Home Blog Page 4025

मछुआरन ने तमिल में की राहुल गाँधी से शिकायत, कॉन्ग्रेसी CM नारायणसामी बोले- मेरी तारीफ कर रही है

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी को आज बुधवार (फरवरी 17, 2021) के दिन किसी और ने नहीं बल्कि पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी नारायणसामी ने बेवकूफ बना दिया। दरअसल मछुआरा समुदाय के बीच बैठक के दौरान एक महिला द्वारा की गई शिकायत का उन्होंने गलत अनुवाद कर दिया।

कॉन्ग्रेस पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी बुधवार को दो दिवसीय दौर पर पुडुचेरी पहुँचे। इस दौरान, पहले से ही अपनी सरकार बचाने का संकट झेल रहे कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री वी नारायणसामी एक विवाद में उलझ गए। उन पर आरोप लग रहे हैं कि जब एक बुजुर्ग मछुआरन ने जब राहुल से उनकी शिकायत की तो नारायणसामी ने उसकी शिकायत का झूठा अनुवाद कर राहुल को बरगला दिया। उन्होंने महिला की शिकायतों का सही अनुवाद करने की जगह कथित तौर पर यह कह दिया कि वह तो उनकी और उनकी सरकार की तारीफ कर रही है। महिला का यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है।

तमिल में बात करते हुए, दर्शकों में से एक महिला ने कहा कि पुडुचेरी में जब चक्रवात आया था तो सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस सरकार ने लोगों की मदद नहीं की। चूँकि राहुल गाँधी तमिल समझने में सक्षम नहीं तो मुख्यमंत्री वी नारायणसामी ने इस मौके का फायदा उठाते हुए महिला की शिकायत को अपनी तारीफ में बदल दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि महिला चक्रवात के समय उनके वहाँ भ्रमण करने और राहत सामग्री प्रदान करने की सराहना कर रही है।

हालाँकि, नारायणसामी राहुल गाँधी की आँखों में धूल झोंकने में सफल रहे, लेकिन यह सोशल मीडिया यूजर्स की नजरों से नहीं बच सका। तमिल जानने वाले सोशल मीडिया यूजर्स ने उनके झूठ को पकड़ लिया। करोड़ों सोशल मीडिया यूजर्स ने जोर देकर कहा कि पुडुचेरी के मुख्यमंत्री ने खुद को एक विवेकशील नेता के रूप में चित्रित करने के लिए महिला के बयान को गलत तरीके से इस तरह पेश किया जैसे उन्होंने उनके कल्याण के लिए अथक प्रयास किए हों।

महिला जाहिर तौर पर पिछले साल नवंबर माह में चक्रवाती तूफान निवार (Cyclone Nivar) के आने पर सत्तारुढ़ कॉन्ग्रेस द्वारा किसी भी तरह की सहायता न करने को लेकर शिकायत कर रही थी। महिला ने कहा कि मुख्यमंत्री उनसे मिलने नहीं आए। हालाँकि, मुख्यमंत्री ने उनकी शिकायत को यह कहते हुए अपने पक्ष में तब्दील कर लिया कि वह केंद्र शासित प्रदेश में चक्रवात आने के समय उनके द्वारा किए गए कामों की तारीफ कर रही है।

पुडुचेरी को चक्रवात निवार ने गंभीर रूप से प्रभावित किया था। पुडुचेरी में नवंबर, 2020 में हुई कुल हानि 400 करोड़ रुपए आँकी गई थी। चक्रवात की वजह से राज्य में भारी बारिश हुई। तमिलनाडु में कम से कम तीन लोग मारे गए, 1,000 से अधिक पेड़ उखड़ गए और कुछ निचले इलाकों में भारी बारिश के बाद जल-जमाव हो गया।

राजनीतिक संकट के बीच पुडुचेरी में राहुल गाँधी

पुडुचेरी में राजनीतिक संकट के बीच और चुनाव के दौरान, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी केंद्र शासित प्रदेश में पार्टी के चुनाव अभियान को शुरू करने के लिए थे। अपने अभियान के एक हिस्से के रूप में, गाँधी ने एक बैठक में भाग लिया जहाँ उन्होंने मछुआरा समुदाय के साथ बातचीत की और बाद में छात्रों के साथ चर्चा की।

पुडुचेरी में हाल के दिनों में कॉन्ग्रेस विधायकों के इस्तीफे के बाद वहाँ की कॉन्ग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई है। ऐसा लग रहा है कि केंद्र शासित प्रदेश का राजनीतिक ड्रामा अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों तक यूँ ही चलता रहेगा। केंद्र सरकार ने उप-राज्यपाल किरण बेदी को अपने पद से हटा दिया है। उनकी जगह तेलंगाना की राज्यपाल तमिलसाई सुंदरराजन को पुडुचेरी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।

पुडुचेरी में कॉन्ग्रेस की सरकार अल्पमत में आ गई है क्योंकि पार्टी के एक विधायक ने इस्तीफा दे दिया है। मुख्यमंत्री वेलु नारायणसामी (Velu Narayanasamy) सरकार ने एक विधायक के जाने से बहुमत खो दिया है। विधायक ए जॉन कुमार ने मंगलवार (फरवरी 16, 2021) को विधानसभा से अपना इस्तीफा स्पीकर वीपी शिवाकोलुन्थु को सौंप दिया है। कॉन्ग्रेस यहाँ DMK (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के साथ गठबंधन बना कर सत्ता में है।

100 दिनों तक दिल्ली बंधक, हिन्दू धर्म का अपमान, संविधान को गाली: वो शाहीन बाग़, जहाँ पनपा दिल्ली दंगों का बीज

अब जब दिल्ली में चल रहे तथाकथित किसान आंदोलन के 3 महीने पूरे होने को हैं, हमें लगभग 1.5 वर्ष पहले शुरू हुए एक और ‘आंदोलन’ को याद करना चाहिए, जो अंत होते-होते दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में बदल गया था। ठीक उसी तरह, जैसे ‘किसान आंदोलन’ ने गणतंत्र दिवस के दिन 500 पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया। अंतर इतना था कि शाहीन बाग़ के बाद हुए दंगों ने 50 से भी अधिक लोगों की जान ले ली।

आम लोगों को परेशान करने वाला आंदोलन, जिस पर मीडिया को था नाज

आइए, एक बार फिर से याद करते हैं कि कैसे एक ऐसे आंदोलन को संविधान बचाने की लड़ाई के रूप में दिखाया गया, जहाँ संविधान को ही गालियाँ दी गईं और महात्मा गाँधी को अपशब्द कहे गए। गाँधी और आंबेडकर की तस्वीरों के साथ राष्ट्रीय ध्वज लगा कर बैठे जिन प्रदर्शनकारियों के महिमामंडन में मीडिया जुटा था, वहाँ असल में भारत में अस्थिरता फैलाने की नींव डाली जा रही थी और देश को खंडित करने की बातें हो रही थीं।

सबसे पहले याद करते हैं कि कैसे शाहीन बाग़ आंदोलन की वजह से आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा था। 100 दिनों से भी अधिक समय तक चले इस उपद्रव के दौरान उस सड़क को इतने ही दिनों तक रोक कर रखा गया, जहाँ से प्रतिदिन 1 लाख से भी ज्यादा गाड़ियाँ गुजरती थीं। बच्चों को स्कूल के लिए देर होती थी, मरीज सही समय पर अस्पताल न पहुँचने के कारण मरते थे और कामकाजी लोगों को दूसरे रास्तों से दफ्तर जाना पड़ता था।

