भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने उत्तर प्रदेश में जनसंख्या के आधार पर कब्रिस्तान और शमशान की संख्या तय करने का मुद्दा उठाया है। उन्नाव से लगातार दूसरी बार सांसद बने साक्षी महाराज ने पूछा कि जिस गाँव में समुदाय विशेष का एक भी आदमी नहीं है, आखिर वहाँ कब्रिस्तान क्यों है? वो भाजपा प्रत्याक्षी श्रीकांत कटियार के लिए वोट माँगने उतरे थे। उन्होंने विपक्षी पार्टियों के लिए ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा निचोड़े’ वाली कहावत का इस्तेमाल किया।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के फायरब्रांड नेता साक्षी महाराज ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पिछले 6 सालों में जितना विकास हुआ है, उतना 70 वर्षों में भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने सारे विकास के मुद्दे अपने हाथ में ले लिए हैं और उनके पास अनर्गल प्रलाप के बजाए और कुछ बच ही नहीं गया है। भाजपा सांसद ने कहा कि अगर किसी गाँव में कब्रिस्तान है तो वहाँ शमशान भी होना ही चाहिए।
साक्षी महाराज ने याद दिलाया कि शमसान और कब्रिस्तान के इस मुद्दे को प्रधानमंत्री नरेंद्र यदि और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी उठाया था। साथ ही कहा कि अब इस मुद्दे का पटाक्षेप होना आवश्यक हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी गाँव में हिन्दुओं और दूसरे मजहब वालों की कितनी जनसंख्या है, इस आधार पर तय होना चाहिए कि वहाँ शमशान और कब्रिस्तान हो। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि अगर कहीं कब्रिस्तान नहीं है, तो होना चाहिए।
साक्षी महाराज ने दोनों समुदायों की बात करते हुए कहा कि शमशान और कब्रिस्तान, दोनों ही होने चाहिए। विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए उन्नाव के सांसद ने कहा कि अब पूरा देश ही भाजपामय हो गया है, वोट तो पूरा भाजपा का ही है। उन्होंने कहा कि विपक्ष इसीलिए परेशान है क्योंकि आप कहीं भी किसी भी गली-मोहल्ले में चले जाओ, वहाँ मोदी-मोदी और योगी-योगी ही होता रहता है।
उन्होंने कहा कि वोट के लिए वो क्या करेंगे, वो तो पहले से ही भाजपा का है। साथ ही दावा किया कि भाजपा के पास वोट ही कोई कमी है ही नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि गाँव में अगर मजहब विशेष का एक भी आदमी होता है तो उनके लिए कब्रिस्तान बहुत बड़ा होता है और वहीं हिंदू को खेत की मेड़ या गंगा के किनारे दाह संस्कार करने के लिए विवश होना पड़ता है। उन्होंने पूछा कि जहाँ समुदाय का एक भी आदमी नहीं है, वहाँ कब्रिस्तान की क्या ज़रूरत?
पाकिस्तान के पेशावर में स्थित एक मदरसे में मंगलवार (अक्टूबर 27, 2020) को हुए बम विस्फोट में 7 की मौत हो गई और 72 के घायल होने की सूचना है। पेशावर के दीर कॉलोनी में हुए इस बम विस्फोट में मृतकों व घायलों में अधिकतर बच्चे हैं। इस बम विस्फोट के लिए 5 किलो IED का प्रयोग किया गया था। पूरे क्षेत्र को घेर लिया गया है कि पुलिस तलाशी अभियान चला रही है। घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
जब ये धमाका हुआ, तब मदरसे में कुरान की कक्षा चल रही थी। किसी ने विस्फोटक को ले जाकर मदरसे के भीतर रख दिया था। घायलों में शिक्षक भी हैं। लेडी रीडिंग हॉस्पिटल में सभी मृतकों और घायलों को लाया गया है। वहाँ इमरजेंसी बेसिस पर घायलों का इलाज चल रहा है। पिछले ही सप्ताह बलूचिस्तान की सरकार ने क्वेटा में विपक्षी पार्टियों की शक्ति प्रदर्शन रैली के बीच बम विस्फोट की साजिश की सूचना के कारण अलर्ट जारी किया था।
पिछले ही महीने खैबर पख्तूनख्वा नौशेरा स्थित अकबरपुरा में भी बम धमाका हुआ था, जहाँ 5 लोगों की मौत हुई थी और 2 घायल हुए थे। वहीं पेशावर में जब बम धमाका हुआ, तब वहाँ 40-50 बच्चे मौजूद थे। सुबह के 8 बजे ही एक अज्ञात ने मदरसे में जाकर विस्फोटक रख दिया था। पेशावर के मदरसे में हुए बम विस्फोट के घायलों में अधिकतर के शरीर के कई हिस्से जल चुके हैं। 72 घायलों में से 50 बच्चे ही हैं। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री महमूद खान ने इस घटना की निंदा की है।
#Peshawar Explosion: First visuals indicate blast took place inside the Madrassa. 19 children injured. 15 taken to Lady Reading Hospital. pic.twitter.com/hFwqbLfQe2
उन्होंने पुलिस को इस घटना की त्वरित जाँच का आदेश देते हुए कहा कि दोषी कानून की पहुँच से निकल कर भाग नहीं पाएँगे। जहाँ बम धमाका हुआ, स्पीन जमात मस्जिद है, जो मदरसे के रूप में भी काम करता है। मस्जिद में जहाँ नमाज पढ़ी जाती थी, उस जगह को खासा नुकसान पहुँचा है। प्रांतीय सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अभी उनका सारा फोकस घायलों को उचित इलाज दिलाने की ओर है।
इधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को कट्टर बताते हुए उन पर इस्लाम पर हमला करने का आरोप लगाया है। उन्होंने पैंगबर के चित्र पर जारी विवाद के मद्देनजर कहा कि मैक्रों ने इस्लाम की जानकारी न होने के बावजूद मुस्लिमों पर हमला किया व इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दिया। पाक पीएम ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि यह समय संयम से काम लेने का था।
कुछ हफ्ते पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘बाबा का ढाबा’ की वीडियो ने देश के कोने-कोने में बुजुर्ग दंपत्ति कांता प्रसाद और बादामी देवी को मशहूर कर दिया था। स्वाद ऑफिशियल नाम के यूट्यूब चैनल को चलाने वाले गौरव वासन ने यह वीडियो अपने चैनल पर अपलोड की थी।
इसके बाद कई नामी हस्तियाँ ‘बाबा का ढाबा’ की मदद के लिए आगे आईं और अगले ही दिन से बाबा की मुस्कुराती वीडियोज सोशल मीडिया पर नजर आने लगीं। आम जनता से लेकर स्विगी और जोमटो जैसी कंपनियों ने भी दंपत्ति की मदद की थी। बुजुर्ग दंपत्ति का जीवन सुधारने के लिए व्यापक स्तर पर डोनेशन दी गई थी।
किसी ने कैश डोनेट किया था किसी ने ऑनलाइन डोनेट किया था। यूट्यूबर गौरव ने जानकारी भी दी थी कि उनके पास 2 लाख के आसपास पैसे इकट्ठा हो गए हैं, इसलिए अब दंपत्ति के लिए डोनेशन देनी बंद कर दी जाए। आगे किसी जरूरतमंद को जरूरत होगी तो वह फिर बताएँगे।
लक्ष्य चौधरी ने लगाया गौरव वासन पर फंड गबन करने का आरोप
अब इसी दंपत्ति की वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने वाले गौरव वासन पर कुछ गंभीर लगे हैं। यह आरोप लगाए हैं एक अन्य यूट्यूबर लक्ष्य चौधरी ने। लक्ष्य का इल्जाम है कि जो पैसे बुजुर्ग दंपत्ति के लिए माँगे गए वह उन तक नहीं पहुँचे।
