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32 साल की बेटी के अब्बू अख्तर ने मुकेश बनकर 22 वर्षीय हिंदू लड़की को फँसाया: शादी के बाद अब इस्लाम कबूलने का बना रहा दबाव

गुजरात के सूरत जिले में लव जिहाद का मामला सामने आया है, जिसमें 51 साल के शेख मोहम्मद अख्तर ने 22 साल की एक हिंदू लड़की से नाम बदलकर पहले दोस्ती की और फिर उससे शादी कर ली। बाद में उसे इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार बुर्का पहनने और नमाज पढ़ने के लिए दबाव बनाने लगा। जब लड़की ने ऐसा नहीं किया तो उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित अख्तर युवती से एक कंपनी में मिला था। उसने हिंदू युवती को अपने जाल में फंसाने के लिए उसे मुकेश के नाम से अपना परिचय दिया था और युवती से झूठ बोला कि वह रेलवे में काम करता है। धीरे-धीरे दोनों करीब आते चले गए और वर्ष 2019 में दोनों ने हिंदू रीति-रिवाज से शादी कर ली। समय बीतने के साथ युवती को एक बच्चा भी हुआ। एक दिन अख्तर की हरकतों पर लड़की को शक हुआ तो उसने आरोपित की आईडी चेक की। इसके बाद उसकी असलियत का खुलासा हुआ।

मामले का खुलासा होने के बाद युवती ने उसका विरोध किया। इसके बाद से ही अख्तर ने उस पर धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने, बुर्का पहनने और नमाज पढ़ने के लिए प्रताड़ित करने लगा। पीड़िता ने अपनी आपबीती में पुलिस को बताया है कि अख्तर उसके बेटे का भी धर्मान्तरण कराना चाहता है। पुलिस ने बताया कि आरोपित ने पीड़िता की रेलवे में नौकरी लगवाने के नाम पर उससे और उसके मायके वालों से 14 लाख रुपए भी ऐंठ लिए।

इस मामले में पीड़िता ने डिंडोली पुलिस थाने में संपर्क किया और अपनी आपबीती पुलिस को बताई। पुलिस ने पहले तो रिपोर्ट लिखने में आनाकानी की, लेकिन बाद में दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करने के लिए तैयार हो गई। पीड़िता मामले को हाल ही में बने लव जिहाद कानून के तहत दर्ज करवाना चाहती थी, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया।

इसके बाद पीड़िता ने हिंदू जागरण मंच से संपर्क किया। हिंदू जागरण मंच ने इस मामले में पुलिस के खिलाफ 28 घंटों तक प्रदर्शन किया। उसके बाद पुलिस ने मामले को लव जिहाद विरोधी कानून के तहत पंजीकृत किया।

पहले से है शादीशुदा आरोपित

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित अख्तर (51) का पहले ही निकाह हो चुका था और उसकी एक 32 साल की एक बेटी भी है। इतना ही नहीं उसकी बेटी की संतान भी है। वहीं, शहर के पुलिस कमिश्नर अजय तोमर इस केस की जाँच कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि मामले में पुलिस की भूमिका की भी जाँचने की जरूरत है।

अमृत काल में विश्व स्तरीय लक्ष्य: PM मोदी का उद्योग, व्यापार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में विकसित देशों की बराबरी का संकल्प

पिछले कई वर्षों से स्वतंत्रता दिवस की वर्षगाँठ पर देश के आम नागरिकों में उत्सुकता रहती है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से संबोधित करेंगे तो क्या-क्या बोलेंगे? दूसरी तरफ उनके समर्थकों और प्रशंसकों में यह उत्सुकता रहती है कि वे इस बार कैसी पगड़ी पहनेंगे या ऐसा क्या कहेंगे जिससे भारतवर्ष आश्चर्यचकित रह जाए। मैं आश्वस्त हूँ कि इस वर्ष भी कुछ ऐसा ही माहौल था। प्रधानमंत्री आए और उन्होंने देश संबोधित करते हुए एक प्रेरणाप्रद भाषण दिया। हमेशा की तरह एक विस्तृत भाषण जिसमें देश के लिए महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी सरकार द्वारा किए जा रहे काम का लेखा-जोखा तो था ही, भविष्य के लिए भी एक स्पष्ट दिशा निर्देश का भी वर्णन था।

जब से नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर प्रधानमंत्री के संबोधन का चरित्र बदल गया है। पहले हमारे प्रधानमंत्री अपनी सरकार की भविष्य की योजनाओं पर बोलते थे पर जब से नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में देश को संबोधित करना आरंभ किया है, तब से न केवल भविष्य की योजनाओं की चर्चा होती है बल्कि सरकार द्वारा पिछले वर्ष किए गए कामों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया जाता है। यह एक ऐसा बदलाव है जो वर्तमान प्रधानमंत्री को पूर्व प्रधानमंत्रियों से अलग करता है।

इस वर्ष प्रधानमंत्री ने न केवल इस समय सरकार द्वारा चलाए जा रहे पचहत्तर सप्ताह लंबे आज़ादी के अमृत महोत्सव की बात की बल्कि अगले पच्चीस वर्षों के अमृतकाल की योजना प्रस्तुत की जिसमें वर्तमान भारत को नए भारत में बदलने की समग्र योजना समाहित है। उन्होंने इस पच्चीस वर्षीय अमृत काल में सरकार द्वारा विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का संकल्प प्रस्तुत किया। इस योजना के अनुसार देश हर क्षेत्र में न केवल समग्र विकास करेगा बल्कि उद्योग, व्यापार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में विकसित देशों के बराबर खड़ा मिलेगा।

सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री का यह संकल्प रहा जिसमें उन्होंने एक ऐसे भारत की बात की जिसमें सरकारी परियोजनाएं और सेवाएं न केवल अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे बल्कि एक आम भारतीय के जीवन में सरकारी दखलंदाजी स्तर पर रहे। यह संकल्प दीर्घकालीन लोकतान्त्रिक व्यवस्था को नए तरह से देखने का संकल्प है जिसका स्वागत होना चाहिए। अमृत काल के संदर्भ में प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य भी महत्वपूर्ण है कि; भले ही हम इन उपलब्धियों को हासिल करने के लिए पचीस वर्षों का समय निर्धारित कर रहे हों पर हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि हम उससे पहले ही यह संकल्प पूरा कर लें।