ये विरोध प्रदर्शन एक खास मजहब का था, लेकिन वामपंथी मीडिया ने दिखाया कि यहाँ कश्मीरी पंडितों के साथ एकता दर्शाई जा रही है। जिन कश्मीरी पंडितों को इस्लामी कट्टरपंथ ने घाटी से भगा दिया, वही इस्लामी कट्टरपंथ उनका साथ देने की बातें करके मीडिया में महान बन रहा था और वामपंथी उसे बना भी रहे थे। वहाँ एक खास मजहब ने महिलाओं को ढाल बना कर भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक और मजहबी लड़ाई लड़ी।

फ़रवरी 2020 आते-आते छात्रों की बोर्ड परीक्षाएँ भी शुरू हो गई थीं। कई बार सुप्रीम कोर्ट में सड़क खाली कराने की याचिका डाली गई, लेकिन शुरू में इसे पुलिस का मामला बता कर ख़ारिज कर दिया गया। कोरोना वायरस के संक्रमण और लॉकडाउन के दौरान महामारी एक्ट का खुलेआम उल्लंघन हुआ। अंत में दिल्ली पुलिस ने उन्हें वहाँ से हटाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद उनका उद्देश्य भी सफल हो ही गया था।

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

इन प्रदर्शनकारियों ने ऐसा नंगा नाच मचाया था कि सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ा कि ‘विरोध प्रदर्शन के अधिकार’ का मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि आप कहीं भी और कभी भी अनिश्चितकाल के लिए बैठ जाएँ। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि शाहीन बाग़ आंदोलन के दौरान जिस तरह से सड़क को अवरुद्ध किया गया, वो स्वीकार्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि आप अपने अधिकार के लिए सार्वजनिक जगहों पर कब्ज़ा कर के दूसरों के अधिकारों के आड़े नहीं आ सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया था कि प्रदर्शन के अधिकार का उपयोग कुछ निश्चित कर्तव्यों को ध्यान में रख कर ही किया जाना चाहिए। प्रदर्शन दूसरों के मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहिए। दलील दी गई थी कि ब्रिटिश राज में ऐसे ही प्रदर्शन होते थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक लोकतंत्र में होने वाले प्रदर्शनों की तुलना उससे नहीं होनी चाहिए। इसके खिलाफ समीक्षा याचिका भी दायर हुई, जिस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस फैसले को सही माना।

वामपंथियों की सबसे बड़ी बात ये है कि वो सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं बख्शते। राम मंदिर पर फैसले के दौरान भी देश के सर्वोच्च न्यायालय को जम कर खरी-खोटी सुनाई गई है। सबसे पहले CJI रहे दीपक मिश्रा के खिलाफ तीन जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाई गई, उसके बाद उनके खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश की गई। उन्हीं तीन जजों में से एक रंजन गोगोई CJI बने, लेकिन राम मंदिर फैसले के बाद उन्हें भी ‘Spineless’ घोषित कर दिया गया।

अब यही गिरोह विशेष CJI एसए बोबडे पर निशाना साधते हुए कभी उन पर भाजपा नेता की बाइक की सवारी करने का आरोप लगाता है तो कभी सोशल मीडिया और उनके खिलाफ ट्रेंड चलाए जाते हैं। यही दबाव की राजनीति है। जिस संस्था को संविधान निर्माताओं ने संविधान की व्याख्या का अधिकार दिया है, उसके फैसले को भी प्रभावित करने की कोशिश होती है। फिर भी वामपंथी ‘संविधान प्रेमी’ होने का टैग नहीं खोते।

शाहीन बाग़ प्रदर्शनों के दौरान भी प्रशांत भूषण और इंदिरा जयसिंह जैसे न जाने कितने ही बड़े अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट में तैयार रहते थे, वामपंथियों को बचाने के लिए। उसी दौरान जामिया में भी हिंसा हुई, जहाँ उपद्रवी छात्रों की तरफ से बड़े-बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। सुप्रीम कोर्ट ने तो कमिटी तक बना दी प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। कोरोना आने के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें वहाँ से हटाया।

इस्लामी कट्टरपंथी से ज्यादा हिन्दू विरोधी आंदोलन था शाहीन बाग़

इसमें कोई शक नहीं है कि शाहीन बाग़ का आंदोलन इस्लामी कट्टरपंथी उपद्रव था, लेकिन इससे भी ज्यादा ये हिन्दू विरोधी अभियान था। एक ऐसा मंच, जहाँ से हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के खिलाफ जो कुछ किया जा सकता था, किया गया। ऐसे पोस्टर्स शेयर किए गए, जिनमें पवित्र हिन्दू प्रतीक चिह्न स्वस्तिक को टूटते हुए दिखाया गया था। बुर्का पहनी महिलाओं को बिंदी लगाए हुए दिखाया गया। फैज की कविताओं के जरिए हिन्दू विरोधी नैरेटिव बनाए गए।

दिल्ली के शाहीन बाग़ की जब बात होती है तो पूरे देश में कई शाहीन बाग़ बनाने की कोशिश हुई, ये हमें नहीं भूलना चाहिए। भोपाल में मस्जिदों से ऐसे पैम्प्लेट्स बाँटे गए, जिनमें सिंधियों की दुकानों का बहिष्कार करने को कहा गया। क्यों? क्योंकि उन्होंने CAA का समर्थन किया था। ‘जिस दिन हम हिन्दुओं से ज्यादा हो गए, उन्हें पटक-पटक कर मारेंगे’ – एक बुर्कानशीं महिला का वीडियो सभी लोगों ने देखा।

तमिलनाडु में दुकानदारों को CAA के समर्थन में बनाई गई वस्तुओं को बेचने पर धमकाया गया। इसी शाहीन बाग़ में अफजल गुरु को हुई फाँसी की सज़ा को गलत ठहराया गया। एक तो किसी आतंकी को संसद हमले के 12 वर्षों बाद सज़ा मिली, इसके लिए पूरी वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई – फिर भी उसका समर्थन हुआ। शाहीन बाग़ में खुलेआम कहा गया कि ये मुस्लिमों का आंदोलन है और सेक्युलर नहीं है।

बाहर मीडिया तो था ही इसे सेक्युलर साबित करने के लिए। शरजील इमाम की चर्चा के बिना शाहीन बाग की बात अधूरी है, जो इसके आयोजकों में से एक था। उसने महात्मा गाँधी को फासिस्ट बताया, जिन्ना की तारीफ की, असम को भारत से खंडित कर अलग करने की बातें की और पूरे उत्तर-पूर्व को शेष भारत से अलग करने के लिए उकसाया। उसने ‘असम में कत्लेआम’ की झूठी अफवाह भी फैलाई।

हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि शाहीन बाग़ का उपद्रव हिन्दू 100 दिनों तक सहते रहे लेकिन देश में जहाँ-जहाँ भी CAA के समर्थन में रैलियाँ हुईं, उनमें से कई जगहों पर मुस्लिम भीड़ द्वारा उस पर हमला किया गया। केरल में दलितों को पानी नहीं पीने दिया गया, क्योंकि उन्होंने CAA का समर्थन किया था। ‘सेवा भारती’ ने उनकी मदद की। ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ और ‘हिन्दुओं की कब्र खुदेगी’ वाले नारे हमें नहीं भूलने हैं।

मीडिया, फिल्म और राजनीतिक जगत की हस्तियों का खुला समर्थन

वामपंथियों की एक बेशर्मी भरी खासियत ये है कि उनके आंदोलन पूर्णतः राजनीतिक होकर भी ‘निष्पक्ष’ बन जाते हैं। राकेश टिकैत के मंच से RLD के जयंत चौधरी का भाषण होगा, लेकिन आंदोलन ‘निष्पक्ष’ रहेगा। कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का वीडियो भी इसी तरह सामने आया था, जिसमें वो एक बुर्कानशीं महिला के छोटे बच्चे को CAA और मोदी विरोधी नारे सीखा रहे थे। लेकिन नहीं, आंदोलन तो गैर-राजनीतिक था न?