ऑनलाइन स्कैमिंग पर बनाई गई वीडियो में लक्ष्य चौधरी ने समझाया कि कैसे लोग इसी तरह की इमोशनल वीडियो बना कर पैसे ऐंठते हैं। इसके बाद उन्होंने गौरव वासन को लेकर कहा कि उसने बाबा का ढाबा के लिए डोनेशन माँगा लेकिन उन लोगों के साथ पैसे नहीं शेयर किए।
एक इंटरव्यू में कांता प्रसाद ने यह भी स्वीकारा कि उन्हें अभी तक गौरव से कोई रुपए नहीं मिले हैं। इस पर चौधरी ने गौरव पर फंड गबन करने के आरोप लगाए और कहा कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी कांता प्रसाद को मदद नहीं पहुँचाई गई है। यूट्यूबर लक्ष्य ने कहा कि गौरव ने कांता प्रसाद की मदद के लिए अपना कॉन्टैक्ट दिया और कांता प्रसाद के बैंक डिटेल्स की जगह अपनी ही अकॉउंट डिटेल्स शेयर की।
चौधरी का कहना है कि ऑनलाइन स्कैमिंग पर संदेह तब और भी ज्यादा उत्पन्न हो जाता है जबसे गौरव ने दावा किया है कि उसे डोनेशन में 2.25 लाख रुपए मिले। वह दिखाते हैं कि वीडियो वायरल होने से पहले गौरव का दावा था कि उस ढाबा के लिए 1.75 लाख रुपए मिले, तो आखिर वीडियो वायरल होने के बाद, कई हस्तियों द्वारा उसे शेयर करने के बाद, सिर्फ़ 40,000-50,0000 की बढ़ौतरी इस बात का सबूत है कि इन सबमे कुछ गड़बड़ है।
बाबा का ढाबा के मालिक कांता प्रसाद ने किसी भी तरह की आर्थिक मदद के लिए नकारा
दरअसल, कांता प्रसाद ने एक वीडियो में कहा, “मुझे कोई डोनेशन ऑनलाइन नहीं मिली। पैसों की मदद मुझे सिर्फ़ कैश के रूप में मिली है। मुझे अमिताभ बच्चन तक से डोनेशन मिली है। लेकिन इसके अलावा मुझे कोई ऑनलाइन डोनेशन नहीं मिली।”
आगे वह कहते हैं, “मुझे गौरव ने कहा था कि मैं किसी से अपनी बैंक की जानकारी न साझा करूँ। जब वीडियो वायरल हुई तो मैंने अपना मोबाइल सुशांत को दिया। गौरव ने हमें कोई पैसे नहीं दिए, चाहे कैश हो या ऑनलाइन। जो भी उसने इकट्ठा किया, वह उसी के पास है। मेरा बैंक अकॉउंट बंद हो गया है।”
चौधरी ने अपनी वीडियो में यह भी कहा है कि गौरव ने जिस बैंक खातों की डिटेल देकर बाबा का ढाबा के नाम पर पैसे माँगे, वह उसकी पासबुक विवरण सहित एक वीडियो अपलोड करें और इस पर सफाई दें। हालाँकि, रूपए गबन करने के आरोपों के वायरल होने के बाद गौरव वासन ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कल सोमवार (अक्टूबर 26, 2020) देर शाम एक छोटा सा वीडियो शेयर करते हुए बताया है कि रूपए बाबा के ढाबा के मालिक को पहुँचा दिए गए हैं। लोगों ने शिकायत की है कि उसे यह काम विवाद बढ़ने से पहले ही कर देना चाहिए था। लोगों का कहना है कि गौरव ने उसी समय ये रूपए कांता प्रसाद को क्यों नहीं दिए?
हरियाणा के फरीदाबाद स्थित बल्लभगढ़ थाना क्षेत्र में एक छात्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। मृतका निकिता ने एक माह पहले ही आरोपित तौसीफ (Tauseef) के खिलाफ छेड़खानी और उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की थी। मेवात के रहने वाले तौसीफ (Tauseef) नाम के युवक पर आरोप लगा है कि उसने छात्रा निकिता तोमर (Nikita Tomar) की हत्या की। आरोपित अपने दोस्तों के साथ कार में सवार होकर छात्रा के अपहरण के इरादे से आया था।
नोट – कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में आरोपित तौसीफ (Tauseef) को ही तौफीक (Taufiq)भी बताया जा रहा है
आरोपित तौसीफ (Tauseef) ने निकिता को गाड़ी में खींचने की कोशिश की लेकिन जब वो असफल रहा तो उसने गोली मार दी। यह पूरी घटना CCTV में भी कैद हो गई। मृतका निकिता बीकॉम फाइनल ईयर की छात्रा थी और अग्रवाल कॉलेज में एग्जाम देने आई थी।
छात्रा निकिता तोमर के पिता और उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी मूलचंद तोमर फरीदाबाद के सेक्टर-23 स्थित एक सोसाइटी में रहते हैं। उन्होंने बताया कि तौसीफ 12वीं क्लास तक निकिता के साथ ही पढ़ता था। उसने कई बार दोस्ती के लिए दबाव भी बनाया था और वो उसका धर्मांतरण भी करना चाहता था। दोस्ती और जबरन निकाह से इनकार किए जाने के कारण तौसीफ ने वर्ष 2018 में एक बार निकिता का अपहरण भी कर लिया था। हालाँकि, तब बदनामी के डर से परिजनों ने किसी तरह समझौता कर लिया था।
NBT की खबर के अनुसार, लड़की के भाई ने बताया कि निकिता सोमवार (अक्टूबर 26, 2020) को परीक्षा देने के ले कॉलेज गई थी। वहाँ परीक्षा सेंटर के बाहर ही माँ और भाई छात्रा का इंतजार कर रहे थे। शाम 4 बजे वो जैसे ही परीक्षा देकर निकली, एक कार वहाँ आकर रुकी। वहाँ तौसीफ ने निकिता को अपनी गाड़ी में खींचने की कोशिश की। लेकिन, जैसे ही उसकी नजर निकिता के भाई पर पड़ी, उसने गोली चला दी।
CCTV footage shows a girl named Nikita Tomar being shot dead by an assailant (Taufeeq) outside her college in Ballabgarh, Faridabad. Shooter and associate flees in car. Police have arrested Taufeeq. pic.twitter.com/idOPIDZfDo
वारदात के बाद छात्रा को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। इस घटना के बाद वहाँ अफरातफरी मच गई। एसीपी सिटी जयवीर राठी व क्राइम ब्रांच ने घटनास्थल का दौरा किया। आसपास की सीसीटीवी फुटेज को खँगाला जा रहा है। बल्लभगढ़ के डीसीपी के मुताबिक, आरोपित तौसीफ को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। तौसीफ मेवात का रहने वाला है।
निकिता पढ़ने में काफी अच्छी थी और बीकॉम में प्रत्येक वर्ष में टॉपर रही थी। वो लेफ्टिनेंट बन कर देश की सेवा करना चाहती थी। उसने हाल ही में एयरफोर्स की परीक्षा भी दी थी। साथ ही एनडीए के लिए भी लगातार तैयारी कर रही थी। उसे 12वीं में भी 95% अंक आए थे। भाई ने बताया कि वो बहन को रोज कॉलेज छोड़ने जाते थे। इस बार भी वो टॉप करना चाहती थी। इससे पहले जब तौसीफ ने अपहरण किया था तो उसके परिवार वालों ने पाँव पकड़ के माफ़ी माँगी थी, इसीलिए मामला पुलिस के पास नहीं गया।
हाल ही में मेवात के नगीना थाने के उलेटा गाँव में गत 21 अप्रैल को गाँव की बहुसंख्यक आबादी के कुछ युवकों ने एक दलित परिवार को अपनी दबंगई का निशाना बनाया था। एक मामूली सी बात पर 24 साल के राहुल पर धारदार फरसे से हमला किया गया था और उसके परिवार को जातिसूचक शब्द बोलकर धमकाया गया था कि यदि गाँव में रहना है तो जूती के नीचे रहना होगा। लगातार दो दशकों से ऐसे अत्याचार सहने के बाद दलित परिवार ने पुलिस में मुकदमा दायर करने की ठानी और इंसाफ की गुहार लगाने लगे।
