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‘अभी बिरयानी ना मँगाएँ’: CAA विरोधी दंगाइयों से हर्जाना वसूल सकेगी UP सरकार, मीडिया ने सुप्रीम कोर्ट का कहा आधा बताया-आधा छिपाया

केंद्र सरकार के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ दिसंबर 2019 में प्रदर्शन करने वाले प्रदर्शनकारियों से वसूली गई रकम को वापस करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 फरवरी 2022) के आदेश को तो आपने पढ़ा होगा, लेकिन ये आधा सच है। पूरा सच ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार (Yogi Government) सीएए दंगाइयों से वसूली करे, लेकिन ‘उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी एक्ट, 2020’ कानून के तहत करे।

इस पर भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सलाहकार कंचन गुप्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले सीएए विरोधियों को जारी नोटिस को वापस लेने की गलत रिपोर्टिंग की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नुकसान की वसूली होनी चाहिए, लेकिन 2020 के कानून के तहत।

कंचन गुप्ता के मुताबिक, “यूपी सरकार अब 2020 कानून के तहत फिर से सीएए उत्पातियों को नोटिस जारी करेगी और 2020 के कानून के तहत स्थापित ट्रिब्युनल सजा का प्रावधान करेगा। वे लोग जो खुश हैं और जश्न मना रहें हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने CAA विरोधियों के लिए सजा को रोक दिया है, अभी बिरयानी का ऑर्डर न दें।” कंचन गुप्ता ने कहा कि अब राज्य सरकार 2020 कानून के तहत आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है।

मीडिया ने सुप्रीम को निर्देश को किस तरह कवर किया, इसकी कुछ बानगी नीचे हैं। खबरों की इन हेडलाइन को पढ़कर स्पष्ट हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिया और मीडिया ने उसे किस अंदाज में कवर किया।

बार ऐंड बेंच ने अपनी स्टोरी में हेडलाइन दिया, ‘CAA विरोधी प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को राज्य द्वारा नोटिस वापस लेने के बाद प्रदर्शनकारियों से वसूल की गई राशि वापस करने का आदेश दिया।’

बूम लाइव ने अपने ट्वीट में लिखा, “SupremeCourt ने #UttarPradesh सरकार को राज्य में दिसंबर 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम (#CAA) के विरोध के बाद सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान के लिए वसूले गए “करोड़ों रुपयों” को वापस करने का निर्देश दिया।”

PTI ने ट्वीट किया, “सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को 2019 में शुरू की गई कार्रवाई के मद्देनजर सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से वसूले गए करोड़ों रुपये वापस करने का निर्देश दिया।”

विवादास्पद पत्रकार बरखा दत्त की मोजो स्टोरी ने लिखा, “SupremeCourt ने #UP सरकार को 2019 में #CAA के विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान के लिए जारी किए गए रिकवरी नोटिस के माध्यम से वसूले गए धन को वापस करने का निर्देश दिया है।”

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने की। इसमें जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ‘उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी एक्ट, 2020’ के तहत वसूली या कार्रवाई के लिए नए सिरे से नोटिस भेज सकती है।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि प्रदर्शनकारियों और सरकार को क्लेम ट्रिब्युनल के पास जाने की इजाजत देनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से रिकवर किए गए धन को वापस करने के आदेश का भी विरोध किया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने उसे मानने से इनकार कर दिया।

वहीं, याचिकाकर्ता की तरफ से इस मामले की पैरवी वकील नीलोफर खान ने की। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से प्रदर्शनकारियों की दुर्दशा से कोर्ट को अवगत कराया। नीलोफर ने कहा, “गरीबों को उनकी आवश्यक वस्तुओं को बेचकर हर्जाना देना पड़ा था।”

गौरतलब है कि इससे पहले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को दंगाइयों को जारी किए गए नोटिस को वापस लेने का आदेश देते हुए कहा था कि यूपी सरकार उसे वापस नहीं लेती है तो कोर्ट को एक्शन लेना पड़ेगा। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा था, “आप शिकायतकर्ता, निर्णायक बनकर आरोपित की संपत्ति कुर्क कर रहे हैं।” बता दें कि अदालत परवेज आरिफ टीटू की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सीमापुरी में मिले विस्फोटकों से दिल्ली के कई जगहों को दहलाने की थी साजिश: पुलिस कमिश्नर अस्थाना ने कहा- स्थानीय लोगों की मदद के बिना ये संभव नहीं

दिल्ली पुलिस (Delhi Police) की सक्रियता के कारण राजधानी को दहलाने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। राजधानी के दो अलग-अलग इलाकों में महीने भर के अंतराल पर मिले विस्फोटों के कारण इस्लामिक आतंकियों के मंसूबों का पता चलता है। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना (Rakesh Asthana) ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर विस्फोट करने के लिए इनका इस्तेमाल होना था और ये स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना संभव नहीं है।

पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने कहा, “17 जनवरी को गाजीपुर में एक IED बरामद किया गया था। इसी तरह की एक आईईडी पुरानी सीमापुरी में बरामद कर उसे निष्क्रिय कर दिया गया है। जाँच में पता चला है कि ये आईईडी सार्वजनिक स्थानों पर विस्फोट करने के लिए तैयार किए गए थे। इस तरह की गतिविधियाँ स्थानीय समर्थन के बिना संभव नहीं हैं।”

बता दें कि गुरुवार कोदिल्ली (Delhi) के सीमापुरी इलाके के एक घर से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 2.2 किलोग्राम आईईडी विस्फोटक बरामद किया था। एक महीने के अंदर लगातार दूसरी बार ऐसा हुआ है कि जब यमुनापार इलाके में बम मिला है। बम मिलने के तुरंत बाद राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) की टीम को बुलाया गया। स्पेशल रोबोट की मदद से संदिग्ध बैग उठाया और बैग में विस्फोटक होने की पुष्टि के बाद उसे निष्क्रिय कर दिया गया। बम को हटाने के लिए आसपास के करीब 200 घर खाली कराए गए।

दरअसल, इससे पहले दिल्ली के ही गाजीपुर इलाके में मिले आईईडी विस्फोटक मामले की जाँच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही थी। उसी दौरान उसे ओल्ड सीमापुरी इलाके में एक मकान में कुछ संदिग्ध लोगों के छिपे होने को लेकर जानकारी मिली थी। इसके बाद सेल की टीम ने गुरुवार (17 फरवरी 2022) शाम घर पर छापा मारा और घर का ताला तोड़कर करीब 2.2 किलो आईडी और कुछ दस्तावेज बरामद किए। हालाँकि, छापेमारी से पहले ही संदिग्ध मौके से फरार हो गए। 