कॉन्ग्रेस के मणिशंकर अय्यर शाहीन बाग़ जाते हैं, लेकिन इसे गैर-राजनीतिक बताया जाता है। AAP नेता अमानतुल्लाह खान वहाँ सारी व्यवस्थाएँ संभाले रहता है, लेकिन इसे सेक्युलर आंदोलन बताया जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसका समर्थन करते हैं, लेकिन इसे राजनीति से अलग बताया जाता है। एक पूर्णतः राजनीतिक उपद्रव, जो भाजपा के खिलाफ था, जिसमें विपक्षी दलों के कई नेताओं की भूमिका थी – उसे जनसामान्य का आंदोलन बताने की कोशिश हुई।

नसीरुद्दीन शाह ने देश भर में घूम-घूम कर कई स्थानों पर CAA विरोधी आंदोलनों को सम्बोधित किया। फरहान अख्तर बिना कुछ जाने-समझे प्रदर्शन स्थल पर जाकर बैठ गए। अभिनेता सुशांत सिंह शाहीन बाग़ गए। ज़ीशान अयूब और स्वरा भास्कर जैसे फ़िल्म जगत के लोगों का तो तब से काम-धाम ही यही बन गया। पूरे देश में हर राज्य में जगह-जगह शाहीन बाग़ बनाने की कोशिश हुई। उपद्रव की साजिश देश भर में थी।

मीडिया के कई पोर्टल्स का काम ही यही रह गया था कि वो शाहीन बाग़ से ‘पॉजिटिव स्टोरीज’ निकालें और दिखाएँ कि कैसे ये अरब स्प्रिंग से भी बड़ा आंदोलन है। जब जामिया में लदीदा फरदाना जैसी ‘छात्राओं’ को आगे करके उनके गिरने, दौड़ने और भागने के एक-एक मोमेंट्स HD कैमरे में कैद किए गए और बरखा दत्त जैसों से उन्हें ‘Shero’ बताया, तब भी सामने आया था कि कैसे मीडिया इसे एक बड़ा आंदोलन बनाने की तैयारी में है।

छात्रों की अराजकता के जरिए आंदोलन को दी गई थी धार

शाहीन बाग़ जिस तरह से देश के कई शहरों में हो रहा था, ठीक उसी तरह AMU और जामिया जैसे कई कॉलेज थे, जहाँ छात्रों ने मजहबी कट्टरता का अखाड़ा बना कर रख दिया था। दिसंबर 2019 में ही जामिया के बाहर जम कर हिंसा हुई और छात्र यूनिवर्सिटी में जाकर लाइब्रेरी में छिप गए। जब पुलिस कार्रवाई हुई तो वीडियो शेयर कर-करके दिल्ली पुलिस को बदनाम किया जाने लगा। CCTV फुटेज शेयर करने के मामले में पुलिस के साथ सहयोग नहीं किया गया।

बाद में ऐसे कई वीडियो आए जिससे उन तथाकथित छात्रों की पोल खुली। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्था तक से बयान जारी करवाए गए। पुलिस के साथ झड़प हुई। बसें जलाई गईं। बाद में सारा फोकस ‘पुलिस की क्रूरता’ की बेहूदी बातों पर रखा गया। शाहीन बाग़ में किसी ने खिलौने वाले बंदूक से फायरिंग कर दी तो उसे ज्यादा तवज्जोह दी गई और इसके जरिए ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शिगूफा फिर से छोड़ा गया।

इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पुलिस द्वारा माइक से बार-बार सहयोग के लिए कहे जाने के बावजूद हिंसा हुई। NHRC ने भी अपनी जाँच में माना कि छात्रों की तरफ से हिंसा शुरू की गई थी और पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मजबूरी में बल-प्रयोग किया। संस्था ने मना कि क्षेत्र को सांप्रदायिक दंगे से बचाने के लिए ये ज़रूरी था। ‘छात्रों’ के मास्क में मजहबी कट्टरवादियों ने अपना एजेंडा चलाया।

ठीक इसी तरह 80 वर्ष से ऊपर की उम्र की मुस्लिम दादियों को, जिन्हें CAA के बारे में कुछ पता ही नहीं था, टीवी चैनलों पर बहस में स्थान दिया गया और इसके सहारे अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगंडा के लिए तस्वीरें जुटाई गईं। बिल्किस दादी को ‘Times’ ने सबसे प्रभावशाली महिलाओं की सूची में स्थान दिया। इसी तरह विदेशों में इस उपद्रव को ‘छात्रों और महिलाओं का आंदोलन’ कह कर प्रचारित किया गया, ताकि कोई आलोचना न कर सके।

शाहीन बाग़ आंदोलन ही था दिल्ली दंगों का कारण

अंत में, इन चीजों को देख कर कहा जा सकता है कि शाहीन बाग़ ही दिल्ली दंगों का कारण था। दिल्ली के अन्य स्थानों पर ही इसी तरह से मार्गों पर कब्ज़ा की कोशिश की गई और जब हिन्दुओं ने, आमजनों ने इसका विरोध किया तो उन्होंने दंगा शुरू कर दिया। शाहीन बाग़ में जो लोग शामिल थे, दिल्ली दंगा के आरोपित भी वही लोग थे। ताहिर हुसैन, इशरत जहाँ, उमर खालिद, खालिद सैफी और अमानतुल्लाह खान जैसे लोगों के इसमें नाम सामने आए।

अर्थात, 100 दिनों तक हिन्दू धर्म और उसके प्रतीक चिह्नों का अपमान हुआ तो ठीक, जब हिन्दुओं ने इसका विरोध किया तो ये भड़क गए। उन्होंने 100 दिनों तक सड़क कब्ज़ा कर रखी तो ठीक, एक कपिल मिश्रा ने सड़क खाली करने को कह दिया तो उन्होंने दंगे कर दिए। उन्होंने खुद के विरोध के अधिकारों का रट्टा लगा कर हिंसा की तो ठीक, हिन्दुओं ने आत्मरक्षा में प्रतिकार किया तो गलत। यही कारण है कि कई दिनों तक चला ये प्रोपेगंडा का खेल दंगे में बदल गया।

गिरिराज सिंह ने इतालवी में लिख ‘समुद्री किसानों’ के चिंतक राहुल गाँधी के लिए मजे, कहा- देश की बदनामी करवाते हैं

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) द्वारा ‘समुद्र के किसानों’ के लिए अलग से मंत्रालय वाले बयान पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने चुटकी लेते हुए इतालवी भाषा में ट्वीट किया है। राहुल गाँधी ने एक रैली में कहा था कि मछुआरों के लिए मंत्रालय क्यों नहीं है। इस पर गिरिराज सिंह ने कई ट्वीट किए, जिनमें से एक ट्वीट इटालियन में था और यह ट्विटर पर जमकर वायरल भी हो रहा है।

इस ट्वीट में गिरिराज सिंह ने लिखा कि इटली में मत्स्य विभाग के लिए कोई अलग मंत्रालय नहीं है, वहाँ पर यह विभाग कृषि और वन मंत्रालय के अधीन आता है। गिरिराज सिंह ने ट्वीट के साथ इटली के कृषि एवं वन मंत्रालय की वेबसाइट का लिंक भी शेयर कर दिया।

एक और ट्वीट कर उन्होंने कहा, “राहुल जी! आपको इतना तो पता ही होना चाहिए कि 31 मई, 2019 को ही मोदी जी ने नया मंत्रालय बना दिया और 20,050 करोड़ रुपए की महायोजना (PMMSY) शुरू की, जो आज़ादी से लेकर 2014 के केंद्र सरकार के खर्च (3682 करोड़) से कई गुना ज़्यादा है।”

अपने दूसरे ट्वीट में गिरिराज सिंह ने कहा, “राहुल जी! मेरा आपसे अनुरोध है कि आप नए मत्स्यपालन मंत्रालय में आएँ या मुझे जहाँ बुलाएँ, मैं आ जाता हूँ। मैं आपको नए फ़िशरीज मंत्रालय के द्वारा पूरे देश तथा पुडुचेरी में चलाई जा रही योजनाओं के बारे में बताता हूँ।”

इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री ने बयान देते हुए कहा, “PM ने 2019 में फिशरीज, पशुपालन, डेयरी के लिए अलग मंत्रालय बनाया। मैं मंत्री के रूप में काम कर रहा हूँ। पुडुचेरी में काम चल रहा है। राहुल गाँधी को नहीं पता इसका अलग विभाग है। मैं उन्हें बता दूँगा।”

उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता पर निशाना साधते हुए कहा, “राहुल गाँधी इटली से बाहर निकल नहीं पाते। उनके दिमाग में सिर्फ इटली रहता है। वे किसानों को भ्रम में डालने का काम कर रहे हैं। उन्हें गेहूँ और जौ में फर्क नहीं पता, उन्हें बाछी और बाछा में फर्क नहीं पता। उनके कारण देश की बदनामी पूरी दुनिया में हो रही है।”

बता दें कि पुडुचेरी में अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले 4 दिनों की यात्रा के लिए वहाँ पहुँचे राहुल गाँधी ने तीनों कृषि कानूनों को मछुआरों और मत्स्य पालकों से जोड़ दिया और कहा कि उनके लिए कोई मंत्रालय नहीं। लेकिन, इस दौरान जानकारी के अभाव में उन्होंने अपनी ही किरकिरी कराने वाली बात कह दी।

राहुल गाँधी ने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने उन किसानों के खिलाफ तीन कृषि कानून पारित कर दिए, जो इस देश की रीढ़ हैं। उन्होंने आगे कहा, “आप लोग सोच रहे होंगे कि मछुआरों की बैठक में मैं किसानों की बात क्यों कर रहा हूँ। असल में मैं आप लोगों को समुद्र का किसान मानता हूँ। अगर किसानों के लिए दिल्ली में अलग से मंत्रालय हो सकता है तो फिर समुद्र के किसानों के लिए क्यों नहीं?”

सच्चाई ये है कि मत्स्य पालन और बाजार के लिए पहले से ही विभाग है और ये ‘पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन’ मंत्रालय के अंतर्गत आता है। वर्तमान में बिहार के बेगूसराय से सांसद गिरिराज सिंह इसके मंत्री हैं। सरकार मत्स्य पालन से जुड़े किसानों के लिए ‘प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना’ भी लेकर आई है। यही विभाग अंतर्देशीय तथा समुद्री मत्स्यन व मात्स्यिकी से जुड़े मामलों को भी देखता है। इस हिसाब से समुद्री मछुआरों के हित भी इसी में आते हैं।

दि प्रिंट की बेशर्मी ने बनाया रिंकू शर्मा को गुनहगार, मन्नू ने बताया मीडिया में चल रहे झूठे नैरेटिव का सच: देखें वीडियो

दिल्ली के मंगोलपुरी में पिछले दिनों हुई रिंकू शर्मा की निर्मम हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। हर किसी के जहन में ये सवाल रह गए कि क्या हिंदुस्तान में हिंदू होने का हासिल आज भी इतना बर्बर है? रिंकू की आखिरी समय की तस्वीरें, उनके साथ हुई वीभत्सता, परिजनों के आँसू, हिंदुओं के सवाल हर किसी को रह-रहकर परेशान कर रहे हैं।

ऐसे में एक तथाकथित सेकुलर गुट है जो पूरी तरह से इस मुद्दे पर चुप्पी बनाए हुए हैं और दूसरी ओर वो मीडिया गिरोह है जो इतना सब होने के बावजूद इस घटना की निंदा करना तो दूर अब भी अपना प्रोपगेंडा फैलाने से बाज नहीं आ रहा है।

रिंकू शर्मा

दि प्रिंट की खबर में रिंकू शर्मा को दिखाया गया दोषी

दि प्रिंट की बेशर्मी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक तरफ जब पूरा देश रिंकू के हत्यारों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर सामने आया, तब इस मीडिया पोर्टल ने माहौल को बैलेंस करने के लिए अपनी रिपोर्ट में तथ्य लिखने के नाम पर पाठकों को आरोपित परिवार का पक्ष पढ़ाकर एक नई थ्योरी दे दी।

इसमें बताया गया कि रिंकू की हत्या जिस चाकू से हुई वो चाकू वो खुद लेकर आया था और उसी ने लड़ाई शुरू की थी। इतना ही नहीं इस रिपोर्ट में आरोपित नसरुद्दीन के परिजनों का हवाला देकर कहा गया कि रिंकू ने उस दिन शराब भी पी रखी थी और विवाद तब शुरू हुआ जब वह जाहिद को जबरदस्ती शराब पिलाने लगा।

इसमें यह भी कहा गया कि रिंकू ने और उसके दोस्तों ने जाहिद को पार्टी में बुलाया था और शराब पीकर उससे मारपीट भी की थी। ऐसे में जब उन लोगों को ये पता चला कि उनके भतीजे के साथ ये हो रहा है तो वो बातचीत करने गए। वहाँ विवाद हुआ और रिंकू ने सिलेंडर मारने के लिए उठा लिया। इस रिपोर्ट की मानें तो पहले रिंकू की ओर से ही चाकू लाकर दूसरे पक्ष पर मारा गया था।

अब इस खबर को लिखने का तरीका देखिए, इसकी हेडलाइन पढ़िए और सोचिए एक 26 साल के हिंदू लड़के की असमय हुई निर्मम हत्या पर मीडिया संस्थान की संवेदनाएँ कहाँ है?

एक ओर एक नौजवान इतनी बेरहमी से मार दिया जाता है। उसके माँ-बाप के आँसू देख कर दूर प्रदेश में बैठे लोग सिहर जाते हैं। हिंदू संगठनों में वाजिब बात पर रोष उमड़ता है। छोटा भाई सिसकी भरते-भरते शांत नहीं हो पाता… फिर भी दि प्रिंट अपनी खबर में ये बता पाता है कि गलती आरोपितों की नहीं थी बल्कि रिंकू शर्मा की थी।

इस रिपोर्ट का उद्देश्य कहीं से भी पाठकों को निष्पक्ष रिपोर्ट दिखाना नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा होता तो शीर्षक में जानबूझकर इस बात को शामिल नहीं किया जाता कि रिंकू शर्मा ही पूरी विवाद की जड़ था और उसी ने लड़ाई शुरू की थी।

दि प्रिंट की इस रिपोर्ट में उठाए गए ओछे एंगल का हमारे सेकुलर समाज में क्या मायने होंगे इस पर बात करने का कोई फायदा नहीं है। जाहिर है कि इसे उसने अपने उन्हीं पाठकों के लिए लिखा जो खोज रहे थे कि पूरे मामले में कहीं से रिंकू की गलती निकल आए तो वो भी मुद्दे पर वोकल होकर शांति बनाए रखने की अपील कर सकें और बताएँ कि गलती दोनों पक्षों की थी।

हनुमान चालीसा का पाठ

लेकिन अफसोस! यह प्रोपगेंडा ज्यादा काम नहीं कर सकता। आरोपितों के ख़िलाफ़ सबूत किसी काल कोठरी में रखें संदूक में बंद नहीं है, वो खुलेआम सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर तैर रहे हैं। हर किसी के सामने वो सीसीटीवी फुटेज भी है जिसमें 15-20 लड़के बकायदा हाथ में हथियार लेकर रिंकू के घर की ओर बढ़ रहे थे और वो वीडियो भी है जिसमें महिला से गाली गलौच और पुरूषों से मारपीट हो रही थी

ये वीडियो यकीनन इतना तो स्पष्ट कर ही रही है कि यदि किसी को मारने की साजिश पहले से नहीं थी, मन में बदले की भावना नहीं थी, तो अचानक इतनी भीड़ कहाँ से इकट्ठा हो गई और कैसे उन सबके पास हथियार आ गए।

आज जो पीड़ा रिंकू शर्मा का परिवार झेल रहा है, उसे देख ऐसी निर्मम हत्या मामले में कोई भी एंगल रखकर आरोपितों के कृत्य को जस्टिफाई करना किसी प्रकार से प्रेस की नैतिकता का हिस्सा नहीं हो सकता। लेकिन मीडिया फिर भी झूठ फैला कर माहौल बैलेंस करने में लगा है।

रिंकू के जाने के बाद भी जारी है हनुमान चालीसा का पाठ

आज रिंकू की हत्या को लगभग एक हफ्ता हो गया है। लेकिन इलाके के लोगों की स्मृतियों से रिंकू का चेहरा थोड़ा बहुत भी धुँधला नहीं हुआ। सब रिंकू को याद कर रहे हैं और उन्हीं की हर जगह चर्चा है। कुछ लोग बताते हैं कि रिंकू ने अस्पताल जाते-जाते भी जय श्रीराम के नारे लगाए थे और अस्पातल पहुँचकर भी उनका जोश राम नाम लेने के लिए उतना ही बरकरार था। हालाँकि, वहाँ (अस्पताल) खड़े मुस्लिम परिवार के हत्यारोपितों में से दो ज़ाहिद और ताजुद्दीन ने रिंकू के दोस्तों पर हमला किया था और ज़ाहिद ने सबूत मिटाने के लिए पहले पीठ में धँसी चाकू निकालकर भागने की कोशिश की, जब फँसा हुआ चाकू नहीं निकला तो अंदर ही और घुमा दिया था।

दूसरी ओर जिन्हें आपत्ति थी कि राम मंदिर शिलान्यास के बाद से रिंकू शर्मा के कारण इलाके में हर मंगलवार को हनुमान चालीसा होने लगी, उन लोगों को जवाब देते हुए इलाके में उस परंपरा को रिंकू के जाने के एक हफ्ते बाद भी विधि विधान से निभाया गया।

ऑपइंडिया की मन्नू शर्मा से बात और मीडिया के झूठों का खुलासा

कल ऑपइंडिया के सीनियर एडिटर जब रिंकू शर्मा की मौत पर मीडिया में फैलाए जा रही बातों की सच्चाई जानने पहुँचे तो वहाँ हनुमान चालीसा का कार्यक्रम चालू था। हमारे सीनियर एडिटर उस जगह गए तो मन्नू शर्मा से बात करने थे। लेकिन उन्होंने वहाँ पाया कि कल से पहले तक जो आयोजन हनुमान भक्ति में आयोजित किया जाता था, कल उसी आयोजन का मकसद कहीं न कहीं रिंकू को याद करना भी था। वह उस कार्यक्रम में शामिल हुए और बाद में मन्नू शर्मा से मीडिया में फैले झूठों पर बात की।

मीडिया झूठ की पोल खोलते रिंकू शर्मा के भाई मन्नू शर्मा

जब उन्होंने मन्नू से पूछा कि आखिर जो बातें बर्थडे पार्टी और शराब आदि को लेकर मीडिया में कही जा रही हैं, उसकी सच्चाई क्या है? इस सवाल को सुन मन्नू ने कहा कि ये सब पूरी तरह फर्जी बातें हैं। रिंकू शर्मा ने न तो शराब पी थी, न पिलाई थी और न ही उनका जाहिद (आरोपितों में से एक) से झगड़ा था। जाहिद किसी और के साथ पार्टी में आया था और उसका झगड़ा भी किसी और से था। रिंकू शर्मा से कोई बात नहीं हुई थी। 

 मन्नू बताते हैं कि जो लोग ये कह रहे हैं कि उनके भैया की ओर से हमले हुए तो इस बात की सच्चाई ये है कि दूसरे पक्ष के सब लोग पहले लाठी डंडे लेकर घर में आए थे और उन्होंने ही गेट खोला था। इसके बाद उन सबने अपनी करनी की वीडियो नहीं बनाई और जब उनके भैया ने सिलेंडर बचाव में उठाया तो उसे कैमरे में कैद कर लिया।

बकौल मन्नू, वह लोग पूरे परिवार को तबाह करना चाहते थे लेकिन उनके भैया ने हिम्मत दिखाई और अकेले बलिदान हो गए। मन्नू के अनुसार, पुलिस पूरे मामले में उन्हें कॉपरेट कर रही है। वह चाहते हैं कि जितने बचे हुए आरोपित हैं सब पकड़े जाएँ। उनका या उनके संगठन का मकसद कहीं से भी तक प्रशासन के विरुद्ध कोई कार्य करने का नहीं है।

दैनिक भास्कर की खबर

गौरतलब है कि एक ओर रिंकू शर्मा और उनका परिवार रह रहकर जहाँ केवल इंसाफ माँग रहा है। वहीं द प्रिंट आरोपितों के कुकर्म पर नया एंगल देकर सफाई पेश कर रहा है और दैनिक भास्कर बता रहा है कि हिंदू संगठनों के लोग रिंकू के घर की चौखट पर माथा टेककर बदला लेने की बात कर रहे हैं जबकि मन्नू शर्मा का कहना है कि उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है।

यहाँ तक की डर कर मुस्लिमों के भाग जाने की बात भी सही नहीं है। रिंकू शर्मा की गली में उनके घर से महज 20 मीटर की दूरी पर स्थित हत्यारों के परिवार के अलावा और कोई नहीं भागा है। जो रिंकू शर्मा की हत्या में शामिल थे वही और उनका परिवार फरार है। जबकि गली के लगभग सभी लोगों का कहना है इन्हें फरार नहीं बल्कि जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए।

एक बात और इस मामले में जो सबसे शर्मनाक निकल कर सामने आ रही है, वो ये कि सीसीटीवी फुटेज के रूप से जितने भी सबूत मिले हैं वो प्राइवेट सीसीटीवी से लिए हुए बताए जा रहे हैं। रिंकू शर्मा के भाई ने भी इस बात को बताया है। उनके अनुसार जो कैमरे केजरीवाल सरकार द्वारा लगवाए गए थे, उनसे आरोपितों के विरुद्द कोई सबूत नहीं मिले है। घटना वाले दिन के बाद से उनके खराब होने की बात सामने आई है।

ठीक ऐसी ही बात दिल्ली दंगों के समय भी नजर आई थी जहाँ दंगा प्रभावित क्षेत्रों में ठीक उसी दिन से CCTV के ख़राब हो जाने का दावा किया गया था। फिलहाल, क्राइम ब्रांच इस पूरे मामले पर सघनता से जाँच कर रही है। पाँच- नसीरुद्दीन, मेहताब, ज़ाहिद, इस्लामुद्दीन, ताजुद्दीन जैसे आरोपित गिरफ्तार हैं। बाकी की भी जल्द से जल्द गिरफ़्तारी की माँग की जा रही है।

