उत्तर प्रदेश का माफिया डॉन पिछले दिनों मोहाली की कोर्ट में व्हीलचेयर पर पेशी के लिए आया था। वह जिस एंबुलेंस से अदालत पहुँचा था, उसको लेकर विवाद है। इस बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और राज्यसभा सांसद बृजलाल ने मुख्तार के एंबुलेंस को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके अनुसार यह साधारण गाड़ी न होकर, एक चलते-फिरते किले जैसा है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व डीजीपी ने बताया कि मुख्तार की एंबुलेंस बुलेटप्रूफ है और इसे चंडीगढ़ में बनवाया गया था। इसका ड्राइवर मुख्तार का खास गुर्गा सलीम है। सलीम मुहमदाबाद का रहने वाला है। उसका बड़ा भाई प्रिंस एक कुख्यात अपराधी था, जिसे कुछ समय पहले मुठभेड़ में मारा गिराया गया था।
पूर्व डीजीपी के मुताबिक इस एंबुलेंस में हथियार से लैस मुख्तार के गुंडे सवार रहते हैं। वह खुद सैटेलाइट फोन रखता है। पूर्व डीजीपी बृजलाल के अनुसार किसी अपराधी के पास बुलेटप्रूफ एंबुलेंस होने का यह पहला मामला है। उनके अनुसार यूपी में सपा शासनकाल में मुख्तार अंसारी जब जेल में बंद था, तब भी यह एंबुलेंस जेल के बाहर खड़ी रहती थी। इसके अलावा वह विधान भवन भी अपनी इसी एंबुलेंस में जाता था और उसके गुर्गे बड़ी-बड़ी गाड़ियों में काफिले की तरह साथ होते थे।
बता दें कि इससे पहले पूर्व डीजीपी ने मुख्तार अंसारी के मामले में पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस पर निशाना साधा था। उन्होंने बताया था कि ये सब सिर्फ़ और सिर्फ़ पैंतरेबाजी है। मुख्तार ये सब शुरू से करता रहा है और अंत तक करेगा।
मुख्तार अंसारी की फर्जी एंबुलेंस
उल्लेखनीय है कि मुख्तार अंसारी इस समय पंजाब जेल में बंद है। पिछले दिनों वह मोहाली की कोर्ट में पेश हुआ था। लेकिन वहाँ उसे लेकर आई एंबुलेंस पर विवाद हो गया। दरअसल जिस एम्बुलेंस से पुलिस ने उसे मोहाली कोर्ट में पेश किया, उसका रजिस्ट्रेशन तो बाराबंकी जिले का है, लेकिन अब यह एंबुलेंस किसी अस्पताल से पंजीकृत ही नहीं है।
न्यूज 18 के अनुसार, जिस अस्पताल के नाम से एंबुलेंस नंबर UP41 AT 7171 का रजिस्ट्रेशन बताया जा रहा है, वह असल में है ही नहीं। इसकी मियाद साल 2015 में खत्म हो चुकी है। एंबुलेंस की फिटनेस भी साल 2017 में एक्सपायर हो चुकी है। बाराबंकी स्वास्थ्य विभाग के पास भी इसकी कोई जानकारी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों पंजाब सरकार को दो सप्ताह के भ्ज्ञीतर मुख्तार की कस्टडी यूपी पुलिस को सौंपने के निर्देश दिए थे।
वैसे मुख्तार पर सपा सरकार की मेहरबानी को बयाँ करने वाले बृजलाल पहले पुलिस अधिकारी नहीं है। हाल ही में योगी सरकार ने पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह पर दर्ज मुकदमा उठाया था। सिंह ने एक लाइटगन बरामद करने के बाद मुख्तार के खिलाफ पोटा के तहत कार्रवाई की थी। उन्होंने बताया था कि इसके बाद उन पर तत्कालीन सरकार ने इतना दबाव बनाया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके कुछ महीने बाद उन पर केस दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया था।
रोटी बनाने के दौरान थूक लगाने का एक और वीडियो वायरल हुआ है। यह वीडियो उत्तर प्रदेश के शामली का बताया जा रहा है। हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह वीडियो कब का है। वीडियो में एक व्यक्ति तंदूर में रोटी सेंकते समय उसमें थूक लगाता हुआ देखा जा सकता है।
शामली पुलिस ने इस वीडियो पर संज्ञान लिया है और ट्विटर पर बताया है कि आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। उसके खिलाफ कानून उचित कार्रवाई की जाएगी।
थूक लगाकर कर रोटी बनाने का एक और वीडियो वायरल, यूपी के शामली का बताया जा रहा Video.. pic.twitter.com/PizBydioFk
थूक लगाकर रोटी बनाने का यह वीडियो शामली के फव्वारा चौक स्थित एक होटल का बताया जा रहा है। वीडियो में स्पष्ट तौर पर यह देखा जा सकता है कि सिर पर सफेद टोपी लगाया हुआ व्यक्ति रोटी पर थूक रहा है।
हाल के समय में इस तरह के कई वीडियो वायरल हुए हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ में थूक लगाकर रोटी बनाने का वीडियो वायरल हुआ था। इस घटना में पुलिस ने नौशाद को गिरफ्तार किया था। उसने खुलासा किया था कि 10-15 वर्षों से वह शादी समारोहों में यह हरकत कर रहा था। इसके अलावा दिल्ली में भी तंदूरी रोटी पर थूक लगाने का वीडियो वायरल हुआ था जिसमें मोहम्मद इब्राहिम और सबी अनवर को गिरफ्तार किया गया था। खाने पर थूकने की एक और घटना में गाजियाबाद के मोहसिन को गिरफ्तार किया गया था जो एक मांगलिक कार्यक्रम में रोटी बनाते समय उसमें थूक रहा था।
वामपंथी मीडिया पोर्टल द वायर, द स्क्रॉल में बतौर लेखक योगदान देने वाले किरण कुंभार ने IMA अध्यक्ष डॉ. जेए जयलाल के समर्थन में आवाज उठाई है। ऑपइंडिया द्वारा ईसाई धर्मांतरण के मुद्दे को प्रकाश में लाने के कुछ ही दिन बाद किरण ने डॉ. जयलाल का समर्थन किया। पिछले दिनों हमने आपको बताया था कि कैसे IMA अध्यक्ष डॉ. जयलाल धर्मांतरण के लिए अस्पतालों को एक मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।
अपने ट्वीट में कुंभार ने जयलाल की मंशा को सामान्य दिखाने का प्रयास किया। उनके अनुसार ये सब हिंदुओं का पागलपन है जो IMA अध्यक्ष पर आरोप लगा रहे हैं कि वो डॉक्टरों, छात्रों और मरीजों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
साभार: ट्विटर
कुंभार ने कहा कि वह डॉ. जयलाल के साक्षात्कार से सहमत नहीं हैं। उसे देख उन्हें ये भी नहीं लगता है कि वे मेडिकल संस्थानों में धर्मांतरण करवाना चाहते हैं। किरण के अनुसार, ये सब सिर्फ़ भ्रम है।
साभार: ट्विटर
इसके बाद कुंभारर ने पिछले 90 सालों में मेडिकल काउंसिल के अध्यक्ष बने सभी लोगों की सूची शेयर की, सिर्फ़ ये बताने के लिए इतने समय तक काउंसिल में हिंदुओं का वर्चस्व रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि डॉ. जयलाल के विश्वास को गलत बताया जा रहा है, क्योंकि हिंदू बहुसंख्यक देश में आईएमए हमेशा से एक हिंदू बहुल संघ रहा।
किरण की सारी बहस सिर्फ़ डॉ. जयलाल पर लग रहे इल्जामों को खारिज करने के लिए है। जाहिर है कि इन सब कुतर्कों से ये पता चलता है कि उनका मानना है कि चूँकि लंबे समय से IMA में हिंदू अध्यक्ष रहे, इसलिए अब जब कोई ईसाई चुना गया है तो उसका अन्य लोगों को धर्मांतरण के लिए उकसाना बिलकुल जायज है। हालाँकि, वामपंथी लेखक शायद भूल गए हैं कि जिस संस्था में तमाम हिंदू अध्यक्ष रहे, वहाँ उन सबने कभी वर्तमान अध्यक्ष की तरह गैर हिंदुओं को हिंदू बनाने का प्रयास नहीं किया, जैसा कि डॉ. जयलाल करने की कोशिश कर रहे हैं।
बता दें कि हिंदुओं के बहुसंख्यक होने और उनपर धर्मांतरण का कोई खतरा न होने वाले दावे करके कई बार इस्लामवादी भी हिंदुओं की चिंता को बेवजह बताने का प्रयास करते रहे हैं और किसी भी रूप में ये नहीं स्वीकारते कि उनमें कट्टरपंथ कितनी तेजी से फैल रहा है, जिसका एक मात्र उद्देश्य या तो धर्मांतरण करवाना है या फिर गैर मजहबी लोगों को बर्बाद करना।
सबसे मुख्य बात ये है कि हिंदू कभी इस बात में यकीन नहीं करते कि उन्हें किसी का धर्मांतरण करवाना है। ये सब इब्राहिम विश्वास रखने वाले ही करते हैं। ये लोग धर्मांतरण को अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं और दूसरे धर्म के लोगों को उसी में रचाने-बसाने की सोचते हैं।
कुंभार के सभी तर्क निराधार हैं, जो स्पष्ट बताते हैं कि वह सिर्फ़ जयलाल का समर्थन करना चाहते हैं। द वायर के लेखक दावा करते हैं कि आईएमए के अध्यक्ष को ईसाई धर्म में झुकाव होने के लिए नहीं, बल्कि उनका आयुर्वेद को लेकर जो आलोचानात्मक नजरिया था उसके लिए टारगेट किया गया है।
अपने ट्वीट में किरण, IMA अध्यक्ष का बचाव करने के लिए उस भाषा का इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकते जिसे इस्लामी आतंकी हिंदू घृणा जाहिर करने के लिए बोलते रहे हैं। किरण, हिंदुओं को IMA अध्यक्ष की बात (धर्मांतरण की) दोहराने के लिए दोषी मानते हैं और गोबर शब्द का इस्तेमाल कर बताते हैं कि कैसे वह भीतर ही भीतर हिंदुओं से घृणा करते हैं।
इंटरव्यू में डॉ. जयलाल ने दिए थे ईसाई धर्मांतरण को लेकर बयान
हाल ही में ‘Haggai इंटरनेशनल’ पर डॉ. जयलाल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कोरोना वायरस संक्रमण मेडिकल छात्रों, डॉक्टरों और रोगियों को ईसाई में धर्मांतरित करने का उनके लिए एक अवसर बनकर आया है।
उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।
उन्होंने ईसाई संस्थाओं में भी गॉस्पेल (ईसाई सन्देश) को साझा करने की ज़रूरत पर बल दिया। उन्होंने IMA में अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कहा था कि आज जो भी हैं वह ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर जीसस क्राइस्ट’ का गिफ्ट है और कल जो होंगे, वे भी उनका ही गिफ्ट होगा।
उन्होंने इस दौरान मदर टेरेसा के उद्धरण का जिक्र किया, जिन पर पहले से ही ईसाई धर्मांतरण के आरोप लगते रहे हैं। ‘क्रिश्चियन टुडे’ के इंटरव्यू में भी उन्होंने बताया कि कैसे महामारी के बावजूद ईसाई मजहब आगे बढ़ रहा है।
वे कोरोना के प्रकोप के कम होने के लिए भी जीसस को ही क्रेडिट देते हैं। उन्होंने कहा था कि जीसस की कृपा से ही लोग सुरक्षित हैं और इस महामारी में उन्होंने ही सभी की रक्षा की है। उन्होंने कहा कि फैमिली प्रेयर्स और नाइट प्रेयर्स की मदद से ईसाई अब स्वर्ग की अनुभूति कर रहे हैं, न कि भौतिकतावादी दुनिया की। इस तरह से भारत के सबसे बड़े मेडिकल संगठन के मुखिया के लिए सरकार द्वारा लॉकडाउन या टीकाकरण का कोरोना से लड़ने में कोई रोल नहीं है।
मालूम हो कि डॉ, जयलाल सिर्फ़ ईसाई धर्मांतरण करवाना ही नहीं चाहते, बल्कि वे आयुर्वेद की आलोचना भी मुखर होकर करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार इसलिए आयुर्वेद में विश्वास करती है, क्योंकि उसके सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक आस्था हिंदुत्व में है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 3-4 वर्षों से आधुनिक मेडिसिन की जगह आयुर्वेद को लाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी और योग इत्यादि की जड़ें संस्कृत में हैं, जो हिंदुत्व की भाषा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इन सबके जरिए सरकार लोगों के दिलो-दिमाग में संस्कृत भाषा को घुसाना चाहती है। डॉक्टर जयलाल ने बताया कि उन्होंने डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के जरिए देश भर में सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करवाए थे। उन्होंने हिन्दुओं में काफी देवताओं के होने की बात करते हुए एक बार कहा था कि उन्हें अब जीसस और मुहम्मद को ईश्वर मान लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये हर ईसाई का कर्तव्य है कि वे बाइबिल का संदेश सभी तक पहुँचाए।
कृषि कानूनों के विरोध के नाम देश के अलग-अलग राज्यों में घूम रहे भारतीय किसान यूनियमन (BKU) के प्रवक्ता राकेश टिकैत के खिलाफ लोगों का गुस्सा बाहर आने लगा है। आज (अप्रैल 2, 2021) राजस्थान में एक सभा के लिए जाते वक्त उनके काफिले पर हमला हुआ। वहीं बिहार के मुजफ्फरपुर में एक अधिवक्ता ने भड़काऊ बयान को लेकर उनके खिलाफ केस किया है। इस बीच एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें उत्तर प्रदेश का एक किसान टिकैत पर पैसा लेकर ममता बनर्जी का प्रचार करने का आरोप लगा रहा है।
काफिले पर हमला
राजस्थान के अलवर के हरसौरा में सभा को संबोधित करने के लिए टिकैत जा रहे थे। इसी दौरान ततारपुर में नाराज भीड़ ने टिकैत के काफिले पर पथराव करते हुए उनकी कार के शीशे तोड़ दिए। उन पर स्याही भी फेंकने की कोशिश हुई।
टिकैत ने हमले में क्षतिग्रस्त गाड़ी का वीडियो ट्विटरपर शेयर करते हुए भाजपा को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा, “राजस्थान के अलवर जिले के ततारपुर चौराहा, बानसूर रोड़ पर भाजपा के गुंडों द्वारा जानलेवा पर हमला किए गए, ये लोकतंत्र के हत्या की तस्वीरें हैं।”
राजस्थान के अलवर जिले के ततारपुर चौराहा, बानसूर रोड़ पर भाजपा के गुंडों द्वारा जानलेवा पर हमला किए गए, लोकतंत्र के हत्या की तस्वीरें pic.twitter.com/aBN9ej7AXS
साझा किए गए वीडियो में सुना जा सकता है कि वीडियो बनाने वाला भाजपा नेताओं के साथ प्रधानमंत्री पर आरोप लगा रहा है कि राकेश टिकैत की गाड़ी पर उनके द्वारा जानलेवा हमला किया गया है। गाड़ी पर गोली भी चलाई गई है। पत्थरबाजी की गई है। स्याही फेंकी गई है।
वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसान विरोधी, जनमानस विरोधी बताते हुए कहा गया कि वह देश को बेचने पर तुले हुए हैं। उन्होंने राकेश टिकैत पर गोली चलवाई है। स्याही फिंकवाई है। इसलिए वह सब रोड जाम करके बैठे हैं जब तक न्याय नहीं मिलेगा तब तक वह ऐसे ही बैठे रहेंगे।
मुजफ्फरपुर में केस दर्ज
राजस्थान में राकेश टिकैत के काफिले पर जहाँ हमला हुआ है, वहीं मुजफ्फरपुर कोर्ट में उनके खिलाफ गुरुवार को केस दायर किया गया है। वकील सुधीर कुमार ओझा ने इसे दायर कराते हुए आरोप लगाया कि टिकैत ने खुलेआम धमकी भरे बयान दिए हैं, जिससे अराजकता फैल जाएगी।
शिकायतकर्ता ने कहा कि दौसा राजस्थान में आयोजित महापंचायत में टिकैत ने खुलेआम धमकी भरा बयान देते हुए कहा था कि अगर सरकार किसान आंदोलन की बात नहीं सुनती है तो देश के 16 राज्यों में विद्युत कनेक्शन काट दिया जाएगा।
सुधीर कुमार ने शिकायत में कहा कि यदि ऐसा कुछ भी होता है तो 16 राज्यों में अँधेरा छा जाएगा और देश की व्यवस्था चरमरा जाएगी। इससे देशवासियों की निजी जिंदगियों पर भी असर पड़ेगा। अराजकता भी फैलेगी और उपद्रव भी बढ़ेगा। ऐसे बयान राष्ट्रीय एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
मालूम हो कि मुजफ्फरपुर में दायर शिकायत पर 8 अप्रैल को सुनवाई होगी।
‘ममता बनर्जी के प्रचारक हो’
बीकेयू नेता राकेश टिकैत पर हो रहे हमले और केसों के बीच उनकी एक ऑडियो भी सामने आई है। इसमें यूपी के मोदीनगर का एक किसान उनसे सवाल कर रहा है कि क्या आप पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के प्रचारक हैं। ऑपइंडिया इस ऑडियो की सच्चाई की पुष्टि नहीं करता है।
ऑडियो में किसान ने न केवल राकेश टिकैत को ममता बनर्जी का प्रचारक कहा, बल्कि ये भी आरोप लगाया कि वह मोटी रकम लेकर किसानों का साथ छोड़ चुनावी दोरे कर रहे हैं। इस ऑडियो में राकेश टिकैत सफाई दे रहे हैं और आखिर में ‘बकवास मत करो’ कहकर बात खत्म कर देते हैं।
असम में गुरुवार (1 अप्रैल 2021) को दूसरे चरण का मतदान हुआ था। मतदान समाप्त होने के बाद एक वीडियो सामने आया। इसमें एक प्राइवेट कार में मतदानकर्मी EVM लेकर जाते देखे गए। इस वीडियो को लेकर जारी विवाद पर विराम लगाते हुए चुनाव आयोग ने चार अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। साथ ही दोबारा मतदान के आदेश दिए हैं।
दरअसल जिस कार से ईवीएम ले जाया जा रहा था वह पथराखंडी से बीजेपी विधायक कृष्णेंदु पॉल की थी। यह उनकी पत्नी मधुमिता पॉल के नाम है। कार को करीमगंज में स्थानीय लोगों ने रोक लिया था और कथित तौर पर मतदान अधिकारियों को पीटा भी। इनका आरोप था कि छेड़छाड़ के इरादे से बीजेपी नेता की कार से ईवीएम को ले जाया जा रहा था। हमले में कार बुरी तरह से छतिग्रस्त हो गई है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भाजपा पर कॉन्ग्रेस ने ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप मढ़ना शुरू कर दिया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक कार को करीमगंज के पास लोगों ने रोक लिया था। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बैकग्राउंड में एक व्यक्ति यह कहते हुए सुना जा सकता है, “ओइ देखुं कृष्णेंदु पाल एर गदित इवा पौवा गसा (कृष्णेंदु पॉल की कार में ईवीएम पाए गए हैं)”। कार रोकने के बाद उसमें सवार सभी लोगों को जबरदस्ती बाहर निकाला गया। जैसे ही इन लोगों दोबारा से कार में घुसने की कोशिश की तो एक स्थानीय ने चेतावनी देते हुए कहा, “गादी जागत ठाक्टो (कार अपनी जगह पर ही रुकेगी)।” कार का नंबर AS10B0022 था।
Breaking : Situation tense after EVMs found in Patharkandi BJP candidate Krishnendu Paul’s car. pic.twitter.com/qeo7G434Eb
वीडियो वायरल होने के बाद कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए ईवीएम से छेड़छाड़ का दुष्प्रचार शुरू कर दिया। एक ट्वीट में उन्होंने कहा, “हर बार के चुनाव में ऐसे वीडियो सामने आते हैं, जिसमें निजी गाड़ियाँ EVM ले जाते हुए पकड़ी जाती हैं। ये गाड़ियाँ अक्सर भाजपा नेताओं अथवा उनके सहयोगियों की होती हैं। ऐसे वीडियो हमेशा एक घटना के रूप में सामने आते हैं और फिर उन्हें झूठा बताकर खारिज कर दिया जाता है। बीजेपी अपने मीडिया तंत्र के जरिए उन्हीं लोगों पर आरोप लगा देती है, जिन्होंने इसका खुलासा किया होता है।”
आगे उन्होंने लिखा, “कई तथ्य देने के बाद भी चुनाव आयोग कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। आयोग को इन सभी शिकायतों पर कार्रवाई करनी चाहिए। सभी राष्ट्रीय दलों को भी गंभीरता से EVM की उपयोगिता का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए।”
घटना पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट की स्थिति
आरोपों की झड़ी लगने के बाद शुक्रवार को चुनाव आयोग ने तथ्यों के साथ अपनी रिपोर्ट जारी की। आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदान दल, जिसमें एक पीठासीन अधिकारी और तीन मतदान कर्मी थे, रतबारी निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत नं 149- इंदिरा एमवी स्कूल के मतदान केंद्र पर मतदान पूरा होने के बाद अपने काफिले के साथ लौट रहे थे। उनकी सुरक्षा के लिए एक कॉन्स्टेबल और एक होमगार्ड को लगाया गया था। बारिश होने के कारण सड़कों पर काफी कीचड़ फैल गया था। चुनाव खत्म होने के बाद लगभग 1300 गाड़ियाँ राष्ट्रीय राजमार्ग- 8 से लौट रहीं थीं, जिस कारण काफी भीड़ हो गई थी।
इसी दौरान अचानक एक मोड़ पर बूथ नंबर 149 से पोलिंग टीम को लेकर जा रही गाड़ी खराब हो गई। उस दौरान रात करीब 9 बजे थे और गाड़ी नीलम बाजार पहुँचने वाली थी। चुनाव आयोग ने आगे कहा, “भारी ट्रैफिक और खराब मौसम के कारण यह पार्टी अपने काफिले से पिछड़ गई। वाहन खराब होने के बाद पोलिंग पार्टी सेक्टर अधिकारी अजय सूत्रधर को यथास्थिति से अवगत कराया गया। जब सेक्टर अधिकारी वैकल्पिक वाहन की व्यवस्था कर रहे थे, तब पोलिंग पार्टी ने अपने स्वयं के एक वाहन की व्यवस्था करने का फैसला किया, ताकि वे सामान को गंतव्य स्थान तक समय पर पहुँचा सकें, क्योंकि उनके पास ईवीएम था।”
EC issues factual report on incident involving EVM in Assam.
Polling party 149-Indira MV School of LAC 1 Ratabari (SC) met with incident. Party comprised a Presiding Officer & 3 polling personnel. They were accompanied by police personnel comprising a constable & a homeguard:EC pic.twitter.com/irm3DEr6KV
चुनाव आयोग ने कहा कि इसके बाद मतदान कर्मी वहाँ से गुजर रहे एक वाहन के मालिक के बारे में जाने बिना ही उसमें सवार हो गए। इसके बाद वे रात करीब 10 बजे करीमगंज के कनाईशिल पहुँचे। ट्रैफिक की वजह से उन्हें गाड़ी धीमी करनी पड़ी। इसी दौरान करीब 50 लोगों की भीड़ ने घात लगाकर उन पर हमला कर दिया। उन्होंने गाड़ी पर पथराव करते हुए गालियाँ दी। पोलिंग एजेंटों ने जब भीड़ के नेता से पूछा तो उसने बताया कि वो गाड़ी पथरकंडी से भाजपा उम्मीदवार कृष्णेंदु पॉल की है। भीड़ ने ईवीएम से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया। आयोग के मुताबिक, जैसे ही पोलिंग अधिकारियों को गड़बड़ी का पता चला तो उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी सेक्टर अधिकारी और नोडल अधिकारी को दी। तब तक वहाँ काफी भीड़ इकट्ठा हो गई थी।
घटना की जानकारी मिलते ही डीईओ एसपी करीमगंज के साथ तुरंत मौके पर पहुँचे। चुनाव आयोग के मुताबिक, “घटनास्थल पर पहुँचने पर देखा गया कि भीड़ ने पोलिंग पार्टी को कार के बाहर खींचकर उसके साथ मारपीट की है। भीड़ हिंसक हो चुकी थी और उन्होंने गाड़ियों के काँचों को पत्थर मारकर फोड़ दिया था। इस पत्थरबाजी में करीमगंज के एसपी भी घायल हुए हैं। एक पोलिंग अधिकारी भी वहाँ से लापता था। हालाँकि सभी को सुरक्षित बचा लिया गया।”
ईवीएम के साथ नहीं हुई कोई छेड़छाड़
चुनाव आयोग ने मतदान किए गए ईवीएम की जाँच की और पाया कि वीवीपीएटी, बीयू और सीयू की सील सभी सुरक्षित थे। सारे सामग्रियों को स्ट्रॉन्ग रूम में रखवा दिया गया है। इस बीच घटना के दौरान लापता हुए पोलिंग ऑफिसर का पता लगाने के लिए तलाशी अभियान भी चलाया गया। उन्हें शुक्रवार को ढूँढ लिया गया। चुनाव आयोग ने चुनाव निकाय के परिवहन प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के लिए पीठासीन अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
दोषी अधिकारी निलंबित, संबंधित केंद्रों पर फिर से होगी वोटिंग
चुनाव आयोग ने परिवहन प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के मामले में दोषी चार अधिकारियों को निलंबित करने का आदेश दिया है। साथ ही मतदान केंद्र संख्या 149 पर दोबारा से मतदान का आदेश जारी किया है। हालाँकि ईवीएम के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई थी।
The suspension orders of the four polling personnel deployed in Ratabari (SC) constituency of Assam — Presiding officer Sahab Uddin Talukdar as well as Saurav Acharjee, Abdul Mumit Choudhury and Sahab Uddin Tapadar https://t.co/dR876Eec48pic.twitter.com/FxPOvvOv28
चुनाव आयोग ने अपने स्टेटमेंट में कहा, “पीओ और 3 अन्य अधिकारियों को भी निलंबित कर दिया है। ईवीएम की सील सही सलामत पाए जाने के बाद भी बूथ नंबर 149 पर फिर से मतदान होगा। एहतियात के तौर पर इंदिरा एमवी स्कूल ऑफ एलएसी 1 रतबारी पर विशेष पर्यवेक्षक भी तैनात किया जाएगा।”
जिन चार अधिकारियों को चुनाव आयोग के यातायात प्रोटोकॉल फॉलो नहीं करने के मामले में निलंबित किया गया है, उनमें पीठासीन अधिकारी सहाबुद्दीन तालुकदार, पोलिंग अधिकारी सौरव अचार्जी, साहब उद्दीन तापड़कर और अब्दुल मुमित चौधरी। चौधरी एक इस्लामिक स्कूल में शिक्षक हैं।
कॉन्ग्रेस एक बार फिर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फेक न्यूज फैलाती पकड़ी गई है। इस बार यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी ने यह कारस्तानी की है। उन्होंने ट्विटर पर एक एडिटेड वीडियो शेयर कर यह जताने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री एक ऐसे मैदान में हाथ हिलाकर अभिवादन कर रहे हैं, जो पूरी तरह खाली है। पोल खुलने पर यह वीडियो डिलीट कर दिया गया।
शुक्रवार (2 अप्रैल 2021) को श्रीनिवास ने एक वीडियो शेयर किया जिसमें पूरी तरह से स्पष्ट ग्राफिक्स नहीं दिखाई दे रहे थे। इसी कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पीएम मोदी खाली मैदान में ही हाथ हिलाकर अभिवादन कर रहे हैं। वीडियो से आवाज को भी हटा दिया गया था। इसके बाद कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से भी यह वीडियो पोस्ट किया गया।
युवा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट कॉन्ग्रेस द्वारा पोस्ट किए गए एडिटेड वीडियो का स्क्रीनशॉट
एडिट किए गए इस वीडियो में यही प्रतीत हो रहा था कि पीएम मोदी जिस मैदान में हैं वहाँ भीड़ का कोई नामो-निशान नहीं है, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। वास्तविक वीडियो में साफ तौर पर पीएम मोदी का अभिवादन करती हुई भीड़ को देखा जा सकता है। लेकिन एडिट कर बनाए गए वीडियो में भीड़ और उनकी आवाज को हटाने का प्रयास किया गया था।
सक्रिय सोशल मीडिया यूजर्स के द्वारा अपनी पोल खोले जाने पर कॉन्ग्रेसऔर उसके नेता ने ट्वीट डिलीट कर दिया।
Original video with sound.
But @srinivasiyc not only blurs it to make audience invisible but also mutes it to ensure that the roar of crowd isn’t audible.
Not only this, @Pawankhera RTs this blatant propaganda.
वास्तविक वीडियो पीएम मोदी के पश्चिम बंगाल के जयनगर पहुँचने की है, जिसमें साफ तौर पर लोगों की भीड़ देखी जा सकती है। पीएम मोदी चुनावी रैली को संबोधित करने के लिए जयनगर पहुँचे थे। मैदान काफी बड़ा था, इस कारण लोग पीएम मोदी के हेलीकॉप्टर से उतरने वाली जगह से कुछ दूर पर खड़े थे, जिन्हें वीडियो को एडिट करके हटाने का प्रयास किया गया। वहाँ लोगों ने पीएम मोदी का शानदार अभिवादन किया और जैसा कि कॉन्ग्रेस मैदान के खाली होने का दावा कर रही थी, उसके उलट मैदान भरा हुआ था।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने पाँव में पट्टी लगवा कर घूम रही हैं। लेकिन एक वीडियो में उन्हें वही पाँव आराम से हिलाते हुए देखा गया। वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि TMC सुप्रीमो एक टेबल के सामने कुर्सी पर बैठी हुई हैं और बड़े आराम से अपने उस पाँव को ऊपर-नीचे उछाल और हिला रही हैं, जिसमें उन्हें चोटें आने की बात कही गई थी। इससे पहले 1 दिन में ही उन्होंने प्लास्टर से बदल कर गरम पट्टी करवा ली थी।
देखा जा सकता है कि इस दौरान ममता बनर्जी को कोई परेशानी नहीं हो रही है। लोगों का कहना है कि अगर उन्हें ऐसा करते हुए दर्द होता तो फिर वो ज़रूर पाँव हिलाना रोक देतीं या फिर उधर ध्यान देतीं। लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वीडियो में एक मौका तो ऐसा आता है, जब वो अपने दूसरे वाले पाँव को चोटिल पाँव के ऊपर चढ़ा देती हैं और तब भी उन्हें किसी प्रकार की तकलीफ में नहीं देखा गया।
The Bengal CM was campaigning for the high-octane Nandigram seat. During a rally, the TMC supremo stood up with her fractured leg for the national anthem pic.twitter.com/cR9fFDEtUd
भाजपा नेता विष्णुवर्धन ने कहा कि ममता बनर्जी ने लोगों को जो कहानी बताई है, ये वीडियो उससे अलग ही कहानी बयाँ करती है। मुंबई भाजपा के प्रवक्ता सुरेश नखुआ ने पूछा कि अपने टूटे हुए पाँव के साथ भला कौन खेलता है? एक अन्य वीडियो में भी उन्हें आराम से अपने व्हीलचेयर से खड़े हुए देखा जा सकता है। बाद में बताया गया था कि राष्ट्रगान के दौरान उनसे बैठे नहीं जा रहा था, इसीलिए वो खड़ी हुई थीं।
इससे पहले 13 मार्च को भी उनके पैर में प्लास्टर की जगह बैंडेज देख कर भी लोगों ने पूछा था कि क्या ये सच में एक गंभीर चोट थी, जैसा बताया गया? लोगों ने कहा था कि एक ही दिन में प्लास्टर से बैंडेज हो गया, यही तो ‘आसोल परिवर्तन है’, अच्छे दिन’ है। एक व्यक्ति ने तो ममता बनर्जी की तुलना हॉलीवुड फिल्म के किरदार ‘वॉल्वरिन’ से कर दी थी, जो एक ऐसा फ़िल्मी किरदार है जिसके घाव चमत्कारिक रूप से तुरंत भर जाते हैं।
बॉलीवुड और तमिल की फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके रंगनाथन माधवन ने अब बतौर निर्देशक अपनी पारी शुरू की है। उनकी अगली फिल्म ‘रॉकेट्री – द नम्बि इफ़ेक्ट’ का ट्रेलर आ गया है और इसे सोशल मीडिया पर अच्छी प्रतिक्रिया भी मिल रही है। असल में ये फिल्म ISRO के वैज्ञानिक रहे एस नम्बि नारायणन की बायोपिक है। पद्म भूषण से सम्मानित नम्बि नारायणन के करियर में एक ऐसा समय भी आया था, जब उन पर झूठे आरोप लगे और उन्हें गिरफ्तार किया गया।
ISRO के पूर्व वैज्ञानिक नम्बि नारायणन की बायोपिक है फिल्म ‘रॉकेट्री’
फिल्म के ट्रेलर में शाहरुख़ खान भी नज़र आते हैं। नम्बि नारायणन के किरदार में ढल चुके आर माधवन कहते हैं, “मैं यहाँ इसलिए आया हूँ ताकि जो इस देश में मेरे साथ हुआ, वो किसी और के साथ न हो।” फिल्म में नम्बि नारायणन पुराने दिनों में भारत में रॉकेट्री को बढ़ावा देने के लिए योजना बनाते दिखते हैं, ताकि देश इस ट्रिलियन डॉलर इंडस्ट्री का हिस्सा बने और रॉकेट्स बनाए, ‘खिलौने’ नहीं। इसके बाद उनके खिलाफ साजिश की बातें आती हैं।
उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाए गए। उनकी कामयाबी के बावजूद उन्हें अलग-थलग कर दिया गया। फिल्म में एक डायलॉग है – “किसी कुत्ते को मारना हो तो अफवाह फैला दो कि वो पागल है। ठीक उसी तरह, किसी इंसान को मारना हो तो दिखा दो कि वो देशद्रोही है।” उन पर गुजरे पारिवारिक संकट और गिरफ़्तारी के दौरान मिली प्रताड़ना को भी फिल्म में उकेरा जाएगा। कैसे उन्होंने न्यायिक लड़ाई जीती, फिल्म में ये भी दिखाया जाएगा।
आर माधवन की फिल्म ‘राकेट्री – द नम्बि इफ़ेक्ट’ का ट्रेलर
इस फिल्म को हिंदी, तमिल और अंग्रेजी में बनाया गया है। फिल्म का प्री-प्रोडक्शन कार्य 2017 की शुरुआत में ही शुरू हो गया था। अक्टूबर 2018 में इसका टीजर जारी कर दिया गया था। आर माधवन और शाहरुख़ खान के अलावा फिल्म में कभी तमिल सिनेमा की सेंसेशन रहीं सिमरन और वहाँ के एक और बड़े स्टार सूर्या भी नज़र आएँगे। भारत के अलावा जॉर्जिया, रूस, फ़्रांस और सर्बिया में इस फिल्म की शूटिंग हुई है।
जब एक प्रतिभावान ISRO वैज्ञानिक अचानक कर लिया गया था गिरफ्तार
वो नवंबर 30, 1994 की बात थी, जब कुछ पुलिस वाले नम्बि नारायणन के घर पर आ धमके। उन्होंने कहा कि DIG आपसे बात करना चाहते हैं। जब नम्बि ने पूछा कि क्या उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है तो पुलिसकर्मियों ने ना में जवाब दिया। उन्हें पुलिस की गाड़ी में आगे बिठा कर ले जाया गया (अपराधियों को अक्सर पीछे बिठाया जाता है)। असल में उससे पहले 20 अक्टूबर को मरियम रशीदा नामक मालदीव्स की एक महिला को गिरफ्तार किया गया था।
बताया गया था कि वो एक जासूस है और ISRO में कुछ संपर्कों के जरिए वो पाकिस्तान को भारतीय रॉकेट तकनीक की बारीकियाँ सप्लाई कर रही है। 13 नवंबर को उसी साल फौजिया हुसैन नामक मालदीव की एक और महिला को गिरफ्तार किया गया, जो मरियम की दोस्त थी। नम्बि नारायणन तब क्रायोजेनिक इंजन प्रोजेक्ट के मुखिया और लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स के डायरेक्टर इन चार्ज हुआ करते थे।
प्रोजेक्ट में उनके नीचे थे डी शशिकुमारन, जिनका नाम इस जासूसी केस में आया था। नम्बि नारायणन कहते हैं कि तब ISRO के वैज्ञानिक इस केस पर बातें करते थे और शशिकुमारन इसमें शामिल हैं या नहीं, इस पर भी। लेकिन, जासूसी वाली बात पर उनकी हँसी छूट जाती थी क्योंकि उनके अनुसार, तब भारत को पता ही नहीं था कि क्रायोजेनिक इंजन बनाते कैसे हैं। तब फ्रांस के साथ मिल कर बनाए गए ‘विकास इंजन’ का सिर्फ खाका ही था देश के पास।
ISRO के वैज्ञानिक इस पर चर्चाएँ करते थे और इस मामले की खबरें अख़बारों में आती रहती थीं, इसीलिए वो लोग फोन पर भी इससे जुड़ी बातें कर लिया करते थे। इसी दौरान एक बार नम्बि नारायणन को एहसास हुआ कि उनका फोन टैप किया जा रहा है। उन्होंने अपने एक दोस्त को ये आशंका जाहिर भी की, लेकिन फिर कहा कि जब उन्होंने कुछ गलत किया ही नहीं है तो फिर डरना किस बात से, जो टैप कर रहा है, उसे मस्ती करने दिया जाए।
पुलिस थाने में एक वैज्ञानिक को ले जाकर बिठा दिया गया, जिससे वो इतने तनावपूर्ण हो गए कि जब पुलिस वालों ने पूछा कि उन्हें खाना-पानी वगैरह में क्या चाहिए तो उन्होंने एक डब्बा Wills सिगरेट माँगा। वो 3 साल पहले ही स्मोक करना छोड़ चुके थे लेकिन एक ऐसा समय था, जब वो दिन भर में 40 सिगरेट पी जाया करते थे। रात को उन्हें वहीं बेंच पर सोना पड़ा। इससे पहले नम्बि नारायणन के परिवार की बात कर लेते हैं।
नम्बि नारायणन, उनके पिता और परिवार
उनके पिता और चाचा ने मिल कर एक कारोबार किया था लेकिन उनके चाचा की मौत के बाद उनके परिवार ने नम्बि के पिता से साझी सम्पत्तियों पर से सारे अधिकार छीन लिए, जिससे उन्हें 11 सालों के लिए मुक़दमे लड़ने पड़े थे। दिसंबर 12, 1941 को नम्बि का जन्म हुआ। वो तीन बेटियों के बाद जन्मे थे। उनका जन्म परिवार में भाग्यशाली माना गया, क्योंकि उसी महीन मुक़दमे का झंझट भी ख़त्म हुआ और कोर्ट ने उनके पिता के हक़ में फैसला दिया।
नम्बि की चाची आत्महत्या कर ली। उनके आहत पिता फिर नागरकोइल में बस गए और वहाँ तेल का एक व्यापार खोल लिया। उनके पिता ने संघर्ष कर के परिवार को उच्च-मध्यम वर्ग का बना दिया, उस जमाने में उनके घर में पानी और बिजली की सप्लाई थी। 40 के दशक में ये बड़ी बात थी। स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें या किसी चीज के लिए उन्हें कहना नहीं पड़ता। घर में सब मिला। उन्हें बचपन से गणित पसंद था।
उस वक़्त तमिलनाडु में मात्र 6 इंजीनियरिंग कॉलेज थे, जिनमें 4 प्राइवेट थे। उनमें से मदुरै स्थित थ्यागराजा कॉलेज में उन्हें एडमिशन मिला। नम्बि नारायणन के अनुसार, उन्हें कॉलेज छोड़ कर जाते हुए अपने पिता को उन्होंने मात्र दूसरी बार रोते देखा था। पहली बार वो अपनी माँ (नम्बि की दादी) के निधन पर रोए थे। इसके ठीक 5 महीने बाद नम्बि के पिता की मौत हो गई और तब उन्हें पता चला कि कम आय के बावजूद 5 बच्चों का परिवार उनके पिता कैसे चला रहे थे।
अब घर में कोई कमाने वाला न था। 19 वर्ष की उम्र में उन पर कठिन जिम्मेदारियाँ आ गईं लेकिन उनकी दो बहनों ने साफ़ कर दिया कि भाई की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए। छात्र जीवन में सक्रियता और कुछ अच्छे प्रोफेसर्स के विश्वास ने उन्हें एक सुयोग्य इंजीनियर बनाया। अब लौटते हैं वापस जासूसी कांड पर। जब नम्बि को एडिशनल मजिस्ट्रेट के सामने ले जाया गया था तो उन्हें पता ही नहीं था कि उन पर आरोप क्या है।
वहाँ उनसे सीधा पूछा गया कि क्या वो अपना जुर्म कबूल करते हैं? कटघरे में खड़े नम्बि नारायणन का एक ही सवाल था – “आरोप क्या है?” इसके बाद कोर्ट के ही एक कर्मचारी ने एक ब्लैक पेपर पर उनसे हस्ताक्षर कराया। उन्हें 11 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया और इस तरह से इस केस में वो आरोपित बन गए। फिर इस मामले को CBI ने अपने हाथों में ले लिया। 1995 में नम्बि मानवाधिकार आयोग के समक्ष पहुँचे।
आरोपमुक्त होने के बावजूद वैज्ञानिक नम्बि नारायणन ने जारी रखी सम्मान की लड़ाई
सितंबर 1996 में NHRC ने इस मामले में केरल के पुलिस अधिकारियों और IB के अधिकारियों के खिलाफ फैसला देते हुए मानवाधिकार के घोर उल्लंघन का मामला माना और 10 लाख रुपए तत्काल मुआवजा देने का निर्देश दिया। केरल सरकार NHRC के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट गई, लेकिन 2012 में उसके खिलाफ फैसला आया। तत्कालीन सरकार ने NHRC के आदेश पर रोक लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।
1996-97 में ही CBI ने पाया था कि इस मामले की जाँच करने वाले केरल पुलिस के अधिकारियों ने ही सारी गड़बड़ी की है। CBI ने उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भी केरल सरकार को लिखा था। CPI (M) के ईके नायनार तब केरल के मुख्यमंत्री थे। वामपंथी सरकार ने उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार का बहाना बनाया। सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आने के बाद भी एक दशक तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके बाद आई ओमान चंडी की सरकार, जिसे इस जासूसी कांड के कारण जनता के बीच पूरा फायदा मिला था। लेकिन उसने भी केरल के उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने का फैसला लिया। उसने 15 साल बीतने का बहाना बनाया। 2012 में नम्बि नारायणन हाईकोर्ट गए, जहाँ से केरल सरकार को फटकार मिली। मजबूरन सरकार को कार्रवाई के लिए कमिटी बनानी पड़ी। फिर वो सारे अधिकारी भी हाईकोर्ट पहुँचे।
केरल हाईकोर्ट ने एकल पीठ के फैसले को पलटते हुए कहा कि CBI की रिपोर्ट एक ओपिनियन भर है और ये सरकार के ऊपर है कि वो उसे माने या ना माने। आप सोचिए, बिना सबूतों के भारत के कई वैज्ञानिकों को गद्दार घोषित किए जाने से किसका फायदा हुआ होगा, क्योंकि इससे भारत की रॉकेट्री तकनीक कई वर्ष पीछे चली गई थी। CBI ने पाया कि भारतीय स्पेस प्रोग्राम को पटरी से उतारने के लिए ये पूरी साजिश रची गई थी।
विदेशी हाथों बिके हुए वामपंथियों की थी पूरी साजिश: नम्बि नारायणन के बिना पिछड़ा ISRO
सारा दोष केरल की तत्कालीन CPI(M) सरकार का था, जिसने अमेरिका के इशारे पर भारतीय वैज्ञानिकों का करियर बर्बाद कर दिया और भारतीय स्पेस व रॉकेट्री विभाग का काम ठप्प कर दिया। भारत तब स्पेस की दुनिया में आत्मनिर्भर नहीं था और वो अमेरिका व रूस जैसे देशों पर निर्भर था, जहाँ से करोड़ों के आयात हुआ करते थे। इन देशों को ज़रूर लगा होगा कि भारत आत्मनिर्भर बना तो उनकी कमाई बंद हो जाएगी।
कई मीडिया रिपोर्ट्स में ये बात भी सामने आती है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने इसके लिए केरल की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार में शामिल बड़े नेताओं और अफसरों को मोटी रकम मुहैया कराई थी। अब आप बताइए। गद्दार कौन? नम्बि नारायणन जैसे ISRO के वैज्ञानिक या भ्रष्ट नेता-अधिकारी?
