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26/11 के बाद एक्शन नहीं लेना, कमजोरी की निशानी: कॉन्ग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने मनमोहन-सोनिया दोनों पर साधा निशाना?

10 FLASHPOINTS; 20 YEARS: NATIONAL SECURITY SITUATIONS THAT IMPACTED INDIA – यह एक किताब है। कॉन्ग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने लिखी है। बाजार में यह 1 दिसंबर 2021 से उपलब्ध होगी। खबर यह है कि लेखक ने अपनी ही पार्टी की इस किताब में खबर ले ली है।

मनीष तिवारी का कहना है कि 26/11 के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। तब की कॉन्ग्रेसी मनमोहन सरकार को घेरते हुए लेखक ने लिखा है कि एक ऐसे देश के लिए जो सैकड़ों निर्दोष लोगों के नरसंहार पर भी झिझकता नहीं है, उसके साथ संयम बरतना शक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि इसे कमजोरी की निशानी माना जाता है।

10 FLASHPOINTS; 20 YEARS नाम की किताब से, साभार: मनीष तिवारी का ट्विटर वॉल

10 FLASHPOINTS; 20 YEARS नाम की अपनी आने वाली किताब में कॉन्ग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने 26/11 मुंबई हमले की तुलना अमेरिका के 9/11 से की है। उन्होंने 26/11 के बाद “शब्दों से ज्यादा कार्रवाई की गूँज (actions must speak louder than words)” की वकालत करते हुए लिखा है कि भारत को उस समय अमेरिका की तरह ही जवाबी कार्रवाई करनी चाहिए थी।

मनीष तिवारी के बागी तेवर पुराने

26 नवंबर 2019 की बात है। मनीष तिवारी ने तब एक ट्वीट किया था।

उस समय भी मनीष तिवारी के ट्वीट का सारांश यही था – अगर अमेरिका में 26/11 के हमले हुए होते तो पाकिस्तान का क्या होता? अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद अलकायदा को टार्गेट करते हुए अमेरिका ने खुद के देश में संदिग्ध आरोपितों और अफगानिस्तान के साथ जो किया, निश्चित ही लेखक के मन में वो रहा होगा और उसे भारत के साथ उन्होंने जोड़ा।

2019 का ट्वीट और अब 10 FLASHPOINTS; 20 YEARS नाम की किताब – मनीष तिवारी निश्चित ही मनमोहन सरकार और कॉन्ग्रेसी सुप्रीमो सोनिया गाँधी पर निशाना साधते दिख रहे हैं। शायद अपने उन कॉन्ग्रेसी साथियों पर भी, जिन्होंने हिंदू टेरर / भगवा आतंक की कहानी गढ़ कर 26/11 को RSS की साजिश बताने की राजनीति खेली थी।

राहुल गाँधी से भी नाराज मनीष तिवारी?

पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और अभी तक युवा नेता राहुल गाँधी पर परोक्ष रूप से निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पार्टी को हिंदू और हिंदुत्व के बहस से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर, गिरजाघर, गुरुद्वारा या मस्जिद में माथा टेकने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन यह किसी की राजनीति का आधार नहीं होना चाहिए।

जमीन कब्जा करने के लिए त्रिपुरा में बंद पड़ी मस्जिद जलाने की झूठी खबर? अब्दुल बासित के दावों में झोल ही झोल

अक्टूबर में बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा हुई। इसके विरोध में त्रिपुरा में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने मार्च निकाला। इस मार्च के बाद सोशल मीडिया में पानीसागर में एक मस्जिद को जलाने की फर्जी खबरें आने लगी। मस्जिदों में आगजनी, कुरान जलाने और मुस्लिमों पर अत्याचार का दावा करते भ्रामक वीडियो वायरल किए गए। फिर इसकी आड़ लेकर कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने महाराष्ट्र के कई जिलों मसलन नांदेड़, अमरावती और मालेगाँव में हिंसा की।

जिस फेक न्यूज को सबसे ज्यादा सुर्खी मिली वह थी, पानीसागर में मस्जिद जलाना। यह तब हुआ जब त्रिपुरा पुलिस ने खुद रोवा बाजार की मस्जिद की तस्वीर साझा कर बताया कि कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया है। लेकिन संदिग्धों ने दावा करना शुरू कर दिया कि सीआरपीएफ की एक मस्जिद को विहिप ने निशाना बनाया था। मीडिया संसथान ‘द न्यू इंडियन’ ने ग्राउंड जीरो पर जाकर इस दावे की पड़ताल की तो पता चला कि यह कथित मस्जिद कई साल से बंद पड़ी है। इसे कोई नुकसान नहीं हुआ था। यह मस्जिद उत्तरी त्रिपुरा के पानीसागर उपमंडल में रीजनल कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन के पास स्थित है।

द न्यू इंडियन को एक स्थानीय मंदिर के पुजारी विधुभूषण नाथ ने बताया, “पहले यहाँ सीआरपीएफ कैंप था। 15 साल पहले इस कैंप में 2 मुस्लिम अफसर थे। अब इस जगह पर कोई नहीं आता।” उन्होंने पुष्टि की कि दो साल पहले एक व्यक्ति की कथित मौत के बाद से यह मस्जिद बंद पड़ी है। देबाशीष डे नामक एक अन्य स्थानीय ने भी इस मस्जिद पर किसी भी हमले, आगजनी से इनकार किया। उन्होंने बताया कि इसके आसपास कोई मुस्लिम रहता भी नहीं है।

