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‘अफगान फौज ही लड़ना नहीं चाहती तो हम क्यों मरें’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा- हम वहाँ देश बनाने नहीं, अपने लिए गए थे

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन ने अफगानिस्तान के हालिया संकट और तालिबान द्वारा काबुल पर कब्ज़ा किए जाने के बाद बयान जारी किया है। उन्होंने कहा कि वो और उनकी टीम पूरी गतिविधियों पर नजर रखे हुए है। उन्होंने याद किया कि कैसे 9/11 के दोषियों को पकड़ने के लिए अमेरिका 2001 में अफगानिस्तान में घुसा था, ताकि अलकायदा अमेरिका के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल नहीं कर सके।

उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने लक्ष्य में कामयाब रहा और अलकायदा को एकदम सीमित कर दिया गया। उन्होंने याद किया कि कैसे ओसामा बिन लादेन के लिए अमेरिका ने तलाश जारी रखी और अंत में उसे मार गिराया। उन्होंने कहा कि एक दशक पहले की बात है। उन्होंने कहा कि अमेरिका का अफगानिस्तान मिशन कभी वहाँ एकीकृत व केंद्रीयकृत लोकतंत्र की स्थापना या फिर राष्ट्र निर्माण के लिए नहीं था।

उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में अमेरिका के मिशन का सिर्फ और सिर्फ एक ही लक्ष्य था – अमेरिका पर होने वाले हमले को रोकना। उन्होंने कहा कि वो शुरू से इसके पक्षधर रहे हैं कि हमारा मिशन आतंकवाद के खिलाफ हो, विद्रोह को दबाना या राष्ट्र निर्माण नहीं। उन्होंने बताया कि 2009 में उप-राष्ट्रपति रहते भी उन्होंने अफगानिस्तान में सेना बढ़ाए जाने की आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि अब वो 2021 के खतरों पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, पिछले दिनों के खतरों की तरफ नहीं।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि आज आतंकवाद सिर्फ अफगानिस्तान तक ही सीमित नहीं है। इसके लिए उन्होंने सोमालिया के अल-शबाब, अरब में अलकायदा, सीरिया में अल-नुसरा, और ISIS द्वारा वहाँ खिलाफत की स्थापना किए जाने के प्रयासों अफ्रीका व एशिया के कई देशों में अपना संगठन खड़ा करने जैसी घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हमारा ध्यान व संसाधनों का इस्तेमाल इन खतरों से निपटने के लिए होना चाहिए।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि अमेरिका कई ऐसे देशों में भी आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रहा है, जहाँ उसकी सैन्य उपस्थिति नहीं है। साथ ही कहा कि ज़रूरत पड़ने पर अमेरिका की तरफ बढ़ते किसी भी खतरे को समाप्त करने की क्षमता देश के पास है। उन्होंने कहा कि उनके पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रम्प ने ही करार किया था कि मई 2021 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस आ जाएगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प के समय ही सेना की वापसी शुरू हो गई थी और अफगानिस्तान में 15,000 सैनिक से लेकर 2500 ट्रूप्स उपस्थित थे, जबकि तालिबान 2001 के बाद अपनी सबसे मजबूत स्थिति में था। उन्होंने कहा कि उनके पास सिर्फ दो विकल्प थे – पहले से हुए करार का अनुसरण करना या फिर वापस जाकर तालिबान से लड़ना। उन्होंने कहा कि वहाँ और सेना भेजने के साथ ही हम इस युद्ध के तीसरे दशक में प्रवेश कर जाते।

उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का इससे अच्छा कोई समय नहीं है। उन्होंने इसे एक सही निर्णय बताते हुए कहा कि जो युद्ध अफगानिस्तान की सेना भी नहीं लड़ना चाहती है और बिना लड़े ही हथियार डाल रही है, वहाँ अमेरिका की सेना जाकर क्यों अपनी जान गँवाए? उन्होंने बताया कि कैसे ट्रिलियन डॉलर खर्च कर के अफगानिस्तान की 3 लाख की सेना तैयार की गई, जो कई NATO देशों से भी ज्यादा है।

बकौल अमेरिकी राष्ट्रपति, उस सेना को प्रशिक्षण, उपकरण व हथियार दिए गए, वेतन दिया गया, वायुसेना को मजबूत बनाया गया। उन्होंने कहा कि तालिबान के पास तो वायुसेना भी नहीं है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की फौज को हमने सब कुछ दिया, लेकिन भविष्य में लड़ने के लिए इच्छाशक्ति नहीं दे पाए। उन्होंने कहा कि अगर अफगानिस्तान ही लड़ना नहीं चाहता है तो अमेरिकी सेना कितने साल भी वहाँ रह जाए, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।

अफगानिस्तान की ताज़ा स्थिति पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन का बयान

जो बायडेन ने कहा, “जब अफगानिस्तान की खुद की ही फौज आगे नहीं आ रही है तो अमेरिकी सेना को वहाँ लड़ने के लिए बोलना गलत है। जब वहाँ के नेता ही भविष्य के लिए एकजुट होकर बातचीत नहीं कर रहे हैं, तो हम वहाँ रह कर उनके लिए क्यों लड़ते रहें? हमारे प्रतिद्वंद्वी चीन और रूस तो चाहते ही हैं कि हम वहाँ बिलियंस डॉलर खर्च कर के बने रहें। मैंने राष्ट्रपति अशरफ गनी से बात की, नेताओं को एकजुट होने को कहा लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए। अमेरिका की कितनी पुश्तें आप अफगानिस्तान में देखेंगे? ये सवाल उनसे है जो कह रहे कि हमें वहाँ रुकना चाहिए।”

जो बायडेन ने कहा, “मैं इतिहास की गलतियों को नहीं दोहराऊँगा। ये अमेरिका के हित में नहीं है कि वो किसी दूसरे देश के सिविल वॉर में पड़े। अफगानिस्तान में हम जो देख रहे हैं, वो सच में दुःख देने वाला है। मैंने सालों इस मुद्दे पर काम किया है। अब मैं वहाँ से लोगों को निकालने के लिए 6000 सैनिकों को तैनात कर रहा हूँ। हमारे व हमारे सहयोगियों के कर्मचारियों के साथ-साथ हम कई अफगान नागरिकों को भी निकाल रहे हैं। हमने दूतावास बंद कर दिया है और ये सब एयरपोर्ट तक ही सीमित है। हम खतरे में पड़े अफगान नागरिकों को वीजा भी दे रहे।”

उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अफगानिस्तान में तालिबानी शासन की सराहना की है। इस्लामाबाद में ‘एकल राष्ट्रीय पाठ्यक्रम’ के उद्घाटन समारोह के दौरान उन्होंने तालिबानी शासकों द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने को उचित ठहराया। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि अफगान के नागरिकों की मानसिक गुलामी की जंजीरें टूट गईं। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा उन पर अपनी संस्कृति को थोपना मानसिक दासता के समान था।

एक मंदिर जिसे ध्वस्त करने आए औरंगजेब को गर्भगृह से भागना पड़ा था, जिसके लिए नर्मदा ने बदली अपनी दिशा

माँ नर्मदा की गोद में बसे मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में कई ऐसे मंदिर हैं जिनके इतिहास की गणना करना बहुत कठिन है। इनमें से कई मंदिर दूर-दराज के इलाकों में स्थित हैं। ऐसा ही एक मंदिर नर्मदा से थोड़ी दूर पर लगभग 70 फुट ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। विश्व प्रसिद्ध भेड़ाघाट के नजदीक स्थित चौसठ योगिनी मंदिर सभवतः भारत का इकलौता मंदिर है, जहाँ भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि इस मंदिर के लिए नर्मदा ने भी अपनी दिशा बदल दी थी। हालाँकि देश के कई अन्य मंदिरों की तरह यह भी औरंगजेब के इस्लामिक कट्टरपंथ की भेंट चढ़ा, लेकिन वह मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा का कोई नुकसान नहीं कर पाया।

इतिहास

कई मान्यताओं के अनुसार जब एक बार भगवान शिव और माता पार्वती भ्रमण के लिए निकले तो उन्होंने भेड़ाघाट के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर विश्राम करने का निर्णय किया। इस स्थान पर सुवर्ण नाम के ऋषि तपस्या कर रहे थे जो भगवान शिव को देखकर प्रसन्न हो गए और उनसे प्रार्थना की कि जब तक वो नर्मदा पूजन कर वापस न लौटें तब तक भगवान शिव उसी पहाड़ी पर विराजमान रहें। नर्मदा पूजन करते समय ऋषि सुवर्ण ने विचार किया कि यदि भगवान हमेशा के लिए यहाँ विराजमान हो जाएँ तो इस स्थान का कल्याण हो और इसी के चलते ऋषि सुवर्ण ने नर्मदा में समाधि ले ली।

इसके बाद से कहा जाता है कि आज भी उस पहाड़ी पर भगवान शिव की कृपा भक्तों को प्राप्त होती है। माना जाता है कि नर्मदा को भगवान शिव ने अपना मार्ग बदलने का आदेश दिया था ताकि मंदिर पहुँचने के लिए भक्तों को कठिनाई का सामना न करना पड़े। इसके बाद संगमरमर की कठोरतम चट्टानें मक्खन की तरह मुलायम हो गई थीं जिससे नर्मदा को अपना मार्ग बदलने में किसी भी तरह की कठिनाई नहीं हुई।

चौसठ योगिनी मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी के दौरान कल्चुरी शासक युवराजदेव प्रथम के द्वारा कराया गया। उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती समेत योगिनियों का आशीर्वाद लेने के उद्देश्य से इस मंदिर का निर्माण कराया था। युवराजदेव के बाद 12वीं शताब्दी के दौरान शैव परंपरा में पारंगत गुजरात की रानी गोसलदेवी ने चौसठ योगिनी मंदिर में गौरी-शंकर मंदिर का निर्माण कराया।

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर की तरह यह मंदिर भी तंत्र साधना का एक महान स्थान हुआ करता था। यह मंदिर काल गणना और पंचांग निर्माण का सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता था जहाँ ज्योतिष, गणित, संस्कृत साहित्य और तंत्र विज्ञान का अध्ययन करने के लिए देश और विदेश से छात्र आया करते थे। 10वीं शताब्दी का यह मंदिर उस समय का आयुर्वेद कॉलेज हुआ करता था। खुले आसमान के नीचे ग्रह और नक्षत्रों की गणना के साथ आयुर्वेद की शिक्षा भी दी जाती थी।

संरचना और इस्लामिक आक्रमण

पत्थरों से निर्मित चबूतरे पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है। त्रिभुजाकार कोणों पर योगिनियों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। मंदिर परिसर की गोलाकार संरचना के केंद्र में गर्भगृह में गौरीशंकर की प्रतिमा स्थापित है। नंदी पर विराजमान भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह प्रतिमा संभवतः पूरे भारत में कहीं नहीं है। मुख्य मंदिर के सामने नंदी प्रतिमा है और एक छोटे चबूतरे पर शिवलिंग स्थापित है, जहाँ श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न तरह के अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

हालाँकि मंदिर में योगिनियों की प्रतिमाओं को खंडित कर दिया गया है और यह कार्य किसी और ने नहीं बल्कि इस्लामी आक्रांता औरंगजेब ने किया, जिसने अपने शासनकाल में हजारों हिन्दू मंदिरों को अपना निशाना बनाया। कहा जाता है कि औरंगजेब ने अपनी तलवार से एक-एक योगिनी की प्रतिमा को खंडित किया, लेकिन जब वह गर्भगृह में स्थापित गौरीशंकर की प्रतिमा को खंडित करने गया तो दैवीय चमत्कार के कारण उसे भयभीत होकर वहाँ से भागना पड़ा था।

कैसे पहुँचे?

जबलपुर, मध्य प्रदेश के चार प्रमुख नगरों में से एक है ऐसे में यहाँ पहुँचने के लिए यातायात के साधन और शहर के अंदर परिवहन व्यवस्था दोनों ही बेहतर है। मंदिर का नजदीकी हवाई अड्डा जबलपुर डुमना एयरपोर्ट ही है जो मंदिर से लगभग 34 किमी दूर है। इसके अलावा इंदौर का देवी अहिल्याबाई एयरपोर्ट, जबलपुर लगभग 534 किमी की दूरी पर है। जबलपुर मध्य भारत का एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है। जंक्शन से चौसठ योगिनी मंदिर की दूरी 22 किमी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों समेत देश के प्रमुख नगरों से सड़क मार्ग के जरिए जबलपुर पहुँचना काफी आसान है।

सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने किया तालिबान का बचाव, कहा- ‘अपने देश को आजाद कराने के लिए उठाया उचित कदम’

अफगानिस्तान पर तालिबानी शासकों के कब्जे से पूरी दुनिया चिंतित है और सभी देश अपने नागरिकों को वहाँ से निकालने में लगे हुए हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के फिर से आने पर लोगों में खासा डर देखा जा रहा है।

इसी बीच उत्तर प्रदेश के संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे को लेकर चौंकाने वाला बयान दिया है। सपा सांसद ने तालिबान शासकों के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि तालिबान एक ऐसी ताकत है, जिसने रूस और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों को भी अपने देश पर कब्जा नहीं करने दिया।

अपने बयानों के कारण विवादों में रहने वाले शफीकुर्रहमान ने तालिबानियों की तारीफों के पुल बाँधते हुए कहा कि अब तालिबान अपने देश को आजाद कर उसे चलाना चाहता है, यह उसका आंतरिक मामला है। उन्होंने कहा कि भारत में भी अंग्रेजों से पूरे देश ने लड़ाई लड़ी थी। रहा सवाल हिंदुस्तान का तो यहाँ कोई अगर कब्जा करने आएगा तो उससे लड़ने को देश मजबूत है।

इसके अलावा सपा सांसद ने भाजपा की जन आशीर्वाद यात्रा पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि जब बीजेपी ने देश की जनता के हित के लिए कोई काम नहीं किया है तो जन आशीर्वाद यात्रा निकालने का क्या मतलब है। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार में आम आदमी से लेकर किसान तक सभी परेशान हैं। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी की भी राज्य में सरकार थी, लेकिन हमने लोगों को कभी परेशान नहीं किया।

यह पहली बार नहीं है जब सांसद ने विवादित बयान दिया हो। इससे पहले भी उन्होंने भाजपा सरकार को मुस्लिम विरोधी बताया था। उन्होंने कहा था, ”बीजेपी ने न सिर्फ शरीयत से छेड़छाड़ की बल्कि लड़कियों को पकड़वाकर बलात्कार भी कराया। मुसलमानों के साथ मॉब लिंचिंग और तमाम ज्यादतियाँ की हैं। सरकार अब कोरोना के रूप में इसका खामियाजा भुगत रही है।”

भारत की अध्यक्षता में तालिबान और अफगानिस्तान पर बुलाई गई UNSC की आपातकालीन बैठक: जानें क्या हुई चर्चा

अफगानिस्तान में तेजी से बदले स्थानीय हालातों के मद्देनजर भारत की अध्यक्षता में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की आपात बैठक बुलाई गई।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहे भारत ने कहा कि काबुल के हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लोग बेहद बुरी हालत में दिखाई दिए। महिलाएँ एवं बच्चे तनाव में हैं और एयरपोर्ट समेत शहर के अन्य हिस्सों से गोलीबारी की खबरें आ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि यदि आतंकवाद के प्रति कोई सहिष्णुता नहीं दिखाई जाती है और अफगानी इलाकों का उपयोग किसी अन्य देश को धमकाने या उस पर हमला करने के लिए नहीं होता है तो अफगानिस्तान का पड़ोसी इलाका सुरक्षित महसूस करेगा।

भारत ने यह भी कहा कि अफगानिस्तान का पड़ोसी और वहाँ के लोगों का मित्र होने के नाते अफगानिस्तान में जो भी हो रहा है वह चिंता का विषय है। अफगानी पुरुष, महिलाएँ और बच्चे लगातार डर में जी रहे हैं। इसके अलावा भारत ने कहा कि इस संकट के पहले से अफगानिस्तान के सभी 34 प्रांतों में कोई न कोई डेवलपमेंट प्रोजेक्ट चल रहे हैं, साथ ही यह भी कहा गया कि भारत सभी पक्षों से यह आशा करता है कि संयुक्त राष्ट्र और दूतावास के सदस्यों समेत अन्य कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

अफगानिस्तान की ओर से बात रखते हुए संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्य और राजदूत गुलाम एम इसाकजई ने कहा, “मैं अफगानिस्तान के लाखों लोगों की ओर से बोल रहा हूँ। मैं उन लाखों अफगानी लड़कियों और महिलाओं की ओर से बोल रहा हूँ जो स्कूल जाने और राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक भागीदारी की स्वतंत्रता खोने वाली हैं।” इसाकजई ने कहा कि तालिबान दोहा और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किए गए अपने वादों का कोई सम्मान नहीं कर रहा है और लोग डर में जीने को मजबूर हैं।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस (António Guterres) ने कहा कि वह तालिबान समेत सभी पक्षों से यह अपील करते हैं कि लोगों की जान बचाने और मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने की प्रतिबद्धता दिखाई जाए।

गुटेरेस ने यह भी कहा कि अफगानी गौरवपूर्ण लोग हैं और वह पीढ़ियों से युद्धरत और कठिनाईयों को झेलने के लिए जाने जाते हैं और वह हमारे पूरे सहयोग के अधिकारी हैं। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया देख रही है और हम किसी भी हालत में अफगानिस्तान को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते हैं।

गुटेरेस ने कहा कि अफगानिस्तान से मानव अधिकारों पर लगाई गई पाबंदियों की खबरें आ रही हैं, खासतौर पर महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ मानव अधिकारों के उल्लंघन की। ऐसे में वह तालिबान समेत सभी पक्षों से यह अपील करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवीय अधिकारों का सम्मान किया जाए।

वहीं यह भी खबर आ रही है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन अफगानिस्तान के मुद्दे पर देश को संबोधित करेंगे। ज्ञात हो कि अमेरिका द्वारा अपनी सेनाओं के वापस बुलाए जाने के बाद अफगानिस्तान में हालात ख़राब हुए और तालिबान एवं अफगानी सेनाओं के बीच संघर्ष बढ़ता गया। आज स्थिति यह है कि अब अफगानिस्तान में तालिबान का शासन स्थापित है।

जिहाद के रंग: तालिबान सफेद झंडे और ISIS काले झंडे का इस्तेमाल क्यों करता है? जानें क्या है पूरा माजरा

अफगानिस्तान में तालिबानी शासकों का कब्जा होने के बाद रविवार (16 अगस्त) को काबुल में डर और अराजकता फैल गई। तालिबानी शासकों ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद देश में 20 साल से चल रहे युद्ध का निर्णायक अंत कर दिया।

अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने की घोषणा के बाद से तालिबानियों ने अफगान नागरिकों पर कहर बरपाना शुरू कर दिया। उन्होंने कुछ ​ही दिनों में एक के बाद एक प्रांतीय राजधानी पर कब्जा कर लिया। अंत में केवल काबुल ही अफगान सरकार के नियंत्रण में अंतिम प्रमुख शहर बचा, लेकिन रविवार को तालिबानी शासकों ने इस शहर पर भी धावा बोल दिया और इसे अपने कब्जे में ले लिया।

इस तरह तालिबानी शासकों ने अफगान सरकार को उखाड़ फेंका और उनसे बचने के लिए राष्ट्रपति अशरफ गनी को भी अपना देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद से पूरे अफगानिस्तान में ​तालिबानियों की दहशत है। अफगान नागरिक इनसे बचने के लिए अपनी जान की परवाह भी नहीं कर रहे हैं। त्रस्त लोगों के देश छोड़कर भागने वाले कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। देश से बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे हजारों लोग आज काबुल हवाईअड्डे पर जमा हो गए और उन्होंने जाम लगा दिया। वायरल वीडियो में अफगान सैनिकों को प्लेन में घुसते हुए दिखाया गया है, उनमें से कुछ तो विमानों के पहियों से भी चिपके हुए हैं।

जैसे ही तालिबान ने अफगानिस्तान में अपना आधिपत्य स्थापित किया, समूह से जुड़े कई आतंकवादी मशीनगनों और तालिबान के सफेद झंडे लहराते हुए काबुल की सड़कों पर उतर आए। आपको बता दें कि तालिबान के झंडे की पृष्ठभूमि सफेद रंग की होती है, जिस पर इस्लामिक शहादा काले रंग में छपा होता है। वहीं, आतंकी संगठन आईएसआईएस द्वारा इस्तेमाल किए गए झंडे की पृष्ठभूमि इसके बिल्कुल उलट यानी काली है और इस पर सफेद रंग में इस्लामिक शहादा (Islamic Shahada) छपा हुआ है।

तो क्या दो झंडों में रंग के अंतर का मतलब यह है कि दो आतंकी संगठन अलग-अलग इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हैं? या यह महज एक संयोग है कि दो आतंकी संगठनों के झंडों में विपरीत रंग है, शायद उन्हें अलग दिखाने के लिए? आइए यह समझने की कोशिश करें कि तालिबान और आईएसआईएस के झंडों के बीच सूक्ष्म अंतर क्या है। यदि वास्तव में कोई अंतर है, तो उसका क्या अर्थ है।

ISIS और तालिबान के झंडों में सूक्ष्म अंतर

तालिबान और आईएसआईएस दोनों खुद को इस्लाम मजहब का सबसे बड़ा संरक्षक व अनुयायी बताते हैं। वे अपने काम को अल्लाह की नजर में बेहतरीन मानते हैं। दोनों समूह इस बात पर जोर देते हैं कि वे अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में इस्लाम को बड़े पैमाने पर स्थापित करने के लिए इस्लामिक जिहाद कर रहे हैं।

तालिबान आईएसआईएस से काफी पुराना है। उसने शुरू में अफगान गृहयुद्ध के दौरान हमलावर सोवियत सेना को भगाते हुए एक सफेद झंडे का इस्तेमाल किया था। जब इसने 1996 में काबुल पर कब्जा जमा लिया और अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात की स्थापना की तब सफेद झंडा देश का राष्ट्रीय ध्वज बन गया। यह राष्ट्रीय ध्वज उनके विश्वास और सरकार की पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता था। बाद में 1997 में तालिबान ने इस्लामिक शहादा को अपने झंडे में जोड़ा।

दूसरी ओर इराक से अमेरिका के हटने के बाद यहाँ ISIS ने बड़ी ही तेजी से अपने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए। गैर-मुसलमानों सहित इस्लाम के दुश्मन माने जाने वाले लोगों के खिलाफ क्रूरता करना ये अपना मजहब मानते थे। सोशल मीडिया ने भी आईएसआईएस को उसके प्रचार-प्रसार में मदद की। इस तरह उसने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हुए अपने इस्लामिक खिलाफत की स्थापना के सदियों पुराने सपने को साकार किया। इस्लामिक शहादा के साथ काले रंग के झंडे वाले आईएसआईएस आतंकी की तस्वीरें आतंकवादी समूह द्वारा नियमित रूप से साझा की जाती थीं।

शहादा एक इस्लामी शपथ (Islamic oath) है, इस्लाम के 5 स्तंभों में से एक अदान का हिस्सा है। यह अल्लाह में विश्वास और पैगंबर मुहम्मद को दूत के रूप में स्वीकार करने की घोषणा करता है। शहादा में लिखा होता है: “कोई ईश्वर नहीं है, सिर्फ अल्लाह है और उसके पैगंबर सिर्फ़ मोहम्मद हैं।”

नोट- विस्तृत रूप से जानने के लिए यहाँ क्लिक कर अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ें।

UPA सरकार के ₹1.44 लाख करोड़ के Oil Bonds के कारण नहीं कम कर पा रहे पेट्रोल-डीजल के दाम: निर्मला सीतारमण ने बताई वजह

देश में बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दामों के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ईंधन की कीमतों में कमी न कर पाने की वजह बताई। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती यूपीए (UPA) सरकार के द्वारा 1.44 लाख करोड़ रुपए के ऑयल बॉन्ड्स (Oil Bonds) जारी किए गए थे, यही कारण है कि वर्तमान सरकार चाह कर भी तेलों के दाम नहीं कम कर सकती है।

वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा, “UPA सरकार के द्वारा तेलों के दाम कम करने के लिए 1.44 लाख करोड़ रुपए के ऑयल बॉन्ड्स जारी किए गए थे। हम UPA सरकार के द्वारा इस्तेमाल किए गए गलत तरीके का उपयोग नहीं कर सकते हैं। इन ऑयल बॉन्ड्स के कारण सारा भार हमारी सरकार पर आ चुका है जिसके कारण हम पेट्रोल और डीजल के कीमतों में कटौती कर पाने में असमर्थ हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि ईंधन के दामों को लेकर लोगों की चिंता जायज है लेकिन जब तक राज्य सरकारें और केंद्र एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर बातचीत नहीं करते, तब तक इसका कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता है।

UPA सरकार के द्वारा जारी किए गए ऑयल बांड्स पर दिए जाने वाले ब्याज की जानकारी देते हुए वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि पिछले 5 सालों में मोदी सरकार ने सिर्फ ऑयल बॉन्ड्स के ब्याज पर ही 70,195.72 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और साल 2026 तक 37,000 करोड़ रुपए ब्याज का भुगतान किया जाना है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि ब्याज के अतिरिक्त 1.30 लाख करोड़ रुपए से अधिक का मूलधन अभी भी बकाया है, ऐसे में अगर ऑयल बॉन्ड्स का भार नहीं होता तो ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कम की जा सकती थी।

आपको बता दें कि ऑयल बॉन्ड्स एक तरह की सिक्योरिटी बॉन्ड होते हैं। सरकार, तेल कंपनियों को सब्सिडी के तौर पर यह बॉन्ड्स जारी करती हैं। आमतौर पर इन बॉन्ड्स की परिपक्वता अवधि (Maturity Period) लगभग 15-20 साल हुआ करती है। इन बॉन्ड्स पर तेल कंपनियों को ब्याज की अदायगी की जाती है। सरकार अक्सर तेल की कीमतों पर नियंत्रण करने के लिए ऐसे बॉन्ड्स जारी करती हैं लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन बॉन्ड्स की सहायता से कुछ समय के लिए राजकोषीय घाटा कम जरूर किया जा सकता है लेकिन अंततः भविष्य में इनका भुगतान करना आवश्यक होता है।

इमरान खान ने की अफगानिस्तान में तालिबानी शासन की सराहना, कहा- ‘मानसिक गुलामी की जंजीरें टूट गईं’

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सोमवार (16 अगस्त) को अफगानिस्तान में तालिबानी शासन की सराहना की। इस्लामाबाद में ‘एकल राष्ट्रीय पाठ्यक्रम’ के उद्घाटन समारोह के दौरान उन्होंने तालिबानी शासकों द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करने को उचित ठहराया। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि अफगान के नागरिकों की मानसिक गुलामी की जंजीरें टूट गईं। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा उन पर अपनी संस्कृति को थोपना मानसिक दासता के समान था।

सांस्कृतिक पहलू पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, “जब आप किसी की संस्कृति को अपनाते हैं, तो आप इसे श्रेष्ठ मानते हैं, लेकिन बाद में इसके गुलाम बन जाते हैं।” उन्होंने इस तरह की दासता को उचित ठहराते हुए दावा ​किया कि मानसिक दासता इससे बदतर थी। अफगान के लोग बड़े निर्णय लेने में असमर्थ थे वह पूरी तरह से गुलामी की जंजीरों से जकड़े हुए थे।

तालिबान के लिए इमरान खान और उनकी सहानुभूति

जून 2013 में, जब एक अमेरिकी ड्रोन हमले में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का उप प्रमुख वलीउर रहमान महसूद मारा गया था, तब खान ने उसे ‘शांति दूत’ के रूप में संदर्भित करके नए विवाद को जन्म दिया था। रहमान पर 5 मिलियन, 50 लाख रुपए अमरीकी डालर का इनाम रखा गया था। उस पर अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो बलों के खिलाफ हमले आयोजित करने का आरोप लगाया गया था। वह 2009 में अफगानिस्तान में एक अमेरिकी ठिकाने पर आत्मघाती हमले के सिलसिले में भी वांछित था, जिसमें सीआईए के सात एजेंट मारे गए थे।

काबुल के आखिरी पुजारी पंडित राजेश ने रतन नाथ मंदिर छोड़ने से किया इनकार, कहा- ‘तालिबान ने मार दिया तो यह भी मेरी सेवा’

अफगानिस्तान में अब तालिबान का शासन स्थापित हो चुका है। राजधानी काबुल में तालिबानी अधिकार स्थापित होने के बाद काबुल से लोगों का पलायन शुरू है और हर कोई तालिबान के डर से अफगानिस्तान छोड़ना चाहता है। लेकिन इस संकट के बीच भी काबुल के रतन नाथ जी (Rattan Nath) मंदिर के पुजारी पंडित राजेश कुमार ने मंदिर छोड़ने से मना कर दिया है। उनका कहना है कि तालिबान उन्हें भले ही मार दे लेकिन वो मंदिर नहीं छोड़ेंगे।

पंडित राजेश कुमार ने कहा कि कई हिन्दुओं ने उनसे काबुल छोड़ने का आग्रह किया और उन हिन्दुओं ने उनका (राजेश कुमार) खर्च उठाने की बात भी कही लेकिन पंडित राजेश ने मंदिर छोड़ने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, “मेरे पूर्वजों ने सैकड़ों सालों तक इस मंदिर में सेवा की है। मैं इसे छोड़कर नहीं जाऊँगा। अगर तालिबान मुझे मार देता है तो यह भी मेरी सेवा ही होगी।” रिपोर्ट्स के अनुसार कुमार संभवतः काबुल के आखिरी पुजारी हैं।

इसके पहले ऑर्गनाइजर ने रिपोर्ट दी थी कि इस्लामी कट्टरपंथियों के आक्रमण की संभावना के चलते अफगानिस्तान के आखिरी यहूदी जैबुलोन सिमन्तोव (Zabulon Simantov) ने अफगानिस्तान छोड़ दिया था। हेरात में जन्मे और पले-बढ़े सिमन्तोव के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद यहूदी-अफगान संबंधों का 2000 साल पुराने इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो गया।

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जे के साथ ही आतंकी संगठन तालिबान ने युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी, इसके बाद मुल्क के राष्ट्रपति और सारे राजनयिक देश छोड़ कर भाग चुके हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने ये कहते हुए देश छोड़ दिया कि वो खूनखराबा नहीं चाहते हैं। रविवार (15 अगस्त, 2021) को दिन भर काबुल के नागरिकों में डर का माहौल रहा। पश्चिमी देश अपने लोगों को वहाँ से निकालने में लगे रहे।

काबुल एयरपोर्ट पर चारों तरफ वही लोग दिखाई दे रहे हैं जो किसी भी हालत में अफगानिस्तान छोड़ना चाहते हैं। सैंकड़ों अफगानिस्तानी इतने मजबूर हो गए हैं कि वह भेड़-बकरियों की तरह एक ऊपर एक लदकर हवाई जहाज में चढ़ रहे हैं। भारत आए अफगानी नागरिक रो-रोकर अपनी आपबीती सुना रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि अब अफगानिस्तान में उनके लिए कुछ भी नहीं बचा और वहाँ अब शांति की भी कोई उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है।

तालिबान से बचने के लिए काबुल एयरपोर्ट पर प्लेन के टायरों पर लटके 3 अफगानी, आसमान से गिरे: देखें वीडियो

तालिबान के कारण अफगानिस्तान के लोग दहशत में हैं। काबुल एयरपोर्ट की तस्वीर इस वक्त बेहद चिंताजनक है। एयरपोर्ट पर हजारों की तादाद में अफगानी नागरिक मौजूद हैं, जो किसी भी तरह से काबुल छोड़कर भागना चाहते हैं। इसके चलते ये लोग कुछ भी करने को तैयार हैं।

सोशल मीडिया पर काबुल एयरपोर्ट का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में एयरपोर्ट से उड़ान भरने वाले अमेरिका के एक प्लेन में जब जगह नहीं मिली तो अफगान के तीन नागरिक उसका टायर पकड़कर ही लटक गए। हालाँकि, तालिबान से बचने के लिए अफगानिस्तान छोड़ने के सपने की उड़ान उनके गिरने के साथ ही धराशायी हो गई। विमान से तीनों अफगानी नागरिकों के गिरने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। एक पत्रकार द्वारा ट्विटर पर दिल को झकझोर देने वाला वीडियो साझा किया गया है।

मिडिल ईस्ट आई के तुर्की ब्यूरो प्रमुख रागिप सोयलू (Ragip Soylu) ने एक वीडियो साझा किया है, जिसमें कुछ अफगान युवकों को एयरपोर्ट से टेक-ऑफ करने से पहले उड़ान के इंजन पर लटका हुआ दिखाया गया था।

स्थानीय लोगों ने कथित तौर पर पुष्टि की है कि विमान से उनके घर के ऊपर एक शव गिरा है। उनका कहना है कि जब शव छत पर गिरा तो काफी तेज आवाज आई थी।

इस दौरान कुछ और भयानक दृश्य भी सामने आए हैं, जिनमें अफगान के लोग काबुल एयरपोर्ट पर विमान से लटके हुए हैं।

तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की राजधानी पर कब्जा करने के बाद काबुल हवाई अड्डे पर बेहद भयावह दृश्य देखे गए हैं। एयरपोर्ट पर नागरिकों की बेतहाशा भीड़ और न के बराबर सुरक्षा के साथ अराजकता फैल गई है। जल्द से जल्द देश छोड़ने की उम्मीद में यात्रियों को लंबी-लंबी कतारों में हवाईअड्डे पर इंतजार करते हुए देखा गया। सोमवार (16 अगस्त) की सुबह काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर हालात बद से बदतर नजर आए। सैकड़ों लोगों को एक एक विमान पर चढ़ने के लिए एक दूसरे के उपर गिरते हुए देखा गया।

क्या CNN ने की अफगानिस्तान में हमले के दौरान मास्क पहनने के लिए तालिबान की प्रशंसा? – Fact Check

सीएनएन न्यूज चैनल की एक रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें चैनल को हमले के दौरान मास्क पहनने के लिए तालिबान की तारीफ करते हुए देखा जा सकता है। यह स्क्रीनशॉट उस दिन से वायरल हो रहा है, जब तालिबान ने बीस साल के बाद अमेरिका के अफगानिस्तान से वापस निकलने के बाद काबुल पर कब्जा किया। स्क्रीनशॉट के सोशल मीडिया पर वायरल ​होने बाद से सीएनएन की काफी आलोचना की जा रही है।

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स्क्रीनशॉट के साथ कैप्शन लिखा था, “सीएनएन ने हमले के दौरान मास्क पहनने के लिए तालिबान की प्रशंसा की।”

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सीएनएन का सच ‘मास्क पहनने के लिए तालिबान की प्रशंसा’

वास्तव में सीएनएन ने हमले के दौरान मास्क पहनने के लिए तालिबान की प्रशंसा नहीं की है। यह स्क्रीनशॉट 14 अगस्त को द बेबीलोन बी (The Babylon Bee) द्वारा प्रकाशित एक व्यंग्य लेख से लिया गया है।

The Babylon Bee का व्यंग्य लेख

व्यंग्य में जो बाइडेन प्रशासन के साथ-साथ सीएनएन पर ‘विश्वसनीय सूत्रों’ के मेजबान ब्रायन स्टेल्टर का भी मज़ाक उड़ाया गया है। व्यंग्य में कहा गया है कि स्टेल्टर को बहुत बड़ा बेवकूफ माना जाता है। वह अपनी प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना दुष्प्रचार करता है, जिस पर वो और उसकी टीम के अलावा कोई भी विश्वास नहीं करता है।

व्यंग्य ने दावा किया कि स्टेल्टर ने कहा, “वाह! युद्ध और रक्तपात के बीच महान इस्लामी रेगिस्तानी शूरवीर मुखौटे पहने हुए हैं। एक अन्य हास्यपूर्ण कोट का श्रेय डॉन लेमन को दिया जाता है। उन्होंने कहा कि एक सीएनएन होस्ट जिसे व्यापक रूप से प्रोपेगेंडा प्रमुख माना जाता है उनकी सभी बातों पर विचार किया जाना चाहिए। हमें इन राजसी मुजाहिदीन योद्धाओं की प्रशंसा करनी चाहिए, जिन्होंने कोविड-19 में मास्क पहना हुआ है।”

CNN की पिछली चूक

हिंसक जॉर्ज फ्लॉयड दंगों के दौरान सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट में आगजनी और लूटपाट को बेहद शांतिपूर्ण विरोध के रूप में वर्णित किया था। स्क्रीन पर आगजनी दिखाई गई, एक वाहन में आग लग गई, जबकि संवाददाता ने स्क्रीन पर कुछ और ही दिखाने का प्रयास किया था।

सीएनएन की ज्यादातर शांतिपूर्ण विरोध वाली रिपोर्ट

समाचार नेटवर्क को संवाददाता के कारण काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। इस हास्यास्पद दावे के लिए सभी लोगों द्वारा इसकी निंदा की गई थी।