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‘इस जैसे इंसान की फिल्म नहीं देखेंगे’: प्रकाश राज को कास्ट किए जाने के बाद ‘KGF2’ का बॉयकॉट करने अपील

ब्लॉकबस्टर कन्नड़ फिल्म केजीएफ के निर्माताओं ने पिछले हफ्ते घोषणा की थी कि उन्होंने कोरोनोवायरस के कारण रुकी फिल्म के सीक्वल की शूटिंग फिर से शुरू कर दी है।

इस बात की जानकारी ‘केजीएफ चैप्टर 2’ निर्माता विजय किरगंदुर ने ट्विटर के जरिए दी। उन्होंने कहा ‘केजीएफ 2’ की शूटिंग दुबारा से शुरू किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने अभिनेता प्रकाश राज का भी स्वागत किया। निर्माताओं के अनुसार प्रकाश राज फिल्म में एक महत्वपूर्ण किरदार निभाने वाले है।

हमेशा विवाद में घिरे रहने वाले अभिनेता प्रकाश राज को आगामी फ़िल्म KGF-2 में कास्ट करने की जानकारी निर्माताओं द्वारा दिए जाने के बाद कर्नाटक सहित कई जगहों पर इस बात का विरोध दर्ज करते हुए लोगों ने काफी हंगामा किया।

फ़िल्म को सपोर्ट करने और इसे ब्लॉकबस्टर बनाने वाले कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने प्रकाश राज जैसे विवादास्पद अभिनेता को फ़िल्म में कास्ट करने को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए आपत्ति जताई है।

बता दें कि अभिनेता प्रकाश राज वामपंथी विचारधारा गिरोह के जाने-माने शख्शियत है। साथ ही उन्होंने समय-समय पर कन्हैया कुमार, उमर खालिद जैसे वामपंथी तत्वों का खुलकर समर्थन भी किया है। इसको लेकर वे काफी विवाद में रहे हैं।

हिंदू धर्म के प्रति बेहद घृणित विचारों के लिए भी प्रकाश राज को जाना जाता है। पिछले साल प्रकाश राज ने चाइल्ड पोर्न के साथ ‘रामलीला‘ की तुलना की थी। इस पर काफी बवाल हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि इस तरह के आयोजनों से अल्पसंख्यकों के मन में डर पैदा होता है।

सोशल मीडिया यूज़र्स विशेषकर कर्नाटक के रहने वाले (जो प्रकाश राज के तमिल समर्थक विचारों की वजह से उनसे नफ़रत करते है) लोगों ने KGF-2 में प्रकाश राज को कास्ट करने वाले फैसले को जानने के बाद फ़िल्म का बॉयकॉट करने का आह्वान किया है।

प्रकाश राज की उपस्थिति ने प्रशंसकों को निराश कर दिया है। जिस वजह से उन्होंने अब फिल्म नहीं देखने का संकल्प लिया है। एक फैन ने ट्विटर पर यह लिखते हुए फ़िल्म का बहिष्कार किया कि हम इस जैसे इंसान (प्रकाश राज) को फ़िल्म में लेने की वजह से इसे नहीं देखेंगे।

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने फिल्म के निर्देशक प्रशांत नील से ’कायर’ प्रकाश राज को फिल्म केजीएफ-2 से हटाने का अनुरोध किया और ऐसा नहीं करने पर दुष्परिणाम की चेतावनी भी दी।

सोशल मीडिया यूज़र्स ने न केवल प्रकाश राज को शामिल करने के फैसले के खिलाफ विरोध किया, बल्कि संजय दत्त को लेकर भी कहा कि कैसे फिल्म निर्माताओं ने संजय दत्त को फिल्म में कास्ट किया, जिन्हें हथियार अवैध तरीके से रखने के लिए दोषी ठहराया गया था।

कन्नाडिगा सोशल मीडिया यूजर ने, विभिन्न राज्यों के प्रशंसकों से यह कहते हुए फिल्म का बहिष्कार करने का आग्रह किया कि ऐसी फिल्म देखने लायक नहीं है, जिसमें देश विरोधी अभिनेता शामिल है।

फिल्म के मुख्य अभिनेता यश के प्रशंसक नागेश नाम के एक यूजर ने कहा कि वह अभिनेता के प्रशंसक होने के बावजूद फिल्म का बहिष्कार करेंगे। यूजर ने कहा कि धर्म और राष्ट्र सबसे ऊपर हैं। साथ ही प्रकाश राज को हटाने की माँग की।

इससे पहले ऐसी भी खबरें सामने आई थी कि प्रकाश राज ने फ़िल्म में अनुभवी अभिनेता अनंत नाग का स्थान लिया है। अनंत ने केजीएफ के पहले पार्ट में कथाकार की भूमिका निभाई थी। इसने भी फैन्स के अंदर नाराजगी पैदा कर दी थी। इस विवाद के बढ़ने के बाद डायरेक्टर प्रशान्त नील ने बाद में स्पष्ट किया कि प्रकाश राज ने अनंत नाग की जगह नहीं ली थी। राज को एक अलग कैरेक्टर में होंगे।

‘99% स्टार लेते हैं ड्रग्स, नेता-पुलिस भी इस गैंग में शामिल, मेरे फिल्म का हीरो और उसकी बीवी खुलेआम ले रहे थे ड्रग्स’

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में बॉलीवुड में सरेआम इस्तेमाल और सप्लाई किए जा रहे ड्रग्स का एंगल सामने आया है। वहीं कंगना रनौत ने भी इस मामले पर कुछ विस्फोटक खुलासे किए हैं।

रिपब्लिक न्यूज़ चैनल पर अर्नब गोस्वामी को दिए एक इंटरव्यू में कंगना रनौत ने इस बात की पुष्टि की कि बॉलीवुड पार्टियों में ड्रग्स पानी की तरह बहता है। इंडस्ट्री में रहने वाले लोग शुरुआती दौर से ही इंडस्ट्री में आए नए लोगों को ड्रग्स देने का काम करते हैं।

