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कन्या भोज कर मंदिर से लौट रही थीं 2 बहनें, रफीक खान ने 8 और 11 साल की दोनों बच्चियों का किया रेप

नवरात्र में हिंदू माता रानी की जयकार करते हैं। लोग कन्याओं का पूजन कर माता से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसी बीच मध्य प्रदेश के छतरपुर में कन्या भोज के लिए मंदिर गई दो बहनों के साथ बलात्कार करने का मामला सामने आया है। आरोपित मुस्लिम समुदाय का है। यह घटना छतरपुर जिले के प्रकाश बमोरी थाना क्षेत्र की है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर मामले की जाँच शुरू कर दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 8 साल और 11 साल की दो बहनें कन्याभोज के लिए मंदिर गई हुई थीं। मंदिर से वापस लौटते वक्त रफीक खान ने इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया। घटना के बाद से स्थानीय लोगों में काफी गुस्सा है।

वहीं घटना की जानकारी मिलते ही छतरपुर एसपी सचिन शर्मा मौके पर पहुँचे। एसडीओपी शशांक जैन ने मामले में जानकारी देते हुए बताया कि फिलहाल आरोपित को राउंडअप कर लिया गया है। पुलिस को डर है कि घटना के चलते माहौल खराब न हो जाए।

गौरतलब है कि यह वीभत्स घटना पहली नहीं है। इससे पहले भी रेप और गैंगरेप के कई मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया है।

हाल ही में महाराष्ट्र के लातूर में 7 साल की मासूम बच्ची से कथित तौर पर दुष्कर्म करने के मामले में एक मुस्लिम शख्स को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने रविवार (11 अप्रैल 2021) को इसकी जानकारी दी थी। एक अधिकारी ने बताया कि 6 अप्रैल को अकरम पठान (26 साल) नाम के एक मुस्लिम शख्स ने निलांगा तहसील के शेडोल में स्थित एक दरगाह में इस शर्मनाक घटना को अंजाम दिया था।

‘उस किताब का नाम ले सकते हो जो असल में वायरस है’: जानें कैसे कॉन्ग्रेस के ‘वैक्सीन’ मीम्स ने किया उसका ही छीछालेदर

कोरोना काल में सोशल मीडिया पर मीम का कारोबार बहुत तेजी से बढ़ा है। कुछ लोगों ने अपनी सृजनात्मकता दिखाने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया तो कुछ ने अपनी कुंठा निकालने के लिए। लेकिन इस बीच कुछ ऐसे भी धूर्त दिखे जिन्होंने अपनी वाहवाही के लिए बिना सोच समझे मीम को सहारा बनाया। कॉन्ग्रेस, उसी सूची में शामिल नामों में से एक है।

अभी हाल में कर्नाटक कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल से कुछ ट्वीट किए गए। इसमें एक तरफ वायरस और दूसरी तरफ वैक्सीन दिखा कर पार्टी ने अपनी हिंदूविरोधी, भाजपा विरोधी, आरएसएस विरोधी मानसिकता का खूब प्रदर्शन किया। मगर, ट्रेंड फॉलो करने के चक्कर में पार्टी भूल गई कि जिन मीम को वो शेयर कर रहे हैं उनका कोई अर्थ है भी या नहीं।

उदाहरण के तौर पर सबसे पहले एक ट्वीट देखिए। इसमें कॉन्ग्रेस ने बताना चाहा कि इस देश के लिए सबसे बड़ा वायरस भगवा रंग का RSS है और इसकी वैक्सीन उनकी पार्टी यानी कॉन्ग्रेस है। अब तर्कों पर बात करें, तो ये सब जानते हैं कि कोई भी वैक्सीन किसी वायरस के बाद आती है लेकिन कॉन्ग्रेसियों को इस लॉजिक से क्या? शायद उन्हें यही नहीं मालूम कि आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी, जबकि कॉन्ग्रेस 1885 से अस्तित्व में है।

इस मूर्खता के लिए कई सोशल मीडिया यूजर्स ने कॉन्ग्रेस को लताड़ा है। कर्नाटक की भाजपा अध्यक्ष ने तथ्य बताते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस 1885 में आई और आरएसस 1925 में। आज भी कॉन्ग्रेस को साफ करने के लिए आरएसएस प्रयास ही कर रही है। मगर कुछ संक्रमण ऐसे होते जिन्हें हटाना मुश्किल हैं लेकिन यदि उनका सफाया नहीं हुआ तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा।

इसके बाद एक अन्य ट्वीट इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दिखाया गया है। नरेंद्र मोदी पर वायरस लिखा है और मनमोहन सिंह पर वैक्सीन। यहाँ ज्ञात हो कि मनमोहन सरकार के 10 साल के कार्यकाल के बाद मोदी सरकार सत्ता में आई। ऐसे में कॉन्ग्रेस के मीम के क्या अर्थ हैं? क्या कभी ऐसा हुआ है कि वैक्सीन के होते हुए वायरस आए। नहीं, क्योंकि वैक्सीन, वायरस के लक्षण देखने के बाद उसी आधार पर निर्मित होती है। यूजर्स ने इस ट्वीट पर भी कॉन्ग्रेस का खूब मजाक उड़ाया है। लोगों ने पूछा है कि वैक्सीन इतनी कमजोर थी क्या कि वायरस दोबारा आ गया।

बता दें कि इन दोनों ट्वीट में जहाँ एक पार्टी और विचारधार के प्रति कॉन्ग्रेस ने अपनी कुंठा निकाली है और खुद को सर्वेसर्वा दिखाया है वहीं इनके द्वारा किया एक ऐसा भी ट्वीट है जिसमें पार्टी ने संविधान को वैक्सीन बताकर हिंदुओं के प्रति नफरत जाहिर की है।

ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने मनुस्मृति को वायरस कहा, जिसे बाद में भाजपा कर्नाटक ने भी अपने हैंडल से शेयर किया। इसमें पूछा गया है कि क्या कॉन्ग्रेस में इतना दम है कि वह उस किताब का नाम ले सके जो असल में वायरस है। आखिर डरपोक कॉन्ग्रेस ने यह ट्वीट डिलीट क्यों किया है। 

नरसिंहानंद और वसीम रिजवी का ‘सिर तन से जुदा’ करने वाले पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ FIR, AIMIM के लोगों की तलाश

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में 12 अप्रैल, 2021 को असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (AIMIM) ने डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती और शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी के खिलाफ ‘सिर तन से जुदा’ का पोस्टर लगाया था। ऑपइंडिया ने इस घटना की विस्तार से रिपोर्ट की थी।

कानपुर नगर की पुलिस ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए आज (16 अप्रैल) ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पुलिस ने बताया कि 12 अप्रैल 2021 को कानपुर में एक आपत्तिजनक व धार्मिक रूप से भड़काऊ पोस्टर को लगाए जाने के संबंध में उपद्रवियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। उन्होंने आगे कहा कि आईपीसी की धारा 153 ए और 295 ए के तहत मामला दर्ज किया गया है और पुलिस आरोपितों की तलाश कर रही है। कानपुर पुलिस ने आश्वस्त किया कि आरोपितों की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं। गिरफ्त में आते ही उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी और डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ AIMIM की तरफ से पोस्टर लगाए गए थे। पोस्टर में दोनों के सिर कलम करते हुए दिखाया गया था। पोस्टर पर लिखा गया था- एक ही सजा, सिर तन से जुदा। धार्मिक रूप से भड़काऊ पोस्टर के अलावा एक अन्य पोस्टर भी कानपुर में देखा गया। इसमें सबसे ऊपर AIMIM कानपुर लिखा है और नीचे एक बच्चा और कुत्ता, रिजवी और नरसिंहानंद के मुँह में पेशाब करते दिखाए गए हैं। हालाँकि, इससे पहले भी कानपुर पुलिस ने सोशल मीडिया पर यह कहते हुए प्रतिक्रिया दी थी कि पोस्टर हटा दिए गए हैं और मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

ज्ञात हो कि 9 अप्रैल को मध्य प्रदेश के बालाघाट में पुलिस ने मुस्लिम समुदाय के 4 लोगों को यति नरसिंहानंद के पोस्टर लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। इनकी पहचान मातिन अजहरी, शोएब खान, कासिम खान और रजा खान के तौर पर हुई थी। गिरफ्तारी का विरोध करते हुए AIMIM के जिला प्रभारी नाजिम खान ने कहा था, “पूरे मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, हमारे समुदाय के चार सदस्यों को उनका पोस्टर लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है।”

मालूम हो कि प्रेस क्लब में यति नरसिंहानंद पैगंबर मुहम्मद पर विवादित बयान के बाद से कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए हैं। 9 अप्रैल को बरेली के इस्लामिया ग्राउंड में मुस्लिमों ने इकट्ठा होकर उनके खिलाफ ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाए थे।

AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी भी यति नरसिंहानंद पर कथित तौर पर पैगंबर की तौहीन करने को लेकर गुस्सा जाहिर कर चुके हैं। ट्विटर पर ओवैसी ने लिखा था कि पैगंबर का अपमान बिलकुल बर्दाश्त नहीं है। उन्होंने पूछा था, “क्‍या धर्मगुरुओं के वेश में छिपे ये अपराधी इस्‍लाम से अपना अप्राकृतिक जुड़ाव खत्‍म कर सकते हैं? आप जो चीज पसंद नहीं करते, उस पर इतना समय क्‍यों खपाते हैं। मुझे यकीन है कि आपके अपने धर्म में भी काफी कुछ होगा जिस पर चर्चा हो सकती है।”

वहीं, इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा यति नरसिंहानंद सरस्वती की हत्या करने के पोस्टर लगाने के बाद से हिंदुओं में व्यापक आक्रोश है। देश के विभिन्न कोनों से आए हिंदू महंत के समर्थन में आवाज बुलंद करने लगे हैं।

CPI(M) ने TMC के लोगों को मारा पर वो BJP से अच्छे: डैमेज कंट्रोल करने आए डेरेक ने किया बेड़ा गर्क