केरल में एक दलित महिला अपनी दो बेटियों की हत्या के मामले में न्याय के लिए भटक रही है और उसने फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। ये 3 साल पहले की घटना है, जब दोनों नाबालिग बहनों की वालयार में संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या कर दी गई थी। हत्या से पहले उन दोनों का यौन शोषण भी किया गया था। सोमवार (अक्टूबर 26, 2020) को उनकी माँ ने न्याय के लिए फिर से आंदोलन शुरू किया है।
महिला का दावा है कि पुलिस ने उनकी बेटियों की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने के लिए मामले में छेड़खानी की। पिछले साल बरी किए गए आरोपितों में से चार को CPI(M) पार्टी का कार्यकर्ता बताया गया है।
न्याय की माँग कर रही माँ ने कहा कि मामले में छ आरोपित हैं लेकिन केवल पाँच को ही कानून के सामने लाया गया और छठे व्यक्ति को छूट दी गई थी, जो कि एक रहस्य ही बना हुआ है। मृतक लड़कियों के सौतेले पिता ने कहा कि जाँच अधिकारी ने उन्हें हत्या की जिम्मेदारी लेने के लिए भी मजबूर किया और मामले में उनकी रक्षा करने का आश्वासन दिया। लेकिन उन्होंने अधिकारी की माँग से इनकार कर दिया और इससे पता चलता है कि पुलिस दोषियों को बचा रही थी।
नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्नीथाला और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने पलक्कड़ जिले में धरनास्थल पर जाकर प्रदर्शनकारी महिला व अन्य परिजनों से मुलाकात की। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि ये उत्तर प्रदेश में हुई हाथरस की घटना से भी बदतर है। उन्होंने कहा कि जो लोग हाथरस मामले पर घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं, वही अपने ही घर में दो दलित नाबालिग लड़कियों की हत्या पर चुप हैं। उन्होंने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि महिला को फिर से आंदोलन करना पड़ रहा है।
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की खबर के अनुसार, वायलार में 52 दिनों के भीतर 12 साल और 8 साल की दोनों बहनों की लाशें लटकी हुई मिली थीं। ये 2017 की घटना है। लड़कियों के अभिभावक बाहर काम से गए थे, तभी उनकी मौत हुई। उसके बाद से इस मामले में कई तरह की बातें सामने आती रही हैं। पिछले ही महीने केरल में पिनाराई विजयन की सरकार ने हाईकोर्ट के सामने स्वीकार किया था कि इस मामले की सही तरीके से जाँच नहीं की गई और वो फिर से जाँच कराने को राजी है।
पीड़ित महिला ने हाईकोर्ट से अपील की थी कि उसकी निगरानी में किसी केंद्रीय एजेंसी से जाँच कराई जाए। मृतक लड़कियों के सौतेले पिता ने बताया कि उन पर हत्या की जिम्मेदारी लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा था और उनके मन में भी आत्महत्या के विचार आ रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस इस मामले में असली दोषियों को बचाना चाहती है, इसीलिए ‘बलि के बकरों’ की खोज की जा रही है।
उन्होंने कहा कि उन पर कई बार पुलिस की तरफ से दबाव बनाया गया, लेकिन जब उन्होंने आत्महत्या की धमकी दी – तब जाकर पुलिस पीछे हटी। केरल के क़ानून मंत्री एके बालन का कहना है कि राज्य सरकार इस मामले में ज्यादा कुछ नहीं कर सकती है क्योंकि मामला अदालत में है। सत्ताधारी सीपीआई (मार्क्ससिस्ट) का कहना है कि वो पीड़ित परिजनों के समर्थन में है लेकिन विपक्षी पार्टियाँ इस मामले को लेकर राजनीति कर रही है।
ऑटोप्सी रिपोर्ट से पता चला था कि हत्या से पहले केरल के वायलार की दोनों दलित नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण हुआ था। जनवरी 13, 2017 को बड़ी बहन की मौत हुई थी और इसके 52 दिन बाद दूसरी बहन की। महिला का आरोप है कि बड़ी बेटी की मौत के बाद उसने कुछ आरोपितों के नाम पुलिस को बताए थे लेकिन प्रशासन के कार्रवाई में विफल रहने के कारण दूसरी बेटी की भी जान चली गई। परिजनों का आरोप है कि इन हत्याओं को आत्महत्या साबित करने का प्रयास हुआ।
#Kerala‘s Leader of Opposition and Congress MP @chennithala on Monday demanded justice for a grieving mother whose two daughters were sexually abused and were later found hanging at their home at Walayar in Palakkad district. pic.twitter.com/1VsNYGwyMu
महिला ने कहा कि वो विरोध प्रदर्शन और अनशन करते हुए सड़क पर ही जान दे देगी। उसने कहा कि कुछ दिनों पहले हुई मुलाकात में सीएम पिनाराई विजयन ने आश्वासन दिया था कि सीबीआई जाँच कराई जाएगी लेकिन वो पलट गए। महिला ने आरोप लगाया कि इस केस को कमजोर करने वाले अधिकारियों का प्रमोशन हुआ। महिला और उसके पति मजदूर हैं। पिछले साल POCSO अदालत ने चार आरोपितों को बरी करते हुए जाँच टीम पर कड़ी टिप्पणी की थी।
जिस पुलिस अधिकारी ने जाँच टीम की अगुवाई की थी, बाद में उसका प्रमोशन हुआ। आरोपितों के वकील एन राजेश को ‘डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड वेलफेयर कमिटी’ का अध्यक्ष बना दिया गया। कोर्ट ने प्रोसिक्यूटर पर भी टिप्पणी की थी, जिसे बाद में हटा दिया गया। सीपीआई (एम) की आलोचना इसीलिए हो रही है क्योंकि आरोपितों में अधिकतर के इसी पार्टी के कार्यकर्ता होने की बात सामने आई थी। इस मामले में राजनीतिक दबाव के आरोप लगे थे।
अब मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा है कि वो इस मामले में पीड़ित परिजनों को न्याय दिलाने के लिए हर कदम उठाएँगे। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस मामले में कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि आरोपितों को बरी किए जाने के बाद फिर से जाँच शुरू करना संभव नहीं था। साथ ही जानकारी दी कि इस मामले में आई खामियों को विधानसभा में रखा गया है। उन्होंने कहा कि केन्दीय एजेंसियाँ जाँच करेगी तो मामला और बिगड़ जाएगा।
पिछले दिनों अपनी दाढ़ी को लेकर चर्चा में आने वाले बागपत जिले के रमाला थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर इंतसार अली एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार खबरों में होने की वजह उनका निलंबन या बहाली नहीं है बल्कि एक देवबंदी उलेमा का बयान है। इस बयान में उलेमा ने कहा है कि इंतसार अली ने दाढ़ी कटवाकर शरीयत और इस्लाम विरोधी काम किया है। उलेमा ने यह भी कहा कि सुन्नत और इस्लाम को छोड़कर कारोबार चुनना मजहब का अपमान है।
सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद के उलेमा लुत्फुर रहमान ने इस पूरे मामले पर अपना बयान दिया है। उनका कहना है कि दरोगा को दाढ़ी नहीं कटवानी चाहिए थी चाहे तो वह नौकरी छोड़ देते।
मौलाना ने दाढ़ी कटवाने को नाजायज बताया है। साथ ही कहा है कि मुस्लिम अगर दाढ़ी नहीं रखता है तो शरीयत के हिसाब से जुर्म है लेकिन अगर उसने रखकर दाढ़ी कटवा दी है तो यह उससे भी बड़ा गुनाह है।
उनका कहना है कि यदि बात शरीयत और सुन्नत की आती है तो ऐसे मौके पर दाढ़ी नहीं बल्कि नौकरी ही छोड़ देनी चाहिए थी। शरीयत के हिसाब से उन्होंने बहुत बड़ा जुर्म किया है।
“मैं यही कहूँगा कि मु###न का दाढ़ी ना रखना भी जुर्म है और दाढ़ी रखकर कटवा देना और बड़ा जुर्म है। दाढ़ी कटाकर नौकरी या अपने कारोबार को अहमियत देना गलत है। इस्लाम और सुन्नत को तवज्जो ना देकर के किसी कारोबार को करना मैं समझता हूँ बिल्कुल गलत है। दूसरी बात यह है कि ऐसे मौके पर अगर कहीं ऐसी बात आती है तो दाढ़ी नहीं बल्कि नौकरी छोड़ देनी चाहिए।”
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बागपत जिला स्थित रमाला थाने में इंतसार अली बतौर सब इंस्पेक्टर (एसआई) तैनात थे। उन्होंने बिना अनुमति पिछले कुछ समय से लंबी दाढ़ी रखी हुई थी नतीजतन उन्हें पुलिस अधीक्षक ने निलंबित कर दिया था। इसके बाद उन्हें पुलिस लाइन भेज दिया गया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्हें कई बार दाढ़ी रखने के लिए विभाग से अनुमति लेने का आदेश दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने बिना किसी भी तरह की अनुमति लिए पिछले काफी समय से दाढ़ी रखी थी। बाद में जब उन्हें निलंबित किया गया तो अगले ही दिन वह दाढी कटवाकर वापस काम पर आ गए। यह देख एसपी अभिषेक सिंह ने भी उनका निलंबन वापस ले लिया और उनकी थाने में बहाली कर दी।
बिहार में लालू यादव का ‘माई समीकरण (MY)’ बहुचर्चित रहा है, जिसके तहत वो मुस्लिमों और यादवों का गठबंधन बना कर जीत का चक्रव्यूह रचा करते थे। दोनों ही समुदाय बिहार की आबादी में सबसे बड़े समुदाय हैं। जहाँ हिन्दुओं में सबसे बड़ी जनसंख्या यादवों की है, वहीं अल्पसंख्यकों में मुस्लिमों की जनसंख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन, इन सबके बावजूद उन्होंने भागलपुर दंगा मामले में कामेश्वर यादव को कैसे बचाया, इसकी चर्चा ज़रूरी है।
‘आप दंगा फैलाने वाली यात्रा रोक दीजिए। अगर आप ये यात्रा करेंगे तो हम आपको छोड़ेंगे नहीं क्योंकि बड़ी मुश्किल से हमने भाईचारा कायम किया है बिहार में।‘ – राम रथयात्रा से पहले लालू यादव ने दिल्ली में में लालकृष्ण आडवाणी से मिल कर ये बातें कही थीं। खैर, यात्रा हुई और कहीं मुलायम सारा लाइमलाइट न लूट ले जाएँ, इसीलिए लालू यादव ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। लालू यादव ने भागलपुर दंगा से उबरे समाज में खुद को शांति का मसीहा कह कर प्रचारित किया।
1989 में भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दंगे उस समय स्वतंत्र भारत में सबसे बड़े दंगे थे क्योंकि इसमें 1000 से भी अधिक लोगों की मौत हो गई थी। उसी साल अक्टूबर 24 को रामशिला यात्रा जा रही थी, जिसे मुस्लिमों ने अपने मोहल्ले से गुजरने से मना कर दिया था। डीएम दोनों समुदायों को समझाने-बुझाने में लगे हुए थे, तभी हिन्दू काफिले पर मुस्लिमों की तरफ से हमला कर दिया गया। इस वारदात ने दंगे में ‘आग में घी’ का काम किया।
कहते हैं, इस दंगे के बाद बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव आया था। कॉन्ग्रेस तब असमंजस की स्थिति में जी रही थी क्योंकि शाहबानों प्रकरण में उसकी जम कर किरकिरी हुई थी। तब उसे सवर्णों के साथ-साथ समुदाय विशेष के भी वोट्स मिला करते थे। तब जनता दल में रहे लालू यादव ने मुस्लिमों के लिए जम कर सहानुभूति जताई। उन्होंने उनकी लड़ाई लड़ने की बातें की। लेकिन, उनका मुख्य मकसद यादव वोट बैंक को साधना था।
कामेश्वर यादव के अलावा कई ऐसे आरोप थे, जो यादव थे। ऐसे में अगर उनके खिलाफ लालू यादव की सरकार कोई भी कार्रवाई करती तो उनका यादव वोट बैंक चला जाता, इसीलिए इसके कुछ ही महीनों बाद मुख्यमंत्री बनने वाले लालू यादव ने भी आरोपितों पर कोई कार्रवाई नहीं होने दी। जस्टिस आरएन प्रसाद की जाँच रिपोर्ट लालू के लिए वरदान बन कर सामने आई। उसमें पुलिस को क्लीन-चिट देते हुए मुस्लिमों को ही किसी न किसी रूप में दोषी बताया गया था।
लालू यादव ने मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए बाद में लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवाया। साथ ही, राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा का विरोध कर के भी इस वोट बैंक को साधा। उन्हें जम कर भाजपा का डर दिखाया। इससे वो मुस्लिमों के मसीहा भी बने रहे और यादवों का वोट भी उन्हें मिलता रहा। भागलपुर दंगा मामले में आरोपितों पर कार्रवाई भी नहीं की और वो मुस्लिमों के रहनुमा भी बने रहे, आज भी ये वोट बैंक उनका ही माना जाता है।
विडंबना देखिए कि जब 2015 में नीतीश कुमार ने जस्टिस एनएन सिंह की जाँच समिति की रिपोर्ट विधानसभा में रखी, तो इसमें तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को दोषी माना गया, जिसके मुखिया सत्येन्द्र नारायण सिंह हुआ करते थे। और जब ये रिपोर्ट आई, जब नीतीश कुमार के साथ कॉन्ग्रेस बिहार में सत्ता कि मलाई चाभ रही थी। वो राजद भी उनके साथ थी, जिसने दोनों तरफ से वोट लूटे थे लेकिन साथ अंत में अपनी जाति का दिया।
वहीं, जब राजग सरकार आई तो इस मामले में जाँच हुई और कार्रवाई हुई। ये इसीलिए संभव हो सका, क्योंकि उस सरकार ने जात-पात देखे बिना ही कार्रवाई की। उसने सरनेम नहीं देखा। भले ही बाद में नीतीश कुमार के कई यू-टर्न्स के कारण ये मुद्दा फिर उलझ गया, लेकिन राजग सरकार ने लालू यादव ने ब्लन्डरों को सही करने का प्रयास किया। फिर भी भाजपा पर ही सांप्रदायिक होने के आरोप लगाए जाते हैं।
एक समय जिस कामेश्वर यादव की सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए तारीफ हुई थी, उसे ही भागलपुर दंगों का मुख्य आरोपित बनाया गया था। इस मामले में कुल 27 मुकदमे दायर किए गए थे। इस दंगे के बाद भाजपा को भी लोगों ने एक विकल्प में देखना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें इस्लामी कट्टरवाद से डर लगने लगा था। नीतीश कुमार और भाजपा 2005 में सत्ता में आए, जिसके बाद इन दंगों की फ़ाइलें फिर से खोली गई थीं।
Kameshwar Yadav main accused of Bhagalpur riots was not only acquitted from all 5 cases but was also honoured by DGP in RJD ‘s rule.