किसानों ने की ‘रेल रोको’ की घोषणा: 4 राज्यों में अतिरिक्त फोर्स तैनात, राकेश टिकैत बोले- यह रेल खोलो आंदोलन है

किसानों ने अब 18 फरवरी को देश भर में दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक ‘रेल रोको कार्यक्रम’ आयोजित करने की घोषणा की है। इस दौरान चार घंटे तक रेल यातायात के प्रभावित होने की आशंका है। किसानों की इस घोषणा के बाद आरपीएफ (Railway Protection Force) और जीआरपी (Government Railway Police) पूरी तरह अलर्ट पर हो गई हैं। इसके लिए अंबाला कैंट से भी जीआरपी कर्मियों को बुलाया गया है। बहादुरगढ़ में जीआरपी की ओर से हर रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मी तैनात किए जाएँगे।

रेल रोको अभियान के चलते फतेहाबाद में भी पुलिस के द्वारा चार डीएसपी, 10 एसएचओ और 500 के करीब पुलिस कर्मचारी ड्यूटी पर तैनात किए गए हैं। किसी भी उपद्रवी से निपटने के लिए पुलिस द्वारा पूरी तैयारी की गई है। 

जानकारी के मुताबिक देशभर में रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स की 20 अतिरिक्त कंपनियाँ यानी करीब 20 हजार जवान तैनात किए गए हैं। मुख्य फोकस पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल पर रखा गया है। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के डायरेक्टर जनरल अरुण कुमार ने पीटीआई से बातचीत में कहा, “हम चाहते हैं कि किसान यात्रियों के लिए असुविधा पैदा न करें। हम चाहते हैं कि वे 4 घंटे शांति से बीत जाए।”

इस बीच दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे किसान नेता राकेश टिकैत कल के आंदोलन को ‘रेल रोको’ की बजाय ‘रेल खोलो’ आंदोलन बता रहे हैं। उन्‍होंने कहा, “कल रेल रोको अभियान 12 बसे से 3-4 बजे तक रहेगा। हम तो रेल चलाने की बात कर रहे हैं। अगर रेल रोकेंगे तो संदेश देंगे कि रेल चले। गाँव के लोग अपने हिसाब से रेल रोको अभियान का संचालन कर लेंगे।”

बता दें कि सिंघु सीमा पर फिर से दिल्ली पुलिस के एक SHO पर तलवार से हमला किया गया। मंगलवार (फरवरी 16, 2021) की रात 8 बजे हरप्रीत सिंह नामक प्रदर्शनकारी ने तलवार के बल पर जानलेवा हमला कर के दिल्ली पुलिस की कार छीन ली।

गौरतलब है कि केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन बीते 84 दिनों से लगातार जारी है। नए कानून के मुद्दे पर केंद्र और किसान संगठनों के बीच अब तक 11 दौर की वार्ता भी हो चुकी है, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका है।

ऐसे में अब किसान इस आंदोलन को तब तक जारी रखना चाहते हैं जब तक कि सरकार उनकी सारी माँगों को नहीं मान लेती और कानूनों को वापस नहीं कर लेती। इस क्रम में आंदोलन को रफ्तार देने के लिए किसान नेता राकेश टिकैत ने कल रेल रोको अभियान का ऐलान किया है।

इमरान खान की कंगाल रेलवे में जान फूँकने के वादे से मुकरा चीन, हर साल हो रहा है ₹40 अरब का घाटा

पाकिस्तान अब अपने जिगरी दोस्त चीन से ही ठगा हुआ महसूस कर रहा है। दरअसल, आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने घाटे में चल रही अपनी रेलवे में फिरसे जान फूँकने के लिए चीन से आर्थिक मदद की भीख माँगी थी, लेकिन पाकिस्तान के हालात देखते हुए चीन ने भी उससे अब किनारा कर लिया है।

पाकिस्‍तानी अखबार ‘डॉन’ के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का मानना था कि आर्थिक समस्या से जूझ रहे उसके देश को चीन के 6.8 अरब डॉलर के निवेश से पेशावर से कराची के बीच मेन लाइन-1 को अपग्रेड कर दिया जाएगा, जिससे रेलवे में चल रही मंदी को फिर से जीवनदान मिलेगा। हालाँकि, चीन ने पाकिस्तान के इस भरोसे को तोड़ दिया।

चीन पाक की इमरान खान सरकार को धोखा देते हुए अपने किए हुए वादे से मुकर गया और रेलवे के लिए पैसा देने से इनकार कर दिया। चीन के इस झटके से पाकिस्तान का यह प्रोजेक्ट बीच में ही लटक गया है और काम में देरी हो रही है।

पाकिस्‍तान की खस्ता रेलवे हालात के बारे में नए रेलमंत्री आजम खान स्‍वाती ने खुलासा किया है कि पिछले 2 दशक में पाकिस्‍तान रेलवे को हुए कुल 1.2 ट्रिलियन रुपए के घाटे में 90 फीसदी नुकसान हुआ है, जिस कारण उन्हें हर साल करीब 35 से 40 अरब रुपए का घाटा हो रहा है। वहीं, चीन के इस रवैए के चलते इमरान खान सरकार को अब यह समझ नहीं आ रहा है कि कैसे रेलवे को वापस अपने पैरों पर खड़ा किया जाए।

बता दें कि कराची-पेशावर मेन लाइन को सुधारने का काम इसी साल जनवरी में शुरू होना था, लेकिन अभी तक यह शुरू नहीं हो सका है। खबर यह भी है कि कर्ज में डूबे पाकिस्तान के पास अब रेलवे कर्मचारियों को सैलरी तक देने के पैसे नहीं हैं।

FATF की ग्रे सूची से जून तक नहीं निकल पाएगा पाकिस्तान

उल्लेखनीय है कि आतंकियों की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में घिरा पड़ोसी देश पाकिस्तान अब जून तक फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (Financial Action Task Force) की ग्रे सूची से नहीं निकल पाएगा।

‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी FATF की आगामी बैठक के परिणाम को लेकर आशान्वित हैं, लेकिन इसके बावजूद अधिकारियों ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान कम से कम जून तक ‘ग्रे’ सूची में रहेगा।

इससे पहले, पिछले साल अक्टूबर माह में हुई FATF की एक बैठक में तय किया गया था कि पाकिस्तान फरवरी, 2021 तक ग्रे सूची में बना रहेगा क्योंकि वह 06 प्रमुख दायित्वों को पूरा करने में नाकाम रहा है। इनमें भारत के दो सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों – मौलाना मसूद अजहर और हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई करना भी शामिल है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान को जून, 2018 में एफएटीएफ ‘ग्रे’ सूची में रखा गया था। 27 मुद्दों को लागू कर वैश्विक चिंताओं को दूर करने के लिए समय सीमा दी गई थी। ग्रे सूची में वो देश शामिल होते हैं जहाँ आतंकवादी गतिविधियों को फंडिंग और आतंकियों को मनी लॉन्ड्रिंग करने का जोखिम सबसे ज़्यादा होता है। वहीं, पाकिस्तान अपने आपको लगातार इस ग्रे लिस्ट से निकालने के लिए प्रयास कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ यानी FATF एक अंतर-सरकारी निकाय है जो 1989 में मनी लॉन्ड्रिंग, टेरर फाइनेंसिंग और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता के लिए अन्य संबंधित खतरों का मुकाबला करने के लिए स्थापित किया गया है।

