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NCP वाले शरद पवार ने केंद्रीय मंत्री गडकरी की जमकर तारीफ की, कहा- पहले 5000 km बनते थे सड़क, अब बनते हैं 12000 Km

महाराष्ट्र के अहमदनगर में आयोजित एक कार्यक्रम में शनिवार (2 अक्टूबर 2021) को राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जमकर तारीफ की। शरद पवार ने कहा, ”मैं इस समारोह में शामिल हो रहा हूँ, क्योंकि मुझे बताया गया था कि गडकरी अहमदनगर में कई परियोजनाओं का उद्घाटन करने जा रहे हैं, जो शहर के लंबे समय से लंबित मुद्दों को हल करेंगे। वह चाहते थे कि मैं मौके पर मौजूद रहूँ।”

एनसीपी नेता ने कहा, “अक्सर परियोजना का शिलान्यास होने के बाद कुछ नहीं होता है, लेकिन जब बात गडकरी की परियोजना की आती है तो कार्यक्रम के कुछ दिनों के बाद ही उस पर काम शुरू होते देखा जा सकता है।’’ पवार ने कहा, ‘‘गडकरी शानदार उदाहरण हैं कि जनप्रतिनिधि राष्ट्र के विकास के लिए कैसे काम कर सकते हैं।”

उन्होंने कहा, ‘‘मुझे याद है कि गडकरी के जिम्मेदारी (सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय) लेने से पहले लगभग 5,000 किलोमीटर का काम होता था, लेकिन उनके पद संभालने के बाद अब यह आँकड़ा बढ़कर 12,000 किलोमीटर को पार कर गया।’’

इसके साथ ही पूर्व कृषि मंत्री ने इलाके के किसानों को सलाह दी कि वे गन्ने का इस्तेमाल केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रखें, बल्कि एथनॉल के कच्चे माल के तौर पर भी विचार करें।

वहीं, गडकरी ने कहा कि महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में सड़क परियोजनाओं को क्रियान्वित करते हुए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने स्थानीय नदियों और नालों को भी साफ किया है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं (महाराष्ट्र के ग्रामीण विकास मंत्री) हसन मुशरिफ को अहमदनगर में जल संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव दूँगा।’’ बता दें कि मुशरिफ राकांपा नेता होने के साथ-साथ अहमदनगर जिले के प्रभारी मंत्री भी हैं। वह भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे।

जम्मू-कश्मीर में बरघशिखा भवानी मंदिर में तोड़फोड़ कर सांप्रदायिक माहौल बिगााड़ने की कोशिश, FIR दर्ज, उमर-महबूबा ने घटना की निंदा की

जम्मू-कश्मीर में उपद्रवियों ने एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की आस्था पर प्रहार किया है। अनंतनाग में शनिवार (अक्टूबर 2, 2021) को बरघशिखा भवानी के मंदिर पर हमला किया। इस दौरान मंदिर में तोड़फोड़ की गई है। पुलिस ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि केस दर्ज किया गया है। जाँच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शनिवार को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में मंदिर को अपवित्र करने के आरोप में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ FIR दर्ज किया है। पुलिस ने बताया कि पता चला है कि शनिवार दोपहर करीब दो बजे कुछ बदमाशों ने अनंतनाग के मट्टन इलाके में बरघशिखा भवानी मंदिर में तोड़फोड़ की।

एक पुलिस अधिकारी ने कहा, “सूचना मिलने के बाद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295, 427 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और जाँच शुरू कर दी गई है।” उन्होंने आगे बताया कि पुलिस और सिविल प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने जाँच के लिए क्षेत्र का दौरा किया।

इधर अनंतनाग के उपायुक्त पीयूष सिंगला ने कहा कि दोषियों को दंडित किया जाएगा। किसी को भी सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा, “इस तरह के अनैतिक और अवैध कृत्यों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों को कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुसार दंडित किया जाएगा। किसी को भी समाज में सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुँचाने या बाधित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घटना की निंदा करते हुए ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “अस्वीकार्य। मैं इस तोड़फोड़ की कड़ी निंदा करता हूँ और प्रशासन खासकर जम्मू-कश्मीर पुलिस से अपील करता हूँ कि दोषियों की पहचान कर सख्त सजा दी जाए।” पीडीपी नेता नईम अख्तर ने भी घटना की निंदा करते हुए दोषियों को सख्त सजा देने की माँग की।

वहीं, पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट कर कहा, “मट्टन के माता मंदिर में तोड़फोड़ की घटना से दुखी और परेशान हूँ। समय की माँग है कि हम अपने कश्मीरी पंडित भाईयों को फिर से सुरक्षा का अहसास दिलाएँ। अनंतनाग के एसएसपी और डीसी से आग्रह है कि इस मामले में अविलंब कार्रवाई करें।”

बता दें कि बरघशिखा भवानी का मंदिर कश्मीर घाटी के अनंतनाग जिले में मट्टन पहाड़ पर है। यह मंदिर कश्मीरी पंडितों की आस्था का केंद्र है। बरघशिखा मंदिर पर ऐसे समय में हमला किया गया है, जब सरकार घाटी में पंडितों की वापसी की कोशिश में जुटी है। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत तीन दिनों के जम्मू-कश्मीर के दौरे पर हैं।

‘मुसलमान एक्टर शाहरुख खान का बेटा है… इसलिए आर्यन खान को बनाया जा रहा निशाना’ – सोशल मीडिया पर ऐसे बचाया जा रहा

हिंदी सिनेमा में काम करके पैसे कमाना रोजगार का एक माध्यम है। हमारी-आपकी नौकरी की तरह। कुछ लोग इसमें भी हिंदू-मुस्लिम खोज लेते हैं। यह खेल खासकर तब खेला जाता है, जब कोई ‘अपना’ फँस जाता है। फिलहाल यह खेल शाहरुख खान के नाम पर खेला जा रहा है। क्यों? क्योंकि उनका बेटा आर्यन ड्रग्स मामलों में फँस गया है।

NCB (Narcotics Control Bureau) एक संस्था है। यह अवैध ड्रग्स वगैरह करने के लिए भारत के लोगों की बजाता है। शाहरुख का बेटा आर्यन भी ड्रग्स मामलों में पकड़ा गया है, भारत का नागरिक है… तो उसको भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

अभी तक की कहानी या खबर आम बात है। सबके साथ ऐसा होता है, ऐसा ही होना चाहिए। अब खास बात। खास बात किसी के हिरासत में होने की नहीं। खास बात हिरासत में होने वाले के धर्म की। आर्यन मुसलमान है… क्योंकि उसके पिता शाहरुख मुसलमान हैं, भले पैदा करने वाली माँ की पैदाइश हिंदू धर्म की है।

यह सारी बात सोशल मीडिया पर चल रही है। शाहरुख मुसलमान है, आर्यन मुसलमान है… गोदी मीडिया इनको धर्म के कारण टारगेट कर रही है… आदि-इत्यादि। और ऐसा करने वाले चंद चिंदी चोर सोशल मीडिया यूजर नहीं हैं बल्कि ट्विटर के VVIP ब्लूटिक वाले भी ऐसा कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर आर्यन ड्रग्स मामले को हिंदू-मुस्लिम का एंगल देने का प्रयास किया जाएगा – यह बहुत सारे यूजर्स ने पहले से सोच लिया था। जरा इन यूजर्स को भी पढ़ लें।

‘…सेक्स करे, ड्रग्स ले, लड़कियों का पीछा करे’ – तब शाहरुख खान ने बेटे आर्यन के लिए TV पर कही थी ये बात

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) मुंबई क्रूज ड्रग्स मामले में सुपरस्टार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान से पूछताछ कर रही है। शनिवार (अक्टूबर 2, 2021) रात मुंबई में एक क्रूज पर एनसीबी की टीम ने छापेमारी की थी। इस दौरान 10 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें शाहरुख खान का बेटा आर्यन खान भी शामिल है।

इस बीच शाहरुख खान का एक पुराना इंटरव्यू वायरल हो रहा है। उन्होंने यह इंटरव्यू सिमी ग्रेवाल को दिया था। इस दौरान शाहरुख ने मजाकिया लहजे में कहा था कि वह चाहते हैं कि आर्यन वो सारे गलत काम करे, जिन्हें वह जवानी में नहीं कर पाए थे।

शाहरुख खान 1997 में सिमी ग्रेवाल के टॉक शो में पहुँचे थे। इस टॉक शो में उनके साथ गौरी भी पहुँची थीं। गौरी ने तब कुछ समय पहले ही अपने पहले बेटे आर्यन को जन्म दिया था। इस मौके पर सिमी ने शाहरुख और गौरी से उनके बेटे के बारे में भी बात की थी।

सिमी ग्रेवाल ने शाहरुख से पूछा कि वह आर्यन का पालन-पोषण कैसे करेंगे तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि वह चाहते हैं कि आर्यन वो सारे काम करे जो वह अपनी टीनएज में नहीं कर सके। शाहरुख ने कहा था कि वह काफी कुछ ऐसा करना चाहते थे जो कि वह चाहकर भी नहीं कर सके क्योंकि उनके पास इतनी सुविधाएँ नहीं थीं।

शाहरुख ने सिमी ग्रेवाल से कहा था, “जब आर्यन 3-4 साल का हो जाएगा तो मैं उसे कहूँगा कि वह लड़कियों के पीछे जा सकता है, ड्रग्स ले सकता है, सेक्स कर सकता है। बेहतर हो कि वह ये सब जल्दी ही शुरू कर दे जो मैं नहीं कर सका। अगर आर्यन घर से बाहर जाता है तो मैं चाहूँगा कि मेरे साथ काम करने वाले लोग जिनकी बेटियाँ हैं, वह आकर मेरे पास उसकी शिकायत करें।”

बता दें कि शनिवार को मुंबई के समुद्री में क्रूज पर चल रही एक ड्रग्स पार्टी में एनसीबी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए भारी मात्रा में नशीला पदार्थ जब्त किए और 10 लोगों को हिरासत में लिया है। यह जहाज मुंबई से गोवा जा रहा था। इस पार्टी में एंट्री के लिए हर शख्स ने 80 हजार रुपए से ज्यादा की फीस चुकाई थी। एक पुख्ता टिप मिलने के बाद मुंबई जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े और अन्य एनसीबी अधिकारी जहाज में आम यात्रियों की तरह सवार हुए और ऑपरेशन को अंजाम दिया।

‘लालू यादव साल भर से दिल्ली में बंधक… लोग नाजायज फायदा उठा रहे’ – तेजस्वी पर तेज प्रताप का हमला?

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने इशारों-इशारों में अपने छोटे भाई तेजस्वी पर हमला बोला है। तेज प्रताप ने आरोप लगाया है कि कुछ लोग पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना देख रहे हैं। इसी कारण से राष्ट्रीय जनता दल के कुछ लोगों ने उनके पिता (सजायाफ्ता अपराधी लालू यादव) को दिल्ली में बंधक बनाकर रखा हुआ है।

तेज प्रताप यादव ने कहा कि उनके पिता को जेल से बाहर आए साल भर का समय हो चुका है, मगर उनको अभी तक दिल्ली में ही रखा गया है। इस दौरान तेज प्रताप यादव ने किसी का नाम नहीं लिया। उन्होंने कहा, ”सब जानता है कि ऐसे कौन लोग हैं, उनका नाम लेने से कोई फायदा नहीं है।”

तेज प्रताप ने पटना में अपने नवगठित संगठन छात्र जनशक्ति परिषद की आयोजित कार्यशाला में शनिवार (2 अक्टूबर 2021) को यह बात कही। कार्यशाला का आयोजन ‘राजनीति सीखो, नेतृत्व करो’ विषय पर किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तेज प्रताप अपने पिता को पटना लेकर आना चाहते हैं और उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं, मगर कुछ लोग उनके पिता को आने नहीं दे रहे हैं। उन्हें दिल्ली में बंधक बना कर रखा है। बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि राजद को जनता से दूर कर दिया गया है। उनके अनुसार पिता लालू यादव रहते थे तो उनके घर का दरवाजा जनता के लिए खुला रहता था। वह जनता से मिलते थे। लेकिन, अब कुछ लोगों ने क्या किया? वो चाहते हैं कि जनता पार्टी (राजद) से दूर रहे।

तेज प्रताप यादव ने आगे कहा, “पार्टी में जो कुछ हो रहा है उससे संगठन बढ़ेगा नहीं, बल्कि टूट जाएगा। इस तरह से काम नहीं चलने वाला है। मेरे पिता बीमार चल रहे हैं इसलिए हम कोई प्रेशर नहीं देना चाहते हैं, लेकिन कुछ लोग इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं।”

इससे पहले भी दोनों भाइयों के बीच मतभेद की खबरें सामने चुकी हैं। तेज प्रताप के नए आरोपों से यह साफ जाहिर होता है कि उनके और तेजस्वी के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है। बता दें कि चारा घोटाले में सजा पाने वाला लालू प्रसाद यादव इन दिनों जमानत पर है। साल भर से लालू यादव नाम का अपराधी दिल्ली में ही रह रहा है।

समुद्र में क्रूज, उस पर ड्रग्स पार्टी… ऐसे पकड़ाया शाहरुख खान का बेटा आर्यन खान, NCB का सीक्रेट ऑपरेशन

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने मुंबई के पास समुद्र में एक क्रूज पर चल रही रेव पार्टी में शनिवार (अक्टूबर 2, 2021) देर रात छापेमारी की। इस दौरान एनसीबी को मौके पर बड़ी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई है। 

साभार: TOI

जानकारी के मुताबिक एनसीबी ने क्रूज से 10 लोगों को हिरासत में लिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को हिरासत में लिया गया है। NCB के एक अधिकारी ने ETimes से बात करते हुए पुष्टि किया कि शाहरुख खान का बेटे आर्यन खान को भी हिरासत में लिया गया है। उससे भी पूछताछ की जा रही है।

साभार: India Today
साभार: indyatv.in

मुंबई तट पर एक क्रूज पर रेव पार्टी पर छापेमारी के सिलसिले में दिल्ली की रहने वाली तीन महिलाओं को पूछताछ के लिए मुंबई में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कार्यालय लाया गया है। एनसीबी अधिकारियों के अनुसार, बॉलीवुड के बड़े अभिनेताओं के बच्चों से पूछताछ की जा रही है। हालाँकि पार्टी में किसी सेलेब्रिटी के बारे में पूछे जाने पर जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े ने किसी तरह की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

इस कार्रवाई को ज्यादा बड़ा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि एनसीबी ने पहली बार किसी शिप पर सीक्रेट ऑपरेशन को अंजाम दिया है। जानकारी मिली है कि इस ऑपरेशन की तैयारी एनसीबी टीम ने एक इनपुट के आधार पर की थी। जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े को बताया गया था कि मुंबई टू गोवा एक शिप जाने वाला है और उस शिप पर एक बड़ी ड्रग्स पार्टी होनी है। उस टिप ऑफ पर विश्वास जताते हुए जोनल डायरेक्टर ने अपनी एक टीम तैयार की और फिर मुंबई से उस शिप पर सवार हो गए।

साभार: fnewshub.com

अब खास बात ये रही कि एनसीबी टीम ने तमाम आरोपितों को चकमा देने का बेहतरीन तरीका निकाला। वे शिप पर जरूर सवार हुए, उनकी तरफ से कार्रवाई भी की गई, लेकिन किसी को इसकी भनक नहीं लगी। वजह ये रही कि तमाम ऑफिसर शिप पर यात्री बन सवार हुए। उन्होंने सिविलियन ड्रेस ही पहन रखी थी और एक तय रणनीति के तहत अपनी कार्रवाई को अंजाम दिया।

एनसीबी को अपनी कार्रवाई में भारी मात्रा में कोकीन और MD बरामद हुआ है। अब क्योंकि ये एक हाई प्रोफाइल ड्रग्स पार्टी रही, ऐसे में इसमें कई सेलिब्रेटी द्वारा परफॉर्म भी किया जा रहा था। लेकिन एनसीबी टीम ने किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाई। जब तक शिप मुंबई से निकल बीच समुद्र में नहीं पहुँच गया, कार्रवाई शुरू नहीं की गई। जैसे ही ड्रग्स पार्टी शुरू ही, जाँच एजेंसी ने एक तय प्रक्रिया के तहत अपने एक्शन को अंजाम दिया और इस रेड को सफल बनाया। जिस शिप पर एनसीबी द्वारा ये रेड की गई है, उसका नाम  Cordelia Cruise है। इसकी ओपनिंग कुछ दिन पहले ही की गई थी। 

इस सब के अलावा इस ड्रग्स पार्टी के ऑर्गेनाइजर को लेकर भी बड़ी जानकारी सामने आई है। खबर है कि दिल्ली की एक कंपनी Namascray Experience ने इस पार्टी का आयोजन किया था, वहीं एक यात्री के इंट्री के लिए 80 हजार रुपए फीस रखा गया था। ये पार्टी शनिवार को शुरू हुई थी और चार अक्टूबर को सभी को वापस मुंबई लाने की तैयारी थी। अभी के लिए शिप पर एनसीबी की कार्रवाई जारी है। कई रूम की छानबीन की जा रही है और तमाम आरोपितों से सवाल-जवाब हो रहे हैं।

वैसे अब इस पार्टी के टिकट प्राइज पर भी बड़ा खुलासा हुआ है। जानकारी मिली है कि इस पार्टी में आने के लिए लोगों ने 80 हजार तक रुपए दिए थे। कुछ तो ऐसे भी रहे जिन्होंने 82 हजार रुपए दिए। लेकिन वो ज्यादा रुपये देना भी उनके काम नहीं आया क्योंकि किसी को भी पार्टी में जाने का मौका ही नहीं मिला। उस पार्टी में सिर्फ सीमित लोगों को ही मंजूरी थी।

उल्लेखनीय है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद एनसीबी लगातार बॉलीवुड इंडस्ट्री में ड्रग्स लेने वाले स्टार्स को अपने रडार पर ले रही है। एनसीबी ने कई स्टार्स को ड्रग्स मामले में गिरफ्तार भी किया है। वहीं, सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद कई बड़े स्टार्स से पूछताछ भी हो चुकी है।

भारत विरोधी अभियान वाले पत्रकार जुड़े आतंकी इस्लामी संस्था ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से, आर्थिक नुकसान था उद्देश्य: डिसइंफोलैब का खुलासा

सोशल मीडिया पर हिंदुओं को बदनाम करने के लिए एक अभियान बड़ी ही सक्रियता से चलाया जा रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि भारत के हिंदू बहुसंख्यक समुदाय के लोग मुस्लिमों पर अत्याचार कर रहे हैं। देश को कमजोर करने की इस साजिश को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। डिसइन्फोलैब ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि कट्टर इस्लामिक संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने भारत के आर्थिक हितों को निशाना बनाने का एक अभियान शुरू किया है। ‘मुस्लिम ब्रदरहुड अराइव्स इन इंडिया’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से ट्विटर पर शेयर किया जा रहा #BoycottIndianProducts हैशटैग भारत के खिलाफ इसी अभियान का हिस्सा था।

बता दें कि सोशल मीडिया पर #BoycottIndianProducts अभियान हाल ही में असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ बेदखली अभियान के बाद शुरू किया गया था। इस अभियान के दौरान कुछ बांग्लादेशी अतिक्रमणकारी हिंसक हो गए थे और पुलिस पर हमला कर दिया था। इस घटना के लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए पाकिस्तान, तुर्की मिस्र और इराक सहित मध्य-पूर्व के इस्लामिक देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों के बहिष्कार का अभियान शुरू किया था।

डिसइन्फोलैब के अनुसार, इस अभियान को हवा देने के लिए अल जजीरा समेत मुस्लिम ब्रदरहुड से सहानुभूति रखने वाले कई मीडिया हाउसों ने भारत विरोधी ‘समाचार लेख’ भी प्रकाशित किए थे। अधिकांश यूजर्स अरबी हैशटैग #مقاطعةالمنتجاتالهندية का उपयोग किया, लेकिन कुछ ने अंग्रेजी में भी #BoycottIndianProducts और #IndiaIsKillingMuslims जैसे टैग ट्वीट किए। खास बात ये कि इनमें से अधिकतर ट्वीट मुस्लिम देशों और जाने-माने लोगों द्वारा किए गए थे, जिनके ट्विटर हैंडल वैरीफाइड हैं।

डिसइन्फोलैब के अनुसार, असम की घटना तो एक बहाना था। इन लोगों ने भारत के खिलाफ पहले से ही योजना तैयार कर रखी थी और असम की घटना ने इसे ट्रिगर कर दिया। मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के साथ-साथ उससे सहानुभूति रखने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को भी निशाना बनाया। ऐसे अधिकांश हैंडल मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंधित थे।

इस्लामिक विद्वानों के अंतर्राष्ट्रीय संघ के न्यासी बोर्ड के सदस्य मोहम्मद अल सगीर के अल जजीरा और मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ संबंध हैं। वह अल जज़ीरा में फ्रांसीसी उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान करता दिखा था। इसके अलावा, इस्तांबुल में रह रहा मिस्र का पत्रकार सामी कमल अल दीन को मिस्र की सरकार दो बार आतंकवादी के रूप में सूचीबद्ध कर चुकी है।

तालिबान और अलकायदा को कवर करने वाले पत्रकार अहमद मुअफ़्फ़ाक़ ज़िदान को मुस्लिम ब्रदरहुड और अल कायदा से संबंधों के कारण अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) ने निगरानी सूची में रखा है। इसके अलावा, अल जजीरा के अरबी न्यूज के पूर्व प्रबंध निदेशक यासिर अबू हिलाला के भी मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध हैं। भारत विरोधी इस अभियान को सबसे अधिक अल जजीरा ने प्रसारित किया है। बता दें कि अमेरिका अल जजीरा के कई पत्रकारों को वॉच लिस्ट में डाल चुका है।

लाहौर में हिंदुओं और सिखों का हो रहा था कत्लेआम, गाँधी ने कहा था – ‘नहीं भागिए… आपकी मृत्यु की खबर मुझे बुरी नहीं लगेगी’

कॉन्ग्रेस पार्टी में लोकमान्य तिलक का जाना एक तरह से गाँधी नामक अध्याय का उदय माना जाएगा। जनवरी 1995 में गाँधी जी अफ्रीका से भारत वापस आए, और भारतीय राजनीति में एक नए तूफ़ान का आरम्भ हुआ।

इसके पहले लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों की कठपुतली रही कॉन्ग्रेस पार्टी को ‘जनता का आंदोलन’ बनाने का भरपूर प्रयास किया। तिलक स्वयं भी सामान्य जनता के नेता कहे जाने लगे। परन्तु फिर भी उस समय तक कॉन्ग्रेस के दूसरे नेता उच्चवर्णीय तथा उच्चवर्गीय लोगों की गिनती में आते रहे। इन कॉन्ग्रेस नेताओं को सर्वसामान्य जनता के बीच मिलजुलकर काम करने की ना तो इच्छा थी और न ही जानकारी।

यह परंपरा गाँधीजी ने खंडित कर दी। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी में उथल-पुथल मचाकर रख दी। 1921 आते-आते, कॉन्ग्रेस के सभी सूत्र उनके हाथों में आ गए। इससे पहले पाँच-छः वर्ष गाँधीजी ने भारतीय आंदोलन का गणित समझने में व्यतीत किए।

गाँधीजी के राजनीति में आगमन से पहले कॉन्ग्रेस द्वारा कोई बड़ा आंदोलन किया हो ऐसा इतिहास में दिखाई नहीं देता। गाँधी से पहले वाले कालखंड में हुआ सबसे बड़ा आंदोलन था ‘बंग-भंग आंदोलन’। परन्तु वास्तव में यह आंदोलन कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में नहीं हुआ था। 1905 से 1911 के इन छः वर्षों में चले इस आंदोलन में कॉन्ग्रेस का एक राजनैतिक संगठन अथवा पार्टी के रूप में कोई योगदान नहीं था। इस दौरान कुछ समय के लिए तिलक मंडाले (ब्रम्ह्देश – बर्मा) के जेल में बन्द थे।

के कुछ कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन को सक्रिय समर्थन दिया था, परन्तु वह केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही था। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का आंदोलन भी कॉन्ग्रेस का आंदोलन कभी नहीं था। 1915 में जब लोकमान्य तिलक और एनी बेसेन्ट ने ‘होमरूल आंदोलन’ चलाया, तब वह तेजी से आग की तरह फैला। परन्तु इतना होने पर भी वह आंदोलन सामान्य जनता के दिलों का विशाल आंदोलन नहीं बन सका।

1914 में जब गाँधी भारत पहुँचे, तब उनके समक्ष ऐसा राजनैतिक दृश्य था। एका पक्का था, जब तक कॉन्ग्रेस का नेतृत्व हाथों में नही आएगा, तब तक भारत में कुछ भी करना संभव नही हैं, ऐसा वे समझ चुके थे। गाँधी की राजनैतिक संपत्ति के रूप में, उनका दक्षिण अफ्रीका में एकमात्र आंदोलन ही था। जिसमें उन्हें आंशिक विजय प्राप्त हुई थी, परन्तु वह बस उतने तक ही सीमित था.।जबकि भारत में राजनीति करने वाले कॉन्ग्रेस के राजनेता ‘टाईमपास राजनीतिज्ञ’ के रूप में कॉन्ग्रेस में रुचि दिखा रहे थे।

इसलिए ऐसे माहौल में गाँधीजी को पहले स्वयं को सिद्ध करना आवश्यक था। गाँधी ने वही किया। बिहार के चम्पारण में नील की खेती करने वाले अनेक किसान थे, जिनकी परिस्थिति बहुत ही बुरी थी। समाचारपत्रों में उनके बारे में पढ़कर एवं राजकुमार शुक्ल के निमंत्रण पर गाँधी ने चम्पारण जाने का निर्णय लिया। उन्होंने सोचा था कि वहाँ पर वे 3-4 दिन रहेंगे और परिस्थिति का आकलन करके वापस आ जाएँगे।

परन्तु गाँधी वहाँ गए और वहाँ की मिट्टी और मुद्दों से एकाकार हो गए। तीन-चार दिनों में वापस आने का विचार करते-करते उन्हें वहाँ तीन-चार महीने हो गए। चंपारण में उन्होंने भारत की भूमि पर पहली बार अंग्रेजों और जमींदारों के खिलाफ अपना ‘सत्याग्रह’ नामक शस्त्र निकाला। उनका यह आंदोलन किसके विरुद्ध था? राजेन्द्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे भूमिहार लोगों के विरुद्ध ही। परन्तु यह लोग जल्दी ही गाँधी जी के अनुयायी बन गए। गाँधी जी का एक विलक्षण रूप कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने देखा, और चम्पारण के उस सत्याग्रह से गाँधी का नाम चल निकला।

चम्पारण के बाद गुजरात के खेडा में संघर्ष और इसके बाद अहमदाबाद के कारखानों में मजदूरों की हड़ताल जैसे काम गाँधी ने अपने हाथ में लिए। कॉन्ग्रेस की मदद अथवा सहभागिता के बिना किए गए इन तीन आन्दोलनों से गाँधी नामक नेतृत्व का चमकदार स्वरूप निखर गया। वल्लभभाई पटेल, नरहरी पारीख, उत्तम सोमाणी, महादेवभाई देसाई, इंदुलाल याज्ञिक जैसे अनेक अनुयायी उन्हें गुजरात से मिल गए। तिलक और एनी बेसेन्ट द्वारा खड़े किए गए ‘होमरूल आंदोलन’ के सभी कार्यकर्ता गाँधी के असीम भक्त बन गए। और यह इतना बढ़ा कि आगे चलकर 1920 में गाँधी जी को भारतीय होमरूल लीग का अध्यक्ष बना दिया गया। आगे गाँधी जी की सलाह पर ही होमरूल लीग का कॉन्ग्रेस में विलय कर दिया गया।

इन तीनों आन्दोलनों में गाँधी जी ने अपना मैनेजमेंट कौशल दिखाया और उपयोग किया। दक्षिण अफ्रीका में किए गए आंदोलन का अनुभव उनके साथ था। इसलिए इन तीनों आन्दोलनों को उन्होंने व्यवस्थित एवं सुसूत्र पद्धति से चलाया और परिणामस्वरूप उनकी राजनैतिक झोली में बहुत कुछ आ गया।

गाँधी की राजनैतिक समझ बहुत ही अचूक थी। उन्हें पक्का विश्वास था कि कॉन्ग्रेस को उनकी तरफ ध्यान देना ही पड़ेगा, और वैसा हुआ भी। 1921 में कॉन्ग्रेस के सभी सूत्र गांधी के नियंत्रण में आ गए और अपेंडिक्स के ऑपरेशन की वजह से मात्र दो वर्ष में ही जेल से छूटकर बाहर आने के पश्चात, 1924 में कॉन्ग्रेस के बेलगांव अधिवेशन में वे अध्यक्ष के रूप में विराजित हो गए।

और फिर इसके बाद जो सारा इतिहास है वह गाँधी जी द्वारा अपने साथ खींचकर ले जाई गई कॉन्ग्रेस का इतिहास है। 1924 के बाद भले ही वे कॉन्ग्रेस के पदाधिकारी नहीं थे, परन्तु फिर भी सर्वेसर्वा थे। कॉन्ग्रेस उनके मतानुसार ही चलती थी।

यही गाँधी जी की विशिष्टता थी। अगले पूरे तेईस वर्ष उन्होंने अपनी जिद और आग्रहों से कई निर्णय लिए। दूसरी भाषा में कहें तो गाँधी जी ने अपनी एकाधिकारवादी मनोवृत्ति कॉन्ग्रेस पर अर्थात एक तरह से सम्पूर्ण देश पर थोपे रखी।

वर्ष 1938 में कॉन्ग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सुभाषचन्द्र बोस अध्यक्ष के रूप में चुनकर आए। यह चुनाव सर्वानुमति से किया गया था और ज़ाहिर है कि गाँधी का भी इसे समर्थन था। परन्तु सुभाष बाबू की कार्यपद्धति स्वतन्त्र निर्णय लेने वाले व्यक्ति की थी, इसलिए उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए। यहाँ तक कि डॉक्टर कोटनीस के नेतृत्व में चिकित्सकों की एक टीम को चीन भेजने का निर्णय भी उनकी अध्यक्षता में लिया गया।

गाँधी असहज महसूस करने लगे, क्योंकि उन्हें तो सुभाष बाबू से पहले वाले कॉन्ग्रेस अध्यक्षों की आदत थी, जो प्रत्येक निर्णय गाँधी से पूछकर किया करते थे। 1936 और 1937 में जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष थे। वे अपने सभी निर्णय गाँधीजी से पूछकर किया करते थे। इसलिए जब सुभाष बाबू ने 1939 के त्रिपुरी (जबलपुर) के कॉन्ग्रेस अधिवेशन में पुनः कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुनाव लड़ने की घोषणा की, तब गाँधी ने उनका विरोध किया। उन्होंने अध्यक्ष पद हेतु पहले नेहरू का नाम आगे किया। परन्तु नेहरू उस समय, हाल ही में अपनी लंबी यूरोप की छुट्टियाँ बिताकर भारत लौटे थे। इसलिए उन्होंने इनकार कर दिया। इसके बाद मौलाना आज़ाद ने भी अध्यक्ष बनने से मना कर दिया।

तब गाँधी ने डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया नामक आंध्रप्रदेश के नेता के नाम की घोषणा कर दी। गाँधी ने सभी कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से कहा कि नाम भले ही पट्टाभि सीतारमैया का है, परन्तु अपना वोट यही समझकर दें कि मैं ही चुनाव लड़ रहा हूँ।

गाँधी के दुर्भाग्य से डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया 203 वोटों से चुनाव हार गए और सुभाषचंद्र बोस त्रिपुरी कॉन्ग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में चुन लिए गए। हालाँकि कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी में गाँधी के अनुयायियों का ही बहुमत था, इसलिए तमाम अडंगों के बीच सुभाष बाबू कोई भी काम ठीक से नहीं कर सके, और उन्होंने केवल दो माह बाद ही अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके स्थान पर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को नामांकित किया गया, जो कि गाँधी के परम भक्त ही थे।

यह तो काफी बाद की बात है। परन्तु इससे पहले भी चाहे आश्रम के दैनिक कामकाज हों, अथवा किसी भी आंदोलन की रूपरेखा हो… हर बार, हर स्थान पर गाँधी जी ने उनके अंतर्मन में आए हुए सन्देश को ही प्रमाण माना और वैसे ही मनमाने निर्णय लेते रहे।

मराठी में एक शब्द है, ‘व्यामिश्र’… गाँधी जी के पूर्ण व्यक्तित्व को सटीक उकेरने वाला यह शब्द है। थोड़ा सा उलझा हुआ, थोड़ा सा कठिन और काफी अप्रत्याशित किस्म के व्यक्तित्व को ‘व्यामिश्र’ कहा जाता है।

गाँधी ने अपने अनेक अनुयायी तैयार किए। अनेक लोग तो गाँधी से प्रथम भेंट में ही उनके भक्त बन गए। उनमें से कुछ लोग आजीवन उनके प्रति निष्ठावान बने रहे। महादेव भाई देसाई जैसे लोगों ने तो एक तरह से स्वयं को गाँधीजी के चरणों में ही अर्पित कर दिया था। चाहे मीराबेन हों, अथवा मगनलाल गाँधी, इन सभी लोगों की गाँधी जी के प्रति अपार निष्ठा थी।

अपने अनुयायियों/अपने भक्तों पर गाँधी ने सदैव ही पुत्रवत प्रेम नहीं किया। ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि उन्होंने अपने इन अनुयायियों की अनुचित इच्छाएँ पूरी की हों, बल्कि अनेक प्रसंगों पर तो गाँधी ने इनके साथ दूसरों के मुकाबले अधिक कठोरता का व्यवहार किया। महादेव भाई को फ्रेंच भाषा सीखने की इच्छा थी। आश्रम में ही रहने वाली मीराबेन से उन्होंने फ्रेंच सीखने की शुरुआत भी की थी। परन्तु गाँधी ने उनके इस निर्णय को उलट दिया। महादेव भाई का फ्रेंच भाषा सीखना एक फालतू काम है, ऐसा स्वयं गाँधी ने कहा। परन्तु ऐसी अनेक बातों के बावजूद महादेव भाई की गाँधी के प्रति भक्ति एवं निष्ठा में कभी भी रत्ती भर का फर्क नहीं आया।

ऐसा क्यों होता था?? संभवतः ऐसा गाँधी जी के सत्य व्यवहार के कारण होता होगा। उनके बोलने में, उनके व्यवहार में सदैव प्रामाणिकता झलकती थी। वे जो कहते थे, वही करते भी थे। संडास साफ़ करने से लेकर सब कुछ। और उनका यह रूप अन्य नेताओं के मुकाबले विलोभनीय था। तत्कालीन कॉन्ग्रेस नेताओं को तो यह सब कुछ एक चमत्कार जैसा ही लगता था। सादे स्वरूप में, सादगी से रहने वाला, सादा जीवन व्यतीत करने वाला कोई नेता पहली बार भारतीय मिट्टी से निर्मित हो रहा था। यही सादगी भरा जीवन गाँधी जी का भारतीय लोगों से असली राजनैतिक ‘कनैक्ट’ था।

गाँधी जी के सादे जीवन के बारे में, रेल में तीसरी श्रेणी के डिब्बे में उनकी यात्रा के बारे में, उनके कुल रहन-सहन के बारे में भरपूर आलोचना भी हुईं। तीसरी श्रेणी के रेलवे डिब्बे में उनके द्वारा की गई यात्राएँ, प्रथम श्रेणी से भी अधिक महँगी लगती थीं। परन्तु सादे जीवन का यह दिखावा नहीं था। न ही गाँधीजी की ‘रणनीति’ कभी ऐसी रही। ऐसा सादा जीवन उनका ‘कनविक्शन’ था। इसीलिए आम जनता के सामने सादा जीवन व्यतीत करना और परदे के पीछे ऐशोआराम के साथ रहना… इस प्रकार का दोहरा और दिखावे का व्यवहार गाँधी ने कभी भी नहीं किया। भारत के सामान्य लोग गाँधी के साथ जिस प्रकार निरंतर जुड़ रहे थे, उन्हें देवता मानने लगे थे, उनकी पूजा करने लगे थे, उसके पीछे यही कारण मुख्य थे – अर्थात उनकी सादगी, सत्य के प्रति उनकी अविचल निष्ठा, आन्दोलनों की रचना में सामान्य व्यक्ति की सहभागिता और निर्भयतापूर्वक व्यवहार।

गाँधी का प्रत्येक आंदोलन, सामान्य व्यक्ति का आंदोलन था। बिना किसी तड़क-भड़क अथवा बिना किसी दिखावे के उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि एक सामान्य भारतीय को किसी आंदोलन से कैसे जोड़ा जा सकता है। फिर चाहे वह नमक सत्याग्रह हो, सविनय अवज्ञा आंदोलन हो, अथवा भारत छोड़ो आंदोलन हो। उन्होंने आंदोलन का स्वरूप ऐसा रखा कि सामान्य व्यक्ति भी उसे कर सके। अर्थात उपवास करना, सत्याग्रह करना, सूत कताई करना, पैदल मार्च करना… इसीलिए ये सभी आंदोलन देखते-देखते सर्वसामान्य जनता के आंदोलन बन गए और इन्हें जनता का जबरदस्त सहयोग मिला।

कॉन्ग्रेस के इतिहास में पहली बार, आन्दोलनों अथवा राजनैतिक मुहिमों का अच्छे से प्रबंधन एवं व्यवस्थापन किए जाने के बावजूद गाँधी जी द्वारा किए गए कुछ आंदोलन एकदम फेल हो गए थे। जैसे कि एकदम शुरुआती दौर का खिलाफत आंदोलन हो, अथवा चौरीचौरा का आंदोलन हो, या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो। अनेक बार इन आंदोलनों का नियंत्रण उनके हाथों से निकल गया था। परन्तु उन्होंने तत्काल स्थिति पर काबू पाने के लिए आंदोलन को स्थगित करके अपना नियंत्रण कायम रखने का प्रयास भी किया।

‘निर्भय स्वभाव’, गाँधी की एक बड़ी विशिष्टता थी। उनका निर्भय मन अनेकानेक बार प्रकट हुआ है। फिर चाहे वह शौचालय साफ़ करने के लिए लगने वाली हिम्मत हो, अथवा अंग्रेज सिपाहियों की लाठी के सामने धैर्यपूर्वक खड़े रहने का साहस हो। गाँधी स्वभावतः जिद्दी थे, लगभग दुराग्रही भी थे, कुछ-कुछ अभिमानी भी कहे जा सकते हैं। परन्तु कोई भी व्यक्ति उन्हें डरपोक अथवा घबरा जाने वाला नेता नहीं कह सकता।

कलकत्ते में चल रहे भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शांत करने के लिए गाँधी 9 अगस्त 1947 को वहाँ पहुँचे। इससे एक वर्ष पहले ही बंगाल के प्रधानमंत्री शहीद सुहरावर्दी ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम से कलकत्ता में हजारों हिंदुओं का रक्त बहाया था। इसलिए स्वाभाविक रूप से कलकता में सुहरावर्दी के विरोध में हिन्दू क्रोध से उबल रहे थे। एक दिन पहले, अर्थात 8 अगस्त 1947 को कलकत्ता में हिंदुओं की दुकानों पर हमला करने आई मुस्लिमों की भीड़ से मुकाबला करते समय वहाँ के डिप्टी पुलिस कमिश्नर एचएस घोष और एफएम जर्मन नामक वरिष्ठ अधिकारी गंभीर रूप से घायल हुए थे। वातावरण बेहद तनावपूर्ण था।

परन्तु एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह कलकत्ता पहुँचते ही उन्होने सुहरावर्दी के साथ पन्द्रह अगस्त तक एक ही मकान में, एक ही छत के नीचे रहने का प्रस्ताव रख दिया। इमारत का चयन भी कौन सा किया?? – मुस्लिम बहुल बस्ती की ‘हैदरी मंज़िल’।

सुहरावर्दी के लिए तो यह एक आश्चर्यजनक धक्का ही था। अपनी ही बस्ती में, अपने साथ दिन-रात एकत्र रहने का ऐसा कोई प्रस्ताव यह आदमी अपने सामने रखेगा, ऐसा तो उसने कभी सोचा ही नहीं था। हैरानी से भरा सुहरावर्दी गाँधी के स्वागत हेतु तैयार हुआ।

उस बेहद गंदे, अस्वच्छ स्थान पर रात बिताना सुहरावर्दी के लिए बहुत कठिन साबित हो रहा था। इसलिए पहली रात को वह हैदरी मंज़िल में सोने के लिए आया ही नहीं। परन्तु दूसरे दिन मजबूरी में उसे गाँधी के साथ रहने आना ही पड़ा। इस कारण एक बात हुई, कि जादू की छड़ी घुमाए जाने की तरह कलकत्ता में हिन्दू-मुस्लिम दंगे अचानक थम गए। पूरे भारत में, विभाजित हो चुके पंजाब सहित अन्य प्रान्तों के मुकाबले स्वतंत्रता दिवस के दिन कलकत्ता से अधिक शांत शहर दूसरा कोई नहीं था।

गाँधी का निर्भय स्वभाव हमें कदम-कदम पर दिखाई देता है। लन्दन की गोलमेज परिषद् हो अथवा दिल्ली के वायसरॉय हाउस में लॉर्ड माउंटबेटन के साथ बातचीत करते समय हो, गाँधी कभी भी किसी के सामने दबकर अथवा घबराहट में नहीं दिखाई देते थे। उन्होंने बड़े से बड़े और छोटे से छोटे सभी लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार रखा।

इसीलिए आपातकाल के समय, जब देश में लोकतंत्र बचाओ का आंदोलन चल रहा था, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं जनसंघर्ष समिति ने 2 अक्टूबर 1975 से एक बड़ी मुहिम चलाई, जिसे नाम दिया गया ‘निर्भय बनो’। एक मध्यम आकार का पोस्टर, जिस पर तेज गति से चलते हुए दांडी यात्रा की तस्वीर एवं बड़े-मोटे अक्षरों में एक ही वाक्य लिखा था – ‘निर्भय बनो’।

परन्तु इतना सब कुछ अच्छा होने के बावजूद गाँधी जी के व्यवहार एवं निर्णयों में विसंगति दिखाई देती है। गाँधी ने महिलाओं के बारे में अनेक स्थानों पर बहुत ही आदर युक्त उल्लेख किया है. महिलाओं की भूमिका के बारे में अच्छा लिखा हुआ है, महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए, यह भी उनका आग्रह हुआ करता था… परन्तु वास्तव में अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ गाँधी जी का व्यवहार कैसा था।

8 अगस्त 1942 की रात को, अर्थात ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की पूर्व संध्या पर गाँधी एवं कस्तूरबा को गिरफ्तार करके अंग्रेजों ने पुणे के ‘आगा खान पैलेस’ में रखा। यहाँ पर लगभग डेढ़ वर्ष बाद कस्तूरबा को गंभीर ब्रोंकाइटिस का दौरा पड़ा और यह बीमारी निमोनिया तक पहुँच गई। हालाँकि गाँधी कस्तूरबा की सेवा कर रहे थे, परन्तु गाँधी का विश्वास प्राकृतिक चिकित्सा पर था, इसलिए उन्होंने कस्तूरबा पर ‘जल चिकित्सा’ जैसे प्रयोग जारी रखे। प्राकृतिक चिकित्सा से कस्तूरबा को कोई लाभ नहीं हो रहा था। ब्रिटिश डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी कि कस्तूरबा को उन दिनों नई-नई आई पेनिसिलीन नामक एंटीबायोटिक दवा दी जाए। उनके बड़े पुत्र देवीदास ने तो यह जिद पकड़ ली कि कस्तूरबा को पेनिसिलीन दी जाए। परन्तु गाँधी अपनी मान्यताओं से एक इंच भी नहीं हटे। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा ही जारी रखी, और अंततः उस बीमारी का तनाव सहन नहीं कर पाने के कारण कस्तूरबा की हृदयाघात से मृत्यु हो गई।

कस्तूरबा के निधन डेढ़ माह बाद ही गाँधी जी को मलेरिया हो गया। उन्होंने कुछ दिन तो अपनी प्राकृतिक चिकित्सा के हिसाब से उपचार किया, परन्तु जब उनका मलेरिया बहुत बढ़ गया, तब डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने क्विनाइन की गोली खाकर अपना बुखार कम किया और इस प्रकार गाँधी ठीक हुए।

गाँधी की जिद के कारण ही उन्होंने अपने बड़े बेटे देवीदास को शालेय शिक्षा ग्रहण नहीं करने दी। देवीदास की उन्होंने एक भी इच्छा पूरी नहीं की, और इस प्रकार अंततः देवीदास, गाँधी के नियंत्रण से बाहर चला गया। ‘व्यामिश्र’ व्यक्तित्त्व के ऐसे अनेक ऊँचे-नीचे, फूल-काँटों से भरे कई अटपटे व्यवहार हमें गाँधी की जीवनी में दिखाई देते हैं।

जीवन के अंतिम वर्षों में, विशेषकर मृत्यु से पहले अंतिम वर्ष में, गाँधी का व्यवहार लोगों को परेशानी और दुविधा में डालने वाला रहा। मूलतः गांधी एक चतुर राजनीतिज्ञ थे। अंग्रेजों के साथ संघर्ष में अथवा अपने शुरुआती आन्दोलनों की दिशा में उनकी यह चतुरता स्पष्ट दिखाई भी देती है।

परन्तु यही गाँधी, जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं पर, आँख बन्द करके भरोसा करते हैं, तब मन में यही सवाल उठता है कि ‘क्या यह वही पुराने जोरदार आन्दोलनों वाले, अंग्रेज़ सरकार को झुकाने वाले गाँधी हैं?’ पश्चिम पंजाब के ‘वाह’ शरणार्थी शिविर में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं से बातचीत करते समय गाँधी लगातार यही कहते रहे कि, “….आप लोगों को पन्द्रह अगस्त के बाद जिस प्रकार के हिन्दू-मुस्लिम दंगों का डर सता रहा है, वैसा मुझे कुछ भी प्रतीत नहीं होता। मुसलमानों को पाकिस्तान चाहिए था, वह उन्हें मिल चुका है। अब मुसलमान कुछ भी हिंसक कार्य करेंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता। जिन्ना साहब और मुस्लिम लीग ”के नेताओं ने भी मुझे शान्ति और सदभाव का आश्वासन दिया है। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है कि पाकिस्तान बनने के बाद हिन्दू और सिख एकदम सुरक्षित रहेंगे। इसलिए आप इन मुस्लिम नेताओं के आश्वासनों का आदर करें। पश्चिमी पंजाब का यह शरणार्थी शिविर पूर्वी पंजाब ले जाने का कोई कारण मुझे दिखाई नहीं देता, आप अपने मन का भय निकाल दें।”

और वास्तव में हुआ क्या?? हिंदुओं एवं सिखों का जबरदस्त कत्लेआम हुआ। विशेषकर 15 अगस्त के बाद नए बने पाकिस्तान से हिंदुओं एवं सिखों को मार-मारकर भगाने के लिए स्वयं मुस्लिम लीग ने खुल्लमखुल्ला बड़े पैमाने पर दंगों में भाग लिया, बड़ी संख्या में हिन्दू और सिखों को या तो समाप्त कर दिया गया अथवा बर्बाद करके भारत की तरफ भगा दिया गया।

लाहौर के एक सिख निर्वासित बंधु के कटु प्रश्नों का उत्तर देते समय 6 अगस्त 1947 को गाँधी कहते हैं कि, “… मुझे यह बात बहुत खराब लग रही है कि पश्चिम पंजाब से सभी गैर-मुस्लिम पलायन कर रहे हैं। कल ‘वाह’ के शरणार्थी शिविर में भी मैंने यही सुना, और आज यहाँ लाहौर के शिविर में भी यही देख रहा हूँ। ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए। यदि आप लोगों को ऐसा लगता है कि आपकी मृत्यु लाहौर में ही होगी, अथवा आप मरने वाले हैं, तो इससे दूर नहीं भागिए। बल्कि यदि लाहौर मर रहा है, तो आप भी उसके साथ निर्भयतापूर्वक मृत्यु का सामना कीजिए। जब आप किसी से भयग्रस्त होते हैं, तब प्रत्यक्षतः आप मरने से पहले ही मर जाते हैं। यह उचित नहीं है। यदि पंजाब से ऐसी ख़बरें आती हैं कि पंजाबियों ने बिना किसी घबराहट के धैर्यपूर्वक मृत्यु का सामना किया, तो मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगेगा।”

I must say that this is not as it should be. If you think Lahore is dead or is dying, do not run away from it, but die with what you think is a dying city.” – Times of India, Bombay. 8th August 1947

गाँधी को सदैव दिल से यही लगता रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यदि वे पाकिस्तान जाकर रहने लगें, तो वे वहाँ के मुस्लिमों का हृदय परिवर्तन करने में सफल होंगे और पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर जो बड़े पैमाने पर हमले और अत्याचार हो रहे हैं वह रोकने में सफलता मिल जाएगी। उन्होंने अनेक बार अपना यह विचार सार्वजनिक रूप से बयान भी किया। परन्तु गाँधी जी का दुर्भाग्य देखिये कि नवनिर्मित पाकिस्तान में वहां के बड़े नेता तो छोड़िए, किसी छुटभैये नेता ने एक बार भी गाँधी जी से पाकिस्तान पधारने का आग्रह भी नहीं किया।

यह सारी घटनाएँ इंसानी समझ से बाहर की और बेहद आश्चर्यजनक लगती हैं। स्वयं को ‘बनिया’ कहने वाले गाँधी, जिन्ना और मुस्लिम लीग की राजनीति के सामने इतने भोले और नादान कैसे सिद्ध हुए?

भारत के खंडित होने के बाद तो गाँधी पूर्णरूप से अप्रासंगिक ही हो चुके थे। नए भारत के निर्माण संबंधी एक भी महत्वपूर्ण निर्णय में गाँधी से सलाह-मशविरा किया गया हो, ऐसा नहीं दिखाई देता। वास्तव में मूलतः नेहरू की नीतियों में “व्यवस्था विरोधी’ गांधी कहीं भी फिट नहीं बैठते थे। इसीलिए स्वतंत्रता के पश्चात कॉन्ग्रेस ने गाँधी के सभी मूलभूत तत्वों, अर्थात सादगी, सच्चाई, स्वदेशी भाषा, स्वदेशी वस्तुओं, भारतीय परम्पराओं इत्यादि से एकदम दूरी बना ली। कॉन्ग्रेस ने गांधी का सब कुछ त्याग दिया। लेकिन राजनीति की खातिर गाँधी का एकमात्र सिद्धांत ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ को कॉन्ग्रेस ने थामे रखा।

वास्तव में देखा जाए, तो गाँधी सच्चे और कट्टर सनातनी थे। वे हिन्दू धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति थे। इस बारे में वे आग्रही भी थे। परन्तु भारत के आधुनिक इतिहास में गाँधी के बारे में जो चित्र उभरता है वह यह कि गाँधी मुसलमानों के नेता और पाकिस्तान का निर्माण करने वाले प्रमुख घटक थे। आज विश्व भर में भारत की पहचान ‘गाँधी का देश’ के रूप में होती है। गाँधी जी के जीवन दर्शन के सभी तत्त्व, उनकी श्रद्धा एवं गाँधी जी के जीवन मूल्यों को विश्व के सामने आना आवश्यक है, क्योंकि ऐसा होने पर ही ‘वास्तविक गाँधी’ दुनिया के सामने आएँगे।

लेखक: प्रशांत पोल

हबीबुल्लाह ने फैशन डिजाइनर ममता का धर्मांतरण कर किया निकाह, फिर उसकी नाबालिग बेटी पर रखने लगा बुरी निगाह, ₹12 लाख लेकर भी भागा

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले से धर्मान्तरण का चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। आंध्र प्रदेश से ममता उर्फ ममीशा खान नाम की महिला अपने शौहर की तलाश में गोरखपुर पहुँचकर पुलिस से मदद माँगी है। महिला का आरोप है कि उसका शौहर जबरन धर्मांतरण करने के बाद उससे निकाह किया और घर बनवाने के नाम उससे 12 लाख रुपये लेकर फरार हो गया।

महिला का कहना है कि हबीबुल्लाह नाम का शख्स 4 साल पहले कमाने के लिए आंध्र प्रदेश गया था। वहाँ हबीबुल्लाह ने उसे अपने प्रेमजाल में फंसा लिया और बाद में उसका जबरन धर्मान्तरण कराकर उसका नाम ममता से ममीशा खान रख दिया और निकाह कर लिया। महिला ने बताया कि तीन महीने पहले हबीबुल्लाह अपने घर गोरखपुर आया था, लेकिन यहाँ आकर उसने अपना मोबाइल बंद कर लिया है।

महिला ने बताया कि हबीबुल्लाह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के कैम्पियरगंज थाने के कुनवार गाँव का रहने वाला है। महिला शुक्रवार (1 अक्टूबर 2021) को अपने दो बच्चों को लेकर थाने पहुँची और इस मामले में पुलिस से मदद माँगी।

पेशे से फैशन डिजाइनर ममता उर्फ ममीशा खान ने पुलिस को दी गई लिखित तहरीर में बताया है कि अब हबीबुल्लाह का मोबाइल फोन स्विच ऑफ है। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि आरोपित ने घर बनवाने के नाम पर उससे 12 लाख रुपए से अधिक की रकम भी ऐंठ ली। ममता उर्फ ममीशा खान ने बताया कि उसका पहले पति से रिश्ता टूट चुका है और उसके दो बच्चे हैं।

ममीशा खान के मुताबिक, आरोपित ने उसके साथ 16 अगस्त 2017 में निकाह किया था। इसके बाद उसने महिला से गाँव में घर बनवाने के नाम पर पहले 4.50 लाख रुपए लिए। इसके बाद किसी न किसी तरह करके उसने 12 लाख रुपए से अधिक रुपए ले लिए।

बेटी पर भी रखता था बुरी नजर

पीड़िता के मुताबिक, शुरुआत में तो सब ठीक था, लेकिन कुछ दिन बाद आरोपित हबीबुल्लाह की नजर महिला की 16 साल की बेटी पर टिक गई। वह नाबालिग पर यौन संबंध बनाने का दबाव डालने लगा। जब वह नहीं मानी तो उसके साथ मारपीट कर हबीबुल्लाह जुलाई में गोरखपुर भाग आया।

मक्का में देखा सपना 4000 Km दूर पूरा किया: हिन्दू लड़की से निकाह करने वाला अरब का फकीर, जिसके कारण लक्षद्वीप में 98% मुस्लिम

शायद भारत में बहुतेरे लोगों को पता भी नहीं था कि लक्षद्वीप में इस्लाम ने अपना पाँव इतना जमा लिया है कि वहाँ की 98% जनसंख्या मुस्लिम है। जहाँ सड़कों पर सरेआम माँस कटते हों, शराब प्रतिबंधित हो और कपड़े पहनने के मामले में अघोषित शरिया लागू हो, वहाँ क्या कभी पर्यटन पनप सकता है? लक्षद्वीप का दुर्भाग्य है कि दुनिया के सबसे सुंदर द्वीप समूहों में से एक होने के बावजूद पर्यटन के मामले में ये तरक्की नहीं कर पाया।

हाल के दिनों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने प्रफुल्ल खोड़ा पटेल को इस केन्द्रशासित प्रदेश का प्रशासक बना कर भेजा और उन्होंने इस स्थल को मालदीव के टक्कर का बनाने के लिए कुछ सुधर योजनाएँ लाई, तब जाकर लोगों को पता चला कि लक्षद्वीप की क्या हालत बना दी गई है। देश भर में इस्लाम संगठन इसके खिलाफ सड़क पर उतर आए और राजनीतिक दलों ने भी उनके लिए आवाज़ उठाई।

लेकिन, क्या किसी ने ये सोचा कि आज तक लक्षद्वीप में ‘राष्ट्रपिता’ कहे जाने वाले उन महात्मा गाँधी की प्रतिमा क्यों नहीं लग पाई, जिनकी कसमें विपक्ष का हर नेता दिन में 10 बार खाता है? क्या गाँधी तब उनके प्रिय नहीं रह जाते, जब मुस्लिम उनका विरोध करें? बूतपरस्ती शरिया में हराम है, इसीलिए लक्षद्वीप की मुस्लिम जनसंख्या ने एक ‘पुतले’ को वहाँ नहीं लगने दिया। ‘आज़ादी के अमृत महोत्सव’ में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ये काम भी पूरा कर दिया

ध्यान दीजिए, दिन भर गाँधी-गाँधी चिल्लाते हुए उनके आदर्शों और मूल्यों का रट्टा मारने वाले विपक्षी नेता सत्ता में रहते हुए ऐसा नहीं कर पाए थे और 2010 में यूपीए सरकार को पीछे हटना पड़ा था। मोदी सरकार ने ये कर दिखाया। जैसे कश्मीर बदला है, लक्षद्वीप भी बदलेगा। लेकिन, आइए इसी बहाने हम क्यों न भारत के दक्षिणी भाग में स्थित इस द्वीप समूह के इतिहास को समझें और ये भी कि इस्लाम ने यहाँ कैसे डेरा जमाया।

यहाँ नाम आता है शेख उबैदुल्लाह का, जिसे ‘संत उबैदुल्लाह’ भी कहते हैं। भारत में अधिकतर सूफी संत किसलिए आए थे, इस बारे में हम पहले भी बता चुके हैं। वो सुल्तान का मुखौटा होते थे और इस्लामी आक्रमण के इर्दगिर्द नरम रुख दिखा कर गरीबों का धर्मांतरण कराते थे। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती और चाँद मियाँ इसके उदाहरण हैं। बंगाल में ऐसे ‘सूफी संतों’ ने मंदिर तोड़े। कइयों ने युद्ध भी लड़ा, ‘काफिर’ हिन्दुओं के विरुद्ध।

इसी तरह सातवीं शताब्दी में शेख उबैदुल्लाह हुआ। अब वो कहानी सुनिए, जो इस्लामी समाज के बीच फैली हुई है। शेख उबैदुल्लाह अरब में रहता था और मक्का-मदीना में नमाज पढ़ता था। एक बार मक्का में अल्लाह की इबादत करते समय उसे नींद आ गई और सपने में खुद पैगंबर मुहम्मद आ पहुँचे। सपने में ही उन्हें आदेश मिला कि जेद्दाह (सऊदी अरब का बंदरगाह) जाओ और वहाँ से एक जहाज लेकर इस्लाम को फैलाने के लिए दूर-दूर क्षेत्रों में निकलो।

कहानी आगे कुछ यूँ जाती है कि शेख उबैदुल्लाह समुद्र के रास्ते निकल पड़ा। कई महीनों तक समुद्र में भटकने के बाद एक तूफ़ान आया और उसका जहाज अमिनि द्वीप से आ टकराया। इसके बाद उसे फिर से नींद आ गई और वो सो गया। जैसा कि मक्का में हुआ था, पैगंबर मुहम्मद फिर से उसके सपने में आए और कहा कि इसी द्वीप पर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करो। इसके बाद उसने आदेश का पालन शुरू कर दिया।

ये कहानी लक्षद्वीप की सरकार वेबसाइट पर द्वीप समूह के इतिहास के वर्णन में भी दी गई है। इसमें लिखा है कि उस समय यहाँ के मुखिया ने उसकी मंशा को भाँप कर उसे बाहर निकाल दिया, लेकिन वो अड़ा रहा। फिर एक सुंदर हिन्दू युवती के उसके प्यार में पड़ने की बात कही जाती है। उसने उसका धर्मांतरण करा के मुस्लिम बनाया और ‘हमीदत बीबी’ नाम रखा। शेख उबैदुल्लाह ने उसके साथ निकाह भी रचा लिया।

अब जरा ये देखिए कि झूठे चमत्कार की कहानियों को फैला कर कैसे अपने मजहब को श्रेष्ठ साबित किया जाता है। इस्लामी नैरेटिव की कहानी के अनुसार, स्थानीय मुखिया ने जब उसे मारने की योजना बनाई और अपने सैनिकों के साथ उसे घेर लिया, तब शेख उबैदुल्लाह ने अल्लाह को याद किया और उसे घेरे उसके सभी विरोधी अंधे हो गए। दोनों भाग निकले और जैसे ही उन्होंने द्वीप छोड़ा, इन लोगों की आँखों की रोशनी वापस आ गई।

इसके बाद शेख उबैदुल्लाह एंड्रोट द्वीप पर पहुँचा, लेकिन वहाँ भी उसका कड़ा विरोध हुआ। लेकिन, किसी तरह उसने लोगों को फुसला कर कइयों का इस्लामी धर्मांतरण किया। फिर उसने लक्षद्वीप के कई द्वीपों में जाकर इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया और धर्मांतरण अभियान चलाया। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वो एंड्रोट लौटा, जहाँ उसे दफनाया गया। आज एंड्रोट में उसका मकबरा है और श्रीलंका से लेकर बर्मा और मलेशिया तक से लोग उसके कब्र पर आते हैं।

कहते हैं कि बाद में उसने अमिनी में जाकर भी बड़े पैमाने पर लोगों का धर्मांतरण कराया और इस बारे नए-नए मुस्लिम बने कई स्थानीय लोग उसके साथ थे, इसीलिए उसका विरोध भी कम हुआ। इसी तरह उसने कवरत्ती और अगट्टी में भी बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का इस्लामी धर्मांतरण किया। एंड्रोट के जुमा मस्जिद में उसकी कब्र है, जो उसके समय ही बना था। ये उसके ब्रेंनवॉशिंग का कमाल ही था कि आज लक्षद्वीप की 98% आबादी मुस्लिम है।

लक्षद्वीप के इतिहास का वर्णन हमें बिचित्रानन्द सिन्हा की ‘Geo-economic Survey of Lakshadweep‘ में भी मिलता है। इसमें बताया गया है कि अरब के लोगों ने यहाँ के मूल निवासियों के बारे में कुछ खास नहीं लिखा है, लेकिन इतना ज़रूर जिक्र किया है कि वो लोग अपने धर्म के पक्के अनुयायी थे। इसमें लिखा है कि वहाँ के पुराने मस्जिदों की वास्तुकला हिन्दू मंदिरों की तरह है, अतः हिन्दुओं की यहाँ जनसंख्या निवास करती थी।

लक्षद्वीप की सरकारी वेबसाइट पर भी मौजूद है शेख उबैदुल्लाह का इतिहास

खुदाई से पता चला है कि यहाँ नाग की पूजा के साथ-साथ लोग भगवान श्रीराम को भी मानते थे। एक और लोकप्रिय कहानी केरल के राजा चेरामन पेरुमल को लेकर है, जिसने 825 ईश्वी में इस्लाम अपना लिया था और फिर गायब हो गया। जहाजों ने उसे खोजना शुरू किया और इसी दौरान कई लोग लक्षद्वीप तक पहुँचे। लोगों का मानना था कि राजा मक्का चला गया है। इसी दौरान उन्होंने बंगरम द्वीप की खोज की।

इसके बाद लौट कर उन्होंने मालाबार के राजा कोलत्तिरि को इस नए द्वीप को बताया, जो उनके हिसाब से नारियल की खेती और मछली पालन के लिए उपयुक्त था। इसके बाद मालाबार से कई लोग यहाँ पहुँचे। हालाँकि, कई इतिहासकारों का मानना है कि इस्लाम के जन्म के काफी पहले से यहाँ अच्छी-खासी जनसंख्या रहती थी। केरल से यहाँ जो लोग आकर बसे थे, वो भी हिन्दू ही थे। फिर भी लंबे समय तक ये हिन्दू राजाओं के शासन में ही रहा।

इसीलिए, आज जब मध्यकालीन युग में जी रहे इस द्वीप समूह का विकास कर के इसे आधुनिक बनाया जा रहा है और देश-विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए खुले विचारों को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो महिलाओं को बुरका-हिजाब में देखने की वकालत करने वालों को ये नहीं ही अच्छा लगेगा। सड़कों पर गोहत्या करना बंद होगा – ये उन्हें नहीं पसंद आएगा। अब देखना ये है कि कब तक लक्षद्वीप के इन सुधार कानूनों के परिणाम आने शुरू होते हैं।