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री ने कहा कि बॉलीवुड सितारों के लिए ड्रग्स का इस्तेमाल करना आम बात है, और नए लोग भी ड्रग्स की शुरुआत करते हैं। उन्होंने दावा किया कि 99 प्रतिशत स्टार ड्रग्स का सेवन करते हैं। ड्रग्स डीलर्स भी सेम हैं। वे उन्हें कोकीन, एलएसडी, एक्सटेसी (ecstasy) आदि ड्रग्स की सप्लाई करते हैं।

कंगना ने कहा कि सब कुछ व्यवस्थित तरीके से कंट्रोल किया जाता है। अभिनेताओं की पत्नियाँ भी इन पार्टियों को होस्ट करती हैं। वहाँ पूरी तरह से अलग माहौल रहता है। आपको ऐसी पार्टियों में केवल ऐसे लोग मिलेंगे, जो ड्रग्स लेते हैं और अय्याशी करते हैं।

कंगना रनौत ने आरोप लगाया, “कई सरकारों ने इस बॉलीवुड-ड्रग माफिया को बढ़ाने में मदद की है। ये लोग भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देते हैं, उनमें से कई बचपन से ड्रग्स लेते हैं और फिर अभिनेता या निर्देशक बन जाते हैं। इनमें से कई अभिनेताओं में से मैंने एक के साथ डेट किया था। वे एक जगह जाते हैं और एक साथ ड्रिंक्स और ड्रग्स लेना शुरू करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “यह सब एक ड्रिंक्स के साथ शुरू होता है, फिर एक रोल और फिर एक गोली, और फिर वे सूंघते (ड्रग्स) हैं। यह सब एक गुप्त संकेत में होता है। ये सभी एक्टर और उनकी पत्नियाँ पार्टी में जाती है और ड्रग्स का सेवन करती है। यह एक तरह की अय्याशी है, जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते। मैंने देखा है कि यह कितना अश्लील हो जाता है और इन ड्रग्स की वजह से पार्टियों का माहौल कंट्रोल के बाहर हो जाता है।”

अभिनेत्री ने खुलासा किया कि राजनेता और पुलिस अधिकारी बॉलीवुड सितारों द्वारा नशीली दवाओं का उपयोग के बारे में जानते हुए भी अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि अभिनेता राजनेताओं के लिए प्रचार करते हैं, इसलिए प्रशासन द्वारा उनकी नशीली दवाओं के दुरुपयोग को अनदेखा किया जाता है।

कंगना रनौत ने कहा कि बॉलीवुड पार्टियों में कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें हर पार्टियों में देखे जाते हैं। यही लोग ड्रग्स की सप्लाई करते हैं। ये आमतौर पर रेस्तरां या क्लब चलाने वाले लोग होते हैं।

कंगना रनौत ने कहा कि जब उन्होंने मुंबई में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया था, तब उन्हें एक करेक्टर आर्टिस्ट द्वारा ड्रग्स दिया गया था। उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ में एक प्रतियोगिता जीतने के बाद, उन्हें एक टीवी विज्ञापन के लिए चुना गया था। जिसके बाद उन्होंने एक एजेंसी को साइन किया। जिन्होंने उन्हें मुंबई भेज दिया।

कंगना जब मुंबई में अपने लिए काम देख रही थीं, तब वो एक महिला के साथ रहती थीं। उस दौरान उस करेक्टर आर्टिस्ट से उनकी दोस्ती हुई थी और जल्द ही वह खुद को उनका (कंगना का) मेंटोर समझने लगा था। कंगना रनौत के अनुसार, वह आदमी उन्हें पार्टियों में ले जाने लगा। वह उनके ड्रिंक्स में ड्रग्स मिलाता था। जिसकी वजह से वे उसके करीब आने लगी थीं। इस किस्से के बाद वह खुद को कंगना का पति मानने लगा था। वह कंगना को चप्पल से मारता था और गाली देता था। कंगना ने कहा वह आदमी अपने जाल में फँसाने के लिए उन्हें ड्रग्स देता था।

कंगना के अनुसार वह आदमी उन्हें बॉलीवुड में रोल दिलाने की बातें करता था, लेकिन जब उन्हें एक बड़ी फिल्म का ऑफर आया तो वह शॉक्ड हो गया। उसके बाद वह शख्स कंगना को इंजेक्शन देने लगा, जिससे कि वो शूटिंग पर न जा सकें।

कंगना ने यह सारी बातें उस फिल्म के डायरेक्टर अनुराग बासु को बताया था। बासु ने उस दौरान कंगना की मदद की थी। मदद के तौर पर उन्हें कई रात ऑफिस में रहने के लिए भी बोला था ताकि वह आदमी कंगना को नुकसान न पहुँचाए।

कंगना रनौत ने एक ऐसी घटना के बारे में बताया, जिसमें उन्होंने एक शीर्ष बॉलीवुड स्टार को एक विदेशी शूटिंग के दौरान ड्रग्स लेते हुए देखा था। फिल्म में कंगना की एक छोटी सी भूमिका थी और शूटिंग लास वेगस में थी। इस वक्त उनकी एंट्री बॉलीवुड के ड्रग माफिया के बीच हुई थी। उन्होंने बताया कि बॉलीवुड स्टार और उनकी पत्नी खुलेआम ड्रग्स का सेवन कर रहे थे।

बाद में वे बॉलीवुड के टॉप स्टार के साथ रिलेशनशिप में आई। उस दौरान उस सुपरास्टर को ड्रग्स ओवरडोज के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। उन्होंने यह भी कहा कि उस स्टार और उसकी फैमिली ने भी उन्हें इस ड्रग्स की दुनिया मे ढकेलने की कोशिश की थी।

कंगना ने आगे कहा कि इंडस्ट्री में बाहरी लोगों का शोषण किया जाता है। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड इंडस्ट्री में कानून व्यवस्था का कोई हस्तक्षेप नहीं है। इंडस्ट्री माफिया या अंडरवर्ल्ड की तरह काम करती है। उन्होंने कहा कि अगर कोई पुलिस के पास मदद माँगने जाता भी है तो उसे मानसिक रूप से पीड़ित करार कर दिया जाता है। यहाँ तक कि उसकी हत्या कर दी जाती है।