कृषि को लेकर वर्तमान सरकार की योजनाओं और संकल्पों पर पहले से ही काम होता रहा है पर उन्होंने अपने संबोधन में जिस तरह से छोटे किसानों के हितों की बात की उससे स्पष्ट झलक रहा था कि जिन कृषि कानूनों का विरोध हो रहा है, देश में कृषि क्षेत्र की वर्तमान कमियों को पूरा करने में इन कानूनों की भूमिका को लेकर वे पूरी तरह से आश्वस्त हैं। नए सुधारों, विज्ञान और तकनीक की भूमिका के अलावा उन्होंने कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिकों की भूमिका को लेकर जो कहा वह महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में वर्तमान सरकार कृषि के योगदान को लेकर न केवल सतर्क है बल्कि इस योगदान को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सुधारों के प्रति वचनबद्ध भी है।

आँकड़े बताते हैं कि तमाम मुश्किलों के बावजूद पिछले कई वर्षों में सरकारी योजनाओं के कार्यान्वन की गति में बड़ा सुधार आया है पर वर्तमान सरकार इस गति को अगले स्तर पर ले जाने पर काम कर रही है। सरकार का प्रयास एक ऐसी व्यवस्था बनाने का है जिसमें तमाम सरकारी क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ें हों। जल जीवन मिशन, देश भर को रेलवे से जोड़ना, अंतिम व्यक्ति तक बैंकिंग की सुविधा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, बेहतर डॉक्टरी शिक्षा को लेकर सरकार का दृष्टिकोण ऐसी बातें हैं जो आने वाले समय में भारत के हर कोने में एक नए भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएंगे।

उत्तर-पूर्वी राज्यों को लेकर वर्तमान सरकार की नीति हमेशा से स्पष्ट रही है। खुद प्रधानमंत्री उत्तर-पूर्व में लगातार प्रयासों से बढ़ी रोड और रेल कनेक्टिविटी पर नज़र रखते रहे हैं। यह ऐसा पहलू है जो पिछले कई वर्षों से भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में बहस का विषय है। ऐसे में यह आश्चर्य नहीं कि उन्होंने इन राज्यों की राजधानियों को रेल से जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना पर भी बात की और साथ ही कृषि उत्पादन में इसे भविष्य का भौगोलिक क्षेत्र भी बताया। एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि सहकारिता को लेकर वर्तमान सरकार की नीति और सोच की बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के लिए सहकारिता का क्षेत्र नियम और कानून के लिए नहीं बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे हमारी संस्कृति के साथ जोड़ना आसान है। सहकारिता को लेकर लेकर पूर्व की सरकारें सीमित सोच रखती थीं।

2014 में रेलवे को लेकर मोदी सरकार की सोच और भविष्य की योजनाएं महत्वपूर्ण मानी जाती थी। आज के भाषण में एक बार फिर से लगा कि वर्तमान सरकार आज भी उन योजनाओं को न केवल महत्वपूर्ण मानती है बल्कि उसे लेकर गंभीरता से काम भी कर रही है। उन्होंने देश के 75 गंतव्यों के लिए 75 नई वंदे भारत रेलगाड़ियों की घोषणा की जो भारतीय रेल को एक नए स्तर पर ले जाने का काम होगा। साथ ही उन्होंने गति शक्ति योजना की घोषणा की जिसका उद्देश्य यह है कि पूरे देश में ऐसे समग्र इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो जो ट्रांसपोर्टेशन पर लगने वाला समय घटाए। यह महत्वाकांक्षी परियोजना है जिससे देश में बनने वाली मूलभूत सुविधाओं को नई दिशा मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उनकी सरकार द्वारा अनावश्यक पुराने कानूनों और नियमों को रद्द किये जाने की बात की। उनकी सरकार का शुरू से यह मानना रहा कि ढेरों पुराने कानून हैं जिनका रहना सरकारी कार्यों को बाधित करता है। सरकार का यह कदम न केवल आम भारतीय बल्कि उद्योग और व्यापार के लिए भी अच्छा है क्योंकि ये नियम और कानून आधुनिक वैश्विक व्यवस्था के अनुसार न चलने वाले देशों के पीछे रहने का कारण बन सकते हैं।

यह अच्छा है कि सरकार इस बात को लेकर सतर्क भी है और उसपर काम भी कर रही है। साथ ही उन्होंने टैक्स सुधार तथा अन्य प्रशासनिक सुधारों की चर्चा की। एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से यह अनुरोध किया कि वे अपने वर्तमान कानूनों और नियमों की समीक्षा के लिए आयोग का गठन करें। उनका यह अनुरोध इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ढेरों नियम कानून हैं जो किसी राज्य की प्रगति में बाधा डालते हैं।

नई शिक्षा नीति को लेकर भी संबोधन आवश्यक था। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा की भूमिका की चर्चा इसलिए आवश्यक थी क्योंकि तमाम प्रतिभाएं भाषा की वजह से पीछे रह जाती हैं और वर्तमान सरकार द्वारा लाई गई नई शिक्षा नीति प्रतिभा को आगे आने में सहायक साबित होगी। शिक्षा नीति में खेलों को मुख्यधारा में लाने की सरकार की योजना की भी चर्चा की। पर्यावरण सुरक्षा को लेकर किए गए सरकार के प्रयासों के साथ-साथ उन्होंने भविष्य की जिन योजनाओं की घोषणा की, उससे भारत वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में खुद को आगे रख सकेगा। एक महत्वपूर्ण घोषणा भारत के अगले 25 वर्षों में एक एनर्जी इंडिपेंडेंट नेशन बनने की रही। भारत के लिए अपने आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति की पहली शर्त यही है कि हम जल्द से जल्द एक एनर्जी इंडिपेंडेंट नेशन बने और प्रधानमंत्री की यह घोषणा सामयिक भी है और आवश्यक भी।

प्रधानमंत्री ने कोरोना के बाद एक न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की बात की जो आर्थिक और सामरिक दृष्टि से शायद बिल्कुल नया होगा। साथ ही उन्होंने आतंकवाद और विस्तारवाद के खतरे की भी बात की जिससे स्पष्ट था कि वे किस ओर इशारा कर रहे हैं। यह सुखद अनुभव रहा कि उन्होंने आज के दिन इन विषयों की चर्चा की। यह आवश्यक है कि सरकार देशवासियों को आने वाले हर संभावित खतरे और अवसरों के बारे में आगाह करे। उन्होंने नागरिकों के लिए उनके कर्तव्यों की बात की जो किसी भी राष्ट्र की प्रगति का आधार होते हैं। सरकारी प्रयासों के साथ आवश्यक है कि नागरिक कर्त्तव्य भी जुड़े।

