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बेंगलुरु रेप वायरल वीडियो मामला: भाग रहा था 2 बांग्लादेशी, पुलिस ने टाँग में गोली मार कर दबोच लिया

बेंगलुरु में 22 साल की महिला के साथ दुष्कर्म करने वाले 5 आरोपितों में से 2 पर पुलिस को गोली चलानी पड़ी। कथित तौर पर शुक्रवार (28 मई) को दोनों ने पुलिस पर हमला बोलकर भागने की कोशिश की। दोनों को पकड़ने में पुलिस को उन पर फायरिंग करनी पड़ी।

जानकारी के अनुसार, पुलिस 28 मई की सुबह 5 बजे सभी आरोपितों को दोबारा क्राइम सीन पर लेकर गई थी। इसी दौरान दो आरोपितों रिदॉय बाबू (25) और सागर (23) ने फरार होने का प्रयास किया। कोई अन्य विकल्प न होने के कारण पुलिस को उन पर गोली चलानी पड़ी। घायल होने के कारण दोनों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।

बता दें कि सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ लोग एक महिला को प्रताड़ित करते हुए उसका गैंगरेप करते दिख रहे थे। कहा जा रहा था कि पीड़िता नॉर्थ-ईस्ट की है, लेकिन बेंगलुरु पुलिस ने बताया है कि वो बांग्लादेशी है। उसकी ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) कर के उसे भारत लाया गया था। पुलिस ने इस मामले में 6 आरोपितों को चिह्नित कर के उनमें से 5 को गिरफ्तार करने में सफलता पाई।

बेंगलुरु सिटी के पुलिस कमिश्नर कमल कांत ने बताया कि शुरुआती जाँच के बाद बलात्कार और प्रताड़ना का मामला दर्ज कर लिया गया। पीड़िता को खोजने के लिए पुलिस की एक अलग टीम बनाई गई है। अब तक मिली सूचनाओं के अनुसार, सभी आरोपित बांग्लादेशी माने जा रहे हैं और पुलिस ने आशंका जताई है कि ये किसी गैंग का हिस्सा हैं।

राँची में बीच से टूट गया 13 करोड़ में बना नया पुल: प्रशासन चुप, इसी ठेकेदार का बनाया एक और पुल ढहा था

झारखंड की राजधानी राँची में काँची नदी पर बना एक नवनिर्मित पुल ढह गया। 13 करोड़ की लागत से बना हाराडीह-बुढ़ाडीह पुल गुरुवार सुबह करीब 4:30 बजे ढह गया। यह पुल राँची के तमाड़, बुंडू और सोनाहातु को जोड़ता था। स्थानीय लोगों ने इसके लिए लगातार अवैध बालू खनन और प्रशासनिक ढिलाई का आरोप लगाया है।

इस पुल के दो अन्य पिलर भी कमजोर हैं और स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल की तत्काल मरम्मत की जरूरत है, नहीं तो पूरा ढाँचा ढह सकता है। अवैध बालू खनन की वजह से झारखंड में ढहा ये तीसरा पुल है।

ये घटना राँची के तामार इलाके में हुई। चक्रवात Yaas की वजह से चली तेज हवाओं और उसके बाद हुई तेज बारिश के कारण कमजोर संरचना ढह गई।

स्थानीय लोगों का कहना है कि 600 मीटर लँबे इस पुल के निर्माण में बहुत अनियमितताएँ बरती गईं और मजबूती का ध्यान रखे बिना ही दलदल में ही पुल के पिलरों को खड़ा कर दिया गया। कमजोर नींव होने की वजह से Yaas तूफान के सामने ये पुल टिक नहीं सका और बीच से टूट गया। पुल टूटने से दोनों ओर के ग्रामीण फँस कर रह गए हैं।

‘अवैध बालू खनन रोकने के लिए प्रशासन ने नहीं की कार्रवाई’

स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल के आसपास नदीं से काफी ज्यादा अवैध बालू खनन होता है। बालू तस्कर नदी पुल के आसपास जेसीबी के जरिए बालू खनन करते हैं और यही पुल के टूटने की प्रमुख वजह है। गाँव वालों का आरोप है कि अवैध खनन को रोकने के लिए प्रशासन की तरफ से अब तक कोई भी कार्रवाई नहीं की गई है। ग्रामीणों ने बताया कि इस पुल का ढंग से उद्घाटन तक नहीं हुआ।

स्थानीय लोगों का कहना है कि स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पुल को राँची के उसी ठेकेदार रंजन सिंह ने बनाया है जिनका इस पुल से थोड़ी ही दूर काँची नदीं पर बनाया एक और पुल दो साल पहले टूट चुका है।

पुल टूटने की खबर सुनकर घटनास्थल पर पहुँचे विधायक विकास मुंडा ने भी माँग की है कि इससे पहले भी एक और बड़ा पुल गिरा था और दोनों की कंस्ट्रक्शन कंपनी एक ही है, इसलिए मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराके दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन इस मामले पर कुछ भी बोलने से बच रहा है। 

झारखंड में भी साइक्लोन Yaas का कहर

पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तबाही मचाने के बाद Yaas तूफान ने झारखंड में भी कहर ढाया है। चक्रवात यास की वजह से हो रही लगातार बारिश के कारण घर गिरने से राँची में दो लोगों की मौत हो गई।

झारखंड में कम से कम 5,000 लोगों को पूर्वी सिंघभूमि में खतरे के निशान से ऊपर बहने वाली नदियों के पास के निचले इलाकों से निकाला गया, साथ ही 15,000 अन्य लोगों को भी सुरक्षित आश्रयों में स्थानांतरित किया गया है।

चक्रवात Yaas और इसके कारण हुई मूसलाधार बारिश से राज्य के लगभग आठ लाख लोग प्रभावित हुए हैं।

