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IAS अधिकारी ने जबरन हवन करवाकर पंडितों को पढ़ाया ‘समानता का पाठ’, लोगों ने पूछा- मस्जिद में मौलवियों को भी ज्ञान देंगी?

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित माँ शूलिनी के मंदिर में IAS अधिकारी रितिका जिंदल द्वारा पंडितों को ज्ञान देने की बातें कुछ लोगों को पसंद नहीं आई हैं और वो पूछ रहे हैं कि क्या अन्य मजहबों व उनके प्रार्थना स्थलों में जाकर भी अधिकारीगण इस तरह भाषण झाड़ सकते हैं? रितिका जिंदल का दावा है कि पंडितों ने दुर्गाष्टमी के दिन महिला होने के कारण उन्हें हवन में हिस्सा लेने से रोका, जिसके बाद उन्होंने ब्राह्मणों को ‘बराबरी’ का पाठ पढ़ाया।

रितिका जिंदल का कहना है कि अष्टमी के दिन हम महिलाओं के सम्मान की बात तो की जाती है, लेकिन उन्हें उन्हीं के अधिकारों से वंचित रखा जाता है। उनकी मानें तो वो सुबह मंदिर में व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने गई थीं। मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और पूजा करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन वहाँ हवन चल रहा था और उन्हें कहा गया कि वो महिला होने के कारण हवन में नहीं बैठ सकतीं। इस पर उन्होंने विरोध जताया।

IAS अधिकारी रितिका जिंदल का कहना है कि उन्हें ये सब सुनकर धक्का लगा और इसीलिए उन्होंने समानता की बातें कर हवन में हिस्सा लिया। उनका कहना है कि वो मंदिर अधिकारी की हैसियत से वहाँ गई थीं और वो एक IAS अधिकारी बाद में हैं, एक महिला पहले हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और संविधान की बातें करते हुए कहा कि लिंग या जाति के आधार पर किसी को पूजा करने से नहीं रोका जा सकता।

उन्होंने कहा कि हमारे समाज में एक रूढ़िवादी ख्याल है, एक पितृसत्तात्मक भाव है, जिसे ख़त्म कर के सभी को बराबरी की तरफ बढ़ना पड़ेगा। रितिका जिंदल ने बताया कि उन्होंने पंडितों से साफ़-साफ़ कह दिया कि वो शूलिनी मंदिर में हवन में हिस्सा लेंगी और पूजा की सारी प्रक्रियाएँ करेंगी। उन्होंने ये भी कहा कि उन्होंने पंडितों को निर्देश दिया है कि आगे से किसी अन्य महिला को नहीं रोका जाना चाहिए। बता दें कि शूलिनी मंदिर में महिलाओं द्वारा पूजा-पाठ पर कोई रोक नहीं है।

अभिजीत अय्यर मित्रा ने तंज कसते हुए कहा कि एक IAS ‘जोकर’ हिन्दू ब्राह्मणों को ‘समानता के अधिकार’ के बारे में सिखा रही हैं, एक अन्य अधिकारी किसी खास चैनल पे ब्रांड्स द्वारा एड न देने को लेकर अभियान चला रहा है। उन्होंने कहा कि एक अन्य अधिकारी ने बिना आर्थिक समझ ने सरकार के सामने आर्थिक पुनरुद्धार का ब्लूप्रिंट पेश कर दिया। मित्रा ने कहा कि इन सबके बावजूद वामपंथी संस्थाओं के राजनीतिकरण का मुद्दा उठा कर चिल्ला रहा है।

दिक्कत ये है कि क्या पंडितों को ‘समानता का पाठ’ पढ़ाने वाले IAS अधिकारी मौलवियों को ये पाठ पढ़ाएँगे? चर्चों में जाकर पादिरयों द्वारा यौन शोषण की आई कई खबरों का जिक्र करते हुए ज्ञान देंगे? और हाँ, जब बात समानता की ही हो रही है तो क्या वो इसके लिए आवाज़ उठाएँगे कि ‘मंदिर अधिकारी’ की तरह मस्जिदों और चर्चों के लिए भी उन्हें अधिकारी नियुक्त किया जाए? लोग यही पूछ रहे हैं। केरल के सबरीमाला को लेकर भी कई सालों से विवाद होता रहा है।

नसीब बदलने का दावा करने वाले काले खान, हारून ने जलाया युवक का हाथ: मीडिया ने बताया ‘तांत्रिक’

उत्तर प्रदेश के फतेहगंज में पुलिस ने काले खान और हारून खान नामक दो ठग फकीरों को गिरफ्तार किया है। ये दोनों अपनी ‘शक्ति’ के बल पर भाग्य उदय का दावा किया करते थे। उनके पास से पुलिस ने दो तमंचे भी बरामद किए हैं। सोमवार (अक्टूबर 26, 2020) को उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। ये दोनों भोजीपुरा थाना क्षेत्र स्थित घघोरा गाँव के निवासी हैं, लेकिन वो टिटौली गाँव के मजार पर रहा करते थे।

वो खुद को तांत्रिक बताते हुए लोगों के भाग्य बदलने का दावा किया करते थे। वो कई सालों से ठगी के इस कारोबार में लगे हुए थे। दरअसल, हुआ यूँ कि करीब एक महीने पहले गाँव का ही एक युवक काम करते समय छत से गिर गया था, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। इस खबर की सूचना मिलते ही काले खान और हारून नामक इन फकीरों ने अपने एक चेले को मृतक के परिजनों के घर भेजा। उसने घर में भूत-प्रेत का साया होने की बात कही, जिससे वो लोग घबरा गए।

हाल ही में घर के मुखिया की मौत होने के कारण परिजनों को ये आशंका सही लगी और वो इन फकीरों के झाँसे में आ गए। फकीरों के चेले ने उस घर के लोगों को लेकर मजार पर लाकर इन दोनों ठगों से मिलवाया। इन दोनों ने 15 हजार रुपए लेकर घर में सब ठीक करने और नया भाग्य जगाने का दावा किया। इसमें से पाँच हजार रुपए उन्होंने बतौर एडवांस ऐंठ भी लिए। शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को ये दोनों परिजनों के घर में पहुँच गए।

यहाँ इन दोनों ने चमत्कार दिखाने के नाम पर घर के एक युवक के हाथ पर एक तरल पदार्थ डाल दिया। इससे उसके हाथ में आग लग गई। काफी देर तक आग लगे रहने के कारण उसका हाथ जल गया। चीख-चिल्लाहट सुन कर गाँव के कई लोग जमा हो गए, जिन्होंने तत्काल इस धोखाधड़ी की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने काले खान और हारून को गिरफ्तार कर लिया। थाना प्रभारी चंद्रकिरण ने कहा कि ये दोनों काफी समय से इस जालसाजी में लगे हुए थे।