हिमंत बिस्वा सरमा की बेटी के साथ फोटो को गलत दावों के साथ फैलाने वाले पत्रकार तौफीकुद्दीन और इकबाल गिरफ्तार

असम पुलिस ने गुवाहाटी स्थित एक वेब पोर्टल से जुड़े दो पत्रकारों को वरिष्ठ मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की उनकी बेटी के साथ तस्वीर के चरित्र पर ऊँगली उठाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। आरोपितों ने मंत्री की उनकी बेटी के साथ की तस्वीर का इस्तेमाल करके उनके चरित्र को धूमिल करने का प्रयास किया था। ‘प्रतिबिंब लाइव’ नाम के पोर्टल के एडिटर इन चीफ तौफीकुद्दीन अहमद और इसके न्यूज एडिटर आसिफ इकबाल हुसैन को मंत्री के बारे में फर्जी खबरें फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

पोर्टल ने कल एक तस्वीर पब्लिश की। जिसमें हिमंत बिस्वा सरमा अपनी बेटी को गले लगा रहे थे। मगर पोर्टल ने बेहद शातिर तरीके से यह दावा किया कि मंत्री किसी अनजान महिला के साथ हैं। जिसके बाद उन पर संगीन आरोप लगाए गए। इस न्यूज रिपोर्ट के बाद फोटोग्राफ सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोग सरमा के चरित्र को लेकर सवाल उठाने लगे।

जब एक सोशल मीडिया यूजर ने फैलाई जा रही अफवाहों को लेकर प्वाइंट आउट किया, तो हिमंत बिस्वा सरमा ने ट्वीट किया, “कृपया उन्हें बताएँ कि तस्वीर में छोटी लड़की मेरी बेटी है।”

सोशल मीडिया पर, विशेषकर फेसबुक पर झूठे आरोप के वायरल होने के बाद, पुलिस ने इसे रोकने के लिए कदम बढ़ाया। असम पुलिस के एडीजीपी जीपी सिंह ने बताया कि दोनों पत्रकारों को आईपीसी की धारा 509 (किसी भी महिला की शीलता का अपमान करने का इरादा) के तहत गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा POCSO अधिनियम की धारा 14 और 21 भी लगाई गई है, क्योंकि मंत्री की बेटी नाबालिग है। ऐसी दुर्भावनापूर्ण खबरों को हवा देने के पीछे की साजिश की जाँच के लिए पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है।

‘प्रतिबिंब लाइव’ के तौफीकुद्दीन अहमद और इकबाल के अलावा, पुलिस ने कुछ अन्य ऐसे व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया है, जिन्होंने फोटो को उसी भ्रामक दावे के साथ पब्लिश या फॉरवर्ड किया था। बोडोलैंड डिजिटल नामक पोर्टल से जुड़े पुली मुचैरी और स्पॉटलाइट असम नामक पोर्टल से जुड़े नाँग नोयोनमोनी गोगोई को भी पुलिस ने इस मामले में हिरासत में लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके साथ नजारुल हुसैन, नजमुल हक और मिजुल अली नाम के सोशल मीडिया यूजर्स को भी गिरफ्तार किया गया है।

एक साजिश के तहत इस तरह की फर्जी खबरों को न फैलाने की चेतावनी देते हुए, जीपी सिंह ने ट्वीट किया, “निवास स्थान की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी जो इस साजिश को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी तरह के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल दुर्भावनापूर्ण तरीके से करते हैं।” उन्होंने कहा कि दुर्भावनापूर्ण इरादे से ऐसी तस्वीरें पोस्ट करना POCSO एक्ट और असम पुलिस के प्रावधानों को आकर्षित करता है।

POCSO अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत ऐसे सभी प्रयासों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दुर्भावनापूर्ण दावे के साथ फोटो प्रसारित करने वाले अधिक लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा सकता है।

दुर्भावनापूर्ण रिपोर्ट को प्रसारित करने के बाद, प्रतिबिंब लाइव ने उस रिपोर्ट को डिलीट कर दिया है और एक अन्य रिपोर्ट में इसके लिए माफी माँगी है। हालाँकि, उन्होंने झूठे दावे को फैलाने के लिए दूसरों को दोषी ठहराया। उन्होंने बताया कि लोग सोशल मीडिया पर फोटो को वायरल करके मंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। पोर्टल ने ‘अनजाने में हुई गलती’ के लिए माफी माँगी और दावा किया कि शायद किसी निहित स्वार्थी व्यक्ति ने मंत्री की बेटी के साथ इस तस्वीर को वायरल किया हो।

दादी की नाक, डैडी का हेयरकट, गंगा स्नान.. और अब ‘समुद्र के किसानों’ के भरोसे कॉन्ग्रेस का भविष्य

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा अब लगातार मेहनत करते नजर आते हैं। देश में चुनाव हों या ना हों, कल ही होने हों या फिर पाँच साल बाद; वो अब तन, मन और धन से जनता के बीच मौजूद हैं। इसके लिए कभी बहन गंगा स्नान करने लगी हैं, तो कभी भैया राहुल कॉन्ग्रेस के लिए रात-दिन एक करते हुए पार्टी का भूत-भविष्य और वर्तमान एक करते देखे जाते हैं।

आज ही राहुल गाँधी ने पुडुचेरी के मुथियालपेट में कहा कि मछुआरे समुद्र के किसान हैं और उनके लिए मोदी जी ने कोई मंत्रालय नहीं बनाया। एक ओर, जहाँ लोगों को भय है कि युवराज ने आज कहीं किसी दो साल पुराने भाषण को तो नहीं पढ़ लिया तो वहीं दूसरी ओर, राहुल गाँधी के इस बयान के बाद केंद्र सरकार एक ऐसा विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है, जिसके बाद तमाम राजनीतिक पार्टी के नेताओं को सामान्य ज्ञान की किताबें पढ़ना आवश्यक कर दिया जाएगा।

उधर, प्रियंका गाँधी वाड्रा ने किसान हितों का समर्थन करने की ऐसी जिम्मेदारी उठा ली है कि इसके लिए अब वो फेक न्यूज़ फ़ैलाने के अलावा राह चलते आदमी को भी ये पूछने लगी हैं कि उसके खाते में गन्ने के रूपए आए या नहीं? गन्ने का जूस बेचने वालों की जेब में तो इंदिरा की पोती ने जबरन रूपए ठूँसकर उन्हें फासीवाद सरकार के दौरान ही मालामाल करने की कसम खा डाली होगी।

समाज में नैरेटिव विकसित करने के लिए कॉन्ग्रेस को पहले इतने प्रयोग करते हुए कभी नहीं देखा गया। एक दौर था, जब सदियों बाद ही ये पार्टी कभी पेड़ गिरने और धरती हिलने जैसा बयान देकर मामला इकतरफा करने का कांफिडेंस लेकर चलती थी, लेकिन अब हालात ये हैं कि एक ही साल के भीतर इसके युवा नेता, जो कि संयोग से भाई-बहन हैं, अपनी दादी की नाक से लेकर पापा का हेयर स्टाइल तक अपनी राजनीति के बीच ले आए मगर ‘पॉलिटिकल ग्रिप’ है कि कमजोर ही हुए जा रही है।

राहुल गाँधी आज ‘समुद्र के किसानों’ से मिलते हुए जिस कॉन्फिडेंस में नजर आए, उसे देखकर तो लगता है कि अगर ‘बाय चांस’ कभी उनकी पार्टी सत्ता में वापसी करती है, तो वो आसमान के किसानों के लिए भी किसी मंत्रालय की घोषणा ना कर बैठें।

किसान हित सर्वोपरी हैं मगर राहुल गाँधी इन हितों के लड़ते-लड़ते ये भूल बैठे हैं कि उनके आए दिन ऐसे बयानों को सुनने और सहन करने वालों के भी कुछ अधिकार होते हैं, जिन्हें कि मानवाधिकार कहा जाता है और वो हैं कि इन अधिकारों की निर्मम हत्या किए जा रहे हैं और पारी की घोषणा करने को भी तैयार नहीं।

फ्रांस में रेडिकल इस्लाम विरोधी कानून पारित: मस्जिदों-मदरसों पर रहेगी कड़ी नजर, बहु विवाह पर पाबन्दी

इस्लामी कट्‌टरवाद के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाते हुए फ्रांस की संसद ने विवादास्पद बिल को मंजूरी दे दी है। इस बिल में मस्जिदों और मदरसों पर सरकारी निगरानी बढ़ाने और बहु विवाह और जबरन विवाह पर सख्ती का प्रावधान है। बिल फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष परंपराओं को कमजोर करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की इजाजत देता है। इस बिल के समर्थन में 347 वोट पड़े जबकि 151 सांसदों ने इसका विरोध किया। 

अब उच्च सदन में होगा पेश

पिछले साल हुई शिक्षक सैम्युएल पैटी की हत्या के बाद से फ्रांस में इस्लामिक कट्‌टरवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाने की माँग हो रही है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) ने कई मौकों पर कहा था कि वह जल्द ही इस दिशा में कदम उठाएँगे। माना जा रहा है कि संसद के निचले सदन द्वारा पारित बिल को लेकर आने वाले दिनों में देश में बवाल बढ़ सकता है। क्योंकि यह सीधे तौर पर मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करेगा। अब इस बिल को उच्च सदन यानी सीनेट में पेश किया जाएगा।

मैक्रों ने बताया जरूरी

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि जेंडर इक्वेलिटी और सेक्युलरिज्म जैसे फ्रांसीसी मूल्यों की रक्षा किया जाना आवश्यक है, इसलिए ऐसे कानून देश हित में हैं। वहीं फ्रांस में रहने वाले मुस्लिमों का कहना है कि यह कानून ना केवल उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करेगा, बल्कि उन्हें इसके जरिए निशाना बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि फ्रांस के पास पहले से आतंकवादी हिंसा से लड़ने के लिए पर्याप्त कानून है, इसलिए नया बिल लाने की कोई जरूरत नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले साल अक्टूबर में छात्र को पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाने पर एक हमलावर ने टीचर सैम्युएल पैटी का सिर काट दिया था। घटना राजधानी पेरिस से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर कॉनफ्लैंस सेंट-होनोरिन के एक मिडिल स्कूल के बाहर हुई थी।

फ्रांस में शिक्षक पैटी की हत्या के बाद से ही सरकार इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ एक्शन में है। राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने भी कहा था कि आज इस्लाम के नाम पर हिंसा और हत्याओं को बढ़ावा दिया जा रहा है और ऐसे लोग हैं, जो इस्लाम के नाम पर हिंसक अभियान चलाते हुए हत्याओं और नरसंहार को जायज ठहरा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आतंकवाद इस्लाम की भी समस्या है, क्योंकि इसके 80% पीड़ित मुस्लिम ही हैं और वो इसके पहले पीड़ित हैं। उन्होंने विश्वास दिलाया था कि इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी।

ममता बनर्जी के लिए गंदी-गंदी गालियाँ, अश्लील टिप्पणी: ट्वीट वायरल होते ही कॉमेडियन ने किया एकाउंट प्रोटेक्ट

घटिया और बकवास मजाक करने के लिए जाने जाने वाले स्टैंड-अप ‘कॉमेडियन’ अतुल खत्री ने सोशल मीडिया यूज़र्स द्वारा लताड़े जाने पर हाल ही में अपने ट्विटर एकाउंट पर प्रोटेक्शन सुविधा को एक्टिवेट कर लिया है। दरअसल, यूज़र्स ने अतुल खत्री के उन ट्वीट को खोज बाहर निकाला, जिसमें उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

सोशल मीडिया यूज़र्स ने एक नहीं बल्कि ऐसे कई आपत्तिजनक ट्वीट्स का पता लगाया, जिसमें खत्री द्वारा अतीत में तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख के खिलाफ बेहद ही अपमानजनक टिप्पणियाँ की गई हैं। नेटीज़न्स द्वारा साझा किए गए एक ट्वीट में खत्री ने ममता बनर्जी को कु*& तक कह दिया था और अपनी गिरफ्तारी के लिए मुख्यमंत्री को ललकारा भी था।

वहीं खत्री द्वारा किए गए एक अन्य ट्वीट में, उन्होंने ममता बनर्जी के चेहरे को ‘एक थी डायन’ फिल्म के पोस्टर के साथ फोटोशॉप करते हुए उन्हें चुड़ैल के रूप में भी संदर्भित किया था।

कॉमेडियन ने एक ट्वीट में मुख्यमंत्री के खिलाफ यौन संबंधी अश्लील टिप्पणी भी की। जहाँ उन्होंने कहा था कि पश्चिम बंगाल में MILF में M का मतलब कुछ और ही है …”

एक और ट्वीट करते हुए खत्री ने कहा था, “जब सुबह की भूली शाम को वापस आ जाए, उसे भूली नहीं, उसे TMC पार्टी की ममता कहते हैं। TMC का मतलब तेरी माँ की…”

TMC प्रमुख से संभवत: प्रतिशोध की आशंका वाले ट्वीट्स के दोबारा वायरल होते ही खत्री ने घबरा कर तुरंत अपने ट्विटर एकाउंट को प्रोटेक्ट कर दिया, ताकि कोई भी उनके पिछले गड़े कारनामों को दोबारा से उजागर न कर सके। इसके अलावा उन्होंने अपने एकाउंट में लिमिटेड एक्सेस की भी सेटिंग चालू कर दी।

लगातार मोदी सरकार की आलोचना करने वाले कॉमेडियन, ममता बनर्जी के खिलाफ की गई अपनी टिप्पणियों और इसके लिए टीएमसी के गुंडों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई से डर गए। गौरतलब है कि वामपंथी झुकाव वाले बुद्धिजीवियों के चहते बने खत्री अब अपने ही द्वारा किए गए कारनामों से बचते फिर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मोदी सरकार की आलोचना और पहले ममता बनर्जी का मजाक उड़ाने और उनके खिलाफ किए गए अपमानजनक टिप्पणी ने खत्री की मंशा को सबके सामने खोल कर रख दिया है। जहाँ एक तरफ लिबरल गिरोह राज्य में एक बार फिर ममता सरकार की वापसी चाहते है वहीं खत्री अब अपने पुराने कारनामों को छुपाने पर तुले हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि टीएमसी पश्चिम बंगाल में तेजी से नीचे की तरफ गिरती नजर आ रही है, क्योंकि उनके पार्टी के कद्दावर नेता उन्हें छोड़ कर, धीरे-धीरे विपक्षी दलों में शामिल हो रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि सिर्फ ममता बनर्जी ही नहीं है, जिनके खिलाफ कॉमेडियन अतुल ने ट्विटर पर अश्लील टिप्पणियाँ की हैं। पिछले साल उन्होंने मर्यादा की सारी हदें पार करते हुए बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल के खिलाफ भी ‘चांडाल‘ तक लिख दिया था।

आपको बता दें कि चांडाल भी एक अनुसूचित जाति समुदाय है, जो लाशों को डिस्पोज़ करने का काम करती है। साथ ही यह समुदाय अंतिम संस्कार भी करता है। चांडाल को देश के कम से कम छह राज्यों में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है।