लेकिन, फरवरी 2006 में गठित की गई टीम की रिपोर्ट 2015 में तब आई, जब बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे और लालू यादव व नीतीश कुमार की पार्टी कॉन्ग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाली थी और दूसरी तरफ भाजपा ने जीतन राम माँझी की ‘हम’ और रामविलास पासवान की लोजपा के साथ गठबंधन किया था। भागलपुर में हुए दंगों में 200 से भी अधिक गाँव इसके लपेटे में या गए थे। सरकार ने इसकी रिपोर्ट विधानसभा सत्र के ठीक आखिरी दिन पेश किया।
जबकि ये फरवरी 2015 में ही सरकार को सौंप दी गई थी। जाहिर है कि तीनों पार्टियाँ मुस्लिमों के वोट बैंक के लिए चुनाव का इंतजार कर रही थीं और उन्होंने भाजपा के खिलाफ जो डर मुस्लिमों के मन में बिठाया था, उसे इस रिपोर्ट के माध्यम से और मजबूत करने में आसानी हुई। भले ही इसके लिए कॉन्ग्रेस को अपनी ही सरकार को गाली क्यों न देनी पड़े। खैर, उस चुनाव में उन्हें जम कर वोट मिले थे और भाजपा चारों खाने चित हो गई थी।
कामेश्वर यादव को लालू यादव की सरकार के दौरान तो बरी कर दिया गया था लेकिन उन पर फिर से नकेल कसनी शुरू हो गई। कामेश्वर यादव पर असानंनपुर के मोहम्मद कयूम की हत्या कर लाश गायब करने का आरोप कयूम के पिता नसीरुद्दीन ने लगाया था और मामला दर्ज कराया गया था। हिन्दू महासभा से बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके कामेश्वर यादव ने जुलाई 2017 में जेल से निकलते ही भाजपा से टिकट मिलने की उम्मीद जताई थी।
पतबत्ती निवासी कामेश्वर यादव की अच्छी-खासी फैन-फॉलोइंग है और जेल से निकलने के बाद समर्थकों का इतना बड़ा हुजूम उमड़ आया था कि पुलिस ने उन्हें जेल से घर तक पहुँचाया था। पटना उच्च-न्यायालय ने अंततः उन्हें रिहा कर दिया। लेकिन, लालू यादव ने भी उन्हें अपने 15 साल के शासन में बचाने की जम कर कोशिश की। उन्होंने कहा था कि रिहाई के रूप में ईश्वर का वरदान मिला और उन्हें बचपन से ईश्वर पर भरोसा था।
बाद में रंजन यादव और पप्पू यादव जैसों की बगावत के बाद लालू की पकड़ यादव वोट बैंक में कमजोर जरूर पड़ी लेकिन मुस्लिमों के वो एकमात्र मसीहा बने रहे क्योंकि उन्हें बार-बार ये डर दिखाया कि भाजपा या जाएगी तो उनका क्या होगा? हालाँकि, नीतीश-भाजपा के काल में ऐसा कोई दंगा नहीं हुआ। फिर भी, लालू यादव के दोनों बेटे आज उसी MY समीकरण के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जगत भिड़ा रहे हैं।
भागलपुर दंगा मामले में कामेश्वर यादव को बचाने वाले लालू आज जेल में हैं और चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता हैं। कामेश्वर यादव भी रिहा होकर अपने घर में हैं लेकिन भागलपुर आज भी संवेदनशील बना हुआ है, लालू यादव के 15 साल के शासन की बदौलत। वहाँ लोकसभा में पिछले 7 में से 4 चुनावों में भाजपा को जीत मिली है और 1 बार राजद व 1 बार सीपीएम की जीत हुई है। 2019 में ये सीट जदयू ने जीती, तो इस हिसाब से 7 में से 5 बार राजग यहाँ से जीता है।
जहाँ तक भागलपुर विधानसभा क्षेत्र की बात है, ये जनसंघ का पुराना गढ़ रहा है। यहाँ हुए अब तक कुल 15 चुनावों में से 8 बार जनसंघ या भाजपा ने जीत दर्ज की है। हालाँकि, अश्विनी कुमार चौबे के सांसद व केन्द्रीय मंत्री बनने के बाद से ये सीट भाजपा के हाथ से फिसल गई और कॉन्ग्रेस के हाथों में चली गई। मौजूदा विधायक कारोबारी अजीत शर्मा बॉलीवुड अभिनेत्रियों नेहा शर्मा और आयशा शर्मा के पिता हैं। दोनों बहनें चुनावों में अपने पिता का खूब प्रचार करती हैं।
केंद्रीय मंत्री (पर्यावरण, सूचना एवं प्रसारण, भारी उद्योग) प्रकाश जावड़ेकर ने ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में कई मुद्दों पर अपनी बात काफी मुखरता के साथ रखी। हमने उनसे तीनों मंत्रालय के साथ-साथ बिहार-महाराष्ट्र की राजनीति, ‘OTT प्लेटफॉर्म सेल्फ-रेग्युलेशन, फेक न्यूज और रिपब्लिक मीडिया समेत कई मुद्दों पर बातचीत की।
यहाँ पर इंटरव्यू के अंश सवाल-जवाब के रूप में पेश हैं-
सवाल:कुछ जगहों पर सड़कों के लिए रास्ते कटे हुए हैं, लेकिन उन पर पीचिंग नहीं हो पा रही है यानी सामान्य सड़क नहीं बनाया जा रहा है, जो इस तरह की समस्याएँ ‘विकास बनाम जंगल’ की बातें करते हैं, उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब: विकास जब करना होता है, तो फिर चाहे वो पहाड़ों में हो या मैदान में भी हो, कुछ न कुछ तो जो आज जमीन की स्थिति है, उसमें बदलाव होता है। हमें यही देखना है कि वो जमीन का बदलाव जमीन को और बाकी पर्यावरण को ज्यादा नुकसान करने वाला तो नहीं है न। क्योंकि मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में था तो उस समय देश की आबादी 30 करोड़ थी और आज 136 करोड़ है, तो उनको खाने के लिए ज्यादा खेती चाहिए। ज्यादा तकनीक चाहिए, ज्यादा बल चाहिए। उसके लिए ज्यादा नौकरियाँ चाहिए। नौकरी के लिए कल-कारखाने चाहिए। नहीं तो आदमी की तरक्की क्या होगी। इसलिए मोदी सरकार की नीति है कि पर्यावरण भी और विकास भी। दोनों एक दूसरे के विरोध में नहीं है। यह ‘जंगल बनाम विकास’ नहीं बल्कि ‘विकास विद जंगल’ है। और ये हमने पिछले 6 सालों में दिखाया कि विकास भी हुआ और जंगल भी 15000 स्क्वायर किलोमीटर बढ़े। इसीलिए हमारा मानना है कि विकास और पर्यावरण दोनों साथ-साथ है और यही हमारा नारा है।
सवाल:अल्ट्रा-लेफ्ट वाले हमेशा इस मुद्दे को हवा देते हैं कि जंगल आदिवासियों का है और सरकार उसमें अगर हस्तक्षेप करती है तो उसके बाद वो हिंसक हो जाते हैं, हथियार उठा लेते हैं, नक्सली बन जाते हैं।
जवाब: नहीं, ऐसा तो नहीं है। यूपीए शासनकाल में जहाँ पर नक्सलवाद का काफी प्रभाव था, वहाँ भी अब एक तिहाई हो गया है। इसलिए यह सच नहीं है, बल्कि इसके विपरीत अगर विकास होता है तो आदिवासियों का भी विकास होता है। अब आदिवासियों को जमीन के पट्टे मिलने लगे हैं। वहाँ हमने नए-नए औजार शुरू किए। जैसे बाँस के वन निर्माण का अधिकार आदिवासियों को दिया है। बाँस 2-3 साल में बढ़ते हैं, उसके पैसे उनको मिलते हैं। तो ये नया तरीका है। आदिवासी तरक्की के रास्ते में पार्टनर बन गए हैं, वो खिलाफ नहीं हैं।
सवाल: अभी EIA 2020 को लेकर जो नोटिफिकेशन आ रहे हैं, उसको लेकर मीडिया में चलाया जा रहा है कि इस पर काफी विरोध हुआ है। सवाल के साथ-साथ सुझाव भी आए हैं।
जवाब: 15-20 लाख जो भी सुझाव आए हैं, उसमें 90% एक ही भाषा के हैं, तो इसलिए वह एक मुहिम थी। लेकिन हमने हर सुझाव का संज्ञान लिया है। जब फाइनल आएगा तो सबके सामने आ जाएगा। मैं मूल बताना चाहता हूँ कि हमने क्या किया। 2006 के नोटिफिकेशन के बाद 55 बार संशोधन हुआ है और 236 ऑफिस मेमोरेंडम निकले, जिससे बदलाव किए गए। इतना सारा बदलाव अलग-अलग पढ़ने की बजाए एक ही जगह पढ़ें, इसलिए EIA 2020 का नोटिफिकेशन लाया गया है। लोगों को गलतफहमी हुई है कि हमने कुछ लोगों को सार्वजनिक सुनवाई से माफ किया है। जबकि हमने 21 उद्योगों को सार्वजनिक सुनवाई में लाया है, जो पहले नहीं थे।
सवाल:पर्यावरण पर जब बात होती है तो लोग पराली जलाने और कुछ लोग इसमें दिवाली का भी योगदान बता देते हैं।
जवाब: इसमें बहुत सारी चीजों का योगदान है। वाहन-यातायात प्रदूषण का एक कारक है। दूसरा है- कंस्ट्रक्शन डस्ट। ये बहुत बड़ा कारक है। दिल्ली और उत्तरी भारत में जिस तरह से धूल का संकट है, धूल उड़ती है, हिमालय की ठंड होती है, गंगा और बाकी नदियों का मॉइश्चर होता है, वो सब पकड़ लेता है और यहाँ एक विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण हवा नहीं बहती है, तो ये जम जाता है। ये प्रदूषण की समस्या का कारण है। इसमें पराली और उद्योग का भी योगदान होता है। 35 दिन तक पराली जलाने का सिलसिला होता है। वो कम हो, इसके लिए सरकार ने बहुत प्रयास किया है। मुझे और वैज्ञानिकों को भी उम्मीद है कि इस साल थोड़ा कम होगा। जिस दिन किसान के खेत काटने का खर्चा निकलने वाला कोई भी इलाज निकलेगा, उस दिन खेती नहीं जलेगी। उस दिशा में हम जा रहे हैं और मुझे लगता है कि हम 3-4 साल में इससे निजात पा लेंगे।
सवाल: पर्यावरण और भारी उद्योग कई बार एक-दूसरे के सामने खड़े दिखते हैं, क्योंकि सबसे ज्यादा भारी उद्योग वालों को ही पर्यावरण से अनुमति लेनी पड़ती है, तो क्या इसके लिए आपके सामने कभी ऊहा-पोह की स्थिति आई?
जवाब: भारी उद्योगों का मुख्य काम इलेक्ट्रिक वाहनों को पुश करना है और इलेक्ट्रिकल वाहनों के लिए 10 हजार बसें देश भर में हो, इसके लिए हमने 10,000 करोड़ का कार्यक्रम बनाया है। ये बहुत महत्वपूर्ण है। बाकी इलेक्ट्रिकल वाहन को भी सब्सिडी देते हैं। वो भी बढ़ें, हम इस दिशा में भी काम करते हैं।
सवाल:डिजिटल मीडियम में फिलहाल आपको किस तरह की चुनौतियाँ दिखती हैं?
जवाब: मेरा मानना है कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है और डिजिटल मीडिया खुद ही इसे सेल्फ रेग्युलेट करे, लेकिन अगर उन्हें मदद चाहिए, तो हम मदद करने के लिए भी तैयार हैं। इसके अच्छे और बुरे दोनों तरह के नतीजे आ रहे हैं। इसलिए हमने OTT प्लेटफॉर्म को कहा है कि वो सेल्फ-रेग्युलेशन की अच्छी व्यवस्था करें। डिजिटल मीडिया से भी कह सकते हैं, क्योंकि कंटेंट ऑर्गेनाइज्ड होता है। लेकिन डिसऑर्गेनाइज्ड कंटेंट पर लगाम कसना थोड़ा मुश्किल है। एक मैकेनिज्म बनाइए, जिसकी विश्वसनीयता हो और किसी को भी इससे शिकायत न हो और उसके कारण सुधार होता रहे और अगर कोई नहीं करता है तो क्या करना है, इसका विकल्प हमेशा सरकार के पास खुले होते हैं।
सवाल:कुछ लोग खुद को ही फैक्ट चेकर कह रहे हैं और फेक न्यूज फैलाते दिख रहे हैं। इस फेक न्यूज की पहचान कैसे की जाए?
जवाब: इसके लिए पीआईबी है। वो बहुत अच्छे से फैक्ट चेक करती है। उसकी प्रतिष्ठा भी हो गई है। आगे इसके लिए और सख्त कदम उठाए जाएँगे। इसकी वजह से अनेक चैनल ने फेक न्यूज दिखाना बंद किया, कई चैनलों को माफी माँगनी पड़ी, अनेक अखबारों को माफी माँगनी पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि अब लोग भी चेक करके ही न्यूज लगाते हैं, बिना सोर्स का न्यूज नहीं लगाते हैं।
सवाल:महाराष्ट्र में जो मीडिया से जुड़ा चाहे टीआरपी स्कैम हो या एक चैनल को परेशान करना, हजार लोगों पर एफआईआर करना अतार्किक है। आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब: टीआरपी स्कैम गलत ही है, अगर हुआ है तो जाँच करके पता चलना चाहिए। कंप्लेन में एक का नाम आता है, चार्ज दूसरे पर लगता है। ये मुंबई पुलिस जो कर रही है, इसे कोई भी पसंद नहीं करेगा। एडिटर्स गिल्ड से लेकर सभी लोगों ने उसका विरोध किया है। एनडीए ने भी विरोध किया है। मुझे लगता है कि इस तरह से पत्रकारों का दमन अपने राजनीतिक हितों के लिए करना गलत है।
सवाल: आपने कम से कम तीन बार विदेशी संस्थाओं को ट्विटर पर तथ्यात्मक रूप से गलत साबित किया है, लेकिन वही चीज मीडिया में नहीं दिखती है कि आपने ऐसा किया है। ऐसा क्यो?
जवाब: मैं देश-विदेश की हर खबरें देखता हूँ। ऐसे में अगर कोई गलत जानकारी या खबर होती है तो हम उन तक पहुँचाते हैं। ये काम पीआईबी करता है। पीआईबी के ऐसे कुछ प्रयासों को मैं ट्विट्स में बदलता हूँ, लेकिन हर ट्विट्स के द्वारा मैं मंत्रालय नहीं चलाता हूँ।
सवाल:बिहार चुनाव और महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पोस्ट-पोल अलायंस को आप एक निजी वोटर के तौर पर कैसे देखते हैं?
जवाब: ये शिवसेना-भाजपा का प्री-पोल अलायंस था। लोगों ने पीएम मोदी के नेतृत्व में शिवसेना के कैंडिडेट को वोट दिए। हम दोनों का प्री-पोल अलायंस था। वो सत्ता में आया। हमें पूर्ण बहुमत मिला। 160 मेंबर बने। लेकिन उसके बाद अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण मुख्यमंत्री की लालसा से शिवसेना बागी हुए।
उन्होंने जनता से द्रोह करके जनता के जनादेश का अपमान करके उनके साथ गए, जिन्हें हमने चुनाव में पराजित किया था। इसमें शिवसेना भी शामिल थे। तो शिवसेना ने जिनको बीजेपी की मदद से हराया, उन्हीं कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ जाकर वो बैठे। शिवसेना ने राजनीतिक रूप से ये बहुत गलत बात की है और जब भी मौका मिलेगा, इसकी सजा महाराष्ट्र की जनता देगी। वो भ्रम मे हैं कि वो जीत गए हैं, वो जीते नहीं हैं, बल्कि हारे हैं।
सवाल:महाराष्ट्र सरकार के विचित्र गठबंधन का भविष्य आपको कैसा नजर आता है?
जवाब: इसका कोई लॉजिकल फ्यूचर नहीं है। भ्रष्टाचार ही एकमात्र मुद्दा है, जिन पर उनकी एकजुटता निर्भर है। इसलिए महाराष्ट्र पीछे जा रहा है और वहाँ पर सरकार नाम की कोई चीज दिखती ही नहीं है।
सवाल:बिहार में भाजपा समर्थक ये सवाल उठा रहे हैं कि वहाँ पर भाजपा अकेले चुनाव क्यों नहीं लड़ती है? क्या इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व में कुछ बातचीत होती है?
जवाब: बातचीत हम हर मुद्दे की करते हैं, लेकिन वहाँ पर हम पहले से गठबंधन में हैं, तो हम ऐसे ही इसे छोड़ नहीं सकते। हमने शिवसेना के साथ भी 30 साल चलाया। बाद में जब पिछली बार असंभव हुआ तो हम अलग लड़े लेकिन फिर सत्ता में गठबंधन करके ही आए। अभी भी हमारा गठबंधन था, जिसे उन्होंने छोड़ दिया। उनकी गलती वो भुगतेंगे, लेकिन बिहार में हमारा पहले से ही गठबंधन है, बीच में जदयू निकल गए थे, लेकिन फिर वापस आए, तो आज हम काफी मजबूती से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के वादे पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। और हमें जनता का आशीर्वाद मिलेगा। पहले चरण के चुनाव के बाद पता चलेगा कि बीजेपी और जदयू कॉम्बिनेशन बहुत आगे निकलेगा। HAM और VIP चार पार्टियों का ये गठबंधन मजबूती से लड़ रहा है और निश्चित रूप से जीतेगा।
सवाल:आप लोजपा पर क्या प्रतिक्रिया देना चाहेंगे?
जवाब: हमारे केंद्र में वो एनडीए का हिस्सा हैं, लेकिन जिस तरह की भूमिका लोजपा ने बिहार में की है, वो वहाँ पर वोटकटुआ पार्टी की तरह काम करेंगे, इसके अलावा वो कुछ नहीं कर सकते। इससे परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
सवाल:आपका एक बयान गलत तरीके से पेश किया गया है कि हमने इतिहास के किताब में कोई बदलाव नहीं किया।
जवाब: इंडियन एक्सप्रेस ने 29-30-31 मई को तीन दिन लगातार बैनर लगाकर इस तरह से स्टोरी किया था कि देखने लायक है। बदलाव करने के अनेक तरीके होते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने ये तीन लेख छापे कि लोग इस पर काफी प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन बदलाव हम हर साल एफलिएशन में करते हैं। वो 1100 शिक्षक के सुझाव पर आधारित हैं। वो इतने सार्थक हैं कि 900 पेज का बदलाव हुआ, लेकिन जरा भी चर्चा नहीं हुई। इसके लिए तो शाबाशी मिलनी चाहिए।
सोमवार (26 अक्टूबर 2020) को पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने फ्रांसीसी दूत मार्क बरेटी (Marc Barety) को समन भेजा है। यह समन दो कारणों से भेजा गया था, पहला चार्ली हेब्दो के कार्टून का सार्वजानिक प्रदर्शन और कट्टरपंथी इस्लाम पर फ्रांस के राष्ट्रपति की टिप्पणी।
शाह महमूद कुरैशी चाहते हैं संयुक्त राष्ट्र का दखल
पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ज़हीद हफीज़ चौधरी द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक़, फ्रांस के एम्बेसेडर को विशेष सचिव (यूरोप) की तरफ से एक फ़ाइल (dossier) दिया गया था और चार्ली हेब्दो मामले में पाकिस्तान की तरफ से असहमति की जानकारी भी दी गई थी। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इस मुद्दे पर कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति का बयान बेहद गैर ज़िम्मेदाराना था और ऐसे बयान से सिर्फ आग को हवा मिलेगी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से निवेदन किया कि वह इस्लाम के विरुद्ध चलाए जा रहे नफ़रत भरे नैरेटिव का संज्ञान लें और आवश्यक कार्रवाई करें।
कुरैशी ने बताया कि वो ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) के समक्ष प्रस्ताव पेश करेंगे कि 15 मार्च को इस्लामोफ़ोबिया के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाए। अंत में उन्होंने कहा, “किसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में लाखों मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करे।”
कुरान के अपमान पर विदेश मंत्रालय की निंदा