अपने संबोधन की समाप्ति पर उन्होंने यह संकल्प दोहराया कि वे और उनकी सरकार हर संभव प्रयास करेंगे कि आज वे जिन बातों का जिक्र कर रहे हैं, आज से 25 वर्षों बाद कोई भी प्रधानमंत्री जब स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले पर खड़ा देश को संबोधित कर रहा हो तो ये सारे काम तब तक हो चुके हों तब के प्रधानमंत्री गर्व से इनका वर्णन कर सकें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना के लिए हमेशा स्थान रहेगा और परंपरा के अनुसार विपक्ष प्रधानमंत्री के भाषण को एक निरुत्साह वाला भाषण भी बता सकता है पर एक आम भारतीय के लिए उनका संबोधन आशा देता है और उसे प्रेरित भी करता है।

भारत को नकल करने की जरूरत नहीं, हमें आत्मनिर्भर होना होगा; हमारे पास हजारों साल पुराना आर्थिक विचार: RSS प्रमुख मोहन भागवत

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई के एक स्कूल में तिरंगा फहराया। उन्होंने देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर अपनी बात रखते हुए कहा कि देश आर्थिक रूप से जितना आत्मनिर्भर रहेगा उतना सुरक्षित रहेगा।

मोहन भागवत ने मुंबई के IES राजा स्कूल में झंडा फहराया। इस अवसर पर उन्होंने भारत की आर्थिक स्थिति पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र देश को स्व-निर्भर रहना चाहिए और स्व-निर्भरता से ही देश की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। मोबाइल फोन का उदाहरण देते हुए भागवत ने कहा कि हम जितना चीन के बहिष्कार के बारे में चिल्लाते रहें लेकिन जब तक चीन पर निर्भरता है, हमें उसके सामने झुकना पड़ेगा।

भागवत ने कहा कि स्वदेशी होने से तात्पर्य है अपनी शर्तों पर कारोबार करना। उन्होंने सरकार से यह माँग की कि सरकार को उद्योगों को सहायता एवं प्रोत्साहन देना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि उत्पादन जन-केंद्रित होना चाहिए और अधिकतर ध्यान शोध एवं विकास, एमएसएमई और सहकारी क्षेत्रों के विकास पर होना चाहिए। उन्होंने भविष्य के बारे में बात करते हुए कहा कि दुनिया भारत की ओर देख रही है और भारत को किसी की नकल करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत के पास हजारों साल पुराना आर्थिक विचार है जो अधूरा नहीं है।

भागवत ने स्वतंत्रता के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि सिकंदर से भी पहले भारत में आक्रमण हुए और जब भी देश पर कोई विदेशी आक्रमण हुआ तो उसके खिलाफ संघर्ष प्रारंभ हो गया। उन्होंने कहा कि इन आक्रमणों को हमने 15 अगस्त को विराम दिया और जो विदेशियों के हाथ में था, वह हमारा राज्य हमें वापस मिल गया और हम अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हुए। उन्होंने यह भी कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन रोकने के लिए नियंत्रित उपभोक्तावाद की आवश्यकता है और खुशी तब मिलेगी जब दूसरों के कल्याण के बारे में विचार किया जाएगा।

‘किसान नेता’ राकेश टिकैत 15 अगस्त को मनाएँगे गणतंत्र दिवस! हेकड़ी गायब होने पर सोशल मीडिया पर हुई खिंचाई: देखें वीडियो

किसान नेता राकेश टिकैत शनिवार (14 अगस्त 2021) को एनडीटीवी से इंटरव्यू के दौरान भारत के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के बीच कन्फ्यूज हो गए जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी जमकर खिंचाई हो रही है।

राकेश टिकैत की इस बातचीत में 1 मिनट 12 सेकंड में सुना जा सकता जब उनसे 15 अगस्त के दिन किसान प्रदर्शनकारियों के प्लान के बारे में पूछा गया। टिकैत ने जवाब दिया कि किसान अपने खेतों, ट्रैक्टर, घर, जिले और गाँवों में झंडा फहराएँगे। उन्होंने कहा, “सब गणतंत्र दिवस मनाएँगे।” बातचीत में आगे वो फिर गलती कर बैठे और उन्होंने कहा भाजपा पर ‘गणतंत्र दिवस’ समारोह का उपयोग अपने राजनीतिक फायदे के लिए करने का आरोप लगाया।

वीडियो : एनडीटीवी

टिकैत की इस गलती के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें जमकर निशाने पर लिया गया। एक ट्विटर यूजर @Agnistic_Exploring ने लिखा कि सबसे लंबा प्रैंक होने के कारण किसान आंदोलन को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होना चाहिए और यह राकेश टिकैत के प्रभावशाली नेतृत्व में अभी भी चल रहा है, जिसके पास शक्ति है 15 अगस्त को गणतंत्र दिवस मनाने की। ट्विटर यूजर पल्लवी ने लिखा कि जब आप हाई होते हैं तब ऐसा ही होता है। एक अन्य यूजर ने लिखा कि टिकैत अंकल कल रात को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ सस्ता नशा कर रहे थे शायद।

जुलाई के आखिरी सप्ताह में राकेश टिकैत ने कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल लागू किए गए कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान 14-15 अगस्त को गाजीपुर बॉर्डर के लिए ट्रैक्टर रैली निकालेंगे और स्वतंत्रता दिवस को राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे। उन्होंने बताया कि 2 जिलों से ट्रैक्टर इस रैली में शामिल होने आएंगे, साथ ही टिकैत ने यह भी कहा कि उन्होंने कहा कि 26 जनवरी को उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज नहीं हटाया था। वैसे एक और ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कहना यही बताता है कि टिकैत अब किसान आंदोलन के गिरते जनाधार को पुनर्जीवित करना चाहते हैं।

आजादी के अमृत महोत्सव पर स्थापना की 75वीं वर्षगाँठ बना रहा अमूल, दुग्ध क्रांति से लेकर महिला सशक्तिकरण में निभाई अभूतपूर्व भूमिका: देखें वीडियो

वर्ष 1946 में स्थापित दुनिया की नौवीं सबसे बड़ी डेयरी कंपनी, अमूल भी भारत की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष पर अपनी 75वीं वर्षगाँठ मना रहा है। इस अवसर को यादगार बनाने के लिए गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) के रूप में पहचाने जाने वाले मिल्क ब्रांड अमूल की ओर से एक वीडियो जारी किया गया है। इसमें कंपनी उन 36 लाख महिला डेयरी किसानों का जश्न मना रही है, जिन्होंने उसे इन 75 वर्षों में इसे सशक्त बनाया है।

भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर अमूल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर अभियान के वीडियो का एक अंश साझा किया और लिखा, “1946 में स्थापित #Amul 36 लाख महिला किसानों के जीवन को समृद्ध करके और हर दिन 135 करोड़ भारतीयों को स्वाद, स्वास्थ्य और पोषण देकर, विकास के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है।#75YearsofAmul”।

इस गीत में दिखाया गया है कि कैसे देश पिछले कुछ वर्षों में फला-फूला है और दुग्ध क्रांति (श्वेत क्रांति) ने कैसे देश की महिलाओं की तस्वीर बदल दी है। अब, बदलते समय के साथ, डिजिटल भुगतान समेत तमाम तकनीकी प्रगति के साथ अमूल 75 साल का हो गया है। वीडियो में महिलाओं को पारंपरिक कपड़े पहने मोटरसाइकिल की सवारी करते हुए दिखाया गया है और बताया गया है कि कैसे सहकारी आंदोलन ने महिलाओं को स्वावलंबी और स्वतंत्र बना दिया है। समय के साथ ब्रांड दुनिया के हर कोने में अपनी पहुँच बनाने में सफल रहा है।

इसके वीडियो के जरिए बहुत ही खूबसूरत तरीके से इस बात को रेखांकित किया गया है कि कैसे सहकारी समितियों ने पिछले सात दशकों से लैंगिक समानता का समर्थन किया है, महिलाओं को बाहर निकलने और पारिवारिक आय में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया है।

आज अमूल सहकारी आंदोलन ग्रुप का 75वें साल में कुल टर्न ओवर 53,000 करोड़ (€ 6.01 बिलियन) रुपए पर पहुँच गया है। कोरोना महामारी के कारण बाजार में उपजे नकारात्मक प्रभाव और डेयरी कमोडिटी बाजारों पर इसके प्रतिकूल प्रभाव के बावजूद गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (अमूल फेडरेशन) ने वित्तीय वर्ष 2020-21 में 39,248 करोड़ रुपए का कारोबार किया है।

अमूल ऐसा ब्रांड है, जिसने पिछले दो दशकों में देश में दुग्ध के उत्पादन को दोगुना करते हुए लगभग 130 मिलियन टन सालाना तक पहुँचा दिया और भारत को दूध की कमी वाले देश की श्रेणी से बाहर निकालकर दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश बनने में मदद की है। अमूल दुनिया की नौवीं सबसे बड़ी डेयरी कंपनी है।

तालिबानी आतंकियों के सामने ऐसे पस्त हुई ₹6 लाख करोड़ की फ़ौज, 20 साल की मेहनत बेकार: काबुल छोड़ भागने को बेताब USA

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी क्या शुरू हुई, तालिबान ने पाँव पसारने चालू कर दिए। अब तो स्थिति ये है कि काबुल को छोड़ कर अधिकतर बड़े शहर अब आतंकियों के कब्जे में हैं। अफगानिस्तान की सेना व पुलिस तालिबान के सामने पस्त नजर आ रही है। अमेरिका ने अपने हाथ खींच लिए हैं। भारत के लिए भी ये चिंता का विषय है, क्योंकि आतंक समर्थक पाकिस्तान की तालिबान के साथ भी साँठगाँठ है।

ताज़ा खबर ये है कि तालिबान अब अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में घुस रहा है, वो भी चारों तरफ से। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अफगानिस्तान के ही गृह मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है। तालिबान का कहना है कि वो अभी काबुल की एंट्री पॉइंट पर ही है। काबुल में कई स्थानों पर गोलीबारी की आवाज़ सुनी गई। हाल ही में वहाँ एक कार ब्लास्ट भी हुआ था। अमेरिका किसी तरह वहाँ से निकल कर भागने को बेताब है।

फुस्स हो गई ₹6 लाख करोड़ की फ़ौज?

तालिबान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा है, अफगानिस्तान के सशस्त्र बल आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं। मई में शुरू हुआ तालिबान का हिंसक अभियान डेढ़ दर्जन बड़े शहरों को अपने चपेट में ले लिया है और अफगानिस्तानी सेना बिखरती जा रही है। मुल्क के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े शहर कंधार व हेरात अब तालिबान के कब्जे में हैं। कहीं हफ़्तों गोलीबारी चली तो कहीं तालिबान को संघर्ष का सामना ही नहीं करना पड़ा।

ऐसे में ये में ये सवाल उठना लाजिमी है कि अब तक अफगानिस्तानी सेना के प्रशिक्षण, उपकरणों और हथियारों पर अमेरिका ने पिछले 20 वर्षों में जो 83 बिलियन डॉलर (6.16 लाख करोड़ रुपए) खर्च किए थे, वो कहाँ चले गए? उसका परिणाम क्यों नहीं दिख रहा? बराक ओबामा जब अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तभी उन्होंने अफगानिस्तान की सेना को सशक्त करने का खाका तैयार किया था। योजना थी कि उन्हें दायित्व सौंप कर अमेरिका वहाँ से निकलेगा।

इसके लिए अमेरिका की तर्ज पर अफगानिस्तान में सेना का गठन किया गया, लेकिन अब ये सब बेकार हो गया है। यानी, अफगानिस्तान की फ़ौज पर 2 दशकों में 6 लाख करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद आज मुल्क का अधिकतर हिस्सा तालिबानी आतंकियों के कब्जे में है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने 11 सितंबर, 2021 तक अपनी सेना की वापसी की घोषणा की, तभी से अफगानिस्तानी फ़ौज बिखरने लगी।

इसकी शुरुआत ग्रामीण इलाकों से हुई। गाँवों में बने आउटपोस्ट्स को घेरने के बाद तालिबान के आतंकी कहते थे कि अगर उन्हें आगे जाने दिया जाएगा तो वो सबकी जान बख्श देंगे। यहीं से आत्मसमर्पण का दौर शुरू हुआ। अपने उपकरण, हथियारों व गोला-बारूद छोड़ कर अफगानिस्तानी सशस्त्र बल पीछे हटते चले गए। इससे तालिबान को ज्यादा से ज्यादा गाँवों व सड़कों पर कब्ज़ा मिलता चला गया।

अफगानिस्तान में 3 लाख सैनिकों की एक फौज तैयार की गई थी, लेकिन अब इसका एक छठा हिस्सा ही सक्रिय है। भ्रष्टाचार और कई गोपनीयता के कारण कागज़ पर संख्या कुछ और थी और असल में कुछ और। अफगानिस्तान की सरकार से सैनिक पहले से ही नाराज़ थे। इन सब पर अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया। तालिबान ने सुरक्षा बलों के मन में बिठा दिया कि वो राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार के लिए लड़ रहे हैं, जो इस लायक ही नहीं हैं।

इसीलिए, अफगानिस्तान सरकार के लिए लड़ते हुए मरने से बेहतर इन सैनिकों ने आत्मसमर्पण को चुना। कंधार में तो स्थिति और खराब थी। सैनिकों के लिए जो आलू लाए गए थे, उसे तालिबान ने अपने कब्जे में ले लिया। सैनिक तक भूख से जूझ रहे थे। ऐसे में वो भला क्या मुकाबला करते? सरकार से भी उन्हें समर्थन नहीं मिला। तालिबान ने गाँवों को छोड़ कर शहरों का रुख किया और एक के बाद एक राजधानियों को कब्जाते चले गए।

2001 से लेकर अब तक अफगानिस्तान के 60,000 जवानों ने अपनी जान गँवाई है। कुंदूज़ शहर में तो अफगानिस्तान की सेना का एक पूरे मुख्यालय ने ही तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका द्वारा दिए गए ड्रोन व हैलीकॉप्टर तक आतंकियों के कब्जे में चले गए। मुल्क के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ये युद्ध नहीं बल्कि ‘मानसिक युद्ध’ ज्यादा है। पायलटों का कहना है कि नेताओं को उनकी फ़िक्र कम और एयरक्राफ्ट्स के रख-रखाव पर ज्यादा थी।

सैनिकों की संख्या तो दूर, हथियार और राशन तक के मामले में अफगानिस्तान की सेना कमजोर है। बताया जा रहा है कि तालिबान के लगभग 1 लाख लड़ाके मैदान में हैं। कई इलाकों में तो तालिबान ने पुलिस अधिकारियों को रुपए देकर उन्हें पीछे हटने को मजबूर किया। हेलमंड के लश्कर गाह में लड़ाई के वक़्त जब सेना ने मदद माँगी तो वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि वहीं रुको और लड़ो। यही सब तालिबान की ताकत इतनी जल्दी बढ़ने के कारण हैं।

सबसे बड़ी बात ये है कि अफगानिस्तान के कई जाने माने ‘वॉरलॉर्ड्स’ ने भी तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया है। इनमें मोहम्मद इस्माइल खान भी शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय तक तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। वहीं अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति मार्शल अब्दुल राशिद दोस्तुम भी शामिल हैं, जिन्होंने 40 साल तक युद्ध लड़ा है। इससे निचले स्तर के अधिकारियों व सैनिकों का आत्मविश्वास डिगा है।

अमेरिका को केवल अपनी चिंता

उधर अमेरिका का अब सारा जोर इस बात पर है कि वो जल्द से जल्द अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल ले। इसके लिए 5000 अतिरिक्त सैनिक भी भेजे जा रहे हैं, जो अमेरिकी राजनयिकों व अधिकारियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करेंगे। 1000 सैनिक भेज दिए गए हैं और 3000 अतिरिक्त भेजे जा रहे हैं। अमेरिका के अपने अब तक के सबसे लंबे युद्ध से हाथ खींचने के बाद अब वो पीछे हटने के मूड में बिलकुल नहीं है।

यानी, अब वो अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ कर निकलने पर ही आमदा है। अफगानिस्तान में स्थित अमेरिकी दूतावास और एयरपोर्ट्स की सुरक्षा के लिए पहले से ही अमेरिकी सैनिक लगे हुए हैं। एक बार सारे अधिकारी निकल जाएँ तो ये भी लौट जाएँगे। अमेरिका ‘राजनीतिक सेटलमेंट’ के लिए अफगान सरकार के समर्थन की बात कर रहा है और साथ ही कह रहा है कि अफगानिस्तान से आतंकी खतरों को लेकर ख़ुफ़िया विभाग अलर्ट पर है।

अमेरिकी विशेषज्ञ तक माँग कर रहे हैं कि अमेरिका कम से कम तालिबान को इतनी चेतावनी तो दे कि अगर वो काबुल में घुसते हैं तो फिर अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करेगा। जो बायडेन को अफगानिस्तान से पूरी तरह अमेरिका के निकलने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील भी की जा रही है। महिलाओं के साथ क्रूरता और सार्वजनिक रूप से मौत का खेल खेल रहे तालिबान को अब कौन रोकेगा?

भारत नहीं करेगा सैन्य हस्तक्षेप

जहाँ तक भारत का सवाल है, वो अफगानिस्तान में किसी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करने से बचेगा क्योंकि हम पहले से ही पाकिस्तान और चीन के मोर्चे पर लगे हुए हैं। ऐसे में, एक और संकट मोल लेने का कोई अर्थ नहीं। तालिबान कह रहा है कि वो भारत द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं को नुकसान नहीं पहुँचाएगा, लेकिन भारत अपने कर्मचारियों व अधिकारियों को वहाँ छोड़ने की भूल नहीं कर सकता है।

दानिश सिद्दीकी की हत्या ने ये दिखा दिया है कि तालिबानी आतंकियों के भीतर भारत के प्रति किस तरह कूट-कूट कर नफरत भरी हुई है। दानिश सिद्दीकी के शव तक के साथ भी बर्बरता की गई थी। युवतियों व विधवाओं की तालिबान के लड़ाकों से जबरन शादी कराई जा रही है। तालिबान लड़कियों की लिस्ट तलब कर रहा है। उन्हें स्कूलों-कॉलेजों से लौटा दिया जा रहा है। उनका पहनावा तय कर रहा है।

अगर तालिबान किसी प्रकार की गड़बड़ी करता है तो भारत उसे वैसे ही जवाब देने की क्षमता रखता है, जैसा पाकिस्तान को अक्सर दिया जाता है। लेकिन, तालिबान भारत से सीधे नहीं उलझना चाहेगा। हाँ, पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के कई सरगना जरूर तालिबान के साथ हैं। ऐसे में, हमें सीमा पर घुसपैठ पर कड़ी नजर रखनी होगी। पंजाब में ‘किसान आंदोलन’ के कारण खालिस्तानियों की सक्रियता और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच भारत किसी दूसरे देश में सैन्य हस्तक्षेप का रिस्क नहीं लेगा।