राजनीति दलों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, ज़िलाध्यक्ष, सचिव, महासचिव, प्रदेश सचिव, प्रदेश प्रभारी, उप प्रभारी जैसे पद तो होते हैं पर कुछ अति महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए पद नहीं होते। तमाम दलों के नेताओं द्वारा समय-समय पर डैमेजर की भूमिका अदा करने की वजह से मुझे हमेशा यह लगता है कि हर दल के पास चीफ़ डैमेज कंट्रोलर, डेप्युटी डैमेज कंट्रोलर, रेज़िडेंट डैमेज कंट्रोलर, अकेज़नल डैमेज कंट्रोलर जैसे पद भी होने चाहिए। ऐसे पद रहने से दल के समर्थक, कार्यकर्ता और कैडरगण के लिए चिंता के कारण कम रहेंगे।

ऐसा हो जाए तो कम्यूनिकेशन चैनल बहुत कुछ पारदर्शी हो जाएगा। जैसे किसी नेता के बयान या किसी ख़ास ग्रुप के लोगों के लिए गाली वग़ैरह दिए जाने की वजह से डैमेज कितना गंभीर है इसका अंदाज़ा इस बात से लग जाएगा कि उसे कंट्रोल करने के लिए किसे आगे किया गया है। जैसे अगर चीफ़ डैमेज कंट्रोलर को आगे किया जाए तो लोग समझ जाएँगे कि डैमेज राष्ट्रीय स्तर का है और डेप्युटी डैमेज कंट्रोलर को आगे किया जाएगा तो पता चल जाएगा कि डैमेज प्रदेश स्तर का है।

जब तक राजनीतिक दल ऐसे पद नहीं बनाते तब तक उन्हें अनाधिकारिक डैमेज कंट्रोलर से काम चलाना पड़ रहा है। तृणमूल कॉन्ग्रेस को ही ले लीजिए। प्रशांत किशोर ने जब से क्लब हाउस में पार्टी के लिए महा डैमेज जैसा कुछ किया है, उसे कंट्रोल करने की कोशिशें लगातार हो रही हैं। अनअफ़िशियल डैमेज कंट्रोलर की अपनी भूमिका में यशवंत सिन्हा ट्विटर पर ओवरटाइम कर रहे हैं। अब ट्विटर पुराना प्लैटफॉर्म है तो सिन्हा जी की बातें सुनने के लिए वहाँ ट्विटर के पुराने चावल हैं जो अधिकतर उनकी बात पर उन्हें ट्रोल कर जाते हैं।

वैसे भी चूँकि प्रशांत किशोर ने डैमेज का यह बुलडोजर क्लब हाउस पर चलाया था तो कम्यूनिकेशन नीति के अनुसार उससे पैदा हुए मलवे को समेटने का काम ट्विटर पर करने का कोई औचित्य नहीं है। शायद इसलिए डेरेक ओ’ ब्रायन कल रात क्लब हाउस पर आए। उन्होंने प्रशांत किशोर द्वारा की गई बातों पर ठंडा पानी उड़ेलने की हर संभव कोशिश की। सब वही बातें कही जो क्लब हाउस के बाहर अधिकतर परंपरागत मीडिया के सामने कहते रहे हैं।

पर राजनीति में कम्यूनिकेशन का तक़ाज़ा है कि सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर आया नेता कुछ तो अलग कहेगा। कारण यह है कि सोशल मीडिया पर एक ही जगह कई लोग एक साथ प्रश्न पूछते हैं। नेता बेचारा करे भी तो क्या करे? प्रश्नों के तीर को मैच करने के लिए डेरेक को भी जल्दी-जल्दी तीर चलाने पड़े। ऐसे में उन्होंने ऐसी बातें कहीं जो उनके विवेक, समझ और मायूसी को दर्शाती हैं।

लोगों से बात करते हुए डेरेक ने महत्वपूर्ण राज खोला। बोले; कांग्रेस पार्टी ने कभी भी संविधान की अवमानना नहीं की। वे आगे बोले; सीपीआइ (एम) ने पहले भले ही तृणमूल कॉन्ग्रेस के कैडर को मारा हो पर वो किसी भी दिन बीजेपी से अच्छा विपक्ष है।

वहाँ उपस्थित एक मेम्बर ने उनकी इस बात पर कहा; उनकी बात सुनकर इच्छा हुई कि इक्स्क्यूज़ मी कहकर रूम से बाहर जाकर हँस आऊँ। माने एक एमपी द्वारा यह कहना कि कॉन्ग्रेस ने संविधान की अवमानना कभी नहीं की, वैसे ही है जैसे कोई पाकिस्तानी जनरल कहे कि पाकिस्तानी आर्मी ने देश में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।

वैसे डेरेक की इन बातों से लगा जैसे उन्होंने चुनाव नतीजों के बाद की संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रख कर यह बात कही हो। शायद तृणमूल कॉन्ग्रेस ऐसा कुछ नहीं कहता चाहती, जिससे उसे आवश्यकता पड़ने पर कॉन्ग्रेस या वाम दलों के पास जाने में असुविधा हो। वैसे भी प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक मंचों पर विधानसभा चुनाव की जो तस्वीर बनाई है उसे देखते हुए डेरेक का यह बयान राजनीतिक व्यावहारिकता के अनुसार उनके अपने दल के पक्ष में ही है।

पर यहाँ डेरेक ने एक और महत्वपूर्ण बयान दिया। ऐसा बयान जो उनके दल की वर्तमान हालत की असली कहानी कहता है। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा; हमारा फ़ोकस आज मोदी और शाह को हटाना है। बीजेपी के साथ फिर कभी लड़ लेंगे।

लड़ाई तो आज है तो आज लड़ना होगा न? फिर कभी जो लड़ाई होगी वो दूसरी होगी। यह बयान क्या वर्तमान लड़ाई में तृणमूल की स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहता? और अगर कहता है तो क्या कहता है? शायद यही कि दल ठोस ज़मीन पर नहीं है।

कोरोना फैलने की स्थिति में क्या आगे के चार चरणों के लिए चुनाव प्रचार बंद कर देना चाहिए? इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा; यदि चुनाव आयोग ऐसा करता है तो फ़ायदा बीजेपी को ही होगा क्योंकि बीजेपी के पास मज़बूत डिजिटल मीडिया प्रचार के साधन हैं और इसका लाभ उसे मिलेगा। चुनाव प्रचार को लेकर डेरेक ने जो कहा उससे इस चर्चा को विराम मिलेगा, जिसमें लोग चुनाव प्रचार के लिए रैलियों पर रोक की बात कर रहे हैं।

डेरेक के ये बयान महत्वपूर्ण तो हैं ही पर इस समय होने वाले चुनाव में उनके दल की स्थिति पर काफ़ी कुछ कहते भी हैं। पता नहीं जिस उद्देश्य से वे क्लब हाउस पर आए थे वह प्राप्त कर सके या नहीं पर यह अवश्य है कि कई मामलों में वे प्रशांत किशोर द्वारा कही गई बातों पर स्टैम्प लगाते हुए ही दिखे। अब देखना यह है कि डेरेक ओ’ब्रायन द्वारा किए गए इस डैमेज कंट्रोल को फ़ाइनल मान लिया जाएगा या किसी सीनियर डैमेज कंट्रोलर को आगे किया जाएगा?

‘सोना तस्करी केस में ED ने जबरन घसीटा CM विजयन का नाम, स्वप्ना को किया मजबूर’: HC ने केरल पुलिस की FIR को रद्द किया

केरल सोना तस्करी मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। केरल हाईकोर्ट ने ED अधिकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR को रद्द कर दिया। इस FIR में दावा किया गया था कि इन अधिकारियों ने आरोपितों को मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का नाम लेने के लिए मजबूर किया। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस को इसके लिए PMLA कोर्ट जाना चाहिए था, जो इस मामले की सुनवाई कर रही है।

केरल सोना तस्करी केस में रुपयों के लेनदेन के तार कहाँ-कहाँ गए हैं, इसकी जाँच चल रही है। पुलिस ने आरोप लगाया है कि ED के अधिकारियों ने सबूत के साथ छेड़छाड़ की है। हाईकोर्ट ने इस मामले की जाँच कर रहे अधिकारी से कहा कि वो अब तक जुटाई गई सारी जानकारियों को PMLA कोर्ट के समक्ष सीलबंद लिफ़ाफ़े में पेश करें। दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस AG अरुण ने फैसला सुनाया।

कोच्चि जोन के ED के डिप्टी डायरेक्टर पी राधाकृष्णन ने ये याचिकाएँ दाखिल की थी, जिनमें उन्होंने क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज दो FIR को चुनौती दी थी। इसके लिए एक ऑडियो को आधार बनाया गया था, जिसमें मुख्य आरोपित स्वप्ना सुरेश कह रही हैं कि उन्हें पिनराई विजयन का नाम लेने के लिए मजबूर किया गया। साथ ही इस मामले के सह-आरोपित संदीप नायर द्वारा लिखे गए एक पत्र के आधार पर भी ये आरोप लगाए गए।

ED के अनुसार, ये FIR इस परोक्ष मंशा के साथ दर्ज किए गए थे ताकि इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जो वैधानिक जाँच चलाई जा रही है, उसे पटरी से उतारा जा सके। ED का कहना है कि बड़ी मात्रा में सोना की तस्करी की गई है और इसमें बड़ी धनराशि का पता लगा है। ED ने कहा कि इसमें बड़े नाम शामिल हैं, इसीलिए इस मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए CBI को मामला सौंपा गया था।

साथ ही एजेंसी ने ये भी कहा कि पुलिस ने शुरुआत में जो जाँच की थी, उसमें भी कई त्रुटियाँ हैं। क्राइम ब्रांच ने मार्च 17 को लीक हुए कथित ऑडियो क्लिप के आधार पर आरोप लगाए थे। FIR में कहा गया कि अक्टूबर 2020 में पूछताछ के दौरान स्वप्ना सुरेश पर दबाव बनाया गया था। UAE काउंसलेट में काम करने वाली स्वप्ना सुरेश इस मामले में मुख्य आरोपित हैं। ये मामले 14.82 करोड़ रुपए के 30 किलो सोने के तस्करी से जुड़ा है।

पुलिस ने अपने FIR में IPC की धारा 120B (आपराधिक धमकी), 167 (किसी को नुकसान पहुँचाने की मंशा से किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा छेड़छाड़ किए गए दस्तावेज पेश करना), 192 (गलत सबूत पेश करना) और 195A (गलत सबूत देने के लिए किसी पर दबाव बनाना) के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में ED अधिकारियों के साथ रहीं 2 महिला पुलिसकर्मियों के बयान भी पुलिस ने अपने पक्ष में लिए थे।

स्वप्ना सुरेश ने बताया था कि मुख्यमंत्री महावाणिज्य दूत (Consulate General) के सीधे संपर्क में थे। उनके अलावा उनकी सरकार के तीन और कैबिनेट मंत्री इस डॉलर की तस्करी के मामले में शामिल थे। सीएम को इस बात की भी जानकारी थी कि स्वप्ना को राज्य की सरकारी एजेंसी स्पेस पार्क ने हायर किया है। उन्होंने स्वप्ना से ‘अनौपचारिक’ रूप से संपर्क बनाए रखने के लिए कहा था। इन आरोपों को गलत बताते हुए विजयन ने पीएम मोदी को पत्र भी लिखा था।

योगी सरकार का बड़ा फैसला: कोरोना के मद्देनजर उद्योगों को मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति पर लगाई तत्काल रोक

उत्तर प्रदेश में कोरोना की बेकाबू रफ्तार पर काबू पाने के लिए योगी सरकार ने शुक्रवार को अहम फैसला लिया। बताया जा रहा है कि योगी सरकार ने कोरोना संक्रमण में ऑक्सीजन की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए उद्योगों को मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति पर 15 मई तक रोक लगा दी है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन आयुक्त अनीता सिंह ने गुरुवार को इस संबंध आदेश जारी कर किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबि​क, अनीता सिंह ने कहा कि कोरोना संक्रमण बढ़ने के कारण प्रदेश में ऑक्सीजन की माँग तेजी से बढ़ी है। आदेश में कहा गया है कि अस्पतालों में ऑक्सीजन की माँग एवं आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए उद्योगों को मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति पर तत्काल प्रभाव से रोकने की आवश्यकता है। ताकि कोविड मरीजों के लिए ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादकों अथवा रिफिलकर्ताओं के प्लांट में उत्पादित या रिफिल किया ऑक्सीजन केवल मेडिकल अथवा अस्पतालों के लिए होगा।

आदेश में यह भी कहा गया है कि प्रदेश में ऑक्सीजन के सभी निर्माता फर्मों, रिफिलर तथा आपूर्तिकर्ताओं द्वारा ऑक्सीजन की आपूर्ति रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय (औषध विभाग) (राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण) के गजट नोटिफिकेशन संख्या काआ 3322 (अ) सितम्बर 2020 के बीते 25 मार्च को जारी आदेश के तहत निर्धारित अधिकतम मूल्य से अधिक मूल्य पर विक्रय नहीं किया जाएगा।

बता दें कि यूपी में गुरुवार को बीते 24 घंटे में 22,439 कोरोना पॉजिटिव मामले सामने आए और 104 लोगों की मौत हुई थी। सबसे अधिक लखनऊ में कोरोना के 5,183 नए मामले सामने आए, जबकि 26 लोगों की मौत हुई थी। यह प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा आँकड़ा है।

ईसाई मिशनरियों ने बोया घृणा का बीज, 500+ की भीड़ ने 2 साधुओं की ली जान: 181 आरोपितों को मिल चुकी है जमानत

पूरे देश में भला कौन ऐसा भलमानुष नहीं होगा, जिसका हृदय पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा हत्या के बाद व्यथित न हुआ हो। इसे ईसाई मिशनरी का दुष्प्रचार कहिए, महाराष्ट्र पुलिस का निकम्मेपन या फिर हिन्दुओं के खिलाफ चल रहे व्यापक षड्यंत्र का नतीजा, इसकी कीमत उन साधुओं और उनके साथ जा रहे एक ड्राइवर को चुकानी पड़ी। शुक्रवार (अप्रैल 16, 2021) को इस दुःखद हत्याकांड के 1 साल पूरे हो गए।

घटना कुछ यूँ है कि कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70) और सुशील गिरी महाराज (35) अपने ड्राइवर नीलेश तलगाडे (30) के साथ पालघर के गढ़चिंचले गाँव से गुजर रहे थे, तभी लगभग 500 की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। ये इलाका दहानु तहसील में पड़ता है। नासिक के रहने वाले ये दोनों साधु श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा से सम्बन्ध रखते थे, जिसका मुख्यालय वाराणसी में है। ये साधुओं के सबसे बड़े अखाड़ों में से एक है।

अब थोड़ा इस घटना का बैकग्राउंड समझ लेते हैं। इसके कुछ दिनों पहले ही गाँव में अफवाह फैली थी कि आसपास कुछ मानव तस्कर घूम रहे हैं, जो किडनियों की चोरी और खरीद-बेच का कारोबार करते हैं, खासकर वो बच्चों की किडनियों को ब्लैक मार्किट में बेच देते हैं। इसके बाद ग्रामीण रात को भी चौकन्ने रहने लगे। साधुओं और उनके ड्राइवर को अपहरणकर्ता समझ कर हमला किया गया। ये घटना कासा पुलिस थाने के अंतर्गत हुई।

सबसे बड़ी बात तो ये कि वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों के सामने ये सामूहिक हत्याकांड हुआ लेकिन उन्होंने भीड़ से इन निर्दोष साधुओं को बचाने का प्रयास तक नहीं किया, उलटा उन्हें भीड़ को सौंप दिया। यहाँ सवाल उठता है कि क्या एक अफवाह की आड़ में जानबूझ कर हिन्दू साधुओं को निशाना बनाया गया? वहाँ ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों और नक्सली हरकतों को देख कर लगता है कि भगवाधारियों के प्रति घृणा पहले से पल रही थी।

एक पूर्व जज के नेतृत्व में घटना की पड़ताल करने गई स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी ने भी यही पाया। तब महाराष्ट्र ‘महा विकास अघाड़ी (MVA)’ सरकार को सत्ता में आए 4 महीने से कुछ ही ज्यादा दिन हुए थे। उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना ने वैचारिक रूप से हमेशा अपने विपरीत रहे कॉन्ग्रेस-NCP को न सिर्फ अपना साथी बनाया, बल्कि अब भी उनकी मदद से सरकार चला रहे थे। चुनाव बाद शिवसेना ने भाजपा को धोखा दिया था।

हिंदूवादी होने का दम भरने वाली एक पार्टी के सत्ता में रहते ये सब हुआ तो उससे सवाल भी पूछे गए। ये घटना ऐसे समय में हुई, जब देश भर में लॉकडाउन लगा हुआ था और महाराष्ट्र में तो कोरोना की स्थिति शुरू से ही बदतर रही है। जहाँ 5 लोगों से ज्यादा के जुटने पर पाबंदी थी, घर से बिना काम निकलने पर प्रतिबंध था, वहाँ 500 की हत्यारी भीड़ कैसे खुलेआम निकल गई? हमेशा की तरफ उद्धव सरकार डैमेज कंट्रोल में लगी रही।

गाँव की जनसंख्या के आँकड़ों को भी समझिए। 2011 की जनगणना के हिसाब से इस गाँव में 1300 लोग रहते हैं, जिनमें से 93% SC/ST समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। ये गाँव महाराष्ट्र और केंद्र शासित प्रदेश दादर एवं नगर हवेली की सीमा पर स्थित है। और वो साधु बिना काम के नहीं घूम रहे थे। उनके गुरु महंत श्रीराम गिरी का निधन हो गया था। ये दो लोग अपने ड्राइवर के साथ उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने जा रहे थे।

इस मामले की जाँच CID को दी गई थी। कुल 251 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें 13 नाबालिग भी थे। अभी इनमें से मात्र 70 ही हिरासत में हैं और बाकी किसी तरह जमानत लेने में कामयाब रहे हैं। चार्जशीट दायर हो चुकी है और सुनवाई चल रही है। आरोपितों के खिलाफ वरिष्ठ वकील सतीश मानशिंदे पब्लिक प्रोसिक्यूटर हैं, जबकि आरोपितों ने अमृत अधिकार और अतुल पाटिल को अपना वकील बनाया है।

आनन-फानन में उस समय इलाके के कई पुलिस अधिकारियों का ट्रांसफर हुआ था और कइयों को हटाया गया था, लेकिन न्याय की उम्मीद अभी भी धूमिल ही नजर आ रही है। राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख 100 करोड़ की वसूली के मामले में CBI की पूछताछ का सामना कर रहे हैं। वो पद से इस्तीफा दे चुके हैं। पालघर का उबाल अभी ठंडा नहीं हुआ है। दलितों और नाबालिगों को हथियार बनाने वाले लोग कौन थे, उनका नाम अब तक सामने नहीं आया है।

लेकिन, लोगों को नहीं भूलना चाहिए कि अनिल देशमुख ने किस तरह से तब आरोपितों के नामों की सूची सोशल मीडिया पर शेयर करके दावा किया था कि इस घटना के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन आरोपितों में एक भी मुस्लिम नहीं हैं। इस घटना के पीछे अफवाह होने की बात तो कही गई, लेकिन इसका निशाना हमेशा भगवाधारी ही क्यों बने? इलाके में ऐसी और भी घटनाएँ हुईं।

नांदेड़ में मई 2020 में शिवाचार्य नामक साधु को मार डाला गया। मई 2020 के अंत में मंदिर लूटे जाने और पुजारियों पर हमले की घटना हुई। वसाई तालुका के बलिवाली में कुछ हथियारबंद लोग घुस गए और जागृत महादेव मंदिर को लूट लिया। मंदिर के महंत शंकरानंद सरस्वती और उनके अनुयायी पर हमले हुए। क्या किसी क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं के बार-बार दोहराए जाने के पीछे हिन्दू धर्म के प्रति घृणा नहीं माना जा सकता?

पालघर में ईसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दू धर्म व देवी-देवताओं का अपमान किए जाने का पुराना इतिहास रहा है। इसी तरह की एक घटना के दौरान कुछ हिन्दुओं ने मिशनरियों को घेर कर उनसे आपत्ति भी जताई थी। हनुमान जी को ‘बंदर’ और भगवान गणेश को ‘हाथी’ कहा गया था। ईसाई धर्मांतरण के लिए प्रलोभन देने हेतु मिशनरियों ने एक कार्यक्रम में ऐसा किया था। इससे कुछ दिन पहले मुंबई के विरार में छात्रों को जबरन ईसाई बनाए जाने की बात सामने आई थी।

घृणा का बीज पहले से अंकुरित हो रहा था। लेकिन, इस मामले में लिबरल गिरोह और मीडिया ने सरकार से सवाल पूछना तो दूर की बात, न्याय के लिए एक माँग तक न उठाई और न ही इस हत्याकांड की निंदा की। तबरेज अंसारी की मौत पर जिस तरह साल भर नैरेटिव चलाया गया था, वैसा कुछ नहीं हुआ। मरने वाले मुस्लिम हो तो उसके गुनाह छिपा लिए जाते हैं और कारण कुछ और हो फिर भी बदनाम हिन्दुओं को ही किया जाता है।

वकील, रिटायर्ड जज, पत्रकार, एक्टिविस्ट और रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों की स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी ने कहा था कि वहाँ उपस्थित पुलिसकर्मी अगर चाहते तो इस हत्याकांड को रोक सकते थे लेकिन उन्होंने हिंसा की साजिश में शामिल होने का रास्ता चुना। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, झारखण्ड में पत्थलगड़ी की तर्ज पर ही पालघर में भी आंदोलन चल रहा है। आदिवासियों को वामपंथी भड़का रहे हैं कि वो क़ानून, सरकार और संविधान का सम्मान न करें।

पाकिस्तान में Facebook, Twitter, WhatsApp सब बंद: सोशल मीडिया पर अस्थाई प्रतिबंध, गृहयुद्ध की ओर बढ़ता देश!

पाकिस्तान ने बड़ा कदम उठाते हुए Facebook, Twitter, Tiktok, WhatsApp और YouTube पर शुक्रवार को 11 से 3 बजे तक के लिए अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया है। शाम 4 बजे से ये सेवाएँ फिर से पहले की ही तरह काम करना शुरू कर देंगी।

सरकार ने यह फैसला देश में आंतरिक कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए लिया है। इमरान सरकार ने यह कदम तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने के एक दिन बाद उठाया है। इतना ही नहीं पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी (पीईएमआरए) ने सभी टीवी चैनलों को प्रतिबंधित संगठन के किसी भी कवरेज से रोक दिया है।

सुरक्षाबलों को आशंका है कि टीएलपी शुक्रवार की नमाज के बाद देश भर में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन कर सकता है।

आंतरिक मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना में कहा है कि सरकार के पास पुख्ता सबूत है कि टीएलपी “आतंकवाद में लिप्त है और पूर्वाग्रह तरीके से काम करती है व देश की शांति और सुरक्षा के लिए चुनौती है”। यह भी कहा गया है कि इस संगठन ने जनता को डराया, धमकाया लोगों को चोटें पहुँचाई और कानूनी एजेंसियों से जुड़े लोगों की हत्या भी किए हैं।

टीएलपी पर आतंकवाद विरोधी अधिनियम, 1997 की धारा 11 बी (1) के तहत मुकदमा चलाया गया है। इस एक्ट के तहत सरकार आतंकवाद में शामिल संगठनों पर प्रतिबंध लगा सकती है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री शेख रशीद ने बुधवार को टीएलपी पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था। इसके बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी उनके इस आदेश का अनुमोदन किया। इसके मुताबिक, धार्मिक समूह द्वारा किए गए हिंसक प्रदर्शनों में दो पुलिस अधिकारी मारे गए थे और सुरक्षाबलों के 30 वाहन भी क्षतिग्रस्त हो गए थे।

टीएलपी कार्यकर्ताओं के सड़कों पर उतरने के बाद 12 अप्रैल को पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में विरोध प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारी संगठन के मुखिया साद की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। साद की गिरफ्तारी के बाद उसके समर्थकों ने कई शहरों की सड़कों को जाम कर दिया था। हालाँकि, सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर कर दिया है।

इस मामले में अब तक कम से कम 115 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं और 2,063 कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए हैं। पंजाब में 1669 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है, सिंध में 228, खैबर पख्तूनख्वा में 193, और इस्लामाबाद में 43 आंदोलकारियों को गिरफ्तार किया गया है।

जहाँ इस्लाम का जन्म हुआ, उस सऊदी अरब में पढ़ाया जा रहा है रामायण-महाभारत

इस्लामिक राष्ट्र सऊदी अरब ने बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच खुद को उसमें ढालना शुरू कर दिया है। मुस्लिम देश ने शैक्षणिक क्षेत्र के लिए नया “विजन-2030” लॉन्च किया है, जिसमें वहाँ सांस्कृतिक पाठ्यक्रमों के तहत विद्यार्थियों को दूसरे देशों के इतिहास और संस्कृति को भी पढ़ाया जा रहा है।

इसमें रामायण, महाभारत को भी पाठ्यक्रमों के तौर पर शामिल किया गया है। ताकि वैश्विक विकास की प्रतिस्पर्धा में सऊदी खुद को खड़ा रख सके। सऊदी के “विजन-2030” के मुताबिक, अंग्रेजी भाषा को जरूरी भाषा के तौर पर शामिल किया जाएगा, क्योंकि यह संचार का अच्छा माध्यम माना गया है।

सऊदी के विजन को नऊफ-अल-मारवई नाम की ट्विटर यूजर ने स्क्रीन शॉट शेयर कर स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा, “सऊदी अरब का नया विजन-2030 और पाठ्यक्रम सबको साथ लेकर चलने वाला, उदारवादी और सहिष्णु भविष्य बनाने में मदद करेगा। सामाजिक अध्ययन की पुस्तक में आज मेरे बेटे की स्कूल परीक्षा के स्क्रीनशॉट में हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, रामायण, कर्म, महाभारत और धर्म की अवधारणाएँ और इतिहास शामिल हैं। मुझे उसकी पढ़ाई में मदद करने में मजा आया।”

सऊदी की शिक्षा पाठ्यक्रम के परिचय में कहा गया है कि सऊदी अरब शिक्षित और कुशल कार्यबल का निर्माण करके वैश्विक अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा में शामिल होगा। अलग-अलग देशों और लोगों के बीच सांस्कृतिक संवादों का आदान-प्रदान वैश्विक शांति और मानव कल्याण में सहायक है। इसलिए विदेशी भाषाओं में मुख्यतया अंग्रेजी को सीखना आवश्यक है।

इसमें कहा गया है कि दुनिया भर के देशों में विकास और समृद्धि के लिए संवाद सबसे अहम कड़ी है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब्दुल अजीज ने “2030 के सऊदी विजन” को आगे बढ़ाने का काम किया है। इसके कई पहलू हैं, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी शैक्षिक प्रणाली का निर्माण करना है, जिससे सरकार और विभिन्न व्यवसायों के बीच आने वाली कठिनाइयों को दूर किया जा सके। इसके अलावा “विजन-2030” के जरिए सऊदी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से निवेश के लिए उचित माहौल बनाना चाहता है।

तेल आधारित अर्थव्यवस्था की इमेज बदलना चाहता है सऊदी

सऊदी के विजन-2030 का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि वहाँ की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और तेल से मिलने वाले राजस्व की निर्भरता में कमी लाने के लिए भी वह शैक्षिक व्यवस्था में बदलाव कर रहा है। इसीलिए अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए सऊदी सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हैं।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान द्वारा घोषित विजन-2030 इन्हीं परिवर्तनों में से एक है। प्रिंस का मानना है कि इससे देश में बड़े आर्थिक बदलाव होंगे। पाठ्यक्रम के मुताबिक 1932 में सउदी के निर्माण के बाद यह सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहा है।

छत्तीसगढ़ में फिर नक्सली हमला, पुलिस के 2 जवानों का गला रेता: 23 दिनों में तीसरी घटना

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमलों की वारदात बढ़ती जा रही है। अब पिछले 3 दिनों में यहाँ तीसरा नक्सली हमला सामने आया है। सुकमा जिले के भेज्जी थाने से सिर्फ आधा किलोमीटर दूर पुलिस के दो जवानों की हत्या कर दी गई। ये घटना ऐसे समय सामने आई है, जब बीजापुर में अर्धसैनिक बलों के 22 जवानों की नक्सलियों द्वारा हत्या का ग़म देश भूला नहीं है। ताज़ा मामले में दोनों मृतक भेज्जी पुलिस थाने में ही तैनात थे।

थाने के पास ही एक पुलिस कैम्प भी है। गुरुवार (अप्रैल 15, 2021) को दोनों जवान बाइक से बाजार की तरफ जा रहे थे, तभी इनका रास्ता रोक कर किसी ने धारदार हथियार से गला रेत डाला और फ़रार हो गए। इस हमले को लेकर ग्रामीणों ने भी चुप्पी साधी हुई है। एसपी केएल ध्रुव ने बस इतना कहा है कि मामले की जाँच की जा रही है। मृतक जवानों की पहचान पुनेम हड़मा और धनीराम कश्यप के रूप में हुई है।

मीडिया ने ग्रामीण सूत्रों के हवाले से अंदेशा जताया है कि इस हमले के पीछे नक्सलियों की ‘स्मॉल एक्शन टीम’ का हाथ हो सकता है। इस दस्ते में दो-चार नक्सली ही होते हैं लेकिन वो खतरनाक हथियारों से छोटे हमले करते हैं। ये टीमें कैम्प से बाहर निकलने वाले पुलिसकर्मियों पर नजर रखती है। ये नक्सली ग्रामीणों के बीच ही आम आदमी बन कर रहते हैं और इनके प्रभाव के कारण इन्हें चिह्नित कर पाना बड़ा मुश्किल होता है।

जहाँ ये घटना हुई, वहाँ पुलिसकर्मी अक्सर बाजार के काम के लिए जाया करते हैं। पुलिस को सूचना मिली थी कि दोनों जवान सड़क पर पड़े हुए हैं, जिसके बाद वो मौके पर पहुँची। दोनों जवान पड़े हुए थे और उनके गले से खून लगातार निकल रहा था। पुलिस जब तक पहुँची, तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। अब पुलिस गाँव वालों की मदद से ही नक्सलियों को चिह्नित कर के दोषियों को पकड़ने में लगी हुई है।

इससे पहले बीजापुर में पट्रोलिंग करते जवानों को यू-शेप व्यूह बना कर फँसाया गया था और उनके निकलने के रास्ते को जाम कर के ताबड़तोड़ फायरिंग की गई थी। 23 जवान बलिदान हो गए थे। एक जवान राकेश्वर सिंह का अपहरण कर लिया गया था, लेकिन फिर सरकार के प्रयासों के बाद छोड़ दिया गया। इसी तरह 3 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन के बीजापुर जिले में नक्सलियों के सथ मुठभेड़ में 5 जवान बलिदान हो गए थे। 9 नक्सली भी मार गिराए गए थे।