इस मामले में पुलिस ने घर के मालिक को हिरासत में ले लिया है। उसके घर में उसकी माँ, पत्नी और चार बच्चे हैं। आरोप है कि उसने किराएदारों का पुलिस वेरिफिकेशन कराए बिना ही उसे किराए पर कमरा दे दिया था। संदिग्धों ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर घर किराए पर लिया था। दरअसल, घर के मालिक का सीमापुरी में दो घर है। एक में वो खुद अपने परिवार के साथ रहता है, जबकि दूसरे को किराए पर उठा रखा है। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों का कहना है कि वो घर में रहने वाले किसी को भी नहीं जानते थे, क्योंकि किराए पर रहने वाले अपने कमरे से कम ही बाहर निकलते थे।

इस मामले में स्पेशल सेल ने 3-4 संदिग्ध युवकों की पहचान की है। उनकी तस्वीरें भी हाथ लगी है। वे कहाँ के रहने वाले इसकी भी जानकारी मिल गई है। सेल को शक है कि संदिग्ध किसी आतंकी संगठन के स्लीपर सेल से हो सकते हैं। इन चार संदिग्धों ने उस घर को कुछ समय पहले ही किराए पर लिया था। पहले एक आया था, उसके बाद तीन और आकर साथ रहने लगे। मकान मालिक कासिम ठेकेदार बताया जा रहा है और उसने शकील नाम के प्रोपर्टी डीलर के जरिए मकान की दूसरी मंजिल को किराए पर दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 29 जनवरी की रात हिमाचल प्रदेश के कल्लू में पार्किग में खड़ी एक कार में धमाका हुआ था। इसके तार गाजीपुर में बरामद RDX से जुड़े हैं। FSL की टीम ने कूल्लू की कार से जो ट्रेसेस बरामद किए थे, वो गाजीपुर से बरामद विस्फोटक से मेल खाते हैं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को शक है कि इन विस्फोटकों को स्थानीय स्लीपर सेल की मदद से पाकिस्तान की ISI ने प्लांट करवाया है।

गौरतलब है कि 14 जनवरी को गाजीपुर फूलमंडी में स्कूटी से सामान लेने के लिए आया एक व्यक्ति अपनी स्कूटी और बैग रखकर चला गया। बाद में सूचना मिलने पर पहुँची पुलिस ने जाँच की तो आरडीएक्स बरामद हुआ। इसके बाद एनएसजी की टीम ने उसे डीफ्यूज किया। बाद में पता चला कि यह बम पाकिस्तान की आईएसआई और उसकी जिहादी सेल इसमें शामिल है। जाँच में ये पता चला था कि यह आईडी 24 बम की खेप का हिस्सा था, जिसे सीमा पार से या तो जमीन के जरिए या समुद्री मार्ग से पाकिस्तान द्वारा स्थानीय आतंकवादियों को भेजा गया था।

कब खत्म होगा कर्नाटक का बुर्का विवाद, अब अगले हफ्ते सुनवाई: हाईकोर्ट से सरकार ने कहा- हिजाब इस्लाम में अनिवार्य नहीं

हिजाब विवाद को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट में आज (18 हिजाब विवाद को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट में आज (18 फरवरी, 2022) छटवें दिन भी सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता पक्ष के वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। हालाँकि, आज भी इस मामले पर कोई फैसला नहीं आया और अदालत इस मामले में सोमवार (21 फरवरी, 2022) को फिर आगे की सुनवाई करेगी। आज कोर्ट में बाकी बची 7 याचिकाओं के आधार पर ही सुनवाई हुई। आज की सुनवाई एटॉर्नी जनरल (AG) प्रभुलिंग नवदगी की दलीलों से हुई।

मामले मे एडवोकेट जनरल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि अगर किसी को धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करना है। अदालत को देखना होगा कि क्या यह कवायद सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता को प्रभावित करती है। जब भी कोर्ट के सामने चुनौती आए तो मेरे हिसाब से सबसे पहले परीक्षा लें कि यह लोक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है या नहीं। कोविड के समय में सभी धार्मिक स्थलों को बंद कर दिया गया था, वजह थी सेहत। हर स्थिति में जैसे अब वे हिजाब लेकर आए हैं, अदालतों को यह जाँचना होगा कि यह सार्वजनिक व्यवस्था है, नैतिकता है या स्वास्थ्य है।

इस दौरान सरकार की तरफ से एडवोकेट जनरल (AG) ने कहा कि हिजाब इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। 14 फरवरी से लगातार चीफ जस्टिस ऋतुराज अवस्‍थी, जस्टिस कृष्‍णा एस दीक्षित, जस्टिस जैबुन्निसा मोहियुद्दीन काजी की बड़ी बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही है। इससे पहले कोर्ट में छात्राओं की तरफ ह‍िजाब के पक्ष में दलीलें दी गईं थीं।

मामले में सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए एडवोकेट जनरल ने कहा, “2018 में वर्दी निर्धारित थी। दिसंबर 2021 तक कोई समस्या नहीं आई। छात्राओं के एक समूह जो याचिकाकर्ता भी हैं, उन्होंने प्रिंसिपल से संपर्क किया और जोर देकर कहा कि वे हिजाब पहनकर कॉलेज में आएँगी। 31 दिसंबर से यह घटना तब हुई जब कुछ लड़कियों ने प्रिंसिपल के पास जाकर कहा कि वे हिजाब पहनकर ही कॉलेज में प्रवेश करेंगी। जब यह जिद हुई तो सीडीसी ने जाँच करना चाहा। सीडीसी की अध्यक्षता विधायक ने 01.01.2022 को की।

वहीं कल की सुनवाई में 5 छात्राओं के वकील एएम डार ने कोर्ट से माँग की कि सरकार के आदेश से उन लोगों पर असर पड़ेगा जो हिजाब पहनते हैं। यह असंवैधानिक है।

आज की सुनवाई की खास बातें

कर्नाटक HC ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की

सीनियर एडवोकेट एएम डार ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट की आपत्ति को देखते हुए उन्होंने 5 छात्राओं की ओर से नई याचिका दायर की है। याचिका पर 21 फरवरी को सुनवाई करेगी कोर्ट।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने कर्नाटक उच्च न्यायालय से लाइव-स्ट्रीमिंग कार्यवाही को बंद करने और निलंबित करने का आग्रह किया। कुमार का कहना है कि लाइव स्ट्रीमिंग उल्टा हो गया है।

कर्नाटक एचसी का कहना है कि लोगों को सुनने दें कि उत्तरदाताओं का क्या रुख है।

चीफ जस्टिस: आप खुद कह रहे हैं कि हिजाब हटाने के लिए कोई रोकथाम या बल नहीं था, अब कुछ विरोधी तत्व उन्हें हिजाब हटाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

वकील : कॉलेज प्रशासन भी इजाजत नहीं दे रहा है।

सीजे: आपने याचिका में जो उल्लेख किया है वह, वह नहीं है जो आप कह रहे हैं

अहमद : इस न्यायालय का आदेश सभी को स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आ रहा है। हर वो संस्था जहाँ पहले हिजाब की अनुमति थी, अब बंद हो रही है।

सीजे: क्या आप सरकारी कॉलेज में पढ़ रहे हैं?

अहमद कहते हैं एक निजी कॉलेज।

सीजे : कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है।

जस्टिस दीक्षित : यह कहने का हक कहाँ है कि कॉलेज विरोध कर रहा है। उनका कहना है कि असामाजिक तत्व रोक रहे हैं। उनमें से किसी को भी पार्टी नहीं बनाया गया है। कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है।

जस्टिस दीक्षित : एक भी असामाजिक तत्व को पार्टी नहीं बनाया गया है। पार्टी नहीं बनाने के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। इस याचिका पर कैसे विचार किया जा सकता है?

सीजे : बेहतर होगा कि आप उचित याचिका दायर करें। उचित व्यवस्थाएं करें। कॉलेज को पार्टी नहीं बनाया गया है। यह कैसी याचिका है!

अहमद ने कॉलेज को जोड़ने के लिए याचिका में संशोधन की अनुमति माँगी, जिसे कोर्ट ने उन्हें प्रदान किया।

अधिवक्ता कीर्ति सिंह अब एक महिला संघ और एक मुस्लिम महिला द्वारा दायर जनहित याचिका में दलीलें पेश करती हैं।

सिंह: हमने हाई कोर्ट के नियम के मुताबिक डिक्लेरेशन फाइल नहीं किया था, अब हमने फाइल कर दी है और उसी के मुताबिक हमारी सुनवाई हो सकती है।

अधिवक्ता जी आर मोहन अब कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान प्रबंधन संघ के लिए उपस्थित हो रहे हैं।

मोहन : याचिकाकर्ता अल्पसंख्यक संस्थाओं का संघ है जो अनुच्छेद 29 और 30 द्वारा संरक्षित है।

सीजे : क्या याचिकाकर्ता एक पंजीकृत निकाय है?

मोहन : हाँ।

सीजे : सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत?

मोहन : हाँ।

सीजे: फाइलिंग को अधिकृत करने वाला सोसायटी का संकल्प कहाँ है।

मोहन : सभापति स्वयं यह याचिका दाखिल कर रहे हैं।

सीजे : क्या अध्यक्ष अधिकृत है? हमें उपनियम दिखाओ।

मोहन: मैं प्राधिकरण प्रस्तुत करूंगा। हमने पहले भी कई WP दायर किए हैं। यह मुद्दा कभी नहीं आया।

सीजे: यह चौंकाने वाला है, सिर्फ इसलिए कि आपसे पहले नहीं पूछा गया है।

एजी: जैसा कि मैंने समझा है, विवाद तीन व्यापक श्रेणियों में आता है। सबसे पहले, आदेश दिनांक 05.02.2022, मेरा पहला निवेदन यह है कि आदेश शिक्षा अधिनियम के अनुरूप है।

एजी : दूसरा अधिक ठोस तर्क है कि हिजाब एक अनिवार्य हिस्सा है। हमने यह स्टैंड लिया है कि हिजाब पहनना इस्लाम की आवश्यक धार्मिक प्रथा के अंतर्गत नहीं आता है। कर्नाटक के महाधिवक्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय को बताया।

एजी: तीसरा यह है कि हिजाब पहनने का यह अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) से पता लगाया जा सकता है। सबमिशन है कि यह ऐसा नहीं करता है।

एजी: सबरीमाला और शायरा बानो (ट्रिपल तालक) मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए के अनुसार हिजाब को संवैधानिक नैतिकता और व्यक्तिगत गरिमा की परीक्षा पास करनी चाहिए। यह सकारात्मक प्रस्ताव है जिस पर हम स्वतंत्र रूप से बहस कर रहे हैं।

AG: यदि कोई सीडीसी हिजाब पहनने की अनुमति देता है तो शिक्षा अधिनियम की धारा 131 के तहत हमारे पास पुनरीक्षण शक्तियाँ हैं और यदि कोई आपत्ति है तो राज्य निर्णय ले सकता है। अभी तक के आदेश में हमने सीडीसी को स्वायत्तता दी है।

जस्टिस दीक्षित: आपने ठीक से यह नहीं बताया कि हिजाब पहनना प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन ये आदेश आम लोगों, शिक्षकों, सीडीसी के छात्र सदस्यों के लिए हैं, वे इसकी व्याख्या कैसे करेंगे?

CJ: GO में निर्णयों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता थी?

AG: इस मुद्दे को हमने संस्थानों की पूर्ण स्वायत्तता पर छोड़ दिया है। मैं GO में कही गई बातों से आगे नहीं बढ़ सकता। यदि यह संस्थानों को संकेत देता है, तो निश्चित रूप से यह कुछ ऐसा है जिसे संस्थानों को समझना चाहिए।

CJ: हम इन निर्णयों का उल्लेख करने और आपके निष्कर्ष को रिकॉर्ड करने और फिर GO पास करने की आवश्यकता जानना चाहते थे?

AG: एक बेहतर सलाह पर इनसे बचा जा सकता था। लेकिन वह चरण बीत चुका है।

CJ: ऐसा लगता है कि वे आपकी सलाह नहीं लेते हैं। एजी मुस्कराते हैं।

AG: इस आदेश के बाद, रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो देखो राज्य ने हमें बताया है इसलिए हम (संस्थान) यह आदेश पारित कर रहे हैं।

AG का कहना है कि जीओ को समझना होगा कि वह आखिरकार क्या निर्देश देता है और याचिकाकर्ताओं की ओर से यह कहना गलत है कि यह सांप्रदायिक है।

AG: सीपीसी में किसी निष्कर्ष के खिलाफ अपील दायर करने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि संचालन आदेश किसी के पक्ष में है, तो निष्कर्षों को चुनौती देने की कोई गुंजाइश नहीं है।

AG: मुझे नहीं पता कि उच्च स्तरीय कमेटी को लेकर सरकार का क्या मन है।

CJ: क्या GO समय से पहले था? क्योंकि एक तरफ आप कहते हैं कि एक उच्च स्तरीय समिति मामले की जांच कर रही है और दूसरी तरफ आप ऐसा कहते हैं? क्या यह राज्य के विरोधाभासी रुख के बराबर नहीं होगा?

CJ: आपने यह भी कहा है कि राज्य को अभी ड्रेस के संबंध में निर्णय लेना है?

AG: हाँ।

जस्टिस दीक्षित: कम से कम आपको तो कहना चाहिए था कि हमने एक कमेटी बनाने का फैसला किया है। लेकिन आपने ऐसा नहीं कहा।

जस्टिस दीक्षित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संदर्भित करते हैं जो कहता है कि एक आदेश को उसमें कही गई बातों के आधार पर समझा जाना चाहिए और बाद की दलीलों से इसमें सुधार नहीं हो सकता है।

AG: यह अधिनियम आईसीएसई, सीबीएसई संस्थानों को छोड़कर सभी संस्थानों पर लागू होता है। अधिनियम की धारा 2 (14) पढ़ता है।

AG: अधिनियम की धारा 38 सरकारी पीयू कॉलेजों का ख्याल रखती है।

एडवोकेट जनरल अब रवि वर्मा कुमार के तर्क का जवाब दे रहे हैं कि कॉलेज विकास समिति शिक्षा अधिनियम द्वारा मान्यता प्राप्त प्राधिकरण नहीं है। उन्‍होंने शिक्षा अधिनियम की प्रस्तावना पढ़ी- यह अधिनियम छात्र समुदाय की बेहतरी के लिए है।

AG: चूँकि हम कॉलेज विकास समिति के मुद्दे को संबोधित कर रहे हैं, दिलचस्प बात यह है कि एक सरकारी पीयू कॉलेज के लिए प्रबंध समिति की कोई अवधारणा नहीं है।

एडवोकेट जनरल शिक्षा अधिनियम की धारा 133(2) की बात करते हैं जो राज्य को अवशिष्ट शक्तियाँ प्रदान करता है। निजी कॉलेजों में एक प्रबंध समिति होती है। सरकार द्वारा संचालित पीयू कॉलेजों में, कोई प्रबंध समिति नहीं होती है।

CJ: आपने जो सर्कुलर दिखाया है जो सीडीसी का गठन करता है, एक अवर सचिव द्वारा जारी किया गया है। क्या इसे धारा 133 के तहत आदेश माना जा सकता है?

AG: यह 133 का पता लगाना है।

CJ: यह सरकारी आदेश नहीं है, यह अधिसूचना नहीं है। यह अंडर-सिक्योर द्वारा एक सर्कुलर है।

AG: हमने धारा 133 (2) (सीडीसी के गठन के लिए) का प्रयोग किया है। अगर हमने प्रिंसिपल को दिया होता तो रविवर्मा कुमार कहते कि आपने इसे एक कर्मचारी को दिया है। कृपया सीडीसी के संविधान को देखें, इससे अधिक प्रतिनिधि चरित्र नहीं हो सकता।

AG: इस तरह के परिपत्र सरकार के अनुमोदन से जारी किए जाते हैं।

CJ: क्या वहाँ सरकार की मंजूरी थी?

AG: निश्चित रूप से हाँ। मैं रिकॉर्ड रख सकता हूँ। जहाँ एक विधायक को समिति में नियुक्त किया जाता है, वह सरकार की मंजूरी के बिना नहीं होता।

AG: कृपया अनुच्छेद 25(1) पर आएँ।

CJ: मिस्टर युसूफ का एक तर्क था। भले ही इसे हिजाब पहने हुए ईआरपी के रूप में नहीं माना जाता है, फिर भी इसे पहनना बंद करना अनुच्छेद 25 का उल्लंघन होगा क्योंकि यह न केवल धर्म की स्वतंत्रता के बारे में है बल्कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बारे में है।

AG: नहीं, हिजाब पहनने की अनुमति नहीं देने की शिकायत राज्य में नहीं आया है। एक सामान्य छात्र से एक प्रतिनिधित्व देने की अपेक्षा की जाती। ड्रेस की बात होती तो मिलोर्ड्स आ जाते.. मैं इसे वहीं छोड़ देता हूँ।

AG: अगर किसी को धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करना है। अदालत को देखना होगा कि क्या यह कवायद सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता को प्रभावित करती है। जब भी कोर्ट के सामने चुनौती आए तो मेरे हिसाब से सबसे पहले परीक्षा लें कि यह लोक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है या नहीं। कोविड के समय में सभी धार्मिक स्थलों को बंद कर दिया गया था, वजह थी सेहत। हर स्थिति में जैसे अब वे हिजाब लेकर आए हैं, अदालतों को यह जाँचना होगा कि यह सार्वजनिक व्यवस्था है, नैतिकता है या स्वास्थ्य है।

न्यायमूर्ति दीक्षित ने एक श्लोक का उदाहरण दिया और कहा क‍ि वह कोई पूजा नहीं करते हैं, लेकिन वह भी अंतरात्मा की स्वतंत्रता के तहत संरक्षित है।

AG: जो आप बाहर प्रकट करते हैं, वह अंतरात्मा की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है।

CJ: विवेक और धर्म दो अलग चीजें हैं।

AG: कामत ने बहस के दौरान रुद्राक्ष धारण करने का उदाहरण दिया। रुद्राक्ष धारण करना मान्यता नहीं अभिव्यक्ति है।

जस्टिस दीक्षित: क्या आप यह कहना चाहते हैं कि अंतःकरण की स्वतंत्रता केवल नास्तिक तक ही सीमित है?

AG: निश्चित रूप से नहीं। हाँ, इसीलिए उन्होंने अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म का पालन करने का अधिकार जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।

जस्टिस दीक्षित: कोई व्यक्ति अत्यधिक धार्मिक हो सकता है। लेकिन विवेक नहीं हो सकता है और दूसरे के पास विवेक हो सकता है लेकिन धार्मिक नहीं हो सकता है।

CJ: क्या हिजाब आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा है।

AG: मेरा जवाब नहीं है। क्यों नहीं है, मैं इसकी पुष्टि करूँगा।

कोर्ट अब इस मामले में सोमवार को सुनवाई करेगा।

शुक्रवार और रमजान में हिजाब पहनने की छूट मिले

गुरुवार को हुई सुनवाई में हिजाब को लेकर लगाई गई एक अन्य याचिका में डॉ. कुलकर्णी ने कोर्ट के सामने कहा कि कृपया शुक्रवार और रमजान के दौरान हिजाब पहनने की अनुमति दें। अधिवक्ता विनोद कुलकर्णी ने कर्नाटक हाईकोर्ट से यह भी कहा था कि यह मुद्दा उन्माद पैदा कर रहा है और मुस्लिम लड़कियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।

गुरुवार को ही 5 छात्राओं का प्रतिनिधित्व करने वाले सीनियर वकील एएम डार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष कहा कि हिजाब पर सरकार के आदेश से उनके मुवक्किलों पर असर पड़ेगा जो हिजाब पहनते हैं। उन्होंने कहा कि यह आदेश असंवैधानिक है। अदालत ने डार से अपनी वर्तमान याचिका वापस लेने और नई याचिका दायर करने को कहा।

वहीं 5वें दिन की सुनवाई के बीच नई याचिकाएँ आने पर चीफ जस्टिस ने याचिकर्ताओं से कहा कि हम चार याचिकाएँ सुन चुके हैं और 4 बाकी हैं। हमें नहीं पता कि आप इसके लिए और कितना टाइम लेंगे। हम इसके लिए और ज्यादा समय नहीं दे सकते।

बेंच ने ख़ारिज की एक याचिका

बेंच ने एडवोकेट रहमतुल्लाह कोटवाल की याचिका, जनहित याचिका अधिनियम 2018 के तहत न होने के कारण खारिज कर दी। इसके पहले वकील ने बिना पहचान बताए ही दलील शुरू की तो जस्टिस दीक्षित ने उनसे पूछा कि आप इतने महत्वपूर्ण और गंभीर मामले में कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं। पहले अपनी पहचान बताओ, तुम हो कौन?

बुधवार को दी गई थीं ये दलीलें

इससे पहले हिजाब मामले पर बुधवार को भी सुनवाई हुई थी। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से जिरह करते हुए अधिवक्ता रवि वर्मा कुमार ने कहा कि अकेले हिजाब का ही जिक्र क्यों है जब दुपट्टा, चूड़ियाँ, पगड़ी, क्रॉस और बिंदी जैसे सैकड़ों धार्मिक प्रतीक चिन्ह लोगों द्वारा रोजाना पहने जाते हैं।

वकील रवि वर्मा ने कहा कि मैं केवल समाज के सभी वर्गों में धार्मिक प्रतीकों की विविधता को उजागर कर रहा हूँ। सरकार अकेले हिजाब को चुनकर भेदभाव क्यों कर रही है? चूड़ियाँ पहनी जाती हैं? क्या वे धार्मिक प्रतीक नहीं है? कुमार ने कहा, यह केवल उनके धर्म के कारण है कि याचिककर्ता को कक्षा से बाहर भेजा जा रहा है। बिंदी लगाने वाली लड़की को बाहर नहीं भेजा जा रहा, चूड़ी पहने वाली लड़की को भी नहीं। क्रॉस पहनने वाली ईसाई लड़कियों को भी नहीं, केवल इन्हें ही क्यों। यह संविधान के आर्टिकल-15 का उल्लंघन है।

‘मैं स्वीट आतंकी’: कुमार विश्वास के आरोपों पर बोले केजरीवाल- मेरे खिलाफ हो सकती है NIA जाँच, विश्वास की सुरक्षा को लेकर समीक्षा

दिल्ली के मख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल (Delhi CM & AAP Chief Arvind Kejriwal) पर खालिस्तान समर्थक होने का आरोप लगाकर पूर्व आप नेता कुमार विश्वास (Kumar Vishwas) आजकल सुर्खियों में हैं। इसमें अलगाववादी खालिस्तान का नाम आने के बाद केंद्र सरकार उनकी सुरक्षा की समीक्षा कर रही है। वहीं, कुमार विश्वास को जवाब देते हुए केजरीवाल ने खुद को भगत सिंह का सबसे बड़ा चेला बताते हुए खुद को स्कूल-अस्पताल बनाने वाला ‘स्वीट आतंकी’ बताया।

थ्रेट परसेप्शन के आधार पर कुमार विश्वास को जल्दी ही सुरक्षा दी सकती है। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा समीक्षा बैठक करने की भी बात सामने आई है। बता दें कि गुरुवार को पंजाब में एक रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने कुमार विश्वास के आरोपों का हवाला देते परोक्ष रूप से केजरीवाल को विभाजनकारी तत्व बताया था। कुमार विश्वास के आरोप के आधार पर कॉन्ग्रेस ने भी केजरीवाल पर निशाना साधा है। पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) ने पीएम मोदी को पत्र लिखकर कुमार विश्वास द्वारा लगाए आरोपों के आधार पर केजरीवाल की जाँच कराने की माँग भी की है।

इधर कुमार विश्वास के आरोप के बाद अरविंद केजरीवाल ने बयान देते हुए कहा कि वह भगत सिंह के चेला हैं और ‘स्वीट आतंकी’ हैं। पंजाब के बठिंडा में उन्होंने कहा, “मैं स्वीट आतंकी हूँ। जो लोगों के लिए अस्पताल-स्कूल बनाकर देता है। बुजुर्गों को तीर्थ यात्रा पर भेजता है।” उन्होंने कहा कि 100 साल पहले अंग्रेजों ने भगत सिंह को आतंकवादी कहा था और 100 साल बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है और भगत सिंह के सबसे बड़े चेले को (केजरीवाल को) आतंकवादी कहा जा रहा है।

कुमार विश्वास के बया को कॉमेडी बताते हुए कहा, “अगर उनके आरोपों की माने तो मैं बड़ा आतंकवादी हूँ। अगर ऐसा है तो इस मामले में सुरक्षा एजेंसियाँ पिछले 10 साल से क्या कर रही थीं?” उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने CM चरणजीत चन्नी को फोन कर शिकायत मँगवाई है। उन्होंने कहा, “मुझे एक अफसर से खबर मिली है कि मेरे खिलाफ 1-2 दिन में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) एफआईआर दर्ज करेगी। मैं सब FIR का स्वागत करता हूँ। अगर इस तरह से केंद्र सरकार सुरक्षा को डील करेगी तो यह चिंताजनक है।

बता दें कि ANI को दिए बयान में कुमार विश्वास ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल ने उनसे कहा था, “उसने (केजरीवाल ने) मुझसे ऐसी भयानक बातें बोली हैं जो पंजाब में सभी को पता है। एक दिन जब मैंने उससे 2020 के जनमत संग्रह के बारे में बात की तो वो कहता है कि तू चिंता मत कर एक दिन मैं या तो स्वतंत्र सूबे का मुख्यमंत्री बनूँगा या फिर स्वतंत्र राष्ट्र (खालिस्तान) का पहला प्रधानमंत्री बनूँगा। जब मैंने बताया कि इस रेफरेंडम को आईएसआई से लेकर दुनिया भर के अलगाववादी तत्व फंडिंग कर रहे हैं तो उन्होंने मुझे चिंता नहीं करने को कहा।”

इसके बाद इस खबर को चलाने पर आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने मीडिया को धमकाया था। चड्ढा ने कहा था, “अगर कोई चैनल इसे प्रकाशित/प्रसारित करता है या उसे प्रसारित करने के लिए मंच प्रदान करता है तो हमें कड़ी कानूनी कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिसमें उसे उकसाने/सहायता करने के अपराध शामिल होंगे।”

‘राजीव गाँधी की तरह होनी थी PM मोदी की हत्या, लोकतंत्र खत्म करने की साजिश’: एल्गार परिषद केस में बेल से कोर्ट का इनकार

महाराष्ट्र (Maharashtra) के पुणे की एल्गार परिषद (Elgar Parishad) के नक्सलियों से लिंक के मामले में सुनवाई करते हुए मुंबई में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने तीन आरोपितों की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि मौजूद तथ्यों से स्पष्ट है कि तीनों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के साथ मिलकर देश में अशांति फैलाने और PM मोदी की हत्या करने की गंभीर साजिश रची थी।

NIA कोर्ट के स्पेशल जस्टिस डीई कोठालीकर ने जिन तीन लोगों को जमानत देने से इनकार कर दिया वो सागर गोरखे, रमेश गायचोर और ज्योति जगताप हैं। कोर्ट में पेश किए गए एक पत्र में बताया गया है कि सीपीआई (एम) ‘मोदी राज’ को किसी भी सूरत में खत्म करना चाहता था। अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो को निशाना बनाकर पूर्व पीएम राजीव गाँधी के हत्या जैसी एक और घटना को अंजाम देने की फिराक में थे।

गुरुवार (17 फरवरी 2022) को जारी किए गए विस्तृत आदेश में कोर्ट ने कहा, “रिकॉर्ड पर रखे गए पत्रों और दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया यह पता लगता है कि प्रतिबंधित संगठन के लोगों के साथ मिलकर आवेदकों ने देशभर में अशांति पैदा करने और सरकार को राजनीतिक रूप से सत्ता से हटाने के लिए गंभीर साजिश रची थी।”

रिकॉर्ड से ये स्पष्ट होता है कि तीनों आरोपित सागर गोरखे (Sagar Gorkhe), रमेश गाईचोर (Ramesh Gaichor) और ज्योति प्रताप (Jyoti Jagtap) न केवल सीपीएम के मेंबर थे, बल्कि ये उन कार्यों में लिप्त थे, जो कि देश के लोकतंत्र को उखाड़ फेंकने के अलावा और कुछ नहीं है। बता दें कि तीनों आरोपित कबीर कला मंच से जुड़े थे।

कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर इन आरोपों को ध्यान में रखा जाए तो ये स्पष्ट हो जाता है कि इन लोगों ने देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता को खतरे में डालने या संभावित रूप से खतरे में डालने के इरादे से कार्य किया है।

जेल में बंद याचिकाकर्ता पुणे के एल्गार परिषद के सम्मेलन में सक्रिय तौर पर शामिल थे और इन तीनों को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था, तभी से ये जेल की हवा खा रहे हैं।

क्या है मामला

गौरतलब है कि 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में एल्गार परिषद सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें देश विरोधी और भड़काऊ भाषण दिए गए। इसके अगले ही दिन भीमा-कोरेगाँव युद्ध स्मारक के पास हिंसा की वारदात हुई। पुणे पुलिस ने दावा किया था कि इसमें नक्सलियों का हाथ था।

वोटिंग से दो दिन पहले सिख समुदाय के प्रमुख लोगों ने की PM मोदी से मुलाकात, दिल्ली से दिया पंजाब को सन्देश

पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक दो दिन पहले शुक्रवार (18 फरवरी 2022) को सिख समुदाय की कई बड़ी हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने शॉल ओढ़ाकर पीएम का अभिनंदन किया। प्रधानमंत्री ने दिल्ली में अपने आवास पर देश भर के प्रमुख सिखों की मेजबानी की। इसके बाद पीएम मोदी सिख समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए दिल्ली से पंजाब को संदेश देते हुए नजर आए। 

पीएम मोदी ने सिख नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। भाजपा के वरिष्ठ नेता मनजिंदर सिंह सिरसा भी उसका हिस्सा थे। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा साझा की गई बैठक के एक वीडियो में सिख प्रतिनिधियों को प्रधानमंत्री को कृपाण भेंट करते देखा गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पीएम मोदी से मिलने वाले सिखों में दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, पद्म श्री बाबा बलबीर सिंह जी सिचेवाल (सुल्तानपुर लोधी), महंत करमजीत सिंह, अध्यक्ष, सेवापंथी, यमुना नगर; बाबा जोगा सिंह, डेरा बाबा जंग सिंह (नानकसर), करनाल; संत बाबा मेजर सिंह वा, मुखी डेरा बाबा तारा सिंह, अमृतसर; जत्थेदार बाबा साहिब सिंह जी, कार सेवा, आनंदपुर साहिब; सुरिंदर सिंह, नामधारी दरबार (भनी साहिब); बाबा जस्सा सिंह, शिरोमणि अकाली बुद्ध दल, पंजवा तख्त; डॉ हरभजन सिंह, दमदमी टकसाल, चौक मेहता; और सिंह साहिब ज्ञानी रणजीत सिंह जी, जत्थेदार तख्त, श्री पटना साहिब शामिल थे।

गौरतलब है कि इससे पहले प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि इस वर्ष से सिख गुरु गोबिंद सिंह के पुत्रों के बलिदान को श्रद्धांजलि देने के लिए 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। उनके इस कदम का देश भर के विभिन्न सिख जत्थों, संगतों और आम-जन ने पत्र लिख कर प्रशंसा किया था। यह घोषणा गुरु गोविंद सिंह के प्रकाश पर्व के शुभ अवसर पर की गई थी।

बता दें कि पंजाब में 117 सीटों के लिए रविवार (20 फरवरी 2022) सुबह 8 से शाम 6 बजे तक मतदान होगा। शुक्रवार (18 फरवरी 2022) को चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है। शाम को प्रचार का दौर खत्म हो जाएगा। 

उल्लेखनीय है कि बीजेपी गठबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पंजाब में तीन रैलियाँ कर चुके हैं। 17 फरवरी को अबोहर में रैली को संबोधित करते हुए पीएम ने पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा यूपी-बिहार के लोगों को ‘भइया’ कहकर उन्हें राज्य में घुसने से रोकने वाले बयान पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि ऐसा कहकर कॉन्ग्रेस ने गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मभूमि बिहार और संत रविदास की जन्मभूमि उत्तर प्रदेश को अपमानित किया है। 

सिखों के गुरु को याद करते हुए पीएम ने कहा, “मैं ये भी पूछना चाहता हूँ कि गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म कहाँ हुआ था? उनका जन्म पटना साहिब में हुआ था। हमारे गुरु महाराज गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पटना, बिहार में हुआ और तुम कहते हो कि बिहार के लोगों को घुसने नहीं देेंगे? तो क्या तुम गुरु गोबिंद सिंह महाराज का अपमान करोगे? जिस मिट्टी में गुरु गोबिंद सिंह जी ने जन्म लिया, उस मिट्टी का अपमान करोगे? गुरु गोबिंद सिंह जी ने जिस मिट्टी में जन्म लेकर हमारी रक्षा की, वहाँ के लोगों को अपने प्रदेश में घुसने नहीं दोगे, ऐसी भाषा का प्रयोग करोगे क्या?” इस दौरान उन्होंने सिख दंगों की भयावहता को भी याद किया।

बता दें कि 15 फरवरी को चन्नी ने कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी (Priyanka Gandhi) के साथ पंजाब के रोपड़ में एक रैली को संबोधित किया था। चन्नी ने कहा था, “प्रियंका पंजाबियाँ दी बहू है। यूपी दे, बिहार दे, दिल्ली दे भईए आके इते राज नई कर दे। यूपी के भइयों को पंजाब में फटकने नहीं देना है।” पंजाबी में ‘भइये’ एक अपमानजनक शब्द है। यह शब्द यूपी के लोगों के लिए एक गाली की तरह है।  

‘सत्ता के लिए अकबर से लड़े महाराणा प्रताप’: राजस्थान के शिक्षा मंत्री का ‘ज्ञान’, बोली BJP- मुगल चले गए, कॉन्ग्रेसी एजेंट छोड़ गए

देश और हिंदुओं के स्वाभिमान के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले क्षत्रिय महाराणा प्रताप और मुगल आक्रांता अकबर के बीच युद्ध को ‘सत्ता का संघर्ष’ बताकर राजस्थान के शिक्षा मंत्री और कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने राजनीति में उबाल ला दिया है। डोटासरा के इस बयान पर भाजपा ने कड़ी आपत्ति जताई है। वहीं, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि मुगल चले गए लेकिन कॉन्ग्रेसी एजेंट को छोड़ गए।

केंद्रीय मंत्री ने ट्वीट कर कहा, “मुगल चले गए अपने पीछे कांग्रेसी एजेंटों को छोड़कर जो मातृभूमि के सम्मान की लड़ाई को सत्ता से जोड़ देते हैं। राजस्थान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा किस आधार पर कह रहे हैं कि राजस्थान के माथे का तिलक हमारे महाराणा प्रताप ने अकबर से सत्ता के लिए युद्ध किया था?”

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, “डोटासरा जी इटालियन कोचिंग से सीखा अपना इतिहास हमें न बांचें। महाराणा ने अकबर से स्वतंत्रता के लिए रण किया था, धर्म रक्षा का युद्ध किया था, मरुधरा के परचम को ऊंचा रखने की जंग की थी।” उन्होंने कहा कि डोटासरा तुरंत माफी माँगे और अगली बार ‘हमारे महाराणा’ का नाम अपनी सियासी जुबान पर न लाएँ। यही अच्छा होगा।

डोटासरा के पर प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री और भाजपा नेता गुलाबचंद कटारिया ने कहा कि कॉन्ग्रेसियों को महाराणा प्रताप दिखते ही अकबर दिख जाता है। इन लोगों ने इतने साल तक यही खेती कमाकर राज किया है। उन्होंने कहा कि प्रताप का जीवन राष्ट्र के लिए स्वाभिमान और मूल्यों की लड़ाई के लिए रहा। कॉन्ग्रेस ने हमेशा मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की है और उसकी की जो दुर्गति आज हुई है उसका बड़ा कारण यही है।

उन्होंने कहा कि मेवाड़ नहीं झुके इस बात के लिए महाराणा प्रताप ने इतनी बड़ी सल्तनत से मुकाबला किया। बड़े-बड़े कई लोग झुक गए, लेकिन मेवाड़ राजघराना और प्रताप ने अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं करके कष्टों को भुगतना स्वीकार किया और संघर्ष करते हुए अपनी लड़ाई जारी रखी।

वहीं, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता वसुंधरा राजे ने भी डोटासरा के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “अकबर के साथ #MaharanaPratap का युद्ध सत्ता संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्र सुरक्षा का संघर्ष था। उन्होंने मेवाड़ के स्वाभिमान की खातिर जंगलों में घास की रोटियां तक खाई, ऐसे पराक्रमी योद्धा के अपमान पर कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से जनता से माफी मांगनी चाहिए।”

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने ट्वीट कर कहा कि महाराणा प्रताप का अकबर के साथ युद्ध सत्ता संघर्ष नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की लड़ाई थी। डोटासरा पहले भी इस मामले पर विवादित बयान दे चुके हैं। उन्होंने पूछा कि कॉन्ग्रेस को मुस्लिम वोटों को खोने का इतना डर क्यों है।

राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के उपनेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि महाराणा प्रताप व अकबर की लड़ाई ‘संप्रभुता, स्वतंत्रता और स्वाभिमान’ की लड़ाई थी जो भारतीय संविधान के आदर्श हैं ना कि सत्ता की लड़ाई थी। राजस्थान की आन बान शान के प्रतीक महाराणा प्रताप के खिलाफ बार-बार कुंठित मानसिकता का परिचय देना डोटासरा आदत में शुमार हो गया है।

दरअसल, डोटासरा ने गुरुवार (17 फरवरी) को नागौर जिले में दो दिवसीय जिलास्तरीय कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर के पहले दिन अपने संबोधन में कहा कि भाजपा अपने राज के दौरान विद्या भारती की तर्ज पर पाठ्यक्रम बनवाए। उन्होंने महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुई लड़ाई को धार्मिक लड़ाई बताकर पाठ्यक्रम में शामिल करवा रखा था, जबकि ये सत्ता का संघर्ष था। बीजेपी हर चीज को हिन्दू-मुस्लिम के धार्मिक चश्मे से देखती है।

इससे पहले भी डोटासरा ने महाराणा प्रताप को लेकर विवादित बयान दिया था। प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद मंत्रीमंडल में शपथ लेने के दौरान उन्होंने कहा था कि यह तो एक्सपर्ट तय करेंगे कि महाराणा प्रताप और अकबर में महान कौन है? उनके इस बयान पर विवाद बढ़ा तो उन्होंने सफाई दी थी।

यह पहला मौका नहीं है, जब कॉन्ग्रेस के नेताओं ने महाराणा प्रताप को लेकर इस तरह का बेतुका बयान दिया हो। साल 2017 में 10वीं की पाठ्य-पुस्तक में कुछ तथ्यों को शामिल किया गया था, लेकिन 2018 में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस सरकार बनते ही 2019 में उन तथ्यों को बिना किसी जानकारी के बदल दिया गया और लेख को उसी लेखक के नाम से प्रकाशित कर दिया गया। इस बुक में तो महाराणा प्रताप को युद्ध के दौरान प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य, संयम और योजना के प्रति कमजोर बताया दिया गया था। साथ ही एक जगह ये कहा गया था कि हल्दीघाटी की लड़ाई बेनतीजा थी और महाराणा प्रताप उस लड़ाई में हार गए थे।

जिस ट्रक में घुसी थी दीप सिद्धू की कार, उसे चला रहा था कासिम खान: पकड़े जाने के बाद कहा- मेरे से गलती हो गई…

लाल किला हिंसा के आरोपित पंजाबी गायक और अभिनेता दीप सिद्धू की 15 फरवरी 2022 की रात हरियाणा में सोनीपत के पास सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उनकी कार जिस ट्रक से टकरा हादसे की शिकार हुई थी, उसका ड्राइवर कासिम खान गिरफ्तार कर लिया गया है। वह हादसे के बाद से फरार थ। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार कासिम ने पूछताछ में अपना गुनाह कबूल करते हुए कहा कि उससे गलती हो गई थी।

कासिम खान नूंह का रहने वाला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोनीपत के पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा ने बताया, “फरार ट्राला चालक को पकड़ने के लिए पुलिस टीम बनाई गई थी। आख़िरकार वो गुरुवार (17 फ़रवरी) को अपने गॉंव सिंगारा में मिला।” SHO खरखौदा के मुताबिक आरोपित कासिम ने अपना अपराध कबूल कर लिया है और अचानक ब्रेक लगाने से यह हादसा होना बताया। जानकारी के मुताबिक कासिम के ट्राले में कोयला लोड था जिसे लेकर वह गुजरात के अहमदाबाद से उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जा रहा था। दुर्घटना के बाद वह काफी डर गया और ट्रक छोड़ कर भाग गया। उसको अगले दिन पता चला कि मरने वाला पंजाबी फिल्मों का कलाकार था।

सोनीपत पुलिस ने दीप सिद्धू के भाई सुरजीत की शिकायत पर ट्रक चालक के खिलाफ FIR दर्ज की थी। सुरजीत ने आरोप लगाया था कि ट्रक चालक ने अचानक से ब्रेक लगाया, जिसकी वजह से यह दुर्घटना हुई। पुलिस ने IPC की धारा 279 और 304A के तहत FIR दर्ज की थी।

दुर्घटना के समय दीप सिद्धू के साथ उसकी गर्लफ्रेंड राजविंदर कौर उर्फ़ रीना भी थी। रीना राय ने बताया था, “जब हादसा हुआ तब दीप सिद्धू की आँख लग गई थी। ट्रक से टक्कर के बाद कार तकरीबन 20 से 30 मीटर तक सड़क पर घिसटती चली गई। इस दौरान कार का आगे का हिस्सा चिपक गया।” बुधवार को दीप सिद्धू के साथ अपनी तस्वीरें शेयर करते हुए रीना ने इंस्टाग्राम पर लिखा था, “मैं टूट चुकी हूँ, मैं अंदर से मर चुकी हूँ। प्लीज अपने सोलमेट के पास वापस आएँ, आपने मुझसे वादा किया था कि आप मुझे किसी भी जीवन में नहीं छोड़ेंगे।”

सभी अल्पसंख्यक संस्थानों में हिजाब और भगवा शॉल पहनने पर कर्नाटक सरकार ने लगाई रोक, बुर्का पहनने पर अड़ी मुस्लिम छात्राएँ

कर्नाटक (Karnataka) बुर्का मामले (Hijab Controversy) को लेकर जारी विवाद के बीच राज्य सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने गुरुवार (17 फरवरी 2022) को एक आदेश जारी कर सभी सरकार द्वारा संचालित अल्पसंख्यक संस्थानों में छात्र-छात्राओं के हिजाब, स्कार्फ या भगवा शॉल पहनने पर रोक लगा दिया है।

ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, हज और वक्फ विभाग के सचिव मेजर मणिवन्नन पी की ओर से एक पत्र जारी किया गया है। जिसमें कहा गया है कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में सभी छात्रों को, उनके धर्म या विश्वास की परवाह किए बिना क्लास के अंदर भगवा शॉल, स्कार्फ, हिजाब या फिर धार्मिक झंडे के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया है।

विभाग द्वारा जारी किए गए निर्देश में स्पष्ट कहा गया है, “हाई कोर्ट का हिजाब को लेकर दिया गया फैसला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के आवासीय स्कूलों, कॉलेजों और मौलाना आज़ाद मॉडल इंग्लिश मीडियम के संस्थानों पर भी लागू होता है। स्कूलों और कॉलेजों के साथ-साथ मौलाना आज़ाद मॉडल इंग्लिश मीडियम स्कूलों में भगवा शॉल, स्कार्फ, हिजाब, या किसी दूसरे धार्मिक झंडे पर बैन है, क्योंकि ये अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का हिस्सा हैं।”

आदेश में ये भी कहा गया है कि इस दिशा निर्देश का पालन उन सभी संस्थानों को करना है, जहाँ पर पहले से ड्रेस कोड लागू है। अल्पसंख्यक विभाग की ओर से यह निर्देश राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री सीएन अश्वथनारायण द्वारा जारी किए गए उस बयान के बाद आया हैं, जिसमें एक दिन पहले उन्होंने कहा था कि कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतरिम फैसला डिग्री कॉलेज के छात्रों पर लागू नहीं होता। बावजूद इसके मुस्लिम स्टूडेंट लगातार हिजाब पहनकर स्कूल आ रहे हैं।

गौरतलब है कि है कि हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने अंतरिम फैसले में हिजाब विवाद पर फाइनल फैसला आने तक सभी शिक्षण संस्थानों में छात्रों को कॉलेज में भगवा शॉल, स्कार्फ या फिर हिजाब पहनने पर रोक लगा दिया था।

कब से चल रहा है यह मामला

पीयू कॉलेज का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है।

70 मिनट में 21 धमाके: 38 आतंकियों को फाँसी-11 को उम्रकैद, अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट में 13 साल बाद सजा

गुजरात के अहमदाबाद (Ahmedabad, Gujarat) शहर में साल 2008 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट (Serial Bomb Blast) के मामले में लगभग 13 साल बाद 38 दोषियों को फाँसी की सजा और बाकी के 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। सत्र न्यायालय के विशेष न्यायाधीश एआर पटेल (Justice AR Patel) ने शुक्रवार (18 फरवरी) को 7,015 पेज के अपने फैसले में भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 302 और UAPA के तहत यह सजा सुनाई।

इससे पहले इस मामले में न्यायाधीश एआर पटेल ने 8 फरवरी को सुनाए अपने फैसले में 49 आरोपियों को दोषी करार दिया था। वहीं, 28 आरोपियों को बरी कर दिया था। इस मामले में कुल 78 आरोपित थे, जिसमें से एक आरोपित सरकारी गवाह बन गया था। इस तरह कुल 77 आरोपितों पर मामला चला।

सीरियल ब्लास्ट के इस मामले में सुनवाई पिछले साल सितंबर में ही पूरी हो गई थी। इस साल 2 फरवरी को फैसला आना था, लेकिन सत्र न्यायालय के न्यायाधीश एआर पटेल कोरोना से संक्रमित हो गए थे। इसके कारण मामले को 8 फरवरी तक के लिए टाल दिया गया था। 

बता दें कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस समय अहमदाबाद शहर में 26 जुलाई 2008 को लगभग 70 मिनट के भीतर 21 बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हो गई थी और लगभग 200 लोग घायल हो गए थे। इस मामले में अहमदाबाद पुलिस ने 20 प्राथमिकी दर्ज की थी, जबकि सूरत में 15 अलग से FIR दर्ज की गईं थी।

उस समय के प्रदेश के DGP आशीष भाटिया के नेतृत्व में 28 जुलाई 2008 को तेज-तर्रार अधिकारियों की टीम बनाई गई थी। इस टीम ने 19 दिनों में विस्फोट कांड से जुड़े 30 आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया था। बाद में बाकी आतंकियों को भी जेल भेज दिया गया था। घटना के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अहमदाबाद गए थे।

पुलिस का दावा था कि ये सभी आरोपित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े हैं। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने साल 2002 में हुए गोधरा दंगे का बदला लेने के लिए सीरियल बम ब्लास्ट किए थे। अहमदाबाद में धमाकों से पहले इन्हीं आतंकियों ने राजस्थान के जयपुर और उत्तर प्रदेश के वाराणसी में भी धमाकों को अंजाम दिया था।