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पंजाब में MSP पर रिकॉर्ड तोड़ गेहूँ की खरीद: केंद्र की DBT स्कीम से ₹23,000 करोड़ सीधे किसानों के खाते में

पंजाब में कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बावजूद सरकारी एजेंसियों ने गेहूँ की रिकॉर्ड खरीद की है। रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में 132.08 लाख मीट्रिक टन गेहूँ खरीदा गया। इससे लगभग 9 लाख किसानों को 23,000 करोड़ रुपए बिना किसी अढ़तिया या बिचौलिए के सीधे उनके बैंक खातों में भेजे गए। गेहूँ की यह खरीद पिछले साल की तुलना में 2 लाख मीट्रिक टन अधिक है। इस साल मंडी पहुँचने वाले किसानों की संख्या भी ज्यादा है।

हालाँकि मालवा क्षेत्र में जहाँ किसान आंदोलन प्रभावी है, खरीद कम हुई है लेकिन दोआब और माझा क्षेत्र में हुई रिकॉर्ड तोड़ खरीदारी से मालवा में हुई कम खरीदारी की भरपाई हो गई। संगरूर, बरनाला, मोगा, फरीदकोट और भटिंडा जैसे जिले मालवा क्षेत्र में आते हैं।  

पंजाब खाद्य आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के डायरेक्टर रवि भगत ने बताया कि किसानों को अनाज खरीद पोर्टल पर रजिस्टर किया गया और फसल खरीद का भुगतान सीधे ही उनके बैंक खातों में किया गया। इसके अलावा भगत ने बताया कि फसल की जानकारी से संबंधित ‘J Form’ भी डिजिलॉकर में उपलब्ध कराया गया जिससे किसानों की निर्भरता बिचौलियों पर समाप्त हो गई।  

चाककलाँ के एक किसान गुरदीप सिंह ने बताया कि वह इस वर्तमान व्यवस्था से खुश है क्योंकि इस बार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी बेहतर था और उसने अपना 8 लाख रुपए के मूल्य का 400 क्विंटल गेहूँ सरकार को बेचा है।

7 मई को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के तहत 1,500 करोड़ रुपए 75 लाख किसानों के खाते में जमा किए। मुख्यमंत्री चौहान ने बताया कि मध्य प्रदेश में 78 लाख किसान हैं और लगभग 77 लाख किसानों को अब तक 8,465 करोड़ रुपए उनके बैंक खातों में भेजा जा चुका है।

इसके अलावा उन्होंने सूचना दी कि मध्य प्रदेश में अब तक 1 लाख मीट्रिक टन चना और 80 लाख मीट्रिक टन गेंहू की खरीद की गई है। कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए राज्य सरकार ने फसल खरीद की अंतिम तारीख को 5 मई से बढ़ाकर 25 मई कर दिया है। कर्ज चुकाने की अंतिम तारीख भी बढ़ाई गई है।

केजरीवाल सरकार के मंत्री ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का किया उल्लंघन: NCPCR ने LG से की कार्रवाई की माँग

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने दिल्ली के उपराज्यपाल को पत्र लिखकर AAP नेता और केजरीवाल सरकार में समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम के खिलाफ दिल्ली स्थित एक चाइल्ड केयर संस्थान में रहने वाले बच्चों की पहचान का खुलासा करने के लिए कार्रवाई की माँग की है। आयोग ने कार्रवाई की रिपोर्ट भी एक सप्ताह में देने को कहा है।

बाल अधिकार निकाय ने अपने पत्र में कहा कि उसे गौतम द्वारा उनके ट्विटर हैंडल पर अपलोड किए गए एक वीडियो के खिलाफ शिकायत मिली है। वीडियो में AAP मंत्री को दिल्ली में एक चाइल्ड केयर संस्थान का निरीक्षण करते हुए, संस्था के नाम के साथ बच्चों की पहचान का खुलासा करते हुए देखा गया। वीडियो में समाज कल्याण मंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि सीसीआई में रहने वाले बच्चे अनाथ थे।

NCPCR ने बच्चों को उस संस्था के नाम के साथ दिखाने वाले वीडियो को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74 का प्रथम दृष्टया उल्लंघन और बच्चों के खिलाफ एक गंभीर अपराध माना है। बता दें कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 74, किसी भी मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों की पहचान जैसे उनका नाम, पता, उम्र, स्कूल का नाम आदि के उजागर करने पर रोक लगाती है।

इसके अतिरिक्त, ऐसे बच्चों के विवरण को सार्वजनिक करने से प्रतिबंधित किया जाता है ताकि बच्चों की गोपनीयता बनी रहे और इन कमजोर बच्चों को तस्करी, दुर्व्यवहार, क्रूरता, अवैध गोद लेने आदि के लिए अतिसंवेदनशील न बनाया जाए। अधिनियम की धारा 74(3) में कहा गया कि इस प्रावधान का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को एक अवधि के लिए कारावास या 6 महीने तक का जुर्माना या दो लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकता है।

