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RSS का राहत कार्य ‘हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा’ और ‘मुस्लिम बाँट रहे प्यार’: ‘The Wire’ के लिए अब सेवा भी कम्युनल

अगर हिन्दू किसी की मदद करते हैं तो इसमें ‘The Wire’ को ‘ हिंदुत्व एजेंडा’ दिखता है और अगर कोई मुस्लिम संस्था भोजन के कुछ पैकेट्स बाँटती है तो ये ‘प्यार’ है। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान आए दो लेखों में ‘The Wire’ ने अपने प्रोपेगंडा का इस्तेमाल करते हुए ये जताने की कोशिश की है कि देश भर में RSS और सेवा भारती से लेकर अन्य हिन्दू संगठन/मंदिर मदद को आगे आ रहे हैं तो इसके पीछे उनका ‘हिंदुत्व एजेंडा’ है।

आइए, देखते हैं इन दोनों लेखों में कितना बड़ा अंतर है। जो ताज़ा लेख है, उसे रविवार (मई 30, 2021) को प्रकाशित किया गया था। इस लेख में दावा किया गया है कि सत्ताधारी लोग और उनके समर्थक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को बचाने में लगे हुए हैं, बजाए इसके कि लोगों की मदद की जाए। साथ ही इसमें केंद्र सरकार द्वारा मौत के आँकड़ों में गड़बड़ी का आरोप भी लगाया गया है। वही आरोप, जिसे राहुल गाँधी ने NYT के सहारे दोहराया था।

राहुल गाँधी ने अपनी वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही बात कही थी, लेकिन इस दौरान वो ये बात भूल गए थे कि संक्रमितों व मौतों के आँकड़े राज्य ही केंद्र को भेजते हैं, जिसके बाद उसे अपडेट किया जाता है। देश में कॉन्ग्रेस के शासन वाले राज्यों को वो ये नसीहत दें कि वो आँकड़े ठीक से भेजें और केंद्र को गुमराह न करें। लेकिन, ‘लाशों की राजनीति’ ये नहीं समझती है और वो जनता को बरगलाना जानती है।

आप अगर कॉन्ग्रेस का बताए जाने वाले टूलकिट को याद कीजिए तो इसमें भी इसका पूरा खाका था कि कैसे लाशों के सहारे मोदी सरकार को बदनाम करना है और विदेशी मीडिया में आ रही ऐसी ख़बरों को प्रमोट करना है, जलती चिताओं की तस्वीरें फैलानी हैं। केंद्र सरकार पर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद कर देने का आरोप लगाया गया है, जबकि पीएम केयर्स से लेकर स्वास्थ्य बजट तक से अस्पतालों के लिए काफी कुछ किया गया।

जहाँ स्थिति बिगड़ी, वहाँ तुरंत कोविड केयर सेंटर्स बनाए गए। पीएम केयर्स से 50,000 नए वेंटिलेटर्स अस्पतालों को दिए गए। सोनू सूद और विराट कोहली की बड़ाई करते हुए इस लेख में केंद्र सरकार पर लोगों की मदद कर रहे विपक्षी नेताओं को धमकाने का आरोप भी लगाया गया है। इसके बाद ‘The Wire’ अपने सामान्य प्रोपेगंडा पर आ जाता है, जिसके तहत हिंदुत्व में ‘सेवा’ शब्द को ही बदनाम कर के रख दिया गया है।

‘The Wire’ के इस लेख में लिखा है कि प्रधानमंत्री केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनीतिक मुखौटे के रूप में काम कर रहे हैं ‘हिन्दू राष्ट्र’ के बड़े प्रोजेक्ट में वो एक बड़े खिलाड़ी हैं। फिर घटिया आरोप लगाया गया है कि RSS अपने बड़े उद्देश्य के लिए समाज में अपना प्रभाव बना कर रखना चाहता है और समाज में स्वीकार्यता के लिए ‘सेवा’ या समाजसेवा का इस्तेमाल कर रहा है। साथ ही लिखा है कि गाँधी जी ने भी ऐसा ही किया था (राजनीतिक मोबिलाइजेशन के लिए सेवा)।

अगर ‘द वायर’ मानता है कि RSS महात्मा गाँधी के रास्ते पर चल रहा है तब तो समस्या ही ख़त्म हो गई क्योंकि फिर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूरी भाजपा गाँधीवादी है। अगर राजनीतिक जुटान के लिए गाँधी जी ने ‘सेवा’ का इस्तेमाल किया था, जैसा कि ‘The Wire’ का मानना है, तो फिर RSS ऐसा करे तो उसे दिक्कत क्यों? देश भर में लगातार सुदूर इलाकों तक जनसेवा कर रहे संगठन को बदनाम करने के लिए ये लेख लिखा गया है।

RSS स्वयंसेवकों ने अपनी जान दाँव पर लगा कर सेवा का जिम्मा संभाला हुआ है और कई जगह कोविड केयर सेंटर्स भी बनाए। देश भर के कई जिलों में RSS ने श्मशान से लेकर अस्पताल तक अपने लोगों को तैनात कर रखा है और वो लोगों की मदद कर रहे हैं। दूध, काढ़ा और हल्दी जैसी इम्युनिटी बढ़ाने वाली चीजों का वितरण हो रहा है। गरीबों को भोजन दिए जा रहे हैं। मरीजों को अस्पताल पहुँचाया जा रहा है।

इसी तरह ‘सेवा भारती’ ने कई आइसोलेशन सेंटर बनाए। जब पूरी दिल्ली अस्पताल बेड्स की कमी से जूझ रही थी, तब ‘सेवा भारती’ ने अशोक विहार, उदासीन आश्रम, नरेला, द्वारका, हरिनगर एवं लाजपत जिले की अमर कॉलोनी के अलावा 9 अन्य आइसोलेशन सेंटर बनाए और 500 से भी अधिक बेड्स की व्यवस्था खड़ी कर ली। सारी सेवाएँ निःशुल्क दी जाती हैं। ऑक्सीजन सिलिंडर्स तक की व्यवस्था की जा रही है।

