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वामपंथियों को खटक रहे केजरीवाल बने सॉफ्ट हिंदुत्ववादी, रिपब्लिक पर भी धड़ाधड़ दीवाली विज्ञापन

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी कुछ हालिया कार्रवाइयों के बाद हुए बवाल के कारण अब अपने छवि को ‘सेक्युलरिज्म’ से खिसका कर ’सॉफ्ट हिंदुत्व’ में कहीं फिट करने की जगह तलाश रहे हैं। दिल्ली दंगों के मामले में UAPA के तहत उमर खालिद के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देकर मुस्लिमों और लेफ्ट लिबरल्स को नाराज करने के बाद, सीएम अब आक्रामक रूप से पूजा-अर्चना को बढ़ावा देने में लग गए हैं। ऐसा ही कुछ वह दिवाली के अवसर पर दिल्ली के अक्षरधाम में आयोजित करेंगे।

अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो विज्ञापन जारी किया है, जिसमें उन्होंने जानकारी दी है कि वह और उनके मंत्री 14 नवंबर को शाम 7.39 बजे दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में पूजा करेंगे। वीडियो में उन्होंने बताया कि मंत्रों के साथ दीवाली पूजा सभी प्रमुख समाचार चैनलों पर लाइव प्रसारित की जाएगी और वह जनता से लाइव स्ट्रीम देखकर पूजा में भाग लेने की अपील कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने यह भी कहा कि जब 2 करोड़ लोग शनिवार की शाम को एक साथ पूजा करेंगे, तो दिल्ली के चारों ओर जादुई तरंगे प्रकट होंगी, और सभी दृश्य और अदृश्य ताकतें दिल्ली के लोगों को आशीर्वाद देंगी। इस पूजा से दिल्ली के सभी निवासियों को लाभ होगा।

सोशल मीडिया पर वीडियो संदेश जारी करने के अलावा, इसे टीवी चैनलों पर भी बहुत ही आक्रामक रूप से प्रचारित किया जा रहा है। अन्य चैनलों के साथ-साथ यह विज्ञापन रिपब्लिक टीवी पर भी दिखाया जा रहा है, जो कि लेफ्ट लिबरल की आँखों में नफ़रत की हद तक चुभने वाला चैनल है।

वास्तव में, इस विज्ञापन की फ्रीक्वेंसी देखकर ऐसा लग रहा है कि विज्ञापन को रिपब्लिक चैनल पर सबसे अधिक बार दिखाया जा रहा है, क्योंकि यह रिपब्लिक टीवी पर एक घंटे में कई बार देखा गया है। उदाहरण के लिए, नीचे स्क्रीनशॉट में, वीडियो को मात्र 10 मिनट के अंतराल पर रिपब्लिक पर दोहराया गया है।

केजरीवाल का विज्ञापन 5.43 PM पर 13 November
केजरीवाल का विज्ञापन 5.53 PM पर 13 November

इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार ने दिवाली पूजा को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक प्रचार अभियान भी शुरू किया है। ट्विटर पर कई लोगों ने यह सूचना दी कि उन्हें केजरीवाल के वीडियो संदेश के ऑडियो के साथ कई फोन कॉल आए, जिसमें उन्होंने पूजा का सीधा प्रसारण देखने का विशेष आग्रह किया।

आम आदमी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के लिए इफ्तार पार्टियों की मेजबानी करना आम बात है, लेकिन उनके लिए ऐसी सार्वजनिक घोषणा के साथ धूमधाम से पूजा करना दुर्लभ क्षण होगा, खासकर उन नेताओं के लिए जो हिंदुत्व की विचारधारा से नहीं जुड़े हैं। अरविंद केजरीवाल लिबरलों के खास रहे हैं, और इसलिए, यह उनकी विचारधारा में एक प्रमुख बदलाव के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।

केजरीवाल में आए इस स्पष्ट बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हुए, भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या ने कहा कि यह भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा शिफ्ट है जिसे पीएम मोदी ने लाया है। उन्होंने कहा कि यह अब ‘न्यू नॉर्मल’ है, क्योंकि कोई भी अब हिंदू विरोधी होने और राजनीति में अप्रासंगिक होने का जोखिम नहीं उठा सकता है।

भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने भी दिल्ली के सीएम पर उनकी इस अपील के लिए तंज किया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल प्रदूषण के लिए अन्य राज्यों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, और कोरोनोवायरस के मामलों में वृद्धि के लिए प्रदूषण को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। केजरीवाल पर तंज कसते हुए, गंभीर ने ट्वीट किया कि दिल्ली में सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा, और आप लोग अब सीएम को टीवी पर पूजा करते हुए देख सकते हैं।

क्या विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में लग सकता है राष्ट्रपति शासन?

पश्चिम बंगाल में हिंसा और राजनीति एक-दूसरे के पूरक हैं। जब भी पश्चिम बंगाल में राजनीति की बात होती है तो वहाँ की सियासी हिंसा की चर्चा होती है। चुनाव के नजदीकी दिनों में हिंसा अपने चरम पर पहुँच जाती हैं। पिछले कई दशकों से हिंसक घटनाएँ एक ही पैटर्न से घटित होती आई हैं। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई कार्यकर्ताओं को क्रूरता से मौत के घाट उतारा गया है।

मेनस्ट्रीम मीडिया अक्सर उन घटनाओं पर पर्दा डालने और अनदेखा करने का काम किया है जो इनके तथाकथित एजेंडे को आगे नहीं बढ़ाते हैं। इन घटनाओं में ज्यादातर हमले बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हुए हैं। ज्यादातर मीडिया बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हुए हमले को या तो इग्नोर कर देती है या उन्हें मामूली से एक रिपोर्ट के रूप में दिखा देती है।

वहीं पश्चिम बंगाल की राजनीति के बारे में जानने वाले लोग अच्छी तरह से हमलों और उनके पीछे ममता सरकार के लोगों के रवैए को जानते हैं। बता दें कि बंगाल में राजनीतिक हिंसा अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच गई है।

इसीलिए तमाम लोगों द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने कि माँग करना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए। बता दें यह माँग ज्यादातर भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा की जा रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष पर कथित रूप से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा द्वारा हमला किए जाने के बाद से यह माँग और भी तेज हो गई है।

भाजपा नेता काफी समय से राज्य में राष्ट्रपति शासन की चेतावनी दे रहे हैं। बिष्णुपुर के सांसद सौमित्र खान ने अक्टूबर में कहा, “जिस तरह से टीएमसी पश्चिम बंगाल में अपराध और अत्याचार कर रही है, उसे देखते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए।”

इसी तरह आसनसोल के सांसद बाबुल सुप्रियो ने टिप्पणी की थी, “हाल में जिस तरह सिख समुदाय के सदस्य पर हमले हुए, मनीष शुक्ला सहित अन्य राजनीतिक विरोधियों की हत्या की गई, अल कायदा से जुड़े लोग गिरफ्तार किए गए हैं, यह बताता है कि पश्चिम बंगाल में आर्टिकल 365 का इस्तेमाल किया जाना उचित है।”

भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अक्टूबर के अंत मे कहा था कि ममता बनर्जी सरकार के रहते स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की बहुत कम संभावना है। उन्होंने कहा था, “यह मेरा व्यक्तिगत विचार है कि राष्ट्रपति शासन लागू किए बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (पश्चिम बंगाल) संभव नहीं है क्योंकि राज्य में नौकरशाही का राजनीतिकरण हो चुका है। यहाँ तक मामला ठीक है, लेकिन अब नौकरशाही का अपराधीकरण भी हुआ है।”

पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रभारी विजयवर्गीय ने यह भी कहा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए ममता बनर्जी खुद जिम्मेदार होंगी। गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी यह कहा था कि राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को देखते हुए, विपक्षी दलों को राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग करने का पूरा अधिकार है।

उसके बाद से राष्ट्रपति शासन लागू करने के बारे में भाजपा अपना रुख बदलती दिख रही है। दिलीप घोष ने कहा है कि ममता बनर्जी खुद चाहती हैं कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। एक टीवी चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी खुद चाहती हैं राज्य में 356 लागू किया जाए। वह चुनावों के दौरान विक्टिम कार्ड खेलने के लिए केंद्र सरकार को मजबूर कर रही हैं।”

अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति द्वारा लागू किया जाता है। घोष ने आगे कहा कि यदि बंगाल राष्ट्रपति शासन के अधीन होगा तो यह सीएम ममता बनर्जी को आम लोगों की सहानुभूति देगा और विधानसभा चुनाव में इसका लाभ उन्हें मिलेगा। वर्तमान में बंगाल में भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने आगे कहा,”एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर से लोगों को सहानुभूति मिलने पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।”

वहीं अमित शाह ने भी हाल ही में कहा था, “अनुच्छेद 356 एक सार्वजनिक मुद्दा नहीं है। यह एक संवैधानिक मामला है। केंद्र सरकार राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर इस पर निर्णय लेती है। यहाँ अनुच्छेद 356 को लागू करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सरकार केवल अप्रैल में बदल जाएगी। तो यह किस पर किया जाएगा?” इस प्रकार भाजपा समय समय पर राष्ट्रपति शासन को लेकर अपना रुख बदलती दिख रही है।

बंगाल में राजनीतिक हिंसा अभूतपूर्व स्तर पर है। हाल के वर्षों में भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की मौतें हुई हैं। इन हत्याओं से यह साबित हुआ है कि पश्चिम बंगाल में निर्वाचित विधायक भी सुरक्षित नहीं हैं।

बता दें पश्चिम बंगाल में हाल ही में भाजपा के एक विधायक संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए थे। इस प्रकार यदि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना था तो भाजपा को दोष देने के लिए कोई मान्य आधार नहीं हैं। यह एक राजनीतिक निर्णय है और राजनीतिक निर्णय राजनीतिक परिणामों को ध्यान में रखते हुए लिए जाते हैं।

गौरतलब है कि अगर देख जाए तो दिलीप घोष कहीं न कहीं अपनी बात पर सही हैं। ममता बनर्जी जान-बूझकर कर राजनीतिक फायदे के लिए राष्ट्रपति शासन राज्य में लगाना चाहती हैं। यह निश्चित रूप से उन्हें विक्टिम कार्ड खेलने का अवसर प्रदान करेगा।

अमित शाह का मानना ​​है कि अगले साल होने वाले राज्य चुनावों में जीत दर्ज करने में सक्षम भाजपा के लिए सत्ता विरोधी कारक काफी मजबूत है। ऐसी परिस्थितियों में, यह संभावना नहीं है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा। लेकिन चीजें बहुत जल्दी बदल सकती हैं। यदि राज्यपाल को यह विश्वास है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव राज्य में वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार के रहते करना असंभव होगा तो वह जरूर राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करेंगे।

नीतीश कुमार का इस्तीफा, बैठक में नहीं आए कॉन्ग्रेस के 2 MLA, हाथापाई भी

बिहार कॉन्ग्रेस की मुसीबतों का अंत होता नहीं दिख रहा है। एक तरफ विपक्षी गठबंधन के बहुमत से चूक जाने का ठीकरा उस पर फोड़ा जा रहा है, दूसरी तरफ पार्टी के टूटने के कयासों ने भी जोर पकड़ लिया है। इस बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यपाल फागू चौहान से मिलकर उन्हें अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

बिहार कॉन्ग्रेस के नवनिर्वाचित विधायक दल की बैठक में जम कर हंगामा हुआ। कॉन्ग्रेस कार्यालय में हुई बैठक के दौरान दो विधायकों के समर्थक आपस में भिड़ गए। विवाद की शुरुआत विक्रम से विधायक चुने गए सिद्धार्थ शर्मा को विधायक दल का नेता बनाने की माँग से हुई। इस मसले पर शर्मा और पार्टी के एक अन्य विधायक विजय शंकर दूबे के समर्थकों में हाथापाई हो गई।

विधायक दल की यह बैठक बिहार की राजधानी पटना स्थित कॉन्ग्रेस के प्रदेश कार्यालय सदाकत आश्रम में हुई। बैठक के दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन अविनाश पाण्डेय भी मौजूद थे। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे को अपशब्द कहे और मारपीट की। विवाद तब और बढ़ गया जब विधायक सिद्धार्थ शर्मा के समर्थकों ने महाराजगंज से विधायक विजय शंकर दूबे को चोर कह दिया। इसके बाद दूसरे पक्ष के कार्यकर्ता भड़क गए और बैठक के बीच में ही गाली-गलौच और हाथापाई शुरू हो गई। 

हंगामा करने वाले कार्यकर्ताओं में कुछ का यह भी कहना था कि विधायक विजय शंकर दूबे ने कॉन्ग्रेस पार्टी की ज़मीन बेच दी थी इसलिए ऐसे नेता को विधायक दल का नेता नहीं बनाया जाना चाहिए। दूसरी तरफ इन आरोपों के जवाब में विधायक विजय शंकर दूबे ने कहा कि ऐसे किसी की ज़मीन बेचना संभव नहीं है। न्यायालय ने राजेन्द्र स्मारक समिति के पक्ष में आदेश सुनाया था, कॉन्ग्रेस पार्टी ने यह मुकदमा लगभग 10 से 15 साल तक लड़ा था। अंत में जो भी हुआ वह न्यायालय के आदेशानुसार हुआ, इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए लगाए गए सभी आरोप निराधार हैं। 

कॉन्ग्रेस ने महागठबंधन के अंतर्गत कुल 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से पार्टी ने सिर्फ 19 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसके पहले साल 2015 के विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने 27 सीटें ही जीती थीं।

नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक से मनोहर प्रसाद और अबिदुर रहमान गैरहाजिर थे। इस संबंध में पूछे जाने पर बिहार कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा ने बताया कि बैठक के दौरान हुई हाथपाई को लेकर उन्हें जानकारी नहीं। प्रसाद और रहमान की गैरहाजिरी को लेकर कयासों को उन्होंने खारिज कर दिया। झा ने कहा कि रहमान की तबीयत ठीक नहीं है और प्रसाद ने एक दिन पहले ही उनसे मुलाकात की थी।

कॉन्ग्रेस में टूट की खबरों को हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष जीतन राम मांझी के ऑफर से जोर मिला है। मांझी ने कॉन्ग्रेस के नवनिर्वाचित विधायकों को एनडीए में आने का ऑफर दिया था। गौरतलब है कि 2017 में जब नीतीश कुमार महागठबंधन से अलग हुए थे उसके बाद भी बिहार कॉन्ग्रेस में टूट देखने को मिली थी। उस समय कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक चौधरी ने भी पाला बदल लिया था।

अयोध्या में भव्य दीपोत्सव का CM योगी ने किया शुभारम्भ, माटी कला के हुनरमंदों से खरीदा सारा सामान, देखें वीडियो

अयोध्या के दिव्य दीपोत्सव को भव्य बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी है। ऐतिहासिक राम मंदिर की नींव पड़ने के बाद पहली बार अयोध्या में दिवाली का त्योहार मन रहा है। ऐसे में तैयारी भी खास है। सीएम योगी आदित्यनाथ अपने कई सहयोगी मंत्रियों के साथ अयोध्या में दीपोत्सव का कार्यक्रम मनाने पहुँचे हैं। अयोध्या में यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भी मौजूद हैं।

सीएम योगी ने सबसे पहले जन्मभूमि पहुँचकर भगवान रामलला की पूजा-अर्चना की है। वह शाम को राम की पैड़ी से दीपोत्सव के कार्यक्रम की शुरुआत करेंगे। अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम के​ लिए राम की पैड़ी को रंगोली और दीयों से सजाया गया है।

इस बार सरयू नदी के तट पर 5.51 लाख दियों से अयोध्या को जगमगाया जाएगा। मुख्य कार्यक्रम से पहले शोभा यात्रा निकाली गई है। इस बार राम मंदिर निर्माण स्थल पर भी 11,000 दीये जलाए जाएँगे। इसके अलावा भी झाँकी, लाइटिंग समेत कई अन्य व्यवस्थाएँ की गई हैं।

बता दें अयोध्या में आज का मुख्य कार्यक्रम दोपहर तीन बजे से शुरू हुआ है। जिसका प्रसारण टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाइव किया जा रहा। वहीं, समारोह के दौरान भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होगा जिसमें महिलाएँ ‘मिशन शक्ति’ अभियान को बढ़ावा देने के लिए हिस्सा लेंगी। संस्कृति विभाग ने इसके लिए रूपरेखा तैयार कर ली है और इस पर काम भी शुरू हो गया है।

इस भव्य कार्यक्रम की सुरक्षा का भी पुख्ता इन्तज़ाम किया गया है। DIG दीपक कुमार के मुताबिक, ड्रोन कैमरे से पूरे अयोध्या की निगरानी की जा रही है। बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात है। अयोध्या में ही 12 स्थानों पर रूट डायवर्ट किया गया है। एंबुलेंस और मरीज वाहनों के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया है।