अभिनेत्री ने कहा कि अगर वह इस समय मुंबई में होतीं, तो बॉलीवुड में ड्रग माफिया के बारे में बात करने के लिए उन्हें मार दिया जाता। वह लॉकडाउन की शुरुआत से ही अपने मनाली वाले घर में रह रही हैं। “मेरे लिए, यह करो या मरो” वाली सिचुएशन है। उन्होंने कहा,”अगर मैं अपने दुश्मनों को खत्म नहीं करूँगी, तो वे मुझे खत्म कर देंगे, मैं अब नहीं रुकूँगी।”

उन्होंने इंडस्ट्री और ब्रैंड्स को उनके हिंदू-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी स्टैंड के लिए भी लताड़ा। उसने खुलासा किया कि ब्रांड सेलेब्रिटीज़ से राष्ट्रवाद के बारे में बात नहीं करने के लिए कहते हैं। अगर कोई राष्ट्रवाद के बारे में बात करता है तो उन्हें विज्ञापन और फिल्में नहीं मिलती है। उन्होंने यह भी पूछा कि बॉलीवुड ने कभी ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला जैसे विषयों पर फिल्म क्यों नहीं बनाई?

एक लेख में 8 बार बु* शब्द का प्रयोग बताता है कि ‘दि प्रिंट’ का दिमाग कहाँ घुसा हुआ है

पहले ऐसा होता था कि कोई अपनी किसी बात पर पलटने के लिए कम से कम एकाध साल या उससे ज्यादा तो लेता ही था। अब उसका उलटा हो गया है। अब आज के दिन कोई ‘बड़ा’ पत्रकार कुछ बोलता है और दूसरे ही दिन उसे भूल कर उससे अलग बात बोलता है। ताज़ा मामला शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ का है, जिसमें महिलाओं के जननांग से सम्बंधित एक शब्द के जरिए बिहारियों और भोजपुरी भाषियों को नीच दिखाने की कोशिश की गई है।

उदाहरण के रूप में आप रवीश कुमार और राजदीप सरदेसाई को देखिए। ये दोनों पूछते नहीं थकते थे कि कोरोना और चीन सहित कई मुद्दे होने के बावजूद मीडिया में सुशांत मामला क्यों चल रहा है? अब वही राजदीप रिया का इंटरव्यू लेकर दिन-रात इसी मामले पर ट्वीट और शो कर रहे हैं। वहीं रवीश के चैनल एनडीटीवी पर भी सुशांत ही चल रहा है। ऐसे ही शेखर गुप्ता का ‘दि प्रिंट’ एक शब्द के सहारे एक भाषा और प्रदेश को बदनाम करने चला है।

एक ऐसा शब्द, जिसके बारे में दावा किया गया है कि उसे भोजपुरी वाले सर्च करते हैं। पोर्न वेबसाइटों पर हजारों प्रकार के वीडियोज होते हैं और उनके स्पिसिफिक कीवर्ड्स होते हैं, जिनके जरिए उन वीडियोज को देखने वाले उन्हें सर्च करते हैं। ये ज्यादातर अंग्रेजी में होते हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि न्यूज़ वेबसाइट अब वैसे हर कीवर्ड को पकड़ कर उसकी विधाओं को समझाने में लग जाएँ।

अगर वो ऐसा करते हैं तो फिर पोर्न वेबसाइट्स और खबरिया पोर्टलों में अंतर ही क्या रह गया? ठीक ऐसे ही, शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ ने भी एक ऐसा कीवर्ड पकड़ा, जिस पर खबर बना कर इंटरनेट पर उस शब्द की सर्च लिस्ट में भी आया जाए और साथ ही उसे सर्च करने वालों के बहाने एक पूरे समुदाय और प्रदेश को बदनाम किया जाए। इंटरनेट पर रोज ऐसे लाखों कीवर्ड्स सर्च होते हैं, लोग वीडियोज देखते हैं।

‘दि प्रिंट’ ने बार-बार इस शब्द का प्रयोग किया

हम पत्रकारिता में नैतिकता जैसी बात तो कह ही नहीं रहे, हम ‘दि प्रिंट’ की उस धूर्तता के बारे में बताना चाह रहे हैं कि जिस शब्द को कथित तौर पर भोजपुरी वाले विकिपीडिया पर खोज कर पढ़ते थे, वो अब शेखर गुप्ता स्वयं SEO की चालाकी से उन्हें अपने पोर्टल पर उपलब्ध करा रहे हैं। साथ ही, वो नैतिकता की चादर भी ओढ़ रहे हैं कि ‘देखो, भोजपुरी लोग क्या-क्या गंदी और फ्रस्ट्रेशन से भरी चीजें खोज रहे हैं, जबकि बाकी लोग कोविड के बारे में जानना चाहते हैं।’

लेकिन, सवाल तो ये है कि क्या ये इतना महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर जान-बूझकर इतना लम्बा-चौड़ा लेख लिखा जाए। जो लेख उस शब्द को सर्च करने वालों को गाली दे रहा है, उसी लेख में इस शब्द का 8 बार प्रयोग है। आपने किसी प्रोफेसर से बात कर लिया और उसके बयान डाल दिए तो क्या इससे आपकी धूर्तता छिप जाती है? ऐसे मीडिया पोर्टल्स SEO के लिए कुछ भी परोसते हैं और लेख के नाम पर खानापूर्ति करते हैं।

पत्रकारिता में यह तकनीक अब घिस गई है। कुछ लोगों के पास ट्रैफिक को ड्राइव करने के लिए बस सेक्स का ही सहारा बचा है। लल्लनटॉप इस गर्त में बहुत पहले गिर कर, पाठकों की गाली खा-खा कर चर्चा से दूर जा चुका है। ‘दि प्रिंट’ के लेखों पर अगर आप निगाह डालेंगे तो पता चलेगा कि कुछ खास पत्रकारों का मुख्य बीट ही ऐसे ‘सेक्स’ संबंधित लेख हैं, जहाँ लेखक/लेखिका सस्ती लोकप्रियता के लिए, वृहद समाज पर ‘अरे वो तो ये पढ़ रहे हैं, वो ऐसा खोज रहे हैं, उनके दिमाग में ये कचरा ऐसे आता है’ जैसी बातें कहते हुए अपनी यौन कुंठा का वमन करता/करती हैं।

