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TMC सांसद नुसरत जहां के करीबी बंगाली अभिनेता यश दासगुप्ता हो सकते हैं BJP में शामिल: रिपोर्ट्स

बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 से पहले अटकलें लग रही हैं कि बंगाली अभिनेता यश दासगुप्ता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा/ BJP) से जुड़ सकते है। रिपोर्ट के अनुसार, वह गेरुआ कैंप भाजपा ज्वाइन करेंगे।

यश दासगुप्ता के बारे में बता दें कि वह तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद नुसरत जहां के करीबी हैं। नुसरत के वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियों के बीच उनके और यश के डेटिंग करने की खबरें भी मीडिया में हैं।

बता दें कि नुसरत जहां ने दो साल पहले निखिल जैन से शादी की थी। इसके बाद वह कई पूजा-पाठ कार्यक्रमों में नजर आईं और कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं। मगर, हाल में नुसरत को यश के साथ राजस्थान में ट्रिप पर देखा गया था।

इस हफ्ते से पहले अपनी फिल्म डिक्शनरी के प्रीमियर के लिए भी उन्होंने दासगुप्ता के साथ एंट्री की थी। उस दौरान दोनों ने हाथ पकड़ा हुआ था।

उल्लेखनीय है कि दासगुप्ता ने साल 2016 में बंगाली फिल्म से डेब्यू किया था। उनकी साथी कलाकार भी टीएमसी सांसद मिमी चक्रवर्ती थीं। नुसरत ने दोनों के साथ SOS कोलकाता में अभिनय किया था। जनवरी में नुसरत से उनकी शादी में होने वाली दिक्कतों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इस पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था और जवाब में कहा था कि वो उनकी निजी जिंदगी है।

नुसरत ने अपने सोशल मीडिया अकॉउंट्स से अपने पति जैन के साथ हर तस्वीर को भी डिलीट कर दिया था। वहीं यश दासगुप्ता के साथ लगातार तस्वीरें शेयर कर रही हैं।

गौरतलब है कि साल 2019 में निखिल से शादी के बाद से नुसरत जहां कभी कट्टरपंथियों की टिप्पणियों या फिर भी मौलवियों के फतवों के कारण चर्चा में रह चुकी है। उन्होंने शादी के बाद जब पारंपरिक बंगाली बहु का फर्जी निभाते हुए सिंदूर खेला में हिस्सा लिया था तब वह चलताबागान दुर्गा पूजा पंडाल में गई थीं।

मीडिया से बात में उन्होंने कहा था, “मैं भगवान की सबसे प्यारी बच्ची हूँ। मैं सभी पर्व का आनंद उठा सकती हूँ। मैं अन्य बातों की अपेक्षा प्यार और मानवता को ज्यादा इज्जत देती हूँ। मैं बहुत खुश हूँ और विवादों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

प्रियंका गाँधी ने जिस किसान को लेकर फैलाया झूठ, उसी ने खोली पोल, कहा- वाड्रा को सही खबर पढ़कर रिएक्शन देना चाहिए

उत्तर प्रदेश प्रभारी व कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने उत्तर प्रदेश में गन्ने का बकाया भुगतान न होने को लेकर एक बार फिर से झूठ फैलाया। प्रियंका गाँधी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर निशाना साधते हुए ट्विटर पर लिखा कि 14 दिन में भुगतान एवं आय दुगनी का वादा जुमला निकला। प्रियंका गाँधी ने ट्वीट में लखीमपुर खीरी के एक किसान आलोक मिश्रा का भी जिक्र किया। 

प्रियंका गाँधी ने बुधवार (फरवरी 17, 2021) को ट्वीट करते हुए लिखा, “लखीमपुर खीरी के किसान आलोक मिश्रा का 6 लाख रुपए का गन्ना भुगतान बकाया है। उनको खेती, इलाज आदि के लिए 3 लाख का लोन लेना पड़ा। 10,000 करोड़ का भुगतान फँसा होने के चलते यूपी के लाखों किसानों का यही हाल है। 14 दिन में भुगतान एवं आय दुगनी का वादा जुमला निकला।”

इस ट्वीट के सामने आने के बाद एबीपी न्यूज की पत्रकार रुबिका लियाकत ने एक ट्वीट किया। इसमें उन्होंने लिखा, “प्रियंका के ट्वीट में जिस किसान आलोक मिश्रा का ज़िक्र है वो कह रहे हैं कि प्रियंका वाड्रा को सही खबर पढ़कर रिएक्शन देना चाहिए। मुझे पिछले साल का पूरा भुगतान मिल गया है।”

इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए यूपी कॉन्ग्रेस ने लिखा, “आप जैसे गोदी पत्रकारों को मर्म नहीं दिखता। जिस खबर का जिक्र किया गया है उसमें साफ लिखा है कि किसानों को 14 दिन में भुगतान का वादा किया गया था। साल बीत जाते हैं लेकिन किसानों को भुगतान नहीं मिलता, कर्ज लेना पड़ता है। किसान गन्ना की खेती छोड़ रहे हैं।”

इसके जवाब में रुबिका लियाकत ने आलोक मिश्रा के बयान का वीडियो ट्वीट किया। इस वीडियो में आलोक मिश्रा कह रहे हैं, “प्रियंका जी का क्या है कि उनको राजनीति करनी है, वो वैसे ही करती है। उनको न्यूज तो देखना नहीं है। देखना चाहिए कि पूरी न्यूज कम से कम क्या थी।”

बता दें कि बीते दिनों प्रियंका गाँधी वाड्रा ने फेसबुक पर एक वीडियो डालकर किसान आंदोलन को भड़काने की कोशिश की थी। जिसको PIB Fact Check ने झूठा दावा करार दिया और प्रियंका गाँधी के पोस्ट के साथ उसे फर्जी बताया।

प्रियंका गाँधी ने फेसबुक पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “जिस भारतीय रेलवे को देश के करोड़ों लोगों ने अपनी मेहनत से बनाया। भाजपा सरकार ने उस पर अपने अरबपति मित्र अडानी का ठप्पा लगवा दिया। कल को धीरे-धीरे रेलवे का एक बड़ा हिस्सा मोदी के अरबपति मित्रों को चला जाएगा। देश के किसान खेती-किसानी को भी आज मोदी के अरबपति मित्रों के हाथ में जाने से रोकने की लड़ाई लड़ रहे हैं।” हालाँकि पीआईबी ने इसका खंडन कर दिया था।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा फर्जी खबर फैलाना आम बात हो गई है। यहाँ तक कि उनके पार्टी के वरिष्ठ नेता भी इस सूची में शामिल हैं, जो अक्सर अपनी राजनीति को चमकाने के लिए भ्रामक सूचनाओं और फर्जी खबरें फैलाने का सहारा लेते है। 

नीलकंठेश्वर मंदिर का रास्ता हुआ साफ, दूर से दिखने लगा इतिहास: इरफान, महबूब, अहमद ने कर लिया था राजमहल पर कब्जा

57 साल के राजा मियाँ ने अपने हिस्से की आठ फुट ज्यादा जमीन मंदिर के रास्ते को चौड़ा और बेहतर बनाने के लिए आगे आकर दी है। राजा मियाँ ने इस बात का इंतजार नहीं किया कि सरकारी अमला आकर हिदायत या समझाइश दे। जो काम जरूरी है, वह कल पर नहीं टाला।

उनकी पहल ने 40 कारोबारियों को कई दशकों से बने उन दुकान और मकानों को पीछे करने का रास्ता खोल दिया, जिनसे एक 30 फुट चौड़ा रास्ता दस फुट की संकरी और दमघोंटू गली में बदल गया था। यह गली दुनिया भर के लोगों को भारतीय स्थापत्य कला के एक बेमिसाल नमूने की तरफ ले जाती थी।

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में उदयपुर का एक हजार साल पुराना नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर है, जो अब दूर से नजर आने लगा है। वाराणसी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचंड बहुमत का केंद्र है। उनका अपना चुनाव क्षेत्र।

ऐसी ही दमघोंटू गलियों में बाबा विश्वनाथ की विरासत सदियों से किसी की राह तक रही थी। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 150 किलोमीटर दूर विदिशा जिले में आठ हजार आबादी के उदयपुर में बाबा विश्वनाथ नीलकंठेश्वर के नाम से विराजे हैं। परमार राजवंश के शासक शिव के उपासक रहे और अपने ढाई-तीन सौ साल के राज में अपने विशाल राज्य में अनगिनत मंदिर, पाठशालाएँ और छात्रावास बनवाए।

बुंदेलखंड की सीमा पर उदयपुर उनके राज्य के सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्रों में से एक था, जहाँ चारों तरफ दुर्ग से घिरे नगर में एक राजमहल, कई बावड़ियाँ, दरवाजे, मंदिर, चौक-चबूतरे, कचहरी सदियों तक बनाए गए थे। गूगल मैप से पूरी नगर रचना को आज भी देखा-समझा जा सकता है, जो ऊपर पहाड़ी तक की गई किलेबंदी तक विस्तृत है।

परमारों के बाद भारत के इतिहास की एक लंबी अमावस का दौर है, जब लुटेरों के अंतहीन अंधड़ों ने भारतीय पहचान को जड़ से मिटाने की जिद्दी कोशिशें कीं। इस इलाके में शम्सुद्दीन इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, मोहम्मद तुगलक, शेर शाह सूरी के हमले, लूट और कब्जे क्रम से हैं। मुगलों के बाद नवाबों के नाम से नए कब्जेदारों की घातें हैं।

बाबर का चंदेरी पर हमला 1528 में हुआ और तब तक दूर से चुपचाप भारत की तबाही देख रहा उदयपुर चंदेरी सूबे का हिस्सा हो गया। पचास साल कोई कुछ न कहे तो किराएदार ही मालिक हो जाता है। फिर यह तो सदियों की खामोशी थी।

उदयपुर चश्मदीद है। भुक्तभोगी है। 1080 का एक शिलालेख महाराजा उदयादित्य से हमारा परिचय कराता है, जो मंदिर प्रांगण में ही है। हर दिन की एक रात है। हर रात की एक सुबह भी है।

एक इतिहासकार की हेरिटेज वॉक के बाद साल 2021 की जनवरी उदयपुर की एक नई भोर लेकर आई। यह एक उदास कस्बे की अँगड़ाई है, जो कुछ सदियों से हमसे कुछ कहना चाहता था। आजादी के बाद कुछ दशकों का इंतजार और किया। लगा कि नीलकंठेश्वर के तीसरे नेत्र की पलक बहुत हल्की सी हिली है।

इंसानों की तरह इतिहास के सब्र भी टूटते हैं। उदयपुर का सब्र टूटना ही था। उदयादित्य तो अब नहीं रहे। लोकतंत्र आ गया। अब हर नागरिक उदयादित्य है, जो अपने सेवकों को सिंहासन तक भेजता है। पुरखों की पुकार सुन ली गई। उदयपुर नींद से जाग गया।

मंदिर के बाहर आते ही गली के बाईं तरफ राजा मियाँ का आशियाना है। और आगे कोई हमीद है। सामने कोई बशीर है। बीच में रमेश हैं। प्रवीण हैं। राजकुमार हैं। सबके महान पुरखों ने एक साथ ये हैरतअंगेज निर्माण कार्य हजार साल पहले ही कर दिखाए थे।

वह सिर्फ मजदूरी या कारीगरी का हुनर नहीं था। उन्होंने पत्थरों पर जादू रच दिया था। आला दरजे की इंजीनियरिंग के साथ गणित, मूर्ति और चित्र कला के फनकारों ने जाने कहाँ-कहाँ से आकर अपने कला-कौशल की नुमाइश की होगी।

विशाल परिसरों में ये पूजास्थल दरअसल शिक्षा, संस्कृति और कला के विकसित और व्यस्त केंद्र होते थे, जहाँ देवताओं की साक्षी में एक संस्कारवान नई पीढ़ी गढ़ी जाती थी। राज्य इन्हें पोषित करता था। समाज सहेजता था। लेकिन यह इतिहास के अंधड़ों के उस पार की गौरव गाथाएँ हैं। बीच में सदियों की अमावस है। शिव के मस्तक का अर्द्धचंद्र उदयपुर में पूरी तरह खिलता हुआ हम देख रहे हैं।

कितने लोग कहाँ-कहाँ से आ रहे हैं। वे अब तक दर्शन करने, फूल-पत्ती अर्पित करने, अपनी कामनाओं के विष की पोटली शिव के कंठ पर टाँगने और तस्वीरें खिंचाने के लिए दमघोंटू गली से ऊपर सरकते हुए सिर पर चढ़े आते थे।

उदयपुर ने अपनी चादर झटकार दी है। सबसे पास का छोटा शहर है गंज बासौदा। उदयपुर के सामने ही जन्मा होगा। उदयपुर ने इसकी किलकारियाँ सुनी होंगी। फिर बड़ा होते हुए देखा होगा। अब वह पढ़-लिखकर कमाने वाला काबिल शहर हो गया है। आसपास के अनगिनत गाँवों के लोग रोजगार पाते हैं।

बच्चे भविष्य के सपने बुनने आते हैं। अपने पड़ोस में जीवन को नए सिरे से विकसित होता हुआ देखकर एक तजुर्बेकार बुजुर्ग की तरह उदयपुर बीते दशकों में कितना खुश हुआ होगा। अपनी दयनीय हालत पर उसने कभी न बासौदा से कुछ माँगा, न बासौदा से कुछ चाहा। विदिशा हो या भोपाल, हर रोज तमाम माँगने वाले ही नीलकंठेश्वर के द्वार तक आते रहे।

किसी की नजर न लगे, उदयपुर की यह अँगड़ाई कितनी हसीन है। इसका स्वागत करने का बासौदा वालों का हक पहला है। वे अब महादेव के समक्ष कुछ माँगने नहीं आ रहे। वे अपने अतीत को टटोल रहे हैं। कोई मधुर शर्मा अपनी टोली के साथ कैमरे लिए पहाड़-जंगल, गली-कूचों में झाँक रहे हैं। उनके सामने उदयपुर अपनी नई परतें खोल रहा है।

यूट्यूब के प्लेटफार्म नंबर-एक पर कोई अमित शुक्ला वैदिक एक्सप्रेस में जानकारियों की शानदार सवारी करा रहे हैं। कोई गगन दुबे मंदिर की भित्तियों पर मौन मूर्तियों से बात कर रहे हैं। उनके पास प्रश्न हैं। खंडित और आहत देवी उनसे अपनी व्यथा कह रही हैं। कोई प्रवीण शर्मा एक पुराने घरों की अंधेरी दीवारों से कान लगाए हैं। हर दीवार कुछ कहती है। हर स्तंभ को अपनी बारी का इंतजार है। हर बावड़ी आपके आने से प्रसन्न है।

मलबे के बड़े से ढेर के पास एक प्राचीन जैन मंदिर में कोई णमोकार मंत्र गुनगुना रहा है। वह साक्षी है कि कभी यह नगर महान तीर्थंकरों के समृद्ध अनुयायियों की व्यावसायिक और सामाजिक सेवा का भी सक्रिय केंद्र रहा होगा। आज सिर्फ तीन परिवार जैनियों के हैं।

मलूकचंद जैन के पास अपने घर के हिस्से के उस टीले की कहानी है, जिसकी खुदाई में दशकों पहले शानदार कलाकृतियों वाला एक पुराना आवास दफन था। श्रद्धा और परिश्रम से उसकी सफाई की गई थी। वही अब उनका घर है, जो कथा उदयपुर का एक प्रकाशित पृष्ठ है।

उदयपुर की इस करवट को निकट से देखने देश के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. सुरेश मिश्र डेढ़ महीने में दूसरी बार आए तो सबसे ताजा कहानी राजा मियाँ ने सुनाई। खुश होकर बताया कि उन्होंने अपनी ज्यादा जगह खाली की है। बिना किसी आदेश के। उदयपुर की भलाई के लिए कमाया गया यह उनके हिस्से का सवाब है।

आज के नुकसान की भरपाई कल वे लोग कर देंगे, जो दुनिया भर से इस महान विरासत के दर्शन करने आएँगे। बेशक इस काम में जनप्रतिनिधियों, प्रशासन के स्थानीय अधिकारियों, समाज के जागरूक लोगों की भूमिका भी सकारात्मक और प्रेरक है। डॉ. मिश्र ने झूमकर राजा मियाँ को गले लगा लिया। वसंत पंचमी की दोपहर गर्भगृह में भीतर नीलकंठेश्वर महादेव तक सारे शुभ समाचार पहुँच रहे थे।

गौरतलब है कि महल की एक दीवार को तोड़कर सीमेंट और लोहे का दरवाजा लगा दिया गया था और पुरानी दीवार पर एक साइन बोर्ड टाँग दिया गया था- ‘निजी संपत्ति, उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर-822, वार्ड नंबर-14।’ इस पर काजी सैयद इरफ़ान अली, महबूब अली और अहमद अली का नाम लिखा था।

अब नीलकंठेश्वर मंदिर तक पहुँचने का रास्ता अब लगातार ठीक होता जा रहा है, क्योंकि निर्माण कार्य ने गति पकड़ ली है। जो रास्ता पहले तक मात्र 10 फ़ीट का था, वो अब 30 फ़ीट का हो गया है। मार्ग को सुगम बनाने में न सिर्फ प्रशासन, बल्कि स्थानीय लोगों ने भी खासी रुचि दिखाई और योगदान दिया। लोगों ने स्वेच्छा से अपने घरों को 10-15 फ़ीट खोद डाला और सड़क व नाली के लिए रास्ता दे दिया।

नोट: ऑपइंडिया के लिए यह लेख विजय मनोहर तिवारी ने लिखा है।

दिशा रवि, दीप सिद्धू जैसों के साथ खुलकर आया खालिस्तानी संगठन, PM मोदी को बैन करवाने के लिए चलाया ई-मेल कैंपेन

खालिस्तानी आतंकी समूह सिख फॉर जस्टिस (SFJ) का जनरल काउंसल गुरपतवंत सिंह पन्नू भारत में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के इल्जाम में गिरफ्तार दिशा रवि, दीप सिद्धू, नवदीप कौर और निकिता जैकब व अन्य के समर्थन में आया है।

SFJ की वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट

उसने बताया है कि उसके खालिस्तानी संगठन ने इन कार्यकर्ताओं के समर्थन में एक वेबसाइट बनाई है। उसका मानना है कि इन कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का चार्ज लगाकर इनसे इनका प्रोटेस्ट का अधिकार छीना गया है।

संगठन द्वारा शेयर किया गया पोस्टर

उसने ट्विटर4फॉर्मर वेबसाइट को लेकर कहा कि इससे अमेरिकी, कनाडाई, ब्रितानी, जर्मनी, अस्ट्रेलिया, इटली, स्वीडन और ईयू जैसे विदेशी राजदूतों पर दबाव बनाने में मदद मिलेगी कि वह पीएम मोदी को कहीं भी आने जाने से बैन करें। पन्नू ने अनुरोध किया है कि प्रदर्शनकारी इस इमेल कैंपेन में सहभागी बनें।

ईमेल फॉरमैट में लिखा है दिशा रवि का नाम

SFJ का पोस्टर वेबसाइट पर देखा जा सकता है। यह बताता है कि ये वेबसाइट टूलकिट के क्रिएटर्स और दंगाइयों के लिए बनाया गया है। इस पर राजदूतों को ईमेल भेजने का लिंक भी है।

वेबसाइट पर पोस्टर

इसमें अलग से दिशा रवि का नाम है। जिसके साथ लिखा गया है, “दिशा रवि एक पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं जिन्हें गिरफ्तार किया गया है और टूल किट बनाने व शेयर करने के लिए देशद्रोह की धारा लगाई गई है।”

वेबसाइट का स्क्रीनशॉट

हमने जब वेबसाइट के बारे में और जानकारी जुटाई तो हमें पता चला कि इसे 16 फरवरी 2021 को ही बनाया गया है।

इसमें कॉन्टैक्ट की जानकारी छिपाई हुई है लेकिन पंजीकृत संगठन का नाम पन्नू लॉ फर्म पीसी है, जिसका दफ्तर न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया में है। ये कंपनी सिख फॉर जस्टिस के गुरपतवंत सिंह पन्नू की है।

टूलकिट का पूरा मामला

बता दें कि 4 फरवरी 2021 को पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने सोशल मीडिया पर टूलकिट पोस्ट किया था। इस टूलकिट से साफ पता चला था कि कैसे भारत के विरोध में एक वैश्विक प्रोपगेंडा चलाया जा रहा है, जिसके लिंक खालिस्तान समर्थक व खालिस्तानी संगठनों से है।

पुलिस ने इस टूलकिट का संबंध 26 जनवरी को हिंसा के साथ देखते हुए  इस केस में मुकदमा दर्ज किया था। बाद में कई लोग इसकी एडिटिंग, इसे बनाने और इसके डिस्ट्रिब्यूट करने के लिए धरे गए। इनमें एक 21 साल की दिशा रवि भी थीं। कथितततौर पर दिशा की ग्रेटा से मैसेज पर बात हुई थी और उससे ये भी कहा था कि उसका ये ट्वीट उनका यूएपीए लगवा सकता है।

बाद में निकिता जैकब और शांतनु के ख़िलाफ़ गैर जमानती वारंट जारी हुआ, जो मामला दर्ज होने के बाद से ही फरार थे। दोनों ने अपनी बेल के लिए उच्च न्यायालयों में आवेदन किया था, जिसमें से निकिता को 10 दिन की ट्रांजिट जमानत दी गई।

पुलिस ने दंगों और पीटर फ्रेडरिक के बीच के लिंक का भी खुलासा किया, जिसके आतंकी संगठनों से जुड़े होने के कारण खूफिया एजेंसी 2006 से नजर बनाए हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने बताया कि इन तीन लोगों ने 67 अन्य लोगों के साथ खालिस्तानी संगठन के साथ जूम कॉल की थी, जिसमें ये बात हुई थी कि आखिर दंगों के लिए प्रदर्शनकारियों को कैसे उकसाया जाए।

कुमारस्वामी और सिद्धारमैया ने राम मंदिर निधि समर्पण अभियान को लेकर उगला जहर, कहा- RSS कर रहा नाजियों वाले काम

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अयोध्या श्री राम मंदिर समर्पण निधि अभियान पर सवाल उठाए हैं। जेडीएस नेता और पूर्व सीएम एचडी कुमारस्वामी के बयान पर विश्व हिंदू परिषद ने अपनी नाराजगी प्रकट की है। कुमारस्वामी ने आरोप लगाते हुए कहा था कि राम मंदिर निधि समर्पण अभियान के कार्यकर्ता कर्नाटक में राम मंदिर के नाम पर पैसा इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन जो पैसा नहीं दे रहा है उसका नाम लिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि नाजियों ने जो जर्मनी में किया था, वैसा ही RSS यहाँ पर कर रहा है।

इसके बाद कुमारस्वामी ने एक बयान में कहा, “मुझे राम मंदिर के लिए पैसे के योगदान की चिंता नहीं है। यदि आवश्यक हुआ तो मैं भी योगदान दूँगा। लेकिन सही जानकारी कौन दे रहा है? पैसा इकट्ठा करने में पारदर्शिता कहाँ है? कई लोग दूसरों को धमकी देकर पैसा इकट्ठा कर रहे हैं।”

इस बयान पर वीएचपी की नाराजगी के बाद कुमारस्वामी ने सोमवार (फरवरी 16, 2021) कहा कि उन्होंने किसी भी संगठन के नाम का जिक्र नहीं किया है। उन्होंने कहा, “किसने दान देने की अनुमति दी है? इसके लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती है। किस आधार पर लोग सड़कों पर और हर गाँव में पैसा इकट्ठा कर रहे हैं? वे किसको हिसाब देंगे? भावनाओं को आहात कर पैसा जुटाया जा रहा है।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, VHP ने कुमारस्वामी के बयान को बेहद गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि विभिन्न संगठनों के स्वयंसेवक समाज के सभी वर्गों तक पहुँच रहे हैं और उन्हें सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये स्वयंसेवक लोगों से पैसे की माँग भी नहीं करते हैं फिर भी लोग अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए योगदान भी दे रहे हैं क्योंकि सभी का दृढ़ता से मानना ​​है कि श्रीराम भारत की पहचान हैं।

वहीं, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने मंदिर निर्माण के लिए दान को लेकर कहा, “अगर वे चंदा माँगने आएँगे तो मैं बोल दूँगा कि अयोध्या में विवादित राम मंदिर के लिए चंदा नहीं दूँगा। मैं कहीं दूसरी जगह बन रहे राम मंदिर के लिए दान दे दूँगा। भले ही मामला सेटल हो गया है लेकिन विवाद हमेशा बरकरार रहेगा।”

मछुआरों को मूर्ख समझते हैं राहुल गाँधी? मंत्रालय के नाम पर पुडुचेरी में क्यों बोला झूठ… जबकि मौजूद है मत्स्य विभाग

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अक्सर अपने बयानों और आँकड़ों की वजह से चर्चा में रहते हैं, क्योंकि इसका न तो सिर होता है और न ही पैर। पुडुचेरी में अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले 4 दिनों की यात्रा के लिए वहाँ पहुँचे राहुल गाँधी ने तीनों कृषि कानूनों को मछुआरों और मत्स्य पालकों से जोड़ दिया और कहा कि उनके लिए कोई मंत्रालय नहीं। लेकिन, इस दौरान जानकारी के अभाव में उन्होंने अपनी ही किरकिरी कराने वाली बात कह दी।

राहुल गाँधी ने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने उन किसानों के खिलाफ तीन कृषि कानून पारित कर दिए, जो इस देश की रीढ़ हैं। उन्होंने आगे कहा, “आपलोग सोच रहे होंगे कि मछुआरों की बैठक में मैं किसानों की बात क्यों कर रहा हूँ। असल में मैं आप लोगों को समुद्र का किसान मानता हूँ। अगर किसानों के लिए दिल्ली में अलग से मंत्रालय हो सकता है तो फिर समुद्र के किसानों के लिए क्यों नहीं?”

सच्चाई ये है कि मत्स्य पालन और बाजार के लिए पहले से ही विभाग है और ये ‘पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन’ मंत्रालय के अंतर्गत आता है। वर्तमान में बिहार के बेगूसराय से सांसद गिरिराज सिंह इसके मंत्री हैं। सरकार मत्स्य पालन से जुड़े किसानों के लिए ‘प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना’ भी लेकर आई है। यही विभाग अंतर्देशीय तथा समुद्री मत्स्यन व मात्स्यिकी से जुड़े मामलों को भी देखता है। इस हिसाब से समुद्री मछुआरों के हित भी इसी में आते हैं।

इस मंत्रालय का लक्ष्य है कि ताजा तथा खारे जल में जलकृषि का विस्तार और मछुआरा समुदाय आदि का कल्याण के लिए कार्य किया जाए। इसीलिए, राहुल गाँधी ने जो कहा कि मछुआरों और मत्स्य पालन के लिए दिल्ली में विभाग नहीं, वो झूठ है। सरकार मछली पालन के लिए ऋण देने की व्यवस्था भी करती है और किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित भी करती है। देश में एक ‘मात्स्यिकी विकास बोर्ड’ भी है, जो इन मामलों को देखता है।

इसी तरह से राहुल गाँधी ने हाल ही में राजस्थान के अजमेर में कहा था कि कृषि दुनिया का सबसे बड़ा बिजनेस है, जो 40 लाख करोड़ रुपए का है। अगले ही दिन असम के शिवसागर में उन्होंने कहा कि पूरा ’80 लाख करोड़ का हिंदुस्तान का सबसे बड़ा बिजनेस’ सिर्फ दो लोगों के हाथ में चला जाएगा। उन्होंने दोनों जगह जाकर अपने आँकड़े बदल दिए।

अहमदाबाद: GF की मौजूदगी में साहिल शेख ने दोस्त तसकील के साथ मिल कर किया युवती का रेप, मामला दर्ज

मुंबई की 19 साल की युवती के साथ अहमदाबाद के नारोल इलाके के एक फ्लैट में रविवार (फरवरी 14, 2021) को सामूहिक दुष्कर्म का मामला उजागर हुआ। पीड़िता केटरिंग के काम से अहमदाबाद के फ्लैट पर गई थी। वहाँ केटरिंग के कॉन्ट्रैक्टर और उसके दोस्त ने एक अन्य युवती की मौजूदगी में उसके साथ मिल कर रेप किया। 

कॉन्ट्रैक्टर की पहचान साहिल शेख और तसकील कुरैशी के रूप में हुई। इनके साथ इस केस में तान्या दानवाल को भी नामजद किया गया है। तान्या साहिल की प्रेमिका है और जब पीड़िता के साथ रेप किया गया, तब वह वहीं पर मौजूद थी।

पुलिस के मुताबिक, पीड़िता शनिवार को अहमदाबाद गई थी। जहाँ उसे आक्रुति नगर के नारोल के एक फ्लैट में ले जाया गया। फ्लैट पर कई लोग मौजूद थे। इनमें से तीन के साथ उसने शराब भी पी व बाकी 6 अन्य लोग हॉल में मौजूद रहे। 

रात के करीब 10:30 बजे, जब सब खत्म हुआ तो उनमें से चार लोग बाहर आ गए। उनके साथ पीड़िता भी निकली लेकिन उसने पी ज्यादा हुई थी इसलिए सोफे पर गिर गई। रात के करीब 11:30 बजे शेख और कुरैशी उसे दूसरे कमरे में ले गए। शेख ने पहले उसका बलात्कार किया फिर कुरैशी ने। इस बीच दानवाल कमरे में भी गई, लेकिन बाद में वापस आ गई।

देर रात जब युवती को दर्द होना शुरू हुआ तो उसकी आँख खुली। उसने देखा कि प्राइवेट पार्ट से खून निकल रहा था, तब उसे पता चला कि उसका रेप किया गया है। उसके हल्ला मचाने पर वहाँ मौजूद अन्य लोगों को भी घटना का पता चला। बाद में अन्य महिलाओं के साथ सोमवार रात साढ़े 3 बजे पीड़िता थाने पहुँची और शिकायत लिखवाई।

पुलिस ने कुरैशी और दानवाल को फौरन हिरासत में लिया जबकि साहिल मौके से फरार हो गया। पुलिस के अनुसार शिकायत में अन्य महिलाओं के बयान भी दर्ज किए गए हैं और उसके बाद उन्हें उनके घर जाने दिया गया। पीड़िता को अस्पताल ले जाकर मेडिकल टेस्ट करवाया गया है। अब आगे की आवश्यक कार्रवाई चल रही है।

‘जिसकी हर बात मानती थी, उसने ही मुझे…’: सलमान खान से शादी करने 16 साल की लड़की Pak से मुंबई आ गई थी

पूर्व अभिनेत्री सोमी अली ने अपने छोटे से बॉलीवुड करियर को लेकर बातें की हैं। उस दौर में उन्होंने सैफ अली खान और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेताओं के साथ स्क्रीन शेयर किया था, लेकिन सलमान खान के साथ नाम जुड़ने के बाद वो खासी चर्चा में आई थीं। पाकिस्तान के कराची में जन्मी सोमी अली फ़िलहाल अमेरिका में ‘नो मोर टीयर्स’ नामक NGO का संचालन करती हैं। उन्होंने कहा है कि 16 वर्ष की उम्र में उनके मुंबई आने का एक ही कारण था – सलमान खान के साथ शादी।

उन्होंने ‘बॉम्बे टाइम्स’ को बताया, “वो 1991 का वर्ष था और मैं मात्र 16 साल की थी। मैंने ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म देखी और सोचा कि मुझे इस व्यक्ति से शादी करनी है। मैंने अपनी माँ से कह दिया कि मैं कल ही भारत जा रही हूँ। उन्होंने मुझे मेरे कमरे में भेज दिया लेकिन मैं विनती करती रही कि मुझे सलमान खान के साथ शादी करने के लिए भारत जाने दो।” बता दें कि 1989 में आई ‘मैंने प्यार किया’ उस दशक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी।

सोमी अली ने कहा कि वो जानती थीं कि सलमान खान उनके ‘रक्षक’ बनेंगे। उन्होंने अपने पिता को फोन कर के भारत जाने की जिद की और मुंबई में रिश्तेदारों से मिलने का बहाना बनाया। उन्होंने कहा कि उन्हें ताजमहल देखना है। सोमी अली ने कहा कि उनका बचपन पाकिस्तान में बीता, फिर वो मियामी आ गईं। उन्होंने कहा कि ताजमहल का बहाना तो बनाया, लेकिन अब तक वो आगरा नहीं जा सकी हैं।

उन्होंने कहा कि मुंबई में लोग उनका मजाक बनाते थे, क्योंकि वो एक ‘स्ट्रगलिंग एक्टर’ होकर भी फाईब स्टार होटल में रहती थीं। उन्होंने कहा कि एक प्रोडक्शन हाउस में जब वो गई थी तो उन्होंने सलमान खान को देखा। उन्होंने चंकी पांडेय, जितेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती जैसे अभिनेताओं के साथ किए गए काम को याद करते हुए कहा कि 1997 में आई ‘चुप’ में उन्हें ओम पुरी के साथ काम करने का मौका तो मिला, लेकिन उसके बाद उनका करियर ही ‘चुप’ हो गया।

सोमी अली ने कहा कि वो कुछ ज्यादा ही अमेरिकन बन गई थीं और टॉमबॉय हो गई थीं, इसीलिए बॉलीवुड में वो मिसफिट थीं। उन्होंने कहा कि उनके कारण कुछ रिलेशनशिप भी बर्बाद हो गए, क्योंकि उन्हें कोई गलत सलाह दे रहा था – जिसकी वो हर बात मानती थीं। सोमी ने बताया कि उनका रिलेशनशिप भी फेल हो गया, जिसके बाद वो 1999 में मियामी लौट आईं। उन्होंने नौवीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन वापस आकर साइकोलॉजी में डिग्री ली।

बकौल सोमी अली, उन्होंने सलमान खान से कई सालों से बात नहीं की है और चीजों को जाने देने का यही सही तरीका है। उन्होंने कहा, “जब नए लोग ज़िंदगी में आते हैं तो हम उनसे सीखते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। एक समय आते हैं जब हमें मूव ऑन करना होता है। बचपन में एक्टिंग नहीं कर सकी तो अब क्या वापसी होगी। मैं मुंबई की पानी-पूरी और पाव-भाजी को मिस करती हूँ।”

हिजाब पहनी लड़कियों को जेल, गुबंद वाली मस्जिद खत्म: उइगरों के बाद चीन ने कसा उत्सुल मुस्लिमों पर शिकंजा

उइगर मुस्लिमों के साथ होते अत्याचार की खबरों के बीच पता चला है कि अब चीन की नजर सान्या क्षेत्र के उत्सुल मुस्लिमों पर है। इस क्षेत्र में 10 हजार से भी कम संख्या में ये समुदाय रहता है। मगर, वहाँ ‘चीनी सपने’ को साकार करने की आड़ में इस समुदाय पर अप्रत्यक्ष रूप से हमले होने शुरू हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार, सान्या में अब मुस्लिम घरों व दुकानों के बाहर लिखे मजहबी नारों जैसे अल्लाह-हू-अकबर को स्टिकर्स की मदद से ढका जा रहा है। हलाल खाने के बोर्ड को भी रेस्त्रां आदि से हटाया जा रहा है। इस्लामी स्कूल बंद हो रहे हैं और हिजाब पहनने वाली लड़कियों को जेल भेजने की कोशिश हो चुकी है।

न्यूऑर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि चीनी सरकार की मुस्लिम समुदाय के ऊपर ऐसी मनमानियाँ मजहबी कट्टरता रोकने के नाम पर हो रही हैं। उइगर मुस्लिमों के बाद उत्सुल मुस्लिमों पर ऐसा नियंत्रण चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का असली तानाशाही चेहरा उजागर करता है। 

फ्रॉस्टबर्ग स्टेट यूनिवर्सिटी में एक एसोसिएट प्रोफेसर जो मैरीलैंड कहते हैं कि उत्सुल मुस्लिमों पर नियंत्रण का कड़ा होना स्थानीय समुदायों के खिलाफ चीनी कम्युनिस्ट अभियान के असली चेहरे को प्रकट करता है। वह कहते हैं कि राज्य का कड़ा नियंत्रण बताता है कि ये सब पूर्ण रूप से इस्लाम विरोधी है।

बता दें कि चीन में इस्लाम को दबाने का काम साल 2018 के बाद से शुरू हुआ, जब चीनी कैबिनेट ने एक गुप्त निर्देश पास किया कि मस्जिदों और मदरसों में अरब के बढ़ते प्रभाव को रोका जाए। लेकिन अब हाल में सान्या में उत्सुल मुस्लिमों के साथ शुरू हुई मनमानी बताती है कि चीन अपनी ही सरकारी नीतियों के उलट चल रहा है। कुछ साल पहले तक इस समुदाय को और इसके मुस्लिम देशों से संबंधों को बढ़ावा दिया जाता था। लेकिन अब ये लोग उसी समुदाय की धार्मिक पहचान को मिटाने का काम कर रहे हैं।

मलेशियन-चीनी लेखक युसूफ लियो कहते हैं कि उत्सुल मुस्लिमों की अलग पहचान है। इन्होंने सदियों से भौगोलिक रूप से अलग रहकर, अपने मजहब को संभाले रखा। वह बताते हैं कि उत्सुल मुस्लिम कई मायनों में मलेशिया के लोगों जैसे हैं। वह एक जैसे कई गुण, जैसे भाषा, पोषाक, इतिहास, और खान-पान साझा करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय मस्जिद के मजहबी नेताओं को अब लाउडस्पीकर्स हटाने के लिए कहा जा रहा है। इसके अलावा, आवाज को भी कम रखने की बात कही गई। एक नई मस्जिद का निर्माण कथित रूप से अरब वास्तुशिल्प तत्वों के विवाद की वजह से रुका हुआ है। जहाँ पूरी तरह से धूल इकट्ठा हो गई है। स्थानीयों का कहना है कि शहर में 18 साल से कम उम्र के बच्चों को अरबी पढ़ने से रोक दिया गया है।

उत्सुल समुदाय के लोगों का कहना है कि वे अरबी सीखना चाहते थे, जिससे न केवल इस्लामी ग्रंथों को बेहतर ढंग से समझ सकें, बल्कि उन अरब के पर्यटकों के साथ भी बातचीत कर सकें, जो उनके यहाँ रेस्त्रां, होटल और मस्जिद में आते हैं। कुछ लोगों ने नए प्रतिबंधों पर नाराजगी व्यक्त की है।

एक स्थानीय मजहबी नेता ने कहा कि समुदाय को बताया गया था कि उन्हें अब गुंबद बनाने की अनुमति नहीं। वह नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बोले, ”मध्य-पूर्व की मस्जिदें इसी तरह हैं। हम चाहते हैं कि ये भी मस्जिदों की तरह दिखें, न कि घरों की तरह।”

बता दें कि इस संबंध में हाल ही में कुछ लोगों को सरकार की आलोचना करने पर हिरासत में भी ले लिया गया था। वहीं, पिछले साल सितंबर महीने में उत्सुल पैरेंट्स और कुछ स्टूडेंट्स ने हिजाब नहीं पहनने के आदेश के खिलाफ कई स्कूलों और सरकारी दफ्तरों के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया था।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ सान्या के उत्सुल मुस्लिमों को लेकर ऐसी खबर आई है वहीं चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार अब सामान्य हो चुका है। वहाँ चीनी अधिकारी उइगरों की पहचान मिटाने के लिए उन्हें कैंप में रखते हैं, उनके मस्जिदों रिकंस्ट्रक्ट करते हैं और घरों के इंटीरियर तक को बदलने का काम वहाँ किया जाता है। इसके अलावा पुरूषों को असहनीय पीड़ा और महिलाओं का बर्बरता से रेप उइगर मुस्लिमों के लिए कोई नई बात नहीं रह गई है।

17 साल की लड़की, फौज की 2 बटालियन और लगान माफी का लालच: अंग्रेजों को पानी पिलाने वाली रानी गाइदिन्ल्यू

“अरे ओ साम्बा! सरकार कितने का ईनाम रखी है रे हम पर?” एक मशहूर से वक्तव्य में ‘शोले’ का गब्बर पूछता है। जिस पर ईनाम ही न हो, वो बागी कैसा? सरकार के खिलाफ आपने कितनी बड़ी बगावत कर रखी है, इसका पता ही इसी बात से चलता है कि आपके सर पर ईनाम कितने का है।

आज जरूर लोकतंत्र है और जनता की चुनी हुई सरकार के खिलाफ होने के कारण किसी का ‘ईनामी’ होना बदनामी होती है। अर्थों के ऐसे बदलने की वजह से ही हम जब ‘टूलकिट पत्रकारों’ को ‘ईनामी पत्रकार’ कह देते हैं तो उनकी भावना भी आहत हो जाती है।

थोड़े पुराने दौर में ऐसा नहीं था। प्रकट तौर पर भले लोग न दर्शाएँ, लेकिन जनभावनाओं में ब्रिटिश सरकार का ‘ईनामी’ भारतीय जनमानस के लिए सम्मानित ही होता था। उनके सर पर ईनाम भी कोई छोटा मोटा नहीं था। फिरंगी दौर में आज से करीब सौ वर्ष पहले 1930 के दशक में जब उनके सर 500 का ईनाम रखा गया, तो ये काफी बड़ी रकम थी। ईनाम सिर्फ इतना ही नहीं था। जिस गाँव में वो पकड़ी जाती, उसके लिए भी अगले दस वर्ष तक टैक्स में छूट थी। इस सब के वाबजूद ये लड़की पकड़ी नहीं जा रही थी। करीब सत्रह साल की इस लड़की को पकड़ने के लिए फिरंगियों को असम रायफल्स की तीसरी और चौथी बटालियन उतारनी पड़ी।

सत्रह साल की ये लड़की रानी गाइदिन्ल्यू (Gaidinliu) थी। आज के असम, नागालैंड और मिजोरम के क्षेत्रों में उस समय ‘हेराका’ (शुद्धिकरण) का आन्दोलन चल रहा था। साथ ही साथ, ये आन्दोलन राष्ट्रवादी भी था, इसलिए इसके नेता जदोनाँग को फिरंगियों ने गिरफ्तार करके फाँसी पर चढ़ा दिया था।

तेरह वर्ष की आयु में हेराका से जुड़ी रानी गाइदिन्ल्यू ने अपने भाई की मृत्यु के बाद आन्दोलन की कमान संभाल ली। स्थानीय धार्मिक नेतृत्व का उभारना ईसाई फिरंगियों को पसंद तो नहीं ही आना था। इसलिए बड़े ईनाम और मजबूत सेना के साथ उनकी तलाश शुरू हुई। उन्हें 1932 में गिरफ्तार किया जा सका। नेहरू उनसे 1937 में मिले थे और अपने इंटरव्यू में रानी गाइदिन्ल्यू बुलाने के कारण गाइदिन्ल्यू के नाम में रानी जुड़ गया।

जब 1946 में भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट बनी, तब जाकर रानी गाइदिन्ल्यू को छोड़ा गया। तब तक वो अलग-अलग जेलों में करीब 14 वर्ष बिता चुकी थी। जेल से छूटने के बाद रानी गाइदिन्ल्यू में जुटी रहीं, लेकिन फिर क्रन्तिकारी के जीवन में क्रांति एक ही बार कब होती है?

रानी गाइदिन्ल्यू एक जेलिआँगरोंग समूह के कबीलों के भारत राष्ट्र के अन्दर होने की वकालत करती थीं। इसकी तुलना में नागा समूह के कबीलों में अलग देश की माँग उठ रही थी। रानी गाइदिन्ल्यू जिस हेराका संस्कृति की बात करती थी, वो प्रकृति इत्यादि के पूजन वाली व्यवस्था थी। नारी-विरोधी बैप्टिस्ट ईसाई नागा किसी पैगन व्यवस्था को जीवित कैसे रहने दे सकते थे? बैप्टिस्ट ईसाई व्यवस्था को चुनौती देने के कारण उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियाँ मिलने लगीं और अंततः उन्हें 1960 में फिर से भूमिगत होना पड़ा।

इन सबके बीच, ईसाइयों द्वारा उनकी हत्या की कोशिशों के बाद भी उनका हेराका आन्दोलन रुका नहीं। जब वो कोहिमा में थीं (1972) तब उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र मिला। दस वर्ष बाद (1982 में) उन्हें पद्मभूषण भी मिला था।

बैप्टिस्ट ईसाइयों का विरोध करने वाली स्वतंत्रता सेनानी की आवाज भी किस हद तक दबाई जा सकती है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि आपने हाल के दौर तक रानी गाइदिन्ल्यू के बारे में बिकने वाली मीडिया में कुछ भी नहीं पढ़ा। आज भी आप उनके बारे में सोशल मीडिया पर ही पढ़ पा रहे है। ऐसा तब है जब पत्रकारिता के विख्यात संस्थान – दिल्ली के आईआईएमसी का हॉस्टल ही रानी गाइदिन्ल्यू के नाम पर है!

बाकी जब गैर कॉन्ग्रेसी स्वतंत्रता सेनानियों को याद कीजिएगा तो रानी गाइदिन्ल्यू का नाम भी याद कर लीजियेगा। ये भी सोचियेगा कि जब कॉन्ग्रेस के अलावा दूसरे संगठनों के आंदोलनों की बात की जाती है, तो कैसे उन्हें संस्कृति-साहित्य आदि से बौद्धिक रूप से क्षीण बताया जाता है।

ऐसा तब है, जब रानी गाइदिन्ल्यू जिस हेराका आन्दोलन को चलाती रही, वो मुख्यतः अपनी सभ्यता-संस्कृति बचाने के लिए ही था। बाद तक इसे बैप्टिस्ट ईसाइयों का हिंसक विरोध झेलना पड़ा। आज उनकी याद इसलिए क्योंकि आज (17 फ़रवरी 1993) उनकी पुण्यतिथि होती है।