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हिंदू माँ की हत्या, पिता इदरीस है दारोगा, भतीजे से जबरन कराना चाहता है निकाह: घर से भागी हिन्दू पीड़िता का आरोप

उत्तर प्रदेश के बदायूं से भाग कर एक दरोगा की बेटी उत्तराखंड के हरिद्वार जाकर अपने लिए सुरक्षा माँग रही है। लड़की का आरोप है कि उसके पिता इदरीस खान अपने ही बड़े भाई के बेटे वकार यूनुस (रिश्ते में भाई) से उसका निकाह कराने चाहते थे। लेकिन वह लगातार उत्पीड़न और यौन शोषण से तंग आकर घर से भाग आई।

अब उसके पिता ने उसे ढूँढने के लिए गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई है। वहीं पीड़ित लड़की ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि उसे उसके परिजनों से बचाने के लिए सुरक्षा मुहैया करवाई जाए।

लड़की का आरोप है कि बरेली के आईजी कार्यालय में कार्यरत उसके पिता इदरीस खान के कारण पूरा प्रशासन उसे उत्तराखंड से वापस यूपी ले जाने का दबाव बना रहा है। मगर वह किसी भी कीमत पर वापस नहीं लौटना चाहती हैं। उसका आरोप है कि उससे कहा जा रहा है कि बजरंग दल के जो लोग उसे समर्थन कर रहे हैं, उन सबका एनकाउंटर करवा दिया जाएगा।

युवती की सोशल मीडिया पर वीडिया भी सामने आई है। इसमें वह आपबीती सुना रही है। इससे पता चल रहा है कि उसने हिंदू धर्म में खुद को परिवर्तित कर लिया है और पिता की मर्जी से निकाह करने के ख़िलाफ़ है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि युवती ने ये भी कहा है कि उसकी माँ हिंदू थी, जबकि पिता मुस्लिम हैं।

उसने आगे आरोप लगाया कि माँ की हत्या करने के बाद पिता उसका जबरन निकाह कराना चाहते हैं। ऐसे में परिवार के चंगुल से छूट कर वह किसी तरह विश्व हिंदू परिषद व बजरंग दल कार्यकर्ताओं के पास पहुँची और फिर मंगलवार को युवती को हरिद्वार कोतवाली लाया गया।

पुलिस के सामने भी उसने सभी आरोप दोहराते हुए सुरक्षा माँगी। युवती ने कहा कि दरोगा पिता इदरीस खान के अलावा उनके बड़े भाई व बेटों (रिश्ते में लड़की के भी भाई) के उत्पीड़न से तंग आकर 5 नवंबर को वह अपनी मर्जी से घर छोड़ आई थी।

बता दें कि एक ओर जहाँ यूपी से हरिद्वार पहुँची बदायूं पुलिस का कहना है कि लड़की के घरवालों ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई हुई है। वहीं लड़की ने खुद को बालिग बताते हुए स्पष्ट तौर पर बदायूं लौटने से इंकार कर दिया है।

उसका कहना है कि उसने अपनी मर्जी से घर छोड़ा है, जिसकी सूचना उसने बदायूं के डीएम और एसएसपी के अलावा महिला आयोग और सीएम पोर्टल पर भी दी थी। उसे डर है कि उसके पिता अपनी पोस्ट का गलत इस्तेमाल करके उसकी हत्या भी करवा सकते हैं। उसने मीडिया के जरिए पीएम से गुहार लगाई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस अधिकारी अमरजीत सिंह ने बताया कि युवती के परिवार ने बदांयू में उसकी गुमशुदगी दर्ज कराई हुई है। लेकिन युवती घर नहीं जाना चाहती है। इसलिए युवती को सिटी मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया गया है। कोर्ट के आदेश अनुसार अग्रिम कार्यवाही की जाएगी।

मंदिर जाते मुरारी को फैसल और परवीन ने दी धमकी – ‘गोली मार देंगे, मेवात में रहना है तो हमें सलाम करो’

हरियाणा के मेवात में बहुल आबादी के दबंगों का आतंक किसी से छिपा नहीं है। कथित तौर पर ‘मिनी पाकिस्तान’ के नाम से कुख्यात यह जिला आए दिन यहाँ के अल्पसंख्यकों पर होते अत्याचारों के कारण खबरों में नजर आता है। हत्या, मारपीट, अपहरण जैसी घटनाएँ अब यहाँ आम हो चुकी हैं, लेकिन बावजूद इन सबके दु:खद यह है कि हम लोग इन आपराधिक घटनाओं पर हाय-तौबा मचाना शुरू तब करते हैं, जब कोई अनहोनी घटना घट जाती है। उससे पहले हमें बस यही लगता है कि जो दूसरे के साथ हुआ, वो हमारे साथ क्यों होगा?

पिछले दिनों मेवात के नगीना थानांतर्गत एक गाँव में स्थित मंदिर में तोड़फोड़ की खबर सामने आई थी। अब इसी थाना क्षेत्र से खबर है कि एक हिंदू युवक को मंदिर जाने पर और धर्म संबंधी काम-काज करने पर जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं। उन्हें बीच सड़क पर बाइक से घेर कर कहा जाता है कि उनका और उनके जैसों का समय पूरा हो गया है, बस लिस्ट तैयार है और किसी भी दिन उनका काम तमाम हो सकता है।

सोचिए! क्या गुजरती होगी इस हिंदू युवक पर और इसके पूरे परिवार पर, जब उम्र में छोटे गाँव के बहुसंख्यक नौजवान उन्हें ऐसी धमकी देते होंगे। घर से निकलना, काम पर जाना, वापस लौटना… हर समय सिर्फ़ यही डर सताता होगा कि कहीं कोई पीछे से आकर वाकई जान न ले ले।

युवक ने खुद की सुरक्षा के लिए और इन धमकियों से घबराकर नगीना थाने में दरख्वास्त देने से लेकर मुख्यमंत्री खट्टर तक को पत्र लिख दिया है। मगर, अब भी इस मामले में कोई सुनवाई नहीं है। युवक बस इस आस में है कि कहीं से कोई उम्मीद दिखे और उन्हें आश्वासन मिल जाए कि उनके साथ कुछ नहीं होगा।

मुरारीलाल सैनी

इस युवक का नाम मुरालीलाल सैनी है। मुरारीलाल नगीना बाजार में सब्जी बेचते हैं। इनका घर नगीना बाजार से थोड़ी दूर पर स्थित है। कुछ दिन पहले 2 नवंबर को ये अपने साथी हेमराज के साथ मंदिर की ओर जा रहे थे, तभी दो बाइक पर सवार 4 लड़कों ने इन्हें घेर लिया और इनसे गाली-गलौच करके धमकी देने लगे। इससे पहले भी मुरारी को ऐसी धमकियाँ मिलती थीं, उन्हें कट्टा दिखाकर डराया जाता था मगर, तब वह गाँव और सरपंच में उलझे रहे। 

उन्हें लगा गाँव का सरपंच कोई हल निकाल देगा जबकि सरपंच ने पूरे मामले को हल्के में लेकर यह कह दिया कि वो यकीन दिलाते हैं कि ऐसा दोबारा नहीं होगा। 2 नवंबर को रात 8:15 बजे जब मंदिर जाते समय उन्हें धमकाया गया, तब उन्होंने हार मानकर नगीना थाने में अपनी दरख्वास्त दी। इस दरख्वास्त में उन्होंने फैसल और परवीन नाम के दो युवकों समेत कुछ स्थानीयों के ख़िलाफ़ अपनी सारी शिकायत दी।

थाने में दी गई शिकायत

दरख्वास्त में बताया गया कि 2 नवंबर को वह जब हेमराज की दुकान पर खड़े थे, तभी फैसल और परवीन समेत कुछ लड़के उनसे पास आए और उनसे गाली-गलौच करने लगे। उन्हें कहा गया, “जिस दिन तू अकेला मिल गया, उस दिन तुझे जान से मार देंगे। हमने नगीना गाँव के कुछ आदमियों की लिस्ट बनाई हुई है, जिन्हें जरूर मारेंगे। उनमें से एक तू है और नितिन, चमन, महेंद्र व कई अन्य लड़के हैं।”

इस दरख्वास्त में मुरारीलाल ने अपना भय प्रकट करते हुए स्पष्ट लिखा है कि उन्हें उनकी जान का खतरा बना हुआ है। दबंग उनके साथ किसी भी अनहोनी घटना को अंजाम दे सकते हैं। इस दरख्वास्त में लिखा है, “हमें ये मंदिर जाते समय मोटरसाइकिल पर आकर घेर लेते हैं और गाली-गलौच करते हैं। इनके कारण कई लोगों ने मंदिर जाना बंद कर दिया है।”

मुरारी लिखते हैं कि यदि भविष्य में उनके साथ कोई अप्रिय घटना घटती है तो इसके लिए जिम्मेदार ये ही होंगे। यहाँ बता दें कि मुरारीलाल का दावा है कि उन्होंने अपनी दरख्वास्त हरियाणा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, प्रदेश गृहमंत्री अनिल विज और पुलिस अधीक्षक को भी भेजी है। इसकी प्रति उन्होंने ऑपइंडिया से भी साझा की।

सीएम को लिखा गया पत्र

‘वे हमें आते-जाते सलाम करने को कहते हैं’

ऑपइंडिया ने जब मुरारीलाल से पुलिस कार्रवाई पर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि अभी तक उन्हें थाने से कोई जवाब नहीं मिला है। बाइक सवार अब भी धमकी देते हुए कहते हैं, “तुम आरएसएस से हो… तुमको गोली मार देंगे।”

मुरारी हताश होते हुए कहते हैं कि उनकी उम्र 31 साल की है और उन्हें 20-22 साल के लड़कों से ऐसी धमकियाँ मिल रही हैं। पहले उनके साथ ऐसा कुछ नहीं था। वो बाजार में करीब 20 साल से दुकान लगाते थे। लेकिन 7-8 महीनों से इन लड़कों ने परेशान शुरू कर दिया। मंदिर जाते हुए बाइक से घेरने लगे। मुरारी से कहा जाने लगा, “मेवात में अगर रहना है तो हमारे हिसाब से रहना होगा। इसलिए जब भी सामने से आओ तो हमें सलाम करो।”

पीड़ित युवक को पहले लगता था कि ये सब गाँव की बातें हैं, गाँव में ही सुलझ जाएँगी लेकिन जब दबंग नहीं माने तब उन्होंने गाँव के लोगों को इकट्ठा करके सरपंच के सामने अपनी बात रखी, और तब उन्हें तसल्ली दे दी गई कि आज के बाद ऐसी शिकायत नहीं आएगी। इस घटना के एक माह बाद ही दोबारा ये सब शुरू हो गया। धमकी देने का सिलसिला भी लगातार चलता रहा। गाँव छोड़ने की धमकी मिलती रही।

2 नवंबर को हेमराज की दुकान पर खड़ा देखकर ये युवक दोबारा बाइक से आए और कहा- “अभी तक नहीं भागा तू यहाँ से? अब तेरा टाइम आ गया है।” मुरारी लाल के अनुसार उनके इलाके में जो भी हिंदुओं के बच्चे धर्म संबंधी कार्यों के लिए आगे बढ़ते हैं, उन्हें दबाने की कोशिश की जाती है और जब वह नहीं दबते तो उनसे मारपीट होती है। बहुसंख्यक आबादी का दबदबा बताते हुए मुरारी कहते हैं कि यहाँ उन लोगों का ऐसा असर है कि उनका कोई भी व्यक्ति आकर भरे बाजार में धमकी दे जाता है। दुकान जलाने तक की धमकियाँ मिलती हैं।

पुलिस का पक्ष

बता दें कि ऑपइंडिया ने इस संबंध में नगीना थाने के एसएचओ को संपर्क किया था मगर उन्हें इस विषय में तब तक कोई सूचना नहीं थी। इसके बाद हमने उनसे दोबारा बातचीत करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने हमारा फोन नहीं उठाया।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले नगीना थाने के ही उलेटा गाँव में राहुल नाम के एक युवक पर समुदाय विशेष ने फरसे से जानलेवा हमला करके परिवार को धमकियाँ दी थीं। परिवार ने इस बाबत अपनी शिकायत भी करवाई थी मगर आरोपितों की गिरफ्तारी को लेकर आज तक टाल मटोल हो रही है। पुलिस का कहना है कि सारी औपचारिकता पूरी होते ही आरोपितों को गिरफ्तार किया जाएगा।

‘ओवैसी सूअर का बच्चा… मुसलमानों तुम्हें बिहार की हार मुबारक’ – बौखलाए मुनव्वर राणा ने दी जमकर गाली

फ्रांस घटना पर विवादित बयान देने के बाद से आलोचनाओं का शिकार हो रहे उर्दू शायर मुनव्वर राणा अब बिहार के परिणाम देखकर भी आहत हो गए हैं। उन्होंने ओवैसी की पार्टी को 5 सीट जीतने के लिए तंज भरे अंदाज में बधाई तो दी है लेकिन साथ ही बिहार की जनता को हारा हुआ बताया है।

नवभारत ऑनलाइन को दिए साक्षात्कार में मुनव्वर राणा की हताशा साफ झलक रही है। उन्होंने पहले अपने सोशल मीडिया पर लिखा, “मुसलमानों! तुम्हे औवैसी की जीत और बिहार की हार मुबारक हो। मैं तो शायर हूँ मेरी बात कहाँ मानोगे, तुमने झुठला दिए दुनिया में पयम्बर कितने।”

इसके बाद अपने इंटरव्यू में बताया, “बिहार हार गए, बंगाल भी हारेंगे… फिर 2022 से पहले-पहले हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाएगा।”

मुनव्वर राणा ने एनबीटी ऑनलाइन के हिमांशु तिवारी से बात करते हुए बताया कि आखिर उन्हें यह देखकर कितना दुख हुआ, जब ओवैसी के कारण राजद को हार मिली और एनडीए को फायदा पहुँच गया। उन्होंने कहा कि ओवैसी जैसे लोग हैं, ये डॉक्टर अय्यूब जैसे लोग हैं, जो मुसलमान को हाँका लगाते हैं और फिर भाजपा उनका शिकार करती है।

एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, राणा ने कहा:

“मुझे दुख यह हुआ कि दुनिया की जहीन कौम मानते हैं मुसलमान कि मैं कुरान पढ़ता हूँ, यह करता हूँ, वो करता हूँ। मालूम हुआ कि ये ओवैसी जो सूअर का बच्चा है, यह 5 सीट राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की नेता तेजस्वी यादव से माँग लेता तो मिल जाती…. लेकिन आपको फायदा पहुँचाना है भारतीय जनता पार्टी को।”

वह ओवैसी के लिए कहते हैं, “इनकी 15 हजार करोड़ रुपए की संपत्ति खड़ी है, इन लोगों को सड़क पर घूमते देखा है हमने, इनके बाप को। यह अंपायर (अकूत धन-दौलत) कहाँ से खड़ा हो गया? यही दलाली करके हुआ है। एक शेर है कि हमारा सानिहा ये है कि हर दौर-ए-हुकूमत में शिकारी के लिए जंगल में हम हाँका लगाते हैं। ये ओवैसी जैसे लोग हैं, ये डॉक्टर अय्यूब जैसे लोग हैं, जो मुसलमानों का हाँका लगाते हैं, फिर भारतीय जनता पार्टी उनका शिकार करती है।”

राजद की हार से निराश मुनव्वर कहते हैं कि उनका मतलब बस यह था कि बिहार में सेकुलर हुकूमत बननी चाहिए। उन्हें दुख इसी चीज है कि अब बिहार के नतीजे तो सामने आ गए हैं। कुछ दिन बाद बंगाल में भी यही होगा।

ओवैसी को लेकर अपना गुस्सा जाहिर करके हुए राणा कहते हैं कि अगर अखिलेश यादव यूपी में भी उन्हें ऑफर दें तो वह नहीं मानेंगे। उनके पास 15 हजार करोड़ का अंपायर है लेकिन कभी कोई छापा नहीं हुआ। कभी नहीं हुआ।

इसके बाद वह हैदराबाद में आई बाढ़ को लेकर भी ओवैसी पर निशाना साधते हैं, उन्हें गुंडा बताते हैं और मुसलमानों को जाहिल कहते हुए अपनी बात रखते हैं। वह कहते हैं कि हैदराबाद में 83 तालाब थे, इसने सब पटवाकर इमारतें खड़ी कर दीं। जब सैलाब आया तो लोग यही कह रहे थे कि जब पानी को उसका घर नहीं मिलेगा तो वो सड़कों पर ही बहेगा। तो जैसे मजाफाती गुंडा होता है, वैसे ही इसकी हैसियत थी।

वह आगे कहते हैं, अभी आजम खान भी नहीं, अभी कोई है नहीं… इसलिए ये (ओवैसी) जो कहता है, उसे बेवकूफ किस्म के जाहिल मुसलमान सोचते हैं कि वह जैसा कहेंगे, वैसा वह कर देगा। लेकिन क्या ऐसा कहीं हो सकता है? बिहार हार गए, बंगाल भी हारेंगे और बंगाल हारने के बाद में 2022 से पहले-पहले हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाएगा। इस बात को लिख लीजिए और एक साल बाद देख लीजिएगा।

फ्रांस के हमलवार का राणा ने किया था बचाव

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले मुनव्वर राणा ने फ्रांस के हमलावर का बचाव करते हुए कहा था, “अगर उसकी जगह मैं होता तो मैं भी वही करता। किसी को इतना मजबूर न करो कि वह कत्ल करने के लिए तैयार हो जाए।”

मुनव्वर राणा ने जी न्यूज से बात करते हुए कहा था, “अगर अभी कोई शख्स मेरे बाप का कार्टून कोई ऐसा बना दे कोई गंदा कार्टून, मेरी माँ का कोई ऐसा गंदा कार्टून बना दे, तो हम तो उसको मार देंगे। अगर कोई हमारे हिंदुस्तान में हमारे देवी-देवता का, माँ सीता का या भगवान राम का ऐसा कोई कार्टून बना दे जो गंदा हो, आपत्तिजनक हो, तो हम उसको मार देंगे।”

इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश के बाद शायर मुनव्वर राणा के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। उनके खिलाफ़ आईपीसी की धारा 153-A, 295-A,298, 505(1)(B),505(2) और आईटी एक्ट की धरा 67,66 के अंतर्गत मामला पंजीकृत हुआ था।

नहीं, वामपंथियों का पुनर्भव नहीं है बिहार चुनाव परिणाम: समझिए कॉमरेडों के कथित ‘स्ट्राइक रेट’ के पीछे का गणित

बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं और एक बात जो सबको अचंभे में डाल रही है वो ये है कि वामपंथियों को अच्छी सीटें मिली हैं। वामपंथियों को कुल 16 सीटों पर सफलता मिली है। 29 सीटों में से 55.17% सीटें जीत लेने के कारण उनका प्रदर्शन अच्छा माना जा रहा है। देश के अन्य वामपंथी कॉमरेड भी इसे सकारात्मक रूप में लेते हुए अपने पुनर्भव के रूप में देख रहे हैं। क्या ये ऐसा ही है, जैसा दिख रहा है? आइए, समझते हैं।

सबसे पहले तो ये समझने वाली बात है कि ये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) या फिर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) [CPI (M)] की सफलता नहीं है। इन 16 में से 14 सीटें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी लेनिनवादी) लिबरेशन, अर्थात CPI (ML) को मिली हैं, जिसका बिहार में 90 के दशक के पहले से ही जनाधार रहा है और उसके प्रत्याशियों को सफलता मिलती रही है।

दीपांकर भट्टाचार्य बिहार में इसका नेतृत्व करते हैं और इस चुनाव में भी उन्होंने जम कर रैलियाँ और जनसभाएँ की हैं। इसने किसानों, युवाओं और व्यापारियों तक का भी संगठन बना रखा है और अपने पुराने जनाधार के कारण बिहार के कुछ हिस्सों की राजनीति में हस्तक्षेप रखते हैं। कई भाषाओं में इसके मुखपत्र भी आते हैं। सीवान, भोजपुर और आरा व इसके आसपास के क्षेत्रों में जमींदारों से लड़ाई के शुरुआती दौर में ही इन्होंने अपना जनाधार बना लिया था

2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में इसे 3 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में सीवान के दरौली से भाकपा (माले) के सत्यदेव राम जीते थे, जिन्होंने इस बार भी अपनी सीट बचा ली है। कटिहार के बलरामपुर से महबूब आलम जीते थे। उन्होंने भी अपनी सीट बचा ली है। वहीं भोजपुर के तरारी से भी इसी पार्टी के सुदामा प्रसाद ने जीत दर्ज की थी। 5 साल का कार्यकाल पूरा कर के वो भी फिर से जीत गए हैं। इसके अलावा 9 अन्य सीटें पार्टी के खाते में आईं।

अगर आपको लगता है कि इस चुनाव में 29 सीटों पर वामपंथियों की लहर थी तो आप एकदम गलत हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है। भाकपा (माले) ने उन्हीं इलाकों में सीटें लीं, जहाँ उनका जनाधार था। मधुबनी की भी दो सीटें ऐसी हैं, जहाँ उसने प्रभाव डाला। झंझारपुर से उसने रामनारायण यादव को टिकट दिया था, जो दूसरे स्थान पर रहे। इसके अलावा हरलाखी से भी उसके उम्मीदवार को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

यहाँ से अगर निर्दलीय मोहम्मद शब्बीर के वोट को मिला दें तो यहाँ भी वामपंथी उम्मीदवार की जीत हो जाती। ऑपइंडिया की टीम बिहार में ग्राउंड पर भी घूमी है और वामपंथियों की सफलता का सबसे बड़ा कारण ये है कि उनके साथ राजद का कोर वोट भी जुड़ा। वोटों का बिखराव नहीं हुआ और इसीलिए अपने पुराने जनाधार वाले क्षेत्रों में, जहाँ 90 के दशक में उनका खासा प्रभाव था, वहाँ वो अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब रहे।

हाँ, पिछले 30 सालों में ये भाकपा (माले) का सबसे उम्दा प्रदर्शन ज़रूर है, और इसीलिए दीपांकर भट्टाचार्य कह रहे हैं कि महागठबंधन में उन्हें अच्छा प्रतिनिधित्व नहीं मिला, वरना स्ट्राइक रेट के हिसाब से उन्हें और भी ज्यादा सीटें मिल सकती थीं। 2005 की फ़रवरी में हुए चुनाव में भी पार्टी ने 7 सीटें जीती थीं। इसी तरह उसी साल विधानसभा भंग होने के बाद अक्टूबर में जब फिर से चुनाव हुए, तो भाकपा (माले) 5 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

हालाँकि, ये कोई आवश्यक नहीं है कि वामपंथियों को अगर बिहार विधानसभा चुनाव में कई अन्य इलाकों की सीटें या कॉन्ग्रेस के पर कतर के सीटें दी गई होती तो वो जीत ही जाती, क्योंकि उसके लिए अपने खास जनाधार वाले इलाकों से बाहर जीतना संभव नहीं है। राजद का कोर वोट बड़ा है और बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बन कर भी उभरी है, ऐसे में उसके वोट्स ने भाकपा (माले) को जबरदस्त फायदा पहुँचाया।

झारखण्ड में भी पार्टी पाँव पसार रही है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में वहाँ नक्सलवाद फिर से पनप रहा है। खासकर गिरिडीह में उसका प्रदर्शन जानदार रहा था, जहाँ के पंचायत चुनावों में उसने 11 जिला परिषद सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी। उसे एकमात्र विधानसभा सीट भी गिरिडीह के धनवार में मिली। ये चीजें साबित करती हैं कि कुछ छोटे-छोटे क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ बचे-खुचे जनाधार को इकट्ठा कर वो गठबंधन में जीत सकती है।

जहाँ तक बात CPI और CPM की है, तो उसका बिहार में कोई भी जनाधार नहीं है – ये आपको कोई भी राजनीतिक विशेषज्ञ बता सकता है। इन दोनों पार्टियों को 2-2 सीटें मिली तो ज़रूर हैं, लेकिन ये भी भाकपा (माले) के प्रभाव या फिर स्थानीय समीकरणों से मिली। कहीं-कहीं जदयू के मुकाबले लोजपा उम्मीदवार ने भी उसे फायदा पहुँचाया है। आइए, इसे जरा उदाहरण के साथ समझते हैं कि स्थानीय समीकरणों ने इसमें कैसे मदद की।

उदाहरण के लिए आप पालीगंज सीट को देख लीजिए। वहाँ पटना के पालीगंज में भाकपा (माले) ने 33 साल के संदीप सौरव को उतारा। उनका मुकाबला यहाँ के सिटिंग विधायक जयवर्द्धन एफव से था, जो 2015 में जीते तो थे राजद से लेकिन इस बार पाला बदल कर जदयू से उतरे थे। लड़ाई काँटे की थी, लेकिन लोजपा ने 2010 में यहाँ से भाजपा विधायक रहीं उषा विद्यार्थी को उतार कर काम खराब कर दिया। वो 10% से अधिक वोट पाने में कामयाब रहीं।

इसी तरह अगिआँव, काराकाट, तरारी, अरवल और पालीगंज – ये पाँचों ही सीटें आपस में सटी हुई हैं और इससे पता चलता है कि पटना और आरा व उसके आस-पास के इलाकों में उनका जो जनाधार बचा हुआ है, वहाँ राजद के कोर वोटरों के जुड़ने से उन्हें सफलता मिली। इसी तरह से जीरादेई और दरौली सीटें आपस में सटी हुई हैं। दोनों पर उन्हें जीत मिली। इस तरह से इन दो इलाकों में उन्हें कुल 7 सीटें मिलीं।

पालीगंज और डुमराँव में यादव जनसँख्या 20% से अधिक है। इससे पता चलता है कि राजद का कोर वोट (क्योंकि वो जाति के आधार पर ही लड़ती है) उन्हें ट्रांसफर हुआ। वामपंथियों ने बस अपने पुराने गढ़ में राजद के कोर वोट्स जोड़ कर जीत पाई है और लोजपा जैसी पार्टियों ने समीकरण उनके पक्ष में किया, न तो उनकी कोई लहर थी और न ही ये उनके पुनर्जीवित होने की निशानी है। और हाँ, CPI व CPM का बाजार ख़त्म है, जो भी सफलता है वो CPI (ML) की। बिहार चुनाव में यही वामपंथियों को इतनी सीटें मिलने का कारण भी है।

चाटूकार NDTV को दो सीटों पर दो नंबर पर रही कॉन्ग्रेस में ‘आशा’ दिख रही है!

उत्तर प्रदेश की 7 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कल तक भाजपा 6 सीटों पर लगातार आगे चल रही थी। वहीं बाकी बची एक सीट पर सपा प्रत्याशी को बढ़त मिली थी। रुझानों की जो तस्वीर मतगणना के दौरान टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही थी, उससे साफ था कि नतीजे भाजपा के पक्ष में हैं और बिहार व मध्य प्रदेश की तरह यूपी में भी बीजेपी को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं।

हालाँकि, इस बीच सबसे ‘निष्पक्ष’ मीडिया चैनल एनडीटीवी, यूपी के उपचुनावों को देख कर कामना कर रहा था कि कम से कम दो सीटों पर कॉन्ग्रेस अपना कब्जा जमा ले। मगर, अफसोस ऐसा हो न सका। कॉन्ग्रेस को इन उपचुनावों में भी एक भी सीट नहीं मिली। बाद में चाटुकार एनडीटीवी ने खुद को समझाते-बुझाते एक खबर प्रकाशित की और अपने पाठकों को बताना चाहा कि उन्हें कॉन्ग्रेस में किस तरह आशा दिख रही है।

जी हाँ, एनडीटीवी को कॉन्ग्रेस में उम्मीद की किरण दिख रही है। इसका जिक्र उन्होंने अपनी हेडलाइन में ही कर दिया है। हम एनडीटीवी पर प्रकाशित इस खबर से समझ सकते हैं कि आखिर क्यों एक ओर जब हर मीडिया चैनल या तो जीते हुए प्रत्याशी पर खबर चला रहा था या फिर क्षेत्र से लड़े सभी कैंडिडेट्स के ऊपर अपना विश्लेषण दे रहा था, एनडीटीवी ने क्यों अपनी विशेष खबर को सिर्फ़ कॉन्ग्रेस का पक्ष लेकर चलाया। इस खबर में विशेष तौर पर अलग से बताया गया है कि कौन सी विधानसभा में पार्टी के दो प्रत्याशी रनर अप रहे या फिर सेकेंड आए।

NDTV की खबर और शीर्षक से समझिए ‘निष्पक्षता’

बंगरमऊ से आरती बाजपाई और घातमपुर से कृपा शंकर का नाम खबर में लिखते हुए एनडीटीवी ने बताया कि इनके रूप में उन्हें आशा दिख रही है। यूपी में कॉन्ग्रेस प्रवक्ता अशोक सिंह के बयान का उल्लेख करते हुए यह भी बताया गया कि जहाँ कॉन्ग्रेस दूसरे नंबर पर रही, वहाँ के मतदाताओं के मत में बदलाव आसानी से देखा जा सकता है। अशोक सिंह का कहना है कि उनकी पार्टी बसपा के मुकाबले दो नंबर पर रही है। बसपा सिर्फ दूसरे नंबर पर बुलंदशहर में ही रही।

आगे खबर में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन इन चुनावों में अच्छा दिखाने के लिए 2017 के चुनावों पर भी बात हुई। इसमें याद दिलाया गया कि तब तो कॉन्ग्रेस तीसरे नंबर पर थी और दूसरे नंबर पर एसपी का प्रत्याशी था। लेकिन अब यही स्थान बदल गए हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए अपनी प्रतिबद्धता को जाहिर करते हुए एनडीटीवी ने अपनी खबर में प्रियंका गाँधी का बखान भी किया। हाथरस का मुद्दा उठाकर बताया कि कैसे इस मामले पर कॉन्ग्रेस महासचिव लगातार योगी आदित्यनाथ पर हमले बोल रही थी। 

आगे पाठकों का ध्यान इस बात पर आकर्षित करवाया गया कि भले ही भाजपा ने चुनाव जीत लिया है लेकिन यदि 2017 के मुकाबले आँकड़े देखें तो भाजपा का वोट शेयर गिर गया है।

अन्य पार्टियों व भाजपा के वोटशेयर को दर्शाते हुए इस खबर में प्रमाणित करने की कोशिश की गई कि बांगरमऊ, देवरिया, घातमपुर, तुंडला- इन सब जगह बीजेपी के मतदाताओं का ध्यान दूसरी ओर आकर्षित हुआ है। वहीं नौगाँव में पार्टी का प्रदर्शन सुधरा है और बुलंदशहर में इसे बेहतर भी माना जा सकता है।

एनडीटीवी की इस खबर का क्या अर्थ है, क्या निष्कर्ष है? इस बारे में आप खुद सोचिए। न इसमें जीते हुए प्रत्याशियों की बात है और न ही हारे हुए प्रत्याशियों की हार का विश्लेषण। इसमें या तो कॉन्ग्रेस के लिए एनडीटीवी की आशा नजर आ रही है या फिर भाजपा की जीत के लिए निराशा।

वरना क्या वजह है कि एक जगह जब लोगों का कहना यह है कि कॉन्ग्रेस के आपसी ताल-मेल के कारण उन्हें कहीं जीत नहीं मिल पा रही है, तब एनडीटीवी ये बताना चाह रहा है कि कॉन्ग्रेस बाकी सीटें हारी तो हारी लेकिन जिन सीटों पर टक्कर दी है और दूसरे नंबर पर पार्टी प्रत्याशी रहे हैं, वह एक उम्मीद है, आशा की किरण है, जो पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की ओर इशारा करती है। इसे यदि चाटुकारिता नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा?

नीतीश को बिहार का सीएम बनाने के पीछे भाजपा की कौन-सी मजबूरी है?

सबसे पहला कारण तो यही है कि नीतीश सत्ता के लिए जब राजद से एक बार हाथ मिला सकता है तो उसे दोबारा हाथ मिलाने में कोई समस्या नहीं होगी। वो यह भी कह देगा, “राजनीति में कोई भी स्थाई दुश्मन नहीं होता।”

16 लोकसभा सांसद हैं जदयू के, भले ही सारे नरेन्द्र मोदी के कारण गए हों, लेकिन अब पाँच साल के लिए तो वही हैं। नीतीश बिहार में भाजपा को सत्ता से बाहर तो कर ही सकते हैं, बल्कि केन्द्र में भी दुखदायी समस्या बन सकते हैं। इसलिए, भले ही त्वरित निवारण सही न हो, पर 69 साल के नीतीश को शांत रखना भाजपा की विवशता कह सकते हैं।

अब सवाल यह है कि भाजपा विवश क्यों है? क्योंकि भले ही जे पी नड्डा खूब बड़े रणनीतिकार हों, लेकिन बिहार का सत्य यही है कि केन्द्र को चालीस सांसद से मतलब है, जो कि बिहार से मिल रहा है। उसके अलावा बिहार, केन्द्र सरकार को कुछ खास वापस नहीं करता, बल्कि हमेशा ‘विशेष पैकेज’ का रोना रोता रहता है। ऐसे राज्य पर भाजपा की कोई खास नजर है भी नहीं।

भाजपा को बिहार में जमने के लिए इन पाँच सालों में जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कार्य करने होंगे। नीतीश के अगले पाँच साल जो भी रहें, भाजपा के लोगों को 2024 और 2025 में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी अभी से करनी चाहिए। बिहार हमेशा गरीबी का रोना नहीं रो सकता, समुद्र न होने की बकैती नहीं कर सकता।

नीतीश और सुशील मोदी दोनों से भाजपा को सीटों का घाटा ही हुआ है, लाभ नहीं। इन दोनों के कारण भाजपा को रात के नौ बजे तक परिणाम की प्रतीक्षा करनी पड़ी क्योंकि हम जहाँ भी गए, लोगों को भाजपा से पार्टी के तौर पर समस्या नहीं थी, बल्कि सुशील मोदी को हर एक व्यक्ति एक ‘बेकार नेता’ कह रहा था। वहीं, नीतीश से नाराजगी उनकी सीटों की संख्या में भी दिखी, और लोगों ने उनकी पार्टी को जहाँ भी वोट दिया वहाँ यह कह कर दिया कि उन्होंने कुछ खास किया नहीं, और हम नाराज भी हैं, लेकिन इतने नाराज नहीं है कि तेजस्वी जैसे को सत्ता दे दें।

इसलिए, इन दोनों को कूटनीति से ही हटाना होगा। सुशील मोदी को शायद उत्तरपूर्व में राज्यपाल बनाने की तैयारी चल रही है, नीतीश को पाँच अंतिम साल और। नीतीश ने स्वयं ही कहा है कि वो अंतिम बार लड़ रहे हैं, हो सकता है कि आगे पलट जाएँ, अतः भाजपा को उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए।

हो सकता है कि नीतीश वास्तव में बिहार के लिए यह पाँच साल ऐसे काम करें कि उन्हें लोग याद रखें। पहले तीन साल के काम की मार्केटिंग अगले आठ साल कर के, फिर राजद से हाथ मिला कर सत्ता पाने, और वापस भाजपा के साथ आ कर, मोदी के नाम पर अगले पाँच साल टिकने की तैयारी करने वाले नीतीश को ‘इतिहास’ में सुशासन बाबू के नाम को धूमिल होते देखने की बजाय, वापस उसे जनस्मृति का हिस्सा बनाने की इच्छा तो होगी ही।

भाजपा की योजना लम्बे नहीं, बहुत लम्बे समय की होती है। सामान्य पत्रकार या नागरिकों के अनुभवों से दस-बीस गुणा ज्यादा अनुभव वाले लोग शीर्ष नेतृत्व में बैठते हैं। कहा जाता है कि भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के पास भाजपा बिहार के नेता यह समस्या ले कर गए थे कि नीतीश को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। नड्डा ने विचार करने के बाद अमित शाह से चर्चा की, अमित शाह भी सहमत दिखे। फिर बात प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँची, जिन्होंने पंद्रह मिनट में इस बात को खारिज कर दिया कि नीतीश मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे।

सीधा निर्देश यह था कि भाजपा का कोई भी नेता या प्रवक्ता नीतीश से इतर कोई बात न करे। इसीलिए, आपको परिणाम वाले दिन हर प्रवक्ता ‘नीतीश जी ही मुख्यमंत्री बनेंगे’ कहता दिखा। क्योंकि नीतीश किस स्तर के ‘मूडियल/ईगोइस्ट’ नेता हैं, वो हमने 2014-15 में दो बार देख लिया है जब वो मोदी के नाम से बगावत करने के साथ, भाजपा बिहार से भी नाता तोड़ कर लालूपुत्र तेजस्वी के साथ चले गए।

इसलिए, नीतीश कुमार को किसी भी तरह से ऐसा इशारा देना कदाचित आग से खेलने जैसा था। आगे मर्जी नीतीश कुमार की है कि वही मुख्यमंत्री बनेंगे या कुछ और देखने को मिलेगा। शायद ही ऐसा कुछ अलग आपको देखने को मिले, लेकिन एक ‘आँत में दाँत’ वाले नेता के साथ रिस्क लेना सूझ-बूझ की बात तो है ही नहीं।

एक ऐसे राज्य से, जहाँ से न तो केन्द्र को पैसा मिलता है, न ही प्रदेश को कोई विशेष लाभ, भाजपा सिर्फ पाँच साल के लिए अपने समर्थन के सांसदों की संख्या गँवाना नहीं चाहेगी क्योंकि भाजपा बहुत लम्बा समय ले कर चलती है। इसकी सारी योजनाएँ दीर्घकालिक होती हैं, चाहे वो ढाँचागत विकास हो या फिर सामान्य जन को छूने वाली बातें (बिजली, पानी, शौचालय, गैस, बत्ती, बैंकिंग आदि)।

इसलिए, बिहार को पाँच साल और भी नीतीश को देने का रिस्क भाजपा लेती दिख रही है क्योंकि तुलनात्मक रूप से विकास के कार्य तो हुए हैं, लेकिन आशा के अनुरूप और आनुपातिक रूप से बहुत कुछ होने को रह गया है। हो सकता है कि नीतीश अपनी ही छवि सुधारने को ले कर बिहार पर अगले पाँच साल उद्योग और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान दें, और तब तक भाजपा अपने स्तर से बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में जमीनी स्तर पर गंभीरता से कार्य करना शुरु करे।

घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए 10 सेक्टर्स में लागू होगी PLI स्कीम: अगले 5 सालों में मिलेगी ₹2 लाख करोड़ की मदद

मोदी कैबिनेट ने बुधवार (नवंबर 11, 2020) को 10 सेक्टर्स में ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव्स’ (PLI) लागू करने की मँजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस निर्णय की घोषणा करते हुए कहा कि इस कदम से भारत की विनिर्माण क्षमताओं में वृद्धि होगी।

इस स्कीम के तहत 5 सालों में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया जाएगा। साथ ही, ऑटो कॉम्पोनेंट्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर को 57,000 करोड़ रुपए की अधिकतम प्रोत्साहन राशि दी गई है। इसके अलावा जिन सेक्टर्स को इसका फायदा होगा उनमें एडवांस सेल केमिस्ट्री, बैटरी, फार्मा, फूड प्रोडक्ट्स और व्हाइट गुड्स शामिल हैं।

इस योजना के अनुसार, केंद्र अतिरिक्त उत्पादन पर प्रोत्साहन प्रदान करेगा और कंपनियों को भारत में बने उत्पादों को निर्यात करने की अनुमति देगा। पिछले महीने नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार ने कहा था कि PLI स्कीम का लक्ष्य प्रतिस्पर्धात्मक माहौल बनाने के लिए निवेशकों को प्रोत्साहित करना है।

‘यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम फैसला’

केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक, “हमारे यहाँ मैन्युफेक्चरिंग GDP का 16% है। हमें अभी तक निर्यात बढ़ाने के उपायों में ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार 2 लाख करोड़ रुपए का प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव देगी। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में अहम फैसला है।”

उन्होंने कहा, “अब मोबाइल और मेडिकल डिवाइस निर्माण बनाने वाली कंपनियों पर फोकस है, क्योंकि मोबाइल की अनेक कंपनियों में FDI आया है, इससे देश में ही उत्पादन और निर्यात बढ़ेगा। देशी कंपनियों को इसका फायदा मिलेगा।”

प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना का लाभ रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन जैसे उत्पाद, औषधि, विशेष प्रकार के इस्पात, वाहन, दूरसंचार, कपड़ा, खाद्य उत्पाद, सौर फोटोवोल्टिक और मोबाइल फोन बैटरी जैसे उद्योगों में निवेशकों को मिलेगा।

ये हैं वो 10 सेक्टर

इन 10 सेक्टरों में व्हाइट गुड्स, ऑटो, ऑटो कम्पोनेंट और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग शामिल हैं। इस योजना का उद्देश्‍य देश में प्रोडक्शन को बढ़ावा देना है। हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी कि केंद्र सरकार जल्द ही घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को सपोर्ट करने और एशिया में वैकल्पिक वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के रूप में देश को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम आठ और क्षेत्रों में पीएलआई योजना का विस्तार करेगी।

पिछले ही महीने नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार ने ऐलान किया था कि सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव लेकर आएगी, ताकि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों की मदद की जा सके। उन्होंने बताया था कि पीएलआई स्कीम का मकसद देश में पैसा लगाने वाले निवेशकों को इंसेटिंग मुहैया कराना है।

पीएम मोदी ने भी बुधवार को ट्वीट कर इस स्कीम को केंद्र सरकार का बड़ा फैसला बताया। उन्होंने लिखा कि इस स्कीम के तहत उत्पादन के 10 प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। उन्होंने कहा कि कैबिनेट के इस फैसले पीएलआई योजना के तहत विनिर्माण के 10 क्षेत्रों को बढ़ावा मिलेगा। इसके साथ ही भारत को पसंदीदा निवेश गंतव्य बनाते हुए युवाओं को रोजगार का अवसर मिलेगा। यह हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार लाने और एक आत्मानिभर भारत को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इन सेक्टर्स में PLI स्कीम पहले से चल रही

सरकार ने इससे पहले कुछ सेक्टर्स में इसे लागू कर दिया है, जैसे कि फॉर्मा, मेडिकल डिवाइसेज, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक मैनुफैक्चरिंग कंपनीज। इन सभी सेक्टर्स के बाद अब सरकार की योजना इसे अन्य सेक्टर में भी लागू करने की है।

PLI स्कीम के तहत आवेदन करने की आखिरी तारीख 30 नवंबर तक

इसके पहले PLI स्कीम के तहत आवेदन करने वाली कंपनियों के लिए अंतिम तारीख को बढ़ाकर 30 नवंबर कर दिया गया था। वहीं केंद्र सरकार ने फार्मा एवं मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्रीज के लिए PLI स्कीम की शर्तों को आसान किया था।

AIMIM न होती तो भी BJP ही जीतती: कॉन्ग्रेस के आरोप पर ‘वोट कटुओं’ का जवाब

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। हालाँकि, इन चुनावों में भाजपा के शानदार प्रदर्शन से सूबे में एनडीए ने 125 सीटों से जीत हासिल की, जिससे न सिर्फ केंद्र सरकार के कामकाज पर मुहर लगी है बल्कि ‘मोदी मैजिक’ की थ्योरी को भी बरकरार रखा। बिहार में एनडीए की जीत ने कॉन्ग्रेस के सारे दाँव-पेंच को ठंडे बस्ते में दाल दिया। वहीं, निराश कॉन्ग्रेस ने अपनी कमियों को दरकिनार करते हुए हार दोष AIMIM के मत्थे मढ़ दिया और उसे ‘वोट कटुआ’ पार्टी ठहराया है।

कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM, जिसने बिहार चुनावों में 20 सीटों में से 5 सीटें हासिल की, ने ‘वोट कटुआ’ पार्टी के रूप में काम किया, जिसके वजह से चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार हुई। वहीं, इन आरोपों का AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने विरोध करते हुए ट्विटर पर कॉन्ग्रेस को जमकर लताड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस AIMIM की सफलता को देखते हुए अपनी हार का जिम्मेदार उन्हें ठहरा रही हैं।

ओवैसी ने ट्विटर पर उन 20 सीटों का आँकड़ा शेयर किया, जिन पर उनकी पार्टी के उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। बता दें, AIMIM ने जिन 20 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें मात्र 5 पर उन्हें जीत मिली, जबकि महागठबंधन को 9 सीटें मिलीं और बाकी 6 सीटों पर NDA ने जीत दर्ज की है।

6 सीटों पर एनडीए के उम्मीदवारों की जीत के मार्जिन का ब्योरा साझा करते हुए ओवैसी ने आरोप लगाया कि उन सीटों पर एआईएमआईएम उम्मीदवारों को मिला कुल वोट जीत के मार्जिन से भी कम था। इसका मतलब अगर AIMIM के वोट महागठबंधन को भी मिल जाते तो भी बीजेपी ही जीतती और महागठबंधन फिर भी हार जाता।

साहेबगंज सीट पर एनडीए गठबंधन के साथी वीआईपी के राजू कुमार सिंह ने 15,000 से अधिक मतों के अंतर से चुनाव जीता। इस निर्वाचन क्षेत्र में AIMIM के उम्मीदवार को केवल 4000 मत ही प्राप्त हुए। इसी तरह, छतरपुर के भाजपा उम्मीदवार ने 20,000 से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की। वहीं एआईएमआईएम उम्मीदवार आलम को केवल 1,990 वोट मिले। बीजेपी के जय प्रकाश यादव ने नरपतगंज में 28,500 वोटों से जीत हासिल की, जबकि एआईएमआईएम उम्मीदवार को 5,495 वोट मिले।

यही हाल प्राणपुर, रानीगंज और बरारी निर्वाचन क्षेत्रों में भी था, जहाँ एनडीए के उम्मीदवारों ने एआईएमआईएम की तुलना में काफी अधिक संख्या में वोट हासिल किए थे। यह साबित करता है, ओवैसी की पार्टी के विपरीत अन्य कोई भी पार्टी होती तो एनडीए के समक्ष वह भी धराशाही हो जाती।

उल्लेखनीय है कि एआईएमआईएम ने कई सीटों जैसे फुलवारी, साहबपुर कमाल, मनिहारी, रानीगंज और बरारी में हिंदू उम्मीदवार खड़े किए थे। इसलिए अगर एआईएमआईएम ने उन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा होता तो हो सकता है उनमें से कुछ वोट महागठबंधन को जाते तो कुछ एनडीए को भी मिल जाते।

गौरतलब है कि वोटों को लेकर ओवैसी और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के बीच काफी विवाद हुआ। खेरा ने यह भी आरोप लगाया कि AIMIM ने चुनाव लड़कर एनडीए को जिताने में मदद की है। इन आरोपों का एआईएमआईएम प्रमुख ने जमकर विरोध किया था।

बिहार ने जातिवादी राजनीति का खेल खेलने वालों की कब्र खोदी, मगर वाम आतंकियों का मजबूत होना चिंताजनक

आज जिस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं, उस वक्त तक बिहार चुनावी नतीजों का एग्जिट पोल के आधार पर पूर्वानुमान लगा रहे तथाकथित विश्लेषकों के मुँह पर जनमत का झन्नाटेदार तमाचा पड़ चुका है। अगर इतने को आप काफी समझ रहे हैं, तो ये संभवतः गलतफहमी होगी।

एक जाने पहचाने से धारावाहिक ‘भाभीजी घर पर हैं’ की लोकप्रियता का अंदाजा तो होगा ही? उसकी ही तर्ज पर बिहार चुनावों का पूर्वानुमान करने वाला एक ‘भाभीजी मैदान में’ जैसा कार्यक्रम अभी बिहार में चल रहा था। तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों के साथ ही इस धारावाहिक की याद इसलिए आ गई क्योंकि इसमें एक किरदार ऐसा था जो अक्सर पीटने के बाद ‘आई लाइक इट’ करता रहता है।

तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग बिलकुल उसी किरदार की तरह आत्मपीड़न में सुख पाता, मुदित होता रहता है। इसके अलावा क्या कारण हो सकता है कि वो अब बिहार चुनावों को तेजस्वी यादव की विजय बताए? इस चुनाव को राजद और उसके संस्थापक तथा सजायाफ्ता अपराधी लालू यादव की विचारधारा के हारने के रूप में ही देखा जा सकता है।

लालू यादव की राजनीति, सामाजिक न्याय के नाम पर एक वर्ग को अपने साथ लाए और इस प्रक्रिया में बिहार से वाम दलों की राजनीति को साफ कर दिया। उनके दौर तक वाम झुकाव रखने वाले आतंकी संगठन कई जातीय नरसंहारों को अंजाम दिया करते थे। लालू यादव की राजनीति ने अपने जातीय समीकरणों को मजबूत करने के लिए उनका सूपड़ा साफ कर डाला।

गौरतलब है कि बिहार में लालू यादव को जिन समुदायों का समर्थन था, उसका एक बड़ा वर्ग कृषि से जुड़ा था। कृषि योग्य भूमि का अधिपत्य भी काफी हद तक इन समुदायों के नियंत्रण में था। ऐसे में शायद ये बाद हजम करना मुश्किल लगे लेकिन राजनैतिक इतिहास को देखते ही ये बात स्पष्ट हो जाती है। ये मंडल-कमंडल की राजनीति का दौर भी था। जिस मंडल कमीशन को आज आरक्षण में ओबीसी वर्ग को जगह दिलवाने के लिए जाना जाता है, उसके प्रमुख बिहार के सहरसा क्षेत्र के ही थे।

उस क्षेत्र के पाँच सबसे बड़े जमींदारों का भी नाम लें तो एक नाम बीपी मंडल के परिवार का भी आता है। आज के दौर के हिसाब से देखें तो बिहार में लालू और उनके तथाकथित सामाजिक न्याय का नतीजा ये है कि सरकारी नौकरियों से लेकर विधानसभा में प्रतिनित्धित्व के आरक्षण तक में आपको ओबीसी समुदाय के लोगों की गिनती अनुसूचित जाति-जनजातियों से कहीं अधिक नजर आ जाएगी।

वाम दलों ने जिन क्षेत्रों में, राजद की मदद से बढ़त दर्ज की है, वहाँ राजद का परंपरागत मतदाता अपनी राजनैतिक जमीन खो बैठा है। राजद की राजनीति के इस नुकसान में भाजपा का योगदान भी कम नहीं रहा। निजी बातचीत में अधिकांश बिहारी मतदाता ये स्वीकार लेंगे कि लोजपा और चिराग की मदद से ऐसे लोगों का जीतना सुनिश्चित किया गया।

लालू के दोनों पुत्रों की जीत का अंतर और उसी क्षेत्र में लोजपा को मिले मतों की गिनती देखते ही ये और स्पष्ट हो जाता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल ये भी है कि क्या नीतीश के ‘एंटी-इनकमबेंसी’ मतों को मोड़ने और नीतीश को दबाकर भाजपा उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा ने ही रामविलास के चिराग का रणनैतिक प्रयोग किया था?

तेजस्वी यादव और राजद की राजनीति की इस रणनैतिक हार में जो दूसरे मुद्दे अहम् भूमिका निभा रहे थे, उन्हें देखने से भी तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों ने साफ़ इनकार कर दिया था। राजद और उसके समर्थक कॉन्ग्रेस की सीटों के घटने और उसका सीधा फायदा भाजपा और उसके समर्थकों को होने की एक बड़ी वजह तेजस्वी की रैलियों की आक्रामक भीड़ थी।

बिहार की 47% के आसपास की आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है। इसमें जो युवा मतदाता थे, उन्हें कथित रूप से ‘जंगलराज’ कहलाने वाले दौर का कोई अंदाजा नहीं था। उन्होंने अराजकता का वो दौर देखा ही नहीं था। किस्मत से ये रैलियाँ आयोजित करने वाले वही लोग थे, जो ‘जंगलराज’ में सत्ता सुख भोग रहे थे।

इन रैलियों में वही लक्षण दिखे जो ‘जंगलराज’ में दिखते थे। युवाओं, विशेषकर लड़कियों को रैलियों के दिन घर से निकलने से रोका गया होगा और उन्हें परिवार का ‘भय’ महसूस हो गया होगा। सोशल मीडिया के दौर में फटाफट शेयर हो रहे वीडियो ने भी रैली का आतंक और जंगलराज की बानगी दिखा दी थी। जो थोड़ी सी कसर रहती थी वो तेजस्वी के ‘बाबू साहब’ वाले बयान ने पूरी कर दी।

भले ही भाजपा और जदयू उस बयान को सबको दिखाने में नाकाम रहे हों, लेकिन तथाकथित सेक्युलर लोगों को भी उसका प्रभाव याद आ गया। आखिर अस्सी-नब्बे के दशक में जो लोगों को अपने उपनाम छुपाने पड़े थे, वो किसे याद नहीं? एक कथित सेक्युलर चैनल के ईनामी पत्रकार भी तो अपना नाम ‘कुमार’ तक ही बताते हैं, पूरा नाम नहीं बताते ना? क्यों छुपाना पड़ा था, ये याद तो आता है!

राजनीति को एक दो साल का मामला समझने के बदले दशकों चलने वाली लंबी लड़ाई के तौर पर, या कहिए कि ठीक तरह से देखने वाले अब ये अच्छी तरह समझ रहे हैं कि इस चुनाव ने बिहार से जातिवादी राजनीति का खेल खेलने वाली राजद की कब्र खोद दी है। पक्षकारिता और एजेंडा चलाने वाले इसे स्वीकार करते इसलिए हिचकिचाते हैं क्योंकि ये उनके पक्ष की विजय है।

वाम और उसके आतंकी धड़े का मजबूत होना ऐसे कई पक्षकारों के निजी रुझान के अनुरूप ही है। वाम की सेनाएँ कितने पास तक आ गई हैं, ये राजद और लालू जैसे वाम के पुराने शत्रुओं को जितनी देर से पता चले ये उनके लिए उतना अच्छा ही होगा। जब एक दक्षिणी हाथ पर ध्यान हो तभी तो जादूगर वाम से अपना कमाल दिखा पायेगा! बाकी, तथाकथित बुद्धिजीवी विश्लेषकों को भी चुनावी नतीजों की बधाई देनी ही चाहिए, आखिर धुँध की आड़ में उन्हें अपनी फौजों को चार कदम आगे आने का मौका तो मिला ही है।

मुंबई इंडियंस की जीत का वो सिपाही, जो 3 साल से लगातार बना रहा 400+ रन, फिर भी टीम इंडिया में नहीं मिली जगह

मंगलवार (नवंबर 10, 2020) को दुबई में IPL के 13वें संस्करण का फाइनल मैच हुआ और मुंबई इंडियंस (Mumbai Indians) ने बड़ी जीत दर्ज की। मुकेश अम्बानी के स्वामित्व वाली टीम ने रोहित शर्मा की कप्तानी में 5वीं IPL ट्रॉफी जीती। इस तरह से 2013 से हुए IPL के 8 संस्करणों में से 5 में खिताब मुंबई इंडियंस (Mumbai Indians) के नाम गया। इस टीम के पास दो चैंपियंस लीग की ट्रॉफियाँ भी हैं। कुल मिलाकर इसके पास 7 बड़े खिताब हैं।

अगर बल्लेबाजी की बात करें तो मुंबई इंडियंस (Mumbai Indians) की बैटिंग क्रम की सफलता के दो सबसे बड़े सूत्र भारत के दो युवा बल्लेबाज रहे। वो हैं ईशान किशन और सूर्यकुमार यादव। जहाँ ईशान किशन छक्के मारने में महारत रखते हैं, सूर्यकुमार यादव अपनी निरंतरता के लिए जाने जाते हैं, दर्शनीय शॉट्स खेलने के लिए जाने जाते हैं। दोनों युवा बल्लेबाजों ने अभी तक टीम इंडिया का मुँह नहीं देखा है, उन्हें शॉर्टर फॉर्मैट्स में भी नहीं चुना गया है।

IPL-13 में सूर्यकुमार यादव के सम्बंधित दो ऐसे मोमेंट्स आए, जब क्रिकेट के फैंस को उनकी जबरदस्त उपस्थिति का एहसास हुआ। अबुधाबी में अक्टूबर 28, 2020 को मुंबई इंडियंस और रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) का मैच चल रहा था। RCB ने पहले बैटिंग करते हुए 164 रनों का सम्मानजनक स्कोर खड़ा किया। उस मैच में चेज करते समय एक छोड़ से मुंबई इंडियंस के विकेट्स गिर रहे थे, लेकिन ‘सूर्य’ की चमक बढ़ती जा रही थी।

मात्र 43 बॉल पर नाबाद 79 रन बना कर चौकों-छक्कों की बरसात करने सूर्यकुमार यादव के लिए एक मौका ऐसा भी आया, जब भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली (जो RCB के भी कप्तान हैं) से उनका आमना-सामना हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को कुछ देर तक देखा और फिर खेल में लग गए। लेकिन, वो तस्वीर काफी चर्चित हुई और इसीलिए भी, क्योंकि उससे 2 दिन पहले ही ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए टीम का ऐलान हुआ था और सूर्य उसमें नहीं थे।

इस मैच को जिताने के बाद सूर्यकुमार यादव ने ‘मैं हूँ ना’ (फिल्म नहीं) वाला एक्सप्रेशन दिया और टीम के प्रबंधन और फैंस को एक तरह से आश्वस्त किया कि जब तक वो मैदान के बीच में मौजूद हैं, उन्हें टेंशन लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। ये तस्वीर और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर खुल कर घूमा। इसके बाद ‘दिल जीतने वाला’ अगले मोमेंट फाइनल मैच में आया, जब उन्होंने रोहित शर्मा के लिए अपना विकेट ‘सैक्रिफाइस’ कर दिया।

रोहित शर्मा अपना अर्धशतक पूरा करने वाले थे और ऐसे में सूर्यकुमार यादव को लगा कि वो सेट बल्लेबाज हैं और और उन्हें आउट नहीं होना चाहिए। सूर्यकुमार यादव भी वहाँ से जिताने की क्षमता रखते थे और अच्छा खेल रहे थे, लेकिन जब रन आउट का मौका था और रोहित शर्मा आगे निकल आए थे, तब सूर्य ने अपने एन्ड से विकेट दे दिया। इसके बाद उनके इस ‘सैक्रिफाइस’ की चारों तरफ चर्चा हुई।

इस खिलाड़ी की खासियत ये है कि इसने सिर्फ इस साल ही परफॉर्म नहीं किया है बल्कि पिछले 3 सालों से लगातार ऐसा ही तूफानी खेल का मुशायरा कर रहा है। 2018, 19 और 20 – लगातार 3 साल इन्होंने IPL में 400 रनों का आँकड़ा पार किया है। इससे पहले वो ऊपरी क्रम में नहीं उतरते थे लेकिन तब भी उनका प्रदर्शन जानदार हुआ करता था। वो अक्सर नाबाद रहते थे। लेकिन, 30 वर्षीय ‘SKY’ को टीम में जगह नहीं मिली।

यहाँ तक कि कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान रहे गौतम गंभीर भी कह चुके हैं कि KKR के लिए अगर पिछले 13 सालों में कुछ सबसे बड़ा लॉस हुआ है तो वो है सूर्यकुमार यादव का जाना। रणजी ट्रॉफी में भी मुंबई की तरफ से उनका प्रदर्शन शानदार रहा है और वो टीम का नियमित हिस्सा रहे हैं। टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री ने तो उन्हें धैर्य रखने को कहा है लेकिन देखना ये है कि उम्र के किस दहलीज पर उन्हें भारत के लिए खेलना का मौका मिलता है।

एक और युवा नाम है जो बिहार से आता है और इस साल IPL में सबसे ज्यादा छक्के लगाने वाला बैट्समैन भी है। वो विकेटकीपर भी है, लेकिन उसके ऊपर ऋषभ पंत को तरजीह दी जाती है, जो अब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कुछ खास नहीं कर सके हैं और निरंतरता की कमी से जूझ रहे हैं। ईशान किशन धोनी के जाने के बाद के दौर में विकेटकीपर के रूप में टीम इंडिया में सेवा देने की क्षमता रखते हैं।

ईशान किशन अंडर-19 टीम की कप्तानी भी कर चुके हैं, ऐसे में उनके पास अनुभव की भी कमी नहीं है। ईशान किशन ने इस IPL की एक इनिंग में भी 90 रनों से अधिक की जुझारू पारी खेली और कई अन्य मैचेज में भी अपनी इनिंग से समझदारी से स्कोरबोर्ड को चलाया। इस साल उन्होंने यूएई में हुए IPL में 30 छक्के लगाए। जहाँ बॉलर्स का बोलबाला रहा, वहाँ इस तरह से बल्लेबाजी ज़रूर उन्हें खास बनाती है।