केंद्र नहीं, राज्य जुटाते हैं कोरोना के आँकड़े: PM मोदी पर दोष मढ़ने से पहले पंजाब और राजस्थान में झाँकें राहुल

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भारत सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर के लिए सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं, उन्हें कोविड की समझ नहीं है। उन्होंने कोरोना के आँकड़ों में हेराफेरी का आरोप भी केंद्र सरकार पर ही मढ़ा। वायनाड के सांसद ने कहा कि पीएम मोदी ने दरवाजा खुला छोड़ दिया, जिसे अब तक बंद नहीं किया गया है।

राहुल गाँधी ने 1 दिन पहले भी NYT की भ्रामक खबर शेयर कर के दावा किया था कि भारत में कोरोना से सरकारी आँकड़ों के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई है। शुक्रवार (मई 28, 2021) को किए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी उन्होंने आँकड़ों की हेराफेरी की बात की। साथ ही कहा कि कोरोना की पहली लहर के समय किसी को कुछ समझ नहीं आया था, लेकिन दूसरी लहर के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं।

यहाँ राहुल गाँधी को सबसे पहली बात ये याद दिलानी ज़रूरी है कि भारत में अब तक कोरोना का डेटा केंद्र सरकार नहीं, बल्कि राज्य सरकारें जुटाती हैं। अगर वो कोरोना के आँकड़ों में हेराफेरी की बातें कर रहे हैं तो क्या वो ये कहना चाहते हैं कि भाजपा शासित राज्यों में कोरोना के आँकड़ों की हेराफेरी हुई है और कॉन्ग्रेस शासित राज्य पाक साफ़ हैं? लाशों पर राजनीति की बजाए उन्हें वास्तविकता पर ध्यान देना चाहिए।

सबसे पहली बात तो ये है कि कोरोना के कारण होने वाली मौतों के आँकड़ों में गड़बड़ी का आरोप राजस्थान सरकार पर लगा है। ‘दैनिक भास्कर’ ने अपनी ग्राउंड तहकीकात में पाया था कि 1 अप्रैल से लेकर 20 मई के बीच 25 ग्रामीण जिलों में सरकारी आँकड़ों के हिसाब से 3918 मौतें हुई हैं, जबकि वहाँ के 512 गाँव-प्रखंडों में इस अवधि में 14,482 लोगों के अंतिम संस्कार हुए। आँकड़ों की इस हेराफेरी पर क्या वो ‘जादूगर’ अशोक गहलोत को क्लीन चिट देंगे?

अब आते हैं मौत के आँकड़ों पर। महाराष्ट्र में शिवसेना-NCP-कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है और वहाँ कोरोना से अब तक 92,225 मौतें हुई हैं। इसकी एक तिहाई मौतें भी किसी अन्य राज्य में नहीं हुई। वहाँ अब तक 56,72,180 लोग कोरोना संक्रमित हुए हैं। इसके आधे लोग भी किसी अन्य राज्य में संक्रमित नहीं हुए। आइए, कॉन्ग्रेस और भाजपा शासित राज्यों में कोरोना संक्रमितों की मृत्यु दर देखते हैं:

राज्य मृत्यु दर (%)सरकार
महाराष्ट्र 1.62 कॉन्ग्रेस-NCP-शिवसेना
पंजाब 2.51 कॉन्ग्रेस
छत्तीसगढ़1.33 कॉन्ग्रेस
झारखंड1.47 कॉन्ग्रेस-झामुमो
राजस्थान0.87 कॉन्ग्रेस
उत्तर प्रदेश 1.18 भाजपा
गुजरात1.21 भाजपा
कर्नाटक 1.08भाजपा
मध्य प्रदेश1.01 भाजपा
हरियाणा1.05भाजपा
10 राज्यों में कोरोना संक्रमितों का मृत्यु दर

अगर आप ऊपर के आँकड़े देखेंगे तो पाएँगे कि 5 में से 4 कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में भाजपा शासित राज्यों के मुकाबले मृत्यु दर ज्यादा है। पंजाब में तो मृत्यु दर 2.51% है, देश में सर्वाधिक। इन 5 बड़े भाजपा शासित राज्यों की मृत्यु दर उसकी आधी से भी कम है। बाकियों के बीच ज्यादा अंतर नहीं है। कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में राजस्थान की मृत्यु दर काफी कम है, लेकिन उसकी असलियत हम ऊपर देख चुके हैं। अब सवाल ये उठता है कि झूठ कौन बोल रहा है?

अब राहुल गाँधी सरकारों के आधार पर ये तय करेंगे कि फलाँ राज्य में फलाँ पार्टी का शासन है तो वो वहाँ के आँकड़े सच्चाई की प्रतिमूर्ति है, जबकि अगर किसी राज्य में भाजपा की सत्ता है तो उसकी हर एक बात झूठ है? राहुल गाँधी पंजाब और महाराष्ट्र में अपनी सरकारों से क्यों नहीं पूछते कि वहाँ कोरोना से ज्यादा मौतें क्यों हो रही हैं? केंद्र सरकार को कोसने की बजाए जहाँ उनकी सरकार है, अपनी ‘महत्वपूर्ण’ राय वहाँ दें, क्योंकि स्थिति खराब है।

इसे यूँ भी समझिए। अगर कॉन्ग्रेस शासित राज्य ही केवल सच बोल रहे होते तो भाजपा शासित राज्यों के मुकाबले उनके आँकड़ों में बड़ा अंतर होता, लेकिन ऐसा नहीं है। अगर ये राज्य झूठ बोल रहे हैं तो राहुल गाँधी को केंद्र की बजाए इनकी क्लास लेनी चाहिए और पूछना चाहिए कि वो गलत आँकड़े देकर केंद्र को बरगला क्यों रहे हैं? अगर भाजपा शासित राज्य झूठे होते तो अन्य राज्यों के मुकाबले उनके आँकड़ों में बड़ा अंतर होता, जबकि ऐसा नहीं है।

राहुल गाँधी कह रहे हैं कि कोरोना के कारण होने वाली मौतों के आँकड़ों में ‘बड़ा अंतर’ है। अधिकतर भाजपा और कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में मृत्यु दर (ऊपर के 10 में 8 राज्यों में) 1-2% के बीच में ही घूम रही है, ऐसी में ये बड़ा अंतर कहाँ से आ गया? अगर झूठे हैं तब तो भारत के सारे राज्यों की सरकारें झूठी हुईं? और हाँ, अगर कॉन्ग्रेस सरकारें सच बोल रही हैं तो मृत्यु दर में जमीन-आसमान का अंतर होना चाहिए था अलग-अलग राज्यों में।

हमने ऊपर तालिका में देखा कि ऐसा कुछ भी नहीं है। केंद्र सरकार अगर मौतों के आँकड़े जुटाती तो भला उसका दोष हो सकता था, लेकिन राज्य सरकारों के कार्य को लेकर केंद्र को दोष देना कहाँ तक उचित है? विदेशी मीडिया NYT सत्यवादी हो गया और राजस्थान की ग्राउंड रिपोर्ट झूठी हो गई? राहुल गाँधी अपनी सरकारों के आँकड़ों और भाजपा सरकारों के आँकड़े का मिलान करें, उन्हें पता चलेगा कि उनके सारे आरोपों की जड़ ही टूटी हुई है।

ट्विटर पर रूस की अदालत ने लगाया जुर्माना, चाइल्ड पोर्नोग्राफी सहित अन्य प्रतिबंधित कंटेंट नहीं हटाने को लेकर कार्रवाई

रूस और माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस बीच रूस की एक अदालत ने गुरुवार (27 मई 2021) को ट्विटर पर 19 मिलियन रूबल (लगभग 259,000 डॉलर) का जुर्माना लगाया। भारतीय मुद्रा में यह करीब 1.87 करोड़ रुपया होता है। प्रतिबंधित सामग्री नहीं हटाने को लेकर ट्विटर पर यह कार्रवाई की गई है।

ट्विटर पर आरोप है कि उसने रूस में विरोध बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। रूस के सरकारी संचार निगरानीकर्ता रोस्कोम्नादजोर (Ruskomnadzor) ने मार्च में आरोप लगाया था कि ट्विटर बच्चों को आत्महत्या करने के लिए उकसाने वाली सामग्री हटाने में विफल रहा है। इसके अलावा वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी और मादक पदार्थ संबधी जानकारी भी नहीं हटा सका।

एजेंसी ने 10 मार्च को घोषणा की थी कि वह इस मंच पर फोटो और वीडियो अपलोड करने की गति सीमित कर रही है। हालाँकि, इस घोषणा के एक हफ्ते से भी कम समय में ट्विटर को यह धमकी दी गई कि अगर उसने रूसी सरकार की माँगें नहीं मानी तो वह इंटरनेट मीडिया मंच को एक महीने के भीतर ब्लॉक कर देगी।

वही, Ruskomnadzor ने इस महीने की शुरुआत में आंशिक रूप से ट्विटर को लेकर नरमी बरती थी, क्योंकि उसने 90 प्रतिशत से अधिक प्रतिबंधित सामग्री को हटा दिया था। एजेंसी का कहना है कि इसमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी, मादक पदार्थ और आत्महत्या से जुड़ी सामग्री शामिल हैं। इसके मद्देनजर यह फैसला किया गया है।

आधिकारिक तौर पर, ट्विटर ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी, आत्महत्या को प्रोत्साहन और मादक पदार्थ की बिक्री से संबंधित सामग्री साझा करने के लिए अपने मंच का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से इनकार किया है। ट्विटर का क​हना है कि हम इस तरह के मामले बिल्कुल भी बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन यूएस-आधारित कंपनी द्वारा ऐसी सामग्री को हटाने में देरी के कारण रूसी अधिकारियों और ट्विटर के बीच खासा विवाद गहरा गया है।

मॉस्को के टैगांस्की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट (Tagansky District Court) ने जानकारी दी है कि उसने ट्विटर पर छह अलग-अलग प्रशासनिक अपराधों के मद्देनजर कुल 19 मिलियन रूबल का जुर्माना लगाया है। बता दें कि अप्रैल 2021 में एजेंसी ने बताया कि ट्विटर ने 3,100 चाइल्ड पोर्नोग्राफी, मादक पदार्थ और आत्महत्या से जुड़ी सामग्री में से 1,900 को हटा लिया था और प्रतिबंधित सामग्री हटाने की गति बढ़ा दी थी। इसके मद्देनजर रूस सरकार ने ट्विटर को ब्लॉक नहीं करने का फैसला किया था।

कपड़ा-झोला बेचने वाला बना दुनिया का सबसे अमीर आदमी, पीछे छोड़ा इंटरनेट-मोबाइल वालों को

जेफ बेजोस और बिल गेट्स जैसे अरबपतियों को पीछे छोड़ते हुए फ्रांस के बर्नार्ड अर्नाल्ट दुनिया के सबसे अमीर बिजनेसमैन बन गए हैं। फोर्ब्स की रियल टाइम बिलियनेयर लिस्ट के अनुसार, शुक्रवार (28 मई, 2021) सुबह 10:30 बजे तक बर्नार्ड अर्नाल्ट फोर्ब्स की अमीरों की लिस्ट में पहले स्थान पर हैं। उनकी कुल नेटवर्थ 191 अरब डॉलर है। वहीं उनके बाद अमेजन के मालिक जेफ बेजोस 187.4 अरब डॉलर के साथ दुनिया के दूसरे सबसे रईस आदमी हैं।

इससे पहले 2019 में बर्नार्ड अर्नाल्ट 100 अरब डॉलर के क्लब में शामिल हुए थे। उनसे पहले इस क्लब में केवल जेफ बेजोस और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ही इसमें शामिल थे।

कौन हैं बर्नार्ड अर्नाल्ट

बर्नार्ड अर्नाल्ट फ्रांस की फैशन टाइकून एलवीएमएच (Moët Hennessy Louis Vuitton) के चेयरमैन और सीईओ हैं। बर्नार्ड का नाम भले ही अनसुना लगे, लेकिन वह वर्ष 2018 से ही दुनिया के टॉप फाइव अमीर लोगों की लिस्ट में शामिल हैं।

बर्नार्ड अर्नाल्ट ने वर्ष 2021 में अब तक 47 अरब डॉलर की संपत्ति अर्जित की है। अर्नाल्ट के पास एलवीएमएच के 50 फीसदी शेयर हैं। उनकी संपत्ति में पिछले 14 महीनों के दौरान 110 बिलियन डाॅलर का इजाफा देखा गया। मार्च में अकेले बर्नार्ड की संपत्ति 76 बिलियन डॉलर बढ़ी है।

बर्नार्ड की कंपनी LVMH के पास कई फेमस फैशन ब्रांड हैं, जिनमें फेंडी, क्रिश्चियन डिओर (इसमें बर्नार्ड की 96.5 फीसदी हिस्सेदारी है) और जिवेंची जैसे ब्रांड शामिल हैं। इसके अलावा बर्नार्ड अर्नाल्ट लुई विट्टन (Louis Vuitton) और सैफोरा जैसे 70 ब्रांड के मालिक हैं। इसके अलावा वो रिटेल और हॉस्पिटैलिटी के क्षेत्र में भी काम करते हैं।

इससे पहले उन्होंने इसी साल जनवरी, 2021 में एलएमवीएच ने अमेरिका की ज्वेलरी कंपनी टिफनी एंड कंपनी को 15.8 अरब डॉलर में खरीद लिया था। इस डील को अब तक की सबसे बड़ी डील बताया जा रहा है। खास बात यह है कि जिस वक्त में दुनिया कोरोना के कहर से जूझ रही थी, उसी वक्त में कंपनी ने भारी मुनाफा कमाया। विशेषरूप LVMH ने चीन में काफी अच्छा बिजनेस किया।

रिपोर्ट के मुताबिक बर्नार्ड अर्नाल्ट ने 1984 में लग्जरी गुड्स के क्षेत्र में कदम रखा था। उन्होंने टेक्सटाइल कंपनी का भी अधिग्रहण भी किया था। इससे पहले 1981 में फ्रांस में सोशलिस्ट सरकार आने के बाद उन्हें परिवार समेत देश से निकाल दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अमेरिका में शरण ली थी।

अमीरों की लिस्ट में मुकेश अंबानी 79.5 अरब डॉलर के साथ 12वें स्थान पर एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

तिरंगे के सफ़ेद हिस्से को कम कर हरा रंग बढ़ा दिया? केजरीवाल पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप, दिल्ली LG को पत्र

केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल ने आरोप लगाया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रेस कॉन्फ्रेंस/सम्बोधन में राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हुआ है। उन्होंने कहा कि सीएम केजरीवाल के प्रेस कॉन्फ्रेंस में तिरंगा झंडा को उलटा कर के लगाया गया था, जो राष्ट्रध्वज का अपमान है। उन्होंने गलत तरीके से तिरंगे झंडे को लगाए जाने को लेकर दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल को पत्र भी लिखा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरविंद केजरीवाल की कई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो तिरंगे झंडे को कुछ इस तरह से लगाया जाता है, जैसे उसमें हरी पट्टियों को बढ़ा दिया गया हो। उन्होंने इसे गलत तरीका बताते हुए इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय ध्वज की जो मर्यादा है, वो बनी रहनी चाहिए। उन्होंने बताया कि ये झंडे जब केजरीवाल बोल रहे होते हैं, तो उनके बैकग्राउंड में लगाया जाता है, जिसमें ऐसा प्रतीत होता है कि इसके सफ़ेद भाग के कुछ हिस्से को हटा कर हरे रंग का क्षेत्र बढ़ा दिया गया है।

उन्होंने इसे ‘राष्ट्रीय ध्वज संहिता’ का उल्लंघन करार दिया। उन्होंने लेफ्टिनेंट गवर्नर को भेजे गए पत्र में लिखा, “दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल टीवी चैनल पर जब संबोधन करते हैं तो उनकी कुर्सी के पीछे लगे राष्ट्रीय ध्वज के स्वरूप पर ध्यान चला जाता है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से निर्दिष्ट ‘भारतीय झंडा संहिता’ में उल्लेखित भाग 1 के 1.3 मानकों का प्रयोग नहीं दिखाई देता है।”

क्या कहता है ‘राष्ट्रीय ध्वज संहिता’ का भाग 1.3

‘राष्ट्रीय ध्वज संहिता’ का 103 कहता है कि झंडे का आकार आयताकार होना चाहिए और इसकी लंबाई और चौड़ाई (ऊँचाई) का अनुपात 3:2 का होना चाहिए। वहीं 1.1 में स्पष्ट बताया गया है कि तीनों रंगों की आयताकार पट्टियों की चौड़ाई समान होनी चाहिए। साथ ही आकार के अनुपात की सूची भी दी गई है। अभी तक आम आदमी पार्टी (AAP) या दिल्ली सरकार के नेताओं की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।

‘राष्ट्रीय ध्वज संहिता’ में दिए गए दिशानिर्देश (साभार: KnowIndia)

पत्र में प्रह्लाद सिंह पटेल ने ये भी लिखा है कि अरविंद केजरीवाल के सम्बोधनों के दौरान जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज लगाया जाता है, उससे ऐसा लगता है जैसे इसे सम्मान देने की जगह सजावट के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। उन्होंने ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ की धारा 2 (ix) की याद दिलाते हुए कहा कि वक्त के मंच को सजाने के लिए झंडे का प्रयोग यहीं होना चाहिए, और इसकी स्थिति महत्वपूर्ण और विशिष्ट होनी चाहिए।

1999 में 10000+ मौतों से लेकर Yaas में सिर्फ 6: आपदा से निपटने और राहत बचाव में भारत का लंबा सफर

भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इसी कारण यहाँ समुद्री तूफानों का सिलसिला चलता ही रहता है। 1999 के अक्टूबर के महीने में आए सुपर साइक्लोन के बाद से कई तूफान आए हैं। तब इस चक्रवाती तूफान की वजह से ओडिशा में 10000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। इससे जगतसिंहपुर जिले में सबसे ज्यादा जानमाल का नुकसान हुआ था।

1999 में यास तूफान की ही तरह बंगाल की खाड़ी से उठा सुपर साइक्लोन नाम का तूफान तब 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पारादीप के निकट तट से टकराया था। उस दौरान समुद्र में कई मीटर ऊँची लहरें उठी थीं, जो तटीय इलाके में बसे कई गाँवों को निगल गई थीं। इसे 20वीं सदी का सबसे विनाशकारी तूफान माना गया था।

हालाँकि, इसके बाद से भारत ने आपदा से निपटने में काफी सुधार किया है। यही कारण है कि इस बार राज्यों और केंद्र ने आपसी सहयोग के साथ बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि 14 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित बचाकर उन्हें राहत शिविरों में पहुँचाया जा सका। केंद्र और राज्य के बीच बने इस सामंजस्य की वजह से ओडिशा और बंगाल दोनों ही राज्यों में नुकसान काफी कम हुआ। यास तूफान की वजह से अब तक सिर्फ 6 मौत (हालाँकि यह भी नहीं होनी चाहिए लेकिन प्रकृति पर पूर्ण विजय संभव नहीं) हुई है।

1999 से अब तक आए बड़े तूफान

फैलिन तूफान: सुपर साइक्लोन के बाद कई तूफान आए। 12 अक्टूबर 2013 में 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से फैलिन तूफान ओडिशा के गोपालपुर तट से टकराया। इसकी तीव्रता 216 किलोमीटर प्रति घंटा दर्ज की गई थी। हालाँकि, पहले से बरती गई सावधानी के कारण फैलिन तूफान के समय 44 लोगों की मौत हुई थी।

हुदहुद तूफान: 6 अक्टूबर 2014 को अंडमान सागर से उठे हुदहुद तूफान ने भारत में भारी तबाही मचाई थी। 185 किलोमीटर की रफ्तार से उठे इस तूफान ने विशाखापत्तनम और ओडिशा में जमकर कहर मचाया था। यह उत्तर प्रदेश तक पहुँच गया था। हुदहुद तूफान में 18 लोगों की मौत हुई थी। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 1000 करोड़ रुपए का पैकेज भी जारी किया था।

वर्धा साइक्लोन: दक्षिण भारत में 2016 में आए वर्धा साइक्लोन ने भारी तबाही मचाई थी। इसकी रफ्तार 130 किलोमीटर प्रति घंटा थी। थाईलैंड में आई बाढ़ की वजह से आए वर्धा तूफान के कारण भारत में 18 लोगों की मौत हुई थी। इससे हजारों एकड़ फसल बर्बाद हो गई थी और लाखों पेड़ तबाह हो गए थे।

फानी साइक्लोन: सुपर साइक्लोन की ही तरह खतरनाक फानी तूफान 2019 में ओडिशा के तट से टकराया था। उस दौरान इसने सबसे ज्यादा ओडिशा में ही तबाही मचाई थी। इससे 72 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें से अकेले 60 से अधिक मौतें ओडिशा में हुई थीं। इस तूफान की रफ्तार 175 किलोमीटर प्रति घंटा की थी। 26 अप्रैल से शुरू हुए इस तूफान ने 4 मई तक भारत में तबाही मचाई थी।

अम्फान तूफान: 21 मई 2020 में आए अम्फान तूफान ने भी काफी तबाही मचाई थी। इसे महातूफान का नाम दिया गया था। 190 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से इस तूफान ने पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और ओडिशा में भारी तबाही मचाई थी। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 1000 करोड़ रुपए के राहत पैकेज का एलान किया था।

तौकते तूफान: हाल ही में अरब सागर से उठे तौकते तूफान ने गोवा, केरल, गुजरात और महाराष्ट्र समेत पश्चिमी भारत में जमकर कहर बरपाया। इसमें करीब 122 लोगों की मौत भी हुई थी। अरब सागर में जहाज बार्ज पी-305 डूब गया था।

यास तूफान: बंगाल की खाड़ी से उठे यास तूफान के कारण ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भारी तबाही हुई। इससे 6 व्यक्ति की मौत हो चुकी है। वहीं अब तक 20 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित बचाया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 1970 से अब तक भारत ने 170 से अधिक तूफानों को झेला है। हालाँकि इसी अवधि में अमेरिका ने 574, फिलीपींस ने 330 और चीन 330 चक्रवातों को झेल चुका है।

‘एक बच्चा 4 साल का, एक 8 साल का..’: रणदीप हुड्डा ने मायावती पर की थी ‘दलित व महिला विरोधी’ टिप्पणी, गिरफ़्तारी की माँग

बॉलीवुड अभिनेता रणदीप हुड्डा उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर किए गए अपने विवादित बयान को लेकर मुसीबत में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर उनकी इस जातिवादी टिप्पणी के खिलाफ उनकी गिरफ्तारी की माँग हो रही है।

