Home Blog Page 1399

पहले सिर्फ 4.5% मुस्लिम पाते थे उच्च शिक्षा, मोदी सरकार में दोगुनी हुई संख्या: रिपोर्ट में खुलासा- अब भी अपनी लड़कियों को नहीं पढ़ा रहे मुस्लिम

एक रिपोर्ट ने बताया है कि शिक्षा के मामले में मुस्लिम छात्राएँ, मुस्लिम छात्रों से पिछड़ रही हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि वह उच्च शिक्षा तक भी कम संख्या में पहुँच रही हैं। यह सारी जानकारी सरकारी वेबसाइट UDISEPLUS के आँकड़ों का विश्लेषण कर के निकाली गई है।

मुस्लिम एजुकेशन इन इंडिया नाम की एक वेबसाईट ने इन सारे आँकड़ों का विश्लेषण किया है। उनके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, शिक्षा पाने वाले मुस्लिम बच्चों में सर्वाधिक संख्या ऐसे बच्चों की है जो कि प्राथमिक शिक्षा (कक्षा एक से पाँच) प्राप्त कर रहे हैं। कुल मुस्लिम छात्र/छात्राओं का 52% प्राथमिक स्तर पर ही है।

इसके विपरीत उच्च प्राथमिक (कक्षा छः से आठ), सेकेंडरी (कक्षा नौ और दस) तथा हायर सेकेंडरी (कक्षा ग्यारह और बारह) में जाते-जाते इन मुस्लिम छात्रों की संख्या कम होती रहती है। रिपोट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जितने मुस्लिम बच्चे प्राथमिक शिक्षा पाते हैं, उनमे से बड़ी संख्या में आगे नहीं बढ़ पाते और किन्हीं कारणों से पढ़ाई छोड़ देते है।

रिपोर्ट में सामने आई जानकारी के अनुसार, कुल मुस्लिम छात्र/छात्राओं में से 52% प्राथमिक स्तर पर, 26.3% उच्च प्राथमिक, 13.2% सेकेंडरी और 8.4% हायर सेकेंडरी स्तर पर शिक्षा पा रहे हैं।

इन सबमें मुस्लिम छात्राओं की स्थिति और भी खराब है। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि मुस्लिम छात्रों के मुकाबले मुस्लिम छात्राएँ प्राथमिक स्तर पर कम भेजी जा रही हैं। रिपोर्ट का एक विश्लेषण दिखाता है कि 1000 मुस्लिम छात्रों के मुकाबले केवल 950 मुस्लिम छात्राएँ ही प्राथमिक शिक्षा पा रही हैं।

हालाँकि, उच्च शिक्षा के मामले में मामला उलट है जहाँ पर छात्रों के मुकाबले छात्राएँ अधिक हैं। प्राथमिक स्तर पर आई इस कमी का एक बड़ा कारण रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में बीते वर्षों में लिंगानुपात भी कम रहा है। देश में अभी अभी 1,000 लड़कों के मुकाबले 907 बालिकाएँ ही हैं। ऐसे में इसका फर्क पढ़ाई में दिखता है।

इस रिपोर्ट से एक अच्छी बात यह भी सामने आई है कि मोदी सरकार के आने के बाद मुस्लिम छात्र और छात्राएँ अब लगभग दोगुने संख्या में उच्च शिक्षा तक पहुँच रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि जहाँ 2012-13 में पढ़ने लिखने वाले मुस्लिमों का केवल 4.5% ही उच्च शिक्षा (कक्षा 10-12) प्राप्त कर रहे थे, अब यह संख्या बढ़ कर 8.4% हो गई है।

जेल में बंद शराब घोटाला के आरोपित बनाए गए AAP के स्टार प्रचारक, राजस्थान चुनाव वाली लिस्ट में मनीष सिसोदिया और संजय सिंह का भी नाम: I.N.D.I. गठबंधन फुस्स

अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) राजस्थान के चुनावी मैदान में उतर गई है और उसने अपने स्टार प्रचारकों की लिस्ट भी जारी कर दी है। इस लिस्ट में जेल में बंद मनीष सिसोदिया और संजय सिंह का भी नाम है। इसके साथ ही I.N.D.I. गठबंधन की एकता की कलई भी खुल गई है। पटना, बेंगलुरु और मुंबई में बैठकों के दौरान नेताओं ने साथ में तस्वीरें तो क्लिक करवा ली, लेकिन चुनाव लड़ने का समय आया तो सब एक-दूसरे के खिलाफ ही लड़ने लगे।

AAP ने राजस्थान विधानसभा चुनाव में जिन 40 स्टार प्रचारकों की सूची साझा की है, उनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान का नाम प्रमुख है। गुरुवार (16 नवंबर, 2023) को दोनों एक साथ कई जनसभाओं को भी संबोधित करेंगे। लेकिन, सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि शराब घोटाले के ऐसे आरोपित जो जेल में बंद हैं उन्हें भी इस लिस्ट में जगह दी गई है। AAP नेताओं को उम्मीद है कि इन्हें जल्द जमानत मिलेगी।

पार्टी मान कर चल रही है कि जमानत मिलते ही इन्हें फिर चुनावी मैदान में प्रचार के लिए उतार दिया जाएगा। प्रदेश प्रभारी विजय मिश्रा और राजस्थान के आधा दर्जन स्थानीय नेताओं को भी स्टार प्रचारकों में जगह दी गई है। पंजाब से AAP के नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए राजस्थान लाया गया है। राजस्थान की 200 में से 86 सीटों पर पार्टी ने प्रत्याशी उतारे हैं, जबकि यहाँ कॉन्ग्रेस सत्ता में है। दोनों पार्टियाँ I.N.D.I. गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन आपस में लड़ रही है।

हाल ही में मनीष सिसोदिया को अदालत ने उनकी पत्नी से मिलने की इजाजत दी थी, जिसके बाद पुलिस उन्हें लेकर उनके घर गई थी। वहीं संजय सिंह को भी कोर्ट में पेश किए जाने का वीडियो सामने आया था। पार्टी दिल्ली और पंजाब में प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुँचने और पराली जलाए जाने को कंट्रोल न कर पाने के कारण भी विवादों में है। शराब घोटाले के बाद प्रदूषण के मुद्दे पर उसे अपने ही गठबंधन के साथियों का सहयोग नहीं मिल रहा है।

‘चमड़े और मैला’ वाले मडिगा समुदाय के साथ PM मोदी, आरक्षण की बात सुन रो पड़े कृष्णा मडिगा: पैनल की घोषणा, न्यायालय में भी मिलेगा न्याय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के मडिगा समुदाय द्वारा लंबे समय से की जा रही आरक्षण संबंधी माँग को मान लिया है। प्रधानमंत्री ने शनिवार (11 नवंबर 2023) को कहा कि केंद्र जल्द ही एक समिति गठित करेगा, जो मडिगा समुदाय की सशक्तिकरण के लिए जरूरी उपाय करेगी। मडिगा समुदाय अनुसूचित जाति (एससी) का उप-वर्गीकरण करने की माँग करती आ रही है।

पीएम मोदी ने मडिगा आरक्षण पूरता समिति (एमआरपीएस) द्वारा आयोजित एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा पिछले तीन दशक से हर संघर्ष में मडिगा समुदाय के साथ खड़ी रही है। उन्होंने कहा, “हम जल्दी ही इस अन्याय को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं… यह हमारा चुनावी वादा है कि हम जल्दी एक समिति गठित करेंगे जो आपको सशक्त करने के लिए हरसंभव तरीके अपनाएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “आप और हम यह भी जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी कानूनी प्रक्रिया जारी है। हम न्याय को सुनिश्चित करेंगे। यह देखना भारत सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है कि आपको न्यायालय में भी न्याय मिले। भारत सरकार आपके सहयोगियों की तरह न्याय के पक्ष में पूरी ताकत के साथ खड़ी रहेगी।” बता दें कि भाजपा ने अपने साल 2014 के घोषणापत्र में आंतरिक आरक्षण का वादा किया था।

इस दौरान मंच पर पीएम मोदी के साथ बैठे मडिगा आरक्षण पूरता समिति के नेता मंदा कृष्णा मडिगा भावुक हो गए और पीएम मोदी के कंधे पर सिर रखकर रो पड़े। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मडिगा का हाथ पकड़कर और कंधे को थपथपाकर उन्हें सांत्वना दी। दरअसल, मडिगा समुदाय SC कैटेगरी के भीतर ही अपने लिए अलग से आंतरिक आरक्षण की माँग कर रहा है।

मडिगा समुदाय का कहना है कि SC में आरक्षण होने के बावजूद उनके समुदाय के लोगों को इसका उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। वे काफी पिछड़े हैं और उनके हिस्से का भी लाभ दूसरे समुदाय के लोग ले जाते हैं। इसलिए वे SC के लिए दी गई आरक्षण में ही मडिगा समुदाय के लिए अलग से आरक्षण की माँग कर रहे हैं।

तेलुगु भाषी राज्यों में अनुसूचित जातियों में मडिगा समुदाय की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। यह समुदाय अनुसूचित जातियों को श्रेणीबद्ध करने की लड़ाई लड़ रहा है। इसका नेतृत्व कृष्णा मडिगा कर रहे हैं। जुलाई 1994 में आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के एडुमुडी गाँव में MRPS की स्थापना करके कृष्णा मडिगा ने इस लड़ाई को जारी रखा। आज MRPS मडिगा समुदाय में बहुत बड़ा प्रभाव रखता है।

दरअसल, मडिगा समुदाय में अधिकतर लोग चमड़े का काम और मैला ढोने का काम करते हैं। ये समाज का वंचित वर्ग माना जाता है। तेलंगाना की कुल अनुसूचित जाति की आबादी में आधा या उससे अधिक यानी 50 से 60 प्रतिशत आबादी मडिगा समुदाय की मानी जाती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इनकी बड़ी आबादी निवास करती है।

तेलंगाना के 20 से 25 सीटों पर उम्मीदवारों का भविष्य मडिगा समुदाय के लोग तय करते हैं। इसके अलावा, 4-5 सीटें ऐसी हैं, जहाँ मडिगा समुदाय दूसरे नंबर पर है। MRPS के तेलंगाना अध्यक्ष गोविंद नरेश का दावा है कि अकेले तेलंगाना में मडिगा समुदाय के लोगों की जनसंख्या 46 लाख है। वहीं, इससे जुड़े माला समुदाय की संख्या 21 लाख है। लगभग इतनी ही संख्या आंध्र प्रदेश में भी मानी जाती है। इस समुदाय की कुछ आबादी कर्नाटक और तमिलनाडु में भी है।

मोहम्मद शमी ने कहा- हैप्पी दीवाली, तड़प गए पाकिस्तान के कट्टरपंथी: बोले- ह₹मी सजदा कर लेता

भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी ने दीवाली के मौके पर आज एक तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में वह कुर्ता पजामा पहने खड़े दिखाई दिए और साथ में लिखा है- हैप्पी दीवाली। पीछे बैकग्राउंड भी दीवाली वाला है। अब शमी के पोस्ट पर जहाँ भारतीय यूजर्स उन्हें दीवाली की शुभकामनाएँ देने में जुटे तो वहीं पाकिस्तानी कट्टरपंथी उन्हें इस तरह देख बिदक गए।

कई कट्टरपंथियों ने उन्हें उलटा सीधा बोला। महरीन नाम की यूजर उनसे पूछने लगी- तुम मुस्लिम ही हो न? इसके बाद उसी महरीन ने कहा- ये सिर्फ नाम के मुस्लिम हैं। फॉलो तो ये भारतीय धर्म को ही करते हैं।

हुजैफाह भट्टी ने कहा- “इन्हें उतनी आजादी नहीं है जितनी हमें पाकिस्तान में है।”

एक यूजर्स ने सलमान खान के रोने वाली फोटो लगाकर लिखा- “शमी बिलकुल इसी तरह भारत के आगे अपनी लॉयलटी को साबित करने में लगा हुआ है।”

मियाँ लरैब अहमद ने भी कहा- “एक और दिन जब शमी अपनी ईमानदारी भारत के आगे साबित करने में लगा है।”

आसिफ गफूर ने लिखा- “दीवाली विश कर देता हूँ भारत के साथ लॉयल लगूँगा।”

शेरलॉक ओम्स नाम की आईडी से कहा- “भाई सजदा तो कर नहीं पाए तुम, दीवाली अच्छे से मना लो।”

उमर लालामूसा ने कहा- ह₹मी सजदा कर लेना था। सेमी में काम आता लेकिन नहीं।

बता दें कि मोहम्मद शमी इन दिन वैसे तो वर्ल्ड कप में अपने प्रदर्शन के कारण चर्चा में हैं लेकिन आम दिनों में वह अक्सर इन कट्टरपंथियों के निशाने की वजह से खबरों में रहते हैं। वो चाहे कोई भी त्योहार की शुभकामना दे दें या उस दिन अपने या परिवार की तस्वीर डाल दें। ये लोग उन्हें कोसने से पीछे नहीं हटते। पिछले साल शमी ने जब दशहरा की बधाई दी थी तब भी इस्लामी कट्टरपंथियों को उनकी यह बात रास नहीं आई थी और फिर उनको क्रिसमस मनाता देख भी कई इस्लामी नाराज हुए थे। उनकी बेटी को सरस्वती पूजा करते देख को इन्हीं लोगों ने कहा था तुम जहन्नुम में जाओगे।

1 की मौत, 3 घायल: बिहार जाने वाली ट्रेन में चढ़ने के दौरान सूरत रेलवे स्टेशन पर हादसा, RPF जवानों ने बचाई कई की जान

देशभर में लोग दिवाली और छठ पर्व के लिए घर जा रहे हैं। ऐसे में बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर लोगों की भारी भीड़ जमा है। इसी कड़ी में गुजरात के सूरत रेलवे स्टेशन पर शनिवार (11 नवंबर, 2023) को भगदड़ की घटना सामने आई है। इस हादसे में बिहार के एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। वहीं कई लोगों के घायल होने के साथ ही चार-पाँच लोग बेहोश बताए जा रहे हैं, जिनको हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। जिन्हें होश आ गया है।

पश्चिम रेवले के प्रवक्ता सुमित ठाकुर के अनुसार सूरत स्टेशन पर भीड़ को लेकर जरूरी उपाय किए गए हैं। फिर भी भीड़ ट्रेन में चढ़ने के लिए बेकाबू हो जा रही है। वहीं घटना को लेकर पुलिस अधीक्षक (पश्चिम रेलवे) सरोजनी कुमारी ने बताया कि यात्री सुबह सूरत रेलवे स्टेशन से ताप्ती गंगा एक्सप्रेस ट्रेन में चढ़ने के लिए दौड़ पड़े, जिससे अफरा-तफरी का माहौल हो गया और हादसे में एक की मौत हो गई जबकि तीन  लोग घायल हो गए।

क्या है पूरी घटना 

दरअसल, सूरत रेलवे स्टेशन पर दीवाली और छठ के मौके पर घर पहुँचने के लिए पिछले दो दिनों से भारी भीड़ सामने आ रही थी। ऐसे में शनिवार की सुबह जैसे ही छपरा जा रही ताप्ती गंगा एक्सप्रेस ट्रेन स्टेशन पर पहुँची तो यात्रियों में भगदड़ मच गई। भगदड़ में बिहार के एक एक व्यक्ति की मौत सहित कई यात्रियों के गिरने से चोट लगाने की खबर सामने आई है।

शुरूआती जाँच में भगदड़ में जान गँवाने वाले यात्री की पहचान वीरेंद्र कुमार के तौर पर हुई है। वह बिहार के छपरा के रहने वाले थे और सूरत में नौकरी करते थे। रेलवे पुलिस के अनुसार भगदड़ में बेहोश हुए वीरेंद्र कुमार को इलाज के लिए नजदीक के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया था। जहाँ पर उनकी मौत हो गई।

इस हादसे के बारे में प्रत्यक्षदर्शी विनय कुमार ने बताया कि मृतक वीरेंद्र कुमार डायमंड के कारीगर थे। वे अपने भाई के साथ ताप्ती गंगा एक्सप्रेस से बिहार के भागलपुर जाने के लिए पहुँचे थे। जब ट्रेन आई तो उसमें चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की और भगदड़ हुई। इसी दौरान वीरेंद्र नीचे गिर गए। और यह हादसा हो गया। 

बेहोश हुए यात्रियों को आरपीएफ के अधिकारियों ने दिया सीपीआर

सूरत रेलवे स्टेशन पर भारी भीड़ और भगदड़ में बेहोश हुए 5 यात्रियों को आरपीएफ के अधिकारियों ने सीपीआर देकर बचाया। हालाँकि, इस तरह की भीड़ शनिवार को पहली बार नहीं देखी गई बल्कि सूरत रेलवे स्टेशन पर एक दिन पहले भी यात्री ट्रेन में खिड़कियों के जरिए घुसे थे। तब भी अफरा-तफरी की स्थिति बन गई थी। 

रेल राज्य मंत्री ने लिया घायलों का हालचाल 

हादसे के बाद सूरत की सांसद और राज्य रेल मंत्री दर्शना जरदोश घायलों से मिलने अस्पताल पहुँची। वहाँ उन्होंने घायलों से मिलकर उनका हालचाल जाना।

‘दिवाली पर एक-दूसरे को उपहार मत दें, इससे बहुत कचरा पैदा होता है’: लोगों को पसंद नहीं आया फ्लॉप हीरोइन का ‘ज्ञान’, पूछा – ईद-क्रिसमस पर कहाँ सोई रहती हो?

जैसे ही हिन्दू पर्व-त्योहार आते हैं, वैसे ही बॉलीवुड और क्रिकेट की हस्तियाँ ज्ञान देने लगती हैं। ताज़ा मामला दीया मिर्जा का है। दीया मिर्जा ने दीवाली पर वीडियो जारी कर के कुछ ऐसा ज्ञान दिया है, जो लोगों को पसंद नहीं आ रहा है। दीया मिर्जा इस वीडियो में कह रही हैं कि इस दिवाली पर मुझे गिफ्ट्स न दें, मुझे कुछ मत दें। उन्होंने कहा कि उन्हें महसूस होता है कि दिवाली पर लोग एक-दूसरे को कई ऐसी चीजें देते हैं जिनकी कोई ज़रूरत ही नहीं होती।

वीडियो में दीया मिर्जा आगे कहती हैं, “कुछ ज़्यादा ही पैकेजिंग हो जाती है और काफी कचरा पैदा हो जाता है। इस दिवाली मुझे कुछ मत दीजिए। आप बस मुझे अपना समय दीजिए। अपने घर में कचरों को अलग-अलग कर के मेरा समर्थन कीजिए। आप इस दिवाली पर मुझे सबसे अच्छा गिफ्ट ये दे सकते हैं कि आप उन संगठनों का समर्थन करें तो पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए काम कर रहे हैं।” दीया मिर्जा ईद-बकरीद या क्रिसमस पर इस तरह के ज्ञान देती नहीं दिखती हैं।

‘वोकफ्लिक्स’ नाम के ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) हैंडल ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘वोकिज्म’ के झंडाबरदारों और इस्लामवादियों ने दिवाली को बदनाम करने का एक नया रास्ता खोज लिया है – ज़्यादा तोहफे देने से कचरा पैदा होता है। उक्त ट्विटर हैंडल ने ये भी लिखा कि दीया मिर्जा जैसे बॉलीवुड सेलेब्रिटी पर्यावरणविद होने के नाम पर घोटाला हैं। ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ नामक हैंडल ने भी दीया मिर्जा को एक फ्लॉप अभिनेत्री करार देते हुए कहा कि वो दिवाली पर ही अपना ‘वोक’ ज्ञान देती हैं।

बता दें कि दीया मिर्जा ने 33 फ़िल्में की हैं, जिनमें उनकी मात्र 2 फ़िल्में ही हिट हुई हैं और वो दोनों ही राजकुमार हिरानी की फ़िल्में थीं जिनमें दीया मिर्जा का कोई योगदान नहीं था। यही कारण है कि उन्हें फ्लॉप अभिनेत्री कहा जाता है। ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ ने पूछा कि दीया मिर्जा क्रूरता मुक्त ईद या फिर पटाखा मुक्त क्रिसमस की बात क्यों नहीं करतीं? साथ ही याद दिलाया कि बॉलीवुड के लोग जो महँगे मेकअप और शूटिंग के लिए बनाए गए जिस सेट का इस्तेमाल करे हैं, उससे भी काफी कचरा पैदा होता है।

नमाज़ पढ़ी, क्रैम्प्स आया और गिर पड़े… मोहम्मद रिज़वान के ड्रामे के साथ ही वर्ल्ड कप से बाहर हुआ पाकिस्तान, पिटाई के मामले हैरिस रउफ ने बनाया ‘महान’ रिकॉर्ड

पाकिस्तान की क्रिकेट टीम इंग्लैंड से हार के साथ ही ICC वनडे वर्ल्ड कप 2023 से बाहर हो गई है। हालाँकि, हार-जीत का फैसला होने से पहले ही ये सुनिश्चित हो गया था कि पाकिस्तान सेमीफाइनल में नहीं जाएगी, क्योंकि इंग्लैंड के स्कोर को उसे मात्र 6.2 ओवर में चेज करना था जो असंभव था। इंग्लैंड ने 93 रनों से पाकिस्तान को हरा दिया। पाकिस्तान का सिर्फ एक बल्लेबाज आगा सलमान ही अर्धशतक जड़ पाए। इंग्लैंड के 337 के जवाब में टीम मात्र 244 पर ढह गई।

इंग्लैंड की तरफ से बेन स्टोक्स ने सर्वाधिक 84 रन जड़े, वहीं हैरी ब्रूक ने 17 गेंदों पर 30 रनों की तेज़-तर्रार पारी खेली। हैरिस रउफ पाकिस्तान की तरफ से सर्वाधिक 3 विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। वहीं स्कोर का चेज करने उतरी पाकिस्तानी टीम 43.3 ओवर में ऑलआउट हो गई, जिसमें डेविड विली के 3 विकेट का योगदान रहा। ये उनका अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच था, जिसमें वो ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ रहे। इंग्लैंड का कोई भी गेंदबाज बिना विकेट के नहीं गया। कप्तान बाबर आज़म ने 45 गेंदों पर 38 रन बनाए, लेकिन वो इस शुरुआत को आगे नहीं ले जा सके।

प्रेजेंटेशन के दौरान बाबर आज़म का दर्द छलक गया और उन्होंने कहा कि अगर दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ उनकी टीम ने मैच जीत लिया होता तो आज दृश्य दूसरा होता। उन्होंने बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण में गलतियों की बात स्वीकारी। उन्होंने बीच के ओवरों में स्पिनरों द्वारा विकेट न लिए जाने पर उन्हें खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि हमें मिल-बैठ कर गलतियों को सुधारने के लिए विचार-विमर्श करना होगा। रनों के मामले में ये वर्ल्ड कप में पाकिस्तान की चौथी सबसे बड़ी हार है।

2019 से लेकर अब तक वनडे मैचों में इंग्लैंड ने 10 में से 8 मैच पाकिस्तान को हराया है, जबकि एक का रिजल्ट नहीं निकला और एक ही मैच पाकिस्तान जीत पाया। इसके साथ ही इंग्लैंड चैंपियंस ट्रॉफी 2025 में भी क्वालीफाई कर गया है। इसके साथ ही अब साफ़ हो गया है कि बुधवार (15 नवंबर, 2023) को भारत और न्यूजीलैंड भिड़ेंगे और दोनों में जो जीतेगा वो फाइनल में पहुँचेगा। वहीं ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में से कोई एक फाइनल में पहुँचेगा।

पाकिस्तान अब अगले 1 वर्ष तक कोई वनडे नहीं खेलेगा, क्योंकि उसका अगला ODI मैच सीधा नवंबर 2024 में है। वहीं ताज़ा मैच की बात करें तो इसमें विकेटकीपर बल्लेबाज मोहम्मद रिज़वान के आउट होने का खूब मजाक बना। वो क्लीन बोल्ड होने के बाद जमीन पर गिर पड़े। बताया गया कि उन्हें ‘क्रैम्प्स’ आ गया है। हालाँकि, लोगों ने सोशल मीडिया में कहा कि वो ड्रामा कर रहे हैं। मोहम्मद रिज़वान ने इस मैच में भी ड्रिंक्स ब्रेक के दौरान नमाज़ पढ़ी। वहीं हैरिस रउफ किसी भी वर्ल्ड कप में सबसे ज़्यादा रन और छक्के खाने वाले गेंदबाज बन गए हैं।

पुष्पक विमान से उतरे प्रभु श्रीराम, रथ खींचते CM योगी: दीपावली पर गिनीज बुक में दर्ज हुआ अयोध्या का नया रिकॉर्ड, हेलीकॉप्टर से हुई पुष्प वर्षा

दीपावली की पूर्व संध्या पर अयोध्या में शनिवार (11 नवंबर, 2023) को अयोध्या में एकदम कुछ वैसा ही नज़र देखने को मिला, जब श्रीराम और माँ सीता 14 वर्षों के वनवास से लौट कर अपनी राजधानी को आए होंगे। जो अयोध्या केंद्र में कॉन्ग्रेस और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के शासनकाल में सूनी-सूनी रही रही, वहाँ अब दीवाली से एक दिन पहले ऐसा माहौल है जो बताता है कि सरकार बदलने से क्या हो सकता है। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में मौजूद हैं और कार्यक्रम की निगरानी कर रहे हैं।

अयोध्या में आयोजित ‘भव्य-दिव्य दीपोत्सव-2023’ में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भी मौजूद थीं। रामकथा पार्क में राम दरबार भी लगाया गया। इस दौरान हेलीकॉप्टर से भगवान श्रीराम और माँ सीता बने हुए कलाकार उतरे, जिनका सीएम योगी ने स्वागत किया। मुख्यमंत्री ने प्रभु श्री राम के प्रतीक स्वरूप का तिलक लगाकर अभिषेक किया। इसके बाद उन्होंने पुण्यसलिला माँ सरयू जी की पावन आरती की। राम जी की पैड़ी पर भी सीएम योगी ने पूजा-अर्चना की।

इसके बाद वो ‘ग्रीन एन्ड डिजिटल फायरवर्क्स’ शो में पहुँचे, जहाँ रंग-बिरंगे प्रकाश से जगमग अयोध्या को जगमग देखा गया। 22.23 लाख दीपक के साथ अयोध्या में भव्य दीपोत्सव मनाया गया। अयोध्या का ये नया रिकॉर्ड गिनीज बुक में भी दर्ज हो गया है। मिट्टी के दीयों से जगमगाते हुए सरयू घाट को देख के श्रद्धालु आह्लादित थे। अयोध्या के 51 घाटों पर ये दीये जलाए गए। सरयू घाट पर स्क्रीन लगा कर भगवान श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के चित्र दर्शाए गए।

दीयों को सजाने के लिए कई वॉलंटियर्स लगाए गए थे। सीएम योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद 2017 में 87,000 दीये जलाए गए थे और अब ये आँकड़ा कई गुना बढ़ चुका है। ‘पुष्पक विमान’ से उतरे राम-लक्ष्मण का भारत और शत्रुघ्न ने गले लगा कर स्वागत किया, इसके बाद वो गुरु वशिष्ठ के साथ रथ में सवार होकर राम दरबार के लिए निकल गए। रथ पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। रथ को राज्यपाल, CM और उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठ खींच रहे थे।

पीरियड्स की छुट्टियाँ या दोयम दर्जे का होने का एहसास… क्या महिलाएँ दुनिया की अजूबा जीव हैं?

असम की गुवाहाटी यूनिवर्सिटी ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए महावारी के दौरान छात्राओं को छुट्टियाँ देने का फैसला लिया है। इस पीरियड लीव के साथ ही महीने के इन दिनों में छात्राओं को हाजिरी यानी अटेंडेंस में भी राहत दी जाएगी। यूनिवर्सिटी के सभी संबद्ध कॉलेजों में ये महावारी लीव पॉलिसी लागू होगी।

इस पॉलिसी में सेमेस्टर एग्जाम में बैठने के लिए जरूरी कम से कम न्यूनतम क्लास अटेंडेंस में भी छात्राओं को दो फीसदी की छूट देकर इसे 73 फीसदी कर दिया गया। शिक्षा मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के जारी निर्देशों के नजरिए से देखा जाए तो महावारी के दौरान महिलाओं की सेहत की अहमियत को देखते हुए लिया गया ये फैसला नजीर पेश करता है।

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के इस फैसले को काबिले तारीफ कहा जा सकता है। हालाँकि, ये फैसला ये दिखाता हुआ भी लगता है कि महिलाएँ जैसे दुनिया में एक अजूबा जीव हो, जिसे हरदम एक सहारे की जरूरत हो, फिर चाहे वो प्रकृति के बनाए उसके जिस्म को लेकर ही क्यों न हो।

इन दिनों घोर नारीवाद के नाम पर पीरियड लीव ही नहीं, बल्कि थ्रेडिंग, अपरलिप्स, अंडर आर्म्स, फेसिअल, ऑर्गेज्म यानी चरम सुख पर खुलेआम बात होने लगी है। ये अच्छा भी है, क्योंकि अब एक बेटी को अपने पिता से, एक बहन को अपने भाई से पीरियड के लिए पैड मँगाते हुए हिचक नहीं होती है। ये नजरिया एक बच्ची, एक लड़की, एक महिला के हक में बेहद सुखद बदलाव महसूस कराता है।

मसला वहाँ पैदा होता है, जब हम इन बातों को लेकर मुद्दा बनाते हैं और खुद को एक इंसान से कुछ अलग साबित करने की होड़ में लग जाते हैं। नारीवाद की दौड़ में आगे निकलने के लिए हम कुदरत की दी गई जिस्मानी प्रक्रियाओं को लेकर भी शोर मचाते हैं।

कुदरत ने औरत के जिस्म को माँ बनने के लिए ही तैयार किया है। महावारी उसी का हिस्सा है। ये कुदरत की एक सामान्य प्रक्रिया है। एक औरत होने के नाते मैं भी इससे दो-चार होती हूँ। हालाँकि, ये जरूरी नहीं की हर किसी लड़की या महिला को इस दौरान दर्द या तकलीफ से दो-चार होना ही पड़ता है।

मेरे केस में पीरियड शुरू होने से लेकर अभी तक ऐसा शारीरिक दर्द या परेशानी मुझे नहीं झेलना पड़ी है, लेकिन मैं ये नहीं कहती कि हर किसी के महावारी के दिन इतने ही सुकून भरे बीतते हों। मुझे मेंस्ट्रुअल लीव यानी पीरियड्स के दौरान छुट्टी की जरूरत नहीं महसूस होती और शायद मेरे जैसा अनुभव कुछ दूसरी महिलाओं का भी रहा हो।

वहीं, कुछ अन्य लड़कियों एवं महिलाओं को पीरियड्स के दौरान अच्छी-खासी मानसिक एवं शारीरिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। किसी को पेट में असहनीय दर्द होता है तो किसी को बदन दर्द। किसी को उल्टी, तेज बुखार, मूड स्विंग, चिड़चिड़ेपन और कमजोरी से भी दो-चार होना पड़ता है। लाजिमी है कि महावारी के दौरान इस तरह की परेशानियाँ झेलने वाली महिलाओं के काम पर भी इसका असर पड़ता है।

इसके बावजूद अगर सभी लड़कियों और महिलाओं को महावारी के नाम पर हर जगह छुट्टियाँ और आराम देने की बात की जाए और ये महसूस कराया जाए कि पुरुषों के मुकाबले वो काम के मामले में इन दिनों ढीली रहती हैं तो मेरे ख्याल से ये एक आजाद, खुद पर निर्भर रहने वाली हर महिला के लिए उलाहना जैसा ही होगा। ये सबको एक ही लाठी से हाँकने जैसा भी होगा।

वैसे ही महिलाओं के मामले में लाख प्रोग्रेसिव रहने के बाद भी वर्क प्लेस में उन्हें अहमियत देने में एम्पलॉयर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। ये केवल अपने मुल्क की ही बात नहीं, बल्कि महिलाओं के मामले में दुनिया के सबसे उदार देश कहे जाने वाले आइसलैंड का भी यही हाल है। हाल ही में वहाँ की पीएम प्रधानमंत्री कैतरीना कोस्तोत्रई तक को लैंगिक समानता की माँग को लेकर हड़ताल पर बैठना पड़ा था।

कुछ जगहों पर जॉब ज्वॉइन करने से पहले ही देखा जाता है कि महिला मैरिड है या अनमैरिड। कुछ कंपनियाँ अपवाद हो सकती हैं, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि कई कंपनियाँ महिलाओं को काम देने से कतराती है। कहीं उनकी सुरक्षा का मुद्दा हावी हो जाता है तो कहीं उनकी महावारी और प्रेगनेंसी होने के बाद मेटेरनिटी और चाइल्ड केयर लीव का।

ऐसे में महिलाएँ यंग ऐज में जब वो वर्कप्लेस पर बेहतरीन काम कर सकती हैं तो उसे पीरियड्स लीव से जोड़कर उनके लिए जाने-अनजाने खाई तो नहीं खोद रहे हैं? सरकारी विभागों को छोड़ दिया जाए तो प्राइवेट कंपनियों में वैसे ही महिलाओं को 30 की उम्र के बाद रखने से गुरेज किया जाता है। अगर उस पर पीरियड्स लीव का टैग भी लग जाए तो क्या काम मिलना आसान रह जाएगा?

दूसरी तरफ पीरियड लीव का ये कॉन्सेप्ट वर्कप्लेस में महिलाओं और पुरुषों के बीच एक खाई पैदा कर सकता है। मैं ये नहीं कहती कि सभी पुरुष महिलाओं को नहीं समझते, लेकिन इंसान होने के नाते उनके दिल में वर्कप्लेस और यूनिवर्सिटीज में इस तरह की पीरियड लीव मिलने पर महिलाओं के खिलाफ हिकारत और नफरत की भावना होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

वैसे ही हम लोग दुनिया की आधी आबादी कहलाते हैं। कभी हमें पूरी में गिना ही नहीं जाता। अगर हम पूरी आबादी में शामिल होने का दम भरना चाहती हैं और चाहती हैं कि हमें भी पुरुषों के बराबर समझा जाए तो पीरियड लीव जैसे कॉन्सेप्ट से दूरी बनाने के बारे में सोचना चाहिए। जैसे हम बीमार होने पर छुट्टी लेते हैं, वैसे ही जिसे जरूरत है वो खुलेआम बुखार की जगह पीरियड्स लिखकर भी इस सामान्य तरीके से ही छुट्टी ले सकती हैं।

मेरी नजर में ये मुश्किल भी नहीं है, क्योंकि इस दौर में कम से कम हम यहाँ तक तो पहुँच ही गए हैं कि रेप, पीरियड्स, ऑर्गेज्म, सेक्सुअल हेरेसमेंट पर हम खुलकर बात कर सकते हैं। उसके लिए हमें किसी खास पीरियड लीव की जरूरत शायद नहीं होनी चाहिए।

अगर स्टडी पर भी गौर करें तो हर किसी महिला को पीरियड्स में होने वाली तकलीफ का स्तर एक नहीं होता। रिसर्च ये साबित करती है। लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में प्रजनन स्वास्थ्य के प्रोफेसर जॉन गिलेबॉड के मुताबिक, पीरियड्स के दौरान कई औरतों को हार्ट अटैक जैसी तकलीफ होती है। इससे साफ है कि सभी महिलाओं में ऐसा नहीं होता।

इसी तरह डिस्मेनोरिया पर साल 2012 की रिसर्च बताती है कि कम से कम 20 फीसदी महिलाओं को पीरियड्स के दौरान होने वाली तकलीफ से चलना भी मुश्किल हो जाता है। इसका मतलब लगभग 80 फीसदी महिलाओं के लिए ये सामान्य शारीरिक प्रक्रिया की तरह ही रहता है।

एक स्टडी के मुताबिक, पीरियड्स दर्द की वजह से काम करने में औसतन 33 फीसदी की गिरावट आती है। काम करने की क्षमता में इस तरह की गिरावट तो बुखार वगैरह से भी आ सकती है। मेरा मानना है कि ये दौर पीरियड्स और इस तरह की परेशानियों से उबरने का दौर है।

हमें उठ खड़ा होना चाहिए हर एक उस महिला के समर्थन में, जिसका इन सबसे कोई वास्ता ही न हो। जो तालीम हासिल करने के लिए समाज से दो-दो हाथ करने को तैयार हो। जो बलात्कार के बाद भी सिर उठा के बलात्कारी को ललकार सके। अपना सिर ऊँचा कर सरेआम चल सके। जो खुद के लिए बसों और अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट में किसी भी पुरुष सहयात्री को अपनी सीट खुद देने को तैयार हो।

हमें उठ खड़ा होना चाहिए उन महिलाओं के लिए जो यौन शोषण करने वालों के गाल पर भरी महफ़िल में तमाचा जड़ सके। जो छेड़खानी करने वालों का सरेआम पिटाई करके बुरा हाल करने का जिगरा रखती हो। जो महज बच्चा पैदा करने की मशीन बनकर न रहे। जो खुलेआम कह सकती हो मेरे लिए शादी जरूरी नहीं। जिंदगी जीने के लिए मुझे किसी मर्द के कंधे की जरूरत नहीं।

जो अपनी गर्भ में पल रहे कन्या भ्रूण हत्या का इरादे रखने वाले हर एक शख्स से जंग जीतकर सिंगल मदर होकर भी अपनी बच्ची को पाल सके। जो उसके जिस्म पर पड़ने वाली हर वहशी निगाह को फोड़ने से गुरेज न करे। सड़कों पर बेख़ौफ़ चले सके। खुलेआम कह सके -हाँ मैं एक लड़की हूँ, हाँ मैं एक महिला हूँ, मुझे अपने वजूद पर कोई पछतावा नहीं।

पहले हम खुद जैसे हैं वैसे ही खुद को स्वीकार करने की कोशिश तो करें। वैसा जज्बा तो अपने अंदर पैदा करें। इतना ही करके हम दुनिया में अपने वजूद को साबित करने की आधी जंग तो इससे ही जीत जाएँगी। फिर शायद हमें महावारी के दौरान गुवाहाटी यूनिवर्सिटी जैसे खास प्रिविलेज की जरूरत न हो। सुप्रीम कोर्ट में पेड पीरियड लीव माँग को लेकर याचिकाएँ डालने की जरूरत न पड़े।

बिहार की तरह 2 दिन की पीरियड्स लीव न लेनी पड़े, केरल, कोचीन में छात्राओं को हर महीने पीरियड लीव की जरूरत महसूस ही न हो। देश की 12 प्राइवेट कंपनियों से औरतों को पीरियड लीव का अहसान न लेने पड़े। हो सकता है हर कोई मुझसे इस मुद्दे पर इत्तेफाक न रखता हो, लेकिन एक औरत होने के नाते मेरा मानना है कि महिलाओं की मानसिक, शारीरिक सेहत की बेहतरी के लिए महावारी की छुट्टी नहीं बल्कि उन्हें एक सामान्य इंसान के तौर पर लेने की जरूरत अधिक है।

जिन अफगान शरणार्थियों को मुल्क से निकाल रही Pak सरकार, उनके साथ लूटपाट में जुटे पाकिस्तानी: ‘उम्माह’ के पैरोकारों ने 13 बच्चों वाले हबीबुल्ला के बारे में भी नहीं सोचा

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ होता अत्याचार तो हमेशा से मीडिया में सामने आता रहा लेकिन अब वहाँ अफगानिस्तान शरणार्थियों की हालत भी बहुत खराब है। पाकिस्तानी सरकार ने एक तरफ उनसे यह कह दिया है कि जिन शरणार्थियों के पास दस्तावेज नहीं है वो मुल्क से निकलें। तो वहीं, दूसरी ओर वो पाकिस्तानी हैं जो मुल्क छोड़कर जाने वाले शरणार्थियों को तरह-तरह से लूटने में लगे हैं।

पाकिस्तानी मीडिया साइट डॉन ने इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि सरकार ने 1.7 मिलियन गैर दस्तावेज वाले शरणार्थियों से पाकिस्तान छोड़ने को कहा है और साथ में ये भी कहा है कि वो अपने साथ केवल 50 हजार रुपए ही लेकर जा सकते हैं।

सरकार की ऐसी शर्त के कारण एक तो अफगान शरणार्थी पहले ही सोच में हैं कि उनका गुजारा इतने कम पैसों में कहीं अंजान जगह कैसे होगा और कब तक होग। दूसरा वो ये देखकर भी हैरान हैं कि जिन पाकिस्तानियों के साथ वो इतने समय तक रहे वही लोग उनकी लाचारी का कितना फायदा उठाने में लगे हैं।

शरणार्थियों की मजबूरियों का फायदा उठाने में जुटे पाकिस्तानी

मोहम्मद आसिफ नाम का शख्स जो पाकिस्तान की मच्छर कॉलोनी में रहा उसे अपनी दुकान मात्र 0.3 मिलियन (88,590 पाकिस्तानी रुपए के अनुसार) में बेचनी पड़ी। जब उससे पूछा गया कि वो अच्छे सौदे के लिए क्यों नहीं रुका इसपर उसने जवाब दिया कि उसे डर है कि पाकिस्तान की पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी।

आसिफ ने यह भी जानकारी दी कि अल-आसिफ स्कॉयर, जहाँ अफगान के शरणार्थी ज्यादा रहते थे, उनका कारोबार और दुकानें ज्यादा थीं वहाँ भी अब सब बंद है और स्थानीय लोग (पाकिस्तानी) व उनके विश्वासपात्र फ्रंटमैन आकर उनसे बर्बरता से पैसा वसूलते हैं। आसिफ ने अपनी तरह एक अपने चाचा की भी कहानी सुनाई जिन्होंने 5.2 मिलियन में खरीदे घर 1.4 मिलियन में बेचना पड़ा।

ऐसे ही एक हबीब उल्ला का दर्द भी रिपोर्ट में बताया गया है जिसकी उम्र 40 साल है और वो पेशावर में सब्जी की दुकान करता था। कई सालों से वो उसकी बीवी और उसके 13 बच्चे यहीं इसी दुकान के भरोसे पले। लेकिन अब हालातों की वजह से हबीब उल्लाह को भी अपनी दुकान कम दाम में बेचनी पड़ी। कुछ लोगों ने उनसे कर्जा लिया था वो पैसा भी उन्हें वापस नहीं मिल रहा जिसकी वजह से उन्हें 3 लाख रुपए (पाकिस्तानी रुपए) से ज्यादा नुकसान हो गया। उनकी बस यही तमन्ना है कि अगर सरकार उन्हें यहाँ से निकाल ही रही है तो कम से कम उन्हें उनकी मेहनत का पैसा ले जाने दिया जाए।

सरकार ने कहा था कि गैर दस्तावेज वाले अफगानी चूँकि कोई व्यापार या बैक के माध्यम से वित्तीय लेन-देन नहीं कर सकते इसलिए वो एक विश्वासपात्र पाकिस्तानी को चुनें और उसके नाम से अपना काम और वित्तीय लेन-देन करें… अब अफगान के शरणार्थी ये भी शिकायत कर रहे हैं कि यही फ्रंटमैन उनकी मजबूरियों का फायदा उठाने से पीछे नहीं हट रहे और उनकी बचत को लूटने में लगे हैं। इसके अलावा ऐसी वीडियोज भी आ रही हैं जिनमें दिखाया जा रहा है कि कैसे पाकिस्तानी फौज शरणार्थियों को डराने-मारने में लगी है।

मुल्क की सरकार ने पिछले 40 साल से पाकिस्तान में रह रहे अफगानी शरणार्थी को लेकर ऐसा निर्णय क्यों लिया ये बात खुद पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों की समझ से भी बाहर है। लेकिन चलिए हम अंदाजा लगा भी लें कि शायद कर्ज के तले दबा पाकिस्तान अपने ऊपर से कुछ बोझ हल्का करने और राशन बचाने के लिए ऐसी हरकत कर रहा हो। मगर, सवाल है कि ये सामान्य पाकिस्तानियों को क्या हुआ है…। ये क्यों उन अफगानिस्तानी मुस्लिमों को लूटने में जुटे हैं जिन्हें सोशल मीडिया पर आते ही वो उम्माह का हिस्सा बताते रहे। और, जब बात हकीकत में साथ देने की आई तो एकदम रंग बदल लिया।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने किया पाकिस्तान का विरोध

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान की ऐसी हरकत का विरोध भी जताया है। दक्षिण एशिया में अभियान के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के उप क्षेत्रीय निदेशक लिविया सैकार्डी ने तो कहा है कि पाकिस्तान इस समय अफगान शरणार्थियों को राजनीति के मोहरों जैसे इस्तेमाल कर रहा है और उन्हें उस अफगानिस्तान में दोबारा भेज रहा है जिसमें आज तालिबानी राज है।

संस्था ने तो ये भी दावा किया है कि ये पाकिस्तानी इस समय सिर्फ उन्हें निशाना नहीं बना रहे जिनके पास ‘प्रूफ ऑफ रजिस्ट्रेशन’ नहीं है, बल्कि ये उन्हें उन वैध शरणार्थियों को भी परेशान कर रहे हैं जिनपर POR है। संस्था ने एक 17 साल के लड़के के गायब होने की घटना का जिक्र किया है जो जन्मा पाकिस्तान में था और उसके पास सभी जरूरी दस्तावेज भी थे लेकिन उसे फिर भी कराची से उठाकर डिटेंशन सेंटर में रख दिया गया और घरवालों को उस लड़के से मिलने तक नहीं दिया गया।

एमनेस्टी ने चेता दिया है कि अगर अभी पाकिस्तानी सरकार ने ये निर्वासन को नहीं रोका तो हजारों अफगानियों खासकर महिलाओं-लड़कियों की सुरक्षा शिक्षा, जीवन सब दाव पर लग जाएगा। लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि पाकिस्तानी सरकार के कान में जूँ भी रेंगी है।

31 अक्टूबर को उन्होंने अंतिम तारीख दी थी और उसके बाद से उन्होंने शरणार्थियों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया है। ये शरणार्थियों अगर कुछ बोल पा रहे हैं तो सिर्फ इतना- “जब हमने इतने सालों में किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया तो अब हम कैसे पहुँचाएँगे?”… सोच रहे हैं तो ये कि बिन पर्याप्त पैसों के उनका कहीं और गुजारा कैसे होगा।

गाजा के लिए रोया था रोना, अब उम्माह का ख्याल नहीं

अजीबोगरीब बात ये है कि यही पाकिस्तान पिछले दिनों गाजा के लिए रोना रो रहा था, मानवाधिकार की बात कर रहा था लेकिन अब अपने कारनामों पर चुप है। है न हैरानी की बात कि ये हल्ला सिर्फ तभी होता है जब एक तरफ मुस्लिम और दूसरी तरफ कोई और समुदाय हो? क्या जो अफगानी शरणार्थियों से हो रहा है उस पर उम्माह को एक एकजुट होकर नहीं बोलना चाहिए। आज पाकिस्तान उन्हें उसी जमीं पर भेज रहा है जहाँ से वो सालों पहले भागकर आए थे। तालिबान के प्रवक्ता तक को पाकिस्तान की इस हरकत से नाराजगी है लेकिन उन्हें खुद को इस हरकत पर कोई शर्म नहीं।

वैसे ये पहली दफा नहीं है कि इस्लामी देश पाकिस्तान ने मुसलमानों पर अत्याचार देखकर करके आँख मूँदी हो। चीन के कर्जे तले दबा ये मुल्क उइगर मुस्लिमों पर हमेशा से चुप रहा है। उनकी मदद करना तो दूर ये मुल्क सहारा माँगने वाले उइगरों को दोबारा चीन को सौंप देता था। इसके अलावा अपने देश के अल्पसंख्यकों पर हमेशा से इसने क्रूरता की है। खबरों से पता चलता है कि कैसे वहाँ हिंदू, सिख, ईसाई समुदाय के लोगों पर धर्मांतरण की तलवार लटकाई जाती है और लोग अपने बच्चियों को लेकर भारत भागते हैं कि उन्हें पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से बचाया जा सके।