ऐसे लेखों का औचित्य क्या है? इससे किसका भला हो रहा है? क्या इसका औचित्य भोजपुरी बोलने वालों को नीचा दिखाना नहीं है? 1.5% लोगों ने अगर कोई शब्द खोजा तो उसे आधार बना कर, उसे प्रमुखता से, बिना किसी * से छुपाने की कोशिश करते हुए, 8 बार लिखना बताता है कि लेख लिखने के लिए लिख दिया गया है। साथ ही, लिखने वाले ने लगातार एक क्षेत्र के लोगों पर निशाना साधा है, जैसे कि यही 1.5% ‘पिछड़े तबके के लोग’ उस पूरे तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस खास शब्द पर ये पूरा का पूरा लेख है, उसे इसमें बार-बार प्रयोग करने की बजाए उसकी जगह कुछ और भी लिखा जा सकता था। या फिर एक बार लिख कर इशारों में भी समझाया जा सकता था। लेकिन, लेख की मंशा स्पष्ट है कि उसने बार-बार इस शब्द का प्रयोग किया, क्योंकि उसे ऐसे शब्द सर्च करने वालों से ट्रैफिक चाहिए। वैसे भी बिहार और भोजपुरी का मजाक बनाने से आउटरेज नहीं होता, ये सोच कर वो खुद को सेफ समझते होंगे।

बिहार और भोजपुरी को बदनाम करने के लिए एक खास शब्द का बार-बार प्रयोग

जहाँ इसमें हिंदी, पंजाबी और मराठी लोगों द्वारा सर्च किए गए कीवर्ड्स को हाइलाइट करते हुए उसकी तुलना भोजपुरी भाषा के इस शब्द को सर्च किए जाने से करते हुए बताया गया है कि कैसे बाकी प्रदेशों के लोग कितने अच्छे हैं और बिहारी कितने गिरे हुए, वहीं दूसरी तरफ दूसरे और तीसरे नंबर पर इस शब्द के रहने को भी ऐसे बड़ी बात बना कर पेश किया गया है, जैसे ये कोई बहुत बड़ी समस्या हो।

ऐसा कुछ तो है नहीं कि इस पर बात करने से कोई बहुत बड़ी समस्या का समाधान मिल जाएगा? ये तो किसी से छिपा नहीं है कि भोजपुरी गानों और फिल्मों में अश्लीलता का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन ये किसी भाषा की समस्या न होकर उस भाषा की मनोरंजन इंडस्ट्री की समस्या है। ये उनलोगों की समस्या है, जो इससे रुपए बना रहे हैं और इसे प्रचारित कर रहे हैं। लेकिन, असली समस्या पर शेखर गुप्ता के ‘दि प्रिंट’ को बात करनी होती तो इस शब्द को 8 बार नहीं लिखा जाता।

इसके बाद इसी शब्द के सहारे पोर्न देखने, इंटरनेट पर लैंगिक असमानता, गैंगरेप के बाद वीडियो वायरल होने और सेक्स के टैबू होने जैसी ‘बड़ी-बड़ी’ समस्याओं की बात की गई है। जबकि असल में इनमें से किसी का भी इस शब्द को सर्च किए जाने से कोई सम्बन्ध है, ऐसा वो साबित नहीं कर पाया। साथ ही भोजपुरी को ‘अंडरप्रिविलेज्ड’ भाषा करार दिया गया है। इस लेख का उद्देश्य ही है- एक खास भाषा को बदनाम कर ट्रैफिक जुटाना।

₹7 लाख करोड़ के खिलौना मार्केट में हाथ आजमाएँ स्टार्ट-अप, देशी डॉग्स को बनाएँ साथी: ‘मन की बात’ में PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (अगस्त 30, 2020) को अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जरिए देशवासियों को सम्बोधित किया, जिसमें उन्होंने कोरोना वायरस आपदा से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों से लेकर भारत में तकनीक के विस्तार पर बात की। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ के दौरान सुरक्षाबलों के साथ काम कर रहे कुत्तों की भी चर्चा करते हुए उनके योगदानों को सराहा।

पीएम मोदी ने कहा कि आमतौर पर ये समय उत्सव का होता है, जगह-जगह मेले लगते हैं, धार्मिक पूजा-पाठ होते हैं। कोरोना के इस संकट काल में लोगों में उमंग तो है, उत्साह भी है, लेकिन, हम सबको मन को छू जाए, वैसा अनुशासन भी है। उन्होंने कहा कि बहुत एक रूप में देखा जाए तो नागरिकों में दायित्व का एहसास भी है, लोग अपना ध्यान रखते हुए, दूसरों का ध्यान रखते हुए, अपने रोजमर्रा के काम भी कर रहे हैं।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि देश में हो रहे हर आयोजन में जिस तरह का संयम और सादगी इस बार देखी जा रही है, वो अभूतपूर्व है। गणेशोत्सव भी कहीं ऑनलाइन मनाया जा रहा है, तो, ज्यादातर जगहों पर इस बार इकोफ्रेंडली गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। पीएम ने कहा कि बहुत बारीकी से अगर देखेंगे, तो एक बात अवश्य हमारे ध्यान में आयेगी – हमारे पर्व और पर्यावरण। इन दोनों के बीच एक बहुत गहरा नाता रहा है।

बकौल प्रधानमंत्री, जहाँ एक ओर हमारे पर्वों में पर्यावरण और प्रकृति के साथ सहजीवन का सन्देश छिपा होता है तो दूसरी ओर कई सारे पर्व प्रकृति की रक्षा के लिए ही मनाए जाते हैं। जैसे, बिहार के पश्चिमी चंपारण में, सदियों से थारु आदिवासी समाज के लोग 60 घंटे के लॉकडाउन या उनके ही शब्दों में कहें तो ’60 घंटे के बरना’ का पालन करते हैं। प्रकृति की रक्षा के लिये बरना को थारु समाज ने अपनी परंपरा का हिस्सा बना लिया है और सदियों से बनाया है।

उन्होंने कहा कि इस दौरान न कोई गाँव में आता है, न ही कोई अपने घरों से बाहर निकलता है और लोग मानते हैं कि अगर वो बाहर निकले या कोई बाहर से आया, तो उनके आने-जाने से, लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों से, नए पेड़-पौधों को नुकसान हो सकता है। बरना की शुरुआत में भव्य तरीके से हमारे आदिवासी भाई-बहन पूजा-पाठ करते हैं और उसकी समाप्ति पर आदिवासी परम्परा के गीत-संगीत, नृत्य जमकर के उसके कार्यक्रम भी होते हैं।

‘मन की बात’ में केरल की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल ओणम का पर्व भी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। ये पर्व चिनगम महीने में आता है। इस दौरान लोग कुछ नया खरीदते हैं, अपने घरों को सजाते हैं, पूक्क्लम बनाते हैं, ओनम-सादिया का आनंद लेते हैं, तरह-तरह के खेल और प्रतियोगिताएँ भी होती हैं। ओणम की धूम तो, आज, दूर-सुदूर विदेशों तक पहुँची हुई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका हो, यूरोप हो, या खाड़ी देश हों, ओणम का उल्लास आपको हर कहीं मिल जाएगा।

ओणम एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि ओणम हमारी कृषि से जुड़ा हुआ पर्व है। ये हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक नई शुरुआत का समय होता है। किसानों की शक्ति से ही तो हमारा जीवन, हमारा समाज चलता है। हमारे पर्व किसानों के परिश्रम से ही रंग-बिरंगे बनते हैं। पीएम ने कहा कि हमारे अन्नदाता को, किसानों की जीवनदायिनी शक्ति को तो वेदों में भी बहुत गौरवपूर्ण रूप से नमन किया गया है। उन्होंने ऋगवेद के मन्त्र है ‘अन्नानां पतये नमः, क्षेत्राणाम पतये नमः’ की भी चर्चा की।

अर्थात, अन्नदाता को नमन है, किसान को नमन है। पीएम ने कहा कि हमारे किसानों ने कोरोना की इस कठिन परिस्थितियों में भी अपनी ताकत को साबित किया है | हमारे देश में इस बार खरीफ की फसल की बुआई पिछले साल के मुकाबले 7 प्रतिशत ज्यादा हुई है। उन्होंने जानकारी दी कि धान की रुपाई इस बार लगभग 10 प्रतिशत, दालें लगभग 5 प्रतिशत, मोटे अनाज-Coarse Cereals लगभग 3 प्रतिशत, Oilseeds लगभग 13 प्रतिशत, कपास लगभग 3 प्रतिशत ज्यादा बोई गई है। उन्होंने इसके लिए किसानों को धन्यवाद दिया।

पीएम ने ध्यान दिलाया कि कोरोना के इस कालखंड में देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ, कई बार मन में ये भी सवाल आता रहा कि इतने लम्बे समय तक घरों में रहने के कारण, मेरे छोटे-छोटे बाल-मित्रों का समय कैसे बीतता होगा। उन्होंने बताया कि गांधीनगर की चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी जो दुनिया में एक अलग तरह का प्रयोग किया गया है, भारत सरकार के महिला और बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, सूक्ष्म-लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय, इन सभी के साथ मिलकर, हम बच्चों के लिये क्या कर सकते हैं, इस पर मंथन किया, चिंतन किया।

उन्होंने बताया कि उनके लिए ये बहुत सुखद था, लाभकारी भी था क्योंकि एक प्रकार से ये उनके लिए भी कुछ नया जानने का, नया सीखने का अवसर बन गया। उन्होंने बताया कि चिंतन का विषय था- खिलौने और विशेषकर भारतीय खिलौने। इस बात पर मंथन किया गया कि भारत के बच्चों को नए-नए खलौने कैसे मिलें, भारत, Toy Production का बहुत बड़ा हब कैसे बने। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में आगे कहा:

“खिलौने जहाँ एक्टिविटी को बढ़ाने वाले होते हैं, तो खिलौने हमारी आकांक्षाओं को भी उड़ान देते हैं। खिलौने केवल मन ही नहीं बहलाते, खिलौने मन बनाते भी हैं और मकसद गढ़ते भी हैं। मैंने कहीं पढ़ा, कि, खिलौनों के सम्बन्ध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि सबसे अच्छा खिलौना वो होता है जो इन्कम्प्लीट हो। ऐसा खिलौना, जो अधूरा हो, और, बच्चे मिलकर खेल-खेल में उसे पूरा करें। गुरुदेव टैगोर ने कहा था कि जब वो छोटे थे तो खुद की कल्पना से, घर में मिलने वाले सामानों से ही, अपने दोस्तों के साथ, अपने खिलौने और खेल बनाया करते थे। लेकिन, एक दिन बचपन के उन मौज-मस्ती भरे पलों में बड़ों का दखल हो गया। हुआ ये था कि उनका एक साथी, एक बड़ा और सुंदर सा, विदेशी खिलौना लेकर आ गया। खिलौने को लेकर इतराते हुए अब सब साथी का ध्यान खेल से ज्यादा खिलौने पर रह गया।”

“हर किसी के आकर्षण का केंद्र खेल नहीं रहा, खिलौना बन गया। जो बच्चा कल तक सबके साथ खेलता था, सबके साथ रहता था, घुलमिल जाता था, खेल में डूब जाता था, वो अब दूर रहने लगा। एक तरह से बाकी बच्चों से भेद का भाव उसके मन में बैठ गया। महँगे खिलौने में बनाने के लिये भी कुछ नहीं था, सीखने के लिये भी कुछ नहीं था। यानी कि, एक आकर्षक खिलौने ने एक उत्कृष्ठ बच्चे को कहीं दबा दिया, छिपा दिया, मुरझा दिया। इस खिलौने ने धन का, सम्पत्ति का, जरा बड़प्पन का प्रदर्शन कर लिया लेकिन उस बच्चे की क्रिएटिव स्पिरिट को बढ़ने और सँवरने से रोक दिया। खिलौना तो आ गया, पर खेल ख़त्म हो गया और बच्चे का खिलना भी खो गया। इसलिए, गुरुदेव कहते थे, कि, खिलौने ऐसे होने चाहिए जो बच्चे के बचपन को बाहर लाए, उसकी क्रिएटिविटी को सामने लाए।”

“बच्चों के जीवन के अलग-अलग पहलू पर खिलौनों का जो प्रभाव है, इस पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी बहुत ध्यान दिया गया है। खेल-खेल में सीखना, खिलौने बनाना सीखना, खिलौने जहाँ बनते हैं वहाँ की विजिट करना, इन सबको सिलेबस का हिस्सा बनाया गया है। हमारे देश में लोकल खिलौनों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। कई प्रतिभाशाली और कुशल कारीगर हैं, जो अच्छे खिलौने बनाने में महारत रखते हैं। भारत के कुछ क्षेत्र Toy Clusters यानी खिलौनों के केन्द्र के रूप में भी विकसित हो रहे हैं। जैसे, कर्नाटक के रामनगरम में चन्नापटना, आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा में कोंडापल्ली, तमिलनाडु में तंजौर, असम में धुबरी, उत्तर प्रदेश का वाराणसी – कई ऐसे स्थान हैं, कई नाम गिना सकते हैं। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि वैश्विक खिलौना इंडस्ट्री, 7 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक की है। 7 लाख करोड़ रुपयों का इतना बड़ा कारोबार, लेकिन, भारत का हिस्सा उसमें बहुत कम है। अब आप सोचिए कि जिस राष्ट्र के पास इतनी विरासत हो, परम्परा हो, विविधता हो, युवा आबादी हो, क्या खिलौनों के बाजार में उसकी हिस्सेदारी इतनी कम होनी, हमें, अच्छा लगेगा क्या?”

“गृह उद्योग हो, छोटे और लघु उद्योग हो, MSMEs हों, इसके साथ-साथ बड़े उद्योग और निजी उद्यमी भी इसके दायरे में आते हैं। इसे आगे बढ़ाने के लिए देश को मिलकर मेहनत करनी होगी | अब जैसे आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में श्रीमान सी.वी. राजू हैं। उनके गाँव के एति-कोप्पका खिलौने एक समय में बहुत प्रचलित थे। इनकी खासियत ये थी कि ये खिलौने लकड़ी से बनते थे, और दूसरी बात ये कि इन खिलौनों में आपको कहीं कोई एंगल या कोण नहीं मिलता था। ये खिलौने हर तरफ से गोल होते थे, इसलिए, बच्चों को चोट की भी गुंजाइश नहीं होती थी। सी.वी. राजू ने एति-कोप्पका खिलौने के लिये, अब, अपने गाँव के कारीगरों के साथ मिलकर एक तरह से नया अभियान शुरू कर दिया है। मैं अपने स्टार्ट-अप मित्रों को, हमारे नए उद्यमियों से कहता हूँ – Team up for toys… आइए मिलकर खिलौने बनाएँ। अब सभी के लिये लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय है।”

‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने आगे कहा कि भारत एक विशाल देश है, खान-पान में ढेर सारी विविधता है, भारत एक विशाल देश है, खान-पान में ढेर सारी विविधता है। हमारे देश में छह अलग-अलग ऋतुएँ होती हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में वहाँ के मौसम के हिसाब से अलग-अलग चीजें पैदा होती हैं। पीएम ने हर क्षेत्र के मौसम, वहाँ के स्थानीय भोजन और वहाँ पैदा होने वाले अन्न, फल, सब्जियों के अनुसार एक पोषक, न्यूट्रिएंट रिच डाइट प्लान बनाने पर जोर दिया। जैसे, अब जैसे Millets – मोटे अनाज – रागी है, ज्वार है, ये बहुत उपयोगी पोषक आहार हैं। उन्होंने बताया कि एक “भारतीय कृषि कोष’ तैयार किया जा रहा है, इसमें हर एक जिले में क्या-क्या फसल होती है, उनकी न्यूट्रिशन वैल्यू कितनी है, इसकी पूरी जानकारी होगी।

पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा कि हाल ही में हमारे सुरक्षाबलों के दो जांबाज किरदारों की चर्चा हुई, एक है सोफी और दूसरी विदा। सोफी और विदा, भारतीय सेना के श्वान हैं, डॉग्स हैं और उन्हें Chief of Army Staff ‘Commendation Cards’ से सम्मानित किया गया है। पीएम ने बताया कि सोफी और विदा को ये सम्मान इसलिए मिला, क्योंकि इन्होंने अपने देश की रक्षा करते हुए, अपना कर्तव्य बखूबी निभाया है। हमारी सेनाओं में, हमारे सुरक्षाबलों के पास, ऐसे, कितने ही बहादुर श्वान है, डॉग्स हैं जो देश के लिए जीते हैं और देश के लिये अपना बलिदान भी देते हैं।

उन्होंने बताया कि कितने ही बम धमाकों को, कितनी ही आंतकी साजिशों को रोकने में ऐसे डॉग्स ने बहुत अहम् भूमिका निभाई है। एक डॉग बलराम ने 2006 में अमरनाथ यात्रा के रास्ते में, बड़ी मात्र में, गोला-बारूद खोज निकाला था। 2002 में डॉग्स भावना ने IED खोजा था। IED निकालने के दौरान आंतकियों ने विस्फोट कर दिया, और श्वान बलिदान हो गये। दो-तीन वर्ष पहले, छत्तीसगढ़ के बीजापुर में CRPF का sniffer dog ‘Cracker’ भी IED ब्लास्ट में बलिदान हो गया था। पीएम ने बताया कि बीड में रॉकी ने 300 से ज्यादा केसों को सुलझाने में पुलिस की मदद की थी। डॉग्स की Disaster Management और Rescue Missions में भी बहुत बड़ी भूमिका होती हैं।

11 पाकिस्तानी हिंदू विस्थापितों की मौत: ISI का हाथ, इस्लाम कबूल करवाने की साजिश या लोकल माफिया?

जोधपुर में अगस्त 9, 2020 को एक पाकिस्तानी विस्थापित हिन्दू परिवार के 11 लोगों की लाश खेत से मिलने के बाद सनसनी मच गई थी। विस्थापितों की मौत के मामले में अब बड़ा खुलासा हुआ है, जिसमें तीन बहादुर बहनों के संघर्ष की कहानी छिपी है। जहरीले रसायन के सेवन के बाद उनकी मौत हुई थी। विस्थापतों की सामूहिक आत्महत्या के पीछे की जो कहानी, वो काफी चौंकाने वाली है।

जहाँ पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है, वहीं अब जब वो भारत आकर शरण लेते हैं फिर भी उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सिंधियानी तहरीक, सिंध फ्रीडम मूवमेंट सांगड़ इकाई की लक्ष्मी, प्रिया और सुमन की भी यही कहानी है, जो पाकिस्तान में हर अत्याचार को बर्दाश्त करते हुए लड़ती रहीं। उनके माता-पिता, भाई-भाभी और बच्चे, सब शरणार्थी बन कर भारत आ गए।

वो तीन बहनें हैं। तीनों ने पूरे परिवार को भारत भेजने के बाद खुद भी इधर का रुख किया। परिवार को 5 साल का स्थाईवास मिला, जिसके बाद वो राजस्थान के जोधपुर में रहने लगे। लेकिन, एजेंटों और गारंटरों का जंजाल यहाँ उनका इन्तजार कर रहा था, ताकि अपने जाल में फँसा सके। नियम है कि किसी भारतीय को गारंटर बनाया जाता है लेकिन विजिटर वीजा पर आए परिवार ने मज़बूरी में स्थानीय विस्थापितों के ही एक नेता को गारंटर बनाया।

फॉरेनर रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (FRO) बिना गारंटर के स्थाईवास की अनुमति नहीं देता है। इसके बाद परिवार आँगणवा में विस्थापितों की एक बस्ती में रहने लगा। ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित एक एक्सक्लूसिव ख़बर के अनुसार, यहाँ का मुखिया उनकी दोनों भाभियों की तरह इन तीनों बहनों को भी काबू में करना चाहता था। भाभियाँ अपने पतियों के साथ नहीं रहती थीं, इसीलिए उन्हें घर लाने की कवायद शुरू की गई।

तीनों जवान लड़कियों की गूँगे-बहरों के साथ जबरन शादी करा दी गई और उन्हें ऐसे ही रहने को मजबूर किया गया। वो लोग देचू के खेत में बस गए लेकिन वहाँ रहना गैर-क़ानूनी था और स्थाईवास जोधपुर का ही था। जून तक तीनों बहनों और उनके माता-पिता का वीजा भी ख़त्म हो गया। स्थाईवास के लिए फिर आवेदन दिया गया लेकिन गारंटर और मुखिया की नाराजगी के कारण स्थाईवास आगे नहीं बढ़ा।

आखिरकार सिंध की आजादी के लिए लड़ने वाली तीनों बहनों ने परिवार के साथ ही जान दे दी क्योंकि शायद उनके पास और कोई चारा नहीं था और उन्होंने पाकिस्तान लौटने की बजाए मौत को गले लगाना बेहतर समझा। भाभियों से झगड़े के कारण पारिवारिक कलह भी बढ़ गया था। यहाँ रहने पर उन्हें शोषण का शिकार बनाया जाता। भाभियों द्वारा पुलिस केस किए जाने के कारण उन्हें यहाँ की नागरिकता भी नहीं मिलती।

रिश्तेदार का कहना है कि केवलराम की पत्नी धांधीदेवी और रवि की पत्नी शरीफा यहाँ पहले आई थीं लेकिन जब केवलराम व रवि के वृद्ध माता-पिता और बच्चे यहाँ आ गए तो दोनों महिलाओं ने परिवार के साथ रहने से इनकार कर दिया। अंततः बच्चों की कस्टडी के लिए झगड़ा शुरू हो गया। दोनों की पत्नियाँ रिश्ते में मौसी-भांजी हैं। चेतन भील इस बस्ती का मुखिया है, जो 2012 में एक धार्मिक जत्थे के साथ यहाँ आया था।

उसने ही परिवार को पनाह दी थी लेकिन तीनों बहनें यहाँ आ गईं तो फिर विवाद शुरू हो गया। गंगाराम और भागचंद एजेंट्स हैं, जो पाकिस्तान से आए हैं। भागचंद 2000 विस्थापितों को वीजा दिलाने का दावा करता है। सुनील भाटी स्थानीय नेता है, जो गारंटर बना था। चेतन के नाराज होने के बाद वो भी धमकियाँ दे रहा था। आरोप है कि पुलिस ने लक्ष्मी को गिरफ्तार कर के परिवार के साथ दुर्व्यवहार किया।

स्थानीय डीएसपी पर आरोप है कि उन्होंने परिवार को वापस पाकिस्तान भेजने की धमकी दी थी। महिला कॉन्सटेबलों ने भी परिवार के साथ दुर्व्यवहार किया, ये भी आरोप लगे हैं। जोधपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक नवज्योति गोगोई ने स्वीकार किया है कि ये मामला संवेदनशील है और आत्महत्या का है। लक्ष्मी ने मौत से पहले वीडियो बनाया था और डायरी में कुछ बातें लिखी थीं, जिनकी जाँच चल रही है।

पुलिस ने बताया कि लक्ष्मी ने जिन-जिन से बात की थी, उनके रिकार्ड्स खँगाले जाने के साथ-साथ उसने जिन-जिन का नाम लिया है, उन सबसे पूछताछ जारी है। गोगोई ने कहा कि परिवार की पीड़ा के कई एंगल सामने आ रहे हैं। उन्होंने विस्तृत जाँच के बाद दोषियों को चिह्नित कर सजा दिलाने और सिस्टम में सुधार करने का भी आश्वासन दिया है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा।

वहीं ऑपइंडिया ने जब दैनिक भास्कर की इस खबर को लेकर राजस्थान में पाकिस्तानी हिंदू विस्थापितों की मदद करने वाली संस्था ‘निमित्तेकम’ के ओमेंद्र रत्नू से बात की तो उन्होंने इस खबर को ही नकार दिया और कहा कि ये सब मीडिया में झूठ फैलाया जा रहा है। ओमेंद्र ने कहा कि सीएए के तहत भारत सरकार 31,000 विस्थापितों को कोरोना काल में नागरिकता देने वाली थी, ऐसे में ये खबर गलत है।

उन्होंने अपने बयान के पीछे कारण गिनाते हुए कहा कि पाकिस्तान का आईएसआई नहीं चाहता है कि वहाँ से हिन्दू भाग कर भारत आएँ। इसीलिए उनके मन में ये डर बिठाया जा रहा है कि वो भारत में भी सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने बताया कि ऐसी ख़बरों से डर कर पाकिस्तान में कई पीड़ित हिन्दू इस्लाम अपना लेते हैं, इसीलिए मीडिया में ये बातें चलाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत मामलों के कारण परिवार ने आत्महत्या की, जिसे लेकर डर बनाया जा रहा है।

ओमेंद्र ने कहा कि इस घटना का न तो कॉन्ग्रेस से कोई सम्बन्ध है और न ही इसका कोई जिहादी लिंक है। उन्होंने दावा किया कि लक्ष्मी नामक लड़की अपने परिवार को डोमिनेट करना चाहती थी, शिक्षित भी थी, इसीलिए परिवार को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा कि परिवार का एक व्यक्ति ज़िंदा बचा है, जिसके बयान के आधार पर कुछ भी दावा किया जा सकता है। उन्होंने इसे आईएसआई की साजिश करार दिया।

दिल्ली का ‘बदनाम’ रिकॉर्ड अब होगा पुणे के नाम: तेजी से बढ़ रहा कोरोना वायरस, एक दिन में 4000 नए पॉजिटिव केस

महाराष्ट्र के पुणे में कोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। यहाँ की स्थिति इस हद तक बदतर हो गई है कि अब यह भारत में सबसे अधिक कोरोना से प्रभावित शहर बनता जा रहा है। रविवार 30 अगस्त तक के आँकड़ों के मुताबिक पुणे में शनिवार को लगभग 4,000 नए कोविड-19 पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं।

कोरोना वायरस के शुरुआती दौर से सबसे ज्यादा संक्रमण से प्रभावित हुए मुंबई को भी पुणे ने पीछे छोड़ दिया है। अब तक भारत के कुल कोरोना वायरस मामलों में महाराष्ट्र का योगदान 21% से अधिक है। भारत में कोरोनो वायरस के कारण होने वाली कुल मौतों में लगभग 40% मौतें महाराष्ट्र में हुई है। जिसमें सबसे अधिक मुंबई के लोगों की जान इस जानलेवा महामारी के चलते गई है।

पुणे कोरोनो वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित शहर के रूप में उभर रहा है। संभावना है कि पुणे एक या दो दिनों में दिल्ली से आगे निकल जाएगा। दिल्ली में अब तक कुल 1,71,366 कोरोना वायरस पॉजिटिव मामले सामने आए हैं। जबकि पुणे में यह संख्या अभी तक 1,69,448 हो गई है।

चीन के वुहान शहर से फैले इस महामारी ने दुनिया भर में 2.5 करोड़ लोगों को संक्रमित किया है। लगभग 8.4 लाख से अधिक लोग इस महामारी के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं।

4 लोग, 24 दिन की पूछताछ: सुशांत सिंह राजपूत के आखिरी 16 घंटों की गुत्थी के लिए CBI कर रहा अलग ढंग से जाँच-पड़ताल

सुशांत सिंह राजपूत की मौत को ढाई महीने का वक्त बीत चुका है। यह आत्महत्या है या मर्डर? यह गुत्थी सुलझाने के लिए सीबीआई लगातार हर एंगल से जाँच कर रही है। वहीं सीबीआई ने घर में मौजूद सभी लोगों से इस बात का पता लगाया है कि सुशांत की मौत से पहले यानी 13 रात से लेकर 14 जून की दोपहर तक क्या-क्या हुआ।

बता दें कि सीबीआई सुशांत के फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी और एक्टर के स्टाफ में शामिल रहे नीरज, केशव और दीपेश सावंत से इस मामले में लगातार जाँच पड़ताल कर रही है। CBI ने नीरज को 8 दिन, सिद्धार्थ को 7 दिन, दीपेश को 5 दिन और केशव को 4 दिन पूछताछ के लिए बुलाया।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार सीबीआई इस बात का अंदाजा लगा रही है कि अगर सुशांत की हत्या हुई है, तो घर में मौजूद इन चारों लोगों में कोई तो इस साजिश में शामिल होगा या किसी को तो इस बात की जानकारी होगी। वहीं साथ रह रहे लोग घर में आने-जाने वाले सभी शख्स को अच्छे से जानते भी होंगे। इन सभी ने सीबीआई की इन्वेस्टिगेशन में इस बात का खुलासा किया सुशांत की मौत से पहले के कुछ घंटों के पहले क्या-क्या हुआ था।

रिपोर्ट के अनुसार, नीरज 14 जून की सुबह सुशांत के कुत्ते को घूमाने के लिए गया और 8 बजे बाहर से वापस लौटा। जिसके बाद सुशांत ने उससे अपने कमरे से निकल कर ठंडा पानी माँगा था। पानी देते वक्त सुशांत ने स्माइल के साथ नीरज से कहा- “क्या सब ठीक है?” साथ ही घर की साफ सफाई को लेकर भी पूछा कि क्या हॉल साफ हो गया? नीरज ने सुशांत को बताया कि घर की सफाई हो चुकी है। इतनी बात होने के बाद सुशांत वापस कमरे में चले गए। नीरज के मुताबिक सुशांत इस बात का किसी को पता नहीं लगने देते थे कि उनके मन में क्या चल रहा है। न ही वे किसी पर गुस्सा करते थे।

इंडिया टुडे को सूत्रों ने बताया कि सीबीआई की जाँच में दीपेश ने बताया कि सुशांत ने 13 जून की रात को खाना खाने से मना कर दिया था। उन्होंने सिर्फ एक मैंगो शेक पीने की फरमाइश की थी। दीपक ने बताया कि उन्होंने सुशांