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क्या केजरीवाल की ‘राजनीति’ में डूब जाएगा सीमावर्ती पंजाब या शेष है कोई उम्मीद?

लेख के शीर्षक से ही ये साफ है कि मैं अरविंद केजरीवाल का या आम आदमी पार्टी का कोई प्रशंसक नहीं हूँ। जो लोग मेरे मत को फॉलो करते हैं, खासकर ट्विटर पर, उन्हें ये पता ही होगा। साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में AAP की जीत के बाद ऐसा लगता है मेरे पास सिर्फ चिंतित होने और कयामत के दिन की कल्पना करने का विकल्प बचा है। हालाँकि, जनादेश का विरोध और कयामत के दिन की कल्पना करना ‘लिबरल’ होने का आदर्श उदाहरण है इसलिए मैं ऐसा करने से बचूँगा।

लेकिन, इससे ये हकीकत नहीं बदलेगी कि बहुत से लोग AAP के चलते पंजाब के भविष्य को लेकर आशंकित हैं। AAP ने 2017 में ही अलगाववादी तत्वों से छेड़खानी की थी, लेकिन तब कॉन्ग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीत लिए थे। भले ही उस समय एनडीए गठबंधन के हाथों से सत्ता चली गई थी लेकिन भाजपा समर्थकों ने इस बात का स्वागत किया था कि सरहदी राज्य पर का नेतृत्व कैप्टेन अमरिंदर सिंह करेंगे, जो पूर्व में आर्मी में थे और AAP नेताओं की तरह गैर जिम्मेदार नहीं है। लेकिन अब क्या होगा जब 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में आप को प्रचंड बहुमत के साथ जीत मिली है?

इससे भी बदतर बात यह है कि इस साल के चुनाव में, अलगाववादी और खालिस्तानी भावनाएँ पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले में कहीं अधिक और मजबूत दिखाई दीं। लंदन और कनाडा में बैठे हैंडलरों को भी तीन कृषि कानून के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे किसान आंदोलन के बहाने भावनाएँ भड़काने का सबसे अच्छा मौका मिला, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा वापस ले लिया गया था।

ऐसे विरोध प्रदर्शनों के दौरान खालिस्तानी झंडे, नारे और बयानबाजी नियमित रूप से सुनाई देती थी जो ईशनिंदा के आरोप में व्यक्ति की हत्या और रेप करने वाले आपराधिक तत्वों का भी बचाव करते थे। और हाँ! इन्हीं प्रदर्शकारियों ने 2021 में गणतंत्र दिवस पर लाल किले को अपवित्र करके, देश के संवैधानिक अधिकारों को खुली चुनौती दी थी। इसके बाद भी अधिकांश राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे तत्वों की केवल सांकेतिक रूप से आलोचना की गई थी। हकीकत में तो शिरोमणि अकाली दल जैसी पार्टियों ने गणतंत्र दिवस के इन उपद्रवियों को आर्थिक और कानूनी समर्थन भी दिया था। AAP ने भी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे प्रदर्शनकारियों को कई तरह से सहायता पहुँचाई थी।

हम इस समय उन हालातों में हैं जहाँ कोई मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी खुलेआम जरनैल सिंह भिंडरावाले को आतंकी नहीं कह सकती। वही भिंडरावाले जिसने पंजाब के इतिहास में काले अध्यायों को जोड़ा जहाँ हजारों हिंदू मारे गए और कई सिखों ने भी न जाने किसी प्रकार के ‘न्याय’ और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की नासमझी में अपनी गँवाई। पिछले महीने यही खालिस्तान के समर्थन में नारे दीप सिद्धू के अंतिम संस्कार के समय सुने गए थे, जो कि एक पंजाबी एक्टर था लेकिन किसान प्रदर्शन के चलते राष्ट्रीय स्तर पर नाम पा चुका था।

सामने होती घटनाओं से आँख मूंदरकर उन्हें ‘अलग’ बताने के लिए किसी को भी शतुरमुर्ग ही होना पड़ेगा। हालाँकि यह सच है कि पंजाब में हर कोई खालिस्तान की चाह नहीं रखता। लेकिन सच तो ये भी है कि पड़ोसी पाकिस्तान में बैठे कुछ लोगों सहित हैंडलर इसे हाल के दिनों में अपने अलगाववादी विचारों और माँगों को आगे बढ़ाने के लिए सबसे बढ़िया अवसर मान रहे हैं। इन सभी पिछले कहानियों के साथ पंजाब अब आम आदमी पार्टी के हाथ में चला गया है और चलिए ये कहा जाए कि अरविंद केजरीवाल के हाथ में चला गया है। ये आदमी क्या करेगा?

केजरीवाल के पूर्व साथी कुमार विश्वास की मानें तो केजरीवाल खुद पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं, क्योंकि वह दिल्ली जैसे आधे राज्य का सीएम होने से कहीं बड़ा पद है। विश्वास ने सच में ये दावा किया है कि केजरीवाल ने एक बार कहा था कि वे स्वतंत्र पंजाब के प्रधानमंत्री बनने का दावा करते थे। केजरीवाल ने कहा था कि वह एक ‘स्वतंत्र पंजाब’ के ‘प्रधानमंत्री’ बनने की हद तक भी जा सकते हैं, जो कि खालिस्तान होगा। अजीब बात तो ये है कि आम आदमी पार्टी ने कुमार विश्वास के इस दावे को चलाने वाले हर मीडिया संस्थान को मुकदमे की धमकी दी थी, लेकिन उन्होंने विश्वास के ख़िलाफ़ मुकदमे की बात नहीं कही। यानी केजरीवाल ने खुद को परोक्ष रूप से खुद को ‘स्वीट टेररिस्ट’ कहकर जवाब दिया। जो कि और भी अजीब है।

इस तरह के गंभीर आरोप के प्रति इस तरह के आकस्मिक दृष्टिकोण किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकते हैं कि क्या अरविंद केजरीवाल दोबारा से चीजों में इतना गड़बड़झाला कर सकते हैं कि पंजाब दोबारा अंधकारों के दिनों में लौट जाए। इसका सीधा जवाब यह हो सकता है, वाकई ‘सड़जी’ इसे खराब करने वाले हैं क्योंकि उन्होंने इससे पहले भी गैर-जिम्मेदाराना बयान दिए हैं।

हालाँकि, मुझे विश्वास है कि शायद चीजें इतनी विनाशकारी नहीं होंगी। हैरानी की बात है, लेकिन हाँ, मुझे अरविंद केजरीवाल से उम्मीद है कि वह हकीकत में चीजों को बदतर नहीं करेंगे।

साल 2019 के लोकसभा परिणामों के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिखाया है कि वह एक व्यवहारिक नेता भी हो सकते हैं न कि किसी अप्रत्याशित आवारा की तरह जो आग लगाने वाले बयान दें जो कि वह पहले करते थे- जैसे सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाना, ईवीएम पर सवाल उठाना, यह दावा करना कि मोदी अगर दोबारा जीते तो किसी कोई चुनाव नहीं होंने देंगे,  अर्बन नक्सलियों के साथ मिलनसार व्यवहार रखना और इसी तरह बहुत कुछ।

2019 के ‘धक्के’ के बाद केजरीवाल जिस तरह से राजनीति कर रहे हैं, उनमें स्पष्ट रूप से बदलाव आया है। वह अब हड़बड़ी में रहने वाले पागल आदमी नहीं लगते। उन्होंने राम मंदिर के फैसले या अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में और सीएए को लेकर (हालाँकि उनके विधायक अमानतुल्ला खान ने जो किया वह लोगों के लिए अज्ञात नहीं है) भड़काऊ बयान नहीं दिया। उन्होंने ऐसे बयानों या घटनाओं से पूरी तरह खुद को बचाया, जिन्हें खुले तौर पर हिंदू विरोधी देखा जा सकता है। दूसरी ओर, वह सार्वजनिक पूजा और कीर्तन का आयोजन करते दिखे, जिसके कारण उनके ‘सेकुलर’ फैन अक्सर उन पर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ मानकर हमला करने लगे।

इसके अलावा जो केजरीवाल मोदी ‘कायर और मनोरोगी’ बोल देते थे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी अनाप-शनाप बोलना बंद कर दिया। कुल मिलाकर वो चुप हो गए हैं और एक लंबी पारी के लिए तैयार हो रहे हैं जहाँ वह पहले की तरह किसी प्रकार का हमला करके नहीं बल्कि ईंट से ईंट जोड़कर, रणनीतिक कदम उठाकर अपने को मजबूत करना चाहते हैं।

और यही से आशा बनती है कि हो सकता है कि केजरीवाल नए देश के प्रधानमंत्री न बनना चाहते हों और अपने ही देश में प्रधानमंत्री बनने पर उनकी नजर हो। हड़बड़ी वाला पागल आदमी नहीं बल्कि एक चतुर आदमी जो थोड़ा इंतजार करने को तैयार है।

पंजाब में आप की जीत की भविष्यवाणी करने वाले एग्जिट पोल के आधार पर, पार्टी नेताओं ने पहले ही बयान जारी करना शुरू कर दिया था कि यह राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ग्रेस को हटाकर AAP के आने की शुरुआत थी। हमेशा निंदक होने और ‘राष्ट्र-विरोधी’ तत्वों के साथ छेड़खानी करते हुए आप ‘राष्ट्रीय’ महत्वाकांक्षाएँ नहीं रख सकते हैं, और उम्मीद है कि यह अरविंद केजरीवाल को पंजाब में विनाशकारी कदम उठाने से रोकेगा।

यह चुनौतीपूर्ण होने वाला है। केजरीवाल निश्चित रूप से ‘हमें काम नहीं करने दे रहे जी’ की रणनीति छोड़ने वाले नहीं हैं। पंजाब में उनकी पार्टी जो भी चुनावी वादे पूरे करने में नाकाम रही, निश्चित तौर पर वह केंद्र को ही दोषी ठहराएँगे। अब यह सबसे बड़ी चिंता की बात है – जहाँ केजरीवाल इसे केंद्र की भाजपा को बदनाम करने के लिए एक चालकी भरे राजनीतिक कदम के तौर पर देखेंगे, वहीं खालिस्तानी तत्व इसे ऐसे दिखाएँगे कि भारत के हिंदू पंजाब सिखों के साथ अन्याय कर रहे हैं।

मैं उम्मीद करता हूँ कि अपनी भलाई के लिए देश की खातिर केजरीवाल इस जोखिम को समझेंगे और खालिस्तानी तत्वों को पंजाब में अपने राजनीतिक विकास का फायदा नहीं लेने देंगे। किसान प्रदर्शन के दौरान केजरीवाल एक बैठक से उठ कर चले गए थे क्योंकि कुछ किसान उनका आर्टिकल 370 पर कुछ न बोलने के लिए मजाक उड़ा रहे थे। केजरीवाल ने तब साफ कहा था कि इन सबका किसानी से कोई लेना-देना नहीं है। वहाँ किसान सिर्फ वामपंथी वाला वो रोना रो रहे थे जहाँ अगर कोई कृषि कानून के खिलाफ़ है, तो उसे सीएए के विरोध में भी बोलना पड़ेगा और कश्मीर में संघर्ष पर भी कुछ कहना होगा- आप जानते ही है ये उत्पीड़ितों का महागठबंधन है । लेकिन यहाँ केजरीवाल ने बोलने से मना कर दिया। इसलिए मुझे आशा है कि ये आदमी पूरी तरह से चीजें नहीं खराब करेगा।

वह निश्चित ही हर चीज से ऊपर अपने हितों को रखने जा रहा है लेकिन उम्मीद है कि वो अपने वह अपने हित को एक बेहतर प्रोफाइल बनाने की दिशा में देखेंगे जिससे उन्हें परिवक्व राष्ट्र नेता और ‘पीएम मटेलियल’ के तौर पर देखा जाए। उम्मीद है कि ये सारी चीजें उन्हें खालिस्तानी तत्वों द्वारा गुमराह नहीं होने देंगी।

साथ ही, जैसा कि मैंने पहले कहा, हमारे पास अभी पंजाब में शायद ही कोई मुख्यधारा में राजनीतिक पार्टी है जो भिंडरावाले के खिलाफ खुलकर बात करेगी। राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस बेशर्मों की तरह ‘आप तमिलों पर शासन नहीं कर सकते’ जैसी बकवास के साथ भारत को बाँटने की कोशिशों में हैं। शिरोमणि अकाली दल भी चरमपंथी भावनाओं को तब भड़काना शुरू कर देता है जब उनकी राजनीति में किस्मत नहीं चलती (जैसे कि गणतंत्र दिवस के उपद्रवियों को उनका समर्थन)। बीजेपी को तो यहाँ शुरुआत करने का कभी मौका नहीं मिला। इसलिए पंजाब में आम आदमी पार्टी वर्तमान में सबसे खराब नहीं हो सकती है। हाँ, मुझे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं इसे टाइप कर रहा हूँ।

नोट: राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए आर्टिकल का अनुवाद जयन्ती मिश्रा ने किया है।

यूपी में 37 साल बाद सत्ता में दोबारा वापसी कर CM योगी ने रचा इतिहास: ‘जो नोएडा आया, उसने सत्ता गँवाया’ मिथक को भी तोड़ा, भाजपा की जीत के 5 बड़े कारण 

कुछ ही देर में यूपी चुनाव के फाइनल नतीजों के औपचारिक ऐलान हो जाएगा लेकिन रुझानों से साफ है कि बीजेपी एक बार फिर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाती नजर आ रही है। चुनावी रुझानों को गौर से देखें तो दलबदलुओं और बाहुबलियों को यूपी की जनता ने करारा जवाब दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रदर्शन से साफ है कि किसान आंदोलन से बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी की जीत ने उत्तर प्रदेश में इतिहास रच दिया है। 

उत्तर प्रदेश में करीब 37 साल बाद योगी आदित्‍यनाथ मुख्‍यमंत्री के रूप में वापसी करते दिख रहे हैं। यूपी में 37 साल में कोई सीएम दोबारा नहीं बना। ‘नोएडा आने वाला सीएम दोबारा नहीं बनता’, इस अंधविश्वास को भी योगी आदित्यनाथ ने ध्वस्त किया। साल 2017 में उत्तर प्रदेश की कमान सँभालने वाले आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद से दर्जनों बार नोएडा का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने नोएडा में मेट्रो के उद्घाटन के अलावा कई अन्य परियोजनाओं की शुरुआत की। जनवरी में उन्होंने गौतमबुद्ध नगर पहुँचकर कोविड-19 की स्थिति की समीक्षा की थी। 1985 में कॉन्ग्रेस पार्टी के मुख्‍यमंत्री जीबी पंत की मुख्‍यमंत्री के रूप में वापसी के करीब 37 साल बाद योगी आदित्‍यनाथ सत्ता में वापसी करने जा रहे हैं। 

अगर जीत के कारणों की बात करें तो इस विधानसभा चुनाव में कानून व्यवस्था, बुल्डोजर, विकास और मुफ्त राशन की डबल डोज भाजपा की जीत के बड़े कारण बने हैं। आइए उन वजहों के बारे में बात करते हैं, जो भाजपा की जीत में सारथी बने है।

कानून व्यवस्था 

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत का एक बड़ा कारण योगी सरकार की कानून व्यवस्था रही फिर चाहे महिला सुरक्षा हो या गुंडागर्दी खत्म करने की बात। कानून व्यवस्था के मसले पर जनता ने भाजपा को वोट किया। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति और अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई ने उनको एक बड़े वर्ग के बीच लोकप्रिय बना दिया। अवैध कब्जों पर बुल्डोजर चलाने से लेकर उत्तर प्रदेश को दंगा मुक्त और माफियाओं के दबदबे को कम करने के लिए दिखाई गई सख्ती हो, योगी सरकार ने इस मोर्चे पर खूब काम किया। इस कारण से लोग सुरक्षित महसूस करते हैं और इसका नतीजा जनता के वोटों से मिला है।

सरकार की लाभार्थी योजना

सरकार की लाभार्थी योजनाओं का लाभ भी भाजपा को मिला। फिर चाहे मुफ्त राशन की बात हो या फिर उज्जवला योजना या प्रधानमंत्री आवास योजना। आयुष्मान भारत, फ्री राशन, किसान सम्मान निधि योजना, शौचालय, आवास, उज्ज्वला जैसी योजनाओं का बड़ा फायदा महिलाओं को हुआ, जो इस चुनाव में वोट में तब्दील होता नजर आया। 

फ्री राशन और फ्री कोरोना वैक्सीनेशन

पूरे देश में कोरोना काल के दौरान केंद्र सरकार ने गरीब लोगों को फ्री में राशन दिया। उत्तर प्रदेश में कोरोना के दौरान केंद्र सरकार की इस योजना से 15 करोड़ लोगों को लाभ मिला। इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने भी 5 महीने का राशन फ्री में दिया। कोरोना काल में पूरे प्रदेश में कोई व्यक्ति भूखा नहीं सोया। इतना ही नहीं, कोरोना के दौरान प्रदेश सरकार ने मनरेगा के अंतर्गत अपना काम छोड़कर गाँव लौटने वाले मजदूरों को काम दिया था। इसके अलावा लोगों को कोरोना से बचाने के लिए योगी सरकार ने घर-घर सर्वे किया और लोगों को वैक्सीनेशन करवाने का प्रबंध किया। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अस्पतालों के प्रबंधन के मामले में भी योगी सरकार की तारीफ हुई थी। जिसका फायदा योगी सरकार को विधानसभा चुनाव में मिला है।

हिंदुत्व और मंदिर के मुद्दे पर मिले वोट 

यूपी की जनता ने तमाम पार्टियों के आरोपों को नकारते भाजपा को भारी संख्या में वोट दिया और पार्टी को दोबारा सत्ता में ला दिया। यूपी चुनाव में एक बार फिर से हिन्दुत्व का मुद्दा भारी रहा। भाजपा ने अपना पूरा चुनाव प्रचार हिंदुत्व के आसपास रखा। हिंदुत्व का यह कार्ड वोटरों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहा और भाजपा ने आसानी से सत्ता में वापसी कर ली। विपक्ष की तमाम घेरेबंदी के बावजूद जनता ने एकजुटता दिखाते हुए बीजेपी को मंदिर निर्माण के आधार पर एक सिरे से पसंद किया।

कमजोर विपक्ष

इस चुनाव में असली जमीनी लड़ाई समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच देखने को मिली। प्रियंका गाँधी ने कॉन्ग्रेस संगठन में जान फूँकने की कोशिश जरूर की लेकिन वह वोटों में तब्दील नहीं हो पाई। ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ का नारा भी कॉन्ग्रेस पार्टी के काम नहीं आया। वहीं बसपा जमीनी स्तर पर नजर नहीं आई। मायावती 2022 के चुनाव में बहुत कम एक्टिव रहीं, जिसका फायदा इस चुनाव में बीजेपी को कम लेकिन सपा को ज़्यादा मिला।

कपिल शर्मा ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ के एक्टर्स को अपने शो में नहीं बुलाने पर दी सफाई, कहा- एकतरफा कहानी पर यकीन ना करें

बॉलीवुड के फिल्म निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने ये आरोप लगाया था कि उनकी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को कपिल शर्मा ने अपने शो में प्रमोट करने से इनकार कर दिया था। हालाँकि, गुरुवार (10 मार्च 2022) को कॉमेडियन कपिल शर्मा ने इन आऱोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि यह सही नहीं हैं। शर्मा ने ये भी कहा कि उन लोगों को समझाने का कोई मतलब नहीं है, जो पहले ही आरोपों को सही मान चुके हैं।

शर्मा ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ को प्रमोट करने से डरने के सवाल पर एक फॉलोवर के जबाव में कहा कि यह बिल्कुल भी सच नहीं था। कॉमेडियन ने ट्वीट किया, “यह सच नहीं है राठौर साहब आपने पूछा इसलिए मान लिया। बाकि, जिन्होंने सच मान लिया है उन्हें क्या समझाना। एक अनुभवी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता के रूप में बस एक सुझाव- आज के सोशल मीडिया की दुनिया में कभी भी एकतरफा कहानी पर विश्वास न करें। धन्यवाद।”

उल्लेखनीय है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ को प्रमोट करने से इनकार करने की खबर वायरल हुई थी कि कपिल शर्मा शो के निर्माताओं को फिल्म को प्रमोट करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद कॉमेडियन और शो के निर्माताओं को ट्रोल किया गया था। इसका खुलासा करते हुए इस फिल्म के निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने ट्वीट किया, “उन्होंने हमें अपने शो पर बुलाने से इनकार कर दिया, क्योंकि हमारे पास कोई भी बड़ा व्यावसायिक स्टार कास्ट नहीं है।”।

विवेक रंजन अग्निहोत्री ने अगले ट्वीट में कहा, “मैं भी एक प्रशंसक हूँ। लेकिन सच ये है कि उन्होंने हमें अपने शो पर बुलाने से इनकार कर दिया, क्योंकि इसमें कोई बड़ा स्टार नहीं है। बॉलीवुड में नॉन-स्टार निर्देशकों, लेखकों और अच्छे अभिनेताओं को नोबॉडी माना जाता है।”

इससे पहले 7 मार्च 2022 को विवेक अग्निहोत्री ने कहा था कि कपिल शर्मा के शो पर कौन जाएगा इसका फैसला लेने का अधिकार केवल कपिल शर्मा और उसके निर्माताओं को है। एक फैन के सवालों का जबाव देते हुए फिल्म निर्देशक ने कहा, “यह उनकी और उनके निर्माता की पसंद है जिसे वह आमंत्रित करना चाहते हैं। जहाँ तक ​​बॉलीवुड का सवाल है, मैं वो कहूँगा जो एक बार बच्चन ने गाँधी परिवार के बारे में कहा था। वो राजा है हम रंक।”

गौरतलब है कि द कश्मीर फाइल्स फिल्म कश्मीरी पंडितों के जीवन पर आधारित है। इसमें अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती और पल्लवी जोशी समेत कई अन्य सीनियर एक्टर अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस फिल्म में 1989 के दशक के उस वक्त को दिखाया गया है, जब कश्मीर में बढ़ते इस्लामिक जिहाद के कारण हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। अनुमान के मुताबिक, 90 के दशक में इस्लामिक आतंक के कारण कुल 140,000 कश्मीरी पंडितों में से करीब 100,000 लोग पलायन कर गए थे। हालाँकि, 2011 तक करीब 3000 परिवार भी घाटी में नहीं बचे थे।

इस फिल्म में अलग विचार होने के कारण न केवल इसके प्रचार को रोकने की कोशिश की गई, बल्कि अनुपमा चोपड़ा जैसे फिल्म समीक्षकों ने रिलीज से पहले ही इसे नुकसान पहुँचाने की भरसक कोशिशें की। यहीं नहीं, वामपंथी विचारधारा वाले NDTV ने तो द कश्मीर फाइल्स को ‘प्रोपेगैंडा फिल्म’ बताकर एसईओ सेटिंग्स भी बदला था। बहरहाल फिल्म को कुछ मुस्लिम रिलीज होने से रोकना चाहते हैं।

यह फिल्म कश्मीर नरसंहार के पीड़ित कश्मीरी पंडितों के वीडियो इंटरव्यू पर आधारित है। पहले यह फिल्म 26 जनवरी 2022 को ही रिलीज होने वाली थी, लेकिन कोरोना के कारण अब इसे 11 मार्च को रिलीज किया जाएगा।

‘भ्रष्टाचारियों को बचा रहे कुछ लोग, वैक्सीनेशन पर फैलाई अफवाह’: 4 राज्यों में बड़ी जीत पर बोले ‘यूपी वाला’ PM मोदी – परिवारवाद का सूर्यास्त जल्द

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत के बाद भाजपा मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि बीते वर्षों में हमने ‘गवर्नेंस डिलीवरी सिस्टम’ को दुरुस्त किया और इसमें पारदर्शिता भी लाई। उन्होंने कहा कि मैं गरीबों के घर तक उसका हक़ पहुँचाए बिना चैन से बैठने वाला इंसान नहीं हूँ। पीएम मोदी ने कहा कि दो दशक से भी ज्यादा समय तक उन्हें सरकार के मुखिया के रूप में सेवा करने का अवसर मिला है और उन्हें इसमें आने वाली दिक्कतों का पता है।

पीएम मोदी ने कहा कि इन सबके बावजूद उन्होंने ऐसी हिम्मत की है, जो शायद ही कोई कर पाता। उन्होंने याद दिलाया कि लाल किले से उन्होंने कहा था कि जहाँ-जहाँ उन्हें सेवा करने का मौका मिलेगा, वहाँ हर गरीब तक सरकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ पहुँचाने की बात की। उन्होंने कहा कि जब ईमानदारी होती है, नीयत साफ़ होती है, गरीबों के प्रति करुणा होती है और देश के कल्याण की भावना होती है – तभी ये हिम्मत कोई करता है।

पीएम मोदी ने देश की महिलाओं/बहन-बेटियों को विशेष रूप नमन करते हुए कहा कि चुनाव के नतीजों में माताओं-बहनों-बेटियों का बहुत बड़ा योगदान है और ये हमारा सौभाग्य है कि भाजपा को उन्होंने इतना स्नेह और आशीर्वाद दिया है कि जहाँ-जहाँ महिला मतदाताओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा वोट किया है, वहाँ-वहाँ भाजपा को बड़ी जीत मिली है। उन्होंने कहा कि हमारी स्त्री-शक्ति भाजपा की जीत की सारथि बनी हैं।

उन्होंने अपना अनुभव सुनाया कि जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, जब कुछ घटनाएँ होने पर लोगों की उनकी सुरक्षा की चिंता हो जाती थी। तब वो कहते थे कि कोटि-कोटि माताओं का उन्हें ‘स्त्री सुरक्षा कवच’ मिला हुआ है। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएँ लगातार भाजपा पर विश्वास कर रही हैं, क्योंकि उन्हें पहली बार विश्वास मिला है कि भाजपा सरकार उनकी छोटी से छोटी ज़रूरतों को भी ध्यान में रखती है। उन्होंने कहा कि देश की भलाई के लिए सभी ‘ज्ञानी’ लोग पुराने घिसे-पिटे रिकॉर्ड छोड़ कर नए सिरे से सोचना शुरू करें।

उन्होंने कहा, “जब ये ज्ञानी लोग यूपी की जनता को सिर्फ और सिर्फ जातिवाद की तराजू में तौलते हैं, तब मुझे बहुत दुःख होता है। यूपी की जनता को जातिवाद की बाड़ाबंदी में बाँध कर के राज्य का अपमान किया जाता था। कुछ लोग ये कह कर यूपी को बदनाम करते हैं कि यहाँ के चुनाव में जाति ही चलती है, लेकिन 2014, 2017 और 2019 में जनता ने दिखा दिया है कि हर बार उत्तर प्रदेश के लोगों ने सिर्फ विकासवाद की राजनीति को ही चुना है। यूपी के लोगों ने सबक दिया है, गरीब से गरीब व्यक्ति ने सिखाया है कि जाति का मान देश को जोड़ने के लिए होना चाहिए, तोड़ने के लिए नहीं।”

पीएम मोदी ने कहा कि आज मैं ये भी कहूँगा कि 2019 के चुनाव नतीजों के बाद ‘ज्ञानियों’ ने कहा था कि 2019 की जीत में क्या है, ये तो 2017 में ही तय हो गया था। उन्होंने कहा कि इस बार भी ये ‘ज्ञानी’ ये जरूर कहने की हिम्मत करेंगे कि 2022 के नतीजों ने 2024 के नतीजे तय कर दिए हैं। उन्होंने पंजाब के भाजपा कार्यकर्ताओं की भी विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने जिस तरह विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का झंडा बुलंद किया है, उससे पंजाब और देश का विकास होगा।

उन्होंने कहा कि पंजाब में भाजपा एक शक्ति के रूप में उभर रही है। उन्होंने याद दिलाया कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और उसे अलगाववादियों से सुरक्षित रखने का काम भाजपा का हर कार्यकर्ता अपनी जान की बाजी लगा कर भी करते रहेगा। उन्होंने कहा कि ये चुनाव ऐसे समय में हुए हैं, जब दुनिया 100 वर्ष की सबसे बड़ी आपदा, कोरोना जैसी महामारी से लड़ रही है और पूरी मानव जाति, पूरे विश्व ने पिछले एक सदी में ऐसा कुछ नहीं देखा।

उन्होंने कहा कि अब युद्ध ने भी विश्व की चिंताएँ बढ़ाई हैं। उन्होंने कहा कि सप्लाई चेन पर जो प्रभाव पड़ा था, युद्ध ने उसे और गड़बड़ किया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने गरीब-कल्याण के जो फैसले लिए और कदम उठाए, उससे भारत को सँभल कर आगे बढ़ने में मदद मिली। उन्होंने कहा कि हमारी नीतियाँ जमीन से जुड़ी रहीं। उन्होंने कहा कि जहाँ-जहाँ ‘डबल इंजन’ की सरकार रही, वहाँ-वहाँ विकास के कार्यों को दोगुनी गति मिली।

उन्होंने कहा, “भारत शांति के पक्ष में है और बातचीत से हर समस्या को सुलझाने की वकालत करता है, लेकिन इस युद्ध का दुष्प्रभाव दुनिया के हर देश पर पड़ रहा है। जो देश लड़ रहे हैं, उनसे सुरक्षा और आर्थिक दृष्टि से भारत का नाता है। भारत जो बाहर से बच्चा तेल मँगाता है, उसकी कीमत भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। कोयला, गैस और फर्टिलाइजर की कीमतों में उछाल आ रहा है। महँगाई युद्ध के कारण दुनिया भर में बढ़ रही है। विकासशील देशों को ज्यादा परेशानी हो रही है।”

उन्होंने 2022 के वार्षिक बजट और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हुए कहा कि दुनिया भर में बने इस विपरीत वातावरण और उथल-पुथल व अनिश्चितता से भरे माहौल में भारत की जनता, विशेष कर के उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ने अपनी दूरदृष्टि का परिचय दिया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र भारतीयों की रगों में है। पीएम मोदी ने इस दौरान देश के सामने अपनी कुछ चिंताएँ रखते हुए कहा कि यहाँ का नागरिक तो जिम्मेदारी के साथ अपना काम कर रहा है और राष्ट्र निर्माण में जुटा है।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में कुछ लोग राजनीति का स्तर गिराते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश के निर्माण में इन लोगों ने देशवासियों को गुमराह करने की लगातार कोशिश की और टीकाकरण के हमारे प्रयासों की दुनिया प्रशंसा कर रही है, लेकिन मानवता के इस पवित्र सेवा कार्य पर भी सवाल उठाए गए। उन्होंने इसे दुर्भाग्य की बात बताते हुए कहा कि जब यूक्रेन में हजारों भारतीय छात्र फँसे हुए थे, तब भी देश का मनोबल तोड़ने की बातें हो रही थीं और उनके परिवारों की चिंता बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है, बच्चों में असुरक्षा की भावना बढ़ा रहे थे।

पीएम मोदी ने आगे याद दिलाया कि इन लोगों ने ‘ऑपरेशन गंगा’ को भी प्रदेशवाद की बेड़ियों में बाँधने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि हर योजना और कार्य को क्षेत्रवाद और जातिवाद का रंग देने का प्रयास भारत के उज्जवल भविष्य के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय है। पीएम ने याद दिलाया कि इन चुनावों में उन्होंने लगातार विकास की बात की और भाजपा का विजन लोगों के सामने रखा और घोर परिवारवाद पर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि वो न किसी परिवार के खिलाफ हैं और न ही किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी है, लेकिन वो ”ज्ञानियों’ को इसे लोकतंत्र के तराजू पर तौलने को कहा। उन्होंने कहा कि परिवारवाद देश को पीछे ले जाता है, ऐसे में जनता ने इसे समझा है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे लोकतंत्र में देश को ऊँचाई पर ले जाने के लिए वो निरपेक्ष भाव से मुद्दों को उठा रहे हैं और बहस जरूरी है, लेकिन देश में एक दिन ऐसा आएगा जब भारत में परिवारवादी राजनीति का सूर्यास्त हर नागरिक कर के रहेगा।

उन्होंने कहा कि इस चुनाव में देश के मतदाताओं ने अपनी सूझबूझ का परिचय दिखाते हुए इसका इशारा कर दिया है कि आगे क्या होने वाला है। उन्होंने एक और विषय उठाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को रोकने की साजिश चल रही है। उन्होंने पूछा कि भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं? उन्होंने भ्रष्टाचार को दीमक बताते हुए कहा लोगों में एक भयंकर नफरत का भाव है भ्रष्टाचारियों के खिलाफ। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की प्रवृत्ति बन गई है कि जनता को लूट कर अपनी तिजोरी भरें।

उन्होंने कहा कि 2014 में भाजपा ने एक ईमानदार सरकार दी और जनता ने दोबारा इस पर भरोसा किया। उन्होंने कहा कि लोग कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई कर सकती है, ऐसे में सरकार को भी जनता की इस आकांक्षा के लिए जिम्मेदार व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने ध्यान दिलाया कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई पर ये लोग और उनका पूरा इकोसिस्टम भ्रष्टाचारियों की सुरक्षा करने के लिए और सरकारी एजेंसियों को बदनाम करने आगे आते हैं।

उन्होंने कहा कि जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाया जा रहा है और उन्हें रोकने के लिए नए-नए तरीके खोजते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी लोगों को देश की न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि ये हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के बाद जाँच न होने देना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भ्रष्टाचारी पर कार्रवाई होते ही उसे प्रदेश और जाति का रंग दे दिया जाता है, जैसे किसी माफिया के खिलाफ कोई फैसला आए तो इसे भी धर्म-जाति से जोड़ दिया जाता है।

उन्होंने जनता से आग्रह किया कि ऐसे भ्रष्टाचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएँ। उत्तर प्रदेश में जीत का एक कारण उन्होंने ये भी बताया कि वहाँ के लोगों ने ऐसी राजनीति का नुकसान सहा है। उन्होंने कहा कि वो वाराणसी का सांसद होने के नाते ये कह रहे हैं कि उन्हें भी वहाँ की जनता के प्यार ने ‘यूपी वाला’ बना दिया है। उन्होंने कहा कि इन चुनाव परिणामों का बहुत महत्व है और ‘आज़ादी के अमृत वर्ष’ में ये चुनाव परिणाम देश के मिजाज को दिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि यहाँ से हम दो पटरियों पर हम एक साथ काम करने वाले है एक तरफ गाँव-गतिब, छोटे किसान और लघु उद्यमियों पर हमारा जोर होगा, वहीं देश की युवा शक्ति को बढ़ावा देकर ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना साकार करेंगे। उन्होंने युवाओं की तारीफ करते हुए कहा कि विश्व का सबसे बड़ा और सबसे तेज़ टीकाकरण अभियान आज के भारत के सामर्थ्य का उदाहरण है। उन्होंने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में भारत की आत्मनिर्भरता की बात करते हुए कहा कि तकनीक के क्षेत्र में भारत युवा शक्ति के कारण आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा का स्तर देश-दुनिया की समस्याओं का समाधान करने वाली उच्च-कोटि की हो, जिसके लिए तैयारी की जा रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मंत्र पर चलते हुए हम आगे बढ़ते रहेंगे। उन्होंने गुजरात में अपने अनुभवों की बात करते हुए कहा कि उस समय की केंद्र सरकार रोड़े अटकाती थी, लेकिन तब भी विकास हुआ। उन्होंने कहा कि चुनौतियाँ कितनी भी कठिन हों, जीतने का संकल्प उससे भी बड़ा होता है।

मथुरा और काशी में क्लीन स्वीप, अयोध्या में 5 में से 3 सीटों पर विजयश्री: धर्म नगरियों में बजा भाजपा का डंका

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम में धर्मस्थलों से संबंधित विधानसभाओं पर भाजपा ने जोरदार प्रदर्शन किया है। अयोध्या, मथुरा और काशी से भाजपा प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। खुद अखिलेश यादव ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेस में अयोध्या से समाजवादी पार्टी की जीत का दावा प्रत्याशी का नाम ले कर किया था। पार्टियों के चुनाव प्रचार के दौरान भी ये धर्मस्थल अक्सर चर्चा में रहे थे।

अयोध्या जिले में 5 विधानसभा सीटों में 3 पर भाजपा और 2 पर सपा का कब्ज़ा

अयोध्या सीट से वर्तमान विधायक वेद प्रकाश गुप्ता फिर से जीत गए हैं। उन्हें कुल 112169 (49.11%) वोट मिले। समाजवादी पार्टी सरकार में मंत्री रह चुके तेजनारायण पांडेय उर्फ़ पवन पांडेय 92067 (40.31%) वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे। बहुजन समाज पार्टी के रवि प्रकाश 17540 (7.68%) वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। कॉन्ग्रेस प्रत्याशी रीता यहाँ चौथे स्थान पर रहीं। खास बात ये रही कि यहाँ नोटा (NOTA) को आम आदमी पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी से अधिक वोट मिले हैं।

साभार – निर्वाचन आयोग

भाजपा ने अयोध्या जिले की रुदौली और बीकापुर सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं मिल्कीपुर और गोसाईंगंज सीट समाजवादी पार्टी के पाले में गई है।

मथुरा जिले की सभी 5 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा

मथुरा जिले की सभी 5 विधानसभा सीटें भाजपा की झोली में आई हैं। यहाँ मथुरा शहर से भाजपा सरकार में मंत्री श्रीकांत शर्मा ने 151729 (60.41%) वोटों के साथ जीत दर्ज की। उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रत्याशी प्रदीप माथुर को हराया जिन्हें 47770 (19.02%) वोट मिले। बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एस के शर्मा 28913 (11.51%) वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी देवेंद्र अग्रवाल को 17408 (6.93%) वोट ही मिल पाए। यहाँ NOTA को आम आदमी पार्टी और शिवसेना के उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले।

मथुरा विधानसभा, साभार – निर्वाचन आयोग

इसी के साथ मथुरा जिले में आने वाली छाता माट, गोवर्धन और बलदेव सीटों पर भी भाजपा ने जीत दर्ज की है।

वाराणसी में भाजपा का क्लीन स्वीप, सभी 8 सीटों पर भाजपा और गठबंधन प्रत्याशी जीते

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। अखिलेश यादव ने EVM विवाद को यहीं से हवा दी गई थी। यहाँ कुल 8 विधानसभा सीटें हैं जिसमें सभी 8 पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। वाराणसी कैंट से भाजपा प्रत्याशी सौरभ श्रीवास्तव ने 147833 (60.63%) वोटों के साथ जीत दर्ज की है। इस सीट पर समाजवादी पार्टी की पूजा यादव 60989 (25.01%) वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहीं। तीसरे स्थान पर रहे कॉन्ग्रेस प्रत्याशी राजेश कुमार मिश्रा को 23807 (9.76%) वोट मिले। बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी कौशिक कुमार पांडेय 7068 (2.9%) वोटों के साथ चौथे नंबर पर रहे। यहाँ भी नोटा (NOTA) को आम आदमी पार्टी प्रत्याशी से अधिक वोट प्राप्त हुए।

वाराणसी कैंट विधानसभा, साभार – निर्वाचन आयोग

इसी के साथ वाराणसी जिले की ही शिवपुर, पिंडरा, अजगरा, शहर उत्तरी और शहर दक्षिणी में भी भाजपा प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई है। भाजपा के साथ गठबंधन पर चुनाव लड़ रहे अपना दल (एस) ने सेवापुरी और रोहनिया सीटों पर जीत दर्ज की है।

कंबल, चादर, तकिया… ट्रेनों में मिलेगा फिर से सब कुछ: भारतीय रेलवे ने की सुविधा बहाल

भारतीय रेलवे ने यात्रियों को बड़ी राहत देते हुए तत्काल प्रभाव से ट्रेनों में बेड रोल मुहैया कराने की बड़ी सुविधा को बहाल कर दिया है। गुरुवार (10 मार्च) को इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया गया। इसके मुताबिक रेल मंत्रालय अब फिर से लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों को कंबल और चादर आदि देने का प्रबंध करेगा।

गौरतलब है कि साल 2020 में महामारी आने के बाद यात्रियों को चादर, तकिया और कंबल देना बंद कर दिया गया था। उन्हें चाहे कितना लंबा सफर हो अपने लिए खुद इंतजाम करना पड़ता था। ऐसे में उन्हें परेशानी भी होती थी। लेकिन अब रेलवे से आए निर्देशों के अनुसार तत्काल प्रभाव से इस सेवा को चालू करने का ऐलान किया गया है। अब आज से जो भी यात्री भारतीय रेलवे से सफर करेंगे उन्हें कंबल और चादर दोनों मिलेगी।

इस बाबत रेलवे बोर्ड ने सभी रेलवे जोन के महाप्रबंधकों को आदेश जारी कर निर्देश दिए हैं कि इन वस्तुओं की आपूर्ति तत्काल प्रभाव से शुरू की जाए। कथिततौर पर यात्रियों द्वारा इस सुविधा को बहाल करने की माँग लंबे समय से चली आ रही थी। इसी माँग को देखते हुए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने वाराणसी दौरे में बेड रोल की सुविधा को जल्द बहाल करने का आश्वासन दिलाया था।

यहाँ बता दें कि भारतीय रेलवे की एसी कोच में जो लोग अपनी रिजर्वेशन करवाते हैं उन्हें रेलवे कंबल, तकिया, चादर देता है। हालाँकि 2020 में ये सुविधा बंद होवे के बाद रेलवे की ओर से कुछ दिनों तक यात्रियों को डिस्पोजेबल बेडरोल किट मुहैया कराए गए, जिसके लिए उन्हें अलग से पेमेंट करना पड़ता था। हालाँकि यह डिस्पोजल बेडरोल आइडिया ज्यादा दिन नहीं चला। अब इस सुविधा के दोबारा शुरू होने पर कई यात्री रेलवे का शुक्रिया कह रहे है।

रैली/रोड शो- 209, सीट- 2: प्रियंका गॉंधी ने UP में कॉन्ग्रेस का ऐसे किया काम तमाम

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है वह लगभग एक लाख से अधिक वोटों से जीते हैं। यह पिछले 37 साल के इतिहास में पहली बार है जब किसी एक ही पार्टी ने लगातार दो बार सरकार बनाने में कामयाबी पाई हो और यह कारनामा बीजेपी ने किया है। वहीं सूबे में कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ होगा है। प्रदेश में कॉन्ग्रेस 2 सीटों पर सिमट गई है जो 2017 के 7 सीटों से भी कम है। यूपी की जनता ने प्रियंका गाँधी के नेतृत्व और तमाम चुनावी वादों को नकारते हुए कॉन्ग्रेस को और भी पीछे ढकेल दिया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस की साख लौटाने की कोशिश में लगीं प्रियंका गाँधी ने गिनतियों के हिसाब से सबसे अधिक 209 रैलियाँ और रोड शो किए। फिर भी कॉन्ग्रेस का काम जनता ने तमाम कर दिया है।

यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान इस बार जहाँ कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए महिला वोटर्स पर निशाना साधा था, ढेरों चुनावी लॉलीपॉप बाँटे थे। लेकिन अब यह सब बेकार हो गया है। कॉन्ग्रेस के सभी तुरुप के पत्ते फेल हो गए हैं। प्रियंका गाँधी विपक्ष की एक मात्र नेता थीं जो यूपी चुनावों के बहुत पहले से सूबे में सक्रीय नजर आईं थीं। फिर चाहे वो हाथरस का मसला हो या किसानों के मुद्दे, सभी पर उन्होंने योगी सरकार को प्रोपेगेंडा की हद तक घेरने की कोशिश की। यहाँ हम उन बिंदुओं पर बात करेंगे जिससे एक बार फिर PM मोदी का कॉन्ग्रेस विहीन भारत का सपना साकार होता नजर आ रहा है।

वहीं विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के बाद प्रियंका गाँधी ने अपनी पार्टी की खोई हुई जमीन हासिल करने के लिए जमकर चुनाव प्रचार किया। फिर भी सूबे में पार्टी की नाजुक स्थिति को देखते हुए सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को यूपी की राजनीति से दूर ही रखा गया ताकि हार का ठीकरा उनके सिर न फूटे। यूपी में जहाँ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में एक आभासी रैली किया वहीं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी चुनाव प्रचार के लगभग अंत में अतिथि के रूप में दो रैलियों को संबोधित किया जिसमें एक अमेठी और दूसरी वाराणसी में थी।

चुनावी अभियान के स्कोर बोर्ड के हिसाब से देखें तो प्रियंका गाँधी ने यूपी में कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों की जीत के लिए सबसे अधिक 209 रैलियाँ और रोड शो किए। वहीं CM योगी आदित्यनाथ ने बीजेपी को लगातार दूसरी बार सत्ता में वापस लाने के लिए प्रदेश में 203 रैलियाँ और रोड शो किए। जबकि दूसरी विपक्षी पार्टियों में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सपा गठबंधन के उम्मीदवारों के लिए 131 रैलियाँ और रोड शो किए। तो वहीं बसपा प्रमुख पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने केवल 18 रैलियों और रोड शो को संबोधित किया।

कॉन्ग्रेस ने क्यों अकेले लड़ने का किया ऐलान?

ऐसा नहीं था कि अकेले चुनाव लड़ना कॉन्ग्रेस की चॉइस थी फिर भी पार्टी ने इसे चयन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दरअसल, यूपी में योगी आदित्यनाथ की लगातार बढ़ती लोकप्रियता और कामों के मुकाबले विपक्ष में जमीन खो चुकी कॉन्ग्रेस से बड़ा जनाधार सपा के अखिलेश यादव और बसपा के मायावती का है और इसमें से कोई भी कॉन्ग्रेस के साथ एक नाव में सवार होने को तैयार नहीं था। यहाँ तक कि छोटी पार्टियों को कॉन्ग्रेस से जुड़ने में कोई लाभ नजर नहीं आ रहा था बल्कि यह उनकी अपनी पार्टी के लिए भी खतरे की घंटी थी। ऐसे में यूपी चुनाव को लेकर प्रियंका गाँधी ने पहले ही साफ कर दिया था कि कॉन्ग्रेस इस बार अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी और महिला वोटरों पर फोकस करेगी।

इसके चलते भले चुनाव में ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ नारे के साथ 40% महिलाओं को प्रत्याशी बनाने का ऐलान किया गया। लेकिन यह जितना आसान बोलना था उतना ही यूपी में इसे जमीन पर उतारना नहीं था। तो शुरुआत में ही इस नारे की पोस्टर गर्ल के बाहर होने और खुलेआम बयान देने के साथ इसकी हवा निकलती नजर आई। दूसरी वजह यह भी थी कि यूपी में कॉन्ग्रेस के पास कोई चेहरा नहीं था जिसपर वह चुनाव लड़े। चेहरे के नाम पर भले कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू लगातार योगी सरकार के खिलाफ जमीन पर थे और उनके जेल जाने की खबरें सुर्खियाँ भी बनी थीं। लेकिन फिर भी प्रियंका के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था, जो मतदाताओं पर जादू चला सके। ऐसे खुद प्रियंका गाँधी को ही मैदान में उतरना पड़ा।

कॉन्ग्रेस के चुनावी ‘लॉलीपॉप’

यूपी चुनावों में कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को भी तीन बार में जारी किया। सबसे पहले 8 दिसंबर, 2021 को जारी शक्ति विधान में महिलाओं के लिए 40% सीट की घोषणा थी तो वहीं 21 जनवरी को युवाओं के लिए जारी भर्ती विधान में 20 लाख नौकरियों का चुनावी ‘लॉलीपॉप’ युवाओं को दिया गया था। साथ ही यह भी वादा था कि 40 फीसदी रोजगार महिलाओं को आरक्षण के तहत दिए जाएँगे।

कुछ और प्रमुख वादों की बात करें तो 10 दिन में किसानों का कर्ज माफ होगा। इसके अलावा 2500 रुपए में गेंहूँ-धान और 400 रुपए में गन्ना खरीदा जाएगा। गो-धन योजना के तहत गोबर को 2 रुपए किलो खरीदा जाएगा। इसके अलावा आवारा पशुओं से होने वाले नुकसान पर 3 हजार रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। बिजली का बिल आधा किया जाएगा। इसके अलावा कोरोना काल का बकाया बिजली बिल माफ किया जाएगा। कोविड योद्धाओं को 50 लाख का मुआवजा। कोरोना की आर्थिक मार झेलने वाले परिवार को 25 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी।

‘उन्नति विधान’ के तहत कॉन्ग्रेस ने किए कुछ और वादे

  • कोई भी बीमारी होगी तो 10 लाख रुपए तक का इलाज मुफ्त होगा।
  • मध्यम वर्ग को किफायती आवास देंगे।
  • ग्राम प्रधान का वेतन 6 हजार रुपए प्रतिमाह बढ़ाएँगे।
  • स्कूल फीस को बढ़ने से रोकेंगे।
  • शिक्षकों के खाली 2 लाख पद भरे जाएँगे।
  • एडहॉक शिक्षकों, शिक्षामित्रों को अनुभव अनुसार नियमित किया जाएगा।
  • कारीगरों, बुनकरों के लिए विधान परिषद में एक आरक्षित सीट।
  • पूर्व सैनिकों के लिए विधान परिषद में एक सीट।
  • पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को खत्म करेंगे।
  • दिव्यांग लोगों के लिए 3 हजार का मासिक पेंशन।
  • महिला पुलिसकर्मियों को उनके गृह जनपथ में पोस्टिंग की अनुमति।

कॉन्ग्रेस के वादों को यूपी की जनता ने नहीं दिया भाव

अब इन वादों को कोई देखे तो खुश हो सकता है। लेकिन कॉन्ग्रेस के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यूपी की जनता ने प्रियंका गाँधी के इन चुनावी वादों को कोई भाव नहीं दिया। बेशक वामपंथी राजनीतिक विश्लेषकों ने कॉन्ग्रेस के इन वादों को सराहा और बहुत ही जमीनी और क्रन्तिकारी बताया हो लेकिन जनता ने इन वादों को लॉलीपॉप से ज़्यादा कुछ नहीं समझा। इसके पीछे कहीं न कहीं कॉन्ग्रेस का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि बड़ी वजह है।

इस चुनाव की शुरुआत में भी कॉन्ग्रेस ने इमरान प्रतापगढ़ी के माध्यम से मुस्लिमों को लुभाने के प्रयास के तहत ही शुरू किया था। लेकिन मोदी-योगी के विकास और प्रचंड हिंदुत्व की आँधी में कॉन्ग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियों को बीजेपी के ही मैदान में उतरकर विकास, मंदिर और हिंदुत्व की शरण में जाना पड़ा। जहाँ पहले से ही कॉन्ग्रेस ने अपनी छवि ख़राब कर ली है। आज भी जनता 2014 में मोदी के आगमन से पहले वाली कॉन्ग्रेस की निगेटिव इमेज को ही अपने मन में बसाए बैठी है, यह भी एक बड़ी वजह है कि प्रियंका के प्रयास के बावजूद भी कॉन्ग्रेस को यूपी की जनता ने नकार दिया।

इस प्रकार उत्तर प्रदेश में करीब ढाई दशक से अपनी खोई जमीन तलाश रही कॉन्ग्रेस को 2019 के बाद 2022 ने भी निराश किया है। ऐसे में यदि एग्जिट पोल के रुझान सही साबित होते हैं तो कॉन्ग्रेस 2017 के सपा के साथ गठबंधन वाले प्रदर्शन से भी बुरे हालात में नजर आएगी और रही सही साख भी मिट्टी में मिलती नजर आएगी।

बता दें कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 28 सीटें जीती थीं। वहीं 2014 के दौरान मोदी लहर में लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस सिर्फ दो सीटों तक ही सिमट गई थी। इसके बाद 2017 में कॉन्ग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और सूबे की सिर्फ 114 सीटों पर चुनाव लड़ा। इनमें से मात्र 7 सीटों पर उसे कामयाबी मिली। उसके बाद यदि 2019 के लोकसभा चुनाव को याद करें तो कॉन्ग्रेस इसमें भी उबरती नजर नहीं आई थी। 2019 के लोकसभा चुनावों में सिर्फ रायबरेली की सीट बचा सकी। यहाँ तक कि राहुल गाँधी को भी अपनी पारम्परिक सीट अमेठी को स्मृति ईरानी के हाथों हारना पड़ा था।

…तो जीतकर भी ‘हार’ गए कुंडा वाले राजा भैया, अबकी बार अपना भी रिकॉर्ड तोड़ न पाए

यूपी विधानसभा चुनावों में प्रतापगढ़ की कुंडा सीट पर एक बार फिर से रघुराज प्रताप सिंह ने लगातार 7वीं बार जीत दर्ज कर ली है। वहीं राजा भैया ने भले ही समाजवादी पार्टी के गुलशन यादव को हरा दिया हो, मगर इस बार उनकी सियासी बादशाहत कम हो गई है। वजह है जीत का बहुत कम अंतर जो कि करीब 30 हजार के आस-पास है। राजा भैया को जहाँ 99612 वोट मिले वहीं सपा के गुलशन यादव को 69297 वोट प्राप्त हुए है।

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया। उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम जो कभी किसी मुख्यधारा की पार्टी में नहीं रहे, लेकिन हमेशा चर्चा में रहे। कभी मुलायम सिंह से करीबी के कारण तो कभी मायावती के साथ अदावत के कारण। कभी राजनाथ सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनाने को लेकर तो कभी ‘मगरमच्छ वाले तलाब’ को लेकर।

वे जब भी प्रतापगढ़ की कुंडा सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ने उतरे कभी जनता ने मायूस नहीं किया। 2022 के ​चुनावों में भी वे जीतने में कामयाब रहे हैं। लेकिन, इस बार वे वैसी जीत हासिल नहीं कर पाए हैं, जो उन्हें पिछले विधानसभा चुनावों में नतीजों के दिन सुर्खियाँ देती रही है। असल में राजा भैया हर चुनावों में अपनी जीत का मार्जिन बढ़ाते रहने को लेकर चर्चित रहे हैं। पर इस बार वे अपना पुराना रिकॉर्ड भी बचाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।

इस बार राजा भैया को कुंडा से लगभग 30 हजार वोटों से ही जीत मिली है। जबकि चुनाव प्रचार के दौरान उनके समर्थकों ने ‘डेढ़ लाख पार’ का नारा दिया था। इरादा था डेढ़ लाख के अंतर से राजा भैया को विधानसभा में पहुॅंचाने का। राजा भैया ने भी अपनी चुनावी सभाओं में यह दावा किया था कि वो इस बार डेढ़ लाख से अधिक मतों के साथ अपनी जीत सुनिश्चित करेंगे। पिछली बार उनकी जीत का मार्जिन करीब एक लाख रहा था। बिल्कुल वैसा ही, जैसा नारा दिया गया था ‘अबकी बार एक लाख पार’।

कुंडा विधानसभा के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो साल 1993 के बाद पहली बार राजा भैया को कुंडा सीट पर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। राजा भैया 1993 से लगातार कुंडा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर विधायक बनते आ रहे हैं। प्रदेश में सत्ता किसी की भी रही हो कुंडा की सत्ता राजा भैया के पास ही रही। पिछले डेढ़ दशक से सपा कुंडा में राजा भैया के समर्थन में कोई प्रत्याशी नहीं उतारती रही, जिसके चलते वो आसानी से कुंडा सीट से जीतते रहे हैं। लेकिन, इस बार सपा ने उनके खिलाफ गुलशन यादव को मैदान में उतारा वहीं भारतीय जनता पार्टी ने ब्राह्मण कार्ड खेलते हुए सिंधुजा मिश्रा को अपना उम्मीदवार बनाया था। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव की बात करें तो राजा भैया ने 103, 647 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। उन्हें कुल 136 597 वोट प्राप्त हुए थे। दूसरे नंबर पर 32,950 वोटों के साथ भारतीय जनता पार्टी के जानकी शरण थे। वहीं 2017 के चुनाव में राजा भैया के समर्थकों ने एक लाख पार का नारा दिया था।

अखिलेश यादव से हुआ था मतभेद, पहली बार अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लड़ा चुनाव

राजा भैया और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच किसी जमाने में मधुर रिश्ते हुआ करते थे। राजा भैया को अखिलेश यादव का बेहद खास माना जाता रहा है। मुलायम सिंह यादव से भी राजा भैया के रिश्ते बेहतर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति पर गहराई से नजर रखने वालों की माने तो एक वक्त मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में ठाकुर समाज को सपा से जोड़ने की कवायद राजा भैया के सहारे ही शुरू की थी।

उत्तर प्रदेश में सत्ता बदली, वक्त बदला और अखिलेश और राजा भैया के बीच के रिश्ते सियासी अदावत में तब्दील हो गए। यहाँ तक कि चुनाव प्रचार के दौरान दोनों एक दूसरे पर तंज और फब्तियाँ कसते नजर आए। अखिलेश यादव ने पहली बार राजा भैया के खिलाफ चुनावी रैली भी की और यहाँ तक कह दिया कि इस बार जनता कुंडा में कुंडी लगा देगी। इससे पहले राजा भैया के विषय में एक पत्रकार ने जब अखिलेश यादव से सवाल किया था तो अखिलेश ने राजा भैया को पहचानने से भी इन्कार कर दिया था।

इस अदावत की कहानी का एक सिरा राज्यसभा के चुनावों से भी जुड़ा हुआ है, साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव ने मायावती की बसपा के साथ गठबंधन किया था। राजा भैया और मायावती की अदावत का किस्सा काफी पुराना है इसी कारण से वे इस गठबंधन से असहज थे। साल 2018 में हुए राज्यसभा चुनाव में अखिलेश चाहते थे कि राजा भैया गठबंधन के तहत राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी को वोट दें। लेकिन, उन्होंने मायावती के खिलाफ जाकर भाजपा प्रत्याशी को वोट दे दिया था।

25 साल तक निर्दलीय लड़ने और जीतने के बाद राजा भैया ने साल 2018 में जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के नाम से अपनी पार्टी का गठन किया। 2022 के विधानसभा चुनाव में पहली बार अपनी पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के चुनाव चिह्न पर राजा भैया ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। राजा भैया की पार्टी इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा की 16 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

‘भय का वातावरण बनाने वाले आज खुद भयभीत हैं’: 4 राज्यों में BJP की बड़ी जीत पर बोले अध्यक्ष नड्डा – PM मोदी की नीतियों पर जनता की मुहर

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत का जश्न दिल्ली स्थित भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में मनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस समारोह में मौजूद रहे। पंजाब छोड़ कर बाकी सभी 4 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ फिर से लौटे हैं। गोवा में भाजपा बहुमत से बस एक सीट पीछे है, लेकिन वहाँ भी पार्टी की सरकार बन रही है।

इस दौरान मतदाताओं का धन्यवाद करते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाई गई नीतियों पर इस जीत के माध्यम से मुहर लगा दी है। उन्होंने याद दिलाया कि 37 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश में ऐसा हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में किसी पार्टी की सरकार लगातार दोबारा लौट कर आई है। इसी तर उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले हर 5 साल में उत्तराखंड में सरकार बदल जाती थी, लेकिन इस बार भाजपा ने फिर से वापसी की।

इसी तरह उन्होंने गोवा में भाजपा की हैट्रिक की बात की। इसी तरह मणिपुर में भी फिर से भाजपा की सरकार बन रही है। जेपी नड्डा ने असम में 80 में 77 स्थानीय निकायों में भाजपा की जीत की भी चर्चा की। ये परिणाम बुधवार (9 मार्च, 2022) को आए थे। उन्होंने भाजपा विरोधी गठबंधनों पर कहा कि अगर नेता और पार्टियाँ मिल जाएँ तो वोटर नहीं मिलता, वो अपने मताधिकार की रक्षा करना जानता है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने भारत की राजनीति बदल दी है, आज विकास, रिपोर्ट कार्ड और सशक्तिकरण की राजनीति है।

योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि कैसे माफिया आज भयभीत हैं और जेल के पीछे हैं और जो भय का वातावरण बनाते थे, वो आज खुद भयभीत हैं। उन्होंने मणिपुर की जीत के पीछे का कारण पीएम मोदी की पूर्वोत्तर से जुड़ी नीतियों को बताया। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी पहले ही कह चुके हैं कि अगला दशक उत्तराखंड का होगा। नड्डा ने कहा कि कोरोना के बाद भारत की आर्थिक विकास को दुनिया भी मान रही है। उन्होंने इसके लिए सभी केंद्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी धन्यवाद दिया।

लखीमपुर खीरी की सभी 8 सीटों पर BJP की जीत, जनता को पसंद नहीं आई विपक्ष की ‘लाशों वाली राजनीति’: अजय मिश्रा का है इलाका

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में सभी 8 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। ये केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा ‘टेनी’ का इलाका है। आपको याद होगा कि अक्टूबर 2021 में यहाँ किसानों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को विपक्षी दलों और मीडिया के गिरोह विशेष ने जम कर मुद्दा बनाया था। इस हिंसा में 8 लोगों की मौत हो गई थी। केंद्रीय मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा ‘मोनू’ इस मामले में जेल भी गए थे। वो फ़िलहाल जमानत पर बाहर हैं।

जिस निघासन विधानसभा क्षेत्र में ये घटना हुई थी, वहाँ से भी भाजपा के शशांक वर्मा ने जीत दर्ज की है। वहीं पलिया की बात करें तो वहाँ भाजपा प्रत्याशी रोमी साहनी ने सपा के प्रीतइंदर सिंह को हरा दिया। गोला सीट पर भाजपा के अरविंद गिरि ने सपा के विनय तिवारी को धूल चटाई। निघासन सीट पर भाजपा के शशांक वर्मा सपा के आरएस कुशवाहा को हरा कर विधायक बने। इस सीट से कभी आशीष मिश्रा ‘मोनू’ भी दावा ठोक रहे थे।

लखीमपुर खीरी की एक अन्य श्रीनगर सीट पर भाजपा की मंजू त्यागी ने सपा के रामसरन को हरा दिया। वहीं धौरहरा सीट की बात करें तो यहाँ से से भाजपा के विनोद अवस्थी सपा के वरुण चौधरी को मात दे दी। लखीमपुर सदर में भी भाजपा के योगेश वर्मा ही जीते। उन्होंने सपा के उत्कर्ष वर्मा को हराया। कस्ता सीट पर भाजपा के सौरभ सिंह सोनू ने सपा के सुनील लाला को हराकर जीत हासिल की है। मोहम्मदी सीट पर भाजपा के लोकेंद्र प्रताप सिंह की जीत हुई है।

यहाँ हुई घटा को लेकर लगातार विपक्ष अजय कुमार मिश्रा ‘टेनी’ का इस्तीफा माँग रहा था। राकेश टिकैत जैसे ‘किसान नेता’ और मीडिया भी इसमें कॉन्ग्रेस के साथ था। अब सिर्फ यहाँ ही नहीं, बल्कि पूरे यूपी में भाजपा को जबरदस्त बहुमत प्राप्त हुआ है। सीएम योगी ने इस जीत पर कहा कि पीएम मोदी के विकास और सुशासन को एक बार फिर से जनता जनार्दन ने अपना आशीर्वाद दिया है। उन्होंने कहा कि मतगणना को लेकर कई दिनों से जो भ्रामक दुष्प्रचार चलाए जा रहे थे, उसे जनता ने दरकिनार करते हुए NDA पर भरोसा जताया।