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TMC ने जिसे लड़ाया विधानसभा चुनाव, वो निकली बांग्लादेशी नागरिक: कलकत्ता HC ने चुनाव आयोग से कहा – कार्रवाई कीजिए

पश्चिम बंगाल (West Bengal) की ममता बनर्जी सरकार पर लंबे समय से ये आरोप लगते रहे हैं कि वो राज्य में बांग्लादेशियों को सपोर्ट कर रही है। अब ताजा मामले में खुलासा हुआ है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता आलो रानी सरकार (Alo Rani Sarkar) एक बांग्लादेशी नागरिक हैं। ये वही आलो रानी हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल के बनगाँव दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ा था।

इस मामले का खुलासा तब हुआ जब उस क्षेत्र से भाजपा नेता स्वप्न मजूमदार की जीत को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस मामले में सुनवाई जस्टिस विवेक चौधरी ने की। कोर्ट ने कहा है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए नामांकन करते वक्त, चुनाव वाली तारीख और इसके रिजल्ट के दिन तक वो एक बांग्लादेशी नागरिक थीं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “याचिकाकर्ता के डॉक्यूमेंट से यह पता चलता है कि याचिकाकर्ता को 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ने का कोई अधिकार नहीं था।”

कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा, “चूँकि वह भारत की नागरिक नहीं हैं, इसलिए वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के साथ संविधान के अनुच्छेद 173 के अनुसार वो किसी भी राज्य में चुने जाने के योग्य नहीं हैं।”

बांग्लादेश की वोटरलिस्ट में नाम था, फिर भी चुनाव लड़ीं आलो रानी

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि टीएमसी नेता आलो रानी सरकार की शादी 1980 के दशक में बांग्लादेश के नागरिक हरेंद्र नाथ सरकार से हुई थी, जिसके बाद वो कुछ वक्त के लिए बांग्लादेश गई थीं। हालाँकि, जब पति से नहीं बनी तो वो फिर से भारत चली आईं। अपने हलफनामे में आलो रानी सरकार ने 5 नवंबर 2020 को वोटर लिस्ट और बांग्लादेश के राष्ट्रीय पहचान पत्र (एनआईसी) से अपना नाम कैंसिल कराने के लिए अप्लाई किया था। 29 जून 2021 को वरिष्ठ जिला चुनाव अधिकारी (बरिसाल) ने बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से उनका नाम हटाने की सिफारिश की थी।

उल्लेखनीय है कि आलो रानी सरकार ने 31 मार्च 2021 को बनगाँव दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन दाखिल किया था। इसके लिए मतदान 22 अप्रैल 2021 को हुआ था और 2 मई को इसके रिजल्ट आए। चुनाव के दौरान टीएमसी की नेता बांग्लादेशी नागरिक थीं। भारत में दोहरी नागरिकता वाले लोग चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

भारत में जन्म पर आलो रानी का झूठ

आलो रानी ने दावा किया था कि बांग्लादेश में उनके पति के पैतृक स्थान के वोटर लिस्ट में गलत तरीके से उनका नाम शामिल हो गया था। जबकि, यह पता चला है कि टूीएमसी नेता ने अपनी इच्छा से ही अधिकारियों को एसएससी प्रमाण पत्र जमा करके अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराया था। उन्होंने ये भी दावा किया कि उनका जन्म 22 मार्च, 1969 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बैद्यबती में हुआ था। इसके साथ ही उन्होंने 1955 के नागरिकता अधिनियम के तहत जन्म से भारतीय नागरिक होने का दावा किया था।

भले ही टीएमसी की नेता पश्चिम बंगाल की पैदाइश होने का दावा कर रही हों, लेकिन बावजूद इसके वो बैद्यबती में उनका जन्म होने का एक भी सबूत नहीं दे पाई हैं। एक जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, आलो रानी ने दावा किया था कि वो समर हलदर की बेटी हैं और उनके पूर्वज बांग्लादेश के पिरोजपुर जिले के नेचराबाद उपजिला के रहने वाले थे। उन्होंने दावा किया था कि उनके भाई और माँ अभी भी नेचराबाद में रहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में वो अपने चाचा के साथ रहती हैं।

कोर्ट ने कहा, “ये कहने की कोई जरूरत नहीं है कि याचिकाकर्ता ने खुद के जन्म से ही इस देश का नागरिक होने का दावा किया है। लेकिन, जिस जाँच रिपोर्ट पर वह सीपीसी के आदेश VII नियम 11(डी) के तहत आवेदन के खिलाफ अपनी लिखित आपत्ति जताती हैं, उसी से ये पता चलता है कि उनके माता-पिता बांग्लादेश में रहते थे और वो बचपन में अपने चाचा के साथ भारत आई थी। अत: उनका जन्म बांग्लादेश में हुआ था।”

इसके अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी को टीएमसी नेता की जन्म की तारीखों में भी काफी गड़बड़ियाँ देखने को मिली हैं। ये विसंगतियाँ बांग्लादेशी और भारतीय दोनों ही दस्तावेजों में मिली। टीएमसी नेता के आधार और पैन कार्ड पर उनकी जन्मतिथि 22 मार्च 1969 है, जबकि यह बांग्लादेशी अधिकारियों द्वारा जारी राष्ट्रीय पहचान पत्र (एनआईसी) पर 15 जनवरी 1967 है।

टीएमसी नेता की भारतीयता अस्पष्ट

कोर्ट ने एफिडेविट और जाँच रिपोर्ट को नोट किया। हालाँकि, कोर्ट का कहना है कि अभी ये स्पष्ट नहीं है कि उनका नाम बांग्लादेश की वोटर लिस्ट से हटाया गया है या नहीं। न तो ये स्पष्ट है कि वो भारतीय नागरिक कैसे बनीं। कोर्ट ने ये भी कहा, “याचिकाकर्ता ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 या 4 के तहत नागरिकता का दावा नहीं किया है। न ही उसने 1955 के नागरिकता अधिनियम की धारा 5 के तहत पंजीकरण द्वारा नागरिकता हासिल नहीं की है।”

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “याचिकाकर्ता भी नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 के दायरे में नहीं आती हैं। इसलिए, भले ही याचिकाकर्ता के पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और पासपोर्ट हो, लेकिन ये दस्तावेज इस देश की नागरिकता को साबित नहीं करते हैं।”

कोर्ट के फैसले के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों का पालन करते हुए कभी भी इस देश की नागरिकता हासिल नहीं की। इसके विपरीत सबसे अधिक सर्वमान्य स्थिति ये है कि याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल राज्य विधानसभा के आम चुनाव की घोषणा की तारीख को एक बांग्लादेशी नागरिक थी।

कैदी नंबर ‘241383’ ने पहली रात नहीं खाया खाना, केवल दवा ली: नवजोत सिंह सिद्धू को पटियाला सेंट्रल जेल में मिली नई पहचान

पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) को पटियाला सेंट्रल जेल में नई पहचान मिली है। यह पहचान है ‘कैदी नंबर 241383’ का। 34 साल पुराने रोडरेज के केस में सुप्रीम कोर्ट से एक साल की सजा पाने के बाद कॉन्ग्रेस नेता शुक्रवार (20 मई 2022) को जेल पहुँचे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेल में सभी कैदी की पहचान उनके नंबर से होती है। ऐसे में कॉन्ग्रेस नेता को ‘कैदी नंबर 241383’ की पहचान मिली है। यहाँ उन्हें एक साल तक सश्रम कारावास की सजा भुगतनी होगी। इस दौरान प्रतिदिन काम करने के बदले उन्हें 30 से 90 रुपए तक की मजदूरी मिलेगी। यहाँ उन्हें रहने के लिए 10×15 का एक बैरक दिया गया है, जिसमें उनके साथ चार और कैदी पहले से हैं। इनमें से दो पूर्व पुलिसकर्मी हैं और दो आम नागरिक हैं।

सिद्धू ने शुक्रवार की शाम को सरेंडर किया था। उन्हें जेल भेजे जाने के बाद जेल के मैनुअल के हिसाब से शाम को 7:15 बजे दाल-रोटी खाने के लिए दी गई थी। हालाँकि कुछ दवा उन्होंने ली। रिपोर्ट में जेल के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया है, “जेल में उनके लिए विशेष भोजन की व्यवस्था नहीं है। यदि डॉक्टर किसी विशेष भोजन की सलाह देते हैं, तो वह जेल की कैंटीन से खरीद सकते हैं या खुद बना सकते हैं।” जेल में सिद्धू को एक कुर्सी टेबल, कैदियों के सफेद कपड़े, एक आलमारी, 2 पगड़ी, एक कंबल, एक बेड, तीन अंडरवियर और बनियान, 2 टॉवल एक मच्छरदानी, कॉपी पेन, 2 जोड़ी जूते, 4 जोड़ी कुर्ता-पायजामा औऱ 2 बेडशीट दिए गए हैं।

गौरतलब है कि 1988 के रोडरेज केस में एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 1000 रुपए का जुर्माना लगाकर क्रिकेटर से नेता बने सिद्धू को छोड़ दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस केस में गुरुनाम सिंह नाम के जिस बुजुर्ग की मौत हुई थी, उनके परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की थी। शीर्ष अदालत का ताजा फैसला इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए आया था।

BJP के दो कार्यकर्ताओं को TMC की ‘सजा’, जबरन इस्लाम कबूल करवाया: हाई कोर्ट ने CBI/NIA जाँच का दिया ऑर्डर

कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) ने पश्चिम बंगाल के मालदा (Malda, West Bengal) में दो महिलाओं द्वारा उनके पतियों को विरोधी दल को समर्थन करने की सजा के रूप में जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करने के मामले की जाँच CBI या NIA से कराने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी राज्य पुलिस को जाँच में सहयोग करने का निर्देश दिया है।

पश्चिम बंगाल में 2021 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद से तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों का राज्य में तांडव जारी है। टीएमसी के गुंडे राज्य में भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्या, बलात्कार और उनके घरों में आगजनी को अंजाम दे रहे हैं। इस मामले में भी दो पीड़ित भाजपा समर्थक बताए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि जिस राजनीतिक दल के गुंडों द्वारा धर्मांतरण कराने की बात कही जा रही है, वह TMC है।

महिलाओं ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कहा है कि उनके पतियों, रिश्तेदार भाइयों और जिले के कालियाचाक इलाके के निवासियों को जबरन धर्मांतरित कर हिन्दू से मुस्लिम बना दिया गया। महिलाओं ने कहा कि उनके पति विधानसभा चुनाव में एक राजनीतिक दल के काम करते थे और जब वह चुनाव हार गई तो विरोधी दल ने सजा के तौर उन्हें धर्मांतरित कर दिया।

इस मामले में दोनों महिलाएँ बहनें हैं और उनके पति आपस में भाई हैं। ये दोनों एक पार्टी के लिए काम करते थे। साल 2021 में वह पार्टी विधानसभा चुनाव हार गई। महिलाओं का आरोप है कि उनके पति 24 नवंबर 2021 से लापता हैं। इस संबंध में उन्होंने पुलिस में शिकायत भी दी, लेकिन संबंधित थाने में उनकी शिकायतों को फाड़ दिया गया। इसके साथ ही इन महिलाओं को बताया गया कि उनके पतियों ने इस्लाम अपना लिया है।

वहीं, पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि पतियों ने पारिवारिक विवादों के कारण अपना घर छोड़ दिया था और उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम अपना लिया था। इसी कारण दोनों ने वापस अपने घर जाने से इनकार कर दिया। वकील ने कोर्ट को बताया कि धर्मांतरण से पहले इनका नाम गौरांग मंडल और बुद्धु मंडल था। अब गौसल आजम और मोहम्मद इब्राहिम के नाम से जाने जाते हैं। इस संबंध उन्होंने दोनों के धर्मांतरण का शपथ-पत्र भी कोर्ट के समझ प्रस्तुत किया।

इस पर कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस राजशेखर मंथा ने कहा है कि यह स्पष्ट नहीं है कि हलफनामे की पुष्टि क्यों और किस उद्देश्य के लिए की गई है। अदालत ने आगे कहा कि यह इस मामले में सबसे गौर करने वाली बात है कि पुलिस ने अभी भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की है और शिकायत मिलने के बाद ना ही कोई कदम उठाया है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इसके अलावा भी अन्य आरोप हैं। इनमें जबरन धर्मांतरण, सीमा पार से घुसपैठ, भारी मात्रा में हथियारों एवं गोला-बारूद तथा नकली मुद्रा का भंडारण, अपहरण और धमकी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि ये आरोप रिट याचिकाकर्ताओं के दावों से सीधे ना जुड़ा हो, लेकिन उनके पतियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़ा हुआ है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने मालदा जिले के SP को हलफनामे के रूप में अपनी स्वतंत्र एवं विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। इसके साथ जस्‍ट‍िस मंथा ने कहा कि पुलिस को याचिकाकर्ताओं की जान के खतरे को देखते हुए उनकी सुरक्षा की समीक्षा करनी चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जून को होगी।

बता दें कि साल 2021 में भाजपा के विधानसभा चुनाव हारने के बाद टीएमसी के गुंडों द्वारा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल को हिंसा में झोंक दिया गया था। सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई, उनके साथ बलात्कार किया गया और उन्हें अपने घरों से भागने पर मजबूर कर दिया गया। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर आगजनी और हिंसा टीएमसी के गुंडों द्वारा दिन का क्रम बन गया।

जिस बॉक्सर को छोटे कपड़े पर टोकते थे रिश्तेदार, उसने सलमान खान को बताया ‘मेरी जान’: वर्ल्ड चैंपियन निखत जरीन को एक्टर ने दी बधाई

भारत की महिला मुक्केबाज निखत जरीन ने तुर्की में आयोजित विश्व चैंपियनशिप में 52 किलोग्राम केटेगरी में गोल्ड मेडल जीता है। वो बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान की बहुत बड़ी फैन हैं। उनके पिता ने बताया कि बेटी को मुक्केबाज बनाने के लिए परिवार ने काफी संघर्ष किया है। एक समय था, जब रिश्तेदार और दूसरे लोग कहते थे कि छोटे कपड़े मत पहनो। आज वो वर्ल्ड चैंपियन बन गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी है।

‘वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप’ में स्वर्ण पदक जीतने वाली निखत जरीन के पिता मोहम्मद जमील फुटबॉलर और क्रिकेटर हुआ करते थे और उनका सपना था कि उनकी चार बेटियों में से कोई एक स्पोर्ट्स में रुचि दिखाए। उनकी तीसरी बेटी ने मुक्केबाजी का प्रशिक्षण शुरू किया। निजामाबाद की रहने वाली निखत जरीन ने अपने एक चाचा की सलाह पर मुक्केबाजी में करियर बनाने की ठानी और मात्र 14 साल की उम्र में ‘वर्ल्ड यूथ बॉक्सिंग चैंपियनशिप’ अपने नाम किया।

अब हाल ही में थाईलैंड की जितपोंग जुटामेंस को 5-0 से हरा कर विश्व चैंपियन बनने वाली वो भारत की पाँचवीं महिला मुक्केबाज हैं। मुक्केबाजी से पहले एथलेटिक्स में निखत जरीन ने स्टेट चैंपियन बनीं, लेकिन फिर मुक्केबाजी में कदम रखा। भारत में मुक्केबाजी में सबसे बड़ा नाम मैरी कॉम हैं, जिन्होंने 6 बार ये ख़िताब अपने नाम किया है। 2017 में चोट के कारण निखत बॉक्सिंग रिंग में नहीं उतर पाई थीं। उनके पिता ने कहा कि जरीन की ये जीत मुस्लिम लड़कियों के साथ-साथ देश की हर लड़की को बड़ा लक्ष्य तय कर के उसे हासिल करने का हौसला देगी।

कभी सऊदी अरब में बतौर सेल्स अस्सिस्टेंट काम करने वाले निखत के पिता ने बताया कि रिश्तेदार कभी-कभार टोक देते थे कि लड़कियों को ऐसे स्पोर्ट्स में नहीं उतरना चाहिए, जिसमें उन्हें शॉर्ट्स पहनना पड़े। निखत की दो बहनें डॉक्टर हैं और उनकी छोटी बहन बैडमिंटन खेलती हैं। 2016 में फ्लाईवेट कैटेगरी में वो सीनियर नेशनल चैंपियन बनी थीं। 2019 की एशियन चैंपियनशिप में भी उन्हें मेडल मिला। उन्होंने 2-3 साल से अपनी पसंदीदा डिश बिरयानी नहीं खाई है, लेकिन फ़िलहाल फिर से व्यस्त होने से पहले हैदराबाद में उन्हें ये सब खाने-पीने का मौका मिलेगा। उनके घर पर जश्न का माहौल हैं।

विश्व चैंपियन बनने के बाद निखत जरीन ने सलमान खान से मिलने की इच्छा जताई थी, जिसके बाद सलमान खान ने भी ट्वीट कर उन्हें गोल्ड मेडल के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि सलमान खान दूसरों के लिए ‘भाई’ हो सकते हैं, लेकिन उनके लिए ‘जान’ हैं। सलमान खान से मुंबई में मिलना उनका सपना है। उनका एक और सपना है – ओलंपिक मेडल जीतना। जब निखत जरीन ने सलमान खान की बधाई पर कहा कि उन्हें इसका विश्वास नहीं हो रहा, तो सलमान खान ने कहा, “बस मुझे नॉकआउट मत करना। मेरे हीरो सिल्वेस्टर स्टैलोन की तरह पंच करती रहो।”

इमरान खान ने लाँघी मर्यादा, भरी सभा में नवाज शरीफ की बेटी के लिए की ‘सेक्सी’ बात: बोले जरदारी- इतना नीचे मत गिरो

पाकिस्तान में जारी सियासी लड़ाई के बीच पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran Khan) ने अब भाषाई मर्यादा को भी तिलांजलि दे दी है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी PML-N की उपाध्यक्ष मरियम नवाज (Maryam Nawaz) को लेकर अश्लील टिप्पणी की है। पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ के प्रमुख इमरान ने मरियम को लेकर सेक्सिस्ट टिप्पणी एक रैली के दौरान की। इसको लेकर उनकी तीखी आलोचना हो रही है। लोग उन्हें महिला विरोधी और उनके बयान को अनुचित बता रहे हैं।

मुल्तान में एक राजनीतिक रैली को संबोधित करते हुए इमरान खान ने कहा, “मुझे सोशल मीडिया पर मरियम के भाषण की तकरीर भेजी। जिसमें मरियम इतनी बार और इस जुनून से मेरा नाम ले रही थीं कि मैं उन्हें ये कहना चाहता हूँ कि मरियम देखो। थोड़ा ध्यान करो। आपके शौहर नाराज न हो जाएँ, जिस तरह से आप मेरा नाम लेती हैं।”

इमरान खान का ये अश्लील बयान तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। मरियम नवाज के चाचा शाहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने भी इमरान खान के इस बयान की भर्त्सना की है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “देश की बेटी मरियम नवाज शरीफ के खिलाफ इस अपमानजनक भाषा की देश भर में, विशेष तौर पर महिलाओं को कड़ी निंदा करनी चाहिए। देश के खिलाफ आप अपने अपराधों को हास्य के जरिए दबा नहीं सकते। मस्जिद ए नबी के नियमों को तोड़ने वाले से महिलाओं के सम्मान की उम्मीद नहीं की जा सकती।”

वहीं पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी इस बयान की निंदा की है। उनका कहना है कि जिन लोगों के घरों में अम्मी और बहनें होती हैं, वे दूसरी महिलाओं को लेकर इस तरह की बातें नहीं करते। जरदारी ने इमरान खान को राजनीति के लिए इतना नीचे नहीं गिरने की नसीहत दी है।

गौरतलब है कि इमरान खान बीते अप्रैल में पीएम की कुर्सी पर बने रहने के लिए जरूरी विश्वास मत संसद में हासिल नहीं कर पाए थे। वे पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री थे, जिसकी कुर्सी विश्वासमत हारने से गई।

उद्धव का मंत्री, पवार का खास: अदालत ने भी माना ‘डी गैंग’ से नवाब मलिक के संबंध, ED ने चार्जशीट में बताया- मुंबई ब्लास्ट के दोषी से कई बार हुई थी मुलाकात

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने गंभीर आरोपों में गिरफ्तारी के बावजूद अपने जिस मंत्री नवाब मलिक को हटाने से इनकार किया था, उनके डी गैंग से लिंक होने की बात अदालत ने भी मानी है। शरद पवार की एनसीपी से ताल्लुक रखने वाले नवाब मलिक फिलहाल मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल में बंद हैं।

इस संबंध में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दायर की गई चार्जशीट पर स्पेशल कोर्ट ने शुक्रवार (20 मई 2022) को संज्ञान लिया। कोर्ट ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि मलिक सीधे तौर पर और जानबूझकर कुर्ला स्थित गोवावाला कंपाउंड पर कब्जा करने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग और आपराधिक साजिश में शामिल थे। इस मामले में 1993 बम धमाकों का दोषी सरदार शाहवाली खान भी आरोपित है।

विशेष न्यायाधीश राहुल एन रोकाडे ने कहा कि नवाब मलिक ने D-कंपनी के सदस्य मसलन हसीना पारकर, सलीम पटेल और सरदार खान के साथ मुनिरा प्लंबर से संबंधित प्रॉपर्टी हड़पने के लिए आपराधिक साजिश रची थी। बता दें कि NIA ने दाऊद इब्राहिम कासकर और अन्य के खिलाफ अधिनियम, 1967 आईपीसी की धारा 120 बी और गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) की धारा 17, 18, 20, 21, 38 और 40 के तहत 3 फरवरी, 2022 को FIR दर्ज की थी। उल्लेखनीय है कि दाऊद इब्राहिम कास्कर, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकवादी के रूप में नामित किया गया है, एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क चलाता है जिसका नाम डी कंपनी है, जो टेरर फंडिग में शामिल है।

ईडी का दावा है कि नवाब मलिक ने डी-कंपनी के सदस्यों के साथ मिलकर गोवावाला कॉम्प्लेक्स हड़पने के लिए आपराधिक साजिश रची। ईडी ने अपनी जाँच के दौरान पिछले साल दिसंबर में, मुंबई में 1993 के सिलसिलेवार बम धमाकों के लिए उम्रकैद की सजा काट रहे सरदार खान का बयान दर्ज किया था। ईडी के मुताबिक सरदार खान ने अपने बयान में कहा है कि सलीम पटेल, हसीना पारकर का करीबी सहयोगी था और कुर्ला स्थित प्रॉपर्टी के संबंध में उसी के निर्देश पर हर फैसला लिया गया। ईडी ने अपनी चार्जशीट में सरदार खान के उस बयान का हवाला दिया है, जिसमें उसने दावा किया था कि कुर्ला वाली संपत्ति के संबंध में उसके, सलीम पटेल, हसीना पारकर और नवाब मलिक के बीच कई दौर की बैठकें हुई थीं।

ईडी की चार्जशीट में दर्ज सरदार खान के बयान के मुताबिक नवाब मलिक और हसीना पारकर एक समझौते पर पहुँचे थे और एनसीपी नेता ने हसीना को 55 लाख, सलीम पटेल को 15 लाख एवं सरदार खान को 5 लाख रुपए का भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की थी। आपको बता दें कि सलीम पटेल और हसीना पारकर दोनों की मृत्यु हो चुकी है। ईडी ने कहा है कि सरदार खान इन बैठकों में उपस्थित रहा था, इस नाते उसके बयान को चार्जशीट में शामिल किया गया है। ईडी का दावा है कि चारों (नवाब मलिक, हसीना पारकर, सलीम पटेल और सरदार खान) ने ‘आपराधिक साजिश’ की थी और कुर्ला प्रॉपर्टी के असली मालिक मुनीरा प्लंबर को गुमराह करके, सलीम पटेल के पक्ष में ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ बनाकर संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा कर लिया।

अब कहाँ गायब हो गया ज्ञानवापी ढाँचे में दिखा शिवलिंग? पूर्व महंत ने तस्वीरों से खोले राज़, हनुमान मूर्ति और कमल के फूल भी दिखे

काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉक्टर कुलपति तिवारी ने ज्ञानवापी विवादित ढाँचे और शिवलिंग को लेकर पुरानी तस्वीरें दिखाते हुए बड़ा दावा किया है। उन्होंने तस्वीर दिखाते हुए कहा है कि ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में एक और शिवलिंग है। तस्वीर में देखा जा सकता है कि दीवार में बनी एक जगह पर छोटा सा शिवलिंग रखा हुआ है। डॉ तिवारी ने कहा कि उस शिवलिंग को अब उस जगह से हटा दिया गया है। तस्वीर 17 वर्ष पुरानी बताई जा रही है।

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे की पश्चिमी दीवार पर बने खाँचे में रखे इस शिवलिंग को लेकर बड़ा सवाल ये है कि अब ये आखिर कहाँ पर है और इसे हटा कर कहाँ रखा गया है? उन्होंने उस दीवार पर कमल के फूल और घंटा की आकृतियाँ भी दिखाई। उन्होंने कहा कि उनके पास जो भी सबूत हैं, वो प्रमाणित हैं। ‘दैनिक भास्कर’ ने कुछ अन्य तस्वीरें भी प्रकाशित की हैं, जो काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ कुलपति तिवारी ने ही भेजी है।

एक और तस्वीर है, जिसे डेढ़-दो साधक पुराना बताया जा रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के उस हिस्से में बच्चे खेल रहे हैं, वहाँ पर ही श्रृंगार गौरी का मंदिर बताया जाता है। विवादित ढाँचे के परिसर के पास स्थित चबूतरे पर बच्चों को खेलते हुए देखा जा सकता है। एक अन्य तस्वीर में ज्ञानवापी ढाँचे की पिछली दीवार साफ़ नजर आ रही है, जो किसी प्राचीन मंदिर का ही प्रतीत हो रहा है। मंदिर के अवशेष पर ही इसे इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बनाया गया था।

एक अन्य दस्तावेजी तस्वीर है, जिसमें अंग्रेजी में ज्ञानवापी का अर्थ ‘Well Of Knowledge’ लिखा हुआ है, अर्थात – ज्ञान का कुआँ। इस तस्वीर में नंदी की मूर्ति और उसके पीछे भगवान हनुमान की प्रतिमा दिखाई दे रही है। बता दें कि मंदिर को लेकर जो प्राचीन कथा है, वो भी यहाँ ‘ज्ञान का कुआँ’ होने की बात बताती है। डॉ तिवारी ने बताया कि इस कूप का निर्माण भगवान शिव ने खुद अपने त्रिशूल से किया था और इसमें स्नान करने के बाद माँ पारवती भगवान विश्वेश्वर की पूजा करती थीं।

उन्होंने हाल ही में मिले शिवलिंग को ही विश्वेश्वर भगवान बताया। हालाँकि, अंजुमन इस्लामिया मस्जिद कमिटी ने इन तस्वीरों को नकारते हुए कहा है कि पूरे मस्जिद परिसर में ऐसी कोई शिवलिंग है ही नहीं। उन्होंने दावा किया कि कोई भी आकर देख सकता है। उन्होंने दीवार पर बनी नक्काशी को अकबर के तब के नए मजहब ‘दीन-ए-इलाही’ के चिह्न बताते हुए कहा कि सन् 1585 के आसपास इसे बनाया गया था। उन्होंने कहा कि इस ‘मस्जिद’ को जौनपुर के सुल्तानों ने बनवाया था, जिसका औरंगजेब ने जीर्णोद्धार किया।

सिखों के जख्म पर नमक छिड़क राजीव गॉंधी को अधीर रंजन चौधरी ने दी श्रद्धांजलि, कॉन्ग्रेस नेता ने लिखा- जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है…

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने राजीव गाँधी की की बरसी पर श्रद्धांजलि देते हुए विवादित ट्वीट कर के फिर उसे डिलीट कर दिया। दरअसल, अधीर रंजन चौधरी ने जो ट्वीट किया, उसमें राजीव गाँधी का ये विवादित बयान लिखा हुआ था, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।” राजीव गाँधी ने अपनी माँ और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख नरसंहार को जायज ठहराने के लिए ये टिप्पणी की थी।

अधीर रंजन चौधरी ने लिखा कि वो राजीव गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रहे हैं। हालाँकि, विवाद होने के बाद उन्होंने अपना ये ट्वीट डिलीट कर लिया और सफाई देते हुए लिखा, “मेरे ट्विटर हैंडल के साथ जो ट्वीट वायरल हो रहा है, उसका मेरे विचारों से कोई लेनादेना नहीं है। मेरी विरोधी ताकतों द्वारा मेरे खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान चलाया जा रहा है।” इस पर लोगों ने पूछा कि अगर ट्वीट में कुछ भी गलत नहीं था, तो उन्होंने उसे डिलीट क्यों किया?

इस ट्वीट को डिलीट करने के बाद अधीर रंजन चौधरी ने दोबारा राजीव गाँधी को उनकी बरसी पर श्रद्धांजलि देने के लिए ट्वीट किया और उसमें उनका दूसरा उद्धरण लगाया, जिसमें उन्होंने जनता के विकास में मानवीय पहलू पर जोर देने की बात की थी। लोग उनके पुराने ट्वीट को सिखों का अपमान भी बता रहे हैं। सिख नरसंहार को जायज ठहराने के आरोप उन पर लग रहे हैं। लोगों ने कहा कि अब कहीं अधीर रंजन चौधरी अकाउंट हैक होने वाली थ्योरी (बहाना) लेकर न आ जाएँ।

याद हो कि पिछले ही महीने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी पूर्व पीएम राजीव गाँधी के इस कुख्यात भाषण का उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने सिखों को नरसंहार को सही ठहराया था। बता दें कि आज भी सज्जन कुमार इस मामले में जेल में हैं, जो कॉन्ग्रेस के बड़े नेता थे। दिल्ली कॉन्ग्रेस में सक्रिय जगदीश टाइटलर हों या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ, इन ऐसे कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर नरसंहार में शामिल होने के आरोप लगे।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अधीर रंजन चौधरी ने बयान जारी कर के कहा है कि उनका ट्विटर हैंडल हैक हो गया था। उन्होंने कहा कि उनके ट्विटर अकाउंट से एक विवेकहीन, पक्षपाती और बुरे नीयत से एक कंटेंट शेयर कर दिया गया। उन्होंने कहा कि तब वो पार्टी के एक कार्यक्रम के दौरान मंच पर व्यस्त थे और उनके फोन उनके पास नहीं था। उन्होंने अपना ट्विटर हैंडल हैक होने का आरोप भी लगाया। उन्होंने साइबर पुलिस से कार्रवाई की भी माँग की।

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में है स्वयंभू ज्योतिर्लिंग, 100 फीट नीचे स्थित है आदि विश्वेश्वर का शिवलिंग: लॉर्ड्स नेक्स्ट फ्रेंड का दावा

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure, Varanasi) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में हिंदू पक्ष ने शुक्रवार (20 मई 2022) को तर्क दिया कि ज्ञानवापी में आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में लॉर्ड्स नेक्स्ट फ्रेंड (प्रतिवादी) के वकील विजय शंकर रस्तोगी ने लाइव लॉ से कहा कि वजूखाने में मिला शिवलिंग आदि विश्वेश्वर का शिवलिंग नहीं है। वह तारकेश्वर महादेव हैं। उन्होंने कहा कि आदि विश्वेश्वर का शिवलिंग ज्ञानवापी ढाँचे के केंद्रीय गुंबद के ठीक नीचे हो सकता है। यह स्वयंभू शिवलिंग पृथ्वी की सतह से 100 फीट नीचे स्थित है।

बता दें कि स्वयंभू का अर्थ होता है, जो स्वयं प्रकट हुआ हो यानी जिसे बनाया नहीं गया हो। इस अर्थ में भगवान आदि विश्वेश्वर को स्वयं प्रकट हुआ शिवलिंग माना जाता है, जो भगवान शिव के रूप का प्रतिनिधित्व करता है। पुराणों के अनुसार, काशी स्थित शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और सबसे प्राचीन है। ज्योतिर्लिंगों का एक लंबा इतिहास है और इसका वर्णन वेद, उपनिषद, पुराण सहित कई हिंदू धर्मशास्त्रों में अंकित है।

एडवोकेट रस्तोगी ने बताया कि अंग्रेजी शासन के दौरान विश्वनाथ मंदिर का एक पुराना नक्शा वाराणसी के तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनवाया गया था। वह नक्शा का उल्लेख ‘हिस्ट्री ऑफ बनारस रिटन बाय डॉक्टर एएस एलटेकर (हेड ऑफ डिपार्टमेंट, बीएचयू वाराणसी)’ में किया गया है। उसमें दिखाया गया है कि किस-किस स्थान पर कौन-कौन देवता के मंदिर थे।

साल 1991 से वाराणसी के सिविल कोर्ट में चल रहे काशी विश्वनाथ और ज्ञानवापी मस्जिद मामले में आदि विशेश्वर की ओर से वादमित्र रस्तोगी ने कहा कि उस नक्शे के आधार पर वजूखाना का स्थान तारकेश्वर मंदिर को ओर इशारा करता है। उन्होंने कहा कि इस मंदिर को गिराकर सपाट कर दिया गया था। अगर वह शिवलिंग है तो वह उसी तारकेश्वर महादेव का हो सकता है।  

कई बार तोड़ा गया और बनाया गया विश्वनाथ मंदिर

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व विशेष कार्याधिकारी डॉ. विश्वनाथ पांडेय के अनुसार, काशी विश्वनाथ मंदिर पाँच बार बनाने का प्रमाण इतिहास में मिलता है। पहला 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने वरुणा-गंगा संगम के पास बनवाया गया था। संस्कृत सीखने 402 ईस्वी में काशी आए पहले चीनी यात्री फाहियान ने इस महाराजा विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए आदि विश्वेश्वर के पन्ने की शिवलिंग देखने की बात लिखी है।

दूसरी बार विश्वेश्वर गंज के तालाब के पास बना था, लेकिन इस स्थान लेकर इतिहासकारों को विशेष जानकारी नहीं मिली। उन्होंने बताया कि वाराणसी के राजघाट में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान 2,500 साल प्राचीन एक अविमुक्तेश्वर सील मिली थी, जिसे भगवान शिव की पूजा से जोड़ा गया था।

काशी के राजा मोतीचंद की लिखी पुस्तक ‘काशी का इतिहास‘ पुस्तक के अनुसार, सबसे पहले आदि काशी विश्वेश्वर को 1194 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ने तोड़ा था। उसके बाद मंदिर को फिर बनवाया गया, लेकिन 1447 ईस्वी में जौनपुर के तत्कालीन सुल्तान महमूद शाह शर्की ने फिर इसे तोड़वा दिया था।

इसके बाद अकबर के शासनकाल 1585 में राजा मान सिंह ने वित्त मंत्री टोडरमल के द्वारा काशी विश्वेश्वर मंदिर बनवाया था। इस बनवाने में नारायण भट्ट ने मदद की थी। इसी को ढहाकर 1669 ईस्वी में औरंगजेब ने ज्ञानवापी ढाँचा बनवाया था।

औरंगजेब के शासन काल के दौरान राजा जय सिंह ‘द्वितीय’ ने 1680 ईस्वी में आदि विश्वेश्वर को बनवाया था। उसके बाद 1780 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ मंदिर तैयार कराया। कहा जाता है कि इसी मंदिर में मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाने के लिए भगवान आदि विश्वेश्वर मंदिर का मूल अरघा (जिस पर शिवलिंग स्थापित किया जाता है) रखा है।

मस्जिद के सामने छात्रों का हनुमान चालीसा पाठ, लाउडस्पीकर पर अजान से पढ़ाई में पड़ रही थी बाधा: जम्मू की घटना

मस्जिद के लाउडस्पीकर की आवाज से परेशान छात्रों ने जम्मू-कश्मीर (Jammu Kahsmir) में ह​नुमान चालीसा का पाठ किया। इसके बाद जम्मू के गाँधी मेमोरियल गवर्नमेंट कॉलेज के करीब 6 छात्रों को शुक्रवार (20 मई 2022) को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इन छात्रों ने एक स्थानीय मस्जिद के सामने इकट्ठा होकर हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) का पाठ किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गाँधी मेमोरियल गवर्नमेंट कॉलेज के छात्र जिस वक्त हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे, उस दौरान मस्जिद में मुस्लिम नमाज अदा कर रहे थे। छात्रों का आरोप है कि बेफिजूल के शोर के कारण वे पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे। जिसके कारण वे स्थानीय मस्जिद के खिलाफ विरोध करने पर विवश हो गए।

उल्लेखनीय है कि 17 मई 2022 को जम्मू नगर निगम (JMC) ने धार्मिक और सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति के चल रहे सभी लाउडस्पीकरों को हटाने का आदेश जारी किया था। ये प्रस्ताव भाजपा के पार्षद नरोत्तम शर्मा ने पेश किया था। हालाँकि, आदेश के बाद भी इसकी अनदेखी कर मस्जिद ने लाउडस्पीकर नहीं हटाया।

लाउडस्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पेश करने वाले शर्मा ने कहा था कि इससे बहुत ही अधिक मात्रा में ध्वनि प्रदूषण हो रहा है, जिससे लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। मंगलवार को इस प्रस्ताव को पारित करते हुए जम्मू नगर निगम के मेयर चंदर मोहन गुप्ता ने कहा, “संकल्प बहुमत के साथ पारित किया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कार्य किया जाएगा।”

कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लाउडस्पीकर का विरोध करने वाले छात्र स्थानीय मस्जिद से लाउडस्पीकर को बंद नहीं करवा पाने पर प्रशासन से भी नाखुश थे। इन छात्रों को पहले राज्य पुलिस ने गिरफ्तार किया और बाद में उन्हें छोड़ दिया।

क्या है लाउडस्पीकर विवाद

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के प्रमुख राज ठाकरे ने मस्जिदों समेत तमाम धार्मिक स्थलों पर अवैध रूप से लगाए गए लाउडस्पीकरों को हटाने के लिए एक मुहिम छेड़ी थी। इसी के बाद ये विवाद शुरू हुआ। इसके तहत उन्होंने उद्धव ठाकरे सरकार को पहले 4 मई 2022 तक सभी मस्जदों से लाउडस्पीकर हटाने को लेकर चेतावनी दी थी। हालाँकि, जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को जहाँ भी मस्जिदों में लाउडस्पीकर में नमाज हो, वहाँ पर दोगुनी आवाज में हनुमान चालीसा का पाठ करने को कहा था।

मनसे के इस ऐलान के बाद राज्य की कई मस्जिदों ने संबंधित प्रशासन के पास मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर अजान करने के लिए अप्लाई किया। इसी तरह से उत्तर प्रदेश सरकार ने धार्मिक स्थलों के ऊपर से अवैध लाउडस्पीकरों को तेजी से हटाने का कार्य किया। इनमें से करीब 40000 से अधिक अवैध लाउडस्पीकरों को प्रशासन ने हटवा दिया, जबकि, करीब 55000 को डेसिबल लिमिट के नियमों का पालन करने का आदेश दिया गया।