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मुस्लिम परिवार को दीवाली मनाते देख सलमान खान को लगी आग, Video से फैलाई घृणा: कट्टरपंथी बोले- अल्लाह फिलीस्तीन की जगह इनपे कहर बरसा

इंस्टाग्राम पर एक वीडियो सामने आई है जिसमें सलमान खान नाम के यूजर ने मुस्लिम परिवार के दीवाली मनाने पर उनके प्रति नफरत फैलाई है।

वीडियो में दिख रहा है कि एक मुस्लिम परिवार सड़क किनारे दीवाली मना रहा है। इसे शेयर करते हुए सलमान ने लिखा- “मुस्लिम परिवार दीवाली मनाते हुए 100 % रॉन्ग।”

इस वीडियो के नीचे कई कट्टरपंथियों ने भी रिप्लाई किया है। जैसे एक ने लिखा- ये लोग मुस्लिम ही नहीं है। इन्हें इनके पहनावे से मत जाँचो।

एक यूजर लिखता है- अस्तगफिरुल्लाह अल्लाह फिलिस्तीन की जगह जहाँ ऐसे मुस्लिम हैं वहाँ अपना कहर नाजिल फरमा जहाँ मुस्लिम कौम मुस्लिम कौम को ही न समझती हो।

अम्मू अंसारी ने लिखा- इतना भी गुमराह नहीं होना चाहिए मुसलमानों।

मोहम्मद नाफिश ने लिखा- अल्लाह की लानत हो ऐसे लोगों पर।

शहनाज लिखते हैं- इन्हें भी ऐसे ही जलाएँगे टाइम आने दो सबको सबका आजाब मिलेगा।

इनके अलावा ज्यादातर कट्टरपंथियों ने सलमान की वीडियो पर लिखा- ये लोग बोहरा लोग हैं। ये मुस्लिम नहीं होते है। ये कुफ्र होते हैं।

एक कट्टरपंथी यूजर ने लिखा- क्या कोई हिंदू बकरा ईद मनाता है। फिर आखिर कोई मुस्लिम हिंदू त्योहार कैसे मनाते हैं। अगर ऐसा है तो हिंदू को भी बकरा ईद मनानी चाहिए।

इस पोस्ट के सामने आने के बाद अब इस सलमान खान की आईडी को लेकर एक ट्विटर यूजर ने मुंबई पुलिस को शिकायत की है। इस पोस्ट में लिखा गया-

हेलो मुंबई पुलिस, सलमान खान नाम के शख्स नफरत भरे ढंग से मुस्लिमों की दीवाली मनाते एक वीडियो डाली है। वीडियो पर 1 लाख से ज्यादा व्यूज मिल गए हैं। इस ट्वीट के बाद एक्स यूजर्स भी मुंबई पुलिस से सलमान खान के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करने की माँग उठा रहे हैं।

नूहं में कुआँ पूजन के लिए जा रही महिलाओं पर पथराव, फुटेज के आधार पर मदरसे के तीन छात्र गिरफ्तार: एसपी बोले- कंट्रोल में हालात

हरियाणा के नूहं में ​फिर से तनाव पैदा हो गया है। इस बार में कुआँ पूजन के लिए जा रही हिंदू महिलाओं पर मदरसे से पथराव किया गया। गुरुवार (16 नवंबर 2023) की देर शाम हुई इस घटना में तीन महिलाएँ घायल हुई हैं। नूहं के सामुदायिक चिकित्सा केंद्र में उनका उपचार हो रहा है।

इस घटना के बाद वहाँ दोनों समुदायों के लोग जमा हो गए। पथराव की खबर मिलते ही नूहं पुलिस अधीक्षक नरेंद्र बिजारणिया भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुँचे। उन्होंने वहाँ पहुँचकर लोगों से शांत रहने की अपील की।

गौरतलब है कि नूहं में इसी साल 31 जुलाई को ब्रजमंडल यात्रा में शमिल हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला हुआ था। अब करीब चार महीने बाद फिर से इसी तरह की घटना सामने आई है। एसपी बिजारणिया ने कहा, “महिलाओं की शिकायत पर FIR दर्ज कर ली गई है… मदरसे से फुटेज आए थे जिसमें 3 लड़के खड़े दिख रहे थे। उसके आधार पर तीनों लड़कों की पहचान की गई है।”

उन्होंने आगे कहा, “इन तीनों को राउंडअप कर लिया गया है और अब इन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा… 8 महिलाओं ने FIR दर्ज कराई है और इन्हें मामूली चोटें आई हैं… हम तीनों लड़कों से पूछताछ कर रहे हैं कि यह घटना क्यों हुई… तीनों बच्चे नाबालिग हैं… हम महिलाओं द्वारा लगाए गए सभी आरोपों की जाँच करेंगे। स्थिति नियंत्रण में है।”

पुलिस के मुताबिक गुरुवार देर शाम करीब 8:20 पर ‘कुआँ पूजन’ के लिए जा रही महिलाओं के एक समूह पर पथराव किया गया। इसमें कई महिलाओं को चोटों आई। नूहं एसपी नरेंद्र बिजारणिया का कहना है कि शाम के वक्त कुछ महिलाएँ कुआँ पूजन के लिए जा रही थीं। पुलिस को शिकायत मिली कि इनके ऊपर मदरसे की तरफ से कुछ बच्चों ने पत्थर फेंके हैं। इसके बाद दोनों समुदायों के लोग इकट्ठे हो गए।

उन्होंने आगे बताया कि पुलिस ने दोनों पक्षों के लोगों को समझा-बुझाकर अपने-अपने घरों की तरफ भेजा। मदरसे के मौलाना मुफ्ती मोहम्मद जाहिद को बुलाया कर जानकारी ली गई है। आरोपितों के खिलाफ त्वरित और उचित कार्रवाई होगी। हम लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक नूहं के वार्ड नंबर 10 में रहने वाले राम अवतार के यहाँ बेटा पैदा हुआ था। रिवाज के मुताबिक उनके परिवार की महिलाएँ कुआँ पूजन के लिए बाजे-गाजे के साथ पास के शिव मंदिर में जा रही थी।

जब ये महिलाएँ मस्जिद के पास से गुजर रही थीं तो लगभग 20 से अधिक मदरसे के बच्चों ने उनपर पथराव किया। इस घटना की जानकारी होते ही हिंदू समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मौके पर जमा हो गए।

‘मुझे बंदी बना लिया गया है’: सोशल मीडिया फ्रेंड से मिलने नाइजीरिया गई असम की महिला बॉक्सर, कर लिया अपहरण

असम के गुवाहटी में रहने वाली एक महिला बॉक्सर व सर्टिफाइड जिम ट्रेनर को उनके ‘दोस्त’ ने नाइजीरिया में कथिततौर पर बंधक बना लिया है। महिला बॉक्सर की पहचान ‘बरनाली बौरा सैकिया’ के तौर पर हुई है। बताया जा रहा है कि नाइजीरिया के दोस्त से वह सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में आई थीं। इसी के बाद वो उससे मिलने गईं। शुरुआत में तो सब ठीक रहा लेकिन बाद में उन्हें कमरे में बंदी बना लिया गया और उनके घर फोन करके फिरौती के पैसे माँगे जाने लगे।

जानकारी के मुताबिक बरनाली को उनके दोस्त किंग और उसके साथी डेनियल ने बंधक बनाया है। वो लोग महिला बॉक्सर के घर फोन कर करके उनसे फिरौती माँग रहे हैं। अब घरवालों ने इस संबंध में एफआईआर दर्ज करवाई है। शिकायत में बताया गया है कि बरनाली के पति नयन सैकिया के जरिए किंग उनके घर के लोगों को जानने लगा था। धीरे-धीरे बरनाली और वो चैट करने लगे। दोस्ती इतनी घनिष्ठ हो गई कि बरनाली ने एक दिन टूरिस्ट वीजा पर नाइजीरिया जाने का निर्णय लिया और 28 अक्टूबर को बेंगलुरु से लागोस की फ्लाइट लेकर वो नाइजीरिया चली गईं।

नाइजीरिया में जाकर वह किंग से दोस्त बनकर मिलीं, लेकिन उनके उसी दोस्त ने उनको बंदी बना लिया। 3 दिन तक बरनाली अपने घर में संपर्क नहीं कर पाईं। चौथे दिन जाकर किसी तरह उन्होंने अपने घर एक वॉट्सऐप कॉल की और मदद माँगी। उन्होंने बताया कि वो एक कमरे में बंदी बनाकर रखी गई हैं। उन्हें खाने को खाना तक नहीं दिया जाता है

इसी बीच किंग के परिजन भी बरनाली को छोड़ने के बदले उनके घरवालों से फिरौती माँगने लगे और उनको धमकियाँ देने लगे। इस मामले में परिवार ने पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाई है। महिला बॉक्सर की बेटी ने बताया- “28 अक्टूबर को मेरी माँ बेंगलुरु से लागोस गई थी। शुरू में सब ठीक था लेकिन कुछ दिनों से उन्हें खाने को कुछ नहीं दिया जा रहा है, उन्हें बंदी बनाकर रख लिया गया है।”

ये शिकायत असम के डिसपुर पुलिस थाने में हुई है। शिकायत में कहा गया कि बरनाली की वापसी की टिकट 13 नवंबर की कराई गई थी लेकिन बरनाली को एयरपोर्ट तक नहीं आने दिया दिया गया। परिजनों ने दिल्ली क्राइम ब्रांच को भी संपर्क किया है। वहीं पति ने भारतीय प्रशासन अधिकारियों से भी मदद माँगी है ताकि उनके हस्तक्षेप से उनकी बीवी आराम से घर आ पाएँ।

पति ने बताया कि शुरू में नाइजीरिया में उनकी बीवी को एक होटल में रखा गया लेकिन बाद में एक कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। नयन के अनुसार वह अब तक 5 से 6 लाख रुपए किंग को दे चुके हैं, लेकिन उसने उनकी पत्नी को नहीं छोड़ा है।

‘400 हिन्दुओं को मार डाला, बहुत राहत मिली’: महिला मित्र को ‘Love’ के साथ नेहरू की चिट्ठी, गाँधी ने पूरे बिहार के हिन्दुओं को कहा ‘कुकर्मी’ और ‘पापी’

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है, चर्चाएँ हो चुकी हैं। उनमें प्रमुख हैं भारत का विभाजन और कश्मीर को लेकर उनकी नीति। देश खंडित हो गया और जम्मू कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। आपको ये जान कर हैरानी होगी कि जिस व्यक्ति को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया, वही हिन्दुओं के नरसंहार पर खुश होता था। लेकिन हाँ, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू को मुस्लिमों को लेकर बड़ी फ़िक्र रहती थी।

ये तो सबको पता है कि जब भारत को स्वतंत्रता मिलने और सत्ता हस्तांतरण से पहले बंगाल और पंजाब जैसे इलाके विभाजन के कारण दंगों से त्रस्त थे। बंगाल के नोआखली में दंगे सबसे ज़्यादा भड़के हुए थे और ये आग बिहार तक भी फैल गई। तब अंतरिम सरकार चला रहे जवाहरलाल नेहरू भी बिहार पहुँचे और उन्होंने देश की जनता पर ही हवाई बमबारी की धमकी दे डाली। सोचिए, बल-प्रयोग की आवश्यकता कश्मीर में थी तो उस मामले को वो अंतरराष्ट्रीय अदालत में घसीट कर ले गए और उससे पहले दंगों के कारण बौखला कर अपने देश की जनता पर ही हवाई हमले की धमकी देते थे।

उनका ये भाषण गया शहर में हुआ था जब उन्होंने एक जनसभा के दौरान ये धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि नोआखली में जो हुआ वो ठीक नहीं था लेकिन इससे बिहार में जो पाप हुआ वो नहीं धुल जाता। उन्होंने कहा था कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि बिहार के सीधे-सादे किसान इस तरह से कैसे पागल हो गए और जानवर बन गए। नेहरू ने यहाँ तक कहा था कि वो हत्याओं से व्याकुल नहीं हैं, क्योंकि सबको एक न एक दिन मरना है। साथ ही उन्होंने कहा था कि अगर कोई पागल हो जाए तो उसे पागलखाने ही भेजना पड़ेगा, ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता देने को लेकर विश्वास नहीं किया जा सकता।

अपने ही देशवासियों पर बमबारी की धमकी दी थी जवाहरलाल नेहरू ने

इस दौरान जवाहरलाल नेहरू खुद स्वीकार करते हैं कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बल-प्रयोग करना पड़ा है और सेना का इस्तेमाल करना पड़ा है। उन्होंने कहा था कि जब सरकार को गोलीबारी, मशीनगन से फायरिंग और लोगों पर बमबारी का रास्ता अख्तियार करना पड़े, तो ऐसे में जो दोषी हैं और जो निर्दोष हैं उन सभी को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने धमकाया था कि अगर अराजकता कायम रही तो ऐसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता। यानी, बंदूकों, मशीनगन और हवाई बम का इस्तेमाल किया जाएगा।

उन्होंने छात्रों से यहाँ तक अपील कर दी थी कि वो गाँवों में जाएँ और लोगों को समझाएँ, अगर इस प्रयास में वो मर भी जाते हैं तो ये श्रेयस्कर होगा, वो व्यक्तिगत रूप से उन्हें इस त्याग के लिए बधाई देंगे। जवाहरलाल नेहरू की ये बातें सुन कर स्पष्ट लगता है कि देश भर में फैले दंगों के कारण वो अशांत थे और इसका असर उनके मानसिक संतुलन पर भी पड़ा था। आम जनता को हवाई हमलों की धमकी देना, छात्रों को मरने के लिए कहना और किसानों को पागल बताना – क्या ये किसी हिसाब से ठीक है?

स्रोत: ‘सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहरलाल नेहरू’, सीरीज 2, वॉल्यूम 1

अब आते है उनके उस पत्र पर, जिसमें उन्होंने हिन्दू किसानों की हत्याओं पर जश्न मनाया था। इसके पीछे एक घटना थी – बिहार की राजधानी पटना से 40 किलोमीटर दूर स्थित स्थित नगरनौसा गाँव की। प्रखर श्रीवास्तव अपनी पुस्तक ‘हे राम‘ में बताते हैं कि कैसे नेहरू की उस धमकी के बाद से पुलिस और फ़ौज के हौसले बुलंद थे। घटना 5 नवंबर, 1946 की है। मद्रास रेजिमेंट ने भीड़ पर गोलीबारी की और 400 हिन्दू मारे गए। बिहार में चर्चा थी कि मृतकों की संख्या 1000 से ऊपर हो सकती है, नेहरू इसे 50-60 तक गिनते रहे।

महिला मित्र पद्मजा नायडू को जवाहरलाल नेहरू का पत्र

उसी दिन रात को जवाहरलाल नेहरू ने अपनी करीबी मित्र और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा है, “आधी रात के आसपास मैं थका-हारा होने के बावजूद तुम्हें क्यों लिख रहा हूँ, मैं खुद नहीं जानता। इस शाम मैं भागलपुर से हवाई मार्ग से लौटा। पहुँचने पर मुझे पता चला कि फ़ौज ने ग्रामीण इलाके में किसानों की एक भीड़ पर गोलीबारी की है, जिसमें 400 मारे गए हैं। सामान्यतः इस तरह का कुछ मुझे डरा देता, लेकिन क्या तुम यकीन करोगी? मैं ये जान कर अत्यंत चिंतामुक्त हो गया।”

उन्होंने आगे इस पत्र में लिखा है, “बात ये है कि हम बदलती परिस्थितियों के साथ खुद भी बदलते हैं क्योंकि ताज़ा अनुभवों एवं एहसासों की परतें हमारे पुराने विचारों को ढँक लेती हैं। हिन्दू किसानों की भीड़ ने कुछ ऐसा व्यवहार किया है, जो क्रूरता और अमानवीयता की चरम सीमा है। मैं नहीं जानता इन्होंने कितनों को मारा होगा, लेकिन ये संख्या बहुत ज़्यादा होगी। पिछले कुछ दिनों से इन्होंने बिना रोकटोक ये सब किया। इसीलिए, जब मुझ तक खबर पहुँची कि इनमें से 400 को मार डाला गया है, मुझे लगता है संतुलन थोड़ा ठीक किया गया है।”

अपनी अंतरंग मित्र पद्मजा नायडू को जवाहरलाल नेहरू ने लिखा पत्र

पत्र के अंत में वो पद्मजा नायडू को ‘Love’ लिखते हैं। सोचिए, 400 किसानों की हत्या पर जवाहरलाल नेहरू अपनी अंतरंग मित्र को लिखे पत्र में सिर्फ इसीलिए ख़ुशी जता रहे हैं क्योंकि वो हिन्दू थे। क्या ये व्यक्ति सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध उस देश के नेतृत्व के लायक था, जो उस समय विकट परिस्थितियों से गुजर रहा था और जहाँ एक ऐसे नेता की आवश्यकता थी जो उसकी पुरानी महिमा को वापस दिलाए, जनता को एक रख कर वापस अपनी मातृभूमि पर गौरव करना सिखाए।

जवाहरलाल नेहरू ने बाद में डैमेज कंट्रोल के लिए बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह को पत्र लिखा और और उन्हें इस गोलीबारी के संबंध में बयान जारी करने को कहा। इस पत्र में उन्होंने मृतकों की संख्या 250 बताई और ये भी कहा कि ये आँकड़ा तो किसी भी हिसाब से बड़ा है ही नहीं। असल में नेहरू चाहते थे कि इस गोलीबारी से उनका पल्ला झड़ जाए और बिहार सरकार पर सारी जिम्मेदारी चली जाए, नेता सार्वजनिक रूप से ये कह कर उन्हें बचाएँ कि उनके कहने पर कुछ हुआ ही नहीं।

जवाहरलाल नेहरू का तिहरा रवैया देखिए। पद्मजा नायडू को लिखे पत्र में वो आँकड़ा 400 बताते हैं, डॉ श्रीकृष्ण सिंह को लिखे पत्र में 250 और इस घटना के 20 दिन बाद 25 नवंबर, 1946 को वो कॉन्ग्रेस पार्टी के मेरठ अधिवेशन में ये आँकड़ा 50-60 बताते हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी नगरनौसा में हुई गोलीबारी का जिक्र अपनी पुस्तक ‘लोकदेव नेहरू’ में किया है। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें 1952 में राज्यसभा सांसद भी बनाया था।

इसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि 1946 में बिहार में भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान जब नेहरू बिहार आए थे तब वो अपनी ही देखरेख में फ़ौज से काम ले रहे थे। यानी, भारत की आज़ादी से पहले ही फ़ौज नेहरू के हाथों में आ गई थी। रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं कि फौजियों ने जब सैकड़ों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया तो पटना में नाराज़गी फ़ैल गई। जब वो नौजवानों के बीच भाषण देने सीनेट हॉल पहुँचे तब लड़कों ने उनका कुर्ता तक फाड़ डाला और उनकी टोपी उड़ा डाली।

तो ये थी जवाहरलाल नेहरू की इज्जत! जवाहरलाल नेहरू मुस्लिमों को बचाने के इरादे के साथ बिहार तो आए लेकिन नोआखली नहीं गए। महात्मा गाँधी ने तो इन दंगों के विरोध में बकरी का दूध और अन्न त्याग कर अर्ध-अनशन शुरू कर दिया था। 6 नवंबर को इसका ऐलान करते हुए उन्होंने पूरे बिहार को पापी कह डाला था। क्या बिहार में अगर कुछ लोगों ने गलती की भी होगी तो क्या इसके लिए सबको पापी कह दिया जाएगा? क्या नोआखली की घटना पर उन्होंने किसी कौम को या किसी पूरे राज्य को पापी कहा? हिम्मत ही नहीं थी। हिन्दू आसान निशाना थे।

नोआखली में क्या हुआ, बिहार तक पहुँची आग

इस लेख में बार-बार नोआखली दंगे की बात आई है तो आपके मन में ज़रूर सवाल उठ रहा होगा कि वहाँ क्या हुआ था। आज ये जगह बांग्लादेश में है, लेकिन अक्टूबर 1946 में यहीं पर हिन्दुओं का भयंकर कत्लेआम किया गया था। इसे भारत के विभाजन के लिए हुई हिन्दू विरोधी हिंसा की शुरुआत कह सकते हैं। इस इलाके में हिन्दू समृद्ध थे, जमींदार थे, मुस्लिमों का जीवन चलाते थे – उन्हीं मुस्लिमों ने उनका कत्लेआम किया। नोआखली और टिप्पेरा में हिंसा भड़काने के पीछे मौलाना सैयद गुलाम सरवर हुसैनी का नाम लिया जा सकता है।

असल में 22-24 मार्च, 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर सत्र में अलग मुस्लिम मुल्क के लिए प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद से ही नोआखली में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया गया था। सरवर ने अपने भाषणों में हिन्दू देवियों के लिए ‘वेश्या’ शब्द तक का इस्तेमाल किया था। 1930 के दशक में हिन्दुओं के नियंत्रण वाले बाजारों में खुल कर गोमांस की बिक्री शुरू कर दी गई। नोआखली में इस्लामी ‘मियार फ़ौज’ के बैनर तले भीड़ इकट्ठा कर के हिन्दुओं का नरसंहार किया जाता था।

महात्मा गाँधी ने नोआखली पहुँच कर गाँव-गाँव घूमना शुरू किया और नैतिकता की आड़ में हिन्दुओं को बदला न लेने के लिए कहने लगे, हिन्दू मरते रहे। 16 अगस्त, 1946, जिसे मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ नाम दिया था, उस दिन कलकत्ता में दंगे हुए थे और 10,000 लोग मरे गए थे जिनमें अधिकतर हिन्दू थे। हुसैन शाहिद सुहरावर्दी उस समय बंगाल का मुख्यमंत्री हुआ करता था और उसने इस्लामी भीड़ को आश्वासन दिया था कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

इसी दौरान गोपाल मुखर्जी के रूप में एक स्थानीय नेता उभरा और उसने कई हिन्दुओं की जान बचाई। उन्हें हम गोपाल पाठा के रूप में भी जानते हैं। अगर मुस्लिम लीग का कलकत्ता को पाकिस्तान में मिलाने का सपना पूरा नहीं हो पाया, उसमें इनका बड़ा योगदान था। उन्होंने महात्मा गाँधी के कहने के बावजूद अपने हथियार सौंपने से इनकार कर दिया था। मुस्लिम लीग ने अंत में उनसे हिंसा रोकने का निवेदन किया और हिन्दुओं की सुरक्षा की गारंटी दिए जाने के बाद उन्होंने बात मानी।

इन्हीं दंगों का असर बिहार में भी दिख रहा था। बिहार में उस साल जून और सितंबर में भी दंगे हो चुके थे। 27 अक्टूबर से लेकर 9 नवंबर तक स्थिति सबसे ज़्यादा बिगड़ गई। भारत के अंतरिम सरकार का गठन 2 सितंबर, 1946 को ही हो चुका था और जवाहरलाल नेहरू इसके मुखिया थे। वो भी मुस्लिमों पर हमले की खबर सुन कर बिहार पहुँचे। ध्यान दीजिए, वो नोआखली नहीं गए जहाँ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ था। 5 नवंबर, 1946 को महात्मा गाँधी ने बिहार दंगों के विरुद्ध अनशन की घोषणा कर के इसे तुरंत रोकने को कहा था।

महात्मा गाँधी ने पूरे बिहार को बताया ‘पापी’ और ‘कुकर्मी’

अगले दिन ऑस्ट्रेलियाई अख़बार ‘डेली मिरर’ में खबर छपी थी कि अंतरिम सरकार दंगों की खबर छापने को लेकर भी समाचारपत्रों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है। महात्मा गाँधी बिहार दंगों के समय कलकत्ता में थे और नोआखली के लिए जाने वाले थे। उन्हें बिहार में हुए दंगों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन पता नहीं उन्हें किसने बता दिया कि वहाँ केवल मुस्लिम ही मारे जा रहे हैं और इस जानकारी के आधार पर उन्होंने पूछा कि क्या बिहार के 14% मुस्लिमों को बर्बर तरीके से रौंद देना राष्ट्रवाद है?

6 नवंबर, 1946 को उन्होंने कहा था, “मुझे ये कहे जाने की ज़रूरत नहीं है कि मैं कुछ हजार बिहारियों की गलती के लिए पूरे बिहार को पापी न कहूँ। क्या बिहार एक बृजकिशोर प्रसाद और एक राजेंद्र प्रसाद का श्रेय नहीं लेता? मुझे भय है कि अगर बिहार में हिन्दुओं का कदाचार जारी रहा तो दुनिया भारत के सभी हिन्दुओं की निंदा करेगी। बिहारी हिन्दुओं के कुकृत्य कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के इस तंज को सही साबित करते हैं कि कॉन्ग्रेस एक हिन्दू संगठन है, भले ही ये अपने पदाधिकारियों में सिख, मुस्लिम, ईसाई, जैन और पारसी नेताओं के होने की बात करता हो।”

उन्होंने बिहारी हिन्दुओं पर भारत को कलंकित करने तक के आरोप मढ़ दिए थे। उन्होंने हिन्दुओं को नीचा दिखाते हुए कहा था कि तुम सब अपने अमानवीयता के लिए पश्चाताप करो और कॉन्ग्रेस नेताओं को आश्वस्त करो कि मुस्लिमों का उतना ही ख्याल रखोगे, जितना अपने भाई-बहनों का। उन्होंने हिन्दुओं को ये तक कहा था कि न सिर्फ मुस्लिमों को वापस बुलाएँ, बल्कि उनके घर बनवाएँ और मंत्रियों से उनकी मदद करने को कहें। ये थे हिन्दुओं के लिए महात्मा गाँधी के शब्द, बाक़ी नोआखली में कितने मुस्लिमों ने उनकी बात मानी ये इसी से समझ लीजिए कि आज ये क्षेत्र बांग्लादेश में है, एक इस्लामी मुल्क में।

कीवी के बाद अब कंगारू की बारी! भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होगा वर्ल्ड कप 2023 का फाइनल मैच, हेजलवुड-कमिंस-स्टार्क की चुनौती से निपटना होगा

ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित ईडन गार्डन्स में गुरुवार (16 नवंबर, 2023) को ICC वनडे वर्ल्ड कप 2023 का दूसरा सेमीफाइनल मैच खेला गया, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने दक्षिण अफ्रीका को 3 विकेट से हरा दिया। इसके बाद अब साफ़ हो गया है कि 19 नवंबर को अहमदाबाद स्थित नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फाइनल मैच होगा और जो जीतेगा वो नया वर्ल्ड चैंपियन बनेगा।

दक्षिण अफ्रीका ने इस मैच में टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी की, लेकिन उसका ये फैसला उसके पक्ष में नहीं गया और टीम मात्र 212 रनों पर ढह गई और पूरे 50 ओवर भी नहीं खेल पाई। दक्षिण अफ्रीका की तरफ से डेविड मिलर ने 116 गेंद पर 101 रन बना कर और हेनरी क्लासेन ने 48 गेंदों पर 47 रन बना कर संघर्ष किया, लेकिन बाक़ी के बल्लेबाज फ्लॉप रहे। जॉस हेजलवुड को दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज खेल ही नहीं पाए।

उनके 8 ओवरों में मात्र 12 रन ही बने। वहीं कप्तान पैट कमिंस ने न सिर्फ 3 विकेट झटके, बल्कि चेज करते हुए कप्तानी पारी भी खेली। वो अंत तक नाबाद रहे। ऑस्ट्रेलिया की तरफ से जहाँ ट्रेविस हेड ने 48 गेंदों पर 62 रनों की पारी खेली, वहीं उनके साथी सलामी बल्लेबाज डेविड वॉर्नर ने 18 गेंदों पर 29 रनों की तेज़-तर्रार पारी खेली। स्टीवन स्मिथ ने धीमे 30 रन बनाए, वहीं जॉस इंग्लिस ने 7वें नंबर पर उतर कर 28 रन बनाए। लेकिन, चेज में जीत सुनिश्चित किया ऑस्ट्रेलिया के मिशेल स्टार्क ने।

स्टार्क ने जहाँ गेंदबाजी में भी 10 ओवर में 3 विकेट झटके, वहीं बल्लेबाजी करते हुए भी 38 गेंदों पर16 रन जड़ दिए और अपनी टीम को जीत दिलाई। दक्षिण अफ्रीका के विकेटकीपर बल्लेबाज क्विंटन डिकॉक ने इसके साथ ही अपना अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच खेला। उन्होंने अब संन्यास ले लिया है। ऑस्ट्रेलिया इससे पहले 5 बार वनडे वर्ल्ड कप जीत चुका है। ये छठी बार होगा जब वो ट्रॉफी के लिए भिड़ेगा। अब देखना है कि फाइनल में भारत कंगारुओं की चुनौती से कैसे पार पाता है।

‘मुझे एक बार भी कॉल नहीं किया’: वर्ल्ड कप में शमी ने चटकाए धुआँधार विकेट्स तो छलका बीवी का दर्द, बोलीं – उसे फादर होने का ही एहसास नहीं

ICC वनडे वर्ल्ड कप 2023 में मोहम्मद शमी शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यूजलैंड के खिलाफ 15 नवंबर 2023 को हुए सेमीफाइनल मैच में 7 विकेट लेकर उन्होंने नया रिकॉर्ड बनाया है। इसके बाद देश भर में मोहम्मद शमी की वाहवाही हो रही है। पूरा देश उन्हें शुभकामनाएँ दे रहा है। इसी बीच उनकी बीवी हसीन जहाँ ने भी शमी को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है।

यूपी तक से बातचीत में हसीन जहाँ ने कहा, “मेरे मालिक मेरे रब ही हैं। अब जो मेरी किस्मत में होगा, वो देखा जाएगा। तो फ्यूचर को लेकर मैं इतना भी चिंतित नहीं रहती हूँ।” हसीन जहाँ ने कहा कि क्रिकेटर मोहम्मद शमी का उनके पास कभी फोन नहीं आता है।”

हसीन जहाँ ने कहा, “एक फादर होने का अहसास होना चाहिए… उसने मेरे साथ जो भी दुश्मनी क्रिएट करके रखा है, लेकिन फिर उसे ये अहसास होता कि वह एक फादर है…. ये चीजें मैंने कभी अहसास नहीं किया है और ना उसने (शमी) ने करवाया है। मेरी बच्ची ने तो कभी अहसास किया ही नहीं कि हाँ मेरे फादर हैं या फादर की रिस्पॉन्सिब्लिटी वो उठाए। काश वो एक अच्छा प्लेयर होने के साथ-साथ एक अच्छा हसबैंड, एक अच्छा फादर और एक अच्छा इंसान भी होता।”

बताते चलें कि वर्ल्ड कप 2023 के सेमीफाइनल्स में मोहम्मद शमी के धुआँधार प्रदर्शन के बाद जहां पूरा देश उनकी गेंदबाजी की तारीफ करते नहीं थक रहा, वहीं उनकी बीवी हसीन जहां का भी एक वीडियो इंस्टाग्राम पर सामने आया है। इस वीडियो में वो एक गाने पर लिप्सिंग करते और शर्माते हुए नजर आ रही हैं।

इस वीडियो के कैप्शन में लिखा है- “प्योर लव।” जिस गाने पर शमी की बीवी ने वीडियो बनाया है। उसके लिरिक्स हैं- “तेरे नाम से ही मुझको दुनिया वाले जानेंगे। तेरी सूरत देखकर ही लोग मुझे पहचानेंगे।” हसीन जहां की रील देखने के बाद अब मोहम्मद शमी के फैंस ताबड़तोड़ कमेंट कर रहे हैं। 

शौहर-बीवी के बीच है विवाद

दरअसल, मोहम्मद शमी और उनकी बीवी हसीन जहाँ के बीच साल 2018 से ही विवाद है। हसीन जहाँ ने शमी पर न सिर्फ अपनी प्रताड़ना, बल्कि मैच फिक्सिंग का भी आरोप लगाया था। उस समय शमी ने कहा था कि उन्हें नहीं पता कि उनकी बीवी को कौन भड़का रहा है। मैच फिक्सिंग के आरोपों पर शमी ने कहा था कि वे देश से गद्दारी के बजाए मरना पसंद करेंगे।

बाद में शमी और हसीन जहाँ अलग-अलग हो गए थे। कोलकाता की अलीपुर जिला अदालत ने 23 जनवरी 2023 को अपने निर्णय में मोहम्मद शमी को आदेश दिया था कि वो हर महीने हसीन जहाँ को 50 हजार रुपए गुजारा भत्ता के तौर पर दें। इसके बाद हसीन ने दोबारा शमी की गिरफ्तारी के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अपनी याचिका में उन्होंने दावा किया कि भारतीय गेंदबाज मोहम्मद शमी वेश्याओं के साथ संबंध बनाते हैं। विदेशी दौरों पर होटल रूम में वेश्याओं को लेकर आते हैं। हसीन जहाँ के अनुसार, शमी ने वेश्याओं के संपर्क में रहने और उनसे अवैध संबंध बनाने के लिए अपने दूसरे मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया। उस फोन को कोलकाता की लाल बाजार पुलिस ने जब्त कर लिया है।

हसीन जहाँ ने अपनी याचिका में यह भी कहा था, “शमी अभी भी वेश्याओं के साथ यौन गतिविधियों में शामिल हैं। पिछले 4 साल से इस मामले में सुनवाई आगे नहीं बढ़ी है। शमी निचली अदालत में पेश नहीं हुए और जमानत के लिए आवेदन भी नहीं किया।”

जिसने महिला की लाश को नग्न कर निकाली थी परेड, उस आतंकी को अब इजरायल ने मार गिराया: शव पर थूक रहे थे हमास के आततायी, वीडियो हुआ था वायरल

हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमला करके 1400 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस दौरान एक महिला का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें हमास के आतंकी महिला को निर्वस्त्र करके पिकअप गाड़ी में लादकर ले जा रहे थे और उसके शरीर पर थूक रहे थे। अब महिला के साथ तरह का क्रूर व्यवहार करने वाले आतंकी को इजरायल की सेना ने मार गिराया है। इतना ही नहीं, हमास के राजनीतिक प्रमुख इस्लाइल हनियेह के आवास पर भी हमला किया है।

इजरायल पर हमले के दिन एक महिला को मारकर उसे गाजा की गलियों में घुमाया गया था। इस महिला की पहचान इजराइली मूल की जर्मन नागरिक शानी लूक के रूप में हुई थी। वीडियो में महिला का चेहरा नहीं दिख रहा था, लेकिन उसके शरीर पर बने टैटू से शानी की माँ ने उसकी पहचान की थी। दो सप्ताह पहले शानी की खोपड़ी बरामद की गई थी।

दरअसल, 22 साल की शानी लूक इजराइल के नोवा म्यूजिक फेस्टिवल में शामिल हुई थी। उस दौरान हमास के आतंकियों ने शानी को पकड़ लिया था। इजरायल से गाजा ले जाने के बाद शानी का यौन उत्पीड़न किया गया था। इसके बाद उसके पैर तोड़ दिए गए। फिर हत्या करके उसके शव का जुलूस निकाला गया था, जिस पर गाजा सैकड़ों मुस्लिमों ने थूका था।

इजरायल की डिफेंस फोर्सेस को 30 अक्टूबर को गाजा में शानी की खोपड़ी मिली थी। इसको लेकर इजरायली राष्ट्रपति ने कहा था, “इसका मतलब यह है कि हमास के जानवरों ने शानी का सिर कलम कर दिया था।” शानी के अलावा गाजा से कई इजरायली महिलाओं के साथ उत्पीड़न के सबूत मिले थे।

बेटी की मौत की जानकारी मिलने पर शानी की माँ ने कहा था, “ये सोचकर मैं खुश हूँ कि उसने अपने साथ हुई ज्यादती नहीं देखी। उसने नहीं देखा कि हमास उसके शरीर के साथ क्या कर रहा है।” शानी की माँ रिकार्डा लूक ने बताया कि उनकी बेटी के शव को अपने पैरों से दबाकर जुलूस निकालने वाले हमास आतंकी को इजरायल की सेना ने मार गिराया है।

उधर, गाजा में इजरायल का ऑपरेशन जारी है। इज़रायली सेना ने हमास के आतंकवादियों की मौजूदगी का दावा करते हुए अल शिफ़ा अस्पताल में एक “लक्षित ऑपरेशन” चलाया। इस कदम की संयुक्त राष्ट्र और अरब देशों ने निंदा की है, जिससे इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने ऑपरेशन का बचाव किया है।

जो बाइडेन ने कहा कि हमास ने अस्पताल के नीचे सैन्य मुख्यालय बना रखा है। यहाँ पर हमास के सीनियर लीडर मुलाकातें करते हैं। वहीं, इजरायल के वायुसेना और थलसेना ने आपसी समन्वय बनाकर हमास के नेता इस्माइल हनीयेह के गाजा स्थित घर को निशाना बनाया है।

दरअसल, इस्माइल ने नवंबर के शुरू में मुलाकात करके ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनाई से समर्थन माँगा था और इजरायल के साथ युद्ध में हमास की ओर से आने का आग्रह किया था। हालाँकि, खामनेई ने युद्ध में भाग लेने से साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे हमास को नौतिक और राजनीतिक समर्थन देते रहेंगे।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई ने मिलने आए हमास के नेता से कहा था कि 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर किए गए हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इसलिए हमास की ओर से ईरान युद्ध में हिस्सा नहीं लेगा। वहीं, हमास के ठिकाने से बरामद हुए दस्तावेजों से पता चला है कि हमले से पहले ईरान आतंकी संगठन हमास को हथियार बनाने में मदद देना चाहता था।

कैमरे के सामने कपड़े बदलती बॉलीवुड अभिनेत्री: रश्मिका मंदाना और सारा तेंदुलकर के बाद काजोल बनीं डीपफेक का शिकार, वीडियो वायरल

आजतक बॉलीवुड अभिनेत्रियाँ से लेकर कई हस्तियाँ तक डीपफेक (DeepFake) का शिकार हो रही हैं। रश्मिका मंदाना, सारा तेंदुलकर के बाद काजोल इसकी शिकार बनी हैं। बॉलीवुड अभिनेत्री काजोल का एक अश्लील वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में वो कैमरे के सामने कपड़े बदलती नजर आ रही हैं।

यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। हालाँकि, बाद में इसे डिलीट कर दिया है। इस वीडियो को AI डीपफेक तकनीक से एडिट किया गया था, जिसमें असली और नकली का भेद कर पाना थोड़ा मुश्किल होता है। इस वीडियो पर काजोल के फैंस ने गहरी नाराजगी जताई है।

हालांकि, यह भी कहा जा रहा है कि जिस महिला का वीडियो शेयर करके उसे काजोल का बताया जा रहा है वह एक सोशल मीडिया एंफ्लुएंसर है। इसका नाम रोजी ब्रीन है। रोजी टीक-टॉक के जरिए फेमस हुई थीं। काजोल से जुड़ा हुआ वीडियो रोजी ने जून में शेयर था। उस वीडियो में रोजी के चेहरे से छेड़छाड़ करके अब काजोल का चेहरा लगा दिया गया है और वायरल कर दिया गया है।

बताते चलें कि काजोल से पहले रश्मिका मंदाना, सारा तेंदुलकर, कैटरीना कैफ, ऐश्वर्या राय जैसी कई अभिनेत्रियों की तस्वीरें एवं वीडियो को एडिट कर वायरल किया जा चुका है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर खूब हंगामा भी होता है।

अपनी डीपफेक वीडियो वायरल होने के बाद अभिनेत्री रश्मिका मंदाना ने दिल्ली पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई है। दरअसल दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक यूनिट ने इसे लेकर अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। यहीं नहीं पुलिस टीम बनाकर ने आनन-फानन में इस केस की जाँच भी शुरू कर दी है।

अपने इस वीडियो को लेकर रश्मिका मंदाना ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा था, “मुझे अपने ऑनलाइन फैलाए जा रहे डीप फेक वीडियो पर बात करते और इसे शेयर करते हुए बेहद दुख हो रहा है। ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा कुछ, न केवल मेरे लिए, बल्कि हममें से हर एक के लिए बेहद डरावना है, जो आज तकनीकी के बेजा इस्तेमाल की वजह से खतरे में हैं।”

रश्मिका ने आगे लिखा था, “मैं आज एक महिला और एक अभिनेत्री के नाते अपने परिवार, मित्रों और शुभेच्छुकों का धन्यवाद करती हूँ क्योंकि वह मेरे सपोर्ट सिस्टम हैं। हालाँकि, अगर ऐसा कुछ मेरे साथ स्कूल या कॉलेज में हुआ होता तो मुझे नहीं मालूम मैंने इसका सामना कैसे किया होता। हमें इससे एक समाज के तौर उससे पहले लड़ना होगा जब तक यह और लोगों की पहचान चुराए।”

जो वीडियो वायरल हुआ है, Deepfake नामक AI (आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस) तकनीक का इस्तेमाल कर के इसे हूबहू रश्मिका मंदाना की तरह बना दिया गया है। दरअसल, यह जारा पटेल की वीडियो में छेड़छाड़ करके बनाई गई थी। जारा एक ब्रिटिश-इंडियन इन्फ्लुएंसर हैं, जो अक्सर अंतरंग वस्त्रों में तस्वीरें और वीडियो अपलोड करती रहती हैं। इंस्टाग्राम पर उनके 4.32 लाख फॉलोवर्स हैं।

वहाँ उन्हें बिकनी में कई तस्वीरें अपलोड कर रखी हैं। लेकिन, किसी ने उनके एक वीडियो का गलत इस्तेमाल किया और इसमें उनकी जगह रश्मिका मंदाना को दिखा दिया। अमिताभ बच्चन तक ने इस वीडियो का संज्ञान लिया था और कहा कि इस पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

वहीं, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं टेक्नोलॉजी राज्यमंत्री राजीव चंद्रशेखर ने भी कहा था कि इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे सभी डिजिटल नागरिकों की सुरक्षा एवं भरोसे को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

कॉर्पोरेट और विदेशी हस्तक्षेप का कारण बनते चुनावी बॉन्ड: राजनीतिक दलों के लेनदेन में जनता ही गौण, जानिए क्यों गड़बड़ है अनियंत्रित, असीमित और अपारदर्शी दान वाली ये व्यवस्था

लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली में वित्तीय लेन-देन की पारदर्शिता एक अपरिहार्य आवश्यकता है। सबसे अधिक आबादी वाले लोकतंत्र भारत में चुनावी बॉन्ड के माध्यम से 2017 में तथाकथित साफ-सुथरे वित्तपोषण की शुरुआत की गई। लेकिन, प्रारम्भ से ही इस व्यवस्था ने एक तीखी बहस छेड़ दी है। यह बहस चुनावी बॉन्डों की गोपनीयता बनाम लोकतांत्रिक पारदर्शिता की है। चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के अपारदर्शी और संदिग्ध लेन-देन को नियंत्रित करने के लिए चुनावी बॉन्ड योजना का सूत्रपात किया गया था।

लेकिन, अब यह व्यवस्था संदेह के घेरे में आ गई है और भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा उसकी समीक्षा की जा रही है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित संविधान पीठ के समक्ष प्रस्तुत याचिकाएँ चुनावी बॉन्ड योजना (EBS) द्वारा अनुमत ‘चयनात्मक गोपनीयता’ पर प्रश्न उठाती हैं। यह एक गंभीर मुद्दे को सामने लाती हैं कि क्या विशिष्ट व्यक्तियों या कंपनियों की गोपनीयता को अनुच्छेद 19(1) द्वारा प्रदत्त सामान्य आबादी के सूचना के संवैधानिक अधिकार से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए?

मुख्य न्यायाधीश DY चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में 5 जजों की संविधान पीठ ने 2 नवंबर, 2023 को चुनावी बॉन्ड की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। इसके साथ ही, इस संविधान पीठ ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए भारत के चुनाव आयोग को 30 सितंबर, 2023 तक भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त चंदे का समग्र और विस्तृत विवरण प्रकाशित करने को कहा है। साथ ही, अदालत ने टिप्पणी की है कि प्रथम दृष्टया यह योजना ‘गंभीर त्रुटियों’ और ‘अपारदर्शिता’ से ग्रस्त है।

इस पृष्ठभूमि में इस व्यवस्था की समीक्षा करना समीचीन है। भारत में चुनावी बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 के बजट के दौरान तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य राजनीतिक चंदे के लेन-देन में पारदर्शिता लाना और देश के राजनीतिक वित्तपोषण परिदृश्य को स्वच्छ बनाना था। यह सुधार कॉर्पोरेट चंदे को व्यवस्थित करने और राजनीतिक क्षेत्र में प्रचलित अघोषित, अपारदर्शी वित्तपोषण की समाप्ति पर केंद्रित था।

चुनावी बॉन्ड व्यक्तियों और कंपनियों को यह सुविधा देते हैं कि वे गोपनीय ढंग से भारतीय राजनीतिक दलों को आर्थिक सहायता प्रदान कर सकते हैं। नियंत्रण और विनियमन सुनिश्चित करने के लिए केवल वे राजनीतिक दल, जिन्होंने हालिया संपन्न राष्ट्रीय चुनावों में कम से कम 1 प्रतिशत मत हासिल किए हैं, इस प्रकार के बॉन्ड्स की प्राप्ति और नकदीकरण के पात्र हैं। 1000 रुपए से लेकर 100 करोड़ रुपए तक के इन बॉन्डों को केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की निर्धारित शाखाओं से ही खरीदा जा सकता है।

इन्हें खरीदने के लिए बैंक हस्तांतरण या इलेक्ट्रॉनिक भुगतान जैसी पहचान योग्य लेन-देन पद्धतियों का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। इसमें दानकर्ताओं की पहचान गुप्त रखी जाती है। राजनीतिक दल 15 दिनों की निश्चित अवधि में बॉन्ड को गोपनीय ढंग से भुना सकते हैं और इस राशि का उपयोग चुनावी प्रचार अभियान आदि में कर सकते हैं। इन चुनावी बॉन्डों की खरीद पर कोई संख्यात्मक सीमा निर्धारित नहीं है तथा इनका व्यक्ति अथवा कम्पनी की आय और अर्जित लाभ से भी कोई समानुपातिक संबंध नहीं है।

पहले ₹20,000 से अधिक के राजनीतिक चंदे के लिए चुनाव आयोग को सूचित करना अनिवार्य था, जो दानदाताओं के लिए आयकर कटौती प्राप्त करने का भी आधार था। हालाँकि, चुनावी बॉन्ड की शुरुआत के बाद दानकर्ता अब पिछली प्रकटीकरण आवश्यकताओं से बचते हुए गुमनाम और गोपनीय ढंग से ₹20 करोड़ से लेकर ₹200 करोड़ तक की बड़ी राशि का योगदान कर सकते हैं। इस विधायी संशोधन ने राजनीतिक दलों को तीन महत्वपूर्ण स्वतंत्रताएँ प्रदान की हैं।

पहली, आयकर अधिनियम- 1961 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम- 1951 के तहत चुनावी बॉन्ड से प्राप्त योगदान की सूचना देने या प्रकाशित करने की अनिवार्यता से मुक्ति। इससे पारदर्शिता न्यूनतम हो गयी है। दूसरी, कंपनी अधिनियम- 2013 के तहत कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले दान की ऊपरी सीमा की समाप्ति। इससे अनियंत्रित और असीमित वित्तीय सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो गया है। तीसरी, विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम- 2010 के तहत विदेश से धन प्राप्ति के मामले में राजनीतिक दलों के लिए विशेष छूट का प्रावधान। इससे राजनीतिक दलों के नीति-निर्माण और निर्णय-प्रक्रिया में बाहरी प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आशंका बढ़ गई है।

चुनावी बॉन्ड का इरादा राजनीतिक वित्त पोषण को स्वच्छ बनाने का था, लेकिन इसने अनेक आशंकाओं को जन्म दिया है। इस व्यवस्था के आलोचकों के अनुसार गोपनीयता का प्रावधान मुख्यरूप से सत्तारूढ़ दल का हितसाधन करता है। चुनावी बॉन्ड का जारीकर्ता भारतीय स्टेट बैंक है, जो कि एक सरकारी बैंक है। इससे सरकार द्वारा विपक्षी दलों को चंदा देने वाले दानकर्ता की पहचान की ट्रैकिंग की आशंका बनी रहती है और उसके संभावित उत्पीड़न या बदले की कार्रवाई की चिंताएँ करती है। इससे सत्तारूढ़ दल को चुनावी बॉन्डों की प्राप्ति में अवांछित वरीयता, बढ़त और लाभ मिलती है। 

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर) नामक याचिकाकर्ता ने तीन बुनियादी आधारों पर चुनावी बॉन्ड योजना की संवैधानिकता को चुनौती दी है:

पहला, जानकारी का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भाषण के अधिकार के अंतर्गत आता है, जोकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में वर्णित है। हालाँकि, यह योजना चयनात्मक गोपनीयता को प्रश्रय देती है, जिसमें दान प्राप्तकर्ताओं को तो दानकर्ता की जानकारी होती है, लेकिन उसकी पहचान जनता से अप्रकट रहती है। दूसरा, यह भेदभावपूर्ण है क्योंकि इससे राजनीतिक दल आसानी से विदेशी अनुदान प्राप्त कर सकते हैं, जबकि मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों आदि के लिए सख्त नियमावली और पाबंदियां हैं।

तीसरा, यह व्यवस्था अनुचित प्रभाव, पक्षपात और प्रताड़ना की संभावना को बल देती है, क्योंकि कॉर्पोरेट संगठन बड़े चंदे के जरिए सत्तारूढ़ दलों के साथ अनुकूलता बनाते हुए अपने पक्ष में नीति-निर्माण करा सकते हैं। यह चुनावी बॉन्ड व्यवस्था में अंतर्निहित गोपनीयता की आड़ में सहज संभव है। भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता द्वारा अदालत में यह कहना कि राजनीतिक वित्तपोषण में दानदाताओं और प्राप्तकर्ताओं के खुलासे को जनता या मतदाता के जानने के अधिकार के रूप में नहीं देखा जा सकता, चिंताजनक और गैर-जिम्मेदाराना है।

इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि राजनीतिक दानों की गोपनीयता बनाए रखने के प्रावधान को अनुच्छेद 19(2) में निर्दिष्ट उचित प्रतिबंधों के तहत मूल्यांकित किया जाना चाहिए। उनका यह दृष्टिकोण उन पारदर्शिता मानकों के सर्वथा प्रतिकूल है जो कि एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित राष्ट्र से अपेक्षित हैं। विडंबनापूर्ण है कि इन्हीं मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए चुनावी बॉन्ड व्यवस्था का सूत्रपात किया गया।

इस व्यवस्था में धनी-मानी लोग निगरानी व्यवस्था से बचते हुए बिचौलियों के माध्यम से अनेक चुनावी बॉन्ड खरीद सकते हैं, और कंपनियाँ इसी उद्देश्य के लिए अपने सहायक उपक्रमों की स्थापना कर सकती हैं। अनियंत्रित, असीमित और अपारदर्शी दान की अनुमति देने वाली यह व्यवस्था प्रत्यक्षतः ताकतवर लोगों को राजनीतिक दलों को प्रभावित करने की सहूलियत देती है। निश्चय ही, यह प्रभाव जनहित की कीमत पर व्यक्तिगत हितसाधन के लिए होगा।

लोकतंत्र के रंगमंच पर, चुनावी बॉन्ड (अज्ञात) दानदाताओं और प्राप्तकर्ताओं के लिए एक मुखौटा बन गए हैं, जिससे मुख्य पात्र – जनता पर्दे के पीछे की हकीकत से वंचित रह जाती है। इस बहस के पटाक्षेप और राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनावी बॉन्डों के माध्यम से प्राप्त समस्त दान राशि की सूचना चुनाव आयोग और जनता को अनिवार्यता देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। इसके अलावा, व्यक्तियों या कंपनियों द्वारा चुनावी बॉन्डों की खरीद की एक सीमा तय की जानी चाहिए ताकि किसी भी एक दानदाता के अत्यधिक प्रभाव को नियंत्रित किया जा सके।

बॉन्डों की राशि को व्यक्ति अथवा कंपनी द्वारा अर्जित लाभ के 5% से अधिक नहीं होना चाहिए। पारदर्शिता को और बढ़ावा देने के लिए, बॉन्ड की खरीद और नकदीकरण की निगरानी और तत्काल घोषणा हेतु एक स्वतंत्र नियामक संस्था का गठन भी किया जा सकता है। दानराशि के उचित उपयोग की जाँच के लिए नियंत्रक और महालेखा परीक्षक जैसी संस्था द्वारा राजनीतिक दलों की नियमित लेखा-परीक्षा की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

चुनावी चक्रों के अनुसार चुनावी बांडों की प्रतिपूर्ति अवधि को सीमित करना भी अबाध और अपारदर्शी धन प्रवाह को रोक सकता है। चुनावी बांडों के माध्यम से विदेशी फंडिंग को पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए ताकि आंतरिक नीति-निर्माण को बाह्य/विदेशी प्रभाव/दबाव से मुक्त रखा जा सके। निश्चित रूप से चुनावी प्रक्रिया की स्वच्छता और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता का आपस में गहरा संबंध है। चुनाव में लगने वाला काला धन भ्रष्टाचार की जननी है। चुनाव, भ्रष्टाचार और कालेधन का विषैला चक्र है। इसे तोड़ना अति आवश्यक है। इसलिए चुनावों के लिए सार्वजनिक/सरकारी वित्तपोषण के  विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है।

बिहार में मिला सोने का अकूत भंडार! पहुँच गई वैज्ञानिकों की टीम, गाँव के ऊपर मँडराने लगे हेलीकॉप्टर

उद्योग-धंधों की कमी के कारण गरीबी की मार झेल रहे बिहार के लोगों के लिए एक खुशखबरी सामने आई है। बिहार के बांका में सोने का भंडार का पता चला है। इसको लेकर वैज्ञानिक सर्वेक्षण का काम कर रहे हैं। यह पिछले कुछ दिनों में यह दूसरी बार है, जब जिले के किसी अन्य गाँव में सोने का पता लगाने के लिए सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया है।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की टीम ने जिले के कटोरिया प्रखंड के अंतर्गत लकरामा पंचायत के करवाव गाँव में खुदाई की थी।  इस खुदाई में सोने समेत कई अन्य खनिजों के मौजूद होने के बारे में जानकारी मिली थी। अब GSI द्वारा यहाँ लगातार सर्वे, खनन और अध्ययन किया जा रहा है।

अब बांका जिले के जयपुर थाना क्षेत्र के चंदे पट्टी गाँव में सुनहरे पत्थर के बारे में GSI को जानकारी मिली है। यहाँ सोने की खदान होने का अनुमान है। इसके बारे में GSI की टीम यहाँ पहुँचकर खुदाई का काम कर रही है। इसके साथ ही वैज्ञानिक यहाँ की स्थिति का अध्ययन किया जा रहा है।

गाँव के लोगों का कहना है कि GSI की टीम गाँव के अलग-अलग 6 स्थानों पर गड्ढे करके उसके नमूने ली है और उसकी टेस्टिंग के लिए लैब लेकर गई है। इसके बाद बोरिंग प्वाइंट से लगभग 2 किलोमीटर रेडियस के जमीन को प्रत्येक 20 फीट पर मशीन से जाँच की गई और छोटे-छोट खूंटे गाड़ कर मार्किंग की गई है। 

कहा जा रहा है कि इसी जगह पर ब्रिटिश काल में भी खजिन का भंडार मिलने की संभावना जताई गई थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि अंग्रेजी हुकूमत ने उस समय भी यहाँ खुदाई कराई थी। यहाँ मौजूद 8-9 बड़े-बड़े गड्ढे अंग्रेजी सरकार द्वारा खुदाई कराने की पुष्टि कर रहे हैं।

लगभग 6 महीने बाद GSI की टीम द्वारा एक बार फिर सक्रिय होने के बाद स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई दिनों से तीन हेलीकॉप्टर एक साथ जमीन से काफी करीब गांव के आसपास कई चक्कर काट रहे थे। करवार गाँव के बाद चंदे पट्टी गाँव में यह खुदाई शुरू की गई है।

बताते चलें कि इस साल मई में लकरामा पंचायत अंतर्गत करवार गाँव में जीएसआई ने 320 फीट तक खुदाई की थी। अत्याधुनिक मशीनों से खुदाई के बाद 30 बॉक्स पत्थर निकालकर जाँच के लिए भेजे गए थे। खुदाई में निकले पत्थरों के सैंपल में काला और सुनहरा पत्थर भी शामिल था। इतना ही नहीं, उससे सटे इलाकों से भी सैंपल लिए गए थे।

माना जा रहा है कि जिन जमीनों में खनिज संपदा निकालने का अनुमान है, उसे चिह्नित किया जा रहा है। एक अन्य अधिकारी ने बस इतना बताया कि अभी सिर्फ ऊपरी सर्वेक्षण का कार्य चल रहा है, लेकिन यह इलाका भारत का गौरव बनने वाला है।