इनके पास से दो-दो जिन्दा कारतूस भी बरामद हुए हैं। वहीं मीडिया के एक धड़े ने फिर से काले खान और हारून का नाम छिपाते हुए ‘तांत्रिक’ शब्द को हैडिंग में डाल कर चलाया, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि गिरफ्तार होने वाले हिन्दू तांत्रिक हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है। साथ ही हैडिंग में ‘तंत्र विद्या’ की इस तरह से चर्चा की गई, जिसे ये दोनों हिन्दू हों। मीडिया लम्बे समय से आरोपितों की पहचान छिपाने के लिए ऐसा करता आ रहा है।

कुछ ही दिनों पहले खबर आई थी कि लखनऊ स्थित हुसैनाबाद, जामा मज़ार में एक मौलाना कथित तौर पर ऐसे दंपति का उपचार कर रहा था, जिनकी संतान नहीं थी। उपचार की आड़ लेकर वह महिला का यौन शोषण करवा रहा था। इसके अलावा आरोप यह भी है कि वह मज़ार के भीतर ही देह व्यापार का धंधा भी करता था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने मौलाना को ‘तांत्रिक’ बता कर खबर चलाई, जिससे लगे कि वो हिन्दू है।  

हमसे सवाल करने वालों के मुँह गोमूत्र-गोबर से भरे हैं: हिन्दू घृणा से भरे तंज के सहारे उद्धव ठाकरे ने साधा भाजपा पर निशाना

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री व शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने दशहरे के मौके पर भाजपा पर निशाना साधने के लिए वामपंथी और कट्टरपंथियों द्वारा उन्हीं की शैली में हिन्दू धर्म को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ‘गोमूत्र और गोबर’ जैसे शब्दों को अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल किया। उद्धव ठाकरे के इस बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल होने लगी। ट्विटर यूजर्स इस वीडियो को देखते हुए अपनी प्रतिक्रिया में कह रहे हैं कि तथाकथित रामभक्त भाजपा पर निशाना साधने के लिए गोमूत्र का मजाक बना रहे हैं।

वीडियो में उद्धव ठाकरे कहते सुने जा सकते हैं, “जो लोग हमारी सरकार पर सवाल उठाते हैं, उनके मुँह गोमूत्र और गोबर से भरे हुए हैं। वह हमारे ऊपर गोबर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं, वो भी इस आशा से कि वह हमें चिपक जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, हम साफ हैं। यह वो लोग हैं जिनके खुद के कपड़े गोमूत्र व गोबर से लिपटे हैं।”

गौरतलब है कि पौराणिक आयुर्वेद उपचार में गोमूत्र एक जरूरी हिस्सा होता था और आज के समय में भी इसे हिंदुओं में पवित्र माना जाता है। गौमूत्र को लेकर अक्सर वामपंथी व कट्टरपंथी लोग हिंदुओं को निशाना बनाते रहे हैं। ऐसे में शिवसेना नेता द्वारा की गई टिप्पणी साफ दर्शाती है कि उनकी मंशा ‘गोमूत्र’ को लेकर क्या है।

पिछले साल जब पुलवामा का हमला हुआ था और जैश के आतंकी आदिल डार ने अपनी वीडियो जारी की थी, तब उसने भी हिंदुओं को गोमूत्र पीने वाला बताया था। साथ ही कहा था कि वह अल्लाह के नाम पर ‘गाय का पेशाब पीने वालों को’ सबक सिखाना चाहता है।

शिवसेना के बदलते रूप

समय के साथ सबसे दिलचस्प चीज यह देखने वाली है कि शिवसेना नेता व खुद को रामभक्त कहने वाले मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट रूप से अपने संबोधन में ‘गोमूत्र’ शब्द का इस्तेमाल करके हिंदूफोबिक टिप्पणी की है। हालाँकि, यही शिवसेना कुछ समय पहले तक कट्टर हिंदुत्ववादी विचारधारा के कारण पहचानी जाती थी। मगर, बाला साहेब ठाकरे की छवि का इस्तेमाल करके पहले शिवसेना ने विधानसभा का चुनाव लड़ा और उसके बाद सीएम की कुर्सी के लिए जाकर देश की ‘सेकुलर’ पार्टियों से गठबंधन कर लिया।

साल 2019 में शिवसेना का यह दोहरा रवैया सीएए के दौरान भी देखने को मिला था, जिसे लोकसभा में तो पार्टी का समर्थन मिला, लेकिन राज्यसभा में वह इसका विरोध करने लगे। महाविकास आघाड़ी सरकार ने राज्य में 10% आरक्षण को भी खत्म कर दिया है जिसे मोदी सरकार पिछले साल गरीबों के लिए लेकर आई थी ताकि शिक्षा व सरकारी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को फायदा मिल सके।

‘अपनी मर्जी से बिलाल के साथ गई, मेडिकल टेस्ट नहीं कराऊँगी’: फर्जी हिन्दू प्रेमी के बचाव में उतरी ₹8 लाख लेकर घर से भागी छात्रा

बरेली के ‘लव जिहाद’ मामले में नया मोड़ आया है। किला थाने में हिंदूवादी संगठनों के विरोध प्रदर्शन के बाद आरोपित युवक बिलाल को अजमेर से गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन आरोपित ने दावा किया है कि उसने छात्रा से निकाह कर लिया है। वहीं छात्रा भी उसके बचाव में जुटी हुई है, जिससे पुलिस सकते में है। छात्रा ने न सिर्फ हॉस्पिटल के कर्मचारियों, बल्कि मजिस्ट्रेट के सामने भी एक के बाद एक दलीलें रख कर अपने क़ानूनी अधिकारों की बातें की।

इसके बाद उक्त छात्रा को नारी निकेतन भेज दिया गया है। अभी तक उसका मेडिकल टेस्ट नहीं हो सका है। अजमेर के होटल से मिलने के तुरंत बाद ही लड़की ने दो टूक कहा था कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से प्रेमी बिलाल के साथ आई है। वो इसी बात को लगातार दोहरा रही है। जहाँ छात्रा शादी की बात से इनकार कर रही है, बिलाल का कहना है कि उनलोगों का निकाह हो चुका है। अब बरेली पुलिस भी असमंजस में है।

‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, जब पुलिस और अस्पताल कर्मचारी छात्रा को उसके मेडिकल टेस्ट के लिए लेकर गए तो उसने अपने आधार कार्ड और हाईस्कूल के प्रमाण पत्रों को सामने रखकर खुद के बालिग होने की रट लगा दी और परीक्षण से इनकार कर दिया। उसने कहा कि जब उसके पास बालिग होने के सबूत हैं, फिर वो भला क्यों मेडिकल परीक्षण कराएगी? वो अस्पताल के कर्मचारियों से ही उलझ बैठी।

परेशान बरेली पुलिस को छात्र का मेडिकल परीक्षण कराए बिना ही लौटना पड़ा। अब उसके प्रमाण-पत्रों की जाँच होगी, जिसके बाद न्यायालय निर्णय लेगा कि आगे क्या किया जाना है। फ़िलहाल छात्रा ने अपने घर जाने से इनकार कर दिया है और बिलाल के साथ रहने की इच्छा प्रकट की है। उसे मंगलवार (अक्टूबर 27, 2020) को कोर्ट में पेश किया जाएगा। कोर्ट में वो क्या बयान देती है, इस पर सभी की नजर है।

लड़की के पिता ने बताया था कि बिलाल अक्सर हिंदू लड़कों की तरह रहा करता था और उसके कुछ और दोस्त भी तिलक लगाया करते थे। वो और उसके दोस्त हाथ में रक्षासूत्र भी बाँधते थे, जिसे देखकर लगता था कि वे हिंदू हैं। बेटी के घर से गायब होने के बाद जब उन्होंने बिलाल के बारे में पता किया, तब जाकर जानकारी मिली कि वो दूसरे मजहब का था। उसका दूध-दही का व्यापार है। उनका आरोप था कि बिलाल ने उनकी बेटी पर दबाव बनाया है। 

नकली आधार कार्ड बना कर इस्तेमाल करने के आरोप में बिलाल को फ़िलहाल जेल भेजा गया है। वहीं जारी किए गए वीडियो में लड़की असहज दिख रही थी और ऐसा लग रहा था कि वो घबराहट में बयान जारी कर रही है। बिलाल के पास से पुलिस ने चोरी के 3 लाख रुपए के साथ-साथ सोने की चैन भी बरामद कर ली है। हालाँकि, परिवार वालों का आरोप है कि बेटी 8 लाख रुपए लेकर घर से भागी थी।

बता दें कि बरेली में शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) को एक लड़की गायब हो गई थी, जिसके परिवार ने आरोप लगाया था कि दूसरे समुदाय के एक युवक ने उससे शादी कर ली है। आरोप था कि ये शादी जोर-जबरदस्ती की गई। बरेली में भाजपा और विहिप के कार्यकर्ताओं ने इस घटना को ‘लव जिहाद’ बताते हुए थाने में जाकर विरोध प्रदर्शन किया था और छात्रा को छुड़ाने के साथ-साथ मामले में बिलाल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की थी। लड़की बीएससी की छात्रा है और कम्प्यूटर कोचिंग के लिए जाती थी।

मुस्लिम देशों में उठी फ्रांस के बहिष्कार की माँग, NDTV ने कट्टरपन्थ की जगह पैगंबर के कार्टून को ही बताया वजह

फ्रांस में अपने छात्रों को अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब समझाने के कारण एक शिक्षक का सिर कलम कर दिया गया और अब मुस्लिम देश इस घटना की निंदा करने की बजाय फ्रांस के ही उत्पादों का बहिष्कार करने में लगे हैं। इस बीच एनडीटीवी ने भी एक मजहबी हत्यारे द्वारा शिक्षक का गला काटने और कट्टरपंथी मानसिकता के बजाय शिक्षक द्वारा दिखाए गए पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को ही इस बहिष्कार के लिए जिम्मेदार बताया है।

खबर के मुताबिक, मुस्लिम देश फ्रांस के उत्पादों का बहिष्कार करने के लिए मुहीम चला रहे हैं। सऊदी अरब में रविवार (अक्टूबर 25, 2020) को फ्रेंच सुपरमार्केट के विक्रेता कैरेफोर (Carrefour) के बहिष्कार का ट्रेंड चलता रहा। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में बताया कि मध्य पूर्वी देशों में फ्रांसीसी उत्पादों, विशेष रूप से खाद्य उत्पादों का बहिष्कार करने की बात सामने आई है।

मंत्रालय ने कहा कि बहिष्कार के लिए किया गया आह्वान बिलकुल निराधार है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए, क्योंकि सारे हमले हमारे देश के ख़िलाफ़ हैं जिन्हें कट्टरपंथी अल्पसंख्यक द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। मंत्रालय ने अधिकारियों से भी इस बहिष्कार के ख़िलाफ़ बोलने को कहा है जिससे फ्रांसीसी कंपनियों की मदद हो सके और फ्रांसीसी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

गौरतलब है कि कुवैत में उपभोक्ता सहकारी समितियों के गैर सरकारी संघ ने भी फ्रेंच प्रोडक्ट्स के बहिष्कार के निर्देश अक्टूबर में जारी किए थे। ऐसे में रॉयटर ने जब कई सहकारी समितियों को संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि उन लोगों ने अपनी शेल्फ से फ्रेंच कंपनियों के बाल संबंधी व ब्यूटी संबंधी उत्पादों को हटवा दिया है। यूनियन प्रमुख फद अल किश्ती ने बताया कि पैगंबर के लगातार अपमान की प्रतिक्रिया में फ्रांस उत्पादों को हटाया गया है।

बता दें कि इससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इस्लाम पर बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिससे आज पूरी दुनिया संकट में है। उनके इस बयान के बाद से ट्विटर पर हैशटैग #BoycottFrenchProducts, #BoycottFrance Products, #boycottfrance #boycott_French_products #ProphetMuhammad ट्रेंड करने लगा। इसके अलावा कई देशों के यूजर्स ने ट्विटर व फेसबुक पर ‘मोहम्मद- मैसेंजर ऑफ अल्लाह’ के साथ अपनी फ्रोफाइल तस्वीरें बदल दीं।

बहिष्कार की यह खबर के आने के बाद भी कई लोगों ने इस पर ट्वीट किया। सरफराज अहमद रजवी ने खबर शेयर करते हुए लिखा- “जानी नहीं तो माली तौर पर तो नुकसान किया ही जा सकता है फ्रांस का आर्थिक नुकसान कीजिए।”

कुछ ट्विटर यूजर्स ने जब इस बहिष्कार पर टिप्पणी की कि ऐसा करके यह देश उस फ्रेंच टीचर की हत्या का समर्थन कर रहे हैं तो कट्टरपंथियों का जवाब आया, “बिलकुल, आप कैसे 1.8 मिलियन मुस्लिमों की भावनाओं को आहत कर सकते हैं। ये ही वह चीज है जिसे वह डिजर्व करता था।”

मदद की अपील अक्टूबर में, नाम लिख लिया था सितम्बर में: लोगों ने पूछा- सोनू सूद अंतर्यामी हैं क्या?

ट्विटर के माध्यम से लोगों की मदद करने की ख़बरों के कारण लॉकडाउन में अभिनेता सोनू सूद की खूब चर्चा हुई थी। दावा किया गया था कि उन्होंने कई मजदूरों को घर पहुँचाया। हालाँकि, अब मदद को लेकर किए गए कुछ ट्वीट्स में हुई गड़बड़ियों के कारण वो फिर से विवादों का विषय बन रहे हैं। सोनू सूद से मदद माँगने वाले ट्विटर अकाउंट या तो गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें झोल नजर आ रहा है, जिन्हें लेकर अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

ट्विटर हैंडल ‘@SnehalMisal8 ने अक्टूबर 20 को ट्वीट कर के अपने बेटे की ओपन हार्ट सर्जरी के लिए सोनू सूद से मदद की गुहार लगाई थी। उक्त ट्विटर यूजर ने बताया कि उसके बेटे का शरीर 100% ऑक्सीजन लेवल पर नहीं जा पाता है और 30% तक गिर जाता है।

इस ट्वीट के 5 दिन बाद अभिनेता सोनू सूद ने रिप्लाई करते हुए लिखा कि कल आपके बेटे को मुंबई के SRCC अस्पताल में एडमिट कराया जाएगा और इसी सप्ताह सर्जरी के लिए समय भी तय कर दिया जाएगा। लेकिन, ट्विटर पर कुछ लोगों ने इस ट्वीट को पीआर स्टंट करार दिया।

बिना टैग किए सोनू सूद ने खोज लिटा ट्वीट

ऋषि बागरी नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि जिस हैंडल से ट्वीट किया गया, वो एक नया ट्विटर हैंडल है, जिसके मात्र 2-3 फॉलोवर्स हैं और एक ही ट्वीट है। उन्होंने कहा कि इस ट्वीट में सोनू सूद को टैग तक नहीं किया गया था और न ही लोकेशन का जिक्र है, साथ ही कॉन्टैक्ट या ईमेल के डिटेल्स भी नहीं साझा किए गए हैं। उन्होंने आश्चर्य जताया कि फिर भी अभिनेता ने इस ट्वीट को खोज लिया और मदद के लिए हाथ बढ़ा दिया।

उन्होंने दावा किया कि सोनू सूद से मदद माँगने वाले कई ट्विटर हैंडल्स ने अपनी उन ट्वीट्स को डिलीट कर लिया है, जो बताता है कि ये सब पीआर मशीनरी का काम है और महज पब्लिसिटी के लिए किया गया है। कई लोगों ने कहा कि राजनेताओं और बॉलीवुड की हस्तियों द्वारा समाज सेवा के नाम पर पब्लिसिटी करने का पुराना चलन रहा है और सोनू सूद इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सोनू सूद ने ऋषि के ट्वीट को कोट कर सफाई भी दी।

उन्होंने लिखा कि सबसे अच्छी बात ये है कि ज़रूरतमंद लोग उन्हें खोज लेते हैं और वो भी किसी तरह ऐसे लोगों को ढूँढ लेते हैं। उन्होंने लिखा कि ये सब कुछ ‘इरादों’ से तय होता है, जो आपको समझ में नहीं आएगा। उन्होंने तंज कसते हुए लिखा, “मरीज को अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा। आप भी योगदान दें और कुछ फल उन्हें भेज दें। 2-3 फॉलोवर्स वाला कोई व्यक्ति खुश होगा।

इसके साथ ही, सोनू सूद ने मरीज के नाम और ऑपरेशन की तारीख व समय के साथ एक्सेल शीट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।

इस एक्सेल शीट के शीर्षक में ही लिख दिया गया था कि ये उन लोगों की लिस्ट है, जिनकी हार्ट सर्जरी हुई या होनी है। साथ ही, एक्सेल शीट के शीर्षक में ‘सोनू सूद’ लिखा भी प्रतीत हो रहा है, जिसे ब्लर कर दिया गया था। इसमें सितम्बर 25, 2020 की तारीख दर्ज है, जबकि ट्वीट लगभग एक महीने बाद का है। लोगों ने इसका अर्थ लगाया कि स्वप्निल और सोनू सूद एक महीने पहले से संपर्क में थे, फिर ट्वीट इतने दिनों बाद क्यों किया गया?

सोनू द्वारा शेयर की गई शीट में सितम्बर की तारीख

‘प्लाकार्ड्स’ के लिए मशहूर मधुर ने लिखा कि सोनू सूद ने 1 महीने पहले ही एक्सेल शीट तैयार कर ली थी, क्या वो अंतर्यामी हैं? वहीं कुछ लोगों ने अभिनेता से पूछा कि क्या वो एक महीने पीछे चल रहे हैं? पिछली बार भी कुछ लोगों ने डिलीट हुए ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट्स शेयर कर दावा किया था कि सोनू सूद ने जिन-जिन की ट्विटर पर मदद का दावा किया, उनमें से अधिकतर के ट्वीट्स डिलीट किए जा चुके थे।

इससे पहले इन्हीं गायब अकाउंट्स का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कुछ लोगों ने ट्विटर पर सोनू सूद की दरियादिली को प्रोपेगेंडा करार दे दिया था। NationFirst#SAFFRON नामक ट्विटर हैंडल से सोनू सूद के कई ट्वीट के स्क्रीनशॉट शेयर हुए थे। साथ ही ट्वीट में लिखा गया था, “प्रोपेगेंडा चल रहा था सोशल मीडिया पर। सभी मदद माँगने वाले ट्वीट गायब हो गए है और यहाँ तक कि उनके ट्विटर अकाउंट भी गायब हैं।

‘फ्रांस ने समुदाय को भड़काया’: इमरान खान ने फेसबुक को पत्र लिखकर की बढ़ते इस्लामोफ़ोबिया को रोकने की माँग

कक्षा में पैगम्बर का चित्र दिखाने पर एक मजहबी छात्र द्वारा पेरिस में एक प्रोफेसर की हत्या के बाद फ्रांस की सरकार और वहाँ की जनता ने कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया है और इसे इस्लामी आतंकवाद का नाम भी दिया। ऐसे में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को कट्टर बताते हुए उन पर इस्लाम पर हमला करने का आरोप लगाया है।

उन्होंने पैंगबर के चित्र पर जारी विवाद के मद्देनजर कहा कि मैक्रों ने इस्लाम की जानकारी न होने के बावजूद समुदाय के लोगों पर हमला किया व इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दिया। पाक पीएम ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि यह समय संयम से काम लेने का था।

इमरान खान ने अपने ट्वीट में फ्रांसीसी राष्ट्रपति पर निशाना साधते हुए कल लिखा, “एक नेता की पहचान होती है कि वह इंसानों को एकजुट करता है, जैसा कि मंडेला ने लोगों को विभाजित करने की बजाय उन्हें एक करने पर जोर दिया। लेकिन एक आज का समय है, जब राष्ट्रपति मैक्रों देश से रेसिज्म, ध्रुवीकरण हटाने की बजाय अतिवादियों को हीलिंग टच और अस्वीकृत स्थान देने में लगे हैं, जो निश्चित रूप से उनकी कट्टरवादी सोच को दिखाता है।”

इमरान खान ने ट्वीट में यह भी लिखा, “यह दुखद है कि राष्ट्रपति मैक्रों ने विवादित कार्टून को बढ़ावा देते हुए जानबूझकर लोगों को भड़काने की कोशिश की है।”

पाक पीएम ने कहा कि इस समय फ्रांस राष्ट्रपति को संयम से काम लेते हुए कट्टरपंथियों को दरकिनार करने की रणनीति अपनानी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने इस्लाम की जानकारी न होने के बावजूद समुदाय पर हमला करते हुए इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देना चुना, जबकि उन्हें आतंक पर हमला करना चाहिए था।

इमरान खान के अनुसार, फ्रांस राष्ट्रपति ने यूरोप समेत पूरे विश्व के सैकड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने आखिरी में लिखा, “आखिरी चीज जिसे दुनिया चाहती है या जरूरत है, वह है कि दुनिया को ध्रुवीकरण और अज्ञानता की वजह से इस्लामोफोबिया पर सार्वजनिक बयान से बचना चाहिए, क्योंकि इससे उग्रवादियों के मन में और भी नफरत पैदा हो जाएगी।”

गौरतलब है कि 16 अक्टूबर को पेरिस में इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी की कट्टरपंथी हमले में हत्या कर दी गई थी। उन्होंने अपनी कक्षा में छात्रों को पैगंबर का विवादित कैरिकेचर दिखाया था। इसके बाद ही एक 18 साल के युवक ने उन पर हमला बोल दिया और उनका सिर कलम कर दिया। इस घटना की निंदा करते हुए फ्रांस समेत पूरी दुनिया में शिक्षक के समर्थन में आवाजें उठने लगीं।

फ्रांस ने इस्लाम के सामने घुटने न टेकने का ऐलान किया। फ्रांस के ऑसिटैन क्षेत्र (Occitanie region) के दो टाउन हॉल मोंटपेलियर (Montpellier) और टूलूज़ (Toulouse) के बाहर शिक्षक सैम्युएल पैटी को याद करते हुए और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने के लिए पैगम्बर मोहम्मद के उन कार्टूनों का 4 घंटे तक प्रदर्शन किया गया, जिनको लेकर शार्ली एब्दो के कर्मचारियों का 2015 में नरसंहार किया गया था। सबसे पहले इन कार्टूनों का प्रकाशन शार्ली हेब्दो पत्रिका में ही किया गया था

बढ़ते ‘इस्लामोफ़ोबिया’ को रोकने के लिए इमरान ने लिखा फेसबुक को पत्र

यहाँ बता दें कि इमरान खान ने इस्लामोफोबिया के मद्देनजर फेसबुक सीईओ को भी पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने इस्लामोफोबिया को फेसबुक पर बैन करने की माँग की है। अपने पत्र में उन्होंने भारत और फ्रांस का हवाला देते हुए कहा है कि इन देशों में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है।

NSA डोभाल की चेतावनी- अपनी मिट्टी ही नहीं, विदेशी जमीन में घुसकर भी खतरे के मूल को मिटा देगा नया भारत

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने कहा है कि भारत न सिर्फ अपनी मिट्टी पर लड़ेगा, बल्कि अगर कोई विदेशी जमीन हमारे लिए सुरक्षा सम्बन्धी खतरे पैदा करता है तो वहाँ भी लड़ेगा। कई लोग इसे ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ पर भारत-चीन तनाव से जोड़ कर देख रहे हैं, लेकिन ‘नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सिस्टम (NSCS)’ ने इस बात से इनकार किया है। बता दें कि भारत-चीन सेनाएँ सीमा पर कई महीनों से आमने-सामने हैं।

ऋषिकेश में ‘परमार्थ निकेतन आश्रम’ को सम्बोधित करते हुए अजीत डोभाल ने कहा कि भारत ने कभी भी किसी पर पहले हमला नहीं किया, लेकिन नए रणनीतिक समीकरणों के बाद शायद हमें पूरी तरह सक्रियता के साथ सुरक्षा सम्बन्धी खतरों को हटाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि ये ज़रूरी नहीं है कि आप जहाँ चाहते हैं, भारत वहीं लड़े। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध को वहाँ तक ले जा सकता है, जहाँ से खतरा पैदा हो रहा है।

NSA अजीत डोभाल ने इसे ‘नए भारत’ की रणनीति करार दिया। अधिकारियों का कहना है कि डोभाल वर्तमान स्थिति को लेकर नहीं बोल रहे थे, बल्कि वो सामान्य परिस्थितियों की बात कर रहे थे। अजीत डोभाल ने कहा कि हमने कभी भी अपने व्यक्तिगत हितों की पूर्ति के लिए आक्रामक रवैया नहीं अपनाया। उन्होंने कहा कि हम अपनी और विदेशी मिट्टी पर भी लड़ेंगे, लेकिन व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं।

उन्होंने कहा कि भारत ‘परमार्थ आध्यात्मिकता’ के लिए युद्ध लड़ेगा। उन्होंने कहा कि हमारा सभ्यताओं वाला राष्ट्र रहा है, जो किसी खास धर्म, भाषा या फिर समुदाय पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि जिसे देखा भी नहीं जा सकता है, वही इस राष्ट्र का आधार है, और वो है – हमारे देश की संस्कृति। उधर कोरियन युद्ध की बरसी पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी कहा कि चीन कभी भी अपनी सम्प्रभुता, सुरक्षा और विकास हितों को खतरा पहुँचाने की अनुमति नहीं देगा।

उन्होंने कहा कि उनकी ‘पवित्र मातृभूमि’ के क्षेत्रों को बाँटने या फिर अतिक्रमित करने वालों की करतूतों को बैठ कर देखता नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि जब भी ऐसी स्थिति आएगी, चीनी लोग उसका जम कर सामना करेंगे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी दशहरा ‘शस्त्र पूजा’ के बाद कहा कि भारत मौजूदा तनाव को ख़त्म कर शांति चाहता है, कुछ कुटिल घटनाएँ होती रही हैं, बावजूद इसके हमारी सेना किइस को हमारी एक इंच जमीन पर भी कब्ज़ा नहीं करने देगी।

राजनाथ ने कहा कि वो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि भारत-चीन तनाव की हालिया घटनाओं के बीच हमारी सेना ने जो पराक्रम दिखाया, उसे इतिहासकारों द्वारा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी चीन को कोरोना को लेकर ‘संदिग्ध’ करतूतों वाला देश करार देते हुए उसे साम्राज्यवादी बताया और कहा कि भारत ने उसे जो प्रतिक्रिया दी, उससे वो हैरान हो गया। उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध बना चीन से बड़ी ताकत बनेगा।

इसी बीच ट्विटर पर एक हैशटैग ट्रेंड कर रहा है #MoveTheGames और लोग इसके तहत आयोजकों से माँग कर रहे हैं कि 2022 में होने वाले ओलम्पिक का स्थान बदल दिया जाए, उसे चीन की जगह कहीं और आयोजित कराया जाए। 6 अक्टूबर को ब्रिटेन ने इस बात का ऐलान किया कि अगर इस बात के और सबूत सामने आते हैं कि चीन में उइगरों के मानवाधिकारों का हनन होता है तो वह 2022 के विंटर ओलम्पिक का बहिष्कार कर सकता है।

कश्मीरी हिन्दुओं के लिए भारत ही नहीं शेख के यार नेहरू की नाराजगी को भी चुना था महाराजा हरि सिंह ने, आज ही के दिन हुआ था अधिमिलन

26 अक्टूबर 1947- इतिहास के पन्नों की वह तारीख जिसने आजाद भारत के मानचित्र में धड़ जोड़कर उसे सम्पूर्ण बनाया। इसी दिन जम्मू कश्मीर के आखिरी शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत को भारत के साथ मिलाने का फैसला किया था। इसी दिन इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (Instrument of accession) पर अपने हस्ताक्षर किए थे। इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसेशन एक ऐसा दस्तावेज था जिसे भारत सरकार ने 1947 में रियासतों के अधिमिलन पत्र के रूप में तैयार किया था। 

वैसे तो उस दौरान भारत में करीब 565 रियासते थीं मगर, विभाजन के बाद जम्मू कश्मीर का भारत में अधिमिलन इसलिए भी यादगार है क्योंकि बहुसंख्यक आबादी और भौगोलिक परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के बावजूद महाराजा ने हिंदुस्तान के साथ आने का फैसला किया था।

इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसेशन

इससे पहले सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के आजाद होने से पूर्व 3 जुलाई 1947 को ही कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक और महाराजा को अलग-अलग पत्र लिख चुके थे। इन पत्रों में सरदार पटेल ने यह स्पष्ट किया था कि जम्मू कश्मीर का फायदा बिना कोई देरी किए भारत से जुड़ने में ही है। हालाँकि, महाराजा हरि सिंह तब भी सोच विचार में थे। उधर, मोहम्मद अली जिन्ना ये मानकर बैठ चुके थे कि पाकिस्तान के लिए जम्मू कश्मीर को हथियाना कोई मुश्किल काम नहीं है क्योंकि एक तो उस रियासत में आबादी मुस्लिम बहुसंख्यको की थी और दूसरा इसके कई क्षेत्र पाकिस्तान के प्रांतो से जुड़ रहे थे।

समाचार पत्रों में जम्मू कश्मीर के अधिमिलन की खबर

ऐसी स्थिति में एक ओर जहाँ विभाजन का ऐलान 1947 के जून महीने में हो चुका था और देश आजाद शब्द के मायने समझने को तैयार था, महाराजा हरि सिंह इस उधेड़बुन में थे कि आखिर क्या किया जाए। तभी, कुछ दिनों बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा से मुलाकात कर उनको सलाह दी कि उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ जुड़ जाना चाहिए। 

कहा जाता है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने जब महाराजा के सामने अपना सुझाव रखा, तब उनका झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा था। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में शामिल होता है तो भारत इसमें कोई भी परेशानी उत्पन्न नहीं करेगा। लेकिन, महाराजा हरि सिंह को यहाँ पाकिस्तान के साथ जुड़ने में दो समस्याएँ थीं। 

पहली- यदि वह पाकिस्तान के साथ विलय करते तो यह स्पष्ट रूप से साम्प्रदायिक राष्ट्र के का हिस्सा होना था और दूसरा, मुस्लिम बहुल राष्ट्र के साथ जुड़ते हुए उन्हें अपने रियासत के अल्पसंख्यकों की चिंता थी। इनमें लद्दाख के बौद्ध, जम्मू के कश्मीरी पंडित और कश्मीर घाटी के हिंदू शामिल थे।

100 साल से ज्यादा पुराना था जम्मू कश्मीर में डोगरा वंश का इतिहास

महाराजा हरि सिंह मुस्लिम बहुल आबादी के बीच शासन गद्दी संभालने वाले हिंदू राजा थे। आमतौर पर ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती थी कि मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाकों में किसी हिंदू राजा को राज करने का मौका मिला हो, मगर हरि सिंह जिस डोगरा वंश से आते थे उसका इतिहास जम्मू में 100 साल से भी अधिक पुराना था। 

1822 में महाराजा गुलाब सिंह के गद्दी संभालने से लेकर यहाँ चार डोगरा वंश के राजाओं ने राज किया। इनमें पहले महाराजा गुलाब सिंह थे और आखिरी महाराजा हरि सिंह थे।

जम्मू में डोगरा समुदाय का संक्षेप विवरण यही है कि इसकी नींव के पीछे महाराजा रणजीत सिंह का हाथ था। महाराजा रणजीत ने 1819 में कश्मीर में सिख राज की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने पंजाब को भी जम्मू में मिलाया व इसकी जिम्मेदारी सौंपी अपने ही सेना के एक सैनिक गुलाब सिंह को।

1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद व सिख समुदाय को बिखरता देख, गुलाब सिंह ने कश्मीर को स्वतंत्र घोषित किया। फिर 1822 से 1856 उन्होंने वहाँ राज किया। इसके बाद रणबीर सिंह ने 1856 से 1885 तक। महाराजा प्रताप सिंह ने 1885 से 1925 तक और आखिर में महाराजा हरि सिंह ने 1925 से 1947 तक।

भारत विभाजन की बातें शुरू हुई तो रियासतों के विलय की बात का महाराजा हरि सिंह को भी मालूम पड़ा। मगर अपनी रियासत को लेकर आखिरी फैसला उन्होंने तब तक नहीं लिया जब तक उन्हें नेहरू व कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला की मंशा का पता नहीं चला और पाकिस्तान के आतंकी चेहरे से उनके साक्षात्कार नहीं हुए। 

जैसे ही प्रदेश में कबाइलियों का हमला हुआ और महाराजा को एहसास हुआ कि उनकी सेना उन्हें रोकने में असमर्थ हैं, उन्होंने भारत के साथ होने का फैसला ले लिया। इस बीच पाकिस्तान लगातार उन्हें तरह तरह के प्रलोभन दे रहा था लेकिन अपने मनसूबों में असफल होता देख 22 अक्टूबर उसने आतंक का आगाज किया जिससे महाराजा सकपका गए। उन्होंने पाया कि हथियारों से लैस सैंकड़ों कबाइली उनकी सीमा की ओर बढ़े आ रहे थे और जमकर जमकर कत्लेआम कर रहे थे

नतीजतन, कुछ समय पहले तक कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच का स्नेह देखकर भारत के साथ अपनी रियासत के अधिमिलन के लिए हिचकिचाने वाले हरि सिंह फौरन इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर करने को तैयार हो गए।

क्या थी जवाहरलाल नेहरू से महाराजा हरि सिंह की नाराजगी?

शुरुआत में महाराजा हरि सिंह को जवाहरलाल नेहरू का नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता शेख अब्दुल्ला के साथ मैत्रीपूर्ण बर्ताव बिलकुल नहीं पसंद था। दरअसल शेख अब्दुल्ला वही शख्स था जिसने महाराजा के ख़िलाफ़ ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ नाम से आंदोलन छेड़ा था। जब इसी तरह के कारनामों के लिए शेख को गिरफ्तार किया गया व उन्हें 3 साल की सजा हुई, तब भी जवाहरलाल नेहरू उनके प्रति अपनी सहानुभूति दिखाते रहे और राज्य सरकार द्वारा उनका प्रवेश निषेध कर दिए जाने पर भी अब्दुल्ला को प्रोत्साहित करने वहाँ गए, जिस कारण उनकी गिरफ्तारी भी हुई। नेहरू के इस कदम से कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी समेत सरदार वल्लभ भाई सब नाराज थे।

गौरतलब है कि आजाद भारत में रियासतों के विलय का जिम्मा सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा गया था। उन्होंने हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी पेचीदा रियासतों को भी बड़ी सरलता से भारत में विलय करवाया था और सबका यही मानना था कि अगर जम्मू कश्मीर का मसला उनके हाथों होता तो वह उसका भी समाधान कर लेते। लेकिन, नहीं! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पूरा मसला अपने हाथ ले लिया।

शेख अब्दुल्ला से उनका स्नेह साफ बता रहा था कि वह राज्य को उसे सौंपने की मंशा बनाए बैठे हैं। इसी साजिश का पता जब महाराजा हरि सिंह को चल गया तो इसके बाद वह न महात्मा गाँधी के कहने पर माने और न वल्लभ भाई पटले के।

हैरानी की बात थी जिन वल्लभ भाई पटेल ने हैदराबाद में निजाम का शासन होने के बाद भी उसको भारत में शामिल करवा लिया था वही वल्लभ भाई पटेल एक हिंदू शासक को नहीं समझा पा रहे थे।

अंतत: महाराजा हरिसिंह को आश्वस्त करने का काम किया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने, जिनको श्री गुरुजी भी कहा जाता था। तत्कालीन गृहमंत्री के सन्देश पर उन्होंने अविलंब महाराज को मनाने के लिए उनके साथ बैठक की। यह बैठक हुई प्रधानमंत्री  मेहरचंद महाजन और पंडित प्रेमनाथ डोगरा की मध्यस्ता में।

सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर और राजा हरि सिंह

26 अक्टूबर 1947 को अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। यह अधिमिलन पत्र बिलकुल वैसा ही पत्र था जैसे पत्र पर बाकी रियासतों ने हस्ताक्षर किए थे और भारत के साथ आने की सहमति दी थी। इसके बाद 27 अक्टूबर को भारत के गवर्नर जनरल ने इसे स्वीकार किया और भारत के मानचित्र पर मुकुट की तरह हमेशा के लिए विराज गया जम्मू-कश्मीर। 

Accession of J&K: Breaking myths

महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर के साथ माँग थी कि उन्हें सैन्य मदद दी जाए इसलिए राज्य में विमान और सैनिक बिना किसी देरी के भिजवाए गए। सरदार वल्लभभाई की प्रतिबद्धता ने लगातार भारतीय सेना में उत्साह भरे रखा। 

कुछ समय बाद स्वयंसेवकों की सहायता से और अपने अदम्य साहस से भारतीय सेना की जीत हुई और उन्होंने पाकिस्तानियों को मार भगाया। मगर हाँ, इस बीच कुछ हिस्सों पर पाकिस्तान ने अपने पैर कश्मीर राजधानी मुजफ्फराबाद में जमा लिए थे जिसको आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। PoK को पाकिस्तान ने दो हिस्से में बाँटा है एक को वह आजाद कश्मीर कहता है और दूसरा गिलगित बाल्टिस्तान है।

इसके बाद कश्मीर में विवादित अनुच्छेध 370 लाया गया और उनके पास अपना अलग झंडा व संविधान रखने का अधिकार हो गया। हमने ऊपर आपको बताया कि महाराजा हरि सिंह ने जिस अधिमिलन पत्र पर अपने हस्ताक्षर किए थे वह बिलकुल वैसा ही था जैसे अन्य रियासतों का विलय पत्र था। मगर, जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा देने का काम कॉन्ग्रेस ने 1950 में किया और भारत के अधिकार वहाँ बेहद सीमित कर दिए।

भारत के साथ जुड़ने के बाद भी कश्मीर में 90 का दशक

महाराजा हरि सिंह का भारत के साथ आने का फैसलो में सबसे बड़ी चिंता वहाँ की अल्पसंख्यक जनता की सुरक्षा थी। उन्हें डर था कि यदि वह एक ऐसे राज्य से जुड़े जिसकी नींव मजहब आधारित है तो अल्पसंख्यकों का क्या होगा। हालाँकि, तब उनके इस डर ने उन्हें भारत के साथ लाकर जोड़ दिया लेकिन यदि वह यहाँ नहीं शामिल होते तो अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो सकता था इसका उत्तर मिला 90 के दशक में

1989- वही साल जब कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का काला पन्ना इतिहास के साथ जोड़ दिया गया और जिसकी टीस आज भी हर कश्मीरी पंडित के दिल में है। 90 के दशक में पाकिस्तानी ताकतों के बढ़ते प्रभाव ने कश्मीर में आतंक का बोल बाला कर दिया था।

अलगाववादी खुलेआम धमकियाँ दे रहे थीे।  मस्जिदों से पंडितों के सफाए के नारे लगने लगे थे। आवाजें सुनाई पड़ने लगी थीं कि कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। घाटी में कट्टरपंथ ने इतनी तबाही मचाई कि कुछ को इस्लामी आतंकियों ने अपना शिकार बना लिया और कुछ लोग उनकी बर्बरता से बचने के लिए खुद ही अपनों के हाथों मारे गए।

साल 1996 में शेख अब्दुल्ला का बेटा व नेशनल कॉन्प्रेंस का नया चेहरा फारूख अब्दुल्ला सत्ता में आया। इसके बाद साल 2002 में पीडीपी के साथ वहाँ कॉन्ग्रेस पहुँची। फिर पीडीपी के साथ भाजपा का भी गठबंधन हुआ, लेकिन वह ज्यादा समय नहीं चला और राज्य में राज्यपाल शासन लागू करना पड़ा।

नरेंद्र मोदी सरकार ने क्या किए बदलाव

पिछले साल 5 अगस्त 2019 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने राज्य से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को निरस्त किया तो कई विरोधी तिलमिला गए। मगर कश्मीरी पंडितों के लिए मोदी सरकार के फैसले ने एक मरहम की तरह काम किया जिस पर लंबे समय से पूर्ववर्ती सरकार नमक छिड़कने का काम करती थी

ये सच जरूर है कि जिन्होंने उस कट्टरपंथ की आग में अपनों को जलते-कटते-मरते देखा उनके दर्द सिर्फ़ मोदी सरकार के प्रयासों से नहीं भर जाएँगे। इसलिए सोचिए! क्या अनुच्छेद 370 हटने के बाद भी कश्मीरी पंडित भूल जाएँगे कि देश की तात्कालीन सरकार ने अपने स्वार्थ के लिए किस आग में जलाया कि उन्हें अपने अधिकार वापस पाने के लिए 30 साल तक इंतजार करना पड़ा। इस बीच आखिर उनकी क्यों कोई सुनवाई नहीं हुई? क्यों किसी सरकार ने उनकी माँग को तवज्जो नहीं दी। विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी क्या मोदी सरकार से पहले किसी सरकार को जरूरी मुद्दा नहीं लगी?

वास्तविकता तो यह है कि मोदी सरकार ने साल 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही यह साबित कर दिया था कि कश्मीर में शांति बहाल करना उनके प्रमुख एजेंडो में से एक हैं। अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर के 18 दौरे किए थे। इनमें से 9 दौरे तो साल 2014 में ही किए गए थे। 

उनकी सख्तियों का परिणाम था कि जो पत्थरबाज पहले सड़कों पर बेखौफ सेना पर हमले करते थे उन पर सेना ने नकेल कसनी शुरू कर दी थी। पिछले साल तक के आँकड़े बताते हैं कि साल 2004 से 2014 तक के बीच में जहाँ कश्मीर में हर वर्ष 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएँ सामने आती थी, वहीं मोदी कार्यकाल में इनकी गिनती कम होकर 300 के आस पास रह गई।

मोदी सरकार ने सेना को खुली छूट दी। पड़ोसी मुल्क की नापाक हरकतों को जवाब देने का मौका दिया। उन्होंने ऑपरेशन ऑलआउट चलवाया ताकि आतंकियों का सफाया हो सके।

बता दें कि बीते दिनों आईएएनएस द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि जम्मू कश्मीर में विशेष दर्ज खत्म किए जाने के बाद से स्थानीयों और सुरक्षाबलों के साथ हुई झड़पों में साल 2016 के मुकाबले 2019 में 94 प्रतिशत कम हुई। वहीं पत्थरबाजी भी 70 प्रतिशत कम हुई।

यदि मोदी कार्यकाल के 5 सालों की बात की जाए और यूपीए सरकार से उनकी तुलना की जाए तो पता चलता है कि सुधार किस हद्द तक हुआ है। साल 2004 से 2014 तक 9,739 आतंकी घटनाएँ हुईं। यानी हर साल औसतन 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएँ हुईं। इनमें 4000 आतंकी मारे गए, लेकिन 2000 आम जन की मौत हुई और 1000 से ज्यादा जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। 

वहीं, 2014 से 2019 के बीच 1708 आतंकी घटनाएँ हुईं। इनमें 838 आतंकी मारे गए, लेकिन 138 आम नागरिकों की मौत हुई और 339 जवान शहीद हो गए। पिछले साल तक हर साल औसतन 300 से ज्यादा घटनाएँ हुईं जो पिछले 10 वर्ष के सालाना औसत आँकड़े की तुलना में 1/3 है

बुलंदशहर की चुनावी रैली में भिड़े भीम-AIMIM: दिलशाद पर हाजी यामीन समर्थकों का जानलेवा हमला

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद के काफिले पर हमले की खबर के साथ ही बुलन्दशहर उपचुनाव में AIMIM के सदर विधानसभा प्रत्याशी दिलशाद अहमद पर भी जानलेवा हमले की खबर सामने आई हैं।

जहाँ एक ओर भीम आर्मी के काफिले पर हमले की जानकारी भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने अपने ट्विटर अकाउंट पर दी है तो वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, AIMIM प्रत्याशी दिलशाद अहमद ने आज़ाद समाज पार्टी के प्रत्याशी हाजी यामीन के समर्थकों पर उन पर जानलेवा हमला करने का आरोप लगाया है। हालाँकि बुलंदशहर पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद के इस दावे को झूठ बताया है कि आजाद समाज पार्टी के काफिले पर फायरिंग की गई।

गौरतलब है कि भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने रविवार (अक्टूबर 25, 2020) को बुलंदशहर में अपने उम्मीदवार हाजी यामीन के समर्थन में एक रैली को संबोधित करके आगामी उत्तर प्रदेश उपचुनावों के लिए अपना अभियान शुरू किया।

चंद्रशेखर आजाद का दावा है कि रविवार शाम बुलंदशहर में उनकी पार्टी के काफिले पर गोलियाँ चलाई गईं। आजाद ने ट्वीट में लिखा, “बुलंदशहर चुनावों में विपक्षी दलों ने हमारे उम्मीदवार को भयभीत किया और आज की रैली ने उन्हें चिंतित कर दिया, जिसके कारण मेरे काफिले को निकाल दिया गया। ये चाहते है कि माहौल खराब हो लेकिन हम ऐसा नही होने देंगे।”

बुलंदशहर पुलिस ने इस पर बयान जारी करते हुए कहा है कि आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी और चंद्रशेखर आजाद के काफिले पर फायरिंग और हमले की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन AIMIM प्रत्याशी दिलशाद और आजाद समाज पार्टी प्रत्याशी हाजी यामीन के कार्यकर्ताओं के बीच बुलंदशहर में आपस में गाली-गलौज की सूचना उन्हें मिली थी। पुलिस ने कहा कि पुलिस के मौके पर पहुँचने पर बात संभाल ली गई थी और दोनों पक्ष वहाँ से हट गई थी।

उल्लेखनीय है कि यह उपचुनाव सात सीटों के लिए 3 नवंबर को होने वाले हैं। चंद्रशेखर ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी आजाद समाज पार्टी के नाम के साथ राजनीति में उतरेगी, जबकि भीम आर्मी संगठन के रूप में काम करना जारी रखेगी।