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‘लाल लाल होठों पे’: जूही चावला की 5जी पर सुनवाई के दौरान शख्स ने गाए गाने, दिल्ली हाईकोर्ट ने भेजा अवमानना का नोटिस

दिल्ली हाई कोर्ट में बॉलीवुड अभिनेत्री जूही चावला की 5जी टेक्नोलॉजी को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार (2 जून 2021) को वर्चुअल सुनवाई के दौरान एक व्यक्ति अभिनेत्री की फिल्म का गाना गुनगुनाने लगा। इससे डिस्टर्बेंस की वजह से जज को सुनवाई बीच में ही रोकनी पड़ी। इसके बाद उसे सुनवाई से बाहर निकालकर कोर्ट ने फिर से सुनवाई शुरू की। लेकिन, बार-बार सुनवाई में विघ्न डालने से परेशान होकर कोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी करते हुए पुलिस को उसकी तलाश कर कार्रवाई करने का आदेश दिया।

अदालत में सुनवाई शुरू होते ही रुकावटें आनी शुरू हो गई थीं। सुनवाई शुरू होते ही शख्स जूही चावला को तलाशने लगा। सुनवाई के दौरान आवाज आने लगी, कहाँ हैं जूही मैडम, कहाँ है? इस दौरान अदालत जूही के वकील से ईमेल द्वारा नोट प्राप्त करने को लेकर बात कर रही थी, लेकिन अदालत ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया।

जैसे ही मामले की कार्यवाही आगे बढ़ी, उस व्यक्ति ने जूही चावला की फिल्मों के गाने गुनगुनाने, गाने शुरू कर दिए। इसके बाद अदालत ने अधिकारियों को उसे म्यूट करने का आदेश दिया।

वहीं शख्स के गाने पर याचिकाकर्ता जूही चावला के वकील दीपक खोसला ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि ये सुनवाई से ध्यान भंग नहीं कर रहा है।” उन्होंने शख्स को दूर संचार कंपनियों द्वारा भेजे जाने का आरोप लगाया।

लेकिन इससे सुनने में संगीत की रुकावट नहीं रुकती, क्योंकि वही शख्स फिर से जूही चावला की फिल्मों के गाने गाने लगा. इस बार कोर्ट ने कोर्ट मास्टर से उस व्यक्ति को ऑनलाइन सुनवाई से हटाकर लॉक करने को कहा।

हालाँकि, उस व्यक्ति को लॉक किया जाना उसे सुनवाई से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं था। वह किसी तरह फिर से ऑनलाइन सुनवाई में शामिल हो गया और फिर से उसने गाना गाना शुरू कर दिया। इस बार कोर्ट के सब्र का बाँध टूट गया और उसने शख्स की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया। इसके साथ ही उसके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी कर दिया गया। अदालत ने अधिकारियों से दिल्ली पुलिस के आईटी विभाग से संपर्क करने को कहा।

इंडिया टुडे के एक पत्रकार के ट्वीट के मुताबिक, फर्जी आईडी बनाकर कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुए शख्स ने “घूँघट की आड़ से दिलवर का”, “लाल लाल होठों पे गोरी किसका नाम है” और “मेरी बन्नो की आएगी बारात” जैसे गाने गाए।

जूही चावला ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया था सुनवाई का लिंक

गौरतलब है कि बॉलीवुड अभिनेत्री जूहा चावला ने ही 5जी टेक्नोलॉजी के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने ही मामले की ऑनलाइन सुनवाई का लिंक सोशल मीडिया पर शेयर किया था, ताकि लोग अदालती कार्यवाही में शामिल हो सकें। उन्होंने लिंक शेयर करते हुए लिखा था, “अगर आपको लगता है कि यह (5जी) आपको किसी भी तरह परेशान करता है तो दिल्ली उच्च न्यायालय में आयोजित हमारी पहली वर्चुअल हियरिंग में शामिल होने के लिए फ्री फील करें, जो 2 जून को सुबह 10.45 बजे होगी। लिंक इन माय बायो।”

अभिनेत्री ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो मैसेज में अपने फॉलोवर्स को सुनवाई में शामिल होने के लिए कहा था।

जूही चावला ने 5जी तकनीक के खिलाफ दायर किया था मुकदमा

बॉलीवुड एक्ट्रेस जूही चावला ने 31 मई 2021 को भारत में 5जी टेक्नोलॉजी लागू किए जाने के खिलाफ केस दायर किया था। उन्होंने कहा था कि अगर 5जी टेक्नोलॉजी लगाई जाती है, तो इंसानों को रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन (आरएफ) की दर से एक्सपोजर मिलेगा, जो कि वर्तमान से 10 गुना या 100 गुना अधिक रेडिएशन पैदा करेगा।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट: निर्माण को ग्रीन सिग्नल देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सेंट्रल विस्टा परियोजना के निर्माण की छूट दिए जाने के बाद अब इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता प्रदीप कुमार द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि हाई कोर्ट का यह कहना गलत है कि इसमें काम करने वाले श्रमिक परियोजना स्थल पर रह रहे हैं।

उन्होने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार और सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का निर्माण करने वाली कंपनी ने अपने एफिडेविट में कहा था कि श्रमिक सराय काले खाँ में रह रहे थे, जो परियोजना स्थल से काफी दूर था और उन्हें वहाँ तक आने-जाने के लिए पास जारी किए गए थे।

खास बात यह है कि एडवोकेट प्रदीप यादव हाई कोर्ट में सेंट्रल विस्टा के मामले में पक्षकार नहीं थे। बता दें कि बीते 20 मार्च 2021 को केंद्र सरकार ने 20 हजार करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट के स्वरूप में बदलाव के लिए नोटिफिकेशन जारी किया था, जो कि सेंट्रल दिल्ली की 86 एकड़ की जमीनों से जुड़ा हुआ था। इसमें राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय समेत कई इमारतें शामिल हैं।

5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका

इससे पहले इसी साल 5 जनवरी 2021 को सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की बेंच ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को हरी झंडी देते हुए भूमि उपयोग और पर्यावरण मानदंडों के कथित उल्लंघन के आरोप वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (31 मई 2021) को केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी सेन्ट्रल विस्टा पुनरोद्धार परियोजना पर रोक लगाने से इनकार करते हुए इसके लिए दायर याचिका को खारिज कर दिया था। इस याचिका में कोरोना महामारी के मद्देनजर इस प्रोजेक्ट को रोकने की अपील की गई थी, जिसके तहत नए संसद भवन का निर्माण होना है। इसी के साथ हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ही एक लाख रुपए का जुर्माना लगाते हुए सेंट्रल विस्टा को ‘राष्ट्रीय महत्व का एक अत्यावश्यक परियोजना’ कहा था।

UP में कोरोना केसों में 93% कमी: भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव ने की ‘योगी मॉडल’ की तारीफ, 3 दिन तक चली मैराथन बैठक

उत्तर प्रदेश में कोरोना से निपटने के लिए ट्रिपल टी (टेस्टिंग, ट्रैकिंग, ट्रीटमेंट) फॉर्मूले पर काम करके योगी सरकार को अब सकारात्मक नतीजे दिखने लगे हैं। प्रदेश में युद्ध स्तर पर हो रही टेस्टिंग का ही नतीजा है कि राज्य ने एक दिन में 3.32 लाख टेस्ट किए और 5 करोड़ से ज्यादा कोविड टेस्ट करने वाला पहला राज्य बन गया। 

प्रदेश में धीरे-धीरे कोरोना का रिकवरी रेट (97.1%) सुधरने के साथ मामलों की कुल संख्या भी पहले से कम रह गई है। पिछले 24 घंटों की बात करें तो राज्य में 1500 नए मामले आए हैं। पहले कहा जा रहा था कि राज्य में कोरोना के पीक तक 30 लाख एक्टिव केस होंगे। मगर सरकार की प्रतिबद्धता ने कोरोना की रफ्तार पर विराम लगाया और अब वहाँ कुल 28 हजार एक्टिव केस हैं।

राज्य में कोरोना से पहले के मुकाबले राहत मिलने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी साथ-साथ मिशन-2022 में भी जुट गई है। 25 मई को इसी क्रम में आरएसएस (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कुछ नेताओं से मुलाकात की और योगी सरकार और संगठन के काम-काज का फीडबैक लिया। 

इसके बाद 31 मई को पार्टी के महामंत्री संगठन बीएल संतोष ने तीन दिवसीय दौरे में यूपी प्रभारी राधा मोहन सिंह के साथ राजधानी लखनऊ पहुँचकर यूपी की योगी सरकार और संगठन से जुड़े पदाधिकारियों के साथ बैठक कर उनके काम-काज की समीक्षा की।

इस क्रम में सीएम योगी, दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या और डॉ दिनेश शर्मा समेत कई विधायकों और सांसदों से एक-एक कर बैठक करके कोरोना काल में किए गए सेवाकार्यों की जानकारी लेकर काम-काज आदि पर फीडबैक लिया गया।

बता दें कि ये पहली दफा है जब पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री ने यूपी के भाजपा पदाधिकारियों के साथ सामूहिक बैठक न करके एक-एक बैठक की। यहाँ उन्होंने सबके द्वारा किए गए कार्यों की जानकारी हासिल की और बाद में प्रदेश में पार्टी के बहुमत से आने के बावजूद पंचायत चुनावों में हुई शिकस्त पर फीडबैक लिया गया और साल 2022 की तैयारियों पर सवाल किए गए।

इस दौरान मंत्रियों ने हार का कारण कुछ अधिकारियों को और उनके मनमाने रवैये को बताया। साथ ही कहा कि इन अफसरों के कारण ही प्रदेश में कई बार एमपी, एमएलए और पार्टी पदाधिकारियों के साथ कार्यकार्ताओ को भी अपमानित किया जाता है।

बीजेपी के राष्ट्रीय़ महासचिव बीएल संतोष ने यूपी बीजेपी और सरकार के प्रवक्ताओं से भी बात की। इसमें मीडिया में सरकार व संगठन की छवि, काम-काज और 2022 में बीजेपी की स्थिति को लेकर होने वाली चर्चाओ की जानकारी ली गई। इन सारे फीडबैक्स को अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा जाएगा। संभव है इसके बाद सरकार और संगठन के साथ वहाँ की ब्यूरोक्रेसी में बदलाव देखने को मिलें।

उल्लेखनीय है कि राज्य में योगी सरकार के काम से प्रभावित होकर लौटे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव ने ट्वीट कर कहा,  “पाँच हफ्तों में उत्तर प्रदेश ने नए दैनिक मामलों की संख्या में 93% की कमी की…याद रखें कि यह 20+ करोड़ आबादी वाला राज्य है। जब नगर पालिका के सीएम 1.5 करोड़ आबादी वाले शहर का प्रबंधन नहीं कर सके, तो योगीजी ने काफी प्रभावी ढंग से महामारी को संभाला है।”

9 साल के बेटे के लिए ‘इलाज या इच्छामृत्यु’ चाहती थी माँ, फरियाद पर सुनवाई से पहले गोद में तोड़ दिया दम

इकलौती संतान, उम्र: 9 साल और एक दुर्लभ बीमारी। फरियाद लेकर अदालत का चक्कर काटती माँ। एक दिन अचानक से बेटा माँ की गोद में दम तोड़ देता है। अब कल्पना कीजिए उस माँ के दर्द का। यह दर्द है आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले के चौडेपल्ली मंडल के बिरजेपल्ली गाँव की एक माँ का। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक जी. मणि और जी. अरुणा का 9 साल का बेटा हर्षवर्धन खून से जुड़ी एक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित था। हर्षवर्धन जब चार साल का था, तब उसका एक्सीडेंट हुआ था। उसके बाद से अक्सर उसकी नाक से खून आ जाया करता था। इसके बाद दम्पति को बेटे की दुर्लभ बीमारी का पता चला।

परिवार के पास संसाधन बेहद सीमित थे। बावजूद उन्होंने इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी। पेशे से किसान जी. मणि ने अपनी जमीन का कुछ हिस्सा भी बेच दिया। जी. अरुणा कहती हैं, “हमने उसके इलाज के लिए लगभग 4 लाख रुपए खर्च कर दिए। हमने उसका इलाज तिरुपति, वेल्लोर और तमिलनाडु के कई शहरों में कराया। हम कई बड़े डॉक्टरों से भी मिले, लेकिन हर्षवर्धन की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।”

अरुणा को किसी रिश्तेदार ने सलाह दिया कि उन्हें स्थानीय कोर्ट में आवेदन देना चाहिए कि या तो सरकार उनके बेटे हर्षवर्धन के इलाज में सहायता करे या फिर कोर्ट उसे इच्छामृत्यु की अनुमति दे। दो दिनों तक वह बेटे को लेकर याचिका दायर करने को लिए कोर्ट के चक्कर लगाती रहीं। मंगलवार (01 जून 2021) को भी अरुणा पुंगनूर कोर्ट में आवेदन लेकर ही आईं थी। लेकिन एक बार फिर वह आवेदन नहीं दे सकीं।

इसके बाद घर लौटने के लिए वह एक ऑटो रिक्शा में सवार हुईं। इसी दौरान अचानक फिर से हर्षवर्धन की नाक से खून आने लगा और थोड़ी ही देर में उसने माँ की गोद में ही दम तोड़ दिया। अरुणा ने कहा, “मैंने सोचा था कि कोर्ट में जाकर अपने बेटे को शायद बचा पाऊँ, लेकिन इससे पहले कि न्यायपालिका मेरी सहायता करती, मेरे बेटे ने मेरी गोद में ही दम तोड़ दिया।”

अमूल ने पेटा पर बैन लगाने की माँग करते हुए पीएम मोदी को लिखा पत्र, लगाया ‘विदेशी साजिश’ का आरोप

पेटा के साथ जारी विवाद के बीच भारतीय डेयरी अमूल ने मंगलवार (1 जून को 2021) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर पेटा पर कार्रवाई की माँग की। अमूल के वॉइस प्रेसीडेंट वलमजी हंबल (Valamji Humbal) ने पेटा पर लोगों की आजीविका के साधन को बर्बाद करने का आरोप लगाते हुए उस पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। हंबल ने यह भी कहा कि पेटा की हरकतों से भारतीय डेयरी क्षेत्र की छवि खराब हो रही है।

जीडीपी में डेयरी उद्योग का बड़ा योगदान

एक प्रेस रिलीज में हंबल ने जोर देते हुए कहा कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में डेयरी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है और ऐसे एनजीओ की गलत सूचनाओं से जीडीपी पर उल्टा असर हो सकता है। उन्होंने भारत के दुग्ध उद्योग के खिलाफ साजिश का आरोप लगाया है। गुजरात के दुग्ध उत्पादकों का हवाला देते हुए, हंबल ने डेयरी उद्योग की छवि को खराब करने की साजिश करने वालों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की।

हंबल ने कहा, “भारत के सकल घरेलू उत्पाद में डेयरी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन इस गैर सरकारी संगठन जैसे अवसरवादी तत्वों द्वारा फैलाई गई गलत सूचना से जीडीपी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस तरह के संगठन भारत के दूध उत्पादकों को बेरोजगार करने की साजिश का हिस्सा हैं। ”

उन्होंने आगे कहा, “गुजरात के दूध उत्पादक प्रधान मंत्री से ये अनुरोध कर रहे हैं कि वे उन संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए आवश्यक कार्रवाई शुरू करें, जो गलत और भ्रामक सूचना अभियानों के जरिए डेयरी क्षेत्र की छवि को धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं। ये संगठन सिंथेटिक दूध का उत्पादन करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संयंत्रों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।”

हंबल ने पशुओं के खिलाफ हिंसा की अफवाहों को खारिज करते हुए दावा किया कि भारत में लोग दुधारू पशुओं को परिवार के सदस्य के रूप में पालते हैं। उन्होंने पेटा की माँग को भारतीय डेयरी उद्योग को खत्म करने की कोशिश बताया और कहा कि ये उद्योग देश को दुग्ध और उससे बनने वाले उत्पादों के आयात से बचाता है। हंबल ने पेटा के इस कदम को विदेशी कंपनियों की साजिश बताया है।

उन्होंने आगे कहा, “भारतीय संस्कृति पशुधन को अपने परिवार का सदस्य मानती है। देश के 10 करोड़ बेरोजगार लोग इसी व्यवसाय पर निर्भर हैं।”

पेटा इंडिया ने अमूल से वीगन दूध का उत्पान बढ़ाने को कहा

पेटा ने अमूल से वीगन (गैर-जानवर उत्पाद) दूध के उत्पादन पर जोर देने को कहा था। इसी को लेकर दोनों आमने-सामने आ गए हैं। गैर-लाभकारी संगठन (पेटा) ने अमूल को फलते-फूलते वीगन फूड और दूध के बाजार से लाभ उठाने की अपील की थी। पेटा ने दावा किया कि संयंत्र आधारित उत्पादों की माँग बढ़ रही है।

पेटा के इस सुझाव पर पलटवार करते हुए अमूल ने कहा कि वो चाहता है कि हम अपने 10 करोड़ गरीब किसानों की आजीविका छीन लें। अमूल ने कहा कि पेटा चाहता है कि हम 75 सालों में अपने किसानों के साथ मिलकर बनाए गए अपनी सभी संसाधनों को छोड़कर किसी बड़ी मल्टी नेशनल कंपनी द्वारा जेनिटकली मोडिफाई सोया उत्पादों को अपना लें। अमूल ने पेटा के इस सुझाव को खारिज करते हुए कड़ी आपत्ति जताई और अब पीएम से ऐसी संस्थाओं पर बैन लगाने की माँग की है।

RSS का राहत कार्य ‘हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा’ और ‘मुस्लिम बाँट रहे प्यार’: ‘The Wire’ के लिए अब सेवा भी कम्युनल

अगर हिन्दू किसी की मदद करते हैं तो इसमें ‘The Wire’ को ‘ हिंदुत्व एजेंडा’ दिखता है और अगर कोई मुस्लिम संस्था भोजन के कुछ पैकेट्स बाँटती है तो ये ‘प्यार’ है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान आए दो लेखों में ‘The Wire’ ने अपने प्रोपेगंडा का इस्तेमाल करते हुए ये जताने की कोशिश की है कि देश भर में RSS और सेवा भारती से लेकर अन्य हिन्दू संगठन/मंदिर मदद को आगे आ रहे हैं तो इसके पीछे उनका ‘हिंदुत्व एजेंडा’ है।

आइए, देखते हैं इन दोनों लेखों में कितना बड़ा अंतर है। जो ताज़ा लेख है, उसे रविवार (मई 30, 2021) को प्रकाशित किया गया था। इस लेख में दावा किया गया है कि सत्ताधारी लोग और उनके समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को बचाने में लगे हुए हैं, बजाए इसके कि लोगों की मदद की जाए। साथ ही इसमें केंद्र सरकार द्वारा मौत के आँकड़ों में गड़बड़ी का आरोप भी लगाया गया है। वही आरोप, जिसे राहुल गाँधी ने NYT के सहारे दोहराया था।

राहुल गाँधी ने अपनी वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही बात कही थी, लेकिन इस दौरान वो ये बात भूल गए थे कि संक्रमितों व मौतों के आँकड़े राज्य ही केंद्र को भेजते हैं, जिसके बाद उसे अपडेट किया जाता है। देश में कॉन्ग्रेस के शासन वाले राज्यों को वो ये नसीहत दें कि वो आँकड़े ठीक से भेजें और केंद्र को गुमराह न करें। लेकिन, ‘लाशों की राजनीति’ ये नहीं समझती है और वो जनता को बरगलाना जानती है।

आप अगर कॉन्ग्रेस का बताए जाने वाले टूलकिट को याद कीजिए तो इसमें भी इसका पूरा खाका था कि कैसे लाशों के सहारे मोदी सरकार को बदनाम करना है और विदेशी मीडिया में आ रही ऐसी ख़बरों को प्रमोट करना है, जलती चिताओं की तस्वीरें फैलानी हैं। केंद्र सरकार पर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद कर देने का आरोप लगाया गया है, जबकि पीएम केयर्स से लेकर स्वास्थ्य बजट तक से अस्पतालों के लिए काफी कुछ किया गया।

जहाँ स्थिति बिगड़ी, वहाँ तुरंत कोविड केयर सेंटर्स बनाए गए। पीएम केयर्स से 50,000 नए वेंटिलेटर्स अस्पतालों को दिए गए। सोनू सूद और विराट कोहली की बड़ाई करते हुए इस लेख में केंद्र सरकार पर लोगों की मदद कर रहे विपक्षी नेताओं को धमकाने का आरोप भी लगाया गया है। इसके बाद ‘The Wire’ अपने सामान्य प्रोपेगंडा पर आ जाता है, जिसके तहत हिंदुत्व में ‘सेवा’ शब्द को ही बदनाम कर के रख दिया गया है।

‘The Wire’ के इस लेख में लिखा है कि प्रधानमंत्री केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनीतिक मुखौटे के रूप में काम कर रहे हैं ‘हिन्दू राष्ट्र’ के बड़े प्रोजेक्ट में वो एक बड़े खिलाड़ी हैं। फिर घटिया आरोप लगाया गया है कि RSS अपने बड़े उद्देश्य के लिए समाज में अपना प्रभाव बना कर रखना चाहता है और समाज में स्वीकार्यता के लिए ‘सेवा’ या समाजसेवा का इस्तेमाल कर रहा है। साथ ही लिखा है कि गाँधी जी ने भी ऐसा ही किया था (राजनीतिक मोबिलाइजेशन के लिए सेवा)।

अगर ‘द वायर’ मानता है कि RSS महात्मा गाँधी के रास्ते पर चल रहा है तब तो समस्या ही ख़त्म हो गई क्योंकि फिर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरी भाजपा गाँधीवादी है। अगर राजनीतिक जुटान के लिए गाँधी जी ने ‘सेवा’ का इस्तेमाल किया था, जैसा कि ‘The Wire’ का मानना है, तो फिर RSS ऐसा करे तो उसे दिक्कत क्यों? देश भर में लगातार सुदूर इलाकों तक जनसेवा कर रहे संगठन को बदनाम करने के लिए ये लेख लिखा गया है।

RSS स्वयंसेवकों ने अपनी जान दाँव पर लगा कर सेवा का जिम्मा संभाला हुआ है और कई जगह कोविड केयर सेंटर्स भी बनाए। देश भर के कई जिलों में RSS ने श्मशान से लेकर अस्पताल तक अपने लोगों को तैनात कर रखा है और वो लोगों की मदद कर रहे हैं। दूध, काढ़ा और हल्दी जैसी इम्युनिटी बढ़ाने वाली चीजों का वितरण हो रहा है। गरीबों को भोजन दिए जा रहे हैं। मरीजों को अस्पताल पहुँचाया जा रहा है।

इसी तरह ‘सेवा भारती’ ने कई आइसोलेशन सेंटर बनाए। जब पूरी दिल्ली अस्पताल बेड्स की कमी से जूझ रही थी, तब ‘सेवा भारती’ ने अशोक विहार, उदासीन आश्रम, नरेला, द्वारका, हरिनगर एवं लाजपत जिले की अमर कॉलोनी के अलावा 9 अन्य आइसोलेशन सेंटर बनाए और 500 से भी अधिक बेड्स की व्यवस्था खड़ी कर ली। सारी सेवाएँ निःशुल्क दी जाती हैं। ऑक्सीजन सिलिंडर्स तक की व्यवस्था की जा रही है।

देश के हर जिले में RSS और इसकी शाखा संगठन ‘सेवा भारती’ द्वारा किए जा रहे राहत-कार्यों के सैकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। क्या संगठन के हजारों लोग सिर्फ और सिर्फ ‘हिन्दू राष्ट्र’ के लिए ही काम कर रहे हैं? अगर पूरा देश ही हिन्दू राष्ट्र चाहता है, फिर तो ‘द वायर’ को इसे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। भारत विभाजन के दौरान पीड़ित हिंदुओं की सेवा को भी सांप्रदायिक बता दिया गया है। लिखा है कि ‘सेवा’ कर के RSS लोगों की नजरों में अच्छा बनना चाहती है।

अब आइए, देखते हैं कि देश भर में लोगों की सेवा करना जिस मीडिया संस्थान के लिए सांप्रदायिक है, मजहब बदल जाने के बाद किस तरह चींटी को चीनी खिलाना भी ‘प्यार’ हो जाता है। अगस्त 2020 में कोरोना की पहली लहर के वक़्त आए एक लेख में इसी ‘द वायर’ ने एक ‘मुस्लिम मददगार’ के हवाले से लिखा था कि वो ‘सेवा’ कर के अपनी मुस्लिम पहचान को प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि सब ‘एडम और ईव’ की संतान हैं।

उस लेख में कहीं भी RSS या ‘सेवा भारती‘ द्वारा किए जा रहे राहत-कार्यों का जिक्र नहीं था, लेकिन देश के कुछ इलाकों से छिटपुट खबरें उठाई गई थीं, जहाँ मदद करने वाले मुस्लिम हों। और हाँ, यहाँ ‘द वायर’ ने ऐसा नहीं कहा कि अगर मुस्लिम मदद करते हैं तो इसके पीछे कोई एजेंडा होता है। यहाँ केवल प्यार, सहिष्णुता और सांप्रदायिक एकता की बातें की गईं। लेकिन, हिंदू संगठन जब देश भर में समाजसेवा करते हैं, तब ये चीजें कैसे याद या जाती हैं?

अगर कोई संगठन हिंदू धर्म से जुड़ा है तो उसे तत्काल ‘सिविल सोसाइटी’ की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है। 2020 वाले लेख में ‘जमात ए इस्लामी हिन्द’ का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि ये संगठन देश भर में अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के जरिए समाजसेवा कर रहा है। क्या आपको पता है कि इसी संगठन ने 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों को सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को वोट करने को कहा था।

फिर इसे भाजपा विरोधी संगठन क्यों नहीं लिखा जाता या इसके राजनीतिक रुख की चर्चा न कर के इसे सामाजिक संगठन क्यों बताया जाता है? RSS ने तो कभी ऐसा कोई ‘फतवा’ नहीं जारी किया, लेकिन फिर भी उसे बदनाम किया जाता है। असल ‘में द वायर’ को दिक्कत इससे है कि केंद्र ने FCRA (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) में संशोधन किया, जिससे सैकड़ों NGO का बोरिया-बिस्तर बँध गया और मिशनरी व मजहबी गतिविधियों के लिए आने वाली विदेशी फंडिंग पर रोक लगी।

‘The Wire’ को असली खुजली इस बात की काट रही है कि जहाँ देश भर के मंदिरों ने पीएम केयर्स व राज्यों के राहत-कोष में दान के अलावा जिस तरह गरीबों के लिए काम किया है, इसके उलट जहाँ तबलीगी जमात वाले कोरोना के सुपर स्प्रेडर बने और कुछ मौलवियों ने तो मस्जिद द्वारा लॉकडाउन के पालन से ही इनकार कर दिया। अब हिन्दुओं की सेवा को बदनाम करना और मुस्लिम संगठनों की तरफदारी कर उनका महिमामंडन उसकी मजबूरी है।

विदेशी वैक्सीनों के आयात नियमों में ढील, DGCI ने कहा- WHO समेत वैश्विक संस्थाओं से अप्रूव्ड कंपनियों को ब्रिज ट्रायल से छूट

देश में वैक्सीन की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया गया है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DGCI) ने कहा है कि अगर किसी विदेशी वैक्सीन को डबल्यूएचओ या किसी अधिकृत स्वास्थ्य संस्था से आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली हुई है तो भारत में इन्हें लॉन्चिंग के बाद ब्रिज ट्रायल की आवश्यकता नहीं है।

01 जून 2021 को DGCI द्वारा नोटिस जारी किया गया जिसमें यह कहा गया कि यदि किसी वैक्सीन को जापान की PMDA, यूके की MHRA, यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी (EMA), अमेरिका की FDA और डबल्यूएचओ द्वारा आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली है तो उसे भारत में लॉन्चिंग के बाद ब्रिज ट्रायल की कोई आवश्यकता नहीं है। DGCI के द्वारा बताया गया है कि यह निर्णय देश में Covid-19 वैक्सीन प्रशासन के लिए गठित राष्ट्रीय एक्सपर्ट समूह (NEGVAC) की सलाह के आधार पर लिया गया है।

NEGVAC ने कहा था कि जिन वैक्सीनों को अमेरिका, यूरोप, जापान, ब्रिटेन और डबल्यूएचओ के द्वारा आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिल चुकी है वो पहले से ही करोड़ों लोगों को लगाई जा चुकी हैं। ऐसे में भारत में इनको अप्रूवल मिलने के बाद सेंट्रल ड्रग लैबोरेटरी में जाँच से छूट प्रदान की जानी चाहिए। मॉडर्ना और फाइजर उन कंपनियों में शामिल हैं जिन्होंने ऐसी छूट के लिए भारत सरकार से माँग की थी।

हालाँकि, DGCI के नोटिस में आगे कहा गया है कि बड़ी आबादी के लिए वैक्सीन के रोलआउट से पहले सात दिनों के लिए 100 लाभार्थियों पर सुरक्षा परिणामों का आकलन अभी भी जारी रहेगा।

यह निर्णय ऐसे समय आया है जब भारत सरकार पर यह आरोप लगता रहा कि सरकार विदेशों से वैक्सीन खरीदने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। इस पर सरकार ने सफाई देते हुए कहा था कि हर वैक्सीन कंपनी की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं और विदेशी वैक्सीन कंपनियों के द्वारा वैक्सीन की उपलब्धता पर जानकारी देने के बाद भारत सरकार वैक्सीन के आयात पर बात आगे बढ़ा रही है।

इसके अलावा केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार ने विदेशी वैक्सीनों को मंजूरी नहीं दी है। इस पर भी केंद्र सरकार ने कहा था कि जिन वैक्सीनों को वैश्विक स्तर पर आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली है उनके लिए नियमों में ढील दी गई है।

वैक्सीन दे नहीं सकते तो इतने जोर-शोर से क्यों शुरू किए सेंटर: केजरीवाल सरकार को दिल्ली HC से डोज

कोरोना वैक्सीन की कमी के मद्देनजर बुधवार (जून 2, 2021) को हाई कोर्ट ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि अगर दिल्ली सरकार लोगों को तय समय में भारत बॉयोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन की दोनों खुराकें मुहैया ही नहीं करवा सकती तो उसे इतने जोर-शोर से टीकाकरण केंद्र खोलने ही नहीं चाहिए थे। 

कोवैक्सीन के दूसरे डोज को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में दो याचिकाएँ दाखिल हुई थीं। एक वकील आशीष वीरमानी ने दायर की थी, जिन्हें 3 मई को कोवैक्सीन की पहली खुराक लगी। लेकिन वह 29 मई तक अगले शॉट के लिए बुकिंग नहीं करवा सके। अब चूँकि उन्हें 6 हफ्तों में अगली खुराक लेनी ही थी, इसलिए वह मेरठ से दूसरी खुराक लेकर आए।

कोर्ट में दायर इन याचिकाओं में माँग की गई थी कि जिन लोगों को कोवैक्सीन की पहली डोज लग चुकी है, उन्हें तय समय पर दूसरी डोज भी लगाई जाए। इन्हीं याचिका पर हाई कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रेखा पल्ली ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी करके उनसे जवाब माँगा। कोर्ट ने पूछा कि क्या वह कोवैक्सीन की पहली खुराक ले चुके लाभार्थियों को 6 हफ्ते की समय-सीमा खत्म होने से पहले दूसरी डोज मुहैया करवा देंगे। 

हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा कि क्या वह पहले डोज के बाद 6 हफ्तों के भीतर लोगों को दूसरी डोज दे सकते हैं? कोर्ट ने ये भी कहा, “अगर आप कोवैक्सीन की दूसरी डोज नहीं दे सकते तो फिर इतने धूमधाम से वैक्सीनेशन सेंटर क्यों शुरू किए?” 

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “यदि आप सुनिश्चित नहीं थे कि आप दूसरी खुराक भी दे सकते हैं तो आपने (दिल्ली सरकार) इसे (टीकाकरण) क्यों शुरू किया? आपको रुक जाना चाहिए था। महाराष्ट्र रुक गया जब उसे लगा कि वह दूसरी खुराक नहीं दे सकता। आपने हर जगह इतने धूमधाम से कितने टीकाकरण केंद्र खोले और अब आप कहते हैं कि आपको पता नहीं है कि दूसरी खुराक का स्टॉक कब उपलब्ध होगा।”

कोर्ट ने इस मामले में दायर दो याचिकाओं के संबंध में केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने केंद्र से कहा कि राजधानी दिल्ली में कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दूसरी खुराकें उपलब्ध कराई जाएँ।

बता दें कि दिल्ली में अब तक 54.09 लाख लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं। इनमें से 41.85 लाख को पहली और 12.24 लाख को दोनों डोज लग चुकी हैं। दिल्ली सरकार की बुलेटिन के मुताबिक, 1 जून की सुबह तक दिल्ली के पास कोविशील्ड के 3.98 लाख और कोवैक्सीन की 48,430 डोज बची हैं।

‘बहुत बड़ी रणनीति है’: ‘नेशनल हेराल्ड’ की कंसल्टिंग एडिटर ने बताया राहुल गाँधी ने पत्रकारों को क्यों किया अनफॉलो

राहुल गाँधी ने ट्विटर पर मंगलवार (जून 1, 2021) को कुल 63 लोगों को अनफॉलो किया। शुरू में लग रहा था कि उन्होंने सिर्फ 8 कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडाबाजों को अनफॉलो किया है लेकिन बाद में पता चला कि इन्हें अनफॉलो करने के साथ उन्होंने कुछ पत्रकारों और अपने प्रशंसकों को फॉलो किया था। राहुल गाँधी ने ‘पत्रकार’ संजुक्ता बासु को भी अनफॉलो किया।

इस उठा-पटक के बीच कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की कंसल्टिंग एडिटर संजुक्ता बासु ने इस मुद्दे पर अपनी पूरी चर्चा की और इस बारे में कई खुलासे किए। चर्चा के मुख्य बिंदु अब सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे हैं। इनके मुताबिक, संजुक्ता बासु ने राहुल गाँधी के इस फॉलो-अनफॉलो वाले क्रम को एक रणनीतिक कदम करार दिया।

राहुल गाँधी द्वारा अनफॉलो किए जाने के बाद संजुक्ता बासु को ये सब अपना अपमान नहीं लगता बल्कि वो इसे एक बहुत बड़ी रणनीति का हिस्सा मानती हैं।

वह कहती हैं, “बरखा, निधि राजदान, राजदीप सरदेसाई जैसे लोग, आप जानते हैं, जो तथाकथित उदारवादी, वाम-उदारवादी हैं और हर्ष मंदर, हंसराज मीणा जैसे कार्यकर्ता और मेरे और प्रतीक सिन्हा जैसे लोग। उन्होंने सबको अनफॉलो कर दिया है। मुझे भी। मेरे को लगता है ये एक बहुत बड़ी रणनीतिक चाल है, ये एक संदेश है कि चाहे आप वामपंथी मीडिया हों, दक्षिणपंथी मीडिया हों, ये मीडिया हों, वो मीडिया हों, कोई मतलब नहीं है। वह किसी मीडियाकर्मी को नहीं फॉलो कर रहे। वह कॉन्ग्रेस हैंडल्स को फॉलो कर रहे हैं और हर कॉन्ग्रेस नेता को फॉलो कर रहे हैं। इसके अलावा कॉन्ग्रेस की हर राज्य ईकाई को फॉलो कर रहे हैं। तो ये वो चीज है जिस पर वह ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।”

अब इस रिपोर्ट को लिखने के समय तक, कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अपने ट्विटर अकॉउंट से अर्थशास्त्री कौशिक बसु, वकील करुणा नंदी, पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी, शिक्षक अशोक स्वैन, जूनियर अभिनेत्री श्रुति सेठ, वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी, पत्रकार राघव बहल, वरिष्ठ विशेषज्ञ पी साईनाथ, जूनियर लेखक सोनिया फलेरियो, और ओला कैब्स के संस्थापक भाविश अग्रवाल सहित अन्य लोगों को फॉलो कर रहे थे। ऐसे में यदि संजुक्ता द्वारा दिया तथ्य सही है तो शायद हो सकता है कि इन लोगों ने कॉन्ग्रेस ज्वाइन कर ली हो।

एक फहाद नाम का ट्विटर यूजर इस मामले में अपनी राय रखते हुए कहता है कि वह राहुल के इस कदम को संरचनात्मक सुधार और परिवर्तनों की रणनीति के तौर पर देखता है। जिसे पढ़कर बासु फहाद की कही बात पर अपनी सहमति देती हैं।

एक अन्य वीडियो में आजतक के पत्रकार पाणिनि आनंद भी ये समझा रहे हैं कि इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी किसे फॉलो करते हैं या किसे नहीं, महत्वपूर्ण ये हैं कि वह अपने नाना जवाहरलाल नेहरू और संविधान के दिखाए नक्शे कदमों पर चले।

आनंद कहते हैं राहुल गाँधी यूपीए 2 के बाद से पूंजीवादी विरोधी रहे हैं और इसलिए उनसे सबसे पहले उद्योगपति नाराज हुए। मालूम हो कि ये आनंद वही पत्रकार हैं जिन्होंने मोदी विरोधी लेख न लिखने पर अपने एक सहयोगी को परेशान करके रख दिया था।

पाणिनी ने अपने सहयोगी से कथिततौर पर कहा था, “साले तुम कीड़े-मकोड़े हो। मुझको जो मन आएगा करूँगा। मैं गधों को बड़ी जिम्मेदारी दूँगा और उनका प्रमोशन करूँगा व अप्रेजल करूँगा, क्योंकि वो मेरी विचारधारा के लोग हैं। तेरी क्या औकात है। साले तुझको सड़क पर ला दूँगा और तेरे परिवार को बर्बाद कर दूँगा। अगर सुधरा नहीं, तो साले तुझको जूतों से मारूँगा और तेरी हत्या करवा दूँगा। तेरी लाश को कुत्ते खाएँगे। तुझको न मोदी बचाने आएगा और न बीजेपी।”

इसके बाद पंडित नेहरू द्वारा प्रदर्शित किए गए अभिव्यक्ति की आजादी और सहिष्णु परंपरा का अनुसरण करते हुए नेशनल हेराल्ड की कंसल्टिंग एडिटर ने अपनी बातचीत में एक गैर कॉन्ग्रेसी को बोलने का मौका दिया लेकिन कुछ देर बाद वह व्यक्ति पूरी चर्चा से बाहर हो गया क्योंकि वह ‘नेहरू के सेकुलर सिद्धांतों’ पर नहीं चल रहा था। बाद में चर्चा से निकाले गए व्यक्ति ने ट्विटर पर इसकी शिकायत भी की।

लेकिन संजुक्ता बासु ने इस शिकायत का रिप्लाई देते हुए ऐसे सवाल पूछने वाले सभी लोगों को बेवकूफ करार दे दिया।

बता दें कि इस चर्चा को कई भाजपा समर्थकों ने ज्वाइन किया था कि वह जान सकें बासु का क्या कहना है। लेकिन भाजपा समर्थक इससे जुड़ने के बाद सिर्फ हंसने वाले इमोजी भेजते रहे। कई लोगों ने बाद में माना भी कि वह संजुक्ता के ज्ञान से ‘प्रभावित’ थे जो राहुल गाँधी के कदम को इस तरह समझा रही थी कि राहुल गाँधी भी उसे स्वयं न बता पाएँ।

बासु ने बाद में ये भी कहा कि अनफॉलो करना उन लोगों को एक ऐसा संदेश है जो राहुल गाँधी से सवाल करते हैं लेकिन कभी भी उनकी गतिविधियों पर रिपोर्ट नहीं करते। एक ट्विटर यूजर @ruchhan ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “हम सुहाग रात के दौरान दूध के महत्व जैसे असंख्य विषयों को होस्ट कर रहे हैं, लेकिन राहुल गाँधी की रणनीति पर बासु मैडम की चर्चा एक आँख खोलने वाली है। उसी से प्रेरित होकर, जल्द ही हम इस पर चर्चा करेंगे कि अगर किसी को आईबीएस चाहिए तो क्या किसी को कब्ज या दस्त को प्राथमिकता देनी चाहिए।”

डॉ. सैयद फैजान अहमद, बीमारी इधर है-आप किधर हैं: बंगाल के बुजुर्ग डॉक्टर मुखोपाध्याय हों या असम के सेनापति, हमलावर वही हैं

जून 2019: कोलकाता के एक अस्पताल में मोहम्मद सईद की मौत के बाद उसके परिजनों ने डॉक्टरों पर हमला कर दिया।

दिसंबर 2019: गुजरात के एक निजी अस्पताल में रुखसार पठान नामक महिला की प्रसव के दौरान मौत हो गई। परिजनों ने एक डॉक्टर पर हमला कर दिया और उसे खींचते हुए अस्पताल से बाहर ले गए।

अप्रैल 2020: दिल्ली में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौटे दो भाई कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद हैदराबाद के एक अस्पताल में एडमिट हुए। एक की मौत हो गई। दूसरे भाई और परिजनों ने डॉक्टर और स्टाफ पर हमला कर दिया

जून 2021: असम के एक कोविड सेंटर में मरीज की मौत के बाद परिजनों ने हमला कर दिया। अस्पताल के भीतर घुस कर डॉक्टर सेजु कुमार सेनापति के कपड़े उतार कर उन्हें घसीट-घसीट कर पीटा गया। मोहम्मद कमरुद्दीन, मोहम्मद जैनलुद्दीन जैसे नाम वाले हमलावरों में महिला भी थी।

फेहरिस्त लंबी है जब डॉक्टरों को निशाना बनाने वाली भीड़ की एक खास पहचान थी। देश में आए दिन डॉक्टरों के साथ बदसलूकी की खबरें आती रहती हैं। लिहाजा, डॉक्टरों की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय है और ऐसे मामलों में उपद्रवियों से सख्ती से निपटने की जरूरत है। असम के मामले में इसी तरह की सक्रियता पुलिस ने दिखाई। खुद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटना पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश देते हुए कहा कि इस तरह के हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

लेकिन, यह सक्रियता उस जमात को तब खटकने लगी, जब हमलावरों के नाम सार्वजनिक किए गए, क्योंकि हमलावर एक खास मजहबी नाम वाले थे। ऐसे नाम को अपराधियों की सूची में शामिल देखकर ही इस जमात के रंग बदल जाते हैं। फिर अपराध गौण हो जाता है। अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश शुरू होती है या मामले को कोई और रंग देने की। अमूमन ऐसे मामलों में तीन स्तर पर काम होता है। पहला, यह कहना कि इसका मजहब से कोई लेना-देना नहीं है, जबकि यही वर्ग जब हिंदू आरोपित तथा पीड़ित दूसरे संप्रदाय से हो तो आपसी झगड़े में भी धर्म का एंगल लेकर आता है। दूसरा, मामले में एक हिंदू विलेन खोजने की कोशिश करो। तीसरा, यदि दोनों में से कोई मुमकिन न हो तो एक मजहबी हीरो की तलाश करो।

असम में जूनियर डॉक्टर की पिटाई के मामले में दूसरे विकल्प पर काम चल रहा है। मसलन, डॉक्टर सैयद फैजान अहमद के ट्वीट पर गौर करिए। ट्विटर बॉयो में खुद को कोरोना वॉरियर बताने वाले डॉक्टर साहब ने इस मामले में आईएमए और रामदेव के हालिया विवाद को घुसेड़ कर एक तरह से इसे हमले की वजह बताने की कोशिश की है।

ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं। दिलचस्प यह है कि सोशल मीडिया में यह प्रलाप कर रहे ज्यादातर डॉक्टरों की मजहबी पहचान भी वही है जो असम की घटना के गुनहगारों की है।

जाहिर है यह सब उस कोशिश के तहत होती है जिसका मकसद हर उस गुनाह को दबाना है जिसमें हिंदू या बीजेपी को शोषक और मजहबी लोगों को पीड़ित दिखाने का मौका नहीं हो। असम पुलिस और मुख्यमंत्री सरमा की सक्रियता ने इस मामले में बीजेपी को घेरने का मौका भी लिबरलों से छीन लिया था, जबकि हम सब जानते हैं कि कैसे असम से सटे बंगाल में हमले के बाद डॉक्टरों ने आवाज उठाई थी तो राज्य सरकार ने उन पर ही दबाव डाला था

यह यह भी बताता है कि इस जमात के लिए डॉक्टरों की सुरक्षा असल में कोई मसला नहीं है, जबकि यह पुरानी बीमारी है। जैस कि 136 साल पुराने ‘द जर्नल आफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) के 10 जून 1992 को प्रकाशित अंक ‘असॉल्ट अपॉन मेडिकल मेन’ में बकायदा कहा गया है, “कोई भी फिज़िशियन, कितना भी कर्मवीर या ध्यान से काम करने वाला क्यों न हो, यह नहीं बता सकता कि किस घड़ी या किस दिन उसके ऊपर अकारण हमला हो सकता है, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जा सकते हैं, ब्लैकमेल किया जा सकता है या फिर क्षतिपूर्ति का मुक़दमा किया जा सकता है।”

इन सालों में मेडिकल साइंस ने भले काफी तरक्की की है, पर यह खतरा आज भी कायम है। लेकिन, सरकारी और सामाजिक प्रयासों से इस खतरे का दायरा सीमित करना संभव है। यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हेल्थस नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (NIH/NLM) के जर्नल पबमेड सेंट्रल (PMC) की अगस्त 2018 की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में बीते 40 साल में इस खतरे का दायरा सीमित हुआ है। कोविड-19 संक्रमण के बीच मोदी सरकार ने भी डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर महामारी रोग (संशोधन) अधिनियम 2000, पारित किया था। इसमें मेडिकल कर्मचारियों और आशा कर्मचारियों की भी सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। हमलावरों को 6 महीने से 7 साल जेल की कड़ी सजा और 5 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसे गैर जमानती अपराध बनाया गया है।

पिछले साल संक्रमण के वक्त स्वास्थकर्मियों को देश के अलग-अलग हिस्सों में किस तरह निशाना बनाया गया था यह भी छिपा नहीं। ऐसे ज्यादातर मामले जमातियों से जुड़े थे। लेकिन, डॉक्टर सैयद जैसे लोग जब ऐसे गुनाहों पर मजहबी वजहों से पर्दा डालने की कोशिश करते हैं तो वह उस खतरे को और बढ़ा देते हैं जिसके शिकार कल डॉक्टर दत्ता हुए थे, आज डॉक्टर सेनापति हुए हैं और कल कोई और होगा।