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निहंगों ने ‘लखबीर सिंह’ का शव उतारते समय मचाया उत्पात: कुंडली बॉर्डर पर बर्बर हत्या के मामले में FIR दर्ज, जानिए कौन है मृतक

तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे कथित किसान प्रदर्शन स्थल के पास एक युवक की बर्बर तरीके से हत्या करने के मामले में FIR दर्ज की गई है। ऑपइंडिया ने मामले में दर्ज FIR को एक्सेस किया है। FIR में कहा गया है कि जिस स्थान पर किसानों का विरोध चल रहा है, उस स्थान पर हाथ, पैर कटे हुए व्यक्ति का शव सुबह 5 बजे मिला था। प्राथमिकी दर्ज करने के समय उस व्यक्ति की पहचान अज्ञात थी।

कुंडली बॉर्डर पर युवक की हत्या मामले में दर्ज FIR

प्राथमिकी में कहा गया है कि एक पुलिस निरीक्षक एक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने देखा कि व्यक्ति के शरीर पर केवल उसका अंडरगारमेंट था। उसके हाथ और पैर कटे हुए थे। उसे पुलिस बैरिकेड्स से लटका दिया गया था। मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 और धारा 304 के तहत FIR दर्ज की गई है। मामले की जाँच के आदेश दिए गए हैं।

कुंडली बॉर्डर पर युवक की हत्या मामले में दर्ज FIR

पुलिस ने प्राथमिकी में उल्लेख किया है कि उनकी टीम को स्थानीय लोगों ने बताया था कि निहंगों ने एक युवक का हाथ काट कर उसे पुलिस बैरिकेट से लटका दिया। इसके बाद वो लोग मौके पर पहुँचे। पुलिस टीम जब मौके पर पहुँची तो निहंग समुदाय के लोगों की भारी भीड़ वहाँ पर जमा हो गई थी। हालाँकि, उनमें से किसी ने भी उनकी जाँच में पुलिस की मदद नहीं की और पुलिस बैरिकेड्स से मृतक के शव को हटाने के लिए पुलिस का विरोध किया।

हालाँकि FIR में पीड़ित की पहचान का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन जाँच से जुड़े सूत्रों ने ऑपइंडिया को बताया कि कुंडली सीमा पर जिस व्यक्ति को बेरहमी से काटकर मार डाला गया था, उसकी पहचान हरनाम सिंह के पुत्र लखबीर सिंह के रूप में हुई है। 35 वर्षीय सिंह चीमा खुर्द गाँव के रहने वाले थे और एससी समुदाय से थे। उनके परिवार में बहन राज कौर, अलग हो चुकी पत्नी जसप्रीत कौर और तीन बेटियाँ हैं। सिंह का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही उनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध था।

मामले पर बोलते हुए, डीएसपी हंसराज ने कहा कि शव सुबह 5 बजे उस स्थान पर मिला, जहाँ किसानों का विरोध चल रहा था। उन्होंने आगे कहा कि जाँच शुरू कर दी गई है और पुलिस को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि इस कृत्य के लिए कौन जिम्मेदार है। दिलचस्प बात यह है कि पुलिस ने कहा है कि उन्हें पता नहीं है कि अपराधी कौन है, जबकि निहंगों के वो वीडियो सोशल मीडिया पर हैं जिन्होंने इस भीषण हत्या की जिम्मेदारी ली है।

निहंगों ने ‘ईशनिंदा की सजा’ के रूप में हत्या को सही ठहराया

दिल्ली-हरियाणा के सिंघु बॉर्डर पर 35 साल के एक युवक की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। युवक का शव आंदोलनकारियों के मुख्य मंच के पास शुक्रवार सुबह लटका मिला। हत्या का आरोप निहंगों पर लगा है। युवक के शरीर पर धारदार हथियार से हमले के निशान हैं। आरोपितों ने युवक का हाथ काटकर शव को बैरिकेड से लटका दिया। युवक की हत्या के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया और किसानों ने पुलिस को मौके पर पहुँचने से रोक दिया।

द न्यू इंडियन के अनुसार, पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को कथित रूप से अपवित्र करने के आरोप में गुरुवार रात निहंग सिखों ने एक अज्ञात व्यक्ति की हत्या कर दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना तड़के करीब साढ़े तीन बजे की है। सोशल मीडिया पर एक और वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें बुरी तरह से पीटा गया, बेरहमी से घायल पीड़ित जमीन पर बेबस पड़ा नजर आ रहा है जबकि कुछ नाराज निहंग उसे घेरे हुए है। आदमी का कटा हुआ हाथ उसके बगल में पड़ा हुआ दिखाई दे रहा है।

कैदी नंबर 956 आर्यन की रिहाई के लिए माँ गौरी खान ने रखी ‘मन्नत’, नहीं खाएँगी ‘मीठा’

ड्रग्स केस में बेटे आर्यन खान की गिरफ्तारी के बाद से पिता शाहरुख खान और माँ गौरी खान की नींदे उड़ीं हुईं हैं। एक तरफ लाख कोशिशों के बावजूद बेटे को जमानत नहीं मिल रही, दूसरी तरफ जेल की मुश्किल भरी जिंदगी है। ये सोच-सोच कर कि आर्यन कैसे दिन काट रहे होंगे, गौरी खान परेशान हैं। अब इन मुश्किलों से बाहर निकलने के लिए उन्होंने भगवान की शरण ली है।

गौरी ने माँगी ‘मन्नत’

शाहरुख खान और गौरी खान के एक पारिवारिक मित्र ने ‘इंडिया टुडे’ को बताया है कि शाहरुख और गौरी दोनों की हर बीतते दिन के साथ चिंता बढ़ती जा रही है। गौरी ने बेटे के लिए नवरात्रि में मन्नत माँगी हैं। आमतौर पर ये धारणा है कि मन्नत पूरी होने के लिए अपनी कोई सबसे प्यारी चीज छोड़ी जाती है। ऐसे में गौरी ने मीठा खाना पूरी तरह से छोड़ दिया है। अब जब तक उनके लाडले आर्यन घर नहीं आ जाते, गौरी मीठे को हाथ भी नहीं लगाएँगी।

आगे एक्टर के करीबी दोस्त ने कहा कि शाहरुख खान ने अपने सेलिब्रिटी दोस्तों से भी बार-बार मन्नत नहीं आने की गुजारिश की है। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि शाहरुख खान और गौरी ने अपने परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों से आर्यन के लिए प्रार्थना करने के लिए कहा है। हालाँकि, सलमान खान अब तक कई बार मन्नत आ चुके हैं।

गुरुवार को जमानत की थी उम्मीद

वहीं, शाहरुख खान की मैनेजर पूजा डडलानी ने भी इंस्टाग्राम पर देवी दुर्गा की फोटो शेयर की है। यह तस्वीर उन्होंने 14 अक्टूबर की सुनवाई से पहले शेयर की थी। उन्होंने लिखा, ‘शुक्रिया माता रानी’। ऐसी अटकलें लगाई जा रहीं थीं कि शायद गुरुवार को आर्यन को जमानत मिल जाए, पर ऐसा हो न सका। कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर अब 20 अक्टूबर को फैसला देने का निर्णय किया है।

आर्थर रोड जेल में कैदी नंबर 956 बने आर्यन खान

आर्यन खान को फिलहाल मुंबई के आर्थर रोड जेल में रखा गया है। पहले उन्हें क्वारंटीन बैरक दिया गया था, लेकिन अब वह नॉर्मल बैरक में आ गए हैं। आर्यन खान को आर्थर रोड जेल में 956 कैदी नंबर दिया गया है। जेल में रहते हुए यही उनकी पहचान होगी और इसी नंबर से उन्हें बुलाया जाएगा। सभी ट्रायल वाले कैदियों को नंबर दिया जाता है और इसीलिए आर्यन खान को भी नंबर मिला है। 

इसके अलावा, आर्यन खान को जेल की कैंटीन से खाना खाने के लिए उनके परिवार से मनी ऑर्डर मिला है। परिवार ने 11 अक्टूबर को आर्यन के लिए 4500 रुपए भेजे हैं। जेल के नियमों के अनुसार, एक कैदी को एक महीने में सिर्फ 4500 रुपए का मनी ऑर्डर पाने की इजाजत है।

ये है पूरा मामला

बता दें कि आर्यन खान को एनसीबी ने 2 अक्टूबर को मुंबई से गोवा जा रहे जहाज में ड्रग्स पार्टी के दौरान एनसीबी ने छापेमारी कर गिरफ्तार किया था। इसके बाद से ही आर्यन खान जेल में है। हालाँकि, आर्यन खान की जमानत याचिका पर 14 अक्तूबर को स्पेशल एनडीपीएस कोर्ट में कई घंटे तक सुनवाई चली, लेकिन कोर्ट ने 20 अक्टूबर तक फैसला सुरक्षित रख लिया।

पंजाब में सिख ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों ने रामलीला के मंचन में पहुँचाई बाधा, दर्शकों पर किए हमले, FIR दर्ज: ऑपइंडिया Exclusive

9 अक्टूबर 2021 (शनिवार) को पंजाब के रूपनगर में सिखों के एक समूह ने रामलीला मैदान में घुसकर श्री सनातन धर्म रामलीला समिति द्वारा आयोजित की जा रही रामलीला में बाधा पहुँचाई थी। इस मामले में विस्तार से जानकारी के लिए ऑपइंडिया ने रामलीला के आयोजकों, वहाँ मौजूद कार्यकर्ताओं और पुलिस से बातचीत की।

श्री सनातन धर्म रामलीला समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजू जैन ने ऑपइंडिया को बताया, “शनिवार को रामलीला रात 9 बजे शुरू होने वाली थी। उस दिन मुख्य अतिथि पास के गाँव में रहने वाले संत बाबा सुखबीर सिंह कंधोला वाले थे। उनके कार्यक्रम स्थल पर पहुँचते ही सिखों का एक समूह रामलीला परिसर में घुस गया और उन्हें व वहाँ मौजूद अन्य लोगों को गालियाँ देना शुरु कर दिया।”

सब कुछ किसान आंदोलन के बहाने हुआ

जैन के अनुसार, हमलावर खुद को किसान बता रहे थे और वो अपना विरोध प्रकट करने की बात कह रहे थे, लेकिन उनके इरादे अलग ही लग रहे थे। विरोध के लिए उन सभी ने किसान आंदोलन को बहाना बनाया था, लेकिन असलियत कुछ और ही थी। उन्होंने मुख्य अतिथि संत सुखबीर को बुलाया और उनसे पूछा कि एक सिख होकर वो हिन्दुओं के त्योहार में कैसे शामिल हुए? इसी के साथ उन्होंने संत सुखबीर को फौरन वहाँ से चले जाने को कहा।

जैन के मुताबिक, जब संत सुखबीर सिंह ने उनका विरोध किया तब माहौल हिंसक हो उठा। हिन्दू और सिख एकता की बात करते हुए संत सुखबीर ने उन्हें शांत करने की कोशिश की। संत सुखबीर ने ये भी बताया कि भगवान राम, वाहेगुरु और गुरु नानक एक ही हैं और सभी हमारे हैं, लेकिन हमलावरों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उल्टे वो आक्रामक हो गए और गालियाँ देने लगे। जब हमने बीच-बचाव करने की कोशिश की तब हमें और वहाँ मौजूद लोगों को धमकाया गया और रामलीला बंद करने की चेतावनी दी गई।

पुलिस ने हमलावरों को तितर-बितर किया

मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोजकों ने एसएसपी से शिकायत की। इसके बाद संबंधित SHO पुलिस बल के साथ रामलीला मैदान पहुँचे और हमलावरों को तितर-बितर किया। आयोजकों ने इस घटना की शिकायत एसएसपी और जिला कलेक्टर से की है।

आयोजकों ने दर्ज की शिकायत

अपनी शिकायत में आयोजकों ने जिला कलेक्टर से हिन्दुओं और सिखों को बाँटने की साजिश रचने वाले उपद्रवियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है, ताकि ऐसी घटना दोबारा ना हो। साथ ही आयोजकों ने चेतावनी भी दी है कि यदि हमलावरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न हुई तो हिन्दू समाज अपने मंदिरों और संगठनों को बंदकर के चाबी प्रशासन को सौंप देगा। इसके अलावा, रामलीला को भी बंद कर दिया जाएगा।

आयोजकों द्वारा दर्ज शिकायत

दबाव के बाद पुलिस ने दर्ज की FIR

इस मामले में ऑपइंडिया ने श्री शिवशक्ति प्रभात फेरी सेवा समिति के हरमिंदर पाल सिंह से बातचीत की। घटना के बारे में बात करते हुए सिंह ने कहा कि जब संत सुखबीर ने हमलवारों से हिन्दुओं और सिखों को न बाँटने की अपील की, तब उन्हें गाली दी गई। संत सुखबीर ने यह भी बताया कि वो स्वयं किसान आंदोलन के लिए 50 लाख से अधिक का दान दे चुके हैं। इसी के साथ उन्होंने किसान आंदोलन को राजनैतिक और धार्मिक रंग न देने की भी अपील की। हालाँकि, हमलावरों पर उनकी बातों का कोई असर नहीं पड़ा। हमलावर लगातार कहते रहे कि सिख होने के कारण उन्हें हिन्दुओं के कार्यक्रम में नहीं शामिल होना चाहिए।

सिंह ने आगे बताया कि घटना के अगले ही दिन हमलावरों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई गई थी, लेकिन उन पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। पुलिस की इसी निष्क्रियता के चलते विरोध प्रदर्शन का फैसला लिया गया। इस विरोध प्रदर्शन के तहत मंगलवार (12 अक्टूबर 2021) को सभी दुर्गा पंडालों और रामलीला मंचों के साथ अन्य धर्मस्थलों की लाइटें बंद कर दी गई थीं।

हरमिंदर ने आगे कहा कि विरोध के कारण ही प्रशासन पर दबाव बना। इसके बाद डीसी और एसएचओ उनके पास पहुँचे और विरोध प्रदर्शन बंद करने की अपील की। प्रशासन ने हमलावरों के विरुद्ध FIR दर्ज करने की माँग को भी मान लिया। इसके बाद पंडालों की लाइटें जला दी गईं और धार्मिक कार्यक्रम फिर से शुरू किये गए। हालाँकि, हरमिंदर सिंह के अनुसार, बुधवार (13 अक्टूबर 2021) तक प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

पुलिस की निष्क्रियता के विरोध में तमाम हिंदू संगठन एकजुट होकर रामलीला मैदान में धरने पर बैठ गए। इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने फिर से आयोजकों को बुलाया, पर उन्होंने आने से मना कर दिया। हरमिंदर सिंह के अनुसार, उन्हें पता था कि पुलिस मुकदमा दर्ज करने के बजाय हमलावरों से माफी माँगने की बात कहेगी। इसीलिए धरना दे रहे लोगों ने साफ कर दिया कि प्रशासन द्वारा FIR की कॉपी भेजे जाने के बाद ही वो मिलने आएँगे।

हमलावरों पर दर्ज हुई FIR

आखिरकार पुलिस ने हमलावरों के विरुद्ध धारा 296 (धार्मिक आयोजन में व्यवधान), 506 (आपराधिक धमकी) और 341 (गलत तरीके से रोकना) के तहत FIR दर्ज कर ली। इस मामले की अधिक जानकारी के लिए ऑपइंडिया ने रूपनगर के एसएसपी विवेकशील सोनी से बातचीत की। एसएसपी सोनी ने बताया कि रामलीला मैदान में मौजूद लोगों पर हमला करने वाले किसान संघ के सदस्य थे। उन्हें लगा कि वहाँ भाजपा नेताओं का दौरा है इसलिए वो वहाँ विरोध प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे। एसएसपी के अनुसार, आरोपितों को लगा कि भाजपा एक धार्मिक आयोजन को राजनैतिक कार्यक्रम में बदलना चाह रही है।

एसएसपी सोनी ने कहा कि आयोजकों ने कार्रवाई की माँग की थी, जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया है। हमलावरों द्वारा साम्प्रदायिकता फैलाने के आरोपों के सवाल पर एसएसपी ने कहा कि हमलावरों की असली मंशा जाँच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।

क्या कहती है FIR?

श्री सनातन धर्म रामलीला समिति के महासचिव अश्विनी कुमार द्वारा दिए गए बयान के आधार पर पुलिस ने दलजीत सिंह गिल, जगजीत सिंह व कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।

FIR की कॉपी

मामले में शिकायतकर्ता अश्वनी कुमार ने पुलिस में बयान दर्ज करवाया है। बयान में उन्होंने कहा कि जब रामलीला शुरू होने वाली थी, तब दलजीत सिंह गिल और उनके भाई जगजीत सिंह गिल अपने कुछ साथियों के साथ मैदान में पहुँचे। इन सभी के हाथों में डंडे थे। इन सभी ने संत सुखबीर को रामलीला परिसर में घुसने से रोका और जब उन्होंने समझाने की कोशिश की तब वे नारेबाजी करने लगे। उन्होंने संत सुखबीर और अन्य उपस्थित लोगों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया। इस घटना के बाद संत सुखबीर रामलीला में शामिल हुए बिना ही मैदान से बाहर चले गए। घटना की सूचना आयोजकों ने पुलिस को दी। पुलिस को देखते ही हमलावरों ने अपने हथियार छिपा लिए और हाथों में किसान आंदोलन के झंडे उठा लिए।

शिकायतकर्ता अश्विनी कुमार ने ऑपइंडिया को बताया, “हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और हम ये नहीं चाहते कि हिंदुओं और सिखों के बीच कोई दरार पैदा हो। फिर भी इसका ये मतलब नहीं है कि हम अपने धर्म पर इस तरह के किसी हमले को सहन करेंगे। इसलिए हम इस मामले में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई चाहते हैं।” अश्विनी ने बताया कि आरोपितों ने किसान आंदोलन के बहाने रामलीला को रोकने का प्रयास किया। अश्विनी ने ये भी कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा ना हों, इसलिए वो चाहते हैं कि दोषियों को कानून सजा दे।

70 सालों से आयोजित हो रही है रामलीला

ऑपइंडिया से बात करते हुए जैन ने बताया कि श्री सनातन धर्म रामलीला समिति 70 वर्षों से हर साल रामलीला का आयोजन करती आ रही है। केवल पिछले साल कोविड-19 महामारी के दौरान रामलीला नहीं हो पाई थी। घटना के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे पहले कभी भी ऐसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा था।

‘ये तो कसाई हैं, किसान थोड़े हैं’: कुंडली बॉर्डर पर युवक की बर्बर हत्या के बाद कसार के सरपंच ने याद दिलाया कैसे जिंदा जलाया गया था मुकेश

शुक्रवार (15 अक्टूबर 2021) को किसानों के प्रदर्शन स्थल से एक और बर्बरता की खबर आई। कथित तौर पर निहंग सिखों ने कुंडली बॉर्डर पर एक युवक के पहले हाथ, ऊँगलियाँ और गर्दन काटी। फिर उसके शव को संयुक्त किसान मोर्चा के मंच के पीछे लटका दिया। इस घटना ने एक बार फिर 16 जून 2021 की उस घटना की याद दिला दी है, जब टिकरी बॉर्डर पर किसानों के टेंट में बहादुरगढ़ के कसार गाँव के 42 साल के मुकेश मुद्गिल को जिंदा जलाने की खबर सामने आई थी।

कसार के सरपंच टोनी कुमार ने कुंडली बॉर्डर की घटना का जिक्र करते हुए ऑपइंडिया को बताया, “ये तो कसाई हैं। किसान थोड़े हैं। किसान लोगों की हत्या नहीं करेंगे। ये लोगों को काटकर टाँग दे रहे, सोचो आप ये किस तरह के लोग हैं।” उन्होंने कहा कि इस संबंध में सरकार को सोचना चाहिए और कुछ एक्शन लेना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि मुकेश के साथ हुई घटना के बाद उनलोगों ने बॉर्डर पर जमे कथित किसानों को हटाने की जो मॉंग की थी उसमें क्या हुआ, सरपंच बताते हैं, “हमलोग आवेदन देते-देते थक गए, कुछ नहीं हुआ। ये प्रशासन के वश का नहीं है। हमलोग पहले उनकी (किसान प्रदर्शनकारियों) मदद करते थे। बुलाने पर उनकी बैठक में जाते थे। लेकिन, मुकेश के साथ हुई घटना के बाद हमलोगों ने जाना बंद कर दिया और न ही उनकी किसी तरह की मदद करते हैं।”

मुकेश के मामले में उन्होंने बताया कि पीड़ित परिवार को अब तक 7 लाख रुपए की आर्थिक मदद मिली है। इसमें से 5 लाख रुपए बीजेपी के स्थानीय विधायक नरेश कौशिक की तरफ से और 2 लाख रुपए हिसार की राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा नामक संस्था की ओर से दी गई है। सरपंच का यह भी दावा है कि मुकेश की विधवा को सरकारी नौकरी और आर्थिक मुआवजा सरकार की तरफ से दिए जाने की भी प्रक्रिया चल रही है।

हालाँकि मुकेश के छोटे भाई मंजीत ने ऑपइंडिया को बताया कि सरकार की तरफ से अब तक उनको कोई मदद नहीं मिली है। इस संबंध में सरपंच के दावे को लेकर पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “प्रधान जी हमारे बड़े भाई हैं। वे अपने स्तर से प्रयास कर रहे होंगे तो हमें इसकी जानकारी नहीं है।” मंजीत कहते हैं, “हमारी सरकार से केवल यह माँग है कि उनकी भाई की हत्या में जो दोषी हैं, उनको सजा मिले और उनके भाई की पत्नी को नौकरी मिल जाए ताकि परिवार का भविष्य बन जाए।” मंजीत ने यह भी बताया कि समाज के तरफ से उनलोगों को करीब 5 लाख रुपए की आर्थिक मदद अब तक मिली है। कथित किसान प्रदर्शन के कारण होने वाली समस्या को लेकर वे कहते हैं, “हमारा इनसे कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है। पूरे बहादुरगढ़ के लोग इनसे परेशान हैं। पर हमलोग क्या कर सकते हैं। जो करना है सरकार को ही करना है।”

गौरतलब है कि मुकेश को जिंदा जलाए जाने की खबर आने के बाद जब ऑपइंडिया की टीम कसार पहुँची थी तो ग्रामीणों ने बताया था कि कथित किसान प्रदर्शनकारी नशे में धुत होकर उनलोगों को परेशान करते हैं। प्रशासन को दी एक शिकायत में ग्रामीणों ने कहा था, “पिछले 6-7 महीनों से गाँव कसार के साथ लगती सड़क पर कथित किसानों ने गदर मचा रखा है। ये गाँव में आकर शराब पीकर हुड़दंग करते हैं। ट्रैक्टर पर घूमते हैं। महिलाओं से छेड़खानी करते हैं। इन्हें तुरंत प्रभाव से गाँव कसार की परिधि से हटाया जाए।” मुकेश की विधवा रेणु ने उस समय हमें बताया था, “ये जो लोग (किसान प्रदर्शनकारी) पड़े हैं, वही ये काम (मुकेश को जिंदा जलाना) किए हैं। ये लोग किसान नहीं हैं। ये लोग अपराधी हैं। दारू पिए रहते हैं। होश में नहीं रहते हैं। एक साल हो गया ये लोग जा नहीं रहे यहाँ से। गदर मचा रखा है यहाँ पर।”

मुकेश के साथ क्या हुआ था?

जगदीश चंद्र की तीन संतानों में 42 साल का मुकेश सबसे बड़ा था। लॉकडाउन में काम छूट गया था तो ज्यादातर समय गाँव में ही रहता था। इसी दौरान अपने गाँव से सटे बाइपास पर कब्जा जमाए कुछ प्रदर्शनकारियों के संपर्क में वह आया था। 16 जून की रात करीब 9 बजे परिजनों को उसे जिंदा जलाने की खबर मिली थी।

मुकेश की माँ शकुंतला ने ऑपइंडिया को बताया था कि वह घर में खाना बनाने के लिए कहकर निकला था। बाद में उन्हें पता चला कि उनके बेटे को शराब पिलाकर कुछ लोगों ने जिंदा जला दिया। मुकेश की पत्नी रेणु ने बताया था, “उन्होंने कहा था खाना बनाकर रखना मैं जल्दी आ जाऊँगा। मैंने कहा कि अपना फोन लेकर जाइए तो कहा कि नहीं, मैं जल्दी आ जाऊँगा।” मुकेश के छोटे भाई मंजीत ने बताया था कि जब वे लोग मौके पर पहुँचे तो मुकेश जला हुआ था। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जान नहीं बची।

मंजीत ने बताया था, “सिविल हॉस्पिटल में हमने भाई से इस घटना के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि तीन-चार आदमी थे। उन्होंने उसे रोक लिया और कहा कि ‘इकट्ठा’ ही घर भेज देंगे।” गाँव के सरपंच टोनी कुमार ने बताया था, “जब मैं मौके पर पहुँचा तो मुकेश बुरी तरह जल चुका था। उसे जब हम सिविल हॉस्पिटल बहादुरगढ़ लेकर जा रहे थे तो उसने बताया कि उसके ऊपर एक किसान ने तेल गिरा दिया और एक ने माचिस लगा दी। उसने इनके नाम भी बताए। कृष्ण, प्रदीप, संदीप।”

‘हिंदुओं के मुहल्ले में बन गए 40 मुस्लिम घर’: मुस्लिम भीड़ ने ‘मासूम का ताजिया’ में मचाया उत्पात: तोड़ा पुलिस बैरिकेड और हिंदू कॉलोनी का गेट

दक्षिण दिल्ली के बीके दत्त कॉलोनी में वृहस्पतिवार (14 अक्टूबर 2021) को ‘मासूम का ताज़िया’ लेकर निकली भीड़ सुरक्षा के लिए तैनात दिल्ली पुलिस से भिड़ गई। रास्ते में लगे बैरिकेड के पास तैनात पुलिसकर्मियों से बहस करने के बाद भीड़ बैरिकेड तोड़कर जबरन आगे बढ़ने लगी। इस मामले से संबंधित वीडियो को दिल्ली भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सुनील यादव ने अपने ट्विटर हैंडल पर शेयर किया है।

इस घटना को कॉलोनी में ‘भय का माहौल’ बताते हुए सुनील यादव ने दिल्ली पुलिस से सुरक्षा की माँग की है। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, “मुस्लिम समुदाय की उन्मादी भीड़ ने केजरीवाल के विधानसभा क्षेत्र नई दिल्ली की बीके दत्त कॉलोनी के सारे गेट तोड़ दिए हैं। समुदाय विशेष के लोगों ने महानवमी के दिन जमकर उत्पाद मचाया है। हिन्दू समाज के लोग डर के मारे घरों में कैद हैं। भय का जबरदस्त माहौल बना हुआ है।” इसी के साथ सुनील यादव ने #SaveBKDuttPeoples नाम से हैशटैग भी चलाया है।

भाजपा नेता सुनील यादव ने इस घटना का एक दूसरा वीडियो भी शेयर किया है। इसमें उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर निशाना साधा है। ट्वीट में लिखा है, “केजरीवाल की विधानसभा नई दिल्ली के बी.के दत्त में मुस्लिम समुदाय के लोग लगातार हुड़दंग मचा रहे हैं लोग भय के डर में जी रहे हैं। कहाँ हैं केजरीवाल जी आप? आपके क्षेत्र के लोग भय के साये में हैं। छठ पूजा को केजरीवाल परमिशन नहीं देते, लेकिन हुड़दंगियों को खुली परमिशन दी हुई है।” सुनील यादव के इस ट्वीट को दिल्ली भाजपा के आधिकारिक हैंडल ने रीट्वीट भी किया है।

सुनील यादव ने अपना और अपने परिवार की सुरक्षा की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जाहिर की। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, “मुस्लिम समुदाय के लोग घर के सामने बेवजह एकत्रित होकर हंगामा कर रहे हैं। पूरे परिवार में भय का वातावरण बन रहा है। परिवार वालों को डर लग रहा है कि कहीं ये लोग कोई हादसा न कर दें। दिल्ली भाजपा उपाध्यक्ष होने के नाते कृपया दिल्ली पुलिस व संबंधित अधिकारी सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।”

इस घटना को पत्रकार नामित त्यागी ने भी अपने हैंडल पर शेयर किया है। नामित ने लिखा, “आज दिल्ली के बीके दत्त कॉलोनी में उन्मादी भीड़ ने दंगे जैसे हालात बना दिए। समुदाय विशेष के लोगों ने महानवमी के दिन बिना अनुमति के जमकर उत्पाद मचाया। भड़काऊ भाषण दिए गए। हिन्दू समाज के लोग डर के मारे घरों में कैद हैं।”

इस घटना पर DCP दक्षिण दिल्ली ने मुकदमा दर्ज करके कार्रवाई की बात कही है। अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर उन्होंने लिखा, “मासूम का ताज़िया पर मुस्लिम समुदाय के लोग हर साल करबला, ज़ोर बाग पर इकट्ठा होते हैं। इस साल कोविड-19 के चलते भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बंदोबस्त भी लगाया गया था। इसी के चलते करबला के रास्ते के कुछ गेट पुलिस द्वारा बंद किए गए थे।”

उन्होंने अगले ट्वीट में कहा, “एक बंद गेट के पास रास्ता ना मिल पाने की वजह से भीड़ इकट्ठा हो गई थी। भीड़ ने बैरिकेड हटाकर रास्ता बना लिया था व कुछ लोग अंदर घुस गये थे। हालात को तुरंत सामान्य कर दिया गया था। इस सम्बंध में एक मुक़दमा भी दर्ज किया गया है।”

इस पूरे मामले पर ऑपइंडिया ने भाजपा नेता सुनील यादव से बात की। सुनील यादव ने बताया कि बीके दत्त कॉलोनी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के नाम पर है। यह कॉलोनी पाकिस्तान से भारत में शरण लिए हिन्दुओं के लिए सरकार द्वारा दी गई थी। इस कॉलोनी में पहले मुस्लिम समाज के मात्र 4 घर थे, जो धीरे-धीरे 40 की संख्या में कैसे हो गए ये किसी को नहीं पता।

सुनील यादव ने आगे बताया कि जिस जुलूस में विवाद हुआ, वो नई परम्परा चलाई गई है। कुछ साल पहले यह जुलूस नहीं निकलता था। कॉलोनी का नाम धीरे-धीरे मौखिक रूप से बटुकेश्वर दत्त के बजाय कर्बला कॉलोनी होता जा रहा है। भीड़ के भय के कारण कोई भी आवाज भी नहीं उठा पाता।

कल हुए विवाद पर बात करते हुए सुनील यादव ने कहा कि जानबूझकर महिलाओं को आगे किया गया था। महिलाओं के आगे होने के कारण पुलिस बल भी बैकफुट पर होता है। इन्हीं के पीछे हुड़दंग मचाने वाले छिपे होते हैं। अक्सर पुलिस बल भी इनकी भीड़ के आगे लाचार दिखता है।

भाजपा नेता ने ये भी बताया कि जुलूस में अक्सर बाहरी लोग शामिल होते हैं। पुलिस से विवाद और बैरिकेड तोड़ना कोई नई बात नहीं, बल्कि ऐसा हर साल होता रहता है। घटना के समय पूरी कॉलोनी के लोग डरकर खुद को घरों में बंद रखते हैं।

ऑपइंडिया ने इस मामले में दिल्ली के लोधी कॉलोनी थाने से बात की। पुलिस ने बताया कि घटना की एफआईआर दर्ज की गई है, जिसका FIR संख्या 193/2021 है। नामजद आरोपितों के नाम बहादुर अब्बास और जहीरुल हसन हैं। बहादुर अब्बास अंजुमन हैदरी दरगाह के जनरल सेक्रेटरी हैं और जहीरुल हसन इसी संस्था के मैनेजर। इन सभी के साथ अज्ञात लोगों पर धारा 186, 353, 188, 269 और महामारी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस आरोपितों की तलाश कर रही है। खबर लिखे जाने तक किसी आरोपित की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

ऑस्ट्रेलिया की जेल से रिहा हुए विशाल जूड, भड़के खालिस्तानियों ने अब मददगार रहे योगेश खट्टर पर किया हमला

ऑस्ट्रेलिया की जेल में कथित हेट क्राइम्स के मामले में बंद हरियाणा के रहने वाले विशाल जूड को रिहा कर दिया गया है। उनपर खालिस्तानियों ने झूठे आरोप लगाए थे। एनआरआई हेराल्ड ने बताया है कि जूड की रिहाई की पुष्टि उनके वकीलों ने की है। हालाँकि, खतरों को देखते हुए उनके स्थान से संबंधित जानकारी को छुपाया गया है।

एनआरआई हेराल्ड ने ट्वीट किया, “विशाल जूड के वकीलों ने पुष्टि की है कि विशाल को आज सुबह हिरासत से रिहा कर दिया गया। उनके खिलाफ जो धमकियाँ दी गई हैं, उन्हें देखते हुए उनके वर्तमान स्थान का खुलासा नहीं किया जाएगा।”

बीते 2 सितंबर को मजिस्ट्रेट के थॉमसन के पररामट्टा एलसी कोर्ट 13 ने 15 अक्टूबर, 2021 को विशाल जूड को रिहा करने का आदेश दिया था। रिपोर्टों के अनुसार, एक याचिका में एनएसडब्ल्यू विभाग के लोक अभियोजकों ने जूड पर लगाए के आठ नस्लीय आरोपों को हटा दिया था।

खालिस्तानियों की साजिश का शिकार बने थे विशाल

हरियाणा के रहने वाले 24 वर्षीय विशाल जूड ऑस्ट्रेलिया में हायर स्टडीज के लिए गए हैं। उन्हें वहाँ इसी साल 16 अप्रैल को 3 अपराधों में शामिल होने के आरोप में ऑस्ट्रेलियन अथॉरिटी ने अरेस्ट कर लिया था। भारतीय राष्ट्रवादियों के एक समूह की ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानियों के साथ झड़प के बाद ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने उनपर ये कार्रवाई की थी। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया में हिंदुओं ने विशाल के समर्थन में कैंपेन चलाया था।

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर से इस मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की थी। उन्होंने विदेश मंत्री को बताया कि कैसे विशाल ऑस्ट्रेलिया में देश विरोधी तत्वों के खिलाफ खड़ा हुआ था। इसके बाद 23 जून 2021 को भारतीय विदेश मंत्रालय ने उन्हें जूड को जल्द रिहा कराने का भरोसा दिया था।

विशाल के मददगार को खालिस्तानियों ने बनाया निशाना

विशाल जूड की जेल से रिहाई के बाद अब खालिस्तानी और भारत विरोधी तत्वों ने ऑस्ट्रेलिया में उनकी मदद करने वाले योगेश खट्टर पर हमला किया है। न्यू साउथवेल्स आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रेसीडेंट योगेश खट्टर ने विशाल जूड को कानूनी लड़ाइयाँ लड़ने में मदद की थी।

योगेश का खालिस्तानी तत्वों को लेकर कहा कि वे उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं और इस बार खालिस्तानियों ने उन्हें भी उसी तरह फंसाने की कोशिश की जैसे उन्होंने विशाल जूड के साथ किया था।

खालिस्तानियों ने खट्टर पर 15 अक्टूबर को विशाल जूड की रिहाई से कुछ घंटे पहले हमले किए। दरअसल, योगेश खट्टर ने विशाल जूड की मदद की थी। इससे जाहिर तौर पर खालिस्तानी नाराज हो गए। ऑस्ट्रेलिया टुडे से बात करते हुए योगेश खट्टर ने हमले की पुष्टि की और कहा, “मैं आमतौर पर अपने व्यवसाय में देर तक काम करता हूँ, लेकिन कल थोड़ा जल्दी निकल गया। ऐसा लगता है कि हमलावर मुझे नहीं पा सके तो गुस्से में हमारे वाहनों को नष्ट कर दिया।”

उन्होंने आगे बताया कि 13 अक्टूबर की दोपहर को उन्हें एनएसडब्ल्यू पुलिस के बहुसांस्कृतिक संपर्क अधिकारी का फोन आया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक वीडियो चल रहा है। खट्टर ने कहा, “मैंने उन्हें फोन पर बताया कि मुझे किसी वीडियो के बारे में कोई जानकारी नहीं है और मैंने इसे नहीं देखा है। वीडियो में विशाल जूड की रिहाई पर ‘विजय रैली’ की अपील की गई थी। आश्चर्यजनक रूप से इसमें मेरी तस्वीर और फोन नंबर था।”

योगेश खट्टर ने कहा कि वह ज्यादातर हिंदू समुदाय की गतिविधियों से अवगत रहते हैं। लेकिन, अगर समुदाय के अन्य नेताओं और मुझे इस वीडियो के बारे में पता नहीं है तो इसका मतलब है कि किसी ने जानबूझकर इसे हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए बनाया है।

जनसंख्या नीति की जरूरत क्यों? मुस्लिम बहुल जिलों से समझिए समस्या को, खतरे में है लड़कियों का जीवन

भारत में जनसंख्या नीति के लिए एक व्यवस्थित कानून का माँग कोई नई नहीं है बल्कि यह दशकों से लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। साल 1992 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री एमएल फोतेदार ने संविधान का 79वाँ संशोधन विधेयक पेश किया। इसके अंतर्गत संसद एवं सभी राज्यों की विधानसभाओं में जिन निर्वाचित प्रतिनिधियों के दो से अधिक बच्चे थे, उनके चुनाव को अयोग्य ठहराने का प्रस्ताव पेश किया था।

हालाँकि, इस विधेयक पर हंगामा होना तय था, अतः इस पर चर्चा ही नहीं हुई और यह आज तक पारित होने की राह देख रहा है। उस दौरान संसद एवं विधानसभाओं में कितने सांसदों एवं विधायकों के दो से अधिक बच्चे थे, इसका कोई सटीक तथ्य उपलब्ध नहीं है। वास्तव में इस विधेयक को ससंद में पारित करवाना इतना भी आसान नहीं था। मगर केंद्र की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार की जनसंख्या नियमन की एक अनूठी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रस्तावित संशोधन के बाद कई राज्यों ने अपने यहाँ की पंचायतों में इसे लागू कर दिया।

इसके बाद देश की जनसंख्या पर एक नीति बनाने के लिए चर्चाओं का सिलसिला शुरू हो गया और साल 1992 से वर्तमान तक लगभग 22 निजी विधयेक पेश किए जा चुके हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सबसे पहले अप्रैल 1992 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति विधेयक को प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पेश किया था। यह सर्व-विदित है कि प्रतिभा देवी सिंह पाटिल आगे चलकर देश की 12वीं राष्ट्रपति बनी।

राष्ट्रीय जनसंख्या नीति विधेयक पर निजी विधेयक पेश करने वालों में भाजपा, कॉन्ग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, ऑल इण्डिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, तेलगू देशम पार्टी, बीजू जनता दल, और राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी जैसे दलों के सांसद शामिल रहे हैं। यानि जनसंख्या पर नीति की माँग सिर्फ एक दल की नहीं बल्कि देश के राष्ट्रीय और स्थानीय दोनों प्रकार के दलों की तरफ से समय-समय पर होती रही है।

साल 2010 में भी जनसंख्या को लेकर लोकसभा में एक बहस हो चुकी है। उस दौरान कॉन्ग्रेस के गुलाम नबी आजाद देश के परिवार एवं स्वास्थ्य कल्याण मंत्री थे और उन्होंने जनसंख्या के नियमन को लेकर अपनी स्वीकार्यता दी थी। इस विषय पर लगभग सभी दलों के 45 सदस्यों ने अपने मत रखे। बहस के दौरान मात्र चार सदस्यों ने जनसंख्या के नियमन को लेकर अपनी अस्वीकार्यता दिखाई थी। यह एक अभूतपूर्व कदम था जिसमें सदन के सभी दल जनसंख्या के नियमन को लेकर एकदम स्पष्ट थे लेकिन उस दिन लोकसभा में बस एकमात्र मतभेद देखने को मिला, जोकि नियमन के प्रकारों पर था। यानी नियमन किस तरह से किया जाए, इस पर सदस्यों के भिन्न-भिन्न मत थे।

विधायिका के इतर जनसंख्या असंतुलन के कारकों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। भारत की 1950 में कुल प्रजनन दर 5.9 प्रतिशत थी और 1960 की तक इस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया, लेकिन 1970 में मामूली गिरावट के साथ यह 5.72 हो गई। इसके बाद प्रजनन दर में 1990 के बाद से लेकर 2010 के बीच तेजी से कमी आनी शुरू हुई और 2020 में यह अपने न्यूनतम स्तर 2.24 पर है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुल प्रजनन दर के मामले में देश ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। लेकिन अभी जनसंख्या को लेकर ऐसे कई महत्वपूर्ण विषय हैं, जिन पर अब विचार करना होगा।

जैसे पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। यह जिला पश्चिम बंगाल का सबसे अधिक मुस्लिम बहुल है। यहाँ प्रश्न सिर्फ मुस्लिम आबादी का नहीं है बल्कि लड़कियों के विवाह को लेकर है। साल 2019-20 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार मुर्शिदाबाद में 18 वर्ष की उम्र से पहले लड़कियों के विवाह का प्रतिशत 55.4 है, जोकि देश में सबसे अधिकतम है। यही नहीं, जिले में सर्वेक्षण के दौरान 15-19 वर्ष की लड़कियाँ जो पहले से ही माँ अथवा गर्भवती थीं, उनका प्रतिशत 20.6 है।

लगभग यही कहानी असम के धुबरी जिले की है, जहाँ मुस्लिम आबादी 79.67 है। साल 2019-20 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार धुबरी में 18 वर्ष की उम्र से पहले लड़कियों के विवाह का प्रतिशत 50.8 है। साथ ही जिले में सर्वेक्षण के दौरान 15-19 वर्ष की लड़कियाँ जो पहले से ही माँ अथवा गर्भवती थीं, उनका प्रतिशत 22.4 है।

यह देश के सिर्फ दो जिलों की दुर्दशा नहीं है, जहाँ न सिर्फ समय से पहले लड़कियों के विवाह बड़े पैमाने पर हो रहे हैं, साथ ही साथ बेहद कम उम्र में वे माँ बन चुकी हैं अथवा गर्भवती हैं। इस दिशा में रोकथाम के लिए सरकारों ने कई प्रयास किए हैं लेकिन वह ज्यादा प्रभावी नहीं रहे हैं। इसलिए देश के कई हिस्सों में जरूरत से ज्यादा असंतुलन पैदा हो रहा है अथवा हो चुका है। विवाह की न्यूनतम आयु से संबंधित कानून के प्रचार-प्रसार एवं प्रवर्तन के प्रयास को लेकर देश में सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान ही एक सम्बंधित प्रस्ताव शामिल किया गया था। इसके बाद अथवा इससे पहले कोई ठोस व्यवस्था इस सन्दर्भ में नहीं की गई है।

दरअसल, कम उम्र में विवाह होना और माँ बनने से जनसँख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ असंतुलन भी पैदा हो जाता है। यही नहीं, इससे लड़कियों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी बुरा असर पड़ता है। अतः अब इस और भी ध्यान देने की जरूरत है। भारत में जनसंख्या पर अंकुश लगाने के साल 1951 से प्रयास जारी हैं। इस दौरान केंद्र सरकारों और राज्य सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर कई योजनाएँ, कार्यक्रम, जागरूक अभियान और कानून बनाए हैं। इससे भारत की एक बड़ी आबादी पर तो इसका सकारात्मक असर दिखाई देता है लेकिन मुर्शिदाबाद और धुबरी जिलों के जैसे अन्य कई जिलों में कुल प्रजनन दर अधिक बनी हुई है।

अतः अब जनसंख्या को लेकर एक ऐसी समग्र नीति की आवश्यकता है जोकि सम्पूर्ण देश के को लाभान्वित कर सके। यह तो तय है कि जनसंख्या नीति को लेकर सभी दलों की एक राय है। कुछ गतिरोध है जिन्हें संसद में सर्वदलीय समिति का गठन अथवा आपसी समझ के माध्यम से दूर किया जा सकता है।

हिंदुओं के पड़ोस में शौकत मंसूरी ने घर खरीदा… पहले भजन हराम हुआ, फिर वह सब कुछ हुआ जो आप सोच रहे हैं

गुजरात का भरूच। इसी शहर के सोनी फलियो (Soni Faliyo) इलाके में है बहादुर बुराज। यह इलाका अब अशांत क्षेत्र अधिनियम के अंतर्गत आता है। इसी इलाके में 2008 में शौकत मंसूरी ने एक घर खरीदा। उसके घर के पास ही जलाराम बापा मंदिर (Jalaram Bapa Temple) है। मंदिर में हर शाम 6:30 से 8 बजे के बीच घरों में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य स्पीकर पर भजन बजाया जाता। इसकी आवाज इतनी तेज नहीं होती थी कि आसपास रहने वालों को परेशानी हो। यह मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के सुनने के लिए पर्याप्त था।

करीब तीन साल पहले शौकत को मंदिर में होने वाले भजन से परेशानी होने लगी। उसने शिकायत की। इसी इलाके में रहने वाले मे​हुल पटेल ने ऑपइंडिया को बताया कि भजन और आरती का विरोध करने के लिए शौकत का बेटा एक बड़ा सा डीजे स्टाइल वाला स्पीकर लेकर आ गया। इस पर उसी समय इस्लामी उपदेश बजाने लगा जब मंदिर में भजन-आरती का समय होता।

पटेल के अनुसार उस समय पुलिस ने भी हिंदुओं को ही दोषी ठहरा दिया। फिर अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू हुआ। इलाके में कई घरों की खरीद-बिक्री कानून की खामी का फायदा उठाकर किया गया। उन्होंने बताया कि 2008 में जब शौकत मंसूरी मोहल्ले में रहने आया तो पड़ोसियों से घुलने-मिलने और उनका भरोसा जीतने के लिए उसने उपहार में साड़ी और बर्तन बाँटे। 2011 में इसी शौकत ने सामुदायिक क्षेत्र में लोगों को बैठने से रोकने के लिए पड़ोस के कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया।

भारत के छोटे शहरों के हर इलाके में ऐसे सार्वजनिक जगह होते हैं जहाँ बच्चे खेलते हैं। बुजुर्ग क्रिकेट से लेकर राजनीति तक पर चर्चा करते हैं। भजन गाते हैं और इस तरह की तमाम दूसरी चीजें करते हैं। लेकिन शौकत ने यहाँ आने वाले लोगों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया। यहाँ तक कि बच्चों का क्रिकेट खेलना बंद करवा दिया।

पटेल कहते हैं, “मैं एक निम्न मध्यम वर्ग की पृष्ठभूमि से आता हूँ। एक बार किसी ने उसकी गाड़ी की सीट फाड़ दी तो उसने मुझ पर आरोप लगा दिया और मेरे खिलाफ मामला दर्ज कराया। मैंने महीनों मानसिक प्रताड़ना झेली। उस समय मैं पढ़ाई कर रहा था और यह मेरे लिए मुश्किल समय था।”

अब हालत यह है कि हिंदुओं ने ‘बिक्री के लिए है’ का बैनर लगा रखा है। इस संबंध में पटेल बताते हैं, “हमने पुलिस को मंदिर में एक स्पीकर लगाने के लिए एक आवेदन दिया था। ठीक वैसे ही जैसे मस्जिदों में स्पीकर होते हैं। इससे मंसूरी नाराज हो गया और एक दिन मंदिर में तैयारी के लिए जाने वाले लड़कों में से एक को रोक लिया। मंसूरी और उसके तीन अन्य मुस्लिम पड़ोसियों, जो उसके रिश्तेदार भी हैं, ने पुलिस से शिकायत कर प्राथमिकी दर्ज कराई। हमने भी उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई।”

जून 2021 में शौकत मंसूरी और अन्य के खिलाफ की गई शिकायत

शिकायत में स्थानीय लोगों ने ने बताया कि वे हर शाम 30 मिनट से एक घंटे तक भजन बजाते हैं। उनका आरोप है कि शौकत मंसूरी, इकबाल मंसूरी, शगुफ्ता इकबाल मंसूरी, इमरान मंसूरी और तस्लीम इमरान मंसूरी ने भजन बजाने गए शख्स से इसे बंद करने को कहा। शिकायत में कहा गया है, “आज वे फिर से भीड़ में आए और भजन बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि भजन इस्लाम में हराम है। भजन और आरती ‘हमारे इलाके’ में बंद होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हम मुसलमान यहाँ रहते हैं और यहाँ भजन नहीं बजनी चाहिए। जलाराम साईं मंदिर और शिव मंदिर कई वर्षों से है और ये मुस्लिम, हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करना चाहते हैं।”

बाद में 11 जून 2021 को शौकत मंसूरी, इमरान मंसूरी, तसलीम मंसूरी और शगुफ्ता मंसूरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने बताया कि मामला दर्ज कर जाँच जा रही है।

हालाँकि, पटेल का आरोप है कि शिकायत दर्ज होने के बाद मंसूरी और उसके रिश्तेदार फिर से उन्हें धमकी देने आए। इसके बाद उन्होंने एक और अर्जी दी। दूसरी शिकायत के अनुसार, जिसकी एक प्रति ऑपइंडिया के पास है, उबेद मंसूरी, शगुफ्ता मंसूरी, जुलेखा मंसूरी, शौकत मंसूरी की पत्नी और दो अन्य मुस्लिम महिलाओं ने शिकायत दर्ज कराने वाले दर्पण चौहान, चेतन पटेल और गौरांग राणा पर दबाव बनाने की कोशिश की। शिकायत में कहा गया है कि जब उन्होंने पीछे हटने से इनकार किया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।

आवेदन में कहा गया है, “पिछले 8-10 वर्षों से डर पैदा करने के लिए वे महिलाओं और बच्चों को आगे कर देते हैं। इस वजह से हम असुरक्षित महसूस करते हैं। शौकत मंसूरी की हिंदू विरोधी मानसिकता है और वह लैंड-जिहाद करना चाहता है और क्षेत्र में हिंदू समुदाय को अल्पसंख्यक बनाना चाहता है। अशांत क्षेत्र अधिनियम के लागू होने के बावजूद उसने अपने परिवार के सदस्यों को हिंदू परिवारों से घर खरीदने के लिए कहा है। भजन जारी रखने पर वे हमें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दे रहे हैं। उसने धमकी दी है कि वह इलाके को मुस्लिम बहुल बना देगा।” आगे कहा गया है, “यदि हमें या हमारे परिवार के किसी सदस्य को कुछ होता है, तो यही लोग जिम्मेदार होंगे।”

इस घटना के तीन महीने बाद सोनी फलियो के निवासियों ने घर के बाहर ‘बिक्री के लिए है’ के बैनर लगा रखे हैं।

क्या है अशांत क्षेत्र अधिनियम

जिला प्रशासन, सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए उन क्षेत्रों को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकता है जो जनसांख्यिकी परिवर्तन के लिहाज से अतिसंवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। विक्रेता को आवेदन में यह उल्लेख करना होता है कि वह अपनी मर्जी से संपत्ति बेच रहा है। अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल कलेक्टर द्वारा संपत्ति को खरीदने वाले और बेचने वाले द्वारा किए गए आवेदन पर हस्ताक्षर करने के बाद ही हो सकता है। इस तरह के किसी भी आवेदन के बाद कलेक्टर को औपचारिक जाँच करनी होती है। अधिकारियों को मौके पर खुद जाकर सार्वजनिक तौर पर जानकारियाँ इकट्ठी करनी होती है। प्रभावित लोगों से लिखित में भी स्वीकृति भी लेनी होती है। इस अधिनियम के तहत वे लोग भी शामिल हैं जो उस संपत्ति के आस-पास रहते हैं। सभी प्रक्रियाओं का पालन होने और उससे संतुष्ट होने के बाद ही कलेक्टर संपत्ति के हस्तांतरण की मँजूरी दे सकते हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट निरवा मेहता ने अंग्रेजी में लिखी है। पूरी रिपोर्ट आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

हाथ, ऊँगलियाँ, गर्दन काटी और टाँग दिया शव: किसानों के प्रदर्शन स्थल पर एक और बर्बर हत्या

तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे कथित किसान प्रदर्शन स्थल के पास से हत्या की एक और वारदात सामने आई है। हरियाणा के सोनीपत के कुंडली बॉर्डर पर एक युवक की बर्बर तरीके से हत्या कर लाश को लटका दिया। शुकवार (15 अक्टूबर 2021) की सुबह संयुक्त किसान मोर्चा के मंच के पीछे शव लटका मिला। दावा किया जा रहा है कि निहंग सिखों ने इस वारदात को अंजाम दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, व्यक्ति की हत्या करने से पहले उसे करीब 100 मीटर तक घसीटा गया। बाद में उसके दाहिने हाथ और गर्दन को काटा गया। हत्या से पहले मृतक को बेहद प्रताड़ना दी गई होगी क्योंकि उसकी पाँचों ऊँगलियों को भी काट दिया गया था। युवक पर गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी का आरोप लगाया गया है। हालाँकि वह कौन है इस बात का फिलहाल पता नहीं चल सका है।

मामले की सूचना पर कुंडली थाने के प्रभारी रवि कुमार जब वहाँ पहुँचे तो निहंग सिखों ने उसके शव को बैरिकेड से उतारने देने से मना किया। घटनास्थल पर जब एक पत्रकार ने फोटो लेनी चाही तो निहंगों ने उसे भी धमकाया था। हालाँकि, बाद में जब बलदेव सिरसा वहाँ पहुँचे तब निहंगों ने डेड बॉडी को उतारने दिया।

निहंग सिखों ने आरोप लगाया है कि 30,000 रुपए देकर एक साजिश के अंतर्गत युवक को यहाँ भेजा गया था। वहाँ पहुँचने के बाद युवक ने गुरुग्रंथ साहिब का अंग-भंग कर दिया। जिसके बाद गुस्साए निहंगों ने उसे पकड़ लिया और जमकर पीटा। फिलहाल पुलिस युवक की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही है, लेकिन मामले में कुछ भी कहने से बच रही है।

पहले जिंदा जला दिया गया था एक को

इसी तरह की वारदात इसी साल जून के महीने में सामने आई थी। टीकरी बॉर्डर पर किसानों के विरोध स्थल पर एक व्यक्ति को शहीद बताकर जिंदा जला दिया गया था। कसार गाँव का रहने वाला मुकेश नाम का युवक घूमते हुए किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए चला गया था। वहाँ उसे पहले जमकर शराब पिलाई गई। उसके बाद जिंदा जला दिया गया।

कोरोना में जनाजे की भीड़ पर चुप्पी, दशहरे पर RSS को पथ संचलन की अनुमति नहीं: राजस्थान में तुष्टिकरण ऐसे भी

राजस्थान में अशोक गहलोत की अगुआई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने कोरोना का हवाला देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को दशहरे के मौके पर पथ संचलन करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला जयपुर पुलिस कमिश्नरेट ने लिया है। इस पर बीजेपी ने कड़ा विरोध जताया है।

ऐसे में अब बड़े आयोजनों की जगह कम संख्या में विजयदशमी का उत्सव मनाया जाएगा। शाखाओं में 200 से भी कम लोगों को शामिल किया जाएगा। जयपुर महानगर के चार भाग और 29 नगर हैं। नगर की योजना के आधार पर शाम को 31 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।

उल्लेखनीय है कि आरएसएस की स्थापना होने के बाद से ही विजयदशमी पर संघ शस्त्र पूजन और पथ संचलन करता आ रहा है। लेकिन प्रशासन द्वारा अनुमति नहीं मिलने के बाद अब यह छोटे स्तर पर होगा।

बीजेपी ने राज्य सरकार का किया विरोध

अशोक गहलोत सरकार के फैसले का विरोध करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ अरुण चतुर्वेदी ने सरकार को पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि इसी जयपुर में पिछले दिनों कई प्रदर्शन हुए थे। उसमें खुद मुख्यमंत्री भी शामिल हुए थे। ऐसे उदाहरण देकर भाजपा ने पूछा कि क्या उन मौकों पर कोरोना गाइडलाइंस की धज्जियाँ नहीं उड़ीं थीं?

बीजेपी नेता ने ये भी कहा कि करीब एक साल पहले जयपुर में ही कोरोना की पहली लहर के दौरान भी सीएए को लेकर प्रदर्शन हुए थे। विजयदशमी को देश में विजय दिवस के रूप में मनाने की परंपरा सदियों से रही है। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार का अनमति देने से इनकार करना उसकी राजनीतिक सोच को दिखाता है।

गौरतलब है कि इससे पहले इसी साल अप्रैल में धौलपुर में भाजपा विधायक सुखराम खोली ने हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अखंड रामायण का पाठ कराया था। इसमें 500 से अधिक लोग जुटे थे। इस बात को लेकर सीएम गहलोत ने एक बैठक में यहाँ के DM-SP को सबके सामने फटकार लगा डाली थी। आपको शायद यह सही लगे लेकिन जैसलमेर में ‘सरहद का सुल्तान’ गाजी फकीर के जनाजे में उमड़ी भीड़ की तरफ जब इन्हीं CM साहब की प्रशासन आँख मूँद लेती है तो फर्क समझ में आ जाएगा। गाजी फकीर के बेटे मोहम्मद सालेह राजस्थान सरकार में वक्फ और अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री हैं।