रणदीप हुड्डा द्वारा मायावती का मजाक उड़ाने वाला वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। भद्दे मजाक के बाद सोशल मीडिया पर नेटिजन्स ने उन्हें निशाने पर लेते हुए उन्हें गिरफ्तार करने की माँग की। वायरल वीडियो में रणदीप हुड्डा कहते हैं कि वो उन्हें एक ‘डर्टी जोक’ सुनाना चाहते हैं।

वह आगे कहते हैं, “मायावती 2 बच्चों के साथ जा रही होती हैं। इसी बीच एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि क्या बच्चे जुड़वा हैं? तो उन्होंने कहा कि नहीं एक चार साल और दूसरा 8 साल का है।” यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन इसके बाद का जोक लोगों को पसंद नहीं आ रहा है।

उनके उस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर दलित विरोधी और महिला विरोधी बताकर एक्टर को गिरफ्तार करने की माँग की जा रही है।

वीडियो को शेयर करते हुए अगाथा श्रृष्टि नाम की एक यूजर ने ट्वीट किया, “अगर इससे यह पता नहीं चलता है कि यह समाज कितना जातिवादी और सेक्सिस्ट है, खासकर दलित महिलाओं के प्रति तो फिर मुझे नहीं पता क्या होगा। बॉलीवुड के शीर्ष अभिनेता रणदीप हुड्डा एक दलित महिला के बारे में बात कर रहे हैं, जो उत्पीड़ितों की आवाज रही है।”

यहाँ इस मामले पर कुछ सोशल मीडिया यूजर के कमेंट आप देख सकते हैं।

कब का है बयान

रणदीप हुड्डा का 43 सेकेंड का जो वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, वह 2012 का है। एक मीडिया हाउस के कार्यक्रम के दौरान एक्टर ने कुछ ऑडियंस के सामने यह बयान दिया था। लेकिन, उसके 9 साल बाद वह वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो गया। जिसको लेकर इंटरनेट पर उनकी गिरफ्तारी की माँग की जा रही है।

इससे पहले युविका चौधरी, जो कि बिग बॉस, स्प्लिटिसविला और नच बलिए जैसे शो की कंटेस्टेंट रही थीं। उन्होंने हाल ही में एक वीडियो में कहा था, “मैं भंगी जैसी दिख रही हूँ।” उनके उस बयान के बाद नेटिजन्स ने उन्हें आड़े हाथों लिया। उनकी गिरफ्तारी की माँग भी की गई। इसके बाद युविका ने माफी माँग ली थी।

दिसंबर 2020 में अभिनेता सैफ अली खान ने अपनी फिल्म ‘आदिपुरुष’ के बारे में एक इंटरव्यू के दौरान माता सीता के अपहरण को सही ठहराया था। हालाँकि, विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने माफी माँग ली थी।

‘पहले अपनी पत्नी को भेजो, तभी तुम्हें गाँव में घुसने देंगे’, TMC नेता मुजफ्फर ने धमकाया, Video में सुनें आपबीती

बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की राजनीतिक हिंसा और हिंदुओं को निशाना बनाए जाने की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। एक हालिया घटना में, उत्तर 24 परगना जिले के मीनाखान (Minakhan) विधानसभा क्षेत्र के मुजफ्फर नामक टीएमसी नेता द्वारा एक दलित बीजेपी महिला कार्यकर्ता के पति को धमकाने और महिला कार्यकता को लेकर अश्लील टिप्पणी करने का मामला सामने आया है।

बीजेपी उम्मीदरवार और सामाजिक संगठन सिंह वाहिनी के अध्यक्ष देवदत्त माजी द्वारा ट्वीट किए गए वीडियो में टीएमसी नेता मुजफ्फर की गुंडई का खुलासा हुआ। इस वीडियो में हिंदू दलित बीजेपी कार्यकर्ता पिंकी बाज के पति ने कहा कि टीएमसी नेता मुजफ्फर ने गाँव में वापसी के लिए उनके सामने शर्त रखते हुए कहा, ”अपनी पत्नी पिंकी को कुछ दिनों के लिए मेरे पास भेजो, उसके बाद ही हम तुम्हें गाँव में वापस आने देंगे।”

पिंकी बाज (क्षेत्र में बीजेपी महिला शाखा की कोषाध्यक्ष), उनके पति साधन बाज और कई अन्य हिंदुओं को 2 मई को विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा की गई राजनीतिक हिंसा के बाद अपने मुस्लिम बहुल गाँव से भागना पड़ा था। बीजेपी नेता देवदत्त माजी ने उपरोक्त वीडियो उस जगह जाकर बनाया है, जहाँ पिंकी समेत कुछ अन्य हिंदुओं ने अपने गाँव से भागकर शरण ली है।

मुस्लिम बहुल गाँव में हिंसा के बाद हिंदुओं को भागना पड़ा

टीएमसी कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी के बारे में पिंकी के पति साधन ने कहा, “2 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद मुसलमानों ने गाँव में हिंदू परिवारों पर हमला किया।” ”हम सब अपने शरीर पर सिर्फ कपड़े लेकर भाग गए। बाद में जब मैंने स्थानीय (तृणमूल कॉन्ग्रेस) समिति के नेता मुजफ्फर बेग को फोन किया, तो उसने कहा, ”पहले अपनी पत्नी को भेजो, उसके बाद तुम आ सकते हो।”

पिंकी के पोलिंग बूथ में करीब 769 मतदाता हैं, जिनमें से 67 हिंदू हैं और बाकी मुस्लिम हैं। पिंकी ने पीएम से अनुरोध करते हुए कहा, “हम मोदी जी से अनुरोध करते हैं कि मुसलमानों द्वारा हम पर किए जा रहे अत्याचारों से हम हिंदुओं की रक्षा करें।”

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर 24 परगना जिले में लगभग 26% मुस्लिम आबादी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह जिला चुनाव पूर्व और बाद की हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। चुनावों से पहले, यहाँ सैकत भवन, मनीष शुक्ला जैसे बीजेपी कार्यकर्ताओं और नेताओं की हत्याएँ हुई थीं।

बंगाल में 2 मई को आए विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से ही सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने किस कदर राजनीतिक हिंसा की, ये किसी से छिपा नहीं है। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही टीएमसी नेताओं द्वारा बीजेपी के कई कार्यकर्ताओं की हत्या किए जाने के अलावा महिलाओं का यौन उत्पीड़न के कई मामले सामने आए। मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंसा से परेशान हजारों की संख्या में हिंदुओं को अपना घार-बार छोड़कर असम में शरण लेनी पड़ी।

जेल में चूहा नेहरू के लिए ‘टॉर्चर’, झाड़ू लगा और अंग्रेजी बॉन्ड भर सिर्फ 12 दिन में निकले: सावरकर ने 15 साल झेली प्रताड़ना

विनायक दामोदर सावरकर, यानी एक ऐसा नाम जो ‘वीर’ का पर्यायवाची बन गया। वीर सिर्फ हथियार उठा कर अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि ‘वीर’ इसीलिए क्योंकि सैकड़ों को दमनकारी आक्रांताओं के खिलाफ हथियार उठाने को प्रेरित किया, अपनी लेखनी और विचारों से स्वतंत्रता की अलख जगाई, 1857 युद्ध को लेकर अंग्रेजों का नैरेटिव ध्वस्त किया और कालापानी में असंख्य यातनाएँ सहीं।

विनायक दामोदर सावरकर जब कालापनी की सज़ा भुगत रहे थे, तब महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तक नहीं थे और जब 28 वर्ष के सावरकर को अंडमान-निकोबार में बने सेल्युलर जेल में कोल्हू के बैल की जगह जोता जाता था, उसके 4 वर्षों बाद 45 साल के मोहनदास करमचंद गाँधी का भारत में आगमन हुआ। रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा नाना और वीर कुँवर सिंह की गाथाओं को इतिहास से खोद कर निकाल लाने वाले सावरकर सचमुच ‘वीर’ थे।

कॉन्ग्रेस पार्टी ने जवाहरलाल नेहरू के कद को ऊँचा कर के दिखाने के लिए VD सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को नकारा और दबा कर रखा। आज भी कॉन्ग्रेस नेता कहते हैं कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी माँगी। ये एक कानूनी प्रक्रिया थी, जिसका सहारा खुदीराम बोस जैसे बलिदानी ने भी लिया था। सावरकर उन नेताओं में नहीं थे, जिन्हें जेल में ऐशोआराम की सारी सुविधाएँ दी जाती थीं।

जवाहरलाल नेहरू को नाभा जेल से निकालने के लिए वायसराय तक गए थे पिता

जब बात अंग्रेजों की यातनाएँ सहने की हो तो आज विनायक दामोदर सावरकर की तुलना जवाहरलाल नेहरू से करनी बनती है, क्योंकि इसकी शुरुआत कॉन्ग्रेस ने ही की थी। सावरकर 1909-1924 में लगातार 15 जेल में रहे और उसमें से 10 साल कालापानी में भीषण प्रताड़ना झेली, लेकिन, जवाहरलाल नेहरू की अंतिम जेल टर्म को छोड़ दें तो भारत का कोई भी जेल उन्हें 2 साल भी रोक नहीं पाया।

जवाहरलाल नेहरू को टुकड़ों में कुल 9 बार जेल की सज़ा दी गई। पहली बार वो मात्र 88 दिन में ही (दिसंबर 6, 1921 से मार्च 3, 1922 तक) लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल से बाहर आ गए। दूसरी बार उन्हें इलाहबाद सेंट्रल जेल और लखनऊ डिस्ट्रिक्ट जेल में 266 दिनों के लिए (मई 11, 1922 से जनवरी 31, 1923 तक) रखा गया। तीसरी बार सितंबर 22, 1923 में उन्हें नाभा जेल में डाला गया, जहाँ से वो मात्र 12 दिनों में ही छूट गए।

नाभा जेल जवाहरलाल नेहरू को छुड़ाने के लिए उनके पिता, जो कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके थे, ने एड़ी-चोटी का जोड़ लगा दिया। जवाहरलाल नेहरू को नाभा जेल से तभी छोड़ा गया था, जब उन्होंने हस्ताक्षर कर के दिया था कि वो फिर कभी नाभा प्रिंसली स्टेट के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करेंगे। नाभा जेल में कीचड़ और कमरे के कम क्षेत्रफल को देख कर ही नेहरू के पसीने छूट गए थे। संतरियों तक को उनसे बात करने की इजाजत नहीं थी।

इसी जेल में उनके साथ के सन्तानम नाम के स्वतंत्रता सेनानी भी बंद थे, जिनका 1980 में निधन हुआ था। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Handcuffed with Jawaharlal’ में लिखा है कि नेहरू को एक अलग सेल में डाला गया था, जहाँ उन्हें अकेले रखा गया था। 20 × 12 स्क्वायर फ़ीट के इस कमरे में दीवारों पर कीचड़ था और ऊपर से भी टपकता था। स्नान की सुविधा नहीं थी। कैदियों को अच्छे कपड़े भी नहीं दिए गए थे।

एक अमीर खानदान में जन्मे और ऐशोआराम की ज़िंदगी जीने वाले जवाहरलाल नेहरू को ये सब इतना अखरता था कि वो इस व्यवस्था से खासे झल्ला गए। के सन्तानम लिखते हैं कि कुपित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी झल्लाहट निकालने के लिए रोज आधे घंटे कमरे में झाड़ू लगाना शुरू कर दिया था। सन्तानम लिखते हैं कि वो और उनके साथी स्वतंत्रता सेनानी AT गिडवानी को ये सब देख कर गुस्से से ज्यादा ये मनोरंजक लगने लगा था।

लेकिन, बाहर मोतीलाल नेहरू के प्रयासों के बाद अचानक से सब बदल गया और स्नान से लेकर कपड़े बदलने तक की व्यवस्था कर दी गई। बाहर रह रहे मित्रों से फलों से लेकर अन्य खाद्य पदार्थ मँगवाने की अनुमति भी दे दी गई। 2 साल की सज़ा सुनाई गई थी लेकिन नेहरू 12 दिनों में ही बाहर निकलने में कामयाब रहे। लेकिन, उससे पहले बाहरी दुनिया को बताया तक नहीं गया था कि जवाहरलाल को कहाँ रखा गया है।

चिंतित मोतीलाल नेहरू ने हर जगह से पता लगाने की कोशिश की कि उनके बेटे को कहाँ रखा गया है। पंजाब में उन्होंने कई अधिकारियों और अपने सूत्रों के माध्यम से जवाहरलाल को छुड़ाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। इसके बाद उन्होंने पूरी डिटेल्स जानने के लिए सीधे वायसराय से संपर्क किया। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी नाभा की ‘प्रताड़ना’ का जिक्र किया है – कमरे की ऊँचाई कम थी, वहाँ एक चूहा था, जमीन पर सोना होता था और सैनिटाइजेशन की व्यवस्था नहीं थी।

विनायक दामोदर सावरकर और कॉन्ग्रेस पार्टी: स्वतंत्रता के पहले व बाद

जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन ही देश की स्वतंत्रता के लिए न्योछावर कर दिया था, उस व्यक्ति को आज़ादी के बाद ही उसी देश की सरकार ने प्रताड़ित किया, जिसके आज़ाद होने का उन्होंने सपना देखा था। पत्रकार भालचंद्र कृष्णा जी केलकर लिखते हैं कि महात्मा गाँधी की हत्या तक को एक ‘अवसर’ में बदल कर हिंदूवादियों के सफाए की कोशिश की गई। सावरकर को मुक़दमे में लपेट लिया गया और RSS को प्रतिबंधित किया गया।

गुलामी के उस दौर में भी कॉन्ग्रेस के नेताओं के ब्रिटिश वायसरॉय एवं अधिकारियों से बहुत ही अच्छे संबंध थे। यह आपसी संबंध इतने गहरे थे कि जैसा ब्रिटिश सरकार चाहती थी, कॉन्ग्रेस के नेता वैसा ही करते थे। मिंटो ने वायसराय बनने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले को बातचीत के लिए बुलाया और विदेशी समान के बहिष्कार के आंदोलन को ख़त्म करने का आश्वासन ले लिया। कॉन्ग्रेस के कई अधिवेशनों की शुरुआत ब्रिटेन के महाराजा के गुणगान के साथ हुई थी।

खुद महात्मा गाँधी ने लिखा था, “सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएँगे। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रन्तिकारी हैं और इसे छुपाते नहीं हैं। मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझे से काफी पहले, देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में कालापानी भोग रहे हैं। अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो वे किसी ऊँचे शासकीय पद को सुशोभित कर रहे होते।”

अंग्रेजों के हाथों असली प्रताड़ना सावरकर ने ही झेली

कालापानी में कक्ष कारागारों को सेल्युलर जेल कहा जाता था। वहाँ कड़ा पुलिस पहरा रहता था। सावरकर अपनी पुस्तक ‘काला पानी’ में इस नारकीय यातना का वर्णन करते हैं। 750 कोठरियाँ, जिनमें बंद होते ही कैदी के दिलोदिमाग पर घुप्प अँधेरा छा जाता था। अंडमान के सुन्दर द्वीप पर ये अंग्रेजों का नरक था। इंसानों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था। अंग्रेज उन्हें कोल्हू के बैल की जगह जोत देते थे।

पाँव से चलने वाले कोल्हू में एक बड़ा सा डंडा लगा कर उसके दोनों तरफ दो आदमियों को लगाया जाता था और उनसे दिन भर काम करवाया जाता था। जो काम बैलों का था, वो इंसानों से कराए जाते थे। जो टालमटोल करते, उन्हें तेल का कोटा दे दिया जाता था और ये जब तक पूरा नहीं होता था, उन्हें रात का भोजन भी नहीं दिया जाता था। उन्हें हाँकने के लिए वार्डरों तक की नियुक्ति की गई थी। उन्होंने अंडमान में कागज़-कलम न मिलने पर दीवारों पर कीलों, काँटों और अपने नाखूनों तक से साहित्य रचे।

सिर चकराता था। लंगोटी पहन कर कोल्हू में काम लिया जाता था। वो भी दिन भर। शरीर इतना थका होता था कि उनकी रातें करवट बदलते-बदलते कटती थी। सावरकर को आत्महत्या करने की इच्छा होती। एक बार कोल्हू पेरते-पेरते उन्हें चक्कर आ गया और फिर उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया। उसी जेल में VD सावरकर के भाई भी थे। उन्हें भी ऐसे ही प्रताड़ित किया जाता था। कई महीनों तक तो दोनों भाई मिले तक नहीं।

आज जब कॉन्ग्रेस पार्टी वीर सावरकर को ‘देशद्रोही’ बताते है, ‘होमोसेक्सुअल’ कहती है और ‘सॉरी’ का तंज कस के उनका मजाक बनाती है, तो उसे अपने किसी एक नेता का नाम बताना चाहिए जिसे कालापानी की सज़ा हुई हो और डेढ़ दशक तक लगातार प्रताड़ित किया गया हो। अपने नेताओं के अधिकाधिक महिमामंडन तक तो ठीक है, लेकिन इसके लिए अन्य राष्ट्रवादी नेताओं को बदनाम करने का हथकंडा बंद होना चाहिए।