मई 1996 में कोर्ट ने CBI की रिपोर्ट को मानते हुए आरोपित वैज्ञानिकों को बरी कर दिया लेकिन CPI(M) सरकार को उनका करियर बर्बाद करने की इतनी चुल्ल मची थी कि उसने मई 1998 में फिर से जाँच के आदेश दे दिए। 1996 में आरोपमुक्त होने के बावजूद सम्मान की लड़ाई 24 वर्षों तक चली। आखिरकार सितम्बर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके हक़ में फैसला दिया और केरल सरकार से कहा कि उन्हें 75 लाख रुपए बतौर मुआवजा दिया जाए।
जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश दिया कि नम्बि नारायणन को सारे लाभ दिए जाएँ और रकम की भरपाई गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों से हो। सोचिए, अगर नम्बि नारायणन ने अपने वादे के मुताबिक क्रायोजेनिक इंजन तभी बना लिया होता तो भारत स्पेस की दुनिया में 2 दशक आगे होता। 2019 में मोदी सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाजा। उन्होंने ‘Ready To Fire: How India and I Survived the ISRO Spy Case’ पुस्तक में अपने इस संघर्ष का जिक्र किया है।
लड़ाई अब भी जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने 3 सदस्यीय कमिटी बनाई है, जो जाँच करेगी कि ISRO वैज्ञानिक रहे नम्बि नारायणन को एक साजिश के तहत फँसाया गया था या नहीं। उनकी गिरफ़्तारी को सर्वोच्च न्यायालय पहले ही गैर-जरूरी बता चुका है और प्रताड़ना के एवज में मुआवजे का आदेश दिया जा चुका है। दिसंबर 2020 में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज डीके जैन की अध्यक्षता में इस पैनल की पहली बैठक हुई। नारायणन को पैनल के समक्ष बुलाया गया। उनकी कहानी फिर सुनी गई।
पूर्व रॉ अधिकारी एनके सूद ने खुलासा किया था कि ये सब रतन सहगल नामक एक व्यक्ति ने किया। उन्होंने बताया था, “उसने ही नाम्बी नारायणन को फँसाने के लिए जासूसी के आरोपों का जाल बिछाया। ऐसा उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने के लिए किया। रतन जब आईबी में था, तब उसे अमेरिकन एजेंसी सीआईए के लिए जासूसी करते हुए धरा जा चुका था। अब वह सुखपूर्वक अमेरिका में जीवन गुजार रहा है। वह पूर्व-राष्ट्रपति अंसारी का क़रीबी है।”
महाराष्ट्र में कोरोना के बढ़ते मामलों के बावजूद राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ माकूल नहीं हैं। हर कोई एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भाग रहा है। बुधवार (31 मार्च 2021) को एक कोरोना मरीज इन्हीं सब चीजों से तंग आकर नगर निगम के कार्यालय पहुँच गया। मरीज के हाथ में ऑक्सीजन सिलेंडर देख अधिकारी भी घबरा गए। सबने फटाफट एंबुलेंस बुलवाकर उसे बिटको अस्पताल के कोविड वार्ड में भर्ती कराया। लेकिन बिगड़ी तबीयत के चलते गुरुवार रात को उसकी मौत हो गई।
38 वर्षीय बाबासाहेब कोले नासिक के सिडको के कामटवाड़े इलाके के निवासी थे। उनकी पत्नी और दो बच्चे अब अकेले हैं। यदि समय पर उचित इलाज मिलता तो शायद आज वह जिंदा होते। इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है। इसमें कोरोना संक्रमित मास्क लगाए नगर निगम कार्यालय के गेट पर बैठे हैं और पास में उनका एक रिश्तेदार है।
महाराष्ट्र में लापरवाही की हद:नासिक में 3 दिन तक कोरोना पेशेंट को बेड नहीं मिला, ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ निगम दफ्तर पहुंचा; इलाज नहीं मिलने से मौत https://t.co/xtorqHLUjW
मामले की जाँच में पता चला है कि मरीज तीन दिन से कोरोना पॉजिटिव था और उनकी हालत लगातार बिगड़ रही थी। काफी मशक्कत के बाद भी किसी अस्पताल में उन्हें बेड नहीं मिल रहा था। इसलिए मजबूरी में मरीज को अपना ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर नगर निगम के दफ्तर जाना पड़ा। इससे पहले वह स्थानीय पार्षद से भी अस्पताल में एक बेड दिलवाने के लिए गुहार लगा चुके थे। लेकिन उन्हें बेड नहीं मिला और हालत दिन पर दिन बिगड़ती रही।
परिजनों की मानें तो कोले का ऑक्सीजन लेवल सामान्य स्तर से 40 प्रतिशत नीचे गिर गया था। कोले की पत्नी ने बताया,
“दो-तीन दिन पहले उन्हें बिटको अस्पताल ले जाया गया था। वहाँ से वह दूसरे अस्पताल गए, वहाँ से सरकारी मेडिकल कॉलेज पहुँचे। मेडिकल कॉलेज ने कहा कि उनके पास कोई बिस्तर नहीं है। हम फिर दूसरे अस्पतालों में गए। किसी ने उन्हें भर्ती नहीं किया। फिर हम सिविल (अस्पताल) वापस आए और वहाँ उन्हें ऑक्सीजन मिली। बाद में किसी ने हमारी नहीं सुनी।”
बता दें कि महाराष्ट्र पुलिस और नगर निकाय ने इस मामले में कहा है कि वह अपनी जाँच कर रहे हैं। उन्हें पता लगाना है कि आखिर मरीज को नगरपालिका भवन जाने के लिए किसने उकसाया।
उल्लेखनीय है महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण के केस लगातार बढ़ रहे हैं। बुधवार को वहाँ 40 हजार नए केस आए। पिछले माह आदित्य ठाकरे भी कोविड संक्रमित हो गए थे। बाद में उद्धव ठाकरे और उनकी पत्नी भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। ऐसे में सबको लग रहा था कि इतने केस देखकर कम से कम महाराष्ट्र सराकर राज्य में लॉकडाउन की घोषणा कर ही देगी। हालाँकि महाराष्ट्र के सीएम ठाकरे ने नई सख्तियों वाली SOP जारी कर दी, लेकिन लॉकडाउन नहीं लगाया है।
सऊदी अरब के दैनिक अखबार ‘सऊदी गजट’ ने अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार के द्वारा किए जा रहे विकास और जन कल्याण के कार्यों की प्रशंसा की है। सऊदी के इस दैनिक अखबार ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर के युवा मोदी सरकार के इस महत्वपूर्ण निर्णय के प्रति सकारात्मक रवैया अपना रहे हैं और देश की विकास यात्रा में शामिल होना चाहते हैं।
सऊदी गजट में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर के वो स्थानीय नेता गलत साबित हो चुके हैं जो यह कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घाटी में कोई भी तिरंगा लेकर नहीं चलेगा। केंद्र सरकार की छात्रवृत्ति योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए अखबार ने कहा कि इन योजनाओं की सहायता से जम्मू-कश्मीर के कई गरीब विद्यार्थी देश के बड़े संस्थानों में एडमिशन ले रहे हैं। कई छात्र अपनी डिग्री पूरी करके बड़ी व्यापार संस्थाओं में नौकरी कर रहे हैं।
सऊदी गजट ने लिखा है कि केंद्र की मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि केंद्र सरकार के द्वारा लागू की गई योजनाओं का पूरा लाभ जम्मू-कश्मीर के लोगों तक पहुँचे। अखबार ने ‘हिमायत’ योजना के विषय में बताते हुए कहा है कि इस योजना के अंतर्गत कश्मीरी युवाओं को ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसके कारण उन्हें पर्यटन जैसे कई अन्य क्षेत्रों में रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
अखबार ने जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार की नीतियों की सफलता की प्रशंसा करते हुए लिखा कि जो युवा पिछले तीन दशकों से भारत के विरुद्ध छद्म युद्ध कर रहे थे और पत्थरबाजी में सक्रिय रूप से शामिल रहते थे, आज उनके जीवन में बदलाव आ रहा है। ये युवा रोजगार और आर्थिक अवसरों की खोज में भाग ले रहे हैं। अखबार ने लिखा है कि भर्ती एजेंसियाँ जम्मू-कश्मीर में पूर्णतः सक्रिय हो चुकी हैं और भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से सैकड़ों कश्मीरी युवा रोजगार भी हासिल कर चुके हैं।
गौरतलब है कि 5 अगस्त 2019 को केंद्र की मोदी सरकार ने संसद में एक प्रस्ताव पारित कर जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-A के जाल से मुक्त कर दिया था। उसके बाद केंद्र सरकार लगातार जम्मू-कश्मीर को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए तत्पर है।