वैसे भी भारत के वामपंथियों में तालिबान को लेकर गजब की चुप्पी है। बार-बार मुग़ल राज का बचाव करने वाले इस्लामी चरमपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी तालिबान के कुकृत्यों पर चुप्पी साधे हुए हैं। यही लोग भविष्य में तालिबान की ‘अच्छाई’ को लेकर लेख लिखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। औरंगजेब और अलादीन खिलजी का बचाव करने वाले तालिबान के विरोधी कैसे हो सकते हैं? अब नजर इस पर है कि भारतीय विदेशी कूटनीति तालिबानी खतरे से कैसे निपटती है।

कश्मीर का कोना-कोना भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रंगों से सराबोर, भावुक कश्मीरियों ने दिया पीएम मोदी को धन्यवाद

भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जश्न मनाने के लिए केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर को भारतीय ध्वज के रंगों से सजाया गया है, जहाँ पर दशकों तक यह सब बंद था। सोशल मीडिया साइटों पर कई विजुअल्स वायरल हो रहे हैं, जिनमें घाटी के कई हिस्सों को राष्ट्रीय ध्वज के रंगों की रोशनी से रोशन किया गया है। 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद से घाटी में यह तीसरा स्वतंत्रता दिवस समारोह है।

श्रीनगर के लाल चौक स्थित घंटाघर को राष्ट्रीय ध्वज के रंगों से सजाया गया है।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा साझा किए गए दृश्यों में रियासी जिले के सलाल बांध में तिरंगा रोशनी लगाई गई है।

जम्मू और कश्मीर में जेकेपीडीसीएल की परियोजनाओं को भी 75 वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर तिरंगे से रौशन कर दिया गया।

श्रीनगर, कश्मीर में तिरंगे की रोशनी से जगमगाते पुराने ज़ीरो ब्रिज को दिखाते हुए वीडियो का एक स्निपेट भी माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर वायरल हो रहा है।

इसके अलावा श्रीनगर, कश्मीर में कई अन्य फ्लाईओवर, पुल और इमारतों को भी भारतीय ध्वज के रंगों से सजाया गया था।

जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में स्थित बघलियार बांध भी स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय ध्वज के रंगों से जगमगा उठा।

श्रीनगर के मेयर जुनैद अजीम मट्टू ने ट्विटर पर यह जानकारी दी थी कि देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जम्मू-कश्मीर के सबसे ऊंचे तिरंगे का उद्घाटन श्रीनगर के हरि पर्वत किले में किया जाएगा।

स्वतंत्रता दिवस समारोह के उपलक्ष्य में जम्मू-कश्मीर के सैकड़ों स्कूलों और सरकारी कार्यालयों ने आज राष्ट्रीय ध्वज फहराया। पत्रकार अहमद अली फैयाज ने ट्वीट किया कि, सबसे पहले 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 23,000 स्कूलों में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा।

पत्रकार ने आगे लिखा कि 2003 के बाद से 15 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर पहली बार कश्मीर में सभी फोन, एसएमएस और इंटरनेट सेवाएँ पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थीं।

जम्मू और कश्मीर के नागरिक इस बात को लेकर भावुक हैं कि वे पहली बार अपनी मातृभूमि कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस मना पाए। उन्होंने ‘इतिहास’ रचने के लिए पीएम मोदी को धन्यवाद दिया।

श्रीनगर स्थित लालचौक को भी तिरंगे के रंगों से सजाया गया है। उसी के सामने खड़े होकर एक वीडियो शेयर कर वहाँ के स्थानीय नागरिक साहिल टिक्कू ने केंद्र सरकार को धन्यवाद दिया। उसने ट्वीट किया, “मैं अपने जीवन में पहली बार अपनी मातृभूमि कश्मीर में स्वतंत्रता दिवस मना रहा हूँ! विश्वास नहीं हो रहा है कि यह हो रहा है। यह इतिहास है। जम्मू में एक शरणार्थी शिविर में पले-बढ़े एक विस्थापित हिंदू के रूप में जीवन भर इसके लिए तरसता रहा। धन्यवाद, @PMOIndia@HMOIndia@OfficeOfLGJand।”

भारत आज स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के स्वतंत्रता के 100वें वर्ष में प्रवेश करने के लिए विकास का रोडमैप देश के सामने रखा। आप उनका भाषण सुन सकते हैं और इसके बारे में यहाँ और अधिक पढ़ सकते हैं।

‘मोदी है तो मुमकिन है’: आतंकी बुरहान वानी के अब्बा ने फहराया तिरंगा, गाया जन-गण-मन, लोगों ने कहा – ‘यही तो है अच्छे दिन’

आपको हिज्बुल मुजाहिद्दीन का आतंकी बुरहान वानी याद है? हाँ, वही जिसे 6 जुलाई, 2016 को भारतीय सेना ने मार गिराया था। इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसकी ‘अंतिम यात्रा’ निकाली थी, जिसमें भारत विरोधी नारे लगे थे और हजारों लोग जुट गए थे। ये तो बात थी पुराने जम्मू कश्मीर की। अब बुरहान वानी के अब्बा मुजफ्फर वानी ने जम्मू कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज फहराया है। मुजफ्फर वानी द्वारा तिरंगा फहराने की तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं।

ये नया जम्मू कश्मीर है, जहाँ अब आतंकियों की ‘अंतिम यात्राएँ’ नहीं निकाली जातीं और जहाँ श्रीनगर का लाल चौक भी तिरंगे से जगमग हुआ रहता है। जहाँ आतंकियों का सफाया होता है और आम लोगों की मदद की जाती है। लद्दाख में केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने जा रहा है और जम्मू कश्मीर में इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है। ऐसे में आतंकियों व अलगाववादियों के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है।

बुरहान वानी के अब्बा मुजफ्फर ने जम्मू कश्मीर के पुलवामा के एक स्कूल में 75वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में हिस्सा लेते हुए रविवार (15 अगस्त, 2021) को ध्वजारोहण किया। फिर उन्होंने राष्ट्रगान जन-गण-मन भी गाया। मुजफ्फर वानी त्राल के सरकारी कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। दक्षिण कश्मीर में जब आतंकी बुरहान वानी को मार गिराया गया था, तब इस्लामी कट्टरपंथियों के 5 महीने तक राज्य में हिंसा की थी।

तब 100 से अधिक लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ के तहत सभी शैक्षिक संस्थानों और शिक्षा विभाग से जुड़े दफ्तरों में तिरंगा फहराया जाना है। कई लोगों ने बुरहान वानी के अब्बा मुजफ्फर वानी द्वारा तिरंगा झंडा फहराए जाने पर प्रतिक्रिया दी। डॉक्टर विनायक दुबे ने लिखा, “भय बिनु होई न प्रीति – ऐसा भगवान श्रीराम ने कहा है।” एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि 2014 से यही बदलाव हुआ है।

कोरोना नियमों की धज्जियाँ उड़ा एयरपोर्ट पर बिना मास्क के टहलते नजर आए सैफ-करीना, लोगों ने पूछा- ‘क्या इनके लिए कानून नहीं है’

बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान और सैफ अली खान परिवार समेत मालदीव टूर के लिए रवाना हुए हैं। सैफ 16 अगस्त को 51 साल के होने जा रहे हैं और ऐसे में उनके जन्मदिन को मनाने लिए ये टूर पर गए हैं। सैफ के साथ उनका बड़ा बेटा तैमूर और छोटा बेटा जहांगीर भी एयरपोर्ट पर दिखा। कोरोना के कारण सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार मास्क अनिवार्य किया गया है, लेकिन कपल एयरपोर्ट पर बिना किसी मास्क के था। इस कारण से सोशल मीडिया पर लोग उन्हें जमकर ट्रोल कर रहे हैं।

उनके इस वीडियो को फोटोग्राफर विरल भियानी ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया। इसमें स्पष्ट देखा जा सकता है कि दोनों में किसी ने भी मास्क नहीं पहना था। बस इसी गलती के कारण जहाँ आम लोगों पर जुर्माने का प्रावधान है वहीं बॉलीवुड स्टार्स अपनी लापरवाही से कानून और व्यवस्था को भी ठेंगा दिखा कर निकल जाते हैं। अभिनेता ने प्राइवेट प्लेन के जरिए यह यात्रा की।

लोग मास्क नहीं पहनने को लेकर सवाल कर रहे हैं कि आखिर इन्होंने मास्क क्यों नहीं पहने हैं?

साभार: विरल भियानी

यूजर गिरी-एन-जाट ने बॉलीवुड अभिनेता और अभिनेत्री को मास्क लगाने की सलाह दी।

साभार: विरल भियानी

सुमिता नरूला नाम की यूजर ने वीडियो पर कमेंट करते हुए मीडिया को ही दोषी ठहराया और कहा, “बाप रे ये लोग कितने गंदे तरीके से तुम लोगों को लुक दे रहे हैं। शर्म नहीं आती तुम लोगों को मैम-मैम कर रहे हो।” वहीं एक अन्य यूजर ने कहा कि इन्हें इतना महत्व ही क्यों देते हैं?

साभार: विरल भियानी

एंजेल नाम की यूजर ने कहा कि सारा औऱ इब्राहिम को करीना-सैफ के साथ छुट्टियों में जाते कभी नहीं देखा। तैमूर भी अमृता सिंह के घर पर कभी नहीं दिखा। ऐसा लगता है कि सैफ उन सभी को भूल चुके हैं और अपने नए परिवार के साथ ज्यादा खुश हैं।

साभार: विरल भियानी

एक अन्य यूजर ने करीना कपूऱ खान को टैग कर पूछा कि उनके मास्क कहाँ हैं? क्या उनके लिए कानून नहीं है? इसके साथ ही उसने मुंबई पुलिस को भी टैग किया है।

साभार: विरल भियानी

बता दें कि महाराष्ट्र में कोरोना वायरस का संक्रमण अन्य राज्यों की अपेक्षा तेजी से बढ़ रहा है। वहाँ बीते 24 घंटे के दौरान 5,000 से अधिक नए संक्रमित मिले हैं। इसके अलावा राज्य में 63,262 एक्टिव केस हैं। वहीं कुल संक्रमितों की बात करें तो राज्य 63,87,863 लोग अब तक संक्रमित हुए हैं। हालाँकि, इनमें से 61,86,223 लोग स्वस्थ भी हो चुके हैं।

समाज जिसे बालिका कहता है, तालिबानी कबीलाई कानून में वो सिर्फ ‘योनि’ है: टैगोर के ‘काबुलीवाला’ के बहाने बात इस्लामी आतंक की

रहमत ससुर के लिए अपना मोटा सा घूँसा तानकर कहता – “हम ससुर को मारेगा।” सुनकर मिनी ‘ससुर’ नाम के किसी अनजाने जीव की दुरावस्था की कल्पना करके खूब हँसती। स्कूल के दौर में पढ़ाई जाने वाली रविन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी “काबुलीवाला” का ये हिस्सा हमें ही नहीं, कई लोगों को याद होगा। ये कहानी अफगानिस्तान (काबुल) से आने वाले एक व्यापारी (फेरीवाले) की कहानी थी।

उस दौर में ये लोग अफगानिस्तान से आते थे और शायद काबुल इकलौती पहचानी हुई जगह होती होगी तो जैसे हर बिहार निवासी खुद को दिल्ली में पटना का बताता है, वैसे ही हर अफगानी काबुलीवाला हो जाता होगा। इनका मुख्य पेशा अखरोट-सूखे मेवे बेचने के अलावा ब्याज पर पैसे कर्ज देना भी रहा होगा। शायद इसी लिए यशपाल की कहानी “पर्दा” में भी ये ब्याज पर कर्ज देते दिखते हैं।

काबुलीवाला कहानी पर्दा से कहीं ज्यादा प्रसिद्ध रही। इसके बारे में बात करते हुए मार्केटिंग (विपणन-विज्ञापन) के क्षेत्र के लोग बताते हैं कि कहानी में बच्चों के होने से लोगों का उस कथानक से भावनात्मक जुड़ाव अधिक होता है। काबुलीवाला कहानी पर फिल्म भी बनी है और उसमें बलराज साहनी (मन्ना डे की आवाज में) “ऐ मेरे प्यारे वतन” गाते भी सुनाई दे जाते हैं। आज कई जगह शायद ये गीत भी बजेगा।

जब ये बजे तो कहानी की मिनी को भी जरूर याद कर लीजियेगा। कहानी की बच्ची मिनी जितनी ही काबुलीवाले की भी बेटी थी। उसके पास बेटी की कोई तस्वीर तो नहीं थी, लेकिन कोयला हाथ पर लगाकर उसकी एक छाप ले ली गयी थी। कागज़ पर लगा हुआ वही छाप सीने से लगाए काबुलीवाला अपने वतन से हजारों किलोमीटर दूर बेटी को याद किया करता था। अक्सर पिता को बेटियाँ कुछ अधिक ही प्यारी होती हैं तो कहानी के लेखक ने अपनी बेटी को कथा में डाला, या काबुलीवाले की बेटी के प्रेम पर कहानी लिख दी तो आश्चर्य कैसा?

आश्चर्य तब होता है जब जिस अफगानिस्तान के किसी पिता की ऐसी रूमानी कहानी पढ़कर कई पीढ़ियाँ बड़ी हुईं, उन्हें अफगानिस्तान की जमीनी हकीकत समाचारों में दिखाई-सुनाई देने लगती हैं। फातिमा (जो कभी निमिषा थी) नाम की एक लड़की की माँ बिंदु ने केरल के उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें उसकी बेटी को वापस आने देने की अपील थी। ये लड़की मजहब बदल कर निकाह करने के बाद अफगानिस्तान में आईएसआईएस के इस्लामिक आतंकियों की मदद करने के लिए चली गई थी।

युद्ध में इसका इस्लामिक आतंकी पति मारा गया और ये अब अपनी बेटी के साथ अफगानिस्तान की किसी जेल में थी। हालाँकि अफगानी सरकार इन्हें वापस भेजने को तैयार थी, मगर भारत ने इन्हें वापस लेने से इनकार कर दिया था। क्या इस मामले में मानवीयता दिखाई जानी चाहिए थी? क्या एक आतंकी को भारत को वापस लेना चाहिए था? कुछ आतंकियों के पैरोकार इसके समर्थन में शायद कूदकर उतर आएँगे।

जब हम-आप जैसे समझदार लोग इस मामले को देखते हैं, तो हमें कुछ और ही नजर आता है। सबसे पहले सोचना पड़ता है कि ये लड़की क्या कर रही थी? पूरे होशो-हवास में ये पूरी शिद्दत से मदद किसकी कर रही थी? ऐसा करते ही हमें एक ऐसा संगठन दिखाई देता है जिसके लिए स्त्री एक योनि से अधिक कुछ है ही नहीं! वो इस बात की पैरोकारी करते हैं कि लड़कियों को शिक्षा भी नहीं दी जानी चाहिए।

हालाँकि, मलाला इस मामले पर चुप्पी साधे बैठी है, लेकिन ठीक इसी वजह से तो इस्लामी आतंकियों ने उसे रोका था! वो किन्हीं नौकरियों में स्त्रियों को नहीं देखना चाहते, एक बच्चे पैदा करने की खेती तक उसे सीमित कर देना चाहते हैं। क्या उसका किसी मदद पर अधिकार है? जब मानवों जैसा व्यवहार ही नहीं रहा तो मानवाधिकारों की माँग, दोमुँहों को अपने किसी मुँह से करने का अधिकार नहीं रहता।

वो समर्थन कर रहे हैं पंद्रह से पैंतालिस तक की सभी स्त्रियों को भोगदासी बना देने का। क्या ऐसी बातों का समर्थन करने वालों को हम अपने देश में वापस लाना चाहेंगे? अब सवाल है कि ऐसे मुद्दे जब सामने आते हैं तो खुलकर इनका विरोध क्यों नहीं होता? जैसे आधी रात को आतंकियों के लिए अदालतें खुलवाई जाती हैं, जैसे आजाद मैदान में इकट्ठा, एक कट्टरपंथी मजहब की भीड़ शहीद स्मारक को तोड़ देती है, वैसा आंदोलन कभी इन्हें देश के बाहर रोकने के लिए होता नहीं दिखता।

इसकी एक बड़ी वजह मीडिया का सौतेला व्यवहार है। सीरिया से भाग रहे शरणार्थियों के एक बच्चे का समुद्र के किनारे पड़ा शव तो वो वर्षों दिखाते रहेंगे, लेकिन जब राजौरी में एक तीन-चार वर्ष के बच्चे को इस्लामिक कट्टरपंथी गोलियों से भुन डालते हैं, तो उसकी तस्वीरें, सेंसर करके दिखाई जाती हैं। लोगों तक अगर खबर पहुंचे ही नहीं तो फिर आक्रोश कैसा? अफगानिस्तान में ऐसा ही फिर से हो रहा है। लड़कियों को उनके परिवारों से छीना जा रहा है।

तालिबान से पीड़ित अफगानिस्तान की एक बच्ची, जो बनना चाहती है डॉक्टर

वो बच्ची थी, इस बात से इस्लामी कट्टरपंथियों को कोई मतलब नहीं। सभ्य समाज जिसे अठारह से कम उम्र की बालिका मानता है, उसे कबीलाई कानून मानने वाले केवल एक योनि ही तो मानते हैं! मलाला की गूँजती हुई चुप्पी आज इसलिए भी सुनाई दे रही है क्योंकि उसने अपनी आवाज को चंद पुरस्कारों के बोझ तले दब जाने दिया। अगर आपने भी कभी ऐसे लोगों के अभियानों के लिए चंदा दिया हो (जो कि वो माँगते ही रहते हैं) तो एक बार सोचिएगा कि क्या आपकी दी हुई रकम सही तरीके से इस्तेमाल हुई भी?

कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे कथित रूप से किन्हीं दंगों के लिए इकट्ठा की गई रकम से सौन्दर्य प्रसाधन खरीदे जा रहे थे, वैसे ही आपकी दी गयी रकम का भी कोई तीश्ता शीतलवाड़ नाजायज इस्तेमाल कर रही हो! हाँ, जब अफगानियों की दशा पर सोचिए तो वहाँ की छोटी-छोटी बच्चियों की दुर्दशा के बारे में भी जरूर सोचिएगा। मुझे आज ये भूली सी, मगर जानी-पहचानी सी कहानी आज इसलिए नहीं याद आई है क्योंकि स्वतंत्रता दिवस पर हमें इसका देशभक्ति वाला गाना कहीं सुनाई दे गया है।

दरअसल कहानी में बाद में काबुलीवाले को जेल हो जाती है। जेल जाते वक्त भी रहमत काबुलीवाला अपना मोटा सा घूँसा मिनी को दिखाता हुआ कहता है, “ससुर को मारता, मगर क्या करूँ? हाथ बँधे हैं!” काबुलीवाले के हाथ बँधे थे। अफगानिस्तान के लोगों के, दुनिया के तथाकथित चौधरियों के भी हाथ बँधे होंगे। अखबार और खरीदी जा सकने वाली मीडिया के अन्य रूपों में काम करने वाले लोगों के भी हाथ बँधे ही होंगे। वरना ये लोग इस बच्ची को ऐसे तो नहीं जाने देते न? कोई न कोई तो “ससुर को मारता”?