देश के हर जिले में RSS और इसकी शाखा संगठन ‘सेवा भारती’ द्वारा किए जा रहे राहत-कार्यों के सैकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। क्या संगठन के हजारों लोग सिर्फ और सिर्फ ‘हिन्दू राष्ट्र’ के लिए ही काम कर रहे हैं? अगर पूरा देश ही हिन्दू राष्ट्र चाहता है, फिर तो ‘द वायर’ को इसे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। भारत विभाजन के दौरान पीड़ित हिंदुओं की सेवा को भी सांप्रदायिक बता दिया गया है। लिखा है कि ‘सेवा’ कर के RSS लोगों की नजरों में अच्छा बनना चाहती है।

अब आइए, देखते हैं कि देश भर में लोगों की सेवा करना जिस मीडिया संस्थान के लिए सांप्रदायिक है, मजहब बदल जाने के बाद किस तरह चींटी को चीनी खिलाना भी ‘प्यार’ हो जाता है। अगस्त 2020 में कोरोना की पहली लहर के वक़्त आए एक लेख में इसी ‘द वायर’ ने एक ‘मुस्लिम मददगार’ के हवाले से लिखा था कि वो ‘सेवा’ कर के अपनी मुस्लिम पहचान को प्रदर्शित कर रहा है, क्योंकि सब ‘एडम और ईव’ की संतान हैं।

उस लेख में कहीं भी RSS या ‘सेवा भारती‘ द्वारा किए जा रहे राहत-कार्यों का जिक्र नहीं था, लेकिन देश के कुछ इलाकों से छिटपुट खबरें उठाई गई थीं, जहाँ मदद करने वाले मुस्लिम हों। और हाँ, यहाँ ‘द वायर’ ने ऐसा नहीं कहा कि अगर मुस्लिम मदद करते हैं तो इसके पीछे कोई एजेंडा होता है। यहाँ केवल प्यार, सहिष्णुता और सांप्रदायिक एकता की बातें की गईं। लेकिन, हिंदू संगठन जब देश भर में समाजसेवा करते हैं, तब ये चीजें कैसे याद या जाती हैं?

अगर कोई संगठन हिंदू धर्म से जुड़ा है तो उसे तत्काल ‘सिविल सोसाइटी’ की श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है। 2020 वाले लेख में ‘जमात ए इस्लामी हिन्द’ का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि ये संगठन देश भर में अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के जरिए समाजसेवा कर रहा है। क्या आपको पता है कि इसी संगठन ने 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों को सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को वोट करने को कहा था।

फिर इसे भाजपा विरोधी संगठन क्यों नहीं लिखा जाता या इसके राजनीतिक रुख की चर्चा न कर के इसे सामाजिक संगठन क्यों बताया जाता है? RSS ने तो कभी ऐसा कोई ‘फतवा’ नहीं जारी किया, लेकिन फिर भी उसे बदनाम किया जाता है। असल ‘में द वायर’ को दिक्कत इससे है कि केंद्र ने FCRA (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) में संशोधन किया, जिससे सैकड़ों NGO का बोरिया-बिस्तर बँध गया और मिशनरी व मजहबी गतिविधियों के लिए आने वाली विदेशी फंडिंग पर रोक लगी।

‘The Wire’ को असली खुजली इस बात की काट रही है कि जहाँ देश भर के मंदिरों ने पीएम केयर्स व राज्यों के राहत-कोष में दान के अलावा जिस तरह गरीबों के लिए काम किया है, इसके उलट जहाँ तबलीगी जमात वाले कोरोना के सुपर स्प्रेडर बने और कुछ मौलवियों ने तो मस्जिद द्वारा लॉकडाउन के पालन से ही इनकार कर दिया। अब हिन्दुओं की सेवा को बदनाम करना और मुस्लिम संगठनों की तरफदारी कर उनका महिमामंडन उसकी मजबूरी है।

विदेशी वैक्सीनों के आयात नियमों में ढील, DGCI ने कहा- WHO समेत वैश्विक संस्थाओं से अप्रूव्ड कंपनियों को ब्रिज ट्रायल से छूट

देश में वैक्सीन की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए एक बड़ा निर्णय लिया गया है। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DGCI) ने कहा है कि अगर किसी विदेशी वैक्सीन को डबल्यूएचओ या किसी अधिकृत स्वास्थ्य संस्था से आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली हुई है तो भारत में इन्हें लॉन्चिंग के बाद ब्रिज ट्रायल की आवश्यकता नहीं है।

01 जून 2021 को DGCI द्वारा नोटिस जारी किया गया जिसमें यह कहा गया कि यदि किसी वैक्सीन को जापान की PMDA, यूके की MHRA, यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी (EMA), अमेरिका की FDA और डबल्यूएचओ द्वारा आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली है तो उसे भारत में लॉन्चिंग के बाद ब्रिज ट्रायल की कोई आवश्यकता नहीं है। DGCI के द्वारा बताया गया है कि यह निर्णय देश में Covid-19 वैक्सीन प्रशासन के लिए गठित राष्ट्रीय एक्सपर्ट समूह (NEGVAC) की सलाह के आधार पर लिया गया है।

NEGVAC ने कहा था कि जिन वैक्सीनों को अमेरिका, यूरोप, जापान, ब्रिटेन और डबल्यूएचओ के द्वारा आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिल चुकी है वो पहले से ही करोड़ों लोगों को लगाई जा चुकी हैं। ऐसे में भारत में इनको अप्रूवल मिलने के बाद सेंट्रल ड्रग लैबोरेटरी में जाँच से छूट प्रदान की जानी चाहिए। मॉडर्ना और फाइजर उन कंपनियों में शामिल हैं जिन्होंने ऐसी छूट के लिए भारत सरकार से माँग की थी।

हालाँकि, DGCI के नोटिस में आगे कहा गया है कि बड़ी आबादी के लिए वैक्सीन के रोलआउट से पहले सात दिनों के लिए 100 लाभार्थियों पर सुरक्षा परिणामों का आकलन अभी भी जारी रहेगा।

यह निर्णय ऐसे समय आया है जब भारत सरकार पर यह आरोप लगता रहा कि सरकार विदेशों से वैक्सीन खरीदने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। इस पर सरकार ने सफाई देते हुए कहा था कि हर वैक्सीन कंपनी की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं और विदेशी वैक्सीन कंपनियों के द्वारा वैक्सीन की उपलब्धता पर जानकारी देने के बाद भारत सरकार वैक्सीन के आयात पर बात आगे बढ़ा रही है।

इसके अलावा केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार ने विदेशी वैक्सीनों को मंजूरी नहीं दी है। इस पर भी केंद्र सरकार ने कहा था कि जिन वैक्सीनों को वैश्विक स्तर पर आपातकालीन उपयोग को मंजूरी मिली है उनके लिए नियमों में ढील दी गई है।

वैक्सीन दे नहीं सकते तो इतने जोर-शोर से क्यों शुरू किए सेंटर: केजरीवाल सरकार को दिल्ली HC से डोज

कोरोना वैक्सीन की कमी के मद्देनजर बुधवार (जून 2, 2021) को हाई कोर्ट ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि अगर दिल्ली सरकार लोगों को तय समय में भारत बॉयोटेक द्वारा निर्मित कोवैक्सीन की दोनों खुराकें मुहैया ही नहीं करवा सकती तो उसे इतने जोर-शोर से टीकाकरण केंद्र खोलने ही नहीं चाहिए थे। 

कोवैक्सीन के दूसरे डोज को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में दो याचिकाएँ दाखिल हुई थीं। एक वकील आशीष वीरमानी ने दायर की थी, जिन्हें 3 मई को कोवैक्सीन की पहली खुराक लगी। लेकिन वह 29 मई तक अगले शॉट के लिए बुकिंग नहीं करवा सके। अब चूँकि उन्हें 6 हफ्तों में अगली खुराक लेनी ही थी, इसलिए वह मेरठ से दूसरी खुराक लेकर आए।

कोर्ट में दायर इन याचिकाओं में माँग की गई थी कि जिन लोगों को कोवैक्सीन की पहली डोज लग चुकी है, उन्हें तय समय पर दूसरी डोज भी लगाई जाए। इन्हीं याचिका पर हाई कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रेखा पल्ली ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी करके उनसे जवाब माँगा। कोर्ट ने पूछा कि क्या वह कोवैक्सीन की पहली खुराक ले चुके लाभार्थियों को 6 हफ्ते की समय-सीमा खत्म होने से पहले दूसरी डोज मुहैया करवा देंगे। 

हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा कि क्या वह पहले डोज के बाद 6 हफ्तों के भीतर लोगों को दूसरी डोज दे सकते हैं? कोर्ट ने ये भी कहा, “अगर आप कोवैक्सीन की दूसरी डोज नहीं दे सकते तो फिर इतने धूमधाम से वैक्सीनेशन सेंटर क्यों शुरू किए?” 

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “यदि आप सुनिश्चित नहीं थे कि आप दूसरी खुराक भी दे सकते हैं तो आपने (दिल्ली सरकार) इसे (टीकाकरण) क्यों शुरू किया? आपको रुक जाना चाहिए था। महाराष्ट्र रुक गया जब उसे लगा कि वह दूसरी खुराक नहीं दे सकता। आपने हर जगह इतने धूमधाम से कितने टीकाकरण केंद्र खोले और अब आप कहते हैं कि आपको पता नहीं है कि दूसरी खुराक का स्टॉक कब उपलब्ध होगा।”

कोर्ट ने इस मामले में दायर दो याचिकाओं के संबंध में केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने केंद्र से कहा कि राजधानी दिल्ली में कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दूसरी खुराकें उपलब्ध कराई जाएँ।

बता दें कि दिल्ली में अब तक 54.09 लाख लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं। इनमें से 41.85 लाख को पहली और 12.24 लाख को दोनों डोज लग चुकी हैं। दिल्ली सरकार की बुलेटिन के मुताबिक, 1 जून की सुबह तक दिल्ली के पास कोविशील्ड के 3.98 लाख और कोवैक्सीन की 48,430 डोज बची हैं।

‘बहुत बड़ी रणनीति है’: ‘नेशनल हेराल्ड’ की कंसल्टिंग एडिटर ने बताया राहुल गाँधी ने पत्रकारों को क्यों किया अनफॉलो

राहुल गाँधी ने ट्विटर पर मंगलवार (जून 1, 2021) को कुल 63 लोगों को अनफॉलो किया। शुरू में लग रहा था कि उन्होंने सिर्फ 8 कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडाबाजों को अनफॉलो किया है लेकिन बाद में पता चला कि इन्हें अनफॉलो करने के साथ उन्होंने कुछ पत्रकारों और अपने प्रशंसकों को फॉलो किया था। राहुल गाँधी ने ‘पत्रकार’ संजुक्ता बासु को भी अनफॉलो किया।

इस उठा-पटक के बीच कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की कंसल्टिंग एडिटर संजुक्ता बासु ने इस मुद्दे पर अपनी पूरी चर्चा की और इस बारे में कई खुलासे किए। चर्चा के मुख्य बिंदु अब सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे हैं। इनके मुताबिक, संजुक्ता बासु ने राहुल गाँधी के इस फॉलो-अनफॉलो वाले क्रम को एक रणनीतिक कदम करार दिया।

राहुल गाँधी द्वारा अनफॉलो किए जाने के बाद संजुक्ता बासु को ये सब अपना अपमान नहीं लगता बल्कि वो इसे एक बहुत बड़ी रणनीति का हिस्सा मानती हैं।

वह कहती हैं, “बरखा, निधि राजदान, राजदीप सरदेसाई जैसे लोग, आप जानते हैं, जो तथाकथित उदारवादी, वाम-उदारवादी हैं और हर्ष मंदर, हंसराज मीणा जैसे कार्यकर्ता और मेरे और प्रतीक सिन्हा जैसे लोग। उन्होंने सबको अनफॉलो कर दिया है। मुझे भी। मेरे को लगता है ये एक बहुत बड़ी रणनीतिक चाल है, ये एक संदेश है कि चाहे आप वामपंथी मीडिया हों, दक्षिणपंथी मीडिया हों, ये मीडिया हों, वो मीडिया हों, कोई मतलब नहीं है। वह किसी मीडियाकर्मी को नहीं फॉलो कर रहे। वह कॉन्ग्रेस हैंडल्स को फॉलो कर रहे हैं और हर कॉन्ग्रेस नेता को फॉलो कर रहे हैं। इसके अलावा कॉन्ग्रेस की हर राज्य ईकाई को फॉलो कर रहे हैं। तो ये वो चीज है जिस पर वह ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।”

अब इस रिपोर्ट को लिखने के समय तक, कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अपने ट्विटर अकॉउंट से अर्थशास्त्री कौशिक बसु, वकील करुणा नंदी, पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी, शिक्षक अशोक स्वैन, जूनियर अभिनेत्री श्रुति सेठ, वरिष्ठ पत्रकार जावेद अंसारी, पत्रकार राघव बहल, वरिष्ठ विशेषज्ञ पी साईनाथ, जूनियर लेखक सोनिया फलेरियो, और ओला कैब्स के संस्थापक भाविश अग्रवाल सहित अन्य लोगों को फॉलो कर रहे थे। ऐसे में यदि संजुक्ता द्वारा दिया तथ्य सही है तो शायद हो सकता है कि इन लोगों ने कॉन्ग्रेस ज्वाइन कर ली हो।

एक फहाद नाम का ट्विटर यूजर इस मामले में अपनी राय रखते हुए कहता है कि वह राहुल के इस कदम को संरचनात्मक सुधार और परिवर्तनों की रणनीति के तौर पर देखता है। जिसे पढ़कर बासु फहाद की कही बात पर अपनी सहमति देती हैं।

एक अन्य वीडियो में आजतक के पत्रकार पाणिनि आनंद भी ये समझा रहे हैं कि इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गाँधी किसे फॉलो करते हैं या किसे नहीं, महत्वपूर्ण ये हैं कि वह अपने नाना जवाहरलाल नेहरू और संविधान के दिखाए नक्शे कदमों पर चले।

आनंद कहते हैं राहुल गाँधी यूपीए 2 के बाद से पूंजीवादी विरोधी रहे हैं और इसलिए उनसे सबसे पहले उद्योगपति नाराज हुए। मालूम हो कि ये आनंद वही पत्रकार हैं जिन्होंने मोदी विरोधी लेख न लिखने पर अपने एक सहयोगी को परेशान करके रख दिया था।

पाणिनी ने अपने सहयोगी से कथिततौर पर कहा था, “साले तुम कीड़े-मकोड़े हो। मुझको जो मन आएगा करूँगा। मैं गधों को बड़ी जिम्मेदारी दूँगा और उनका प्रमोशन करूँगा व अप्रेजल करूँगा, क्योंकि वो मेरी विचारधारा के लोग हैं। तेरी क्या औकात है। साले तुझको सड़क पर ला दूँगा और तेरे परिवार को बर्बाद कर दूँगा। अगर सुधरा नहीं, तो साले तुझको जूतों से मारूँगा और तेरी हत्या करवा दूँगा। तेरी लाश को कुत्ते खाएँगे। तुझको न मोदी बचाने आएगा और न बीजेपी।”

इसके बाद पंडित नेहरू द्वारा प्रदर्शित किए गए अभिव्यक्ति की आजादी और सहिष्णु परंपरा का अनुसरण करते हुए नेशनल हेराल्ड की कंसल्टिंग एडिटर ने अपनी बातचीत में एक गैर कॉन्ग्रेसी को बोलने का मौका दिया लेकिन कुछ देर बाद वह व्यक्ति पूरी चर्चा से बाहर हो गया क्योंकि वह ‘नेहरू के सेकुलर सिद्धांतों’ पर नहीं चल रहा था। बाद में चर्चा से निकाले गए व्यक्ति ने ट्विटर पर इसकी शिकायत भी की।

लेकिन संजुक्ता बासु ने इस शिकायत का रिप्लाई देते हुए ऐसे सवाल पूछने वाले सभी लोगों को बेवकूफ करार दे दिया।

बता दें कि इस चर्चा को कई भाजपा समर्थकों ने ज्वाइन किया था कि वह जान सकें बासु का क्या कहना है। लेकिन भाजपा समर्थक इससे जुड़ने के बाद सिर्फ हंसने वाले इमोजी भेजते रहे। कई लोगों ने बाद में माना भी कि वह संजुक्ता के ज्ञान से ‘प्रभावित’ थे जो राहुल गाँधी के कदम को इस तरह समझा रही थी कि राहुल गाँधी भी उसे स्वयं न बता पाएँ।

बासु ने बाद में ये भी कहा कि अनफॉलो करना उन लोगों को एक ऐसा संदेश है जो राहुल गाँधी से सवाल करते हैं लेकिन कभी भी उनकी गतिविधियों पर रिपोर्ट नहीं करते। एक ट्विटर यूजर @ruchhan ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा, “हम सुहाग रात के दौरान दूध के महत्व जैसे असंख्य विषयों को होस्ट कर रहे हैं, लेकिन राहुल गाँधी की रणनीति पर बासु मैडम की चर्चा एक आँख खोलने वाली है। उसी से प्रेरित होकर, जल्द ही हम इस पर चर्चा करेंगे कि अगर किसी को आईबीएस चाहिए तो क्या किसी को कब्ज या दस्त को प्राथमिकता देनी चाहिए।”

डॉ. सैयद फैजान अहमद, बीमारी इधर है-आप किधर हैं: बंगाल के बुजुर्ग डॉक्टर मुखोपाध्याय हों या असम के सेनापति, हमलावर वही हैं

जून 2019: कोलकाता के एक अस्पताल में मोहम्मद सईद की मौत के बाद उसके परिजनों ने डॉक्टरों पर हमला कर दिया।

दिसंबर 2019: गुजरात के एक निजी अस्पताल में रुखसार पठान नामक महिला की प्रसव के दौरान मौत हो गई। परिजनों ने एक डॉक्टर पर हमला कर दिया और उसे खींचते हुए अस्पताल से बाहर ले गए।

अप्रैल 2020: दिल्ली में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में हिस्सा लेकर लौटे दो भाई कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद हैदराबाद के एक अस्पताल में एडमिट हुए। एक की मौत हो गई। दूसरे भाई और परिजनों ने डॉक्टर और स्टाफ पर हमला कर दिया

जून 2021: असम के एक कोविड सेंटर में मरीज की मौत के बाद परिजनों ने हमला कर दिया। अस्पताल के भीतर घुस कर डॉक्टर सेजु कुमार सेनापति के कपड़े उतार कर उन्हें घसीट-घसीट कर पीटा गया। मोहम्मद कमरुद्दीन, मोहम्मद जैनलुद्दीन जैसे नाम वाले हमलावरों में महिला भी थी।

फेहरिस्त लंबी है जब डॉक्टरों को निशाना बनाने वाली भीड़ की एक खास पहचान थी। देश में आए दिन डॉक्टरों के साथ बदसलूकी की खबरें आती रहती हैं। लिहाजा, डॉक्टरों की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय है और ऐसे मामलों में उपद्रवियों से सख्ती से निपटने की जरूरत है। असम के मामले में इसी तरह की सक्रियता पुलिस ने दिखाई। खुद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटना पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश देते हुए कहा कि इस तरह के हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

लेकिन, यह सक्रियता उस जमात को तब खटकने लगी, जब हमलावरों के नाम सार्वजनिक किए गए, क्योंकि हमलावर एक खास मजहबी नाम वाले थे। ऐसे नाम को अपराधियों की सूची में शामिल देखकर ही इस जमात के रंग बदल जाते हैं। फिर अपराध गौण हो जाता है। अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश शुरू होती है या मामले को कोई और रंग देने की। अमूमन ऐसे मामलों में तीन स्तर पर काम होता है। पहला, यह कहना कि इसका मजहब से कोई लेना-देना नहीं है, जबकि यही वर्ग जब हिंदू आरोपित तथा पीड़ित दूसरे संप्रदाय से हो तो आपसी झगड़े में भी धर्म का एंगल लेकर आता है। दूसरा, मामले में एक हिंदू विलेन खोजने की कोशिश करो। तीसरा, यदि दोनों में से कोई मुमकिन न हो तो एक मजहबी हीरो की तलाश करो।

असम में जूनियर डॉक्टर की पिटाई के मामले में दूसरे विकल्प पर काम चल रहा है। मसलन, डॉक्टर सैयद फैजान अहमद के ट्वीट पर गौर करिए। ट्विटर बॉयो में खुद को कोरोना वॉरियर बताने वाले डॉक्टर साहब ने इस मामले में आईएमए और रामदेव के हालिया विवाद को घुसेड़ कर एक तरह से इसे हमले की वजह बताने की कोशिश की है।

ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं। दिलचस्प यह है कि सोशल मीडिया में यह प्रलाप कर रहे ज्यादातर डॉक्टरों की मजहबी पहचान भी वही है जो असम की घटना के गुनहगारों की है।

जाहिर है यह सब उस कोशिश के तहत होती है जिसका मकसद हर उस गुनाह को दबाना है जिसमें हिंदू या बीजेपी को शोषक और मजहबी लोगों को पीड़ित दिखाने का मौका नहीं हो। असम पुलिस और मुख्यमंत्री सरमा की सक्रियता ने इस मामले में बीजेपी को घेरने का मौका भी लिबरलों से छीन लिया था, जबकि हम सब जानते हैं कि कैसे असम से सटे बंगाल में हमले के बाद डॉक्टरों ने आवाज उठाई थी तो राज्य सरकार ने उन पर ही दबाव डाला था

यह यह भी बताता है कि इस जमात के लिए डॉक्टरों की सुरक्षा असल में कोई मसला नहीं है, जबकि यह पुरानी बीमारी है। जैस कि 136 साल पुराने ‘द जर्नल आफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) के 10 जून 1992 को प्रकाशित अंक ‘असॉल्ट अपॉन मेडिकल मेन’ में बकायदा कहा गया है, “कोई भी फिज़िशियन, कितना भी कर्मवीर या ध्यान से काम करने वाला क्यों न हो, यह नहीं बता सकता कि किस घड़ी या किस दिन उसके ऊपर अकारण हमला हो सकता है, दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जा सकते हैं, ब्लैकमेल किया जा सकता है या फिर क्षतिपूर्ति का मुक़दमा किया जा सकता है।”

इन सालों में मेडिकल साइंस ने भले काफी तरक्की की है, पर यह खतरा आज भी कायम है। लेकिन, सरकारी और सामाजिक प्रयासों से इस खतरे का दायरा सीमित करना संभव है। यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट्स आफ हेल्थस नेशनल लाइब्रेरी आफ मेडिसिन (NIH/NLM) के जर्नल पबमेड सेंट्रल (PMC) की अगस्त 2018 की रिपोर्ट बताती है कि पश्चिमी देशों में बीते 40 साल में इस खतरे का दायरा सीमित हुआ है। कोविड-19 संक्रमण के बीच मोदी सरकार ने भी डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर महामारी रोग (संशोधन) अधिनियम 2000, पारित किया था। इसमें मेडिकल कर्मचारियों और आशा कर्मचारियों की भी सुरक्षा का ध्यान रखा गया है। हमलावरों को 6 महीने से 7 साल जेल की कड़ी सजा और 5 लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इसे गैर जमानती अपराध बनाया गया है।

पिछले साल संक्रमण के वक्त स्वास्थकर्मियों को देश के अलग-अलग हिस्सों में किस तरह निशाना बनाया गया था यह भी छिपा नहीं। ऐसे ज्यादातर मामले जमातियों से जुड़े थे। लेकिन, डॉक्टर सैयद जैसे लोग जब ऐसे गुनाहों पर मजहबी वजहों से पर्दा डालने की कोशिश करते हैं तो वह उस खतरे को और बढ़ा देते हैं जिसके शिकार कल डॉक्टर दत्ता हुए थे, आज डॉक्टर सेनापति हुए हैं और कल कोई और होगा।

NDTV पत्रकार ने योगी सरकार का मजाक उड़ाने के लिए कसा ‘गोमूत्र’ का तंज, इस्लामी आतंकी करते रहे हैं ऐसी भाषा का इस्तेमाल

NDTV के पत्रकार सौरभ शुक्ला ने मंगलवार (1 जून 2021) को ट्विटर पर वैसी ही भाषा का इस्तेमाल किया जैसा आतंकी सगंठन जैश-ए-मुहम्मद के इस्लामी आतंकवादी अहमद डार करता रहा है। अहमद डार ने फरवरी 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर नृशंस हमला किया था, जिसमें सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। सोशल मीडिया पर बातचीत के दौरान शुक्ला ने उत्तर प्रदेश सरकार का मजाक उड़ाने और हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए गोमूत्र शब्द का इस्तेमाल किया।

वामपंथी पत्रकार रोहिणी सिंह के एक पोस्ट का जवाब देते वक्त शुक्ला ने गौमूत्र (गोमूत्र) का मजाक उड़ाया था। दरअसल, पत्रकार प्रशांत कुमार ने दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के पहले चरण की अनलॉकिंग के तहत शराब की होम डिलिवरी करने की अनुमति की जानकारी दी थी। रोहिणी सिंह ने इसी खबर को लेकर प्रशांत कुमार को बधाई दी थी, जिस पर शुक्ला ने जवाब दिया कि प्रशांत कुमार अब दिल्ली में नहीं रहते हैं वो गाजियाबाद में रहते हैं, जहाँ उन्हें शराब ऑर्डर करने पर गौमूत्र की होम डिलीवरी मिलेगी।

साभार: ट्विटर

इस ट्वीट के जवाब में शुक्ला ने लिखा, “अब वह गाजियाबाद में रहते हैं, और वहाँ दारू मँगाएंगे तो गोमूत्र की होम डिलिवरी मिलेगी।”

गौरतलब है कि गाजियाबाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आता है, जो कि उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र के अंदर आता है। ठीक उसी तरह से नोएडा भी एनसीआर में आता है, लेकिन यूपी सरकार के अधीन है, गुड़गाँव भी एनसीआर में आता है, लेकर यह हरियाणा सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

अपने ट्वीट के जरिए शुक्ला ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर मुखर रही योगी आदित्यनाथ की सरकार का मजाक उड़ाने की कोशिश की लेकिन इससे उनके अंदर का हिंदूफोबिया ही उजागर हुआ।

काफी लंबे अरसे से हिंदूफोबिया से ग्रस्त लोग हिंदुओं और उनकी मान्यताओं का मजाक उड़ाने के लिए गोमूत्र शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं। एनडीटीवी के पत्रकार शुक्ला ने हिंदुओं का अपमान करने और उनके खिलाफ हमलों को सही ठहराने के लिए गोमूत्र का शब्द का इस्तेमाल किया।

आतंकियों की भाषा है गोमूत्र

भारतीयों, विशेषकर हिंदुओं पर हमला करने से पहले इस्लामी आतंकवादी अक्सर गोमूत्र तंज का इस्तेमाल करते हैं। वर्ष 2019 में जम्मू कश्मीर के पुलवामा में पाकिस्तान समर्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी ने सीआरपीएफ के जवानों पर आत्मघाती हमला किया था, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए थे। उस कायरतापूर्ण हमले के बाद आतंकी ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें उसे यह कहते हुए सुना जा सकता था कि वह अल्लाह के नाम पर ‘गोमूत्र पीने वालों’ को दंडित करना और मारना चाहता है।

एक साल पहले ही (2018) जैश ए मोहम्मद में शामिल हुए आदिल अहमद डार उर्फ ​​वकास ने यह वीडियो बनाया था। वीडियो में उसने भारतीयों को ‘गाय का पेशाब पीने वाला’ बताया था।

2 अलग-अलग आँकड़ों से मोदी सरकार को घेर रहा था Lallantop, अब सोशल मीडिया पर हो रही छीछालेदर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 मई को यह घोषणा की कि जिन बच्चों ने कोरोना वायरस महामारी के दौरान अपने माता-पिता या अभिभावक को खो दिया है, उन्हें ‘पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन’ पहल के तहत सहयोग उपलब्ध कराया जाएगा।

इसके बाद मंगलवार (01 जून) को सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग (NCPCR) के द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे में बताया गया कि हाल ही में अस्तित्व में आए बाल स्वराज पोर्टल में महामारी से पीड़ित 9,346 बच्चों का डाटा अपलोड किया गया है। इनमें से 1,742 ऐसे बच्चे हैं जिनके माता-पिता अब जीवित नहीं हैं, 7,464 ऐसे बच्चे हैं जिनके एक ही अभिभावक बचे हैं और 140 ऐसे बच्चे हैं जिन्हें मार्च 2020 से 29 मई 2021 के बीच त्याग दिया गया है।   

हालाँकि लल्लनटॉप डिजिटल न्यूज पोर्टल ने सरकार पर आक्षेप लगाने के प्रयास में आँकड़ों में हेरफेर कर दिया। लल्लनटॉप ने केन्द्रीय मंत्री द्वारा 25 मई को किए गए ट्वीट को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया जिसमें कहा गया था, “भारत सरकार Covid-19 के कारण अपने माता-पिता को खोने वाले प्रत्येक बच्चे की सुरक्षा और सहायता के लिए प्रतिबद्ध है। 01 अप्रैल 2021 से लेकर आज (25 मई) दोपहर 2:00 बजे तक राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार ऐसे 577 बच्चे हैं जिनके अभिभावकों की मृत्यु Covid-19 के चलते हुई है।“  

हालाँकि स्मृति ईरानी ने अपने ट्वीट में ‘01 अप्रैल 2021 से’ लिखा था लेकिन लल्लनटॉप ने इसे ’01 अप्रैल 2021 तक’ में बदल दिया और दावा किया कि आँकड़े सही नहीं हैं। लल्लनटॉप की इस रिपोर्ट से यह साबित होता है कि केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अनाथ हुए बच्चों का आँकड़ा 577 दिया है जबकि NCPCR ने ऐसे बच्चों की संख्या 1700 बताई है।  

लल्लनटॉप की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

अपनी रिपोर्ट को सत्य सिद्ध करने के लिए लल्लनटॉप ने दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट को आधार बनाया जिसमें दैनिक भास्कर ने राजस्थान में Covid-19 के आँकड़ों में हो रही गड़बड़ी का खुलासा किया लेकिन इसका पूरा दोष केंद्र सरकार पर डालने का प्रयास किया।

NCPCR के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने भी लल्लनटॉप की रिपोर्ट को भ्रामक बताया और उस पर फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाया। कानूनगो ने बताया कि आयोग ने जो डाटा दिया है वह मार्च 2020 से 29 मई 2021 के बीच का है। हालाँकि, लल्लनटॉप ने अभी तक रिपोर्ट में कोई सुधार नहीं किया है।  

पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन :

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 मई 2021 को पीएम केयर फंड से बच्चों की मुफ़्त शिक्षा के अलावा कई योजनाओं का ऐलान किया था। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के मुताबिक, कोरोना महामारी में माता-पिता गँवाने वाले बच्चों की ‘पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन’ योजना के तहत मदद की जाएगी। इसके तहत अनाथ बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी और उनका स्वास्थ्य बीमा भी किया जाएगा।

ऐसे बच्चों को 18 साल की उम्र से मासिक भत्ता (स्टाइपेंड) और 23 साल की उम्र में पीएम केयर्स से 10 लाख रुपए का फंड मिलेगा। सरकार ऐसे बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा सुनिश्चित करेगी। बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए एजुकेशन लोन प्राप्त करने में सहायता की जाएगी और PM CARES लोन पर ब्याज का भुगतान सरकार करेगी। आयुष्मान भारत के तहत बच्चों को 18 साल तक 5 लाख रुपए का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिलेगा और प्रीमियम का भुगतान पीएम केयर्स द्वारा किया जाएगा।

‘गुंडा, नल्ला, डरपोक, भौंकने वाले कुत्ते, सू#र, चिरकुट..’: सलमान खान के नोटिस के बाद भड़के KRK, अब SRK को भी घसीटा

बॉलीवुड के फिल्म समीक्षक कमाल आर खान (KRK) और सलमान खान का विवाद कोर्ट में तो पहुँच ही चुका है, अब ट्विटर पर भी चालू हो गया है। KRK ने कहा कि भले ही कई लोग आज उनके विरोध में खड़े हैं, लेकिन वो नहीं झुकेंगे। KRK के खिलाफ अब गायक मीका सिंह और पूर्व बिग बॉस कंटेस्टेंट अली गोनी ने भी मोर्चा खोल रखा है। KRK ने कहा कि उनके खिलाफ बोलने वालों में से अधिकतर को वो जानते तक नहीं।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “अगर मैं हर भौंकने वाले कुत्ते को रिप्लाई करूँगा तो तो फिर सिर्फ यही करता रहूँगा। चूँकि हर ‘नल्ला’ को पब्लिसिटी चाहिए, कुछ मीडिया वाले इतने बेचैन हैं कि वो किसी भी ‘सूअर’ का इंटरव्यू लेने को बेताब रहते हैं। ऐसे लोग, जो ‘ब्रांड KRK’ के खिलाफ बोलना चाहते हों।” उन्होंने सलमान खान के लिए लिखा, “तू कैसा बॉलीवुड का ‘गुंडा’ है भाई जो एक भी बॉलीवुड वाला तेरे समर्थन में नहीं आया?”

KRK ने आगे लिखा, “तुझे इन चिरकुट बिग बॉस के ‘नल्लों’ को अपने समर्थन में लाना पड़ा। क्या इज्जत है तेरी बॉलीवुड में यार? तुम असल में 2 रुपए के आदमी हो।” KRK ने दावा किया है कि सलमान खान की तरफ से उन्हें 90 लाख रुपए के मानहानि का नोटिस भेजा गया है, जिसमें लिखा है कि उनकी समीक्षा से ‘राधे’ फिल्म को नुकसान हुआ है। उन्होंने सलमान खान को विवेक ओबेरॉय, ऐश्वर्या राय, अरिजीत सिंह, जॉन अब्राहम और दिवंगत सुशांत सिंह राजपूत से भी माफ़ी माँगने की सलाह दी।

KRK ने जहाँ सलमान खान को ‘डरपोक’ बताया, वहीं खुद को ‘अर्जुन’ करार दिया। उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ बोलने के लिए ‘फ्लॉप सिंगर, स्ट्रगलिंग मॉडल और बिग बॉस वालों’ को बुलाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि सलमान खान चाहते हैं कि कोर्ट ये आदेश दे कि वो उनकी अगली किसी फिल्म की समीक्षा न करे। कमाल आर खान ने इसे अपना ‘खौफ’ करार दिया। उन्होंने ऋचा चड्ढा पर भी निशाना साधा।

हाल ही में KRK ने अपने घर में चोरी का इल्जाम लगाते हुए एक तथाकथित चोर का CCTV फुटेज भी जारी किया। उन्होंने आरोप लगाया कि ये चोर ताला तोड़ कर उनके घर में घुस गया। साथ ही मुंबई पुलिस को टैग कर के उसे पकड़ने की भी अपील की। उन्होंने आरोप लगाया कि उक्त ‘चोर’ ने सेफ को खोल कर कैश उड़ा लिए। सेफ गोदरेज कम्पनी का था, इसीलिए उन्होंने इस कम्पनी को भी निशाना बनाया।

KRK ने लगातार कई ट्वीट्स शेयर कर विरोधियों को भला-बुरा कहा

वहीं उन्होंने शाहरुख़ खान को भी टैग करते हुए लिखा, “मान लीजिए, मैंने कहा कि शाहरुख खान फ्रॉड हैं और वे चैरिटी नहीं कर रहे हैं, बल्कि लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। वे बुड्ढे दिखते हैं। वे खराब आदमी है। वे मेरे इस फर्जी बयान से परेशान क्यों होंगे, जबकि कोई मेरी सुनता ही नहीं या मुझपर भरोसा ही नहीं करता।” उन्होंने कहा कि अगर शाहरुख़ उन पर इसके लिए केस करते हैं तो इसका अर्थ है कि लोग उनकी बातें सुनते हैं, SRK गलत हैं और 24 घंटे मेरे बारे में सोच रहे हैं।

हाल ही में मीका सिंह ने लिखा था, “ये सिर्फ बॉलीवुड के सभ्य, मशहूर और सॉफ्ट लोगों के साथ पंगा लेता है मगर बाप से नहीं लेगा। प्लीज मेरे बेटे को बोलो मुझे अनब्लॉकर करे प्लीज। मैं करण जौहर या अनुराग कश्यप नहीं हूँ, मैं इसका पापा हूँ। अगर मेरे बारे में कभी भी कुछ भी गलत बोलेगा तो केस-वेस तो नहीं होगा, सीधा झापड़ होगा।”” इससे पहले मीका सिंह ने केआरके को ‘गधा’ और ‘डरा हुआ चूहा’ बताया था।

‘मदरसा शिक्षकों को क्यों दी जा रही है पेंशन’: केरल हाई कोर्ट ने पिनराई विजयन सरकार से पूछा

केरल हाई कोर्ट ने पिनराई विजयन की अगुवाई वाली लेफ्ट सरकार से पूछा है कि वह मदरसा शिक्षकों को पेंशन देते हुए एक धार्मिक गतिविधि का वित्तपोषण क्यों कर रही है। हाई कोर्ट ने ये टिप्पणी मंगलवार (1 जून) को राज्य में मदरसा शिक्षकों को पेंशन प्रदान करने के सरकार के पहले के फैसले के खिलाफ एक याचिका पर विचार करते हुए पूछा। इसके साथ ही अदालत ने राज्य से यह स्पष्ट करने को कहा कि उसने केरल मदरसा शिक्षक कल्याण कोष में किसी प्रकार का कोई योगदान दिया है या नहीं?

उच्च न्यायालय के जस्टिस ए मोहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ की खंडपीठ ने लोकतंत्र, समानता, शाँति और धर्मनिरपेक्षता के लिए नागरिक संगठन के सचिव मनोज की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश जारी किया। इसमें केरल मदरसा शिक्षक कल्याण कोष अधिनियम, 2019 को रद्द करने की माँग की गई है। राज्य सरकार ने इस अधिनियम को मदरसा शिक्षकों को पेंशन समेत दूसरे लाभ देने के लिए पारित किया था।

‘मदरसों को फंडिंग धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ’

याचिकाकर्ता के वकील सी राजेंद्रन ने हाई कोर्ट में बताया कि उस अधिनियम को पढ़ने के बाद ये स्पष्ट हो गया है कि ये मदरसे केवल कुरान और इस्लाम से जुड़ी पाठ्यपुस्तकों से जुड़ी शिक्षाएँ देते हैं। ऐसे में इसके लिए भारी मात्रा में फंडिग करना पूरी तरह से असंवैधानिक और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

पीठ ने कहा कि यह देखा जा रहा है कि केरल में जो मदरसे चल रहे हैं, वे उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में चलाए जा रहे मदरसों से अलग हैं जो कि धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ धार्मिक शिक्षा भी देते रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “केरल में ये मदरसे विशुद्ध रूप से एक धार्मिक गतिविधि में शामिल हैं। एक धार्मिक गतिविधि के लिए राज्य द्वारा धन का सहयोग करने का क्या कारण है?”

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि राज्य सरकार मदरसों की इस योजना के लिए पैसा दे रही है। यह कल्याण कोष मुख्य रूप से एक सदस्य को एक निश्चित राशि और पेंशन के भुगतान के लिए है, जिसने अपने 60 साल की आयुसीमा पूरी कर ली हो। इसके अलावा कम से कम पाँच साल के लिए मदरसे में अपना योगदान दिया हो।

‘भाजपा ने किया शरीयत से खिलवाड़, इसलिए देश में आए तूफान और कोरोना महामारी’: SP सांसद एसटी हसन

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी (सपा) सांसद डॉक्टर एसटी हसन ने विवादित और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया। उन्होंने कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान हुई मौतों और पिछले दिनों देश में आए दो चक्रवातों के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है और कहा है कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि भाजपा सरकार ने शरीयत में दखल दी है।

सपा सांसद डॉ. एसटी हसन ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले 7 सालों में भाजपा की सरकार द्वारा ऐसे कानून बनाए गए जिनके द्वारा शरीयत के साथ खिलवाड़ किया गया। नागरिकता कानून बना दिया गया जिसके अनुसार सिर्फ मुस्लिमों को नागरिकता नहीं मिलेगी। ऐसे कानूनों के द्वारा जो नाइंसाफी हुई है उसके कारण देश में हाल ही में दो तूफान आ चुके हैं। कोरोना के रूप में आसमानी आफत भी आई हुई है। कई लोग इस आसमानी आफत के शिकार हुए हैं।

डॉ. हसन ने कहा कि सीएए और एनआरसी के जरिए देश के मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है। सरकार धार्मिक भेदभाव पैदा करने वाले कानून बना रही है। हसन ने कहा कि जब जमीन वाला इंसाफ नहीं करता है तो आसमान वाला इंसाफ करता है और जब आसमान वाला इंसाफ करता है तो कोई इफ या बट नहीं होता।

हसन ने यह भी कहा कि सरकार में गरीबों का कोई हक नहीं है। सरकार पर जो भी हक है सब बड़े और अमीर लोगों का है। आगे सरकार पर हमला करते हुए सपा सांसद हसन ने कहा कि जिस तरह की सरकार और उसके नुमाइंदे हैं, उन्हें यह अंदेशा है कि आगे आने वाले समय में और भी आफत आने वाली हैं।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब सपा सांसद एसटी हसन ने कोई विवादित बयान दिया हो। अयोध्या में श्री राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे लोगों पर बयान देते हुए एसटी हसन ने कहा था कि भाजपा खुद ही चंदा माँगने के लिए निकले लोगों पर बिके हुए मुस्लिमों से पथराव करवा सकती है।

इसके पहले भी सपा सांसद हसन ने लोकसभा में तीन तलाक पर रोक से जुड़े बिल पर चर्चा के दौरान एक अनर्गल बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि बीवी को गोली मारने या जला कर मार डालने से बेहतर है कि उसे तीन तलाक दे दिया जाए। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से सपा सांसद हसन पहले भी हीरोइनों को ‘तवायफ’ बताने को लेकर चर्चा में रह चुके हैं।