पत्र में कहा गया, “इसलिए, जेजे अधिनियम, 2015 के तहत दिए गए प्रावधानों के उल्लंघन को देखते हुए, इस मामले में जाँच की जानी चाहिए और जैसा उचित समझा जाए, कार्रवाई की जाए। अनुरोध है कि इस मामले में की गई कार्रवाई की जानकारी देते हुए एक सप्ताह के भीतर आयोग को रिपोर्ट भेजी जाए।”

चीनी वायरस पर मोदी घृणा से सना लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा: कोरोना से भी घातक है ये राजनीति

देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर जैसे-जैसे तेज होती गई इसके समानांतर एक और लहर भी उफान मारने लगी। यह लहर संक्रमण से भी घातक है। यह लहर पैदा होती है मीडिया, लिबरल-सेकुलर जमात और भारत के विपक्षी दलों की मोदी घृणा से।

जिस समय राजनीतिक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से उपर उठकर चीनी वायरस से मुकाबला करने की जरूरत है, यह वर्ग अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रही है। राजनीति में हैं तो राजनीति करनी भी चाहिए। लेकिन ये आम जनमानस के खून से सनी नहीं होनी चाहिए।

लेफ्ट-लिबरल्स और कथित सेक्युलर कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराने का एजेंडा चला रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए ये कभी केंद्र सरकार को कोरोना की दूसरी लहर के कोसते हैं तो कभी ऑक्सीजन और अन्य चीजों के लिए। हर बात के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराना तो फैशन सा बन गया है।

हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि भारत में कोरोना की स्थिति दूसरे देशों के मुकाबले इस साल की शुरुआत में काफी बेहतर थी। भारत में दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान शुरू हो चुका था। अब 18 साल से अधिक आयु वर्ग तक के लिए भी वैक्सीनेशन शुरू हो चुकी है। इसके अलावा प्रमुख बात ये कि कोरोना की पहली लहर के दौरान ही केंद्र सरकार ने देशभर के सभी राज्यों को अपने यहाँ ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए करोड़ों रुपए का फंड दिया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम केयर्स फंड से देशभर में वेंटिलेटर्स खरीदने के लिए 2000 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया था। इस फंड से 58 हजार 850 वेंटिलेटर्स खरीदे गए थे। कुछ राज्यों ने इसकी अहमियत को समझते हुए ऑक्सीजन प्लांट लगाया तो कुछ ने इसे ही ठंडे बस्ते में डाल दिया। इन्हीं राज्यों में से एक अरविंद केजरीवाल शासित दिल्ली है। केंद्र सरकार ने केजरीवाल सरकार को पीएम केयर्स फंड के तहत दिल्ली में 8 ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए फंड जारी किया था, लेकिन दिसंबर 2020 तक केवल एक ऑक्सीजन प्लांट लगी।

कोरोना की दूसरी लहर से कराह रही दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से जब लोग दम तोड़ने लगे तो अपने अपेक्षित अंदाज में केजरीवाल ने दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। जबकि एक आरटीआई के जरिए पता चला है कि दिल्ली सरकार ने जनवरी, फरवरी और मार्च इन तीन महीनों में अपने प्रचार पर 150 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

जिस पीएम केयर्स को कोसा, उसी से मदद

जिस पीएम केयर्स फंड पर लेफ्ट-लिबरल्स और कथित सेक्युलर पानी पी-पीकर केंद्र सरकार को कोसते हैं, उसी फंड से केंद्र देशभर में 551 पीएसए ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट लगाने जा रहा है। ये प्लांट देशभर के जिला मुख्यालयों में स्थित सरकारी अस्पतालों में स्थापित किए जाएँगे। 25 अप्रैल 2021 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसकी घोषणा की थी।

इसके अलावा पीएम केयर्स फंड से इसी साल देशभर के जन स्वास्थ्य विभागों में पीएसए मेडिकल ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट की स्थापना के लिए केंद्र सरकार द्वारा 201.58 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया था। कोरोना की दूसरी लहर का प्रभाव गाँवों में अधिक देखने को मिल रहा है। ऐसे में ग्रामीण स्तर पर इससे जंग जीतने के लिए मोदी सरकार ने इसी वर्ष 9 मई 2021 को 25 राज्यों की ग्राम पंचायतों के लिए 8923.8 करोड़ रुपए की अनुदान जारी किया था। इस फंड से ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर कोरोना से लड़ने के लिए सुविधाओं को विकसित किया जाएगा।

बावजूद इसके महामारी के इस दौर में जब देश को एकजुट होकर कोरोना से लड़ना चाहिए तो कॉन्ग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल देश को ही अंतरर्राष्ट्रीय स्तर पर नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए विपक्ष बार-बार ये सवाल कर रहा है कि जब दूसरी लहर से लड़ने के लिए विदेशों से मदद मिल रही है तो केंद्र सरकार आखिर क्या कर रही थी अब तक?