माटी कला के हुनरमंदों के बचे हुए सामानों को CM योगी ने खरीदा

वहीं दीपावली के मौके पर यूपी सीएम योगी की एक और दरियादिली देखने को मिली है। दरअसल माटी कला के हुनरमंदों ने लखनऊ में दीपावाली पर बाजार लगाया था। बाजार समाप्त होने के बाद यह लोग अपना बचा सामान लेकर शुक्रवार को सुबह मुख्यमंत्री आवास पहुँचे थे। जहाँ पर मुख्यमंत्री योगी ने इनके सामान को देखा और इनकी कलाकारी को काफी सराहा। वह लोग यह सारा सामान उपहार के तौर पर मुख्यमंत्री योगी को देना चाहते थे, लेकिन सीएम योगी ने एक सामान की क़ीमत पूछी और फिर क़ीमत चुकाकर सब कुछ ख़रीद लिया। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने उन सबकी तारीफ की और वापस जाते वक्त सबको मिठाई खिलाकर उपहार भी दिए।

साभार :न्यूज़ 18

गौरतलब है कि कोविड 19 को मद्देनजर रखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने त्योहारों में पूरी सतर्कता बरतने के निर्देश दिया है। उन्होंने कहा है कि दीपावली से लेकर छठ पर्व तक व्यापक सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि इस दौरान लोग आपस में भेंट करते हैं। उन्होंने कहा कि छठ पर्व सामूहिक रूप से संपन्न किया जाता है, इसे देखते हुए जनपद स्तर पर समीक्षा करते हुए संक्रमण नियंत्रण के प्रभावी उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘PM मोदी बदलावों के मुखिया’: ओबामा ने कहा- ‘गरीबी से प्रधानमंत्री पद तक उनकी यात्रा भारत की गतिशीलता का प्रतीक’

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ (A promised Land) में राहुल गाँधी पर टिप्पणी की थी। टिप्पणी आम जनता के लिए हास्यास्पद और माननीय राहुल गाँधी के लिए चिंतनीय थी, उन्होंने अपनी टिप्पणी में राहुल गाँधी को घबराया हुआ और अनगढ़ (unformed) छात्र बताया था जिसमें योग्यता की कमी है। इसके अलावा बराक ओबामा ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी टिप्पणी की थी, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को भारत के ‘बदलावों का मुखिया’ (reformer-in-chief) बताया था। इसके अलावा बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व की सराहना करते हुए कई बातें कही थीं। 

साल 2015 के दौरान अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बराक ओबामा ने टाइम मैगजीन से इस मुद्दे पर बात की थी। ओबामा ने कहा था, “अपने बचपन में नरेन्द्र मोदी अपने परिवार की मदद करने के लिए अपने पिता के साथ चाय बेचते थे। आज वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता हैं, गरीबी से प्रधानमंत्री पद तक उनकी यात्रा भारत की गतिशीलता और क्षमता दर्शाती है।” इसके अलावा बराक ओबामा ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद करने को लेकर समर्पित थे, जिससे लोग उनके बताए रास्ते का पालन करें। 

बराक ओबामा ने कहा, “नरेन्द्र मोदी ने गरीबी मिटाने, शिक्षा व्यवस्था सुधारने, लड़कियों-महिलाओं सशक्त करने और जलवायु परिवर्तन का सामना करते हुए भारत की आर्थिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए महत्वाकांक्षी नज़रिया पेश किया। जैसी भारत की मूल अवधारणा है वैसे ही उन्होंने प्राचीन और आधुनिक मूल्यों को समानांतर रूप से ऊपर उठाया।” बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री मोदी को योग प्रेमी बताया, भारत के लोगों को ट्विटर से जोड़ा और ‘डिजिटल इंडिया’ की नींव रखी।

प्रधानमंत्री की वाशिंगटन यात्रा को याद करते हुए बराक ओबामा ने कहा कि मोदी और वो एक साथ मार्टिन लूथर किंग स्मारक गए थे जिसमें मार्टिन लूथर और महात्मा गाँधी की शिक्षा झलकती है। किस तरह पृष्ठभूमि और आस्था की विविधता उनके देशों (भारत और अमेरिका) के लिए एक ताकत जैसी थी जिसकी उन्हें हमेशा रक्षा करनी थी। फिर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने यह बात पहचानी, भारत में एक साथ रहने और जीवनयापन करने वाले 100 करोड़ से अधिक लोग पूरी दुनिया के लिए रोल मॉडल बन सकते हैं।                 

44वें अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी किताब ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड’ (A promised Land) में राहुल गाँधी और भारत के पूर्व पीएम डॉ मनमोहन सिंह पर निशाना साधा था। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक पुस्तक की समीक्षा के अनुसार, ओबामा ने वायनाड के सांसद राहुल गाँधी पर निशाना साधते हुए कहा था, “उनमें एक ऐसे ‘घबराए हुए और अनगढ़ (Unformed)’ छात्र के गुण हैं, जिसने अपना पूरा पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है और वह अपने शिक्षक को प्रभावित करने की चाहत रखता है, लेकिन उसमें ‘विषय में महारत हासिल’ करने की योग्यता या फिर जूनून की कमी है।” 

अपने संस्मरण में बराक ओबामा ने राहुल की माँ और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी का भी जिक्र किया है। समीक्षा में कहा गया है, “हमें चार्ली क्रिस्ट और रहम एमैनुएल जैसे पुरुषों के हैंडसम होने के बारे में बताया जाता है लेकिन महिलाओं के सौंदर्य के बारे में नहीं। सिर्फ एक या दो उदाहरण ही अपवाद हैं जैसे सोनिया गाँधी।” इस पुस्तक समीक्षा में कहा गया है कि अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री बॉब गेट्स और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, दोनों में बिलकुल भावशून्य सच्चाई/ईमानदारी है।

पाकिस्तान के 8 फौजी ढेर, बंकर भी तबाह: उरी में नापाक हरकत का सेना ने दिया मुँहतोड़ जवाब

पाकिस्तानी सेना ने एक बार फिर सीजफायर का उल्लंघन किया है। जवाबी कार्रवाई में भारतीय सेना ने उसके 8 जवानों को ढेर कर बंकर तबाह कर दिए हैं।

जम्मू-कश्मीर के बारामूला सेक्टर के उरी में पाकिस्तान ने शुक्रवार (13 नवंबर) को सीजफायर का उल्लंघन किया। इसमें 1 बीएसएफ जवान, 2 सैनिक और 3 नागरिकों की जान चली गई। पत्रकार आदित्य राज कौल ने इस संबंध में ट्वीट कर जानकारी दी है। उनका कहना है कि उन्हें घटनास्थल से जो तस्वीरें मिली हैं वह बेहद बर्बर हैं।

उन्होंने मृतकों की कुल संख्या 6 बताते हुए इनके नाम बताए हैं। ट्वीट के मुताबिक बीएसएफ जवान राकेश डोभाल, आर्मी के जनरल सुबोध घोष और जनरल हर्षवर्धन चंद्र रॉय वीरगति को प्राप्त हुए हैं। वहीं इरशाद अहमद, तौब मीर और फारूका बेगम नामक तीन नागरिकों की भी इस हमले में मौत हुई।

बताया जा रहा है पाकिस्तान के नापाक इरादों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई में भारत ने भी उनके 7-8 जवानों को ढेर किया है। वहीं उनके कई बंकर भी नष्ट कर दिए गए हैं और लॉन्च पैड पर भी हमला बोला है। मारे गए पाकिस्तानी सेना के सैनिकों की सूची में 2-3 पाकिस्तानी सेना विशेष सेवा समूह (एसएसजी) कमांडो शामिल हैं।

समाचार एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय सेना की कार्रवाई में पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। पाकिस्तानी सेना के बंकर, ईंधन डंप और लॉन्च पैड नष्ट हो गए हैं।

वहीं बीएसएफ की ओर से जानकारी दी गई है कि जम्मू-कश्मीर के बारामूला सेक्टर में सीजफायर वायलेशन में BSF के सब-इंस्पेक्टर राकेश डोभाल वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने बताया कि BSF के सब इंस्पेक्टर राकेश डोभाल उत्तराखंड के ऋषिकेश जिले के गंगानगर के रहने वाले थे।

उड़ी के कमलकोट के अलावा बांदीपोरा के गुरेज सेक्टर और कुपवाड़ा जिले के केरन सेक्टर में भी सीजफायर उल्लंघन हुआ। इस बीच सेना ने घुसपैठ को देखते हुए घाटी के कई इलाकों में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी हैं।

सेना की ओर से कहा गया, “हमारे सैनिकों ने शुक्रवार को केरन सेक्टर में एलओसी पर आगे की चौकियों पर संदिग्ध हरकत देखी थी। इसके बाद संदिग्ध घुसपैठ को नाकाम कर दिया गया। मोर्टार और अन्य हथियार से लैस इन लोगों ने गोलीबारी करके सीजफायर का उल्लंघन किया। हम भी जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं।”

बता दें कि मात्र 1 हफ्ते में पाकिस्तान की ओर से दूसरी दफा सीजफायर उल्लंघन किया गया है। भारतीय सुरक्षाबल लगातार पाकिस्तानी सेना के घुसपैठ के मनसूबों को नाकाम कर रहे हैं। शुक्रवार को इसी बौखलाहट में उत्तरी कश्मीर में जिला कुपवाड़ा में टंगडार व करनाह सेक्टर के धानी, सदपोरा, हाजीतारा और जद्दा चौकियों व उनके आसपास स्थित नागरिक बस्तियों पर गोलाबारी की गई।

बिहार कवरेज की शुरुआत होनी थी माता सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम से, हम पहुँच गए सिमुलतला

मैं 10 अक्टूबर को दिल्ली से रवाना हुआ था और 11 अक्टूबर की शाम बिहार के मधुबनी जिले स्थित अपने पैतृक गाँव पहुँचा। जैसा कि पहले भी कई बार बता चुका हूँ कि मैं पहली बार माइक और कैमरे के साथ था, तो दबाव में था। लेकिन, मेरे पास कागजों पर तैयार एक परफेक्ट प्लान था। उसके हिसाब से आगे बढ़ना था। दिल्ली से मैं यह सोचकर चला था;

  • माता सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी स्थित पुनौरा धाम से अपनी पहली कवरेज करेंगे। रितु जायसवाल जैसे चेहरे से शुरुआत करेंगे। ग्रामीण इलाकों पर फोकस करेंगे।
  • बिहार में तीन बड़े दल (बीजेपी, जदयू, राजद) में से दो जिस तरफ हों, वह आसानी से जीत जाते हैं। तीनों अलग-अलग हों तो बीजेपी सबसे आगे होगी।
  • चिराग पासवान ने जो बड़े नाम खासकर, बीजेपी से आए मजबूत नेताओं को उतारा है वे आसानी से जीत जाएँगे। रामविलास पासवान की मृत्यु से उपजी सहानुभूति का फायदा भी लोजपा को होगा। यानी, मेरा मानना था कि चुनाव बाद बीजेपी+लोजपा भी बहुमत के करीब हो सकती है।

जमीन पर सब कुछ उलट-पुलट

  • 12 अक्टूबर को प्लान पर अमल शुरू किया। रितू जायसवाल से संपर्क नहीं हो पाया। पुनौरा धाम की योजना भी टालनी पड़ी। वैसे भी इन इलाकों में आखिरी चरण में वोट पड़ने थे।
  • नीतीश कुमार से काफी नाराजगी दिख रही थी। इससे यह बात समझ में आई कि इस बार का चुनाव अलग है।
  • संसाधन सीमित थे और समय कम। यह भी समझ में आ गया कि खबरों के लिहाज से हम दूसरे संस्थानों से शायद ही बाजी मार सकते हैं। कई मीडिया संस्थान राज्य की एक फेरी लगा चुके थे, हम काफी देर कर चुके थे। उनकी तीन-तीन टीम बिहार के दौरे पर दिल्ली से आई थी।
  • अमूमन चुनावों में नेताओं के विवादित बोल सुर्खियों में होते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसी खबरें मीडिया से पहले लोगों तक पहुँचती हैं। ऐसे में चर्चा के केंद्र में आने के लिए किसी खबर का हाथ लगना भाग्य भरोसे था। अब जरूरी हो गया था कि यात्रा की योजना नए सिरे से बनाई जाए।

श्रेयसी सिंह का चेहरा क्यों चुना?

  • 13 अक्टूबर को माँ उच्चैठ भगवती के दर्शन करने के बाद दरभंगा के लिए निकला। व्यालोक जी से मुलाकात हुई। उनसे चर्चा के बाद तय किया कि जमुई से बीजेपी की उम्मीदवार श्रेयसी सिंह के चेहरे से शुरुआत करेंगे। श्रेयसी खेल के मैदान में खुद को साबित कर चुकी थीं। फ्रेश चेहरा थीं। युवा और महिला भी। साथ ही राजनीतिक विरासत भी उनसे जुड़ा है। यह भी तय किया कि इंटरव्यू के दौरान उनसे उनके पिता को लेकर सवाल नहीं करूँगा, क्योंकि बीबीसी सहित कई संस्थानों ने उनका जो साक्षात्कार किया था उसमें इसी पर फोकस था। ध्यान रखिएगा यह मैंने तय किया था, श्रेयसी सिंह से हमारा संपर्क नहीं हुआ था।
  • जमुई जाने की बात हुई तो यह भी तय किया कि पहले सिमुलतला जाना है। इससे इसी जिले की झाझा सीट कवर हो जाती। सिमुलतला जाने का मकसद नीतीश के एक ड्रीम प्रोजेक्ट से आपको रूबरू करवाना था। इससे यह भी पता चलता कि नीतीश के पहले कार्यकाल के सपने इस तीसरे कार्यकाल तक आते-आते कैसे बिखरे (सिमुलतला पर हम आगे अलग से एक स्टोरी करेंगे)।
  • दरभंगा से लौटने के बाद 13 अक्टूबर की शाम बेनीपट्टी में मुरलीधर मिले, जो इस पूरी यात्रा में हमारे साथ रहे। उन्होंने गाड़ी पर ऑपइंडिया को जगह दी। हमारी सवारी तैयार हो गई। वैसे तो मैं उपकरण लेकर दिल्ली से गया था। फिर भी उन्होंने अपना कैमरा, ट्राइपॉड, माइक वगैरह रख लिया ताकि किसी आपात परिस्थिति में परेशानी नहीं हो।
  • 13 अक्टूबर की शाम तक श्रेयसी सिंह से संपर्क स्थापित करने की मेरी कोशिश विफल रही थी। लेकिन रात के करीब 10 बजे उनकी बहन मानसी से संपर्क हो पाया, जिन्होंने आगे भी हमारी काफी मदद की। हमें 15 अक्टूबर का समय दिया गया। लेकिन, मैं समय से नहीं पहुँच पाया। बावजूद इसके श्रेयसी सिंह ने बड़प्पन दिखाते हुए हमें 16 अक्टूबर को तबीयत खराब होने के बाद भी पर्याप्त समय दिया था।
सिमुलतला में इस तरह की करीब 500 बदहाल कोठी है। बदहाली का यह सिलसिला लालू के राज में शुरू हुआ था।

सिमुलतला का सफर

  • 14 अक्टूबर को हम सिमुलतला के लिए रवाना हुए। रास्ते में कई जगह हाल लेते चल रहे थे। इस चक्कर में झाझा पहुँचते-पहुँचते रात के करीब 10 बज गए। पुलिस वाले से सिमुलतला जाने का रास्ता पूछा तो उसने इतनी रात उधर जाने से रोका। असल में कभी यह इलाका नक्सल प्रभावित था। बाद में स्थानीय लोगों से पता चला कि जंगलराज की समाप्ति के बाद हालात बदल चुके हैं और वे देर रात भी झाझा से आराम से लौट आते हैं। यह भी याद रखिएगा कि सिमुलतला में कोई होटल नहीं है। यह जंगलों से घिरा इलाका है। यहाँ एक शिक्षक ने उस रात हमारे ठहरने और भोजन का आधी रात के करीब भी खुशी-खुशी इंतजाम कर दिया था। अगली सुबह उन्होंने हमारे गाइड का भी काम किया। हम आसपास के कई गाँव में गए।
  • सिमुलतला के आसपास के गाँव में जाने के बाद अहसास हुआ कि लोजपा के जो मजबूत उम्मीदवार बताए जा रहे हैं, उनकी हालत जमीन पर खराब है। यहाँ से लोजपा ने बीजेपी विधायक रवींद्र यादव को उम्मीदवार बनाया था। सीट जदयू के कोटे में जाने के बाद वे लोजपा में शामिल हो गए थे और मीडिया में काफी मजबूत उम्मीदवार बताए जा रहे थे।
  • यह भी पता चला कि नीतीश से नाराजगी के बावजूद जदयू के जो उम्मीदवार पिछली बार हार गए थे वे जीतने की स्थिति में हैं। झाझा से जदयू के उम्मीदवार पूर्व मंत्री दामोदर राउत थे जो चुनाव जीतने में सफल रहे हैं।
  • ऊपर के दोनों सूत्र हाथ लगने के बाद हम उत्साहित थे, क्योंकि तब मीडिया में इसकी चर्चा नहीं थी। लिहाजा झाझा के दूसरे हिस्से के गाँवों में जाने का भी फैसला किया। इस उत्साह में श्रेयसी सिंह से लिए गए समय का भी ध्यान नहीं रहा।

नाजरीन ने FB पर सोनिया बनकर मोहित से किया निकाह, जबरन खतना कर बनाया मुस्लिम, FIR दर्ज

राजधानी दिल्ली में लव जिहाद का बेहद ही चौकाने वाला मामला सामने आया है। नाजरीन अंसारी नाम की महिला ने फेसबुक पर सोनिया बनकर मोहित कुमार से प्रेम-निकाह किया। खबर के अनुसार, महिला के परिजनों ने हिन्दू युवक को इस्लाम कबूलवा कर निक़ाह कराया और जबरन एक अस्पताल में उसका खतना भी करा दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रोहिणी जिले के रहने वाले 29 वर्षीय एक हिंदू युवक ने यूपी के गोंडा में रहने वाली एक महिला के खिलाफ लव जिहाद का आरोप लगाते हुए पुलिस उपायुक्त कार्यालय में एक मामला दर्ज कराया है।

मोहित कुमार का आरोप है कि मुस्लिम महिला ने अपना धर्म छिपाकर उसे प्रेम जाल में फँसाया और शादी करने के बाद उसका धर्म परिवर्तन करवा दिया। साथ ही उसने महिला और उसके परिजनों पर प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया है।

दर्ज रिपोर्ट के अनुसार, मोहित को फिल्मों में काम करने का बहुत शौक था। मुंबई में उसे वर्ष 2018 में एक फिल्म में काम मिला था। जिसकी जानकारी उसने फेसबुक पर पोस्ट की थी। उसी दौरान फेसबुक के जरिए उसकी मुलाकात गोंडा निवासी नाजरीन अंसारी से हुई जिसने अपनी असली पहचान छुपाते हुए सोनिया नाम से उससे दोस्ती की। दोनों में काफी बातचीत होने लगी।

मोहित को अपने प्रेम जाल में फँसाने के लिए उसने शुरुआती दौर में नाजरीन अंसारी ने कई मनगढंत कहानियाँ अपने बारे में बताई। उसने बताया था कि वह हिंदू है और उसके माता-पिता उसे बहुत मारते-पीटते हैं। मोहित ने उसकी बातों में आकर उसके करीब आने लगा और जल्द ही उनका रिश्ता प्यार में बदल गया।

इसके बाद कुछ दिनों तक दोनों फोन पर बातें करने लगें और उन्होंने शादी का फैसला ले लिया। वहीं शादी के कुछ दिन पहले महिला ने अपने झूठ का खुलासा करते हुए मोहित को सारी सच्चाई बता दी, कि वह मुस्लिम है और उसका सही नाम नाजरीन अंसारी है। उस दौरान उसने मोहित से कहा कि वह उसके साथ हिंदू रीति रिवाजों के साथ रहना चाहती है। जिसका विश्वास कर मोहित ने उसे अपनी धर्मपत्नी के रूप में स्वीकारते हुए उससे शादी कर ली।

मोहित का आरोप है कि शादी के कुछ दिन बाद वह अपने घर चली गई। वहाँ से उसने फोन कर कहा कि वह उसे आकर दिल्ली ले जाए। मोहित अपनी माँ पुष्पा देवी के साथ उसके मायके उसे लेने गया। कथिततौर पर जिसके बाद महिला के परिजनों ने मोहित को रास्ते में ही रोक लिया।

मोहित का आरोप है कि उसे और उसकी माँ को गोंडा के एक होटल के कमरे में बंद कर दिया गया था। वहाँ मोहित का धर्म परिवर्तन कर निकाह कराया गया। मोहित ने यह भी आरोप लगाया कि पास के एक अस्पताल में उसका खतना भी करा दिया गया। महिला के घरवालों की तरफ से जान से मारने की धमकी और 80 हजार रुपए की माँग भी की गई।

मोहित ने बताया कि नाजरीन उसके साथ दिल्ली आ गई। वहीं वापस अपने घर आकर मोहित ने रहने का तौर तरीका एक हिंदू की तरह ही रखा। ऐसे में मुस्लिम महिला फिर उसे छोड़कर अपने घर गोंडा चली गई है।

अर्णब गोस्वामी की रिहाई के 2 दिन बाद मुंबई पुलिस ने की रिपब्लिक TV के CFO से पूछताछ, भेजा गया था समन

रिपब्लिक मीडिया के ऊपर महाराष्ट्र प्रशासन ने हमले करने अभी बंद नहीं किए हैं। अर्णब की रिहाई के मात्र दो दिन बाद अब रायगढ़ पुलिस ने शुक्रवार (नवंबर 13, 2020) को रिपब्लिक टीवी चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर एस सुंदरम से पूछताछ की है। सुंदरम से पूछताछ भी साल 2018 के सुसाइड केस में ही की गई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, रायगढ़ पुलिस ने एस सुंदरम से इस केस में पूछताछ के लिए समन भेजा था। कहा जा रहा है कि अर्णब ने कथिततौर पर पूछताछ में यह बताया था कंपनी की ओर पेमेंट करने का काम सीएफओ का होता है। इसी आधार पर पुलिस ने उन्हें शुक्रवार को पूछताछ के लिए बुलाया।

रिपब्लिक टीवी ने बताया कि उनके सीएफओ से अलीबाग पुलिस स्टेशन में पूछताछ हुई है। अब तक इस पूरे मामले में कई लोगों से कई बार और कई-कई घंटों तक पहले ही पूछताछ हो चुकी है। इस केस से जुड़े अधिकारी का कहना है कि इस मामले में आरोपितों के वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच करेंगे।

उन्होंने कहा, “कुछ और लोगों को आने वाले समय में समन भेजा जाएगा।” इसके साथ ही उन्होंने बताया कि मामले में चार्जशीट दायर करने से पहले वित्तीय रिकॉर्ड की भी जाँच की जाएगी।

बता दें कि इससे पहले बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अर्णब गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया था। इसके बाद अर्णब को रिहाई देने के लिए मुंबई पुलिस को निर्देशित किया गया था।

अर्णब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया था। कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया था कि आदेश का तुरंत पालन किया जाए।

जमानत पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम आज इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो बर्बादी की राह पर बढ़ जाएँगे। उन्होंने यह भी कहा था कहा कि किसी की विचारधारा अलग हो सकती है और वो चैनल नहीं देखे, लेकिन संवैधानिक अदालतें अगर ऐसी आज़ादी की सुरक्षा नहीं करती हैं तो वो बर्बादी की राह पर बढ़ रही है।

उल्लेखनीय है कि अर्णब को साल 2018 के एक केस में पिछले हफ्ते उनके घर से उठाया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया, और बाद में उन्हें तलोजा जेल में शिफ्ट किया गया। इस बीच उनके साथ बदसलूकी की खबरें मीडिया में आती गई। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुँचने के बाद इस केस में उन्हें रिहाई मिली।

‘फेसबुक समय पर एक्शन लेता तो न होता दिल्ली दंगा’: FB के पूर्व कर्मचारी का खुलासा- नीति निर्माता करते हैं राजनीतिक दल के प्रभाव में काम

राजधानी दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को रोका जा सकता था, अगर फेसबुक ने सही समय पर दंगों को भड़काने वाले कंटेंट को रोका होता। यह दावा फेसबुक के पूर्व कर्मचारी मार्क एस लकी ने दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भाव समिति के सामने किया है। उन्होंने बताया कि कई बार वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारों पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके चलते कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि फेसबुक पर पहले भी दक्षिणपंथ के प्रति पूर्वग्रह रखने के आरोप लगते रहे हैं।

दिल्ली विधानसभा की इस कमेटी के अध्यक्ष विधायक राघव चड्ढा हैं। समिति ने गुरुवार (नवम्बर 12, 2020) को फेसबुक के अधिकारियों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली सामग्री को जानबूझकर नजरअंदाज करने से संबंधित शिकायतों की सुनवाई करते हुए एक बैठक बुलाई थी। दरअसल समिति का मानना है कि दिल्ली दंगों को भड़काने में फेसबुक का भी बहुत बड़ा हाथ था।

बैठक के दौरान पूर्व कर्मचारी लकी ने फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों पर राजनीतिक दलों के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए। लकी ने अपने बयान में कहा कि अगर समय रहने फेसबुक पर दिल्ली में दंगे भड़काने वाले कंटेंट को रोका गया होता जो शायद इतनी ​बड़ी घटना नहीं होती। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि अगर फेसबुक ने सही समय पर कार्रवाई की होती तो म्यांमार जनसंहार और श्रीलंका में हुए दंगों को आसानी से रोका जा सकता था।

लकी ने राजनीतिक पार्टियों और फेसबुक के बीच के कनेक्शन के बारे में खुलासा करते हुए यह भी बयान दिया कि फेसबुक के पॉलिसी हेड समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के इशारे पर कंटेंट मॉडरेशन टीम पर दबाव बनाया जाता है। इसके अलावा फेसबुक के वरिष्ठ अधिकारी और क्षेत्रीय प्रमुख उन देशों में राजनीतिक दलों से दोस्ती बनाकर रखते हैं, जहाँ फेसबुक को काफी ग्राहक हैं। इस सब की वजह से कई बार फेसबुक को अपने ही कम्युनिटी स्टैंडर्ड से समझौता करना पड़ता है। जिसका फायदा भी होता है और नुकसान भी झेलना पड़ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि फेसबुक कंटेंट मॉडरेशन के संबंध में ऐसी नीतियां बना रहा है, जो पारदर्शी नहीं हैं।

बिज़नेस के सिलसिले को उजागर करते हुए मार्क ने बताया कि फेसबुक के लिए भारत के बाद अमेरिका दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। लेकिन भारत को इसका कोई खास फायदा नहीं मिलता। क्योंकि फेसबुक भारत में अमेरिका जितना संसाधन खर्च नहीं करता है, जिससे भारत को अपेक्षाकृत नुकसान है। फेसबुक के दिशानिर्देशों पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अगर अधिकारी कंपनी के कर्मचारियों को वास्तविक गाइडलाइंस के मुताबिक काम करने दें तो समाज में ज्यादा शांति और सद्भाव रहेगा।

लेकिन ऐसी बातों को सत्य मानना अनुचित

हालाँकि, इस तरह के दावे पहले भी होते रहे हैं और कौन सा राजनीतिक दल क्या दवाब बनाता है, वह बात कभी भी सामने नहीं आती। फेसबुक पर गैरवामपंथी पार्टियों ने अगर वामपंथियों के साथ होने का आरोप लगाया है, तो वहीं कॉन्ग्रेस समेत वामपंथी पार्टियों ने उस पर अपने समर्थकों के पेज डिलीट करने के भी आरोप लगाए हैं।

मूल बात यह है कि ऐसी स्थिति में किसी पूर्व कर्मचारी की बात को सत्य मान लेना जल्दबाजी होगी क्योंकि ऐसी बातों का सत्यापन लगभग असंभव है। न कोई नाम बताए जाते हैं, न कोई खास उदाहरण, सिर्फ गोल-गोल बातें घुमाने से सत्य कहीं पीछे रह जाता है।