दीबन देबनाथ नामक एक रिक्शा चालक ने मीडिया संस्थान से कहा, “मुझे तो पता भी नहीं था कि यहाँ कोई मस्जिद है और उसे जला दिया गया है। हम जानते हैं कि यहाँ कुछ नहीं हुआ है। फिर भी कुछ लोग आगजनी की अफवाहें फैला रहे हैं।” देबनाथ हो या डे सबने यह बात स्पष्ट की कि उनका विश्व हिंदू परिषद (VHP) या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से कोई जुड़ाव नहीं है।

मस्जिद जलाए जाने के दावे के 20 दिन बाद FIR

द न्यू इंडियन ने अब्दुल बासित नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति से भी संपर्क किया। उसने दावा किया था कि सीआरपीएफ मस्जिद को 21 अक्टूबर 2021 को जला दिया गया था। हालाँकि इस कथित हमले को लेकर एफआईआर 20 दिन बाद, यानी 11 नवंबर को दर्ज की गई। पुलिस को इतनी देरी से सूचना देने को लेकर पूछे जाने पर बासित ने दावा किया कि उसने 23 अक्टूबर को पुलिस से संपर्क करने की कोशिश की थी। लेकिन उसके दावों का प्राथमिकी खंडन करती है।

एफआईआर में बासित अली ने कहा ​है कि मस्जिद समिति के सदस्यों के साथ रायशुमारी और चर्चा की वजह से उसे सूचना देने में देर हुई। द न्यू इंडियन के सवालों से बचने की कोशिश करते हुए उसने कुरान की एक प्रति जलाए जाने की बात दोहराई।

जमीन कब्जाने की नीयत से बासित अली ने फैलाई मस्जिद जलाने की अफवाह?

उत्तरी त्रिपुरा के सीनियर एसपी बीपी चक्रवर्ती ने बताया कि 10-15 साल पहले पानीसागर में सीआरपीएफ की टुकड़ी ने तैनाती के दौरान एक मस्जिद और एक देवस्थान मंदिर का निर्माण किया था। जब वे जाने लगे तो मस्जिद को स्थानीय मुस्लिमों और मंदिर स्थानीय हिंदुओं को सौंप दिया। द न्यू इंडियन की पड़ताल में यह बात सामने आई कि जिस जमीन पर मंदिर और मस्जिद बनी है, वह विवादित है।

पानीसागर के सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट द्वारा 18 जनवरी 2021 को लिखे गए पत्र का अंश (साभार: द न्यू इंडियन)

पानीसागर के सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने 2019-2021 के बीच कई लोगों को पत्र लिखकर बताया है कि दोनों धार्मिक संरचना अनधिकृत हैं और इन्हें हटाए जाने की जरूरत है। अब पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि मस्जिद की जमीन पर कब्जा करने की नीयत से तो बासित अली और उसके परिवार ने हमले और आगजनी की कहानियाँ तो नहीं गढ़ीं?

मस्जिद जलाने की घटना से त्रिपुरा पुलिस ने किया था इनकार

त्रिपुरा पुलिस ने पिछले महीने वायरल वीडियो और वीएचपी के विरोध मार्च के दौरान पानीसागर में मस्जिद में कथित तोड़फोड़ से संबंधित दावों का खंडन किया था। पुलिस ने स्पष्ट रूप से ऐसी किसी भी घटना से इनकार किया था और कहा था कि सोशल मीडिया में फर्जी पोस्ट करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है।

पुलिस ने यह भी बताया था कि कुछ लोग फर्जी सोशल मीडिया आईडी का इस्तेमाल कर त्रिपुरा में हिंसा को लेकर अफवाहें फैला रहे हैं। मस्जिदों पर हमले, उन्हें जलाने या क्षतिग्रस्त करने वगैरह से जुड़ी जो तस्वीरें साझा की जा रही हैं, वह फर्जी हैं और त्रिपुरा से नहीं जुड़ी हैं। सौ से अधिक ट्विटर हैंडल पर गलत सूचना फैलाने को लेकर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत कार्रवाई की थी।

गवर्नमेंट कॉलेज का प्रोफेसर कामरान आलम चला रहा था सेक्स रैकेट, नशीली दवा देकर छात्राओं का करता यौन शोषण

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत शहर के जाने-माने राजकीय महिला महाविद्यालय का प्रोफेसर कामरान आलम खान छात्राओं को फँसाकर सेक्स रैकेट चला रहा था। रविवार को एक छात्रा ने शिकायत करके शिक्षक का भंडाफोड़ किया। 

अब पुलिस इस मामले को दर्ज करके अपनी जाँच कर रही है। वहीं प्रोफेसर एक दिन के अवकाश की एप्लीकेशन कॉलेज में छोड़कर फरार है। जानकारी के मुताबिक, प्रोफेसर कामरान अपने कमरे पर ले जाता था और उन्हें नशीली दवा खिलाकर उनसे अश्लील हरकतें करता था। उनके साथ अवैध संबंध बनाता था। इसके बाद वह छात्राओं को दूसरे के पास भी भेजता था।

अब प्रोफेसर के ख़िलाफ़ पीलीभीत कोतवाली क्षेत्र की रहने वाली एक लड़की ने पुलिस को बताया कि उसके कॉलेज में एक मैथ्य के प्रोफेसर हैं कामरान आलम, जो सेक्स रैकेट चलाते हैं। वह कॉलेज की छात्राओं को बरगलाकर नशीले पदार्थ का सेवन करवाते हैं फिर उन्हें अश्लील बुक, सेक्स टॉयज देकर अश्लीलता करते हैं।

कामरान के विरुद्ध ये भी आरोप है कि वो लड़कियों को निजी आवास में बुलाकर अश्लील हरकत तो करता ही था लेकिन जब कोई उसका विरोध करे तो उसने मारने की धमकी भी दी जाती थी।

अब बता दें कि कोतवाली पुलिस ने प्रोफेसर के विरुद्ध नामजद मामला दर्ज किया है। सीओ सिटी और कोतवाली पुलिस ने कॉलेज पहुँचकर जाँच पड़ताल भी की। सीओ सिटी ने कहा कि छात्रा की तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है टीमों को लगाया गया है आरोपित अभी फरार है, गंभीरता के साथ मामले की जाँच कराई जा रही है, सेक्स रैकेट का मामला अभी नहीं आया है। 

जानकारी के मुताबिक, कामरान का स्थानांतरण महिला महाविद्यालय में साल 2016 में हुआ था। उसके ख़िलाफ़ 20 नवंबर को शिकायत की गई थी। ऐसे में कार्यवाहक डॉ दिनेश चंद्रा ने बताया कि मामले की जानकारी उन्हें नहीं दी गई है। पुलिस को इस बाबत बताया गया है। दोषी को सजा मिले इसे लेकर पुलिस को जाँच में पूरा सहयोग दिया जाएगा।

प्रियंका चोपड़ा ने छोड़ा पति निक का नाम, तलाक की खबर उड़ी तो लिखा- मैं तुम्हारी इन बाँहों में मरना चाहती हूँ

बॉलीवुड-हॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने 22 नवंबर को जैसे ही अपने सोशल मीडिया अकाउंट से अपने पति निक जोनस का सरनेम हटाया, दोनों के रिश्ते में दरार आने की अटकलें लगने लगी। तीसरी सालगिरह से पहले तलाक की खबरों ने जोर पकड़ा तो तो प्रियंका चोपड़ा की माँ मधु चोपड़ा सामने आईं। बताया कि मीडिया में लगाई जा रही अटकलें गलत हैं। उन्होंने नेटीजन्स से भी अपील की कि इस तरह के झूठे दावे न किए जाएँ।

माँ के अलावा प्रियंका चोपड़ा की करीबी दोस्त ने भी नाम न बताने की शर्त पर कहा, “ऐसी निराधार अफवाहों पर यकीन मत करो।” इस करीबी दोस्त ने कहा कि सोशल मीडिया ने लोगों में सोचने की ज्यादा क्षमता विकसित कर दी है।

बता दें कि प्रियंका और निक जोनस की शादी 1 दिसंबर 2018 को हुई थी। इसके बाद से ये जोड़ा मीडिया में लगातार चर्चा में रहा है। ऐसे में जब प्रियंका ने अपने ट्विटर-फेसबुक से नाम हटाया तो हर कोई हैरान रह गया। यहाँ तक कि निक जोनस की एक जिम वाली वीडियो पर तो लोग ये तक कहने लगे कि ‘निक अब पूरी तरह ठुकरा के मेरा प्यार मेरा इंतकाम देखेगी वाले मोड में आ गए हैं।’ किसी ने उन्हें जवाब दिया, ‘कटने के बाद हर कोई जिम ही जाता है।’

भारतीय फैन्स ने तो उनसे ये भी पूछा कि आखिर प्रिंयका और निक का ब्रेकअप क्यों हुआ। लेकिन बता दें कि जिस समय सोशल मीडिया पर लोग अपने कयास लगाने में जुटे थे। उसी दौरान निक की वीडियो पर प्रियंका का एक कमेंट आया जिससे पता चला कि दोनों के अलग होन वाली बातें अभी तो सच नहीं हैं।

इस वीडियो पर कमेंट करते हुए प्रियंका चोपड़ा ने लिखा था, “Damn! मैं तुम्हारी इन बाँहों में मरना चाहती हूँ।” इस कमेंट से उन्होंने तलाक की अटकलों पर विराम लगाने की कोशिश की।

प्रसाद बनाने में ‘हलाल’ गुड़ के प्रयोग पर सबरीमाला मंदिर के तंत्री की क्या राय है? केरल HC में याचिका दाखिल कर माँगा जवाब

केरल हाईकोर्ट में सोमवार (22 नवंबर 2021) को एक याचिका दायर कर सबरीमाला में भगवान अयप्पा के मंदिर में ‘अरावणा’ और ‘अप्पम’ प्रसाद तैयार करने के लिए ‘हलाल’ गुड़ का इस्तेमाल करने के लिए तंत्री (मुख्य पुजारी) की राय पूछी गई है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े याचिकाकर्ता एस. जे. आर. कुमार ने तंत्री की राय के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। कुमार ने गुड़ और चावल से बने हलवा ‘अरावणा’ और मीठे चावल और गुड़ से बनने वाले लड्डू ‘अप्पम’ को तैयार करने के लिए हलाल प्रमाणित गुड़ खरीदे जाने का विरोध किया है। अयप्पा मंदिर में श्रद्धालुओं को ‘अरावणा’ और ‘अप्पम’ का प्रसाद दिया जाता है।

जस्टिस अनिल के नरेंद्रन और जस्टिस पीजी अजित कुमार की खंडपीठ ने खाद्य सुरक्षा विभाग से याचिका पर जवाब माँगा है। अदालत ने कहा कि वह बुधवार (24 नवंबर 2021) को इस मामले पर विचार करेगी। इस मामले में खाद्य सुरक्षा विभाग के कमिश्नर अपना जवाब दाखिल करेंगे।

सबरीमाला में भगवान अयप्पा मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवास्वम् बोर्ड (टीडीबी) ने 18 नवंबर को अदालत को बताया था कि उसे जो गुड़ मिला है, उसकी पैकेजिंग पर ‘हलाल’ लिखा था। इस गुड़ को अरब देशों को निर्यात किया जाता है।

टीडीबी ने अदालत को यह भी बताया कि ‘अप्पम’ और ‘अरावणा’ को बनाने में इस साल के शुरू में प्राप्त की गुड़ का इस्तेमाल किया जा रहा है। उसने बताया कि इस साल सितंबर में पुराने गुड़ की जाँच करने के बाद उसे नीलाम कर दिया गया। जाँच में पाया गया कि ये गुड़ मानव उपभोग के लिए ठीक नहीं हैं। इसके बाद इस गुड़ की नीलामी कर मवेशियों का भोजन बनाने के लिए त्रिशूर के साउदर्न एग्रो टेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को दे दिया गया था।

बोर्ड ने कहा कि सबरीमाला कर्म समिति के महा संयोजक होने का दावा करने वाले कुमार की याचिका में जो आरोप हैं, वे ‘पूरी तरह झूठ और बेबुनियाद हैं’। बोर्ड ने दावा किया कि सबरीमाला में ‘अरावणा’ और ‘अप्पम’ की बिक्री रोकने से इसे बहुत नुकसान होगा।

बता दें कि सत्तारूढ़ माकपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी, नव-नियुक्त टीडीएम अध्यक्ष के अनंतगोपन ने कहा कि मंदिर को बदनाम करने और प्रसाद की बिक्री को कम करने के लिए केवल अफवाह फैलाई जा रही है। उन्होंने कहा, ”हम अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए साइबर विंग से संपर्क करेंगे। यह श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करने वाला है।”

साधु-संतों की आपत्ति के बाद तुरंत बदली गई ‘रामायण एक्सप्रेस’ के वेटर्स की ड्रेस: रेलवे ने जताया खेद, जारी की नई तस्वीरें

रामायण एक्सप्रेस सर्किट स्पेशल ट्रेन के वेटर्स की भगवा ड्रेस पर विवाद गहराने के बाद भारतीय रेलवे (IRCTC) ने अपने फैसले पर खेद जताया है। IRCTC सोमवार (24 नवंबर 2021) को ट्वीट किया, ”आपको सूचित किया जाता है कि रामायण एक्सप्रेस सर्किट स्पेशल ट्रेन के सर्विस स्टाफ की पेशेवर पोशाक को पूरी तरह से बदल दिया गया है। असुविधा के लिए खेद है।”

दरअसल, उज्जैन के साधु-संतों ने सर्विस देने वाले वेटर्स की ड्रेस पर आपत्ति जताई थी। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी सामने आया है। वायरल वीडियो में ट्रेन के वेटर्स को भगवा कपड़े, धोती, पगड़ी और रुद्राक्ष की माला पहने हुए दिखाया गया है। साथ ही वेटर्स संतों की वेशभूषा में लोगों को खाना सर्व करते और लोगों के जूठे बर्तन भी उठाते हुए नजर आए। साधु-संतों ने रेलमंत्री को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि अगर वेटर्स की ड्रेस नहीं बदली गई तो वे ट्रेन रोकेंगे और अगली ट्रिप का विरोध करेंगे।

इस डीलक्स एसी टूरिस्ट ट्रेन से भगवान श्रीराम से जुड़े सभी धार्मिक स्थलों का भ्रमण कराया जाता है। रामायण एक्सप्रेस को बेहद खास अंदाज में डिजाइन किया गया है। ट्रेन में दो डाइनिंग कोच तैयार किए गए हैं। एसी कोच वाली ट्रेन में आरामदायक कुर्सी-टेबल लगाए गए हैं। अलग से टॉयलेट भी बनाया गया है, जिसमें नहाने का भी इंतजाम किया गया है। 12 दिसंबर को रामायण एक्सप्रेस ट्रेन की अगली ट्रिप है।

बता दें कि रामायण सर्किट स्पेशल ट्रेन की पहली ट्रिप 7 नवंबर को शुरू हुई थी। दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन से यह ट्रेन 156 यात्रियों को लेकर रवाना हुई थी। इस ट्रेन का पहला पड़ाव अयोध्या होता है। यहाँ से ही धार्मिक यात्रा शुरू होती है। अयोध्या से यात्रियों को सड़क मार्ग से नंदीग्राम, जनकपुर, सीतामढ़ी के रास्ते नेपाल ले जाया जाता है। इसके बाद ट्रेन से यात्रियों को भगवान शिव की नगरी काशी ले जाया जाता है। इसका अंतिम पड़ाव रामेश्वरम होता है।

47 शैक्षिक/स्वास्थ्य संस्थाएँ चलाने वाला गोरखनाथ मंदिर, जिसके महंत को नेहरू काल में हुई थी जेल: राम मंदिर आंदोलन में बड़ा रोल

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने सोमवार (22 नवंबर, 2021) को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की। ये तो सभी को पता ही है कि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ ‘गोरक्षधाम पीठाधीश्वर’, अर्थात गोरखनाथ मंदिर के मुख्य महंत भी हैं। ये एक ऐसा मंदिर है, जहाँ गैर-ब्राह्मण महंत बनते आए हैं, अर्थात जाति की कोई सीमा नहीं है। गोरखपुर की सभी जातियों और यहाँ तक कि मुस्लिमों में भी इस मंदिर के प्रति श्रद्धा रही है।

यहाँ हम आपको बताते हैं कि कैसे गोरखनाथ मंदिर राजनीति और फिर सत्ता की धुरी बना। चुनावी इतिहास की बात करें तो आज से लगभग 55 वर्ष पूर्व ही महंत दिग्विजयनाथ यहाँ से सांसद चुने गए थे। हालाँकि, 2 वर्षों के बाद ही 1969 में उनका निधन हो गया, जिसके बाद हुए उपचुनाव में उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ सांसद बने। दोनों ने निर्दलीय जीत दर्ज की थी। महंत अवैद्यनाथ 1989 में ‘हिन्दू महासभा’ से चुनाव लड़ कर जीते और फिर से लोकसभा पहुँचे।

उन्होंने 1991 और 1996 में गोरखपुर से फिर जीत दर्ज कर के जीत की हैट्रिक लगाई। इसके बाद नंबर आया योगी आदित्यनाथ का। महंत योगी आदित्यनाथ ने 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 – लगातार 5 बार यहाँ से जीत दर्ज की। 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इस तरह उन्होंने लगातार 19 वर्षों तक सीट अपने पास रखी। गोरखनाथ मंदिर के पास गोरखपुर लोकसभा की सीट 29 वर्षों (1989-2017) तक रही।

अभी भी वहाँ से भाजपा के रवि किशन ही सांसद हैं, जो भोजपुरी फिल्मों के बड़े स्टार भी हैं। उन्होंने खुद को भाजपा से ज्यादा मंदिर का कैंडिडेट बता कर ही वोट माँगे थे। योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद बीच में एक बार ये सीट भाजपा के हाथ से खिसकी, जब समाजवादी पार्टी से प्रवीण निषाद ने जीत दर्ज की। 2018 लोकसभा उपचुनाव गोरखपुर से जीतने वाले प्रवीण निषाद अब भाजपा में हैं और संत कबीर नगर से सांसद हैं। गोरखपुर पूरे उत्तर प्रदेश की सत्ता की धुरी बना हुआ है।

गोरखपुर मंदिर को सहिष्णुता का प्रतीक भी कहा जा सकता है, जहाँ हर जाति-मजहब के लोगों को न्याय मिलता है और उनकी समस्याओं पर काम किया जाता है, उनकी सेवा की जाती है। एक समय था जब यहाँ पूर्वांचल का दरबार लगता था और योगी आदित्यनाथ से मिलने के लिए लोगों का ताँता लगा रहता था। जनता की शिकायत पर वो अधिकारी तक से भिड़ जाते थे। सपा-बसपा के शासनकाल में भी ये करना जिगर का काम था। गोरखनाथ मंदिर के शिखर भले आसमान छूते हों, ये मंदिर इस शहर के दिल में बसता है।

मंदिर के अंदर पूर्व महंतों और भगवान श्रीराम की युद्धमुद्रा में तस्वीर लगी हुई है। खुद योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हिन्दू अध्यात्म में प्रवृत्ति (कार्य करते रहना) और निवृत्ति (सब कुछ त्याग देना), दोनों का महत्व है और लक्ष्य एक ही है। उनका कहना था कि वो एक मिशन पर हैं और राजनीति लोकप्रियता नया पद नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य के लिए कर रहे हैं। महंत दिग्विजयनाथ भी पहले कॉन्ग्रेस में हुआ करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने ‘हिन्दू महासभा’ में शामिल होना उचित समझा और उत्तर प्रदेश में इसके मुखिया भी बने।

27 जनवरी, 1948 में हुई एक जनसभा में महात्मा गाँधी की हत्या के हिन्दुओं को उकसाने का आरोप लगा कर उन्हें 9 महीने तक जेल में रखा गया था। लगभग 5 दशक से गोरखनाथ मंदिर के प्रबंधक द्वारका तिवारी कहते हैं कि कॉन्ग्रेस में जब हिन्दुओं की नहीं सुनी जाने लगी, तब उन्होंने पार्टी से अलग होना ही उचित समझा। उनका कहना है कि हम वो करने लगे, जो राजनीतिक दल हिन्दू समाज के लिए नहीं कर पा रहे थे। ये जानना भी दिलचस्प है कि गोरखनाथ मंदिर से 5 किलोमीटर की दूरी पर ही सुन्नी इमामबाड़ा स्थित है।

अदनान फारुख शाह उर्फ़ ‘मियाँ साहेब’ इसके मुखिया हैं, जो इलाके की वक्फ संपत्तियों की छठी पीढ़ी के ‘मुतवली’ हैं और हर साल मुहर्रम के जुलुस का नेतृत्व करते हैं। हालाँकि, इमामबाड़ा सार्वजनिक राजनीति से दूर ही रहा है। 2007 में मुहर्रम के दौरान ही यहाँ हिंसा भी भड़की थी, जिसके बाद 10 में से अंतिम 3 दिनों का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा था। ‘द हिन्दू बिजनेस लाइन’ में स्मिता गुप्ता के लेख के अनुसार, शाह कहते हैं कि उनके दादा और महंत दिग्विजयनाथ अच्छे दोस्त थे और दोनों साथ में शाम को टेनिस खेला करते थे। इसके बाद वो चाय और नाश्ता करते थे।

इसी लेख में अदनान फारुख शाह ने बताया कि किस तरह वो बचपन से ही महंत अवैद्यनाथ को जानते हैं और उनके पिता भी उनके अच्छे मित्र थे। वो कहते हैं कि उनके पिता के निधन के बाद महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें कर बार फोन कॉल कर के ढाँढस बँधाया था और कहा था, “बाप का साया नहीं गया। मैं हूँ।” हालाँकि, मुस्लिमों में कट्टरता बढ़ने के साथ ही मंदिर और इमामबाड़ा दूर होते चले गए। योगी आदित्यनाथ और उनकी ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ ने हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध सड़क से लेकर संसद तक आवाज़ उठाई।

गुरु गोरखनाथ से जुड़ी कहानी बताते समय पुरखे ‘जाग मच्छिन्द्र, गोरख आया’ वाली कहावत ज़रूर कहते हैं। उनका कालखंड भले ही 11वीं शताब्दी का माना जाता हो, लेकिन वो कई अलग-अलग समयावधियों में कई संतों को दर्शन दे चुके हैं, ऐसी मान्यता है। उनके चमत्कार के किस्से भारत के साथ-साथ नेपाल में भी मशहूर हैं। सामाजिक कार्यों के लिए लोकप्रिय इस मंदिर का इतिहास शैवायत संप्रदाय वाला रहा है और इसे सिद्धपीठ के रूप में ख्याति मिली।

महंत दिग्विजयनाथ 1921 में कॉन्ग्रेस में शामिल हुए थे और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। लेकिन, महात्मा गाँधी की ‘अहिंसा’ उन्हें खास समझ में नहीं आई और 1937 में ‘हिन्दू महासभा’ से जुड़ने के बाद उन्होंने खुल कर महात्मा गाँधी का विरोध शुरू कर दिया। 1949 में राम जन्मभूमि आंदोलन में शामिल होने के साथ ही वैष्णव और शैव का एक ऐसा मेल बना, जिसने हिंदुत्व को और तगड़ा किया। उनके 9 दिन तक रामचरितमानस का पाठ करने के बाद विवादित ढाँचे में रामलला की मूर्ति रखी गई।

महंत दिग्विजयनाथ चौरी-चौरा प्रकरण में सक्रियता से हिस्सा लेने के कारण 1921 में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ सांसद बनने से पहले 1962, 67, 69 और 74 और 77 में विधायक भी रहे हैं। राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका की आज भी सराहना की जाती है। गोरखनाथ मंदिर अब ‘गोरक्षनाथ उत्तर प्रदेश आयुष यूनिवर्सिटी’ भी बनवा रहा है। कुल मिला कर पूर्वांचल में ये मंदिर 47 शैक्षिक और स्वास्थ्य संस्थाएँ चलाता है।

आज योगी आदित्यनाथ इसी विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मात्र 26 वर्ष की उम्र में ही पहली बार सांसद चुने गए थे। गोरखनाथ मंदिर कई विद्यालय और अस्पताल चलाता है। इसकी संस्था ‘महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद’ 28 अन्तर स्कूल, 5 पीजी कॉलेज, एक पॉलिटेक्निक कॉलेज और एक ‘संस्कृत विद्यापीठ’ का संचालन करता है। गोरखपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में योग सेंटर भी चलाए जाते हैं। गौशाला भी है। ‘गुरु गोरक्षनाथ विश्वविद्यालय’ का उद्घाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया था।

‘महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद’ की स्थापना 1932 में महंत दिग्विजयनाथ ने ही की थी। फिर 1957 में गोरखपुर विश्विद्यालय की स्थापना भी उनके ही प्रयासों से हुई। सरकार में 50 लाख रुपए की जमीन दी थी और वो कम थी, जिसके बाद उन्होंने अपने दो कॉलेज दान में दे दिए। उनका कहना था कि सही शिक्षा से राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास होता है। आज सामाजिक सौहार्द का वातावरण बना कर इन शैक्षिक संस्थानों में गरीबों को प्राथमिकता मिलती है और इन्हें एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

‘कॉन्ग्रेस को हिंदुत्व के बहस में नहीं पड़ना चाहिए’: मनीष तिवारी ने राहुल गाँधी पर साधा निशाना, कहा- ऐसा ‘अजीब व्यवहार’ पहले नहीं देखा

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पर परोक्ष निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी को हिंदू और हिंदुत्व के बहस से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर, गिरजाघर, गुरुद्वारा या मस्जिद में माथा टेकने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन यह किसी की राजनीति का आधार नहीं होना चाहिए। पंजाब के पार्टी अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के बयान को लेकर उन्होंने कहा कि अपने राजनीतिक करियर में ऐसा ‘अजीब व्यवहार’ नहीं देखा।

सलमान खुर्शीद की किताब पर विवाद के दौरान उनका बचाव करते हुए 12 नवंबर को राहुल गाँधी ने कहा था, “बीजेपी हिंदुत्व की बात करती है। हिंदू और हिंदुत्व में क्या फर्क है, क्या ये एक हो सकते हैं? अगर हैं तो इनका नाम क्यों एक जैसा नहीं है। ये सच में अलग हैं। क्या हिंदू धर्म में ये है कि सिख और मुस्लिम को पीटा जाए? हिंदुत्व में ये है।”

दैनिक जागरण को दिये साक्षात्कार में मनीष तिवारी ने कहा कि आजादी से पहले कॉन्ग्रेस के दो दृष्टिकोण थे- एक गाँधीवादी मानवतावादी और दूसरा नेहरू का बहुलतावादी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कॉन्ग्रेस को उसी सिद्धांत पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदू या हिंदुत्व के बहस को से दूर रहना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए तिवारी ने कहा कि इस पर कोर्ट भी कह चुका है कि हिंदुत्व जीवन जीने का तरीका है।

सलमान खुर्शीद की किताब में हिंदुत्व की तुलना इस्लामिक-जेहादी संगठन आईएसआईएस और बोको हरम को लेकर उन्होंने कहा कि ऐसे संगठन विषैली विचारधारा का समर्थन करते हैं। ये राजनीतिक इस्लाम की विभिन्न विचारधाराओं में से एक हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हम सब को सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जगदीश सरन वर्मा की अध्यक्षता में एक पीठ ने 1995 में कहा था कि हिंदुत्व जीवन का एक तरीका है। अक्टूबर 2016 में तत्कालीन सीजेआई तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने उस सवाल को फिर से खोलने से इन्कार कर दिया।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा अपना बड़ा भाई बताने पर मनीष तिवारी ने कहा कि 40 वर्षों के अपने करियर में उन्होंने कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष, मुख्यमंत्री या केंद्रीय मंत्री का ऐसा ‘अजीब व्यवहार’ कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस की क्या मजबूरी है, ये तो वही बता पाएँगे, लेकिन इसका असर पूरे देश पर पड़ रहा है।

मनीष तिवारी ने 17 अक्टूबर 2021 को कहा था कि दक्षिण एशिया में एक बड़ा इस्लामिक एजेंडा काम कर रहा है, जो गैर-मुस्लिमों को लगातार निशाना बना रहा है। तिवारी ने कश्मीर और बांग्लादेश में हिंदुओं पर टारगेटेड अटैक को आपस में जुड़ा हुआ बताया। कॉन्ग्रेस नेता ने ट्वीट किया था, “क्या कश्मीर में हो रही गैर-मुसलमानों की हत्याएँ, बांग्लादेश में हो रही हिंदुओं की हत्या और पुंछ में 9 जवानों की शहादत के बीच कोई लिंक है? शायद ऐसा है। दक्षिण एशिया में एक बड़ा इस्लामिक एजेंडा काम कर रहा है।”

‘CAA-NRC का भी होगा कृषि कानूनों जैसा हाल, दूसरा देश होता तो PM मोदी को दे दी जाती फाँसी’: मुनव्वर राना

अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रहने वाले उर्दू के शायर मुनव्वर राना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के ऐलान के बाद एक बार फिर से CAA-NRC का राग अलापा है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार पर भड़कते हुए मुनव्वर राना ने कहा कि जो हाल कृषि कानूनों का हुआ, वही हाल CAA और NRC का भी होगा, क्योंकि ये कोई कानून नहीं हैं, बल्कि इन्हें तो मुस्लिमों से दुश्मनी निकालने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि अमित शाह द्वारा लाए गए CAA और NRC कानून में हमारे बहुत सारे लोग मारे गए और बहुत नुकसान हुआ।

कृषि कानूनों की वापसी के सवाल पर राना ने कहा, ”मैं इस फैसले से बहुत खुश हूँ और मैं पीएम मोदी को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ।” शायर ने अपनी बात को जारी रखते कहा कि पीएम कहते हैं मेरी तपस्या में कुछ कमी रह गई होगी, जबकि इसकी बजाए ये जा सकता है कि हमसे कोई गुनाह हो गया था जिससे 700 किसान खत्म हो गए। दूसरे देश की बात होती तो वहाँ पर उनको फाँसी दे दी जाती। अब उनकी जिम्मेदारी है कि पब्लिक केयर फंड से पैसा निकाल कर किसानों को एक-एक करोड़ दिया जाए। शायर ने ये भी कहा कि ये काम तो जिन्ना का था कि उसने देश के दो टुकड़े करवा दिए और आपका काम जोड़ना है न कि तोड़ना।

इसी क्रम में राना ने सीएम योगी आदित्यनाथ पर भी हमले किए। उन्होंने कहा कि योगी कहते हैं कि हमारे यहाँ एक भी दंगा नहीं हुआ, हम भी यही कहते हैं। अब यहाँ दंगा नहीं होता, बल्कि सीधे कत्लेआम होता है।

बता दें कि इस साल अगस्त में विवादित शायर महर्षि वाल्मीकि से तालिबान की तुलना करके बुरा फँसे थे। मध्य प्रदेश के गुना में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया था। भाजपा अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के राज्य सचिव सुनील मालवीय ने आरोप लगाया था कि राना ने महर्षि वाल्मीकि पर टिप्पणी कर न केवल उनका अपमान किया है, बल्कि वाल्मीकि समुदाय और हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने का काम भी किया है।

‘सिख 300 साल बाद भी नहीं भूलते हैं, कुछ भी हो सकता है’: सत्यपाल मलिक ने याद दिलाई इंदिरा गाँधी और जनरल वैद्य की हत्या

मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का तीन कृषि कानूनों की वापसी पर दिया गया विवादित बयान का सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में वह कह रहे हैं कि अगर वह कृषि कानून वापस नहीं लेते तो उनका हाल इंदिरा गाँधी जैसा होता। यह वीडियो 8 नवंबर 2021 का है। सत्यपाल मलिक के इस वीडियो पर फिल्म निर्माता अशोक पंडित भड़के हुए नजर आए। इसे लेकर उन्होंने ट्विटर पर गृह मंत्रालय, पीएम मोदी को टैग करते हुए शिकायत भी की है। साथ ही लिखा, “उन्हें अपने इस गैर जिम्मेदाराना बयान के लिए इस्तीफा दे देना चाहिए।”

हाल में सत्यपाल मलिक को ग्लोबल जाट समिट में स्पीकर के तौर पर आमंत्रित किया गया था। इस दौरान वह कहते हैं, “आप सिखों को नहीं हरा सकते। उनके गुरु के चार बच्चे उनकी मौजूदगी में मारे गए थे, लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। आप इन जाटों को भी नहीं हरा सकते हैं।”

उन्होंने धमकी देते हुए कहा, “अगर आपको लगता है कि किसान प्रदर्शनकारी अपने आप वापस चले जाएँगे, तो ये आपकी गलतफहमी है। उन्हें कुछ दें (उनकी माँगों को स्वीकार करें) और उन्हें जाने दें। लेकिन दो काम मत करो। सबसे पहले उनके खिलाफ बल प्रयोग न करें। दूसरा उन्हें खाली हाथ घर न भेजें, क्योंकि वे (सिख) आसानी से नहीं भूलते, 300 साल बाद भी नहीं भूलते हैं।”

सत्यपाल मलिक ने कहा कि ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद इंदिरा गाँधी को भी उनके आने वाले भाग्य के बारे में पता था। जब इंदिरा ने अकाल तख्त को नष्ट किया, तो उन्होंने अपने फार्महाउस पर ‘महा मृत्युंजय यज्ञ’ किया। अरुण नेहरू मेरे अच्छे दोस्त थे, उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया था। उन्होंने इंदिरा गाँधी से कहा था कि आप तो इसे नहीं मानती थीं तो फिर ये सब क्यों रही हैं? इस पर इंदिरा ने अरुण नेहरू से कहा था कि तुझे नहीं पता जिनका अकाल तख्त तोड़ा है, वो तो 600 साल भी नहीं भूलते हैं। मुझे विश्वास है कि ये मुझे मारेंगे। मलिक आगे कहते हैं कि इंदिरा गाँधी इस खतरे को भाँप गई थीं कि वे उन्हें मारेंगे और वही हुआ। सत्यपाल मलिक ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “जनरल वैद्या को सिक्खों ने पुणे में मारा, जनरल डायर को लंदन में मारा। मैंने इनसे यह भी कहा था कि आप इनके धैर्य की परीक्षा मत लो।”

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार देश को संबोधित करते हुए 19 नवंबर को तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की थी। साथ ही उन्होंने आंदोलनरत किसानों से अपने-अपने घर लौटने का आग्रह किया था।