रविवार (25 अक्टूबर 2020) को पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने इस्लामोफ़ोबिया को बढ़ावा देने वाले विकसित देशों और कुरान का अपमान करने वालों की निंदा करते हुए बयान जारी किया। बयान में लिखा था, “कुछ राजनेता अपने सतही राजनीतिक फायदों के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में, इस तरह के जघन्य अपराधों को सही ठहराते हुए और आतंकवाद की इस्लाम से तुलना कर रहे हैं, यह बात हमारे लिए चिंता पैदा करती है।” इसके बाद बयान में यह भी कहा गया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ कुछ ज़िम्मेदारी भी होती है, उसका ध्यान रखा जाना चाहिए।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का फ्रांस के राष्ट्रपति पर हमला
UNGA में दिए गए भाषण के वीडियो में सुना जा सकता है किस तरह इमरान खान फ्रांस में हुई घटना की निंदा नहीं करते हैं। इस वीडियो में वह कहते हैं, “पैगंबर हमारे दिलों में हैं, जब कोई उनकी निंदा करता है या उनका अपमान करता है तब दुःख होता है। हम इंसान एक बात अच्छे से समझते हैं कि शारीरिक कष्ट भावनात्मक कष्ट से कहीं ज़्यादा होता है। सिर्फ इसलिए मुस्लिम समुदाय के लोग इस बात पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। पश्चिमी देशों के लोग नहीं समझते हैं कि हमारे जज़्बात पैगंबर से किस तरह जुड़े हैं।” इसके बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने यहूदियों के नरसंहार की तुलना पैगंबर का अपमान किए जाने पर होने वाली पीड़ा से कर दी।
इस्लाम पूरी दुनिया में संकट में हैं
फ्रांस में शिक्षक का गला काटे जाने की घटना के पहले इस्लाम को लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अहम बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि फ्रांस अपनी धर्म निरपेक्षता को ध्यान में रखते हुए कट्टरपंथी इस्लामियों का सामना करेगा। इसके पहले भी इमैनुएल इस्लाम को कट्टरता और नफरत फैलाने वाला मज़हब बता चुके हैं।
विदेशी इमामों के प्रवेश पर प्रतिबंध का फ्रांस पहले ही ऐलान कर चुका है। मैक्रों ने इस साल की शुरुआत में कहा था, “हमने 2020 के बाद अपने देश में किसी भी अन्य देश से इमामों के आने पर रोक लगा दी है।” उन्होंने कहा था कि इस फैसले से फ्रांस में आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगेगी।
मैक्रों ने कहा, “इस्लाम एक ऐसा मज़हब है, जिस पर पूरी दुनिया में संकट है, ऐसा सिर्फ हम अपने देश में नहीं देख रहे हैं।” इसके बाद उन्होंने युवाओं की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया, जिससे उन्हें धर्मनिरपेक्ष आदर्शों वाला बनाया जा सके। इसकी शिक्षा बच्चों को शुरुआती स्तर से या उनके स्कूल के समय से ही देनी होगी। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि फ्रांस इस्लाम को विदेशियों के प्रभाव से भी आज़ाद करेगा, इसके लिए मस्जिदों को मिलने वाली फंडिंग में सुधार किया जाएगा। इसके अलावा ऐसे स्कूल और संगठन जो समुदायों के लिए काम करते हैं, उन पर भी बराबर नज़र रखी जाएगी।”
फ्रांस के शिक्षक की गला काट कर हत्या
फ्रांस की राजधानी पेरिस में इतिहास के एक शिक्षक सैमुअल की सिर्फ इसीलिए हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी की पढ़ाई के दौरान छात्रों को पैगम्बर मुहम्मद का कार्टून दिखाया था। इस हत्या को अंजाम देने वाला 18 साल के इस्लामी कट्टरपंथी युवक का नाम Abdoullakh Abouyezidovitch था। फ्रांस की पुलिस द्वारा मार गिराए जाने के पहले इस कट्टरपंथी आतंकवादी ने हत्या की खून से लथपथ तस्वीर ट्विटर पर साझा की थी।
देश में लगातार लव जिहाद के मामले सामने आ रहे हैं और सबसे ज्यादा हैरानी की बात है कि इस तरह की घटनाएँ देश के अलग-अलग राज्यों में हो रही है। ताज़ा मामला हरियाणा के पलवल जिले का है, जिसमें नाबालिग लड़की ने एक युवक (साजिद) पर बलात्कार का आरोप लगाया है।
आरोप के मुताबिक़ युवक ने पहचान छिपा कर दोस्ती की और इसके बाद उसे प्रेम का झाँसा देकर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद जब पीड़िता ने शादी की बात कही, तब युवक उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। फ़िलहाल पुलिस इस मामले में पीड़िता की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर चुकी है और आरोपित की खोजबीन जारी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई महीनों पहले पीड़िता के पड़ोस में स्थित एक सैलून में एक युवक आता था। वह युवक खुद का नाम राहुल (मूल नाम साजिद) बताता था। उसकी नाबालिग पीड़िता से दोस्ती हो गई। फिर काफी बातें होने के बाद राहुल नाम के युवक ने उसे प्रेम का झाँसा देकर फँसा लिया। इस दौरान युवक शादी करने की बात भी कहता था।
इसके बाद आरोपित पीड़िता को बहला-फुसला कर अपने साथ ले गया और लगभग 1 महीने तक भूपानी गाँव में रखा। इस दौरान आरोपित पीड़िता को नशीला पदार्थ देकर उसके साथ लगातार बलात्कार करता था।
फिर आरोपित ने खुद ही पीड़िता को बताया कि उसका नाम राहुल नहीं बल्कि साजिद है और वह हथीन का रहने वाला है। इसके अलावा साजिद ने पीड़िता से यह भी कहा कि अगर शादी करनी है तो उसे अपना धर्म बदलना पड़ेगा।
ऐसा करने से मना करने पर साजिद ने नाबालिग पीड़िता को उसकी तस्वीरें वायरल करने की धमकी दी। पीड़िता किसी तरह साजिद के चंगुल से आज़ाद होकर अपने परिजनों के पास आई। फिर उसने पलवल के महिला थाना में इस घटना की शिकायत दर्ज कराई।
पीड़िता ने इस मामले में पुलिस पर भी बेहद गम्भीर आरोप लगाए हैं। उसका कहना है कि महिला पुलिसकर्मियों ने उसकी शिकायत सुनना तो दूर बल्कि उसके साथ ही बुरा बर्ताव किया। पीड़िता का यह भी कहना है कि पुलिस ने इस मामले पर बहुत लापरवाही की। विवाद बढ़ने के बाद पुलिस ने आरोपित साजिद के विरुद्ध मामला दर्ज कर लिया। पुलिस फ़िलहाल आरोपित युवक की तलाश में जुट गई है।
इस घटना पर पुलिस की तरफ से कथित तौर पर समझौते का दबाव बनाए जाने की बात सामने आने के बाद कई हिन्दूवादी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। राष्ट्रीय बजरंग दल के प्रदेश अध्यक्ष मुनीश भारद्वाज का इस मुद्दे पर कहना है कि जब पीड़िता और उसके परिजन शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने पहुँचे, तब वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी ने पीड़िता और उसके परिजन की बात सुनना तो दूर उन्हें अंदर तक नहीं आने दिया। अंत में उन्होंने माँग उठाई कि लापरवाही करने वाले पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जाए और आरोपित को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए।