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के रूप में नियुक्त किया।

कंचन गुप्ता ने यह भी सुझाव दिया कि जो यूजर्स मॉडरेशन के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें और कहीं देखने की जरूरत नहीं है जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि राजनीतिक झुकाव रखने वाले व्यक्ति पॉलिसी के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

यह चर्चा तब और बढ़ गई जब यह सामने आया कि प्रियंका राव खान के पति मोहम्मद खान हैं, जो INC की मीडिया टीम से जुड़े बताए जाते हैं। अनुराग की पोस्ट के जवाब में मोहम्मद खान जो खुद को एक वकील बताते हैं, उन्होंने अनुराग को कानूनी कार्रवाई की धमकी दी और लिखा, “अरे डरपोक कमीने। यह मेरी बीवी है। देखते हैं कि हैरेसमेंट के लिए क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन का सामना करने पर तुम कितने बहादुर होते हो। तुम्हारी प्रोफाइल पर कुछ दूसरे क्रिमिनल कंटेंट के भी स्क्रीनशॉट लिए हैं। तुम्हें खुद जाकर इसे सही साबित करते हुए देखने का इंतजार रहेगा।”

फोटो साभार: X

गुजरात के मुख्यमंत्री की मेटा प्रतिनिधियों के साथ बैठक ने चर्चा का मोड़ा रुख

यह विवाद केवल प्रियंका राव खान और मोहम्मद खान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मेटा प्लेटफ़ॉर्म के अन्य कर्मचारियों को भी शामिल करता है। ऐसे ही एक कर्मचारी अमन जैन हैं, जो वर्तमान में मेटा में सीनियर डायरेक्टर और हेड पब्लिक पॉलिसी के पद पर कार्यरत हैं। हाल ही में एक पोस्ट में उन्होंने बताया कि उनकी मुलाकात गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से हुई थी।

फोटो साभार: X

इस बैठक में मेटा प्लेटफ़ॉर्म के प्रतिनिधियों ने AI, वेयरेबल्स, स्किलिंग और ई-गवर्नेंस से जुड़ी पहलों पर चर्चा की। इसके बाद सोशल मीडिया पर पुराने पोस्ट और पॉलिसी इकोसिस्टम से जुड़े लिंक सामने आने लगे। नेटिजन्स ने मेटा प्लेटफ़ॉर्म के डिलीट किए गए पोस्ट का स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी को ‘आत्ममुग्ध’ बताने वाले आर्टिकल को ‘रोचक रचना’ कहा था।

उस आर्टिकल का टाइटल ‘टू नाइटमेयर फोरटोल्ड‘ था, जिसे जेम्स मनोर ने लिखा था और अमन जैन ने उस आर्टिकल से एक खास कोट शेयर किया था, जिसमें लिखा था, “मोदी पक्के नार्सिसिस्ट लोगों के बीच एक पक्के नार्सिसिस्ट होंगे। यह सत्ता में बने रहने का कोई नुस्खा नहीं है।” यह पोस्ट और आर्टिकल दिसंबर 2013 के थे, यानी नरेंद्र मोदी के मई 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभालने से पहले के।

सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पोस्ट का इस्तेमाल यह तर्क देने के लिए किया कि प्लेटफॉर्म की पॉलिसी को आकार देने वाले व्यक्ति पूरी तरह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं हो सकते।

प्रियंका राव ने छोड़ दिया मेटा?

प्रियंका राव खान के ‘लिंक्डइन’ प्रोफाइल के स्क्रीनशॉट्स ने इस चर्चा में एक और पहलू जोड़ दिया। प्रोफाइल के अनुसार, उन्होंने जून 2022 से मार्च 2026 तक मेटा प्लेटफ़ॉर्म में पब्लिक पॉलिसी मैनेजर के रूप में काम किया है। यह संभावना भी जताई जा रही है कि अब वह कंपनी में न हों, हालाँकि उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

स्रोत: लिंक्डइन

पॉलिसी रोल्स में निष्पक्षता पर सवाल

यह विवाद किसी पक्की नीति या नियम को लेकर नहीं है, बल्कि लोगों की सोच और धारणा से जुड़ा है। लेकिन इस बहस ने एक बार फिर यह चिंता सामने ला दी है कि बड़ी टेक कंपनियों में काम करने वाले लोग, जो पब्लिक पॉलिसी जैसे अहम पदों पर होते हैं, क्या पूरी तरह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहते हैं या नहीं? खासकर तब, जब ये प्लैटफॉर्म्स चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दो पर लोगों की सोच को प्रभावित करते हैं।

जब ऐसे पदों पर बैठे लोग अपने राजनीतिक विचार खुलकर जाहिर करते हैं, तो लोगों के मन में सवाल उठने लगेत हैं कि क्या कंटेंट मॉडरेशन और प्लेटफॉर्म के फैसले निष्पक्ष हैं या फिर उनके निजी विचार उन पर असर डालते हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों की चिंता यह है कि अगर किसी तरह का पक्षपात दिखता भी है, तो इससे प्लैटफॉर्म पर भरोसा कम हो सकता है। खासकर उन प्लैटफॉर्म्स पर, जिनका इस्तेमाल करोड़ों लोग करते हैं।

चाहे ये चिंता सच हो या सिर्फ लोगों की सोच, लेकिन इस विवाद ने यह जरूर दिखा दिया है कि अगर नेतृत्व से जुड़े लोगों पर राजनीतिक झुकाव का शक भी होता है, तो प्लैटफॉर्म की निष्पक्षता पर सवाल जल्दी उठने लगते हैं।


(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

UP के Gen-Z का ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’, अखिलेश यादव को ‘रहमान डकैत’ दिखाया: पूछा- ‘ल्यारी राज’ चाहिए या ‘धुरंधर CM’, जानिए संगठन के बारे में सबकुछ

‘धुरंधर-2’ जहाँ बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक रिकॉर्ड ध्वस्त करती जा रही है तो वहीं उसके किरदार देश की राजनीति में भी तहलका मचाए हुए हैं। कुछ दिनों पहले माफिया अतीक अहमद से मिलते जुलते किरदार को लेकर उत्तर प्रदेश में खूब सियासी बवाल हुआ तो अब अखिलेश यादव की ‘धुरंधर तस्वीरों’ को लेकर हंगामा मचा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, सीतापुर, नोएडा और अमेठी समेत 10 जिलों में अखिलेश यादव के खिलाफ होर्डिंग्स लगाए गए हैं।

होर्डिंग्स में लिखा ‘अखिलेश यादव का ल्यारी राज’

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ (YAM) नाम की संस्था द्वारा लगाए गए इन होर्डिंग में एक तरफ अखिलेश यादव तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की तस्वीरें हैं। अखिलेश यादव की तस्वीर को धुरंधर के विलेन रहमान डकैत की तरह बनाया गया है और उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है- ‘अखिलेश का ल्यारी राज’। वहीं, होर्डिंग में दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी की तस्वीर लगी है जिसमें वह कन्या पूजन करते नजर आ रहे हैं और उनकी तस्वीर पर लिखा है- धुरंधर CM। इस होर्डिंग के बीच में बड़े अक्षरों में पूछा गया है-‘आपको क्या चाहिए?’।

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा लगाए गए होर्डिंग

इन होर्डिंग में कुछ अखबारों की खबरों की कटिंग भी लगाई गई हैं। इनमें अखिलेश यादव की तस्वीरों के नीचे ‘हिंसा जारी, अब तक 38 मरे’, ‘हिंसा जारी, 17 और मरे’, ‘मरेठ पहुँची दंगों की आग’ और ‘शामली में खूनी संघर्ष: राज्य में बढ़ रहा सांप्रदायिक तनाव’ जैसी खबरें हैं। तो दूसरी तरफ CM योगी आदित्यनाथ की तस्वीर के नीचे ‘अपराधियों को पालती है सपा, माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’, ‘मुख्तार की मौत’ और ‘अतीक और अशरफ भी मारे गए’ जैसी खबरों की कटिंग लगी हैं।

साथ ही, होर्डिंग पर ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों की तस्वीरें भी लगी हैं। कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह, महामंत्री अभिनव तिवारी, उपाध्यक्ष शिवानी पांडेय जैसे कई पदाधिकारियों की फोटो लगी हैं।

सपा की करतूतों से युवाओं को अवगत कराना मकसद: यूथ अगेंस्ट माफिया

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ के पदाधिकारियों ने ये होर्डिंग लगाए जाने की वजहों पर भी बात की है। संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष आशुतोष सिंह ने कहा, “हमें जेन-जी को संदेश देना है, उन्हें साथ जोड़ना है और उनको यह बताना है कि जब वो व्यस्क नहीं हुए थे तब प्रदेश में क्या चल रहा था, वो उन्हें नहीं भूलनी चाहिए। हम नई पीढ़ी को समझाएँगे और यह बताएँगे कि AI के दौर में जाति-बिरादरी में फँसे रहना कितनी दिक्कत दे सकती है।”

वहीं, संगठन के महामंत्री अभिनव तिवारी ने कहा, “इसका मकसद यही था कि हम जेन-जी में जागरूकता फैलाना चाहते थे। ताकि वो जान सकें कि पहले UP ने एक दौर देखा था और एक दौर अब है, एक समय यहाँ मुजफ्फरनगर-शामली जैसे दंगे होते थे और एक आज का समय है।” साथ ही, अभिनव का कहना है कि यह संस्था छात्रों द्वारा चलाई जा रही है और इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।

क्या है होर्डिंग्स लगाने वाला ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’?

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ की वेबसाइट पर संगठन को ‘उत्तर प्रदेश को डर और माफिया के दौर में वापस जाने से रोकने के लिए नागरिकों द्वारा शुरू किया गया एक मंच’ बताया गया है।

वेबसाइट पर कहा गया है, “‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ एक सामाजिक संगठन है, जिसका उद्देश्य है लोगों को जागरूक करना, खासकर युवाओं को शिक्षित करना, अपराध के नुकसान को समझाना और उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और विकास की राह पर आगे बढ़ाने के लिए लोगों का समर्थन जुटाना।”

यह संगठन पुराने रिकॉर्ड, अपराध से जुड़ी घटनाओं की टाइमलाइन, निवेश पर पड़े असर, अलग-अलग जिलों के ट्रेंड और लोगों को जागरूक करने वाला कंटेंट तैयार करता है। साथ ही, कॉलेजों में ग्रुप बनाने, वॉलंटियर अभियान चलाने और युवाओं से संकल्प लेने जैसे कार्यों से युवाओं को संगठन से जोड़ा जाता है।

यह संगठन सिर्फ जानकारी ही नहीं देता बल्कि एक ऐसी सोच बनाना चाहता है जो अपराध के खिलाफ हो। इसके लिए म्यूजिक, रैप, ग्राफिक्स, प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा लिया जाता है।

यूथ अगेंस्ट माफिया द्वारा बनाया गया कंटेंट

ऊपर तस्वीर में दिखाया गया कंटेंट ‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ द्वारा बनाए जाने वाले कंटेंट का उदाहरण है। इन इन्फोग्राफिक के जरिए दिखाया गया है कि कैसे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले सपा के शासन में 2012 से 2017 के बीच उत्तर प्रदेश में अराजकता का दौर था। इस अवधि में 1 लाख से अधिक नौकरियाँ खत्म हुईं और करीब 27000 करोड़ रुपए के निवेश का नुकसान हुआ जिसके चलते युवाओं के भविष्य और राज्य के विकास पर नकारात्मक असर पड़ा।

वहीं, 2017 के बाद योगी आदित्यनाथ के राज में कैसे प्रदेश की तस्वीर बदली उसकी कहानी भी इसके जरिए दिखाई गई है। इसमें बताया गया है कि 2017 के बाद कानून-व्यवस्था का दौर लौटने से प्रदेश में 7 लाख से अधिक नौकरियाँ पैदा हुईं और 4 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश आया है।

YAM का कहना है कि उत्तर प्रदेश एक समृद्ध भविष्य नहीं बना सकता अगर लोग अपने अतीत को भूल जाएँ। वेबसाइट पर लिखा गया है, “संगठित अपराध, डर, हिंसा और कमजोर कानून-व्यवस्था का दौर सिर्फ उस समय के पीड़ितों को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि यह निवेश के भरोसे को भी कम करता है, लोगों को व्यापार शुरू करने से रोकता है, स्थानीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करता है, रोजगार के अवसर घटाता है और पूरी एक पीढ़ी के सपनों को नुकसान पहुँचाता है।”

‘यूथ अगेंस्ट माफिया’ का मकसद इसी याद को एक जिम्मेदार नागरिक पहल में बदलना है। यह संस्था अतीत को बुरे दौर को दर्ज करेगी, वर्तमान को जागरूक करेगी और एक ऐसा भविष्य बनाने में मदद करेगी जहाँ युवा खुद आगे बढ़कर उत्तर प्रदेश को सुरक्षित और अवसरों से भरा राज्य बनाए रखें।

भारत में बनेगा परमाणु ईंधन का अकूत भंडार, थोरियम से बनेगी बिजली: जानें- क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? जिसकी सफलता पर PM मोदी ने दी बधाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के दूसरे चरण लगभग पूरे होने की जानकारी दी। उन्होंने भारत को प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने पर वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी। उन्नत रिएक्टर की विशेषताओं पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत के लिए इसे गौरवपूर्ण पल बताया।

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात 9.40 बजे एक पोस्ट में लिखा, “आज भारत ने अपने सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम में एक अहम और ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश ने अपने परमाणु ऊर्जा मिशन के दूसरे चरण में बड़ी प्रगति हासिल की है। कलपक्कम में स्वेदशी तकनीक से तैयार किया गया प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब सफलतापूर्वक क्रिटिकल हो गया है।”

रिएक्टर की विशेषता बताते हुए पीएम ने कहा, “यह एक उन्नत प्रकार का रिएक्टर है, जो जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा ईंधन पैदा करने की क्षमता रखता है। यह उपलब्धि भारत के वैज्ञानिकों की गहरी समझ और हमारे इंजानियरों की मजबूत तकनीकी क्षमता को दिखाती है।”

इसी के साथ प्रधानमंत्री ने न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की ओर बढ़ने की भी बात कही। उन्होंने कहा, “साथ ही, यह हमारे न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम है, जहाँ भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का बेहतर उपयोग कर सकेगा। यह देश के लिए गर्व का क्षण है। हमारे सभी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को इस बड़ी सफलता के लिए हार्दिक बधाई।”

आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ किस रिएक्टर की बात कर रहे हैं, जिसमें कई साइंस के शब्द हैं। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर है क्या ये प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर? इस रिएक्टर का काम क्या है? इसके ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का क्या मतलब है? और क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया है?

क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) एक बेहद उन्नत किस्म का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसे भारत ने अपनी खास जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। ‘फास्ट’ का मतलब है कि इसमें तेज गति वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल होता है और ‘ब्रीडर’ का मतलब है कि यह रिएक्टर जितना परमाणु ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन खुद बना लेता है।

आम न्यूक्लियर रिएक्टर जहाँ यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं PFBR यूरेनियम और प्लूटोनियम के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार करता है, जिससे ईंधन की कमी का खतरा कम हो जाता है। भारत के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि हमारे पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भंडार काफी ज्यादा है।

यह रिएक्टर उसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे आगे चलकर थोरियम आधारित ऊर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। तमिलनाडु के कलपक्कम में बना यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है, जो भारत की वैज्ञानिक ताकत और इंजनीयरिंग क्षमता को दिखाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह सिर्फ बिजली बनाने वाली मशीन नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए ‘ईंधन बनाने वाली फैक्ट्री’ भी है, जो भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

रिएक्टर के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने से क्या मतलब है?

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का मतलब यह है कि अब रिएक्टर के भीतर परमाणु प्रतिक्रिया (न्यूक्लियर फिशन) अपने आप लगातार और नियंत्रिति तरीके से चलने लगी है। आसान भाषा में कहें तो जब एक परमाणु टूटता है और उससे निकलने वाले न्यूट्रॉन ठीक उतनी ही संख्या में दूसरे परमाणुओं को तोड़ते रहते हैं, जिससे यह प्रक्रिया बिना रुके चलती रहे, उसी स्थिति को ‘क्रिटिकल’ कहा जाता है।

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार, क्रिटिकलिटी वह स्थिति है जब परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) स्थिर रूप से खुद चलती रहती है, यानी हर फिशन से उतने ही न्यूट्रॉन पैदा होते हैं जितने अगले फिशन को जारी रखने के लिए जरूरी होते हैं।

यह किसी खतरे का संकेत नहीं होता, बल्कि यह दिखाता है कि रिएक्टर सही तरीके से शुरू हो चुका है और अब वह स्थिर रूप से ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार है। इस चरण के बाद वैज्ञानिक धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ाते हैं और इसे बिजली उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार करते हैं।

क्या वाकई भारत न्यूक्लियर प्रोग्राम के तीसरे चरण में पहुँच गया

भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में बनाया गया है, जिसे होमी जे भाभा ने तैयार किया था। अभी जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल की है, वह दूसरे चरण की एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह तीसरे चरण में पहुँच गया है। असल में, भारत अभी दूसरे और तीसरे चरण के बीच के संक्रमण (Transition) दौर में है।

दूसरे चरण का मकसद फास्ट ब्रडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके ज्यादा ईंधन तैयार करना और आगे के लिए जरूरी सामग्री जुटाना है। PFBR का सफल होना दिखाता है कि यह तकनीक अब काम कर रही है, लेकिन पूरे देश में इस तरह के और रिएक्टर लगने औऱ स्थिर रूप से चलने के बाद ही कहा जा सकता है कि दूसरा चरण पूरी तरह सफल हुआ है।

तीसरे चरण में भारत का फोकस थोरियम पर आधारित रिएक्टरों पर होगा, क्योंकि भारत के पास थोरियम का बहुत बड़ा भंडार है। इसके लिए पहले पर्याप्त मात्रा में यू-233 जैसे ईंधन का उत्पादन जरूरी है, जो दूसरे चरण से ही मिलेगा। डिपार्टमेंट ऑप एटॉमिक एनर्जी के अनुसार, यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें हर स्टेज अगले स्टेज के लिए आधार तैयार करता है।

चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने कब्रिस्तानों को लेकर बनाए नए नियम, यहाँ ‘दफनाना’ बहुत महँगा: जानें- क्या हैं ‘बोन एश अपार्टमेंट’, जिन पर लगा बैन

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश चीन इनदिनों एक अलग तरह की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ अंतिम संस्कार के लिए कब्रिस्तान की भारी कमी हो गई है। हालात यह है कि घर सस्ते हैं, लेकिन कब्रिस्तान में जगह मिलना कई गुणा महँगा।

नतीजा यह है कि चीनी छोटे-छोटे फ्लैट खरीद कर उन्हें मुर्दे रखने की जगह में तब्दील कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने के लिए चीन ने 30 मार्च को नया कानून लागू किया है। इसके तहत रिहायशी इलाकों के घरों में मुर्दों को या उनकी अस्थियों को रखना गैरकानूनी करार दिया गया है।

रिहायशी इलाकों में बना ‘बोन एश अपार्टमेंट’

चीन के कई रिहायशी इलाकों में छोटे छोटे फ्लैट्स मिले हैं, जहाँ अंतिम संस्कार के लिए रखी गई अस्थियाँ और कब्र मिले हैं। इन घरों की खिड़कियाँ और दरवाजे बंद हैं। खिड़कियों में पर्दे लगे मिले, ताकि कोई अंदर का दृश्य नहीं दिख सके। फिर भी पड़ोसियों ने जब मेहनत कर अंदर झाँका तो नजारा काफी डरावना लगा। कमरे में मोमबत्तियाँ जल रही थी। काली फोटो के सामने एक ताबूत रखा हुआ था। इसमें हड्डियाँ थी। कब्रिस्तान के खर्च से बचने के लिए खाली फ्लैट्स को ‘हड्डियों वाला घर’ बना दिया गया था।

चीन में मुर्दों पर महँगाई की मार

शंघाई जैसे बड़े शहर में भी रियल स्टेट की कीमत गिरी है, लेकिन कब्रिस्तान में जगह कई गुणा ज्यादा महँगा हो गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक,2020 में एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार का खर्च औसत सैलरी वाले व्यक्ति के 6 महीने की कमाई के बराबर थी। आखिर आम आदमी इसे कैसे वहन करे। इसलिए शहर से बाहर बने सस्ते फ्लैट्स को मुर्दों के ताबूत को रखने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या है नया नियम

चीन के अंतिम संस्कार से जुड़े नए नियम में साफ किया गया है कि इंसानी अवशेषों या मुर्दों को सिर्फ तय सरकारी कब्रिस्तानों पर ही दफनाया जा सकता है। अब फ्लैट या किसी भी दूसरे घरों को ताबूत रखने या अस्थियों को रखने के लिए बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अंतिम संस्कार के नए नियम के मुताबिक, अंतिम संस्कार को एक सामाजिक कार्य के तौर पर परिभाषित किया गया है। बेसिक और सप्लीमेंट्री, दोनों सर्विसेज के लिए एक ‘टू-टियर कैटलॉग’ सिस्टम शुरू करने की बात कही गई है। नए नियमों के कैटलॉग में जरूरी चीजों की फीस लिखी गई है। इसके अलावा किसी भी एक्स्ट्रा आइटम या फीस लेने पर रोक है। इसमें किसी भी कमर्शियल कब्रिस्तान की मनाही है। नए नियम में जिंदगी का आखिरी सफर इज्जतदार और सही तरीके से हो, इस पर ध्यान दिया गया है।

दरअसल चीन में जन्मदर काफी घट गया है और यह बुजुर्गों का देश बन गया है। इसलिए मौतों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में कब्रिस्तान में जगह कम पड़ गए हैं। इसलिए डिमांड ज्यादा है। कीमतों पर कंट्रोल करने के लिए सरकार ने नए नियम बनाए हैं। चीनी अधिकारियों ने रेजिडेंशियल फ्लैट के अंदर दाह संस्कार की राख रखने पर बैन लगा दिया है, क्योंकि दफ़नाने के बढ़ते खर्च की वजह से कुछ परिवारों को दूसरे इंतज़ाम करने पड़े हैं।

चीनी समाज में सही तरीके से दफनाना एक जरूरी जिम्मेदारी मानी जाती है। यह पुरखों के प्रति सम्मान दिखाता है और कल्चरल वैल्यू से भी जुड़ा है। हालाँकि तेजी से हो रहे शहरी विकास और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी की वजह से मौजूद जमीन पर दबाव बढ़ गया है, जिससे चीनी समाज जूझ रहा है।

अब जमीन पर पेड़ों के नीचे और समुद्र में दफनाने को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 6 फीसदी से ज्यादा अंतिम संस्कार इस तरीके से हो रहा है।

हिंदू घृणा से ‘गाजी’ बना सैयद सालार, महाराजा सुहेलदेव ने भेजा जहन्नुम: सत्य यही है ओवैसी के ‘गुलाम’, बिलबिलाने से योगी राज में नहीं होगा इतिहास का ‘तुष्टिकरण’

मुस्लिम आक्रांता सैयद सालार ने हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण कराया। जिसने भी इनकार किया उनके सिर काट दिए। हिंदू घृणा उसमें इतने भरी थी कि इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए वह ‘गाजी’ बन गया। 1034 ईस्वी में महाराजा सुहेलदेव ने उसे पराजित कर भारत और हिंदुओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

5 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान महाराजा सुहेलदेव की इसी वीरगाथा का जिक्र किया। यह सुनते ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के यूपी प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का मजहब बिलबिलाने लगा।

इस बिलबिलाहट में एक्स पर एक पोस्ट करते हुए उसने सैयद सालार को ‘अमन पसंद’ बताते हुए महाराजा सुहेलदेव को अपमानित करने की कोशिश की। पूर्व में वह महाराजा सुहेलदेव को ‘लुटेरा’ भी कह चुका है।

शौकत अली ने एक्स पर लिखा, “सालार मसूद गाजी A.R के बारे में गलत इतिहास बता रहे हैं हमारे मुख्यमन्त्री जी, अगर सालार मसूद ग़ाज़ी, लुटेरे होते अक्रान्ता होते, तो भारत के मुसलमानों के साथ साथ बड़ी तादाद में हमारे हिन्दू भाईयों की उनके प्रति आस्था ना होती, राजा सुहैल देव का भारत की आज़ादी, या भारत के निर्माण में कोई योगदान नहीं था यही सच्चाई है।”

इससे पहले वो सितंबर 2025 में महाराजा सुहैल देव को लुटेरा और सालार मसूद को ‘अमन पसंद‘ बता चुका है। तब शौकत अली के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में FIR दर्ज हुई थी।  

शौकत अली ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन बयानों के पलटवार में ये विवादित टिप्पणी की, जिनमें सीएम ने सालार मसूद गाजी को विदेशी आक्रांता और माफिया बताते हुए कहा था कि महाराजा सुहेलदेव ने उसे मौत के घाट उतार दिया था।

बता दें कि सीएम योगी ने 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ भारतेंदु नाट्य अकादमी के 50 वर्ष पूर्ण होने पर आयोजित समारोह में कहा था, “जो माफिया अभी मिट्टी में मिले हैं, उन्हीं का एक रूप था सालार मसूद। उसने सोमनाथ मंदिर तोड़ा, अयोध्या की राम जन्मभूमि को भी क्षति पहुँचाई। महाराजा सुहेलदेव ने उसे न सिर्फ हराया, बल्कि ऐसी मौत दी जिसे इस्लाम में सबसे बुरी, जहन्नुम‑गारंटी वाली मौत माना जाता है।”

शौकत अली के बयान पर भड़का राजभर समाज

शौकत अली के इस बयान पर खास तौर पर राजभर समाज और हिंदू संगठनों में रोष देखने को मिल रहा है। राजभर कार्यकर्ता इसे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि एक समग्र जातीय‑सांस्कृतिक संवेदना को चोट पहुँचाने की कोशिश मानते हैं।

इसी वजह से उन्होंने न सिर्फ आक्रोश जताया बल्कि शौकत के खिलाफ कानूनी और आंदोलनात्मक प्रतिक्रिया की धमकी भी दी है।

उत्तर प्रदेश के पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने महाराज सुहेलदेव पर एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली के विवादित बयान पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि अगर शौकत ने माफी नहीं माँगी तो प्रदेश भर में आंदोलन होगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि शौकत अली को इतिहास की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवैसी से कहूँगा कि अपने प्रदेश अध्यक्ष को माफी माँगने के लिए कहें, नहीं तो प्रदेशव्यापी आंदोलन होगा। आपका निकलना दूभर हो जाएगा।

मंत्री राजभर ने कहा कि यह सोची समझी रणनीति के तहत है क्योंकि आने वाले 10 जून को बहराइच में मेला लगने जा रहा है जो 10 दिन चलेगा। पहले लुटेरे गाजी का मेला लगता था।

मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने कहा कि अब देश के वीरों का मेला, जिन्होंने देश को गुलाम होने से बचाया, देश को लुटने से बचाया, जिन्होंने देश की संपत्ति को बचाया, ऐसे देश के राष्ट्रीय वीर राजभर महाराज सुहेलदेव जी का मेला लगने लगने जा रहा है।

गौरतलब है कि संभल में सैयद सालार मसूद गाजी के नाम पर हर साल नेजा मेला लगाया जाता था। योगी सरकार ने 2025 में यह कहते हुए इसे रोक दिया कि विदेशी आक्रांताओं के नाम पर कोई मेला नहीं लगने दिया जाएगा। गाजी के नाम पर हर साल बहराइच शहर के दरगाह शरीफ में कई दशकों से मेला लगता आ रहा था।

राजभर समाज के लिए राजा सुहेलदेव की अहमियत

महाराजा सुहेलदेव को राजभर समाज का ‘कुलपुरुष’ माना जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र ने भी उन्हें राष्ट्रीय वीरता‑परंपरा का हिस्सा मानकर उनके नाम पर स्मारक, मेडिकल कॉलेज, ट्रेन और डाक टिकट आदि जैसे ठोस सम्मान दिए हैं।

सुहेलदेव को मुस्लिम आक्रमणकारी सालार मसूद पर विजय प्राप्त करने वाले योद्धा के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोलना राजभर समाज की ऐतिहासिक स्मृति और गौरव को ठेस पहुँचाना माना गया।

उत्तर प्रदेश में सुहेल देव को मानने वाले राजभर समुदाय की संख्या लाखों में है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में करीब 18 फीसद राजभर हैं और बहराइच से लेकर वाराणसी तक के 15 जिलों में 60 विधानसभा सीटों पर राजभर समुदाय प्रभुत्व काफी अधिक है।

ऐतिहासिक‑सांस्कृतिक चर्चाओं के अनुसार, सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के एक क्षेत्रीय राजा और शासक माने जाते हैं, जिनका राज्य श्रावस्ती‑बहराइच के इलाके में बताया जाता है।

कहा जाता है कि उन्होंने बहराइच के पास सालार मसूद गाजी के खिलाफ स्थानीय राजाओं का गठबंधन तैयार किया और सालार मसूद की सेना को 1034 ईस्वी में पराजित कर दिया। इसके बाद मसूद की मौत हुई और उसे बहराइच में दफन किया गया।

राजभर समाज के दृष्टिकोण से यह लड़ाई छोटे और आम लोगों के खिलाफ विदेशी आक्रांता की पराजय का प्रतीक है, जिसमें राजभर आधार‑समूह के रूप में दिखते हैं।

चुनावी राजनीति में सुहेलदेव का नाम बार-बार उभरता है, क्योंकि राजभर समाज उन्हें अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व की लड़ाई से जोड़ता है। वर्तमान में सुभासपा जैसी राजभर केंद्रित पार्टियाँ महाराजा सुहेलदेव को अपना आधार मानती हैं। राजभर नेता उन्हें दलित‑शोषित‑किसान वर्ग का राष्ट्रीय वीर कहते हैं।

शौकत अली की टिप्पणी राजभर समाज के लिए केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि उनके पूरे इतिहास और गौरव पर चोट है। महाराजा सुहेलदेव राजभर समाज के लिए सम्मान, संघर्ष और आत्मगौरव का प्रतीक हैं।

सालार मसूद गाजी: ‘वॉरियर संत’ या आक्रांता?

सालार मसूद गाजी के बारे में जो प्रमुख विवरण मिलता है, वह 17वीं सदी की किताब मिरात‑ए‑मसूदी से आता है, जो घटनाओं के करीब 600 साल बाद लिखी गई। वह गजनी के सुल्तान महमूद का भतीजा माना जाता है। खुद इतिहासकार मानते हैं कि यह ग्रंथ सूफी परंपरा और लोककथाओं से प्रभावित है, न कि ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों से।

मिरात‑ए‑मसूदी के अनुसार, सालार मसूद गाजी को गाजी मियाँ भी कहा जाता था। गजनी के साथ मिलकर उसने भारत में इस्लाम फैलाने और गजनवी प्रभाव बढ़ाने के लिए अभियान चलाया। लेकिन महाराजा सुहेलदेव के सामने ये अभियान टिक न सका और मसूद को करारी हार मिली।

इस लिहाज से कहा जा सकता है कि मसूद की छवि एक ‘वॉरियर संत’ या योद्धा के तौर पर जबरन गढ़ी गई। इसमें इतिहास से ज्यादा आस्था और परंपरा को शामिल करने की कोशिश की गई।

असल में मिरात‑ए‑मसूदी किताब सालार मसूद को एक मजहबी योद्धा और संत के रूप में महिमामंडित करती है, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से वह गजनवी आक्रमण का हिस्सा था।

कुल मिलाकर शौकत अली का बयान सिर्फ उनके ‘अपने’ लोगों को बरगलाने के काम आ सकता है लेकिन दुनिया के सामने कुछ भी कह देने से इतिहास को वह नहीं बदल पाएँगे।

महिला आरक्षण बिल पर अब ‘जल्दीबाजी’ का रोना रो रहा विपक्ष, पहले तुरंत लागू करने के लिए बना रहा था दबाव: सामने आया कॉन्ग्रेस का ‘दोगलापन’

महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का रुख विरोधाभाषी है। कॉन्ग्रेस पहले तुरंत लागू करने की माँग कर रही थी, लेकिन अब प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियाँ उठा रही है। वहीं कई विपक्षी पार्टियाँ ‘लागू करने के समय’ पर सवाल उठा रही हैं। इसके विपरीत सरकार का कहना है कि वह सही सलाह-मशविरा करके आगे बढ़ रही है और बड़े पैमाने पर आम सहमति बनाना चाहती है।

केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सेशन में चर्चा होगी। उन्होंने कहा, “हम 16 अप्रैल को संसद बुला रहे हैं। हम तब महिला आरक्षण बिल पर चर्चा करेंगे। महिलाओं को मजबूत बनाना हमारा वादा है। हमें महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए एक साथ आना चाहिए, राजनीति नहीं करनी चाहिए।” इस घोषणा पर विपक्षी पार्टियों की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई।

विपक्ष ने चुनौती दी और सरकार ने जवाब दिया

इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने आदर्श आचार संहिता के संभावित उल्लंघन की शिकायत की और केंद्र पर विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि उन्होंने 29 अप्रैल के बाद दो बार ऑल-पार्टी मीटिंग की माँग की।

उन्होंने आरोप लगाया, “हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हम इसे लाने वाले लोग हैं। यह हमारे समर्थन से ही सर्वसम्मति से बना है। ये लोग जब चाहें क्रेडिट ले लेते हैं। सब सहमत हैं, लेकिन किस समय, कैसे लाना है और कैसे करना है। इस पर राजनीति मत करो। अगर आपको यह करना ही था, तो आप इसे इस सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाए? हमने तीन दिन तक ग्रामीण विकास पर चर्चा की। क्या हम इस पर चर्चा नहीं कर सकते थे? आप राज्यों में चुनाव के बाद सत्र बुलाएँ। हम सहयोग करेंगे। चुनाव से पहले क्रेडिट मत लो।”

खड़गे के सवाल का जवाब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने दिया। उन्होंने कहा, “आप इसे 30 साल में पास नहीं कर पाए। हम पहले ही इसका क्रेडिट ले चुके हैं। आप हमेशा हर चीज को राजनीति के नजरिए से देखते हैं, इंसानियत के नजरिए से नहीं।”

राज्यसभा MP जयराम रमेश ने भी जोर देकर कहा, “खड़गे ने तब माँग की थी कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। उस वक्त आपको जनगणना और परिसीमन की याद आ रही थी। लेकिन अब बगैर जनगणना के भी लागू करने में दिक्कत नहीं है। 30 महीने तक सोते रहे। इस स्पेशल सेशन का एकमात्र मकसद पॉलिटिकल फायदा उठाना और तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर असर डालना है। क्या इसे 15 दिन बाद नहीं बुलाया जा सकता था?”

हालाँकि रिजिजू ने बताया कि इस जरूरी मुद्दे पर 80% से ज्यादा पार्टियों के साथ पहले ही चर्चा हो चुकी है। इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने सरकार को लिखकर विधानसभा चुनावों के बाद पार्लियामेंट सेशन बुलाने के लिए कहा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार सभी पार्टियों और सांसदों से सलाह-मशविरा कर रही है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि उन्होंने मनमाने तरीके से इसे लागू करने के लिए कदम नहीं बढ़ाया है, बल्कि आरक्षण को सर्वसम्मति से संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “हमारे लिए, इसका किसी खास राज्य के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। हमें प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि वक्त बीता जा रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने हमें लिखकर आग्रह किया है कि 29 अप्रैल के बाद मीटिंग बुलाएँ, हमें दिक्कत नहीं है।”

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार के महिला आरक्षण को लेकर की जा रही कवायद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेपन्स ऑफ मास डायवर्जन’ का एक और हिस्सा बताया। उनका कहना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामियों की वजह से देश को LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) और एनर्जी संकट का देश को सामना करना पड़ रहा है।”

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अप्रैल को कहा कि प्रस्तावित बिल का आधार ही ‘निराधार’ है, क्योंकि यह 15 साल पहले इकट्ठा किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने आगे कहा कि सही प्रतिनिधित्व पाने के लिए सही आबादी का पता चलना चाहिए, जो जनगणना के आधार पर ही पता चलेगा। जब महिलाओं की जनसंख्या के लिए 2011 के पुराने आँकड़ों को आधार बनाएँगे, तो महिला आरक्षण की आधार भूमि ही गलत होगी।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “जब गिनती ही गलत है, तो आरक्षण सही कैसे हो सकता है? जब नेक इरादों की बात हो तो शक नहीं होना चाहिए।”

यादव ने कहा, “इसीलिए हमारी सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि पहले जनगणना कराई जाए फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए। जो सरकार महिलाओं को गिनना नहीं चाहती है, वो भला उन्हें आरक्षण क्या देगी। महिलाओं के साथ भाजपा और उनके संगी-साथी जो धोखा करना चाहते हैं, महिलाओं के साथ वो छलावा हम नहीं होने देंगे। कुल मिलाकर सरकार से हमारा ये कहना है कि जब तक जनगणना नहीं, तब तक महिला आरक्षण पर बहस करना नहीं!”

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के व्हिप और तमिलनाडु के विरुधुनगर से सांसद मणिकम टैगोर ने जोर देकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी का इरादा महिला कोटे में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को आरक्षण देने से मना करना है। उन्होंने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आरोप लगाया, “क्योंकि जाति-आधारित जनगणना से OBC आबादी पर साफ डेटा मिलेगा, इससे महिला कोटे में OBC के सही प्रतिनिधित्व की माँग उठेगी। BJP का छिपा हुआ एजेंडा OBC महिलाओं को आरक्षण देने से रोकना है, इसलिए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।”

उन्होंने आगे कहा कि निचले सदन की सीटों में अनुमानित 50% की बढ़ोतरी से प्रतिनिधित्व में असमानता आ सकती है। इसके पीछे उनका तर्क है कि हालाँकि दक्षिणी राज्यों को ज्यादा सदस्य मिल सकते हैं, लेकिन संसद में उनकी तुलनात्मक ताकत उत्तरी राज्यों की तुलना में कम हो सकती है। खास बात यह है कि PM मोदी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि आने वाले परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों को कोई सीट नहीं गँवानी पड़ेगी।

जल्दी लागू करने की चाह से लेकर विरोध करने तक: विपक्ष के कई यू-टर्न

देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगुवाई वाले विपक्ष ने लोगों में भय फैलाना शुरू कर दिया है कि कई राज्यों, खासकर दक्षिण, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के राज्यों के परिसीमन और आरक्षण के लिए संविधान में बदलाव की कोशिश काफी ‘जल्दबाजी’ में की जा रही है। इसके ‘खतरनाक नतीजे’ सामने आ सकते हैं।

बिल का क्रेडिट लेने के लिए सत्ताधारी पार्टी पर हमला करने वाली कॉन्ग्रेस ने इसे अपना आइडिया करार दिया। पार्टी ने 2023 में इसे पास होने के तुरंत बाद लागू न करने के लिए सरकार की भी आलोचना की। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी फिलहाल सरकार पर हमला करने के लिए रणनीति बनाने में बिजी है। पार्टी कह रही है कि परिसीमन और जनगणना से पहले आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। हालाँकि कॉन्ग्रेस पहले परिसीमन, जनगणना की बात न कर, तुरंत महिला आरक्षण लागू करने की बात कही थी।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने कहा कि बिल अगली सुबह पास हो सकता है, क्योंकि सभी पार्टियों में आम सहमति है।” आपको बस इतना बताना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित होंगी। यह बहुत सीधा है। इसके अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर BJP सच में इसके लिए कमिटेड होती, तो वे इसे लागू करते। महिलाओं को रिज़र्वेशन देने और जनगणना या डिलिमिटेशन के बीच कोई रिश्ता नहीं है। तीनों जुड़े हुए नहीं हैं।

उन्होंने परिसीमना और जनगणना के नाम पर महिला आरक्षण कानून को बेवजह 10 साल तक बढ़ाने के लिए सरकार पर आरोप लगाए। दूसरे नेताओं ने भी यही बात कही।

ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा ने कहा, “हम माँग करते हैं कि हाल ही में पास हुआ महिला आरक्षण बिल 2024 के चुनाव से लागू हो। BJP सरकार ने जो भी रुकावटें डाली हैं, पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा और फिर आरक्षण लागू होगा। हम चाहते हैं कि ये शर्तें हटाई जाएँ। हम चाहते हैं कि बिल तुरंत लागू हो।” उन्होंने उस समय कहा, “हम चाहते हैं कि जनगणना हो, लेकिन जनगणना को महिला रिजर्वेशन से जोड़ना अन्याय है।”

पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और सांसद सोनिया गाँधी ने कहा कि देश की महिलाएँ पिछले 13 सालों से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का इंतजार कर रही हैं, और सरकार उन्हें सालों इंतजार करने के लिए कह रही है। उन्होंने कहा, “वे और कितने साल यह सब सहेंगी? क्या भारतीय महिलाओं के साथ ऐसा बर्ताव सही है? कॉन्ग्रेस बिल को तुरंत लागू करने की माँग करती है।”

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी इसी तरह जोर देते हुए कहा कि सरकार बिल का क्रेडिट ले रही है, लेकिन कम से कम दस साल तक इसे लागू करने का उसका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा था, “हम, भारत की महिलाओं के पास अब और समय बर्बाद करने के लिए नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना हमारा अधिकार है। मैं माँग करती हूँ कि हमारे काम की तारीफ और सम्मान किया जाए।”

पार्टी ने कहा, “हम अपनी माँग से पीछे नहीं हटेंगे। बिल को तुरंत लागू किया जाए, जिसमें OBC महिलाओं के लिए रिज़र्वेशन का प्रावधान हो।” इस मामले में ‘मोदी सरकार को एक्सपोज करने के लिए 15 शहरों में 15 प्रेस कॉन्फ्रेंस’ करने का दावा किया।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की वजह से यह बिल 2029 तक लागू नहीं होगा और यह “जुमला” 2024 के आम चुनाव में हारने के डर से दिया गया है।

दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ भी सरकार पर ऐसे ही आरोप लगा रही थीं, उनका कहना था कि वह महिलाओं को उनका हक नहीं दे रही है। AAP के राज्यसभा सांसद और दिल्ली एक्साइज पॉलिसी स्कैम में आरोपी संजय सिंह के मुताबिक, रिज़र्वेशन एक दिखावा है, क्योंकि सरकार हमेशा अपने वादों से पीछे रही है।

उन्होंने कहा, “इस बार महिलाओं को उन्होंने गुमराह किया है। यह उनका नया जुमला है। हमें यह भी नहीं पता कि बिल पास होने में कितना समय लगेगा, या यह कभी अप्रूव होगा भी या नहीं।” AAP की एक और नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री, आतिशी मार्लेना ने इस बिल को महिलाओं को बेवकूफ बनाने का एक तरीका बताया, क्योंकि यह आरक्षण 2024 के आम चुनाव के लिए नहीं था, बल्कि यह जनगणना और डिलिमिटेशन पर निर्भर करेगा। इसलिए, यह कम से कम अगले कुछ सालों तक लागू नहीं होगा।

ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी बिल को ‘जुमला’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की तारीखें तय नहीं थीं। इसलिए बिल 2029 तक भी लागू नहीं हो सका। उन्होंने मजाक उड़ाया कि यह ‘महिला रिज़र्वेशन रीशेड्यूलिंग बिल’ है और इसका नाम उसी के अनुसार होना चाहिए।

विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करती है। इस ट्रैक रिकॉर्ड के साथ विपक्ष अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दी हैं। उन्होंने सरकार पर आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर महिलाओं को गुमराह करने का आरोप लगाया है। अब सरकार ने वह घोषणा कर दी है, जिसकी माँग की जा रही थी। लेकिन, अब विपक्ष को दिक्कत महसूस हो रही है। पहले तुरंत लागू करने की जिद करने वाली विपक्षी पार्टियाँ अब असेंबली इलेक्शन का रोना रो रही है।

भारत एक बहुत बड़ा देश है और हर साल अलग-अलग राज्यों में इलेक्शन होते हैं। इसलिए जरूरी फैसलों को देश के किसी हिस्से में हो रहे विधानसभा चुनाव का बंधक नहीं बनाया जा सकता। विपक्षी पार्टियाँ एक तरह ‘एक देश, एक इलेक्शन’ का विरोध करती हैं। इनका मानना है कि इससे बीजेपी को फायदा होगा। इसलिए सच में विपक्ष के पास महिला आरक्षण बिल को टालने का कोई तर्क नहीं है। सिर्फ राजनीतिक चालों के लिए विरोध हो रहा है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

भारत को इस्लामी मुल्क बनाने के लिए महिलाओं का दस्ता तैयार कर रही थी हैदराबाद की सईदा बेगम, ISIS-अलकायदा से मिले अल-मलिक के लिंक: सीरिया तक फैला है नेटवर्क

आंध्र प्रदेश में देशभर में फैले एक संगठित कट्टरपंथी और आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ है। विजयवाड़ा पुलिस और आंध्र प्रदेश काउंटर-इंटेलिजेंस की अगुवाई में चले इस ऑपरेशन में अब तक 6 राज्यों से 12 संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके तार ISIS और अलकायदा जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों से जुड़े होने की आशंका है। इस गिरोह का नाम अल मलिक इस्लामिक यूथ बताया जा रहा है।

यह गिरोह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर करता था, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके। नेटवर्क के मास्टरमाइंड मोहम्मद रहमतुल्लाह शरीफ को 24 मार्च 2026 को विजयवाड़ा से अरेस्ट किया गया था।

उसके साथ मोहम्मद दानिश और मिर्जा सोहेल बेग को भी पकड़ा गया। जाँच में सामने आया है कि यह नेटवर्क भारत में युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, विदेशी हैंडलर्स से संपर्क रखने, साइबर आतंकवाद को बढ़ावा देने और भविष्य में आतंकी हमलों की साजिश रचने में सक्रिय था।

इन शुरुआती गिरफ्तारियों के बाद जाँच का दायरा तेजी से बढ़ा और आंध्र प्रदेश पुलिस ने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और राजस्थान में टीमें भेजीं। इसके बाद विभिन्न राज्यों से अन्य संदिग्धों की पहचान की गई और कुल 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

इनमें अल-हकीम शुकूर, मोहम्मद हुजैफा, निंजा, हेमरॉक्सी, अबू मुहरिब, अबू बलुशी और सईदा बेगम जैसे नाम सामने आए हैं।

‘खवातीन’ महिला विंग: हैदराबाद की सईदा बेगम हेड

इस जाँच का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘खवातीन’ नाम की महिला विंग का खुलासा है। यह एक अलग यूनिट थी, जिसे खास तौर पर महिलाओं की भर्ती और नेटवर्क विस्तार के लिए तैयार किया गया था। हैदराबाद की सईदा बेगम को इस महिला विंग की प्रमुख बताई गई है।

जाँच में सामने आया है कि सईदा बेगम पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में सक्रिय लोगों के संपर्क में थी और जिहादी गतिविधियों के समन्वय की योजना बना रही थी। एजेंसियों का मानना है कि इस महिला विंग के जरिए नेटवर्क समाज के एक नए वर्ग तक पहुँच बनाने की कोशिश कर रहा था।

विंग में शामिल महिलाओं को प्रचार, कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और नए सदस्यों को जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई थी।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से कट्टरपंथ: 40+ अकाउंट से इस्लामिक राष्ट्र बनाने की तैयारी

जाँच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क ने सोशल मीडिया को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया हुआ था। 40 से अधिक इंस्टाग्राम अकाउंट और कई एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए यह समूह सक्रिय रूप से कट्टरपंथी सामग्री फैला रहा था।

इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए ओसामा बिन लादेन, जाकिर नाइक, इसरार अहमद शेख और अनवर अल-अवलाकी जैसे व्यक्तियों के वीडियो शेयर किए जाते थे, ताकि मुस्लिम युवाओं को जिहाद और उग्र विचारधारा की ओर आकर्षित किया जा सके।

सदस्य मास्क पहनकर ISIS के झंडे के साथ तस्वीरें पोस्ट करते थे और ‘वन उम्माह’ जैसे नारे लगाते थे, जिससे एक वैश्विक इस्लामिक राज्य यानी ‘खिलाफत’ की मंशा जाहिर होती थी। समूह ने आपत्तिजनक और भड़काऊ सामग्री भी शेयर की थी, जिसमें राष्ट्रगान का अपमान करते हुए गाली-गलौज के साथ गाने और राष्ट्रीय ध्वज को जलाने जैसे वीडियो शामिल थे।

विदेशी हैंडलर्स, ‘हिजरत’ और आतंक प्रशिक्षण का प्लान

जाँच एजेंसियों के मुताबिक इस नेटवर्क के सीधे संपर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, बांग्लादेश और UAE में बैठे विदेशी हैंडलर्स से थे। इन हैंडलर्स के नाम अल-हकीम शुकूर, अबू बलुशी और अन्य उपनामों से सामने आए हैं। इन विदेशी संपर्कों के जरिए युवाओं को ‘हिजरत’ यानी भारत छोड़कर बाहर जाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

वहाँ पहले मजहबी तालीम और फिर आतंकी प्रशिक्षण देने का वादा किया गया था। प्रशिक्षण में स्नाइपर राइफल का इस्तेमाल, हथियार चलाना और IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) बनाना शामिल था। जाँच में ऐसे डिजिटल दस्तावेज और वीडियो बरामद हुए हैं, जिनमें ‘ब्लैक पाउडर’ और बम बनाने की विस्तृत जानकारी दी गई थी।

हैंडलर्स ने यह भी आश्वासन दिया था कि भारत में संभावित हमलों के लिए हथियार पाकिस्तान और अफगानिस्तान से उपलब्ध कराए जाएँगे। एजेंसियों को शक है कि इस नेटवर्क से जुड़े कुछ लोग पहले से ही विदेशों के मदरसों में कथित प्रशिक्षण ले रहे थे।

साइबर आतंकवाद, हैकिंग और तकनीकी साजिश, आतंकी साजिश का बड़ा मकसद: ‘खिलाफत’ की स्थापना

यह नेटवर्क केवल वैचारिक प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि साइबर आतंकवाद की दिशा में भी सक्रिय था। जाँच में सामने आया कि समूह के सदस्य सरकारी वेबसाइटों को हैक करने और साइबर हमले करने की योजना बना रहे थे। डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ऐसे कंटेंट भी साझा किए गए, जिनमें साइबर अटैक को अंजाम देने के तरीके बताए गए थे।

इससे साफ होता है कि यह नेटवर्क तकनीकी रूप से भी सक्षम बनने की कोशिश कर रहा था और केवल भौतिक हमलों तक सीमित नहीं था। जाँच एजेंसियों के अनुसार इस पूरे नेटवर्क का अंतिम उद्देश्य भारत में एक इस्लामिक राज्य या ‘खिलाफत’ स्थापित करना था।

‘वन उम्माह’ जैसे नारों और ISIS के प्रतीकों के इस्तेमाल से यह इरादा स्पष्ट होता है कि यह समूह एक वैश्विक कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित था। एजेंसियों का मानना है कि यह नेटवर्क भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है, जो विचारधारा, प्रशिक्षण और संसाधनों के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

फंडिंग, जाँच और आगे की कार्रवाई

सुरक्षा एजेंसियाँ अब इस नेटवर्क की फंडिंग के स्रोतों का पता लगाने में जुटी हैं। यह भी जाँच की जा रही है कि विदेशी हैंडलर्स से पैसे किस माध्यम से भारत में भेजे जा रहे थे और किन-किन लोगों तक यह फंडिंग पहुँची। इसके अलावा एजेंसियाँ उन युवाओं की पहचान करने की कोशिश कर रही हैं, जिन्हें इस नेटवर्क ने निशाना बनाया था या जो इसके संपर्क में आए थे।

संभावना है कि आने वाले समय में और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं। फिलहाल जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क की हर कड़ी को जोड़ने, इसके पूरे तंत्र को समझने और इसे पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए देशभर में व्यापक स्तर पर कार्रवाई कर रही हैं।

अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग फिर हुई तेज: आशावल से कर्णदेव सोलंकी की कर्णावती फिर अहमद शाह पर नामकरण, जानें- इस शहर का पूरा इतिहास

गुजरात की आर्थिक राजधानी और सबसे बड़ा शहर अहमदाबाद का नाम बदलकर उसके पुराने नाम ‘कर्णावती’ रखने की माँग एक बार फिर तेज हो गई है। पहले भी कई बार इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और अलग-अलग समय पर इसके लिए अभियान भी चलाए गए हैं। कई हिंदू संगठन लगातार इस माँग को उठाते रहे हैं कि शहर का नाम कर्णावती किया जाए। अब फिर से यह मुद्दा सामने आया है।

गुजरात विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राज्य सरकार और केंद्र सरकार से अहमदाबाद का नाम जल्द से जल्द कर्णावती करने की अपील की है। गुजरात इकाई के नेता अशोक रावल ने शनिवार (4 अप्रैल 2026) को एक वीडियो बयान जारी करके यह माँग रखी।

VHP के कर्णावती महानगर के फेसबुक पेज पर शेयर किए गए इस वीडियो में उन्होंने कहा कि “कर्णावती नाम हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यह सिर्फ एक नाम नहीं है, बल्कि हमारे पूर्वजों की पहचान और परंपरा का प्रतीक है। आज का अहमदाबाद शहर सदियों से कर्णावती के नाम से जाना जाता रहा है। हम भारत सरकार और गुजरात सरकार से निवेदन करते हैं कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए शहर का नाम तुरंत बदलकर ‘कर्णावती’ किया जाए।”

स्थानीय चुनावों की घोषणा होते ही यह बयान सामने आया है और इसके साथ ही हिंदू संगठनों की माँग भी तेज हो गई है। ऐसे में इस शहर के नाम का इतिहास जानना जरूरी हो जाता है। क्योंकि इस शहर को अलग-अलग समय में आशावल, कर्णावती और राजनगर के नाम से जाना जाता रहा है। इनमें इसका आखिरी नाम कर्णावती था, जबकि कई जैन ग्रंथों में इसे ‘राजनगर’ के नाम से भी बताया गया है।

लेकिन 14वीं शताब्दी के बाद धीरे-धीरे यह हिंदुओं का गौरवशाली शहर इस्लामी प्रभाव में आने लगा और आखिरकार कर्णावती का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद‘ हो गया। अब आइए इसके इतिहास पर एक नजर डालते हैं।

आशावल से कर्णावती नगरी तक

भारत के किसी भी इलाके या शहर का इतिहास आमतौर पर वैदिक काल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन वैदिक काल में उस जगह का कोई खास उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ आज अहमदाबाद बसा हुआ है।

इसका मतलब यह है कि उस समय वहाँ किसी बड़े शहर या बस्ती के होने के प्रमाण नहीं मिलते। हालाँकि, उस पूरे क्षेत्र को ‘अनर्त क्षेत्र’ कहा जाता था, जिसमें कच्छ और उत्तर गुजरात के कई हिस्से शामिल थे।

साबरमती नदी का जिक्र भी पुराणों में बाद में मिलता है और वहाँ इसका नाम ‘श्वभ्रवती’ बताया गया है। यानि पुराणों के समय तक भी इस इलाके में किसी विकसित शहर या कस्बे के होने के ठोस सबूत नहीं मिलते।

आधुनिक समय से पहले इसी क्षेत्र में ‘आशावल’ नाम का एक नगर बसाया गया। आज का अहमदाबाद, जिसे एक बड़े औद्योगिक और सांस्कृतिक शहर के रूप में जाना जाता है, उसकी जड़ें उसी समय से जुड़ी हैं जब इसे ‘आशावल’ या ‘आशापल्ली’ कहा जाता था।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था, स्थानीय शासन और भौगोलिक स्थिति को भी दर्शाता था। साबरमती नदी के किनारे बसी यह जगह व्यापारिक रास्तों और पानी की उपलब्धता के कारण धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण बस्ती बन गई।

इतिहासकारों के मुताबिक, आशावल क्षेत्र में भील समुदाय का दबदबा था और यहाँ राजा आशा का शासन बताया जाता है। यह जानकारी सिर्फ कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई ऐतिहासिक स्रोतों और क्षेत्रीय इतिहास में भी इसका जिक्र मिलता है। कई किताबों में बताया गया है कि आशावल, साबरमती नदी के किनारे बसी एक शुरुआती बस्ती थी, जो आगे चलकर बड़े राजनीतिक बदलावों का आधार बनी।

11वीं शताब्दी में अल-बिरूनी ने अपने ग्रंथ ‘अल-हिंद’ में आशावल का उल्लेख किया है। उस समय यह पाटन (अन्हिलवाड़) से खंभात तक जाने वाले व्यापार मार्ग पर एक अहम केंद्र था।

यह इलाका उस दौर में भील राजाओं के अधीन था और गुजरात के शुरुआती शहरों में गिना जाता था। वहीं, 14वीं शताब्दी के जैन विद्वान आचार्य मेरुतुंगा ने अपनी रचना ‘प्रबंधचिंतामणि’ में आशावल को एक गाँव के रूप में बताया है, जो सोलंकी राजाओं के आने से पहले का है।

इस बस्ती का नाम ‘आशापल्ली’ से पड़ा, जो आशा भील के नाम पर रखा गया था। उस समय यह कोई बड़ा शहर नहीं था, लेकिन व्यापार और स्थानीय आदिवासी हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र जरूर था।

यह समझना जरूरी है कि आशावल को सिर्फ एक छोटी बस्ती मानना ठीक नहीं होगा। यह वह समय था जब गुजरात के इस हिस्से में स्थानीय लोगों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को मजबूत किया।

नदी के किनारे होने के कारण यहाँ खेती, पशुपालन और छोटे स्तर का व्यापार अच्छे से विकसित हुआ, जिससे इस क्षेत्र में स्थिरता आई। यही स्थिरता आगे चलकर इसे आने वाले शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक केंद्र बनाने में मददगार बनी।

सत्ता परिवर्तन और कर्णदेव का आगमन

गुजरात के इतिहास में एक बड़ा बदलाव 11वीं शताब्दी के आखिरी दौर में आया, जब चालुक्य यानी सोलंकी वंश के राजा कर्णदेव सोलंकी ने इस क्षेत्र में कदम रखा। उस समय तक सोलंकी वंश गुजरात की राजनीति में एक मजबूत ताकत बन चुका था और उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ (पाटन) थी। कर्णदेव का शासन सिर्फ विस्तार तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने प्रशासन को मजबूत करने और संस्कृति को आगे बढ़ाने पर भी ध्यान दिया।

इतिहास के अनुसार, कर्णदेव ने आशावल क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और यहाँ एक नए और व्यवस्थित शहर की स्थापना की, जिसका नाम ‘कर्णावती’ रखा गया। यह सिर्फ नाम बदलने भर की बात नहीं थी, बल्कि एक नए राजनीतिक दौर की शुरुआत का संकेत था। उस समय के सोलंकी काल के साहित्य से भी यह पता चलता है कि कर्णदेव ने अपने शासन में नए इलाकों को विकसित किया और उन्हें बेहतर तरीके से संगठित किया।

कर्णावती की स्थापना एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसमें उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों में राजवंश अपने क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए नए शहर बसाते थे। इसमें सिर्फ किले या सरकारी इमारतें बनाना ही शामिल नहीं था, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था को भी नए सिरे से व्यवस्थित किया जाता था। कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर था, जहाँ शासन, धर्म, व्यापार और संस्कृति सभी का एक साथ विकास हुआ।

सोलंकी युग का उदय और कर्णावती की भूमिका

सोलंकी काल को गुजरात के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है और कर्णावती इस दौर का एक अहम हिस्सा था। इस समय गुजरात में वास्तुकला अपने चरम पर थी। मंदिरों का निर्माण, बावड़ियों (सीढ़ीदार कुओं) का विकास और शहरों की बेहतर योजना, इन सबमें काफी प्रगति हुई। उस समय राज्य सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बन चुका था।

चालुक्य काल के ग्रंथों से पता चलता है कि सोलंकी शासन के दौरान गुजरात में व्यापक सांस्कृतिक विकास हुआ। कर्णावती ऐसा स्थान था, जहाँ यह विकास साफ दिखाई देता है। ‘प्रबंधचिंतामणि’ में मेरुतुंगा ने लिखा है कि कर्णदेव ने आशावल में कर्ण सागर झील बनवाई और कर्णेश्वर देव (शिव मंदिर) का निर्माण कराया।

इसके अलावा जयंती माता मंदिर और अन्य संरचनाएँ भी बनवाई गईं। धीरे-धीरे कर्णावती गुजरात का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और पाटन (अन्हिलवाड़ पाटन) के बाद राजधानी के रूप में उभरकर सामने आया।

कर्णावती के विकास में सोलंकी शासकों ने मंदिरों, झीलों और व्यापार मार्गों को विकसित किया। उस समय यह शहर गुजरात की संस्कृति और अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र था। प्रसिद्ध इतिहासकार रत्नमणि राव भीमराव जोते, हरिप्रसाद शास्त्री और केशवराम काशीराम शास्त्री जैसे विद्वानों ने भी इन तथ्यों का समर्थन किया है।

आज कर्णावती के भौतिक प्रमाण पाटन या मोढेरा की तरह साफ तौर पर नहीं दिखते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसका महत्व कम था। इतिहास में कई ऐसे शहर रहे हैं, जिनका रूप समय के साथ बदल गया, लेकिन उनका जिक्र और उनकी पहचान इतिहास में बनी रही।

कर्णावती भी ऐसा ही एक शहर है, जो अपने समय में महत्वपूर्ण था और जिसने आगे आने वाले शहरों की नींव रखी। कर्णावती को लेकर इतिहासकारों के बीच एक दिलचस्प बहस भी है। कुछ इसे एक पूरी तरह विकसित शहर मानते हैं, तो कुछ इसे एक प्रशासनिक या क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं।

लेकिन इस मतभेद के बावजूद एक बात साफ है कि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी काल से जुड़ा हुआ है और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा रहा है। स्थानीय परंपराओं और साहित्य में इस नाम का लगातार जिक्र मिलता है, जिससे यह समझ आता है कि यह सिर्फ शासक का दिया हुआ नाम नहीं था, बल्कि समाज में भी इसे स्वीकार किया गया था।

यह निरंतरता इस बात को मजबूत करती है कि कर्णावती कोई अस्थायी नाम नहीं था, बल्कि एक स्थायी ऐतिहासिक पहचान थी, जिसे समय के साथ दबा दिया गया, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका।

आशावल एक ऐसी बस्ती थी जो स्थानीय लोगों, जनजातीय समाज और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित थी, जबकि कर्णावती एक संगठित, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से विकसित शहर के रूप में सामने आया।

यह बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं था, बल्कि इसने क्षेत्र की सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक रूप को भी बदल दिया। हालाँकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कर्णदेव का उद्देश्य पुराने नाम को पूरी तरह खत्म करना नहीं था, क्योंकि सोलंकी काल के साहित्य में आशावल और कर्णावती दोनों नाम साथ-साथ मिलते हैं।

आशावल और कर्णावती का इतिहास यह दिखाता है कि अहमदाबाद की पहचान 15वीं शताब्दी से शुरू नहीं होती, बल्कि उससे कई सदियों पहले से बन रही थी। कर्णावती उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का अहम चरण था, जब यह क्षेत्र अपने चरम पर था और आगे आने वाले समय की नींव रख रहा था।

यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं है, बल्कि इतिहास में बनी रहने वाली निरंतरता की है। नाम बदलते हैं, सत्ता बदलती है, लेकिन पहचान पूरी तरह खत्म नहीं होती। कर्णावती उसी निरंतरता का प्रतीक है, जो आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है और समय-समय पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रहती है।

कर्णावती से अहमदाबाद

14वीं और 15वीं शताब्दी का समय भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े राजनीतिक बदलावों का दौर था। दिल्ली सल्तनत के कमजोर पड़ने के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नई सल्तनतें उभरने लगीं, जिनमें गुजरात सल्तनत एक मजबूत शक्ति के रूप में सामने आई। इस बदलाव का असर सिर्फ शासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरों की बनावट, प्रशासनिक ढाँचे और सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ा।

15वीं शताब्दी की शुरुआत में मुजफ्फर वंश ने गुजरात में सत्ता संभाली। इस वंश के संस्थापक मुजफ्फर शाह प्रथम के बाद उनके पोते अहमद शाह प्रथम ने राजधानी को पाटन से कहीं और ले जाने का फैसला किया।

26 फरवरी 1411 को साबरमती नदी के किनारे मानेक बुर्ज पर अहमदाबाद की नींव रखने की बात कही जाती है। यह वही इलाका था, जिसे पहले कर्णावती या आशावल के नाम से जाना जाता था, लेकिन इतिहास में यह दर्ज है कि अहमद शाह ने यहीं अपना नया केंद्र बनाया।

इसी पृष्ठभूमि में अहमद शाह प्रथम का उदय हुआ, जिन्होंने 1411 ईस्वी में गुजरात सल्तनत की राजधानी को कर्णावती में स्थानांतरित किया। यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि सत्ता को मजबूत करने और एक नई पहचान बनाने की कोशिश भी थी।

‘अहमदाबाद स्थापना इतिहास 1411’ के अनुसार, अहमद शाह ने साबरमती नदी के किनारे एक नए शहर की नींव रखी, जिसे आगे चलकर ‘अहमदाबाद’ कहा गया। हालाँकि, इस कहानी में कुछ बातें अधूरी भी मानी जाती हैं, क्योंकि यह जगह पहले से ही ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी।

यहाँ आशावल और कर्णावती जैसे पुराने केंद्र पहले से मौजूद थे। सरल शब्दों में कहें तो अहमद शाह ने पूरी तरह नया शहर नहीं बसाया, बल्कि पहले से विकसित इलाके को अपने नाम से जोड़ दिया। बाद में इस शहर में ऐसी इमारतें भी बनाई गईं, जो इस्लामी शासन की पहचान को दर्शाती हैं।

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि अहमदाबाद बिल्कुल नए स्थान पर बसाया गया था। असल में यह उसी जमीन पर विकसित हुआ, जहाँ पहले से आशावल और कर्णावती जैसी बस्तियाँ थीं। यानी अहमद शाह ने नया क्षेत्र नहीं बनाया, बल्कि पहले से बसे और विकसित इलाके को नई पहचान देने का काम किया।

इस प्रक्रिया में पुराने नाम और पहचान धीरे-धीरे पीछे छूटते गए और एक नई पहचान सामने आई। भारतीय इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है, जब नए शासकों ने अपनी सत्ता को मजबूत दिखाने के लिए शहरों के नाम बदले और वहाँ अपनी शैली की इमारतें बनवाईं। प्रयागराज का इलाहाबाद नाम भी इसी तरह पड़ा था।

‘मिरात-ए-अहमदी’ जैसे फारसी ग्रंथों में भी यह बताया गया है कि अहमदाबाद का निर्माण एक योजनाबद्ध शाही परियोजना के रूप में हुआ था, जिसमें किले, प्रशासनिक इमारतें और धार्मिक ढाँचे शामिल थे।

नामकरण की कहानियों का प्रसार

‘अहमदाबाद’ नाम के पीछे एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक मतलब भी बताया जाता है। समय-समय पर यह बात कही जाती रही है कि इस शहर का नाम सुल्तान अहमद शाह के नाम पर रखा गया।

वहीं कुछ कहानियों में यह भी कहा जाता है कि इस नाम का संबंध चार ‘अहमद’ नाम के सूफी फकीरों या व्यक्तियों से था। कई किताबों में इस विषय पर जानकारी मिलती है और बताया गया है कि शहर का नया नामकरण सत्ता और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के मेल का नतीजा था।

यह नामकरण सिर्फ एक औपचारिक बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक साफ राजनीतिक संदेश भी था कि अब यह शहर एक नई सत्ता के अधीन है और उसकी पहचान भी उसी के अनुसार बदली जाएगी।

इसी प्रक्रिया में ‘कर्णावती’ नाम को धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से सरकारी कामकाज और आम इस्तेमाल से हटाया गया, ताकि ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो जाए। समय के साथ यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि लोगों की बोलचाल और साहित्य में भी गहराई से बस गया, और नाम बदलने के बाद भी यह लंबे समय तक बना रहा।

कर्णावती का इस्लामीकरण

इस्लामी शासक यह समझता था कि सिर्फ कर्णावती का नाम बदल देना ही काफी नहीं होगा। इसलिए उसने पूरे शहर के स्वरूप को बदलने पर जोर दिया। बड़े-बड़े इस्लामी स्मारक बनवाए गए, जिससे समय के साथ पुराने नाम और पहचान को पीछे छोड़ना आसान हो जाए और नई पहचान मजबूत बन सके।

अहमद शाह की धार्मिक सोच उसकी बनवाई गई इमारतों में साफ नजर आती है। कहा जाता है कि उसने पुराने मंदिरों को तोड़कर उनके पत्थरों का इस्तेमाल नई इमारतों में किया। भद्रकाली मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनने का जिक्र भी कई स्रोतों में मिलता है।

उस मस्जिद के स्तंभों पर आज भी कुछ पारंपरिक नक्काशी जैसे कमल, आकृतियाँ और अन्य डिजाइन दिखाई देते हैं, जिन्हें पुराने स्थापत्य से जोड़ा जाता है। भद्रा किले का नाम भी इसी क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है।

फारसी ग्रंथ ‘मिरात-ए-अहमदी‘ जैसे स्रोतों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि अहमद शाह ने 1413-14 के आसपास आशा भील के वंशजों को हराकर पुराने क्षेत्र पर अपना नियंत्रण मजबूत किया।

यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उस समय की सत्ता और संस्कृति को स्थापित करने की एक प्रक्रिया भी था। पुराने ढाँचे में बदलाव करके एक नई पहचान बनाई गई। आज भी अहमदाबाद के पुराने हिस्सों में इस इतिहास के निशान देखे जाते हैं।

2017 में यूनेस्को द्वारा शहर को विश्व धरोहर का दर्जा भी दिया गया, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दिखाता है, हालाँकि इसके अलग-अलग पहलुओं पर आज भी चर्चा होती रहती है।

अहमद शाह के समय में शहर में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए। किले, मस्जिदें और अन्य इमारतें बनाई गईं, जिससे शहर एक प्रशासनिक के साथ-साथ धार्मिक केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ।

भद्रा किला, जामा मस्जिद और अन्य संरचनाएँ इसी दौर की पहचान हैं। इससे शहर का स्वरूप काफी बदल गया जहाँ पहले स्थानीय शैली की बस्तियाँ थीं, वहीं अब नई स्थापत्य शैली सामने आई, जो उस समय की सल्तनत के प्रभाव को दिखाती थी।

यह बदलाव सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके साथ एक नई प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्था भी आई। शहर का नया नाम, नई इमारतें और नई व्यवस्था इन सबने मिलकर एक नई पहचान बनाई, जिससे पुरानी पहचान धीरे-धीरे कम होती चली गई। अहमदाबाद के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।

गुजरात सल्तनत के बाद मुगल सम्राट अकबर ने 1573 में अहमदाबाद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यह शहर मुगल साम्राज्य के गुजरात सूबे का एक अहम केंद्र बन गया। अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के समय में यहाँ व्यापार, कला और वास्तुकला का काफी विकास हुआ।

इसी दौर में अहमदाबाद को कपास और वस्त्र व्यापार का बड़ा केंद्र बनने की दिशा मिली, जिससे इसे आगे चलकर ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहा जाने लगा। इस दौरान बनी इमारतों में भी अलग-अलग स्थापत्य शैलियों का मेल देखने को मिलता है, जैसे जामा मस्जिद में कुछ पारंपरिक नक्काशी के तत्व आज भी दिखाई देते हैं।

अली मुहम्मद खान ने अपनी किताब ‘मिरात-ए-अहमदी’ में मुगल काल के अहमदाबाद को एक समृद्ध व्यापारिक शहर बताया है। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा, जिससे अहमदाबाद में भी अस्थिरता बढ़ी।

इसके बावजूद शहर का नाम अहमदाबाद ही बना रहा, क्योंकि बाद के शासकों ने उसी पहचान को जारी रखा। इस दौरान कर्णावती से जुड़े कुछ पुराने स्थल, जैसे कर्णसागर झील और कर्णेश्वर मंदिर, इतिहास के पन्नों में सीमित होकर रह गए।

क्या कर्णावती पूरी तरह खत्म हो चुका है?

अब सवाल यह उठता है कि क्या ‘कर्णावती’ नाम पूरी तरह खत्म हो गया था या किसी न किसी रूप में बना रहा था। इतिहास के अनुसार, सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर ‘अहमदाबाद’ नाम पूरी तरह स्थापित हो गया था, लेकिन स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक संदर्भों में ‘कर्णावती’ का नाम पूरी तरह गायब नहीं हुआ।

भारत के कई शहरों में ऐसा देखने को मिलता है, जहाँ आधिकारिक नाम बदल जाने के बाद भी पुराना नाम लोगों की यादों और परंपराओं में बना रहता है। कर्णावती का नाम भी इसी तरह इतिहास और संस्कृति में जीवित रहा, भले ही इसका सरकारी इस्तेमाल बंद हो गया।

समय के साथ अहमदाबाद एक बड़ा शहर बन गया, जिसने मुगल काल, मराठा काल और फिर ब्रिटिश शासन के दौरान भी अपनी पहचान बनाए रखी। इन सभी दौर में ‘अहमदाबाद’ नाम लगातार इस्तेमाल होता रहा, जिससे यह नाम स्थायी हो गया।

हालाँकि, ‘कर्णावती’ का ऐतिहासिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज के समय में जब इतिहास, पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा होती है, तो यह नाम फिर से सामने आता है।

कर्णावती नाम को वापस लाने की माँग भी कोई नई बात नहीं है। 1990 में भाजपा के नियंत्रण वाली अहमदाबाद नगर निगम ने इस संबंध में एक प्रस्ताव पास किया था। 2018 में उस समय के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने इस विषय पर कानूनी और अन्य पहलुओं की जाँच की बात कही थी।

2023 में ABVP और बजरंग दल ने इसके लिए अभियान चलाया और अप्रैल 2026 में विश्व हिंदू परिषद के अशोक रावल ने एक वीडियो बयान के जरिए AMC चुनाव से पहले भाजपा के घोषणापत्र में इस माँग को शामिल करने की अपील की।

इस माँग को कुछ लोग सभ्यतागत सुधार के रूप में देखते हैं, जैसे इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर किया गया। एक दृष्टिकोण के अनुसार, ‘अहमदाबाद’ नाम सुल्तान अहमद शाह के दौर की याद दिलाता है, जबकि ‘कर्णावती’ नाम सोलंकी राजा कर्णदेव से जुड़ी ऐतिहासिक पहचान को सामने लाता है। ‘प्रबंध चिंतामणि‘ और अन्य जैन-हिंदू ग्रंथों में भी इस विरासत का जिक्र मिलता है।

कुछ लोग यूनेस्को या अन्य पक्षों की चिंताओं से सहमत नहीं होते और मानते हैं कि इतिहास को सही रूप में सामने लाना जरूरी है। आज जब भारत आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पहचान को लेकर आगे बढ़ रहा है, तब अहमदाबाद का नाम कर्णावती करने की माँग को कुछ लोग गौरव से जोड़कर देखते हैं।

उनका मानना है कि नाम सिर्फ शब्द नहीं होता, बल्कि पहचान का प्रतीक होता है। आशावल और कर्णावती का इतिहास एक पुराने दौर की कहानी बताता है, जबकि अहमदाबाद एक अलग ऐतिहासिक चरण को दिखाता है।

यह विवाद सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह सवाल भी जुड़ा है कि किसी शहर की पहचान उसके मूल इतिहास से कितनी जुड़ी होनी चाहिए और उसे किस हद तक वापस लाया जा सकता है।

अहमद शाह के नाम पर बना अहमदाबाद आज एक आधुनिक शहर है, लेकिन इसके भीतर आशावल और कर्णावती की ऐतिहासिक परतें आज भी मौजूद हैं। ये परतें हमें यह समझाती हैं कि इतिहास कभी खत्म नहीं होता, बल्कि समय के साथ अपना रूप बदलता रहता है और जरूरत पड़ने पर फिर सामने आ जाता है।

संदर्भ :

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)






‘हिस्ट्री रिपीट इटसेल्फ’: डोनाल्ड ट्रंप के पोस्ट के जवाब में ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ की ईरान ने दिलाई याद, अमेरिकियों को 1980 में लौटना पड़ा था खाली हाथ

ईरान को तबाह करने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विवादित ट्वीट के बाद ईरान ने अमेरिकी की दुखती रग दबा दी है। भारत में मौजूद ईरानी दूतावास ने एक वीडियो शेयर किया है, जो 1980 में अमेरिका के असफल ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ की याद दिलाता है।

दरअसल दुनिया भर के देशों में मौजूद ईरानी दूतावास ने एक्स पर यह वीडियो शेयर कर अमेरिका का मजाक उड़ाया है। हालाँकि ईरान और अमेरिका में 45 दिनों के लिए सीजफायर को लेकर बातचीत चलने की बात सामने आई है। इसके बावजूद एक्स पर एक-दूसरे के खिलाफ माहौल बनाने में दोनों देश लगे हुए हैं।

ईरान ने ऑपरेशन ईगल क्लॉ की दिलाई याद

1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ में अमेरिका अपने नागरिकों को ईरान से छुड़वाने के लिए ऑपरेशन चलाया था। यह एक गुप्त ऑपरेशन था, जिसमें खराब मौसम और तकनीकी खराबी की वजह से विफल रहा। इस दौरान हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान की टक्कर में 8 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी।

भारत स्थित ईरानी दूतावास ने एक्स पर वीडियो पोस्ट किया है। इसमें 24 अप्रैल 1980 को ईरान के तबास रेगिस्तान में हुए अमेरिकी ऑपरेशन के मलबे और तबाही का मंजर दिख रहा है। इसमें लिखा गया है ‘History repeats itself'(इतिहास खुद को दोहराता है। ) ऑपरेशन ईगल क्लॉ ईरान की धरती पर एक यूएस सैनिकों की ऐतिहासिक हार।

वहीं थाइलैंड की ईरानी दूतावास ने एक्स पर लिखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जिस तरह से बच्चों की तरह गालियाँ देते हैं, उससे ऐसा लगता है कि अमेरिका उम्मीद से पहले ही पाषाण युग में पहुँच गया है।

अमेरिका राष्ट्रपति ने क्या कहा था

राष्ट्र्पति ट्रंप ने ईरान को पूरी तरह तबाह करने की धमकी दी है। उनका कहना है कि अगर ईरान मंगलवार (6 अप्रैल 2026) तक होर्मुज नहीं खोला तो पावर प्लांट और पुलों पर हमला किया जाएगा। उन्होने सोशल मीडिया ट्रूथ पर गालियाँ देते हुए अपनी बातें कहीं हैं। उन्होंने कहा है कि मंगलवार को ईरान में पावर प्लांट डे और ब्रिज डे, दोनों एक साथ मनाए जाएँगे। उन्होंने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट खोल दो, वरना तुम नरक में पहुँच जाओगे – बस देखते रहो!

क्या था ऑपरेशन ईगल क्लॉ

ये ऑपरेशन अमेरिका के लिए काले अध्याय से कम नहीं है, क्योंकि अमेरिकी सेना वहाँ अपने बंधकों को छुड़ाने गई थी और खुद ही फँस गई।

4 नवंबर 1979 को करीब 3000 चरमपंथी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया था और 63 अमेरिकियों को बंधक बना लिया। इतना ही नहीं अमेरिकी दूतावास के 3 स्टाफ को भी पकड़ लिया गया था। यह घटना ईरान में हटाए गए शासक मोहम्मद रजा शाह पहलवी को अमेरिका द्वारा पनाह देने के फैसले के दो हफ्ते के अंदर हुई थी। अमेरिका ने शाह पहलवी को इलाज के लिए आने की अनुमति दी थी।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने यूनाइटेड स्टेट्स से शाह को वापस करने और ईरान में पश्चिमी असर खत्म करने के लिए अभियान चलाया था। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक वार्ता के दौरान 13 बंधकों को मुक्त कर दिया गया। बाकी 53 बंधक अभी भी ईरान के पास थे। अप्रैल 1980 तक पाँच महीने तक नाकाम बातचीत के बाद अमेरिका गुप्त ऑपरेशन करने में योजना बनाया।

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 16 अप्रैल 1980 को एक मिलिट्री रेस्क्यू ऑपरेशन को मंजूरी दी। इस प्लान में अमेरिकी आर्म्ड सर्विसेज की चारों ब्रांच को शामिल किया गया। दो दिन के ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर और C-130 एयरक्राफ्ट को तेहरान से लगभग 200 मील दक्षिण-पूर्व में एक सॉल्ट फ्लैट (कोड-नेम डेज़र्ट वन) पर ले जाया गया। योजना बनाई गई कि वहाँ से हेलीकॉप्टर C-130 से फ्यूल भरेंगे और अमेरिकी सैनिकों को उस पहाड़ी पर ले जाएँगे, जहाँ से रेस्क्यू मिशन शुरू किया जाएगा। 19 अप्रैल 1980 को पूरे ओमान और अरब सागर में सेना तैनात कर दी गई।

24 अप्रैल 1980 को ऑपरेशन ईगल क्लॉ शुरू हुआ। 8 यूनाइटेड स्टेट्स नेवी RH-53D सी स्टैलियन हेलीकॉप्टर अरब सागर में अमेरिकन एयरक्राफ्ट कैरियर, USS निमित्ज़ के उड़े। वहीं 6 C-130 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ओमान के मसिराह द्वीप से उड़ान भरी।

एयरक्राफ्ट का सामना ईरान के रेगिस्तान में उठा भयंकर रेतीला तूफान ‘हबूब’ से हुआ। इससे विजिबिलिटी काफी कम हो गई। एयरक्राफ्ट को काफी नुकसान हुआ और क्रू के लोग बीमार पड़ गए।

ऑपरेशन शुरू होने से पहले ही विजिबिलिटी कम होने के बीच एक RH-53D हेलीकॉप्टर C-130 एयरक्राफ्ट से टकरा गया, जिसमें रीफ्यूलिंग के लिए एक्स्ट्रा फ्यूल था। ससे आग लग गई और 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए, जबकि कई घायल हुए।

ऑपरेशन को लेकर आ रही दिक्कतों की जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति कॉर्टर को दी गई और उन्होंने मिशन को बंद करने का फैसला लिया। इस तरह से अमेरिकी सेना खाली हाथ वापस लौटी। अमेरिकी लोगों को करीब 270 दिनों तक बंधक बना कर रखा गया था।

ईरान इसलिए अमेरिका को 1980 की याद दिला रहा है और ऑपरेशन ईगल क्लॉ के वीडियो शेयर कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी का जवाब ईरान इस रूप में दे रहा है। वहीं ईरानी उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने राष्ट्रपति ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अपने लोगों को बुनियादी सुविधाएँ नहीं दे पा रहा और ईरान से लड़ रहा है।