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राजस्थान के सरकारी अस्पताल में नाबालिग से रेप, निसार खान ने डिलिवरी वार्ड में ले जाकर 14 साल की बच्ची से की दरिंदगी

राजस्थान (Rajasthan) रेप (Rape) के मामले में आए दिन चर्चा में रहता है। इसी क्रम में ताजा मामला बाड़मेर (Barmer) से आया है। जहाँ पेट में दर्द होने पर होने पर जिले के सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए गई नाबालिग (14) के साथ चाकू की नोक पर निसार खान (26) ने बलात्कार किया। वारदात को अंजाम देने के बाद वह वहाँ से फरार हो गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, ये वारदात गुड़ामालानी इलाके की बताई जा रही है। सोमवार (16 मई 2022) को पीड़िता के पेट में अचानक से दर्द उठा तो अपने भाई के साथ वो गुड़ामालानी सीएची सेंटर में इलाज के लिए गई, लेकिन वहाँ पर काफी भीड़ थी, जिसके कारण उसका भाई उसे वहीं पर बैठाकर बाजार सामान लाने के लिए चला गया। इस बीच पहले से ही लड़की पर नजर रख रहा आरोपित निसार खान पुत्र हाजी खान वहाँ आया और वो उसे चाकू की नोक पर जबरदस्ती अस्पताल के ही खाली पड़े डिलिवरी वार्ड में लेकर गया।

वहाँ जाने के बाद आरोपित ने नाबालिग के साथ रेप किया और इसका वीडियो बना लिया। साथ ही फोटो भी खींच लिया। इसके बाद वहाँ से फरार हो गया। घटना के बाद जब पीड़िता का भाई वहाँ पहुँचा तो उसने अपने साथ हुई ज्यादती की बात अपने भाई को बताई। दोनों वहाँ से इलाज कराए बिना ही घर लौट गए और घर जाकर पीड़िता ने इसकी जानकारी माँ को दी।

इसके बाद 19 मई को पीड़िता को लेकर उसके परिजन गुड़ामालानी थाने गए और रेप का केस दर्ज कराया। इस मामले में पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आईपीसी की धाराओं के साथ ही पोक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज किया है।

जिले के एसपी दीपक भार्गव के मुताबिक, आरोपित निसार फरार चल रहा है और उसकी तलाश की जा रही है। यह घटना दोपहर के समय हुई थी, इसलिए उस दौरान अस्पताल में कौन था, इसकी छानबीन की जा रही है।

गैस, कुकर और टीवी की सर्विस का काम करता है नासिर

इस घटना को लेकर गुड़ामालानी थाने के एएसआई सोनाराम का कहना है कि पीड़िता की मेडिकल जाँच की गई है। आरोपित गैस, कुकर और टीवी सर्विस का काम करता है। वो भी गुड़ामालानी का ही रहने वाला है औऱ कुछ महीने पहले इसी के सिलसिले में पीड़िता के घर पर आया था। तभी से वो उस पर नजर बनाए हुए था।

औरंगजेब मंदिर विध्वंस का चैंपियन, जमीन आज भी देवता के नाम: सुप्रीम कोर्ट को बताया क्यों ज्ञानवापी हिंदुओं का, कैसे लागू नहीं होता वर्शिप एक्ट

उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) में ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure) में वीडियोग्राफिक सर्वे के बाद सामने आए साक्ष्यों के बाद हिंदू पक्ष ने अपना दावा और मजबूती से पेश करना शुरू कर दिया है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जवाबी याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि मुगल आक्रांता औरंगजेब (Aurangzeb) ने फरमान जारी कर भगवान आदि विश्वेश्वर के मंदिर को गिराने का आदेश दिया था।

इस जवाबी याचिका में कहा गया है कि मुगल आक्रांता औरंगजेब मंदिरों का विध्वंस करने में चैंपियन था और उसके आदेश पर काशी और मथुरा सहित देश के मंदिरों का विध्वंस किया गया। इसके साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि मंदिर के हिस्से को ध्वस्त तो कर दिया गया था और उसी क्षेत्र में ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण भी किया गया, लेकिन वे हिंदू धार्मिक प्रतीकों और देवताओं की मूर्तियों को बदलने में विफल रहे। इसलिए देवी श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश और अन्य देवता आज भी परिसर में मौजूद हैं।

याचिका में कहा गया है कि औरंगजेब ने अपने फरमान में और मुगल इतिहासकारों के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि औरंगजेब या उसके बाद के शासकों ने विवादित भूमि पर वक्फ बनाने या किसी मुस्लिम या मुस्लिम निकाय को जमीन सौंपने का आदेश दिया था। हिंदू पक्ष की ओर कोर्ट में शामिल अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने याचिका में अदालत को बताया कि फरमान की कॉपी कोलकाता के एशियाटिक लाइब्रेरी रखे होनी की जानकारी मिली है।

याचिका में कहा गया है कि इतिहासकार इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस्लामी शासक औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें उसके प्रशासन को वाराणसी में स्थित भगवान आदि विश्वेश्वर के मंदिर को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था। आदि विश्वेश्वर के मंदिर पर 1193 ईस्वी से 1669 ईस्वी तक हमला किया गया, लूटा गया और ध्वस्त किया गया।

हिंदू पक्ष ने कहा कि मस्जिद सिर्फ वक्फ की भूमि पर बनाई जा सकती है। इस मामले में मंदिर की भूमि और संपत्ति अनादि काल से देवता की है। तर्क दिया गया कि किसी मुस्लिम शासक या किसी मुस्लिम के आदेश के तहत मंदिर की भूमि पर किए गए निर्माण को मस्जिद नहीं माना जा सकता है।

याचिका में कहा गया है कि काशी में आदि विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग ‘स्वयंभू देवता’ हैं और यह ‘तपोभूमि’ भारतवर्ष के विभिन्न हिस्सों में स्थापित 12 ज्योतिर्लिंगों में से सबसे प्राचीन है। हिंदू पौराणिक कथाओं के तहत ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है और इसका वर्णन वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य शास्त्रों में किया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि ज्ञानवापी विवादित ढाँचे पर पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 लागू नहीं होता, क्योंकि वहाँ की संरचना के धार्मिक चरित्र को बदलने को लेकर कोई सवाल ही नहीं है। वहाँ अभी भी भगवान की पूजा होती है और श्रद्धालुओं द्वारा पंचकोशी परिक्रमा किया जाता है। याचिका में कहा गया है कि हिंदू कानून भी कहता है कि देवता की भूमि हमेशा देवता के नाम पर रहती है। विदेशी शासन आने के बाद भी देवता का अधिकार खत्म

याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पक्ष भी इस बात को मानते हैं कि 30 दिसंबर 1810 को तत्कालीन जिलाधिकारी वॉटसन ने अध्यक्ष परिषद को एक पत्र भेजकर ज्ञानवापी क्षेत्र को हमेशा के लिए हिंदुओं को सौंपने का सुझाव दिया था।

जुमे पर ज्ञानवापी के विवादित ढॉंचे में भारी जुटान, गेट बंद करना पड़ा: इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई 6 जुलाई तक टली

वाराणसी की ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में शुक्रवार (20 मई 2022) को जुमे की नमाज अदा करने के लिए बड़ी संंख्या में लोग पहुँच गए। परिसर के अंदर जगह नहीं होने के बाद गेट बंद करने पड़े। फिलहाल पुलिस-प्रशासन अलर्ट मोड में है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार विवादित ढाँचे के भीतर 700 लोगों की क्षमता है। लेकिन करीब एक हजार लोग जमा हो गए। इसके बाद गेट बंद कर लोगों से अन्य मस्जिदों में जाने की अपील की गई। वाराणसी की अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की अपील के बावजूद लोगों का यह जुटान हुआ। कमेटी ने लोगों से ज्यादा तादाद में नहीं आने और अपने मोहल्ले की मस्जिदों में ही नमाज अदा करने की अपील की थी। इसका कारण ज्ञानवापी के वजू खाने को सील किया जाना बताया गया था।

उल्लेखनीय है कि हिंदू पक्ष ने सर्वे के दौरान विवादित ढाँचे के वजू खाना में शिवलिंग मिलने का दावा किया था। इसके बाद इस जगह को सील कर सुरक्षाकर्मियों के हवाले कर दिया गया। हालाँकि प्रशासन ने जुमे पर नमाजियों के लिए पानी के विशेष इंतजाम किए थे। प्रशासन की ओर से बताया गया था कि नमाजियों के लिए 50 लोटा और दो ड्रम पानी का इंतजाम किया गया है।

उल्लेखनीय है कि पहले से ही आज शुक्रवार (20 मई 2022) को जुमे के के कारण बड़ी संख्या में नमाजियों के विवादित ढाँचे पहुँचने की संभावना जताई जा रही थी। इसे देखते हुए अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने मुस्लिमों से भीड़ नहीं लगाने की गुजारिश की थी। लेकिन इस अपील का कुछ खास असर नहीं पड़ा।

इस बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ज्ञानवापी से जुड़े मामले की सुनवाई 6 जुलाई तक टाल दी है। हाई कोर्ट को यह तय करना है कि 31 साल पहले 1991 में दाखिल वाद की सुनवाई हो सकती है या नहीं। इस मामले में 16 मई को पिछली सुनवाई हुई थी। पिछली सुनवाई पर हिंदू पक्ष की बहस पूरी नहीं हो सकी थी। जानकारी के मुताबिक हिंदू पक्ष की बहस पूरी हो गई है। शुक्रवार को यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता पुनीत गुप्ता ने अपना पक्ष रखा। अगली सुनवाई में भी वह ही बहस करेंगे। हालाँकि अन्य अदालतों में इस मामले को लेकर सनवाई जारी रहेगी। बता दें कि इस मामले में आज (20 मई 2022) सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई होने वाली है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वाराणसी की ट्रायल कोर्ट से भी कोई आदेश न देने को कहा था।

72 हूरों का लालच, अलकायदा से लिंक: सूफी इस्लामिक बोर्ड ने कहा- मुस्लिमों को कट्टरपंथी बना रहा PFI, सरकार लगाए बैन

कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की पोल खोलने में जुटे सूफी इस्लामिक बोर्ड ने एक बार फिर से इसे बैन करने की माँग की है। सूफी बोर्ड ने दावा किया है कि कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पीएफआई आतंकवादी संगठन अलकायदा से मिला हुआ है और उसी से मिले निर्देशों के आधार पर काम करता है।

इस्लामिक बोर्ड के प्रवक्ता कशिश वारसी ने रिपब्लिक टीवी को दिए इंटरव्यू में पीएफआई पर भारतीय मुस्लिमों को भड़काने का आरोप लगाया है। उन्होंने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा कि पीएफआई के अलकायदा से मिले होने के खुलासे के बाद उन्हें हत्या की धमकी भी मिली है। वारसी कहते हैं कि पीएफआई को कई राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल पाया गया है। हमें पीएफआई पर बैन लगाने के लिए सरकार से अनुरोध किए कुछ दिन हो चुके हैं। अब जब सूफी बोर्ड को अलकायदा ने हत्या की धमकी दी है तो ये साबित हो चुका है पीएफआई अलकायदा से जुड़ा हुआ है। इसलिए, सरकार को इस पर प्रतिबंध लगाकर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

दो साल पहले भी लगाया था ऐसा ही आरोप

इससे पहले दिसंबर 2020 में भी सूफी इस्लामिक बोर्ड ने पीएफआई के आतंकियों के साथ मिले होने और मुस्लिम युवाओं को जिहाद के लिए कट्टरपंथी बनाने का आरोप लगाया था। यहीं नहीं सूफी इस्लामिक बोर्ड ने पीएफआई पर उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के जरिए मुस्लिमों के गुमराह करने का आरोप लगाया था। बोर्ड ने आरोप लगाया कि पीएफआई संगठन देश में मुस्लिमों को जिहाद के लिए भड़काता है और उन्हें यह विश्वास दिलाता है कि मरने के बाद उन्हें जन्नत में ’72 हूरें’ मिलेंगी।

मुस्लिमों में ऐसी धारणा है कि आतंकी जब भी जिहाद में मारे जाते हैं तो स्वर्ग में जाने के बाद ’72 हूर’ यानि कि 72 कुँवारी लड़कियाँ मिलती हैं, जो उनकी यौन इच्छाओं को पूरा करती हैं। इस्लामिक आतंकवादी इस बात में विश्वास करते हैं। आतंकवादी संगठन आईएसआईएस, अल-कायदा, बोको हराम जैसे संगठन नए आतंकियों को लालच देने और उन्हें भर्ती करने के लिए ऐसे वादे करते हैं।

मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाने के सूफी इस्लामिक बोर्ड के आरोप के बाद हाल ही में PFI ने उसे मानहानि का नोटिस भी भेजा था। इसके जबाव में बोर्ड ने दो टूक कहा था कि वे तब तक नहीं रुकेंगे जब तक भारत में पीएफआई पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता क्योंकि वो भारत के युवाओं को कट्टर बना रहा है।

केरल हाई कोर्ट ने भी कहा था कट्टरपंथी

एक केस की सुनवाई के दौरान हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) और इसकी मूल संस्था पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) दोनों चरमपंथी संगठन हैं। हाई कोर्ट के जस्टिस हरिपाल ने कहा था, “इसमें कोई शक नहीं, एसडीपीआई और पीएफआई चरमपंथी संगठन हैं जो हिंसा के गंभीर कृत्यों में लिप्त हैं। वहीं, वे प्रतिबंधित संगठन नहीं हैं।”

केरल हाई कोर्ट के मुताबिक, एसडीपीआई और पीएफआई का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को टार्गेट कर उनपर हमले करने का पुराना इतिहास रहा है। कोर्ट ने ये टिप्पणी मारे गए आरएसएस कार्यकर्ता ए संजीत की पत्नी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की थी। इसमें उन्होंने मामले की सीबीआई जाँच की माँग की थी। आरोप था कि एसडीपीआई के कार्यकर्ताओं ने पलक्कड़ के एल्लापल्ली में 26 साल के आरएसएस कार्यकर्ता संजीत की हत्या उनकी पत्नी के सामने ही कर दी थी।

शादी से पहले सेक्स नहीं करूँगी: डेटिंग लाइफ से परेशान महिला खिलाड़ी ने इंस्टाग्राम पर साझा किया दर्द, कहा- मेरी जवानी का मजाक उड़ाते हैं पुरुष मित्र

लोलो जोन्स (Lolo Jones) अमेरिका की जानी-मानी एथलीट है। ओलंपिक सहित कई इंटरनेशनल टूर्नामेंट में अपने देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। फिलहाल वे अपनी एक इंस्टाग्राम पोस्ट को लेकर चर्चा में हैं। इस पोस्ट में अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में कई चौंकाने वाले खुलासे करते हुए कहा है कि वे शादी के बाद ही सेक्स करेंगी।

रविवार (15 मई 2022) ​को एक इमोशनल पोस्ट में इस 39 वर्षीय महिला ​खिलाड़ी ने लिखा कि शादी से पहले सेक्स ना करने के फैसले को लेकर पुरुष उनका मजाक उड़ाते हैं। जोन्स ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि शादी से पहले सेक्स नहीं करने के फैसले को लेकर लोग उनसे कहते हैं कि तुम बूढ़ी हो रही हो। इसके कारण एक दिन तुम्हें काफी दुखी होगा, क्योंकि तब समय तम्हारे हाथ से निकल चुका होगा।

लोकप्रिय अमेरिकी हर्डलर और बोबस्लेडर ने यह भी खुलासा किया, “मैंने आज रात उस शख्स को ब्लॉक कर दिया है, जो मुझसे पिछले 8 महीने से बातचीत कर रहा था।” लोलो ने कहा, “वह शख्स इंटिमेट होने के लिए हिंट देता था। वह शादी और बच्चों की बात करता था। लेकिन मुझे फ्रेंड जोन में रखता था। हालाँकि, वह कभी भी मुझसे मिलने के लिए टाइम नहीं निकालता है। जिसकी वजह से मैं बहुत ज्यादा दुखी भी हूँ। फिलहाल मैं लोगों से प्रार्थना करती हूँ कि वो सेक्स वाली बात को लेकर प्लीज मुझे चिढ़ाना बंद कर दें।”

2007 में Indoor National Titles जीतने वाली खिलाड़ी ने कहा कि वह अपनी डेटिंग लाइफ से परेशान हो चुकी हैं। इसलिए भगवान से अच्छे पति के लिए प्रार्थना कर रही हैं। लोलो ने कहा, “साल दर साल मेरे अंदर शादी की चाहत बढ़ती जा रही है और मैं चाहती हूँ कि मेरा भी परिवार हो। लेकिन मेरा दिल टूटता रहा है। कुछ पुरुष मुझे छेड़ते हैं कि मैं शादी से पहले सेक्स नहीं करने वाली लड़की हूँ।”

उन्होंने कहा कि ये सब मैं बहुत दुखी मन से लिख रही हूँ। भगवान के सामने रोज प्रार्थना करते हुए रोती हूँ। मेरी उम्र 39 साल की हो चुकी है। मेरे पुरुष मित्र मेरा यह कहकर मजाक उड़ाते हैं कि अब तुम्हारी जवानी ढल रही है। अगर शादी नहीं हो रही है तो कम से कम सेक्स ही कर लो, वरना टाइम निकल जाने पर कुछ हासिल नहीं होगा।

बता दें कि इस पोस्ट के वायरल होने के जोन्स ने अपना एक अैर वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि दो दिन पहले मैंने जो पोस्ट लिखी थी, वह लोगों को काफी पसंद आई। मैं उन सभी का धन्यवाद देती हूँ, जिन्होंने मुझे और मेरी भावनाओं को समझा।

हरियाणा सरकार ने रद्द किया राहुल गाँधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा की रियल एस्टेट फर्म का लाइसेंस, ये है मामला

हरियाणा की भाजपा सरकार ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के जीजा और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के एक प्रोजेक्ट का लाइसेंस रद्द कर दिया है। सत्ता में आने के 8 साल बाद भाजपा सरकार ने यह कार्रवाई की है। भाजपा की हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम में बनाए जा रहे स्काईलाइट हॉस्पिटालिटी प्राइवेट लिमिटेड का रियल एस्टेट लाइसेंस कैंसल कर दिया है।

साल 2008 में जब हरियाणा में कॉन्ग्रेस की सरकार थी, तब रॉबर्ड वाड्रा को यह लाइसेंस दिया गया था। अब टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, हरियाणा के डायरेक्टर की तरफ से यह कार्रवाई की गई है। लाइसेंस रद्द करने का आदेश 9 मार्च को दिया गया था।

साल 2012 में स्काई लाइट ने कमर्शियल कॉलोनी बनाने का यह लाइसेंस 58 करोड़ रुपए में रियल एस्टेट कंपनी DLF को बेच दिया गया था। इतना ही नहीं नियमों का उल्लंघन कर गुरुग्राम के वजीराबाद में डीएलएफ को 350 एकड़ जमीन बेचने का भी आरोप है। बता दें कि रियल एस्टेट डेवलपमेंट लाइसेंस से किसी को रिहाइशी, कमर्शियल या इंडस्ट्रियल कॉलोनी बनाने का अधिकार मिल जाता है। 2012 में भी यह लैंड डील काफी विवाद में थी।

आईएएस अशोक खेमका ने 15 अक्टूबर 2012 को स्काईलाइट के 3.35 एकड़ के म्यूटेशन को रद्द कर दिया था। इसके बाद यह मामला चर्चा में आ गया। हालाँकि, म्यूटेशन को रद्द करने के उनके आदेश को गुरुग्राम राजस्व प्रशासन द्वारा कभी भी प्रभावी नहीं किया गया। 25 अप्रैल, 2014 को गुरुग्राम के डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि म्यूटेशन की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह डीएलएफ को जमीन का मालिक बताता है। 

हरियाणा में 2014 में जब भाजपा सरकार आई तो हुड्डा सरकार की तरफ से रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी को दिए गए लाइसेंस पर खूब घेराबंदी हुई। अब विभाग ने लाइसेंस रद्द कर दिया है। अब उस जमीन पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकेगा। दरअसल हुड्डा सरकार ने काफी सस्ती कीमत में यह जमीन रॉबर्ट वाड्रा को दी थी लेकिन बाद में इसे बड़ी कीमत में डीएलएफ को बेच दिया गया।

हरियाणा सरकार ने जस्टिस एसएस ढींगरा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था। इस जाँच की रिपोर्ट सरकार को काफी पहले सौंप दी गई थी। कोर्ट ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर रोक लगाई थी। स्काईलाइट ने जब जमीन डीएलएफ को बेची तो नए टाइटल के साथ स्क्रूटनी फीस जमा की गई और सरकार के पास आवेदन किया गया।

2012 में कॉलोनी की बिल्डिंग बनाने का प्लान अप्रूव हुआ था। 2017 तक प्रोजेक्ट कंप्लीट होना था। डीएलएफ लाइसेंस रिन्यू करवाना चाहता था। जब ऐसा नहीं हुआ तो 2011 में नए लाइसेंस के लिए आवेदन किया गया। 2012 में तत्कालीन डीजी अशोक खेमका ने म्यूटेशन रद्द कर दिया। 

अब DLF ने इस मामले में टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के समक्ष अपील दायर की है, जिसमें रद्द करने के आदेश को चुनौती दी गई है। डीएलएफ ने सरकार को भेजे पत्र में कहा कि लाइसेंस के नवीनीकरण के लंबित रहने के कारण विकास कार्य पूरा नहीं हो सका। लाइसेंस के ट्रांसफर के लिए आवश्यक चार्ज और शुल्क के साथ एक आवेदन भी जमा किया गया था। 

उल्लेखनीय है कि वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटेलिटी 2007 में एक लाख रुपए से शुरू हुई थी। 2008 में स्काईलाइट ने सेक्टर 83 में आंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से 7.5 करोड़ रुपए में 3.5 एकड़ जमीन खरीदी थी। आरोप है कि कॉमर्शियल कॉलोनी का लाइसेंस मिलते ही स्काईलाइट ने जमीन 58 करोड़ में डीएलएफ को बेच दी। इसको लेकर वाड्रा और हुड्डा के खिलाफ FIR भी दर्ज हुई थी।

काशी-मथुरा पाने की लड़ाई यह भी: SC में लड़ रहे अश्विनी उपाध्याय, कहा- वर्शिप एक्ट जैसा कानून बनाने का केंद्र को अधिकार ही नहीं

उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) में काशी विश्वेश्वर मंदिर (Kashi Visheshwar Temple) को तोड़कर उसके खंडहर पर बनाए गए ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure) की वीडियोग्राफी सर्वे में कई बातें स्पष्ट हो चुकी हैं। शिवलिंग और हिंदू प्रतीकों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि वहाँ मंदिर था। हालाँकि, मुस्लिम पक्ष पूजास्थल (विशेष प्रावधान)-1991 की आड़ लेकर मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव (Former PM Narsimha Rao) के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा साल 1991 में बनाए गए इस कानून को भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट वकील (BJP Leader & Supreme Court Advocate Ashwini Upadhyay) ने चुनौती दी है। उन्होंने इस कानून को असंवैधानिक बताया है।

एडवोकेट उपाध्याय का कहना है कि हिंदू लॉ कहता है कि जहाँ एक बार मंदिर बन गया है, वहाँ अगर एक-एक ईंट भी तक उखाड़ दी जाए तो वह मंदिर ही रहेगा, जब तक कि विग्रह का विसर्जन ना किया जाए। वहीं, इस्लामिक लॉ में कहा गया है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनेगी वह अपनी होनी चाहिए या किसी से खरीदा गया या दान (बिना भय, धमकी या लालच के) में प्राप्त होनी चाहिए। उसमें पहली ईंट भी मस्जिद के नाम की ही होनी चाहिए। किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल पर तो इसे बनाने का सवाल ही नहीं है।

केंद्र को ऐसा कानून बनाने का अधिकार नहीं

ऑपइंडिया से बात करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) कानून का बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है। यह कानून पब्लिक ऑर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने के नाम पर बनाया गया है, जबकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की होती है और यह राज्य सरकार का विषय है।

उन्होंने कि यह कानून धार्मिक स्थान की यथास्थिति बनाए रखने के नाम पर लाया गया है। भारत से बाहर के धार्मिक स्थल केंद्र सरकार का विषय है। जैसे पाकिस्तान स्थिति नानकाना साहिब, चीन स्थित कैलाश मानसरोवर, कंबोडिया स्थित मंदिर, हज आदि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भारत सरकार के पास है। भारत के अंदर स्थित तीर्थ स्थानों को लेकर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।

भाजपा नेता ने कहा कि संसद में कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बनाया जा सकता। संसद कानून बनाकर ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

याचिका में हिंदुओं के अधिकारों का हनन का मुद्दा

अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा गया है कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है, जो कि संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही यह कानून जो तिथि निश्चित करता है, वह हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित करता है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों को उनके पूजास्थलों पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोर्ट जाने से रोकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 और 49 का सीधा उल्लंघन है।

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है और पूजास्थल कानून इस मूल संरचना को ही खत्म करता है। यह कानून कहता है कि धार्मिक स्थलों को लेकर जो मुकदमा चल रहा है, वह खत्म हो जाएगा और आगे से कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा। यह संविधान के एक स्तंभ न्यायपालिका पर सीधा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विवाद का निपटारा कोर्ट के जरिए नहीं होगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और भीड़तंत्र हावी हो जाएगा।

अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा है। हमारे देवी-देवता ज्यूरिस्टिक पर्सन हैं। इनको भी वैधानिक अधिकार है। संपत्ति का अधिकार है। इस कानून के जरिए राम और कृष्ण के बीच भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि पूजास्थल कानून, 1991 कहता है कि अयोध्या का मामला इसके दायरे में नहीं आएगा, लेकिन यह मथुरा पर लागू होगा। इस तरह राम और कृष्ण के बीच में भेदभाव कर दिया गया।”

अपनी याचिका में दिए गए तथ्यों पर बात करते हुए उन्होंने बताया, “संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि हिंदू धर्म के मंदिर या मठ की जमीन देवता के नाम पर होती है। जो जमीन मंदिर के देवता के नाम पर एक बार चली गई, वह हमेशा देवता के नाम पर ही रहती है। उसे छीना नहीं जा सकता। उस संपत्ति को मैनेजमेंट कमिटी भले मैनेज करे, लेकिन उसका मालिकाना हक मैनेजमेंट कमिटी के पास नहीं होता। इसलिए मंदिर की जमीन को कोई पुजारी या महात्मा नहीं बेच सकता।”

अनुच्छेद 21 में दिए गए राइट टू जस्टिस (न्याय का अधिकार) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट जाना, वहाँ दलील देना और वहाँ से न्याय लेना इसके अंतर्गत आता है। पूजास्थल कानून कोर्ट का दरवाजा बंद कर दे रहा है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है।

पूजास्थल कानून को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख को भी अपने धर्म का पालन करना, उसका प्रचार-प्रसार करना, पूजा करना, रीति-रिवाज मानने आदि का अधिकार है। जब हमारे महादेव या कृष्ण या किसी देवता का स्थान ही कब्जे में होगा तो हम अपने अनुच्छेद 25 का पालन कैसे कर पाएँगे?”

इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक स्थानों के रख-रखाव का अधिकार देता है। उन्होंने पूछा कि जब मंदिर का मालिकाना हक ही हिंदुओं के पास नहीं है तो उसका रख-रखाव कैसे होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 26 का खुला उल्लंघन बताया।

भाजपा नेता उपाध्याय ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 29 में राइट टू कल्चर के तहत इस देश में हमें अपनी संस्कृति को बचाने व उसका संरक्षण करने का अधिकार है। कृष्ण जन्मभूमि दुनिया में एक ही है, मथुरा में। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का कोई स्थानापन्न (सब्सिट्यूट) नहीं है। कृष्ण का कोई दूसरा मंदिर, मथुरा का सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। इस तरह यह कानून हमें अपने कल्चर को फॉलो करने से रोक रहा है।”

उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 49 कहता है कि सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए, उनका रख-रखाव करे। काशी, मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला आदि सब सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये सब धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक विषय भी हैं।

मुस्लिम पक्ष जानता है कि कानून गलत है

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि उपरोक्त ग्राउंड पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पूजास्थल कानून, 1991 के खिलाफ PIL दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने इस PIL का अभी तक विरोध नहीं किया है। अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, “उन्हें पता है कि पूजास्थल कानून घटिया है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया। जबसे मैंने PIL दाखिल किया है, दो साल में ये लोग सुप्रीम कोर्ट आ गए होते। अगर कोई इसका विरोध नहीं किया तो इसका मतलब है कि मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों का कोई जवाब नहीं है।”

बता दें कि एडवोकेट उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है। इसको लेकर उपाध्याय का कहना है कि सरकार ने दो साल से इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है। इसका मतलब है कि ऊपर दिए गए जो तथ्य उठाए गए हैं, उसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए जवाब नहीं आया।

उन्होंने बताया कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को संसद में बिल द्वारा खत्म किया जा सकता है या सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी PIL यानी, इस विवादित कानून पर सुनवाई पूरे हुए ज्ञानवापी या मथुरा के ईदगाह मस्जिद को लेकर सुनवाई पूरी नहीं हो सकती।

बीफ लेकर स्कूल पहुँचीं महिला प्रिंसिपल दलीमा, बच्चों के मीड डे मील में भी बाँटने को कहा: स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद गिरफ्तार

असम में गोलपारा जिले में एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल को लंच में बीफ लाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपिता प्रिंसिपल का नाम दलीमा नेसा है। वह मुस्लिम समुदाय से हैं और लखीमपुर के सरकारी स्कूल में पोस्टेड थीं। उनके खिलाफ स्थानीय लोगों ने शिकायत की थी। यह घटना 14 मई 2022 (शनिवार) की है। प्रिंसिपल की गिरफ्तारी मंगलवार (17 मई 2022) को हुई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दलीमा नेसा बीफ को अपने घर से बना कर ले गई थीं। उन्होंने स्कूल में मिड डे मील बनाने वाले वर्कर्स से उसे बच्चों में बाँटने के लिए कहा। उन बच्चों में कई हिन्दू समुदाय के छात्र भी थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपिता प्रिंसिपल की उम्र 56 साल है। पुलिस को दी गई शिकायत में कहा गया है कि दलीमा की हरकत से स्कूल के बाकी सदस्यों को समस्या हुई। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक प्रिंसिपल के खिलाफ ब्लॉक स्तरीय जाँच भी शुरू कर दी गई है। वहीं 2 दिनों की सरकारी छुट्टी के चलते दलीमा का निलंबन आदेश जारी नहीं किया जा सका था।

बता दें कि अब तक हुई जाँच में सामने आया है कि महिला प्रिंसिपल लंच में चिकन और बीफ दोनों ले कर आई थी। यह माँस बाहर से प्रोग्राम में आने वाले लोगों को परोसा जाना था। बाहर से आने वाले लोग और महिला प्रिंसिपल एक ही समुदाय से हैं। हालाँकि, रसोइए ने इसे परोसने से मना कर दिया था। बाद में यह खबर स्कूल के अन्य स्टाफ को पता चली और देखते ही देखते बाहर फैल गई और लोग भड़क गए। बाद में स्कूल मैनेजमेंट कमेटी ने इसकी शिकायत पुलिस में की।

फिलहाल महिला प्रिंसिपल न्यायिक हिरासत में है। शिक्षा विभाग के मुताबिक दलीमा निस्सा लगभग डेढ़ साल से हेडमास्टर के पद पर हैं। उनके रिटायरमेंट में लगभग 4 साल बचे हैं। दलीमा नेस्सा पर IPC की धारा 153-A (2 समुदायों के बीच द्वेष फैलाने) और 295-A (किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत करने) की धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

ज्ञानवापी का वजू खाना सील, नमाजियों के लिए 50 लोटा-2 ड्रम पानी का इंतजाम: अंजुमन इंतजामिया ने कहा- मोहल्ले की मस्जिदों में पढ़े नमाज

वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे के (Gyanvapi Masjid Shivling) वजू खाना शिवलिंग मिलने के बाद सील कर दिया गया है। इसे देखते हुए वाराणसी के जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने नमाजियों के लिए विशेष इंतजाम करवाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन ने शुक्रवार (20 मई 2022) यानी जुम्मे की नमाज से पहले वजू करने के लिए विवादित ढाँचे में 50 लोटे और दो ड्रम पानी का इंतजाम करावाया है।

वहीं, वाराणसी के अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने लोगों से अपील की है कि वे शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए बड़ी संख्या में मस्जिद में न आएँ। इसका कारण ज्ञानवापी का वजूखाना सील किया जाना बताया गया है। लोगों से अपने मोहल्‍ले की मस्जिदों में ही जुम्मे की नमाज अता करने की अपील की गई है।

बताया जा रहा है कि जुम्मे की नमाज से पहले गुरुवार (19 मई 2022) को जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने वाराणसी के मुस्लिम प्रतिनिधियों और धर्मगुरुओं के साथ बैठक की थी। इस बैठक में उन्होंने मुस्लिमों से शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील करते हुए उन्हें नमाज से पहले वजू के लिए पूरा इंतजाम कराने की जानकारी दी। जिलाधिकारी ने कहा कि ज्ञानवापी में नमाजियों को वजू करने में कोई समस्या न आए, इसके लिए परिसर में 2 ड्रम पानी और 50 लोटों का बंदोबस्त किया गया है।

गौरतलब है कि वाराणसी स्थित ज्ञानवापी विवादित (Gyanvapi Mosque Survey) ढाँचे में तीन दिनों तक सर्वे का काम चला था। तीसरे दिन हिन्दू पक्ष की तरफ से सोमवार (16 मई, 2022) को करीब 12 फीट 8 इंच लंबा शिवलिंग नंदी के सामने वजूखाने में मिलने का दावा किया गया था। जिसके बाद वाराणसी सिविल कोर्ट के जज रवि कुमार दिवाकर ने उस जगह को सील कर सीआरपीएफ के हवाले करने का निर्देश दिया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने जिला प्रशासन को आदेश दिया था कि जिस स्थान पर शिवलिंग मिला है, उसे सील कर पूरी सुरक्षा दी जाए, लेकिन इसके चलते नमाज में बाधा नहीं आनी चाहिए।

क्या होता है वजू खाना

वजू खाना वह जगह है, जहाँ नमाज से पहले नमाजी अपने हाथों और पैरों को धोते हैं। इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक, ऐसा इबादत से पहले साफ-सफाई के लिए किया जाता है। वजूखाना मूलतः 2 शब्दों से मिल कर बना है। पहला वजू जिसका अर्थ होता है शरीर के अंगों को साफ करना और दूसरा खाना जिसका मतलब उस जगह से है जहाँ वजू किया जाता है।

UP के एटा में DM आवास से सटे दरगाह पर चला बुलडोजर: लगातार बढ़ता जा रहा था कब्जा, गुरुवार को लगता था मेला

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत मुल्लेशाह दरगाह पर किए गए अतिक्रमण पर बुलडोजर चला है। यह कार्रवाई 15 मई 2022 (रविवार) को की गई। सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई की तारीफ की जा रही है। वहीं समाजवादी पार्टी प्रशासन के इस एक्शन का विरोध कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एटा जिला के ADM प्रशासन ने इस कार्रवाई की पुष्टि की है। उन्होंने कहा, “दरगाह सुरक्षित रखी जाएगी, लेकिन उसके ऊपर जो कमरे बन रहे हैं उसे तोड़ा गया है। इस कमरे में लोग रहना शुरू कर दिए थे।” वहीं समाजवादी पार्टी ने प्रशासन की इस कार्रवाई का विरोध किया है। दिबियापुर से सपा विधायक प्रदीप यादव ने कहा, “हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर 7 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने इस मामले की जाँच की है। हम इस कार्रवाई का विरोध करते हैं। इसकी जाँच रिपोर्ट अखिलेश यादव को सौंपी जाएगी। साथ ही इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया जाएगा।”

समाजवादी पार्टी के एटा जिलाध्यक्ष परवेज जुबैरी ने भी इस कार्रवाई को गलत बताया है। उन्होंने कहा, “बहुत गलत काम हुआ है ये। ऐसा नहीं होना चाहिए। ये हमारी एकता को तोड़ने का प्रयास है।”

गुरुवार को लगता था मेला

गौरतलब है कि मुल्लेशाह की दरगाह पर हर गुरुवार को मेला लगता था। मेले में चादर आदि बिकती थी जिसको चढ़ाने और अगरबत्ती जलाने पर मन्नत पूरी होने जैसी बातें कही जाती थी। यहाँ का केयर टेकर सोनू कुमार नाम के व्यक्ति को बनाया गया था। यह दरगाह कितनी पुरानी है, आज स्पष्ट नहीं है। लेकिन केयरटेकर इसे 100 साल पुराना बता रहे हैं।

DM बंगले से सटी हुई थी मजार

ऑपइंडिया से बातचीत में स्थानीय निवासियों ने बताया, “मुल्लेशाह की दरगाह एटा में जिला जज के आवास के ठीक सामने बनी थी। यह दरगाह DM बंगले की बॉउंड्री से भी सटी हुई थी। पहले दरगाह छोटी सी थी जो बाद में आसपास अवैध निर्माण कर बड़ी हो गई थी। यहाँ पर कभी DM एटा के ड्राइवर रहे और अब रिटायर्ड प्रेमपाल सिंह ने अतिक्रमण कर के मकान आदि बनाना शुरू कर दिया था। बाद में यहाँ मेला लगने लगा था। दरगाह सुरक्षित है और उसके बगल अतिक्रमण को हटाया गया है।”