इस सवाल का जवाब बड़ा ही सीधा सा है। कोरोना से त्रस्त संपूर्ण विश्व को वैक्सीन मैत्री के जरिए भारत ने मदद की और अब जरूरत पड़ने पर वही देश हमारी मदद की आगे आ रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे ‘डिप्लोमेटिक टाइज’ कहा जाता है।

हमें ये समझने की आवश्यकता है कि हमारा एक संघीय ढाँचा है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत कामकाज होते हैं। इसके तहत कोई भी मदद राज्यों को देनी होती है तो पहले केंद्र सरकार उसे राज्यों को आवंटित कर देता है। इसके बाद राज्यों की ये जिम्मेदारी होती है कि वो उसे आम जनता तक पहुँचाएँ। ऐसे में हर चीज के लिए केंद्र सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता है।

हम सभी ने देखा है कि कोरोना की पहली लहर के दौरान केंद्र सरकार की सक्रियता के कारण हम दुनिया की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश होते हुए भी सुरक्षित रहे थे। हालाँकि, दूसरी लहर को लेकर केंद्र सरकार और तमाम स्वास्थ्य एजेंसियों के आगाह करने के बावजूद राज्य सरकारों और आम लोगों के स्तर पर भी लापरवाही दिखी। इससे हमें सीख लेते हुए तीसरी लहर को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है, जिसको लेकर केंद्र सरकार पहले ही आगाह कर चुकी है।

MBA किया बेटा नौकरी छोड़ अस्पताल में बना स्वीपर… पिता की देखभाल के लिए… कोरोना से हार गया ‘त्याग’

कोरोना काल में कई ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिसने दिल और दिमाग दोनों को झकझोर दिया है। ताजा घटना आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम की है। यहाँ एक एमबीए किए बेटे ने अपनी नौकरी केवल इसलिए छोड़ दी, ताकि वह अपने कोरोना पॉजिटिव पिता की अस्पताल में स्वीपर बनकर देखभाल कर सके। हालाँकि, इस दर्द से बड़ा दर्द और क्या होगा जब श्रवण कुमार जैसा बेटा अपने सपनों को त्याग कर पिता के लिए स्वीपर बनने के लिए तैयार हो गया, लेकिन अपनी लाख कोशिशों के बावजूद वह उन्हें कोरोना रूपी राक्षस से नहीं बचा पाया।

दरअसल, आंध्र प्रदेश के विशाखा के अक्कय्यापलेम के रहने वाले मधुकिशन राव के पास एमबीए की डिग्री थी और वह पिछले डेढ़ साल से सरकार द्वारा संचालित कॉल सेंटर में काम कर रहे थे। उनके पिता 67 वर्षीय सुदर्शन राव स्थानीय शिपयार्ड के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे। पिता के कोरोना पॉजिटिव होने के बाद मधुकिशन ने उन्हें 2 मई 2021 को शहर के सरकारी KGH Hospital में भर्ती करा दिया। उन्हें अस्पताल में सीएसआर ब्लॉक की चौथी मंजिल पर भर्ती कराया गया था।

न्यूज़ 18 के रिपोर्ट के अनुसार दो दिनों के बाद बुजुर्ग सुदर्शन राव बाथरूम में गिर गए, जिससे उनके शरीर में कई चोटें लग गई और काफी खून भी बह गया। उन्होंने अपने बेटे और परिवार के सदस्यों से इसकी शिकायत की कि अस्पताल के कर्मचारी उनकी ठीक से देखभाल नहीं करते हैं। शिकायतों के बाद कर्मचारियों ने सुदर्शन राव का पहले से बेहतर इलाज करना शुरू कर दिया, लेकिन इसके बाद भी उनकी स्थिति में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला।

वहीं, बेटे से अपने पिता की ऐसी हालत देखी नहीं जा रही थी। वह अपने पिता को इन परिस्थितियों में देखकर बेहद चिंतित थे। ऐसे में पिता की बेहतरी के लिए उन्हें केवल एक ही रास्ता नजर आ रहा था। मधुकिशन ने अपने पिता की देखभाल करने के लिए अपनी कॉल सेंटर वाली नौकरी छोड़ने और अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी के रूप में काम करने का फैसला किया।

अस्पताल में सफाई कर्मचारी की नौकरी करने के लिए पहुँचे मधुकिशन ने अपने पिता को ढूँढना शुरू किया, लेकिन जिस कमरे में उन्हें भर्ती कराया गया था, वह वहाँ थे ही नहीं। काफी तलाश करने के बाद बेटे ने अस्पताल में शौचालय के पास बरामदे में अपने पिता की लावारिस लाश को पड़ा पाया। पास के एक वार्ड में मौजूद व्यक्ति ने मधुकिशन को बताया कि उसके पिता की मृत्यु बहुत पहले ही हो चुकी थी। ये सुनने के बाद मानो बेटे के पैरों जमीन ही खिसक गई हो, वह मन ही मन इसके लिए खुद को दोषी मान रहा थे कि तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपने पिता की जान नहीं बचा पाए।

पिता के साथ हुए इस वाकया से मधुकिशन और उसका परिवार अंदर से टूट चुका है। उन्होंने सुदर्शन की मौत के लिए अस्पताल के लापरवाह कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराया है। मधुकिशन ने इस मामले की शिकायत जिला कलेक्टर, पुलिस आयुक्त, अस्पताल प्रमुख और अस्पताल पर्यवेक्षक से भी की है।

दिल्ली दंगों और IB ऑफिसर की हत्या में आरोपित ताहिर हुसैन को नहीं मिली जमानत, कोर्ट ने जाँच में बाधा डालने की जताई आशंका

दिल्ली की एक अदालत ने राष्ट्रीय राजधानी के उत्तर पूर्वी हिस्से में पिछले साल हिंसा के दौरान खुफिया ब्यूरो (IB) अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आरोपित ताहिर हुसैन की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उसके खिलाफ गंभीर आरोप हैं। कोर्ट ने कहा कि पूर्व AAP पार्षद और मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन ने भीड़ को साम्प्रदायिक रूप से भड़काया, जिस कारण उसने दूसरे समुदाय पर हमले के लिए योजना बनाई।

न्यायाधीश ने कहा कि रिकॉर्ड में यह बताने वाली पर्याप्त सामग्री है कि आरोपित दंगा करने वाली भीड़ का हिस्सा था। न्यायाधीश ने कहा कि आरोपित पर लगे आरोप गंभीर हैं, मामले में आगे की जाँच अभी जारी है और आशंका है कि यदि आरोपित को जमानत पर रिहा कर दिया गया, तो वह गवाहों को धमका सकता है और आगे की जाँच में बाधा डाल सकता है, इसलिए जमानत की अर्जी खारिज की जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि ताहिर हुसैन ने दंगाइयों को मानव हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। 

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में दो अन्य आरोपितों- समीर खान और कासिम की जमानत याचिका को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि उन्हें जमानत दी गई, तो उनके भागने की पूरी आशंका है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बीते साल संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के समर्थकों और विरोधियों के बीच झड़प होने के बाद 24 फरवरी को दंगे भड़क गए थे, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी और लगभग 200 लोग घायल हो गए थे। IB अधिकारी अंकित शर्मा का शव उनके लापता होने के एक दिन बाद 26 फरवरी को दंगा प्रभावित चाँद बाग इलाके में उनके घर के निकट एक नाले से मिला था।

अंकित शर्मा की हत्या के पीछे रची गई थी गहरी साजिश

अंकित के परिजनों ने शक जताया था कि उनका हत्यारा कोई और नहीं बल्कि ताहिर हुसैन ही था। अंकित के पिता और भाई का आरोप था कि हिंसा के दौरान ताहिर हुसैन के समर्थक अंकित को खींचकर ले गए और उनकी हत्या करने के बाद शव नाले में फेंक दिया गया था। अंकित शर्मा की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उनके सिर, चेहरे, छाती, पीठ और कमर पर धारदार हथियार से 450 से ज्यादा बार वार करने का पता चला था। दिल्ली पुलिस ने पिछली जून में दायर अपनी चार्जशीट में आरोप लगाया था कि शर्मा की हत्या के पीछे गहरी साजिश थीं, क्योंकि वह विशेष रूप से हुसैन के नेतृत्व वाली भीड़ का लक्ष्य थे।

बंगाल में दलितों के खिलाफ हिंसा के 1627 मामले- 12 रेप और 20 का हुआ मर्डर: NCSC की जाँच में खुलासा

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासी हिंसा से जुड़े मामलों की छानबीन करने के लिए दो दिवसीय राज्य दौरा करने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) के चेयरमैन विजय सांपला ने टीएमसी पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

उन्होंने शुक्रवार (14 मई 2021) को एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा, ”दो मई के बाद यहाँ जिस तरह की घटनाएँ हुई हैं, वह चिंताजनक है। 1947 के बाद पहली बार बलात्कार, हत्याएँ बिना किसी राज्य संरक्षण के हो रही हैं। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित अनुसूचित जाति के लोग हुए हैं।”

सांपला ने आगे क​हा कि बंगाल में दलितों के खिलाफ हिंसा के 1627 मामले सामने आए हैं। इनमें से करीब 10-12 मामले रेप से संबंधित हैं। इसके अलावा 15 से 20 लोगों की हत्या के मामले भी सामने आए हैं।

एनसीएससी के चेयरमैन ने कहा कि दलितों के खिलाफ हिंसा के बीते एक हफ्ते में ही 672 नए केस सामने आए हैं। मैंने ADGP को निर्देश दिए हैं कि इलाके के SHO के खिलाफ भी जाँच कराई जाए। हिंसा में जिन परिवारों को नुकसान पहुँचा है, उनकी मदद के लिए सरकार को आगे आना चाहिए।

विजय सांपला ने बताया कि जब मैं नाबाग्राम पहुँचा तो पुलिस ने मुझसे कहा कि हिंसा की घटनाएँ दलितों के ही दो गुटों के बीच हुई है। हालाँकि, छानबीन में खुलासा हुआ है कि हिंसा में कई जनरल कैटेगरी के लोग भी शामिल थे। एक दलित व्यक्ति जब पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने पहुँचा तो उस पर दिनदहाड़े हमला किया गया और जो (एससी से) पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने गए थे, उन पर हमला किया गया, उनके घरों को लूट लिया गया।

मालूम हो कि इस महीने की शुरुआत में भाजपा ने आरोप लगाया कि चुनाव के बाद हुई हिंसा में उसकी पार्टी के नौ कार्यकर्ता मारे गए हैं। हालाँकि, तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) इन आरोपों का खंडन करती रही है। 7 मई को गृह मंत्रालय द्वारा प्रतिनियुक्त चार सदस्यीय टीम ने जमीनी स्थिति का आकलन करने के लिए पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर इलाके का दौरा किया था।

बंगाल में हुई हिंसा को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने भी राष्ट्रपति को लिखा था पत्र

वहीं, हाल ही में बंगाल में हुई हिंसा को लेकर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर उनसे इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। उन्होंने पत्र में पश्चिम बंगाल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और जिहादियों द्वारा चुनाव के बाद की गई हिंसा को तत्काल रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की थी।

विहिप नेता आलोक कुमार ने कहा था कि इस हिंसा का बड़ा निशाना अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग ही बन रहे हैं। कूचबिहार से सुंदरवन तक घर जलाए जा रहे हैं। दुकानें लूटी जा रही हैं और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार हो रहा है। भय के वातावरण में राज्य में हिंदू आबादी को पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। खुलेआम विपक्ष के कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है। इस हिंसा का एक सुनियोजित जिहादी पक्ष है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।

उन्होंने कहा था कि ममता के पिछले दो शासनकाल में भी वहाँ का हिंदू समाज त्रस्त रहा है, लेकिन इस बार शासन काल का प्रारंभ जिस ढंग से हुआ है उससे पूरा देश यह समझ रहा है कि अगर इसी समय बंगाल के प्रशासन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो हो सकता है कुछ स्थानों पर हिंदू समाज आत्मरक्षा के लिए स्वयं कुछ उपाय करने पर मजबूर हो जाए। दोनों ही स्थितियाँ पूरे देश के लिए चिंता का विषय हैं।

अल जजीरा न्यूज वाली बिल्डिंग में थे हमास के अड्डे, अटैक की प्लानिंग का था सेंटर, इसलिए उड़ा दिया: इजरायली सेना

गाजा पट्टी में इजरायली सेना द्वारा एक बहुमंजिला इमारत पर हमला किया गया। यहाँ अल जजीरा और अन्य मीडिया समूहों का ऑफिस भी था। इसके पहले इजरायल ने चेतवानी दे दी थी कि उसके द्वारा उन सभी जगहों पर हमला किया जाएगा, जहाँ से हमास इजरायल के लोगों को निशान बनाने का कार्य करेगा।

ट्विटर के माध्यम से इजरायल डिफेंस फोर्स ने जानकारी दी कि क्यों उस इमारत को निशान बनाया गया, जहाँ अल-जजीरा समेत अन्य मीडिया समूहों के कार्यालय थे।

इजरायल डिफेंस फोर्स (@IDF) ने ट्वीट करके बताया कि हमास गाजा की ऊँची इमारतों का उपयोग इजरायल के खिलाफ संचार साधने, कमांड-कंट्रोल, हमले की प्लानिंग और खुफिया सूचनाओं को इकट्ठा करने के लिए कर रहा है और जब हमास इन इमारतों को सैन्य उपयोग में ले रहा है तो ये इमारतें निश्चित तौर पर सैन्य लक्ष्य भी बन जाती हैं।

डिफेंस फोर्स ने कहा कि इजरायल द्वारा पहले भी ऐसी इमारतों को निशान बनाया गया है लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि नागरिकों को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो। इस बार भी इजरायल की सुरक्षा सेना ने इमारत को खाली करने का संदेश पहले ही दे दिया था और चेतावनी देने के लिए ‘रूफ नॉकर’ बम गिराए जो किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं करते हैं अपितु केवल चेतावनी देते हैं।

इजरायल डिफेंस फोर्स ने यह भी बताया कि जब हमास किसी भी बिल्डिंग का उपयोग सैन्य उद्देश्यों और इजरायल के खिलाफ संसाधन रखने के लिए करेगा तो वह इमारत सुरक्षा के हिसाब से सैन्य लक्ष्य बन जाएगी। इजरायल ने जितनी भी इमारतों को नष्ट किया है, वो सभी इजरायल की सुरक्षा के लिए खतरा थीं और उनके खिलाफ कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से की गई है।

इजरायल ने ट्विटर के माध्यम से गाजा की बिल्डिंग पर किए गए हमले पर अपना उद्देश्य स्पष्ट करने के लिए यह संदेश दिया।

उत्तर प्रदेश वैक्सीनेशन में अन्य राज्यों से आगे: 17 मई से 18-44 आयु वर्ग के लिए 23 जिलों में टीकाकरण अभियान

उत्तर प्रदेश में अब कोरोना के मामलों में कमी देखी जा रही है। सरकार की तरफ से लगाए गए लॉकडाउन का असर अब साफ तौर पर देखा जा सकता है। लखनऊ में भी संक्रमित मामले पहले के मुकाबले कम हो रहे हैं। कोरोना वायरस संक्रमण में रिकॉर्ड वृद्धि के बीच कई राज्यों ने खुराक की कमी का दावा करते हुए टीकाकरण में कटौती की, मगर यूपी सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए युद्ध स्तर पर काम किया है कि टीकाकरण अभियान अधिकांश आबादी तक पहुँचे।

उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव नवनीत सहगल ने शनिवार (मई 15, 2021) को बताया, “टीकाकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। अब तक प्रदेश में 1,47,00,000 वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी है। इनमें से 1,16,00,000 लोगों को पहली डोज़ और 31,00,000 लोगों को दूसरी डोज़ दी जा चुकी है। 31,00,000 लोगों को दोनों डोज़ मिल चुकी है।”

योगी आदित्यनाथ सरकार ने कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ बचाव का बड़ा हथियार माने जा रहे टीकाकरण अभियान का दायरा बढ़ा दिया है। अब 17 मई से 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण 23 जिलों में होगा। कोविड संक्रमण पर काबू पाने के लिए राज्य सरकार सोमवार (मई 17, 2021) से प्रदेश के पाँच और जिलों में 18 से 44 वर्ष आयु वर्ग के कोरोना टीकाकरण की शुरुआत करेगी। इनमें मीरजापुर, बांदा, गोंडा, आजमगढ़ और बस्ती जिले शामिल हैं। यह वे मंडलीय मुख्यालय हैं जिनमें 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण अभी शुरू नहीं हो पाया था।

उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संक्रमित नौ जिलों में एक मई से शुरू किया गया 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों के लिए टीकाकरण प्रदेश में चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रदेश में सोमवार से कुल 23 जिलों में 18 पार वालों का कोरोना टीकाकरण होने लगेगा। अभी प्रदेश के 18 जिलों में इस आयु वर्ग के लोगों को टीके लगाए जा रहे हैं।

महाराष्ट्र, दिल्ली समेत देश के अन्य राज्यों में जहाँ वैक्सीनेशन अभियान लगभग ठप होता जा रहा है वहीं, उत्तर प्रदेश में बीमारी के खिलाफ शुरू की गई वैक्सीनेशन की प्रक्रिया हर दिन तेजी पकड़ रही है। सीएम योगी के बड़े फैसलों और लगातार किए जा रहे प्रयासों से उत्तर प्रदेश वैक्सीनेशन के मामले में देश का नम्बर वन राज्य बन गया है।

बता दें कि पिछले चौबीस घंटों में यूपी में कोरोना के 15,747 नए मामले सामने आए हैं। वहीं संक्रमण की वजह से 312 लोगों की जान चली गई। लेकिन राहत की बात ये है कि चौबीस घंटों में 26,179 मरीज कोरोना से जंग जीतकर अस्पतालों से डिस्चार्ज हो चुके हैं। इसका मतलब ये है कि नए मामलों की तुलना में सही होने वाले मरीजों का आँकड़ा सबसे ज्यादा है जो एक राहत भरी खबर है।

लखनऊ में पहले से कम हुए कोरोना के नए मामले

यूपी में फिलहाल कोरोना के 1,93,815 एक्टिव मामले हैं। वहीं अब तक 16,957 लोगों की जान जा चुकी है। 13,85,855 मरीज कोरोना से ठीक हो चुके हैं। लखनऊ में पहले के मुकाबले मामले कम देखे जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों के मुताबिक शुक्रवार (मई 14, 2021) को लखनऊ में संक्रमण के 900 नए मामले सामने आए वहीं 21 लोगों की मौत हो गई।

हिन्दू जिम्मेदारी निभाएँ, मुस्लिम पर चुप्पी दिखाएँ: एजेंडा प्रसाद जी! आपकी बौद्धिक बेईमानी राष्ट्र को बहुत महँगी पड़ती है

देश में जबसे कोरोना की दूसरी लहर तीव्र हुई है, लगभग हर राज्य ने अपनी-अपनी योजना और आवश्यकतानुसार लॉक डाउन और कर्फ्यू लगाया। बाजारों तथा धार्मिक स्थलों में लोगों के जमावड़े पर रोक लगाई गई। महाराष्ट्र सरकार चूँकि कोरोना की पहली लहर पर भी काबू नहीं पा सकी थी, इसलिए इस दिशा में सबसे पहले उसकी पहल रही।

जिन राज्यों में चुनाव हो रहे थे, उनमें हो रही चुनावी रैलियों पर विपक्ष, मीडिया या बुद्धिजीवियों ने तब तक शोर नहीं मचाया जब तक केरल, तमिलनाडु और असम में मतदान न हो गया। इन राज्यों में मतदान के बाद अचानक लोगों को याद आया कि चुनावी रैलियों से संक्रमण फैलने का खतरा था। जैसे ही यह याद आया, लोगों ने बिना समय लगाए शोर मचाना शुरू किया।  

जब यह शोर आरंभ हुआ तब पश्चिम बंगाल में चार चरणों का मतदान होना बाकी था। रैलियाँ हर राजनेता कर रहा था पर शोर ऐसा मचाया गया जैसे केवल नरेंद्र मोदी ही रैलियाँ कर रहे थे। चूँकि राज्य में तब संक्रमण तीव्र गति से नहीं फ़ैल रहा था और इसकी वजह से केवल पश्चिम बंगाल को आगे रखकर यह प्रोपेगंडा चलाना संभव नहीं था इसलिए इस बात पर जोर दिया गया कि पूरे भारत में संक्रमण के फैलाव के लिए केवल नरेंद्र मोदी की रैलियाँ ही जिम्मेदार हैं।

इसके साथ ही यह प्रोपेगेंडा भी चिपका दिया गया कि प्रधानमंत्री रैलियाँ करने के अलावा कुछ और नहीं करते। यह भी कि उन्होंने इस महामारी को रोकने की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। जब यह बातें बार-बार दोहराई जा रही थीं तब एक ही उद्देश्य था कि कैसे कोरोना से लड़ाई की बात पर केंद्र सरकार, खासकर प्रधानमंत्री मोदी को अक्षम बताया जाय।  

इसी के साथ एक माहौल बनाया गया जिसमें संक्रमण तेजी से बढ़ने के लिए हिन्दू संस्थानों, मंदिरों, त्योहारों और कुंभ को जिम्मेदार साबित करने का प्रोपगैंडा चला। अयोध्या में रामनवमी का कार्यक्रम स्थगित होने के बावजूद बार-बार यह झूठ फैलाने की कोशिश की गई कि उत्तर प्रदेश सरकार अयोध्या में कार्यक्रम स्थगित नहीं करना चाहती और यह तब तक चला जब तक सरकार की ओर से आधिकारित तौर पर खंडन नहीं किया गया।

हरिद्वार मे कुंभ के आयोजन को लेकर भी केवल उत्तराखंड सरकार को ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार को दोषी बताया गया। कुंभ आयोजन शुरू में रोका जाना चाहिए था या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है पर यह देखना भी आवश्यक था कि ऐसे विशाल आयोजनों के लिए तैयारी कितने पहले शुरू होती है और कौन से बिंदु तक आयोजन स्थगित करना संभव था।

सरकार ने कुंभ में स्नान के लिए आनेवाले श्रद्धालुओं के लिए प्रोटोकॉल निर्धारित किए पर हल्ला मचाने वाले बाज न आए और यह झूठ फैलाया गया कि प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया जा रहा। संक्रमण के लिए जमकर कुंभ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश चलती रही। 

यह व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर उत्तरदायित्व समझने वाला हिन्दू समाज और उसके संतों की सोच ही है, जिसने प्रधानमन्त्री की एक अपील पर बीच में ही कुंभ का समापन कर दिया। ऐसा होने के बाद भी मीडिया, विपक्षी नेताओं और तथाकथित बुद्धिजीवियों ने कुंभ को संक्रमण के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रोपगैंडा नहीं छोड़ा।

यहाँ प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर आदर्श आचरण का सारा भार केवल हिन्दू समाज क्यों ले? क्या इसी तरह से उत्तरदायित्व का निर्वाह और कोई समाज करता है? और यदि नहीं करता है तो क्या उस समाज की आलोचना उसी तरह होती है, जिस तरह हिन्दू समाज की होती है?

महाराष्ट्र सरकार ने जब आंशिक लॉकडाउन लगाया तब आम आदमी के बाहर निकलने से लेकर दुकानों के खोलने पर बहुत कड़ाई बरती पर यही कड़ाई कुछ और बाजारों पर लागू नहीं की जा सकी। एक महीने तक रमजान चला है। साथ मिलकर नमाज पढ़ने से लेकर बाजारों में लगने वाली भीड़ पर प्रशासनिक कार्यवाई न की जा सकी।

त्रिपुरा (वेस्ट) के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने एक विवाह समारोह में घुस कर जो आचरण किया, वैसा आचरण किसी के साथ नहीं हो। कोरोना महामारी पर अंकुश लगाने को लेकिन यह तो हो ही सकता है कि जहाँ शालीनता से लॉकडाउन के नियमों का पालन करवाया जा सके।

महाराष्ट्र के एक मस्जिद से लोगों द्वारा पुलिस अफसर को खदेड़ने का वीडियो लोगों को देखने को मिला। चार मीनार के आस-पास की भीड़ की तस्वीरें हों या पंजाब के बाज़ारों से आई तस्वीरें, देख कर हर बार यही प्रश्न उठता है कि नियमों को लेकर जब मुस्लिम समाज द्वारा व्यक्तिगत या सामूहिक आचरण की बात आती है तो फिर प्रशासन को क्या हो जाता है? तब उन्हें क्या हो जाता है जो हिन्दू त्योहारों या धार्मिक समारोहों के खिलाफ लगातार बोलने में जरा भी नहीं हिचकते? क्या हो जाता है जो महामारी के संक्रमण रोकने की जिम्मेदारी केवल हिन्दू समाज पर डालना चाहते हैं?

विषाणु जनित संक्रमण या महामारी को फैलने से रोकने के लिए यह आवश्यक है कि संक्रमण की कड़ी को तोड़ा जाए। इसके लिए देश के हर नागरिक का आचरण इस उद्देश्य के हित में हो। ऐसे में यदि एक समाज इस बात को लेकर सतर्क रहता है और दूसरा नहीं रहता तो यह कड़ी टूटेगी कैसे?

व्यक्ति या समूह पर केवल अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं होती। उसके ऊपर हर व्यक्ति या समूह के सुरक्षा की जिम्मेदारी भी होती है। तथाकथित बुद्धिजीवियों, एजेंडा वाहकों और मीडिया द्वारा बात-बात पर यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि हिन्दू समाज का आचरण विज्ञान सम्मत नहीं है पर साबित इसके ठीक उलट होता है।

मुस्लिम समाज के व्यक्तिगत और सामूहिक आचरण के विश्लेषण की बात पर इन विशेषज्ञों की जुबान को लकवा मार जाता है। इस समाज का यह आचरण की जड़ इसी पोलिटिकल करेक्टनेस में है। इनके पास कुछ कहने के लिए नहीं रहता तो वे अपना तर्क इस बात पर खत्म करते हैं कि; हिन्दू समाज अपनी जिम्मेदारी निभाए और मुस्लिम समाज के आचरण या उस आचरण को लेकर प्रशासनिक चुप्पी पर कुछ न बोलें। 

ऐसे लोगों से एक ही बात कहनी है; एजेंडा प्रसाद जी, आपकी यह बौद्धिक बेईमानी राष्ट्र को बहुत महँगी पड़ती है।

CM योगी ने मुस्लिम बहुल मलेरकोटला को जिला बनाने की घोषणा पर लताड़ा, कहा- कॉन्ग्रेस अपना रही विभाजनकारी नीति

शुक्रवार (14 मई) को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने घोषणा की कि मलेरकोटला को पंजाब का 23वाँ जिला बनाया जाएगा। पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मुस्लिम बहुल क्षेत्र को अलग जिला बनाए जाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंजाब सरकार की आलोचना की और कहा कि मलेरकोटला का गठन किया जाना कॉन्ग्रेस की विभाजनकारी नीति का परिचायक है।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने ट्वीट करके कहा कि मत और मजहब के आधार पर किसी भी प्रकार का विभेद भारत के संविधान की मूल भावना के विपरीत है और साथ ही यह भी कहा कि मलेरकोटला का गठन कॉन्ग्रेस की विभाजनकारी नीति का परिचायक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान तब आया जब पंजाब सरकार द्वारा ईद के दिन एक मुस्लिम बहुल इलाके को नया जिला बनाने की घोषणा की गई।

मुस्लिम बहुल कस्बा मलेरकोटला अब तक संगरूर जिले का हिस्सा था। यह संगरूर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नए जिले की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा कि मैं जानता हूँ कि यह लंबे समय से लंबित माँग रही है। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के वक्त पंजाब में 13 जिले थे। सिंह ने कहा कि मलेरकोटला शहर, अमरगढ़ और अहमदगढ़ नए जिले की सीमा में आएँगे। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करके कहा था कि ईद-उल-फ़ितर के मौके यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि मलेरकोटला पंजाब का एक नया जिला बनाया जाएगा। यह पंजाब का 23वाँ जिला होगा।

वर्चुअल कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएम ने कहा था कि उनकी ईद के मौके पर मलेरकोटला में आने की बहुत इच्छा थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण वह आ नहीं सके। उन्होंने कहा था कि मलेरकोटला पटियाला रियासत का हिस्सा रहा है और उनके बुज़ुर्गों के मलेरकोटला के नवाब के साथ बहुत अच्छे संबंध रहे हैं। उन्होंने मलेरकोटला के विकास के लिए 6 करोड़ रुपए का अनुदान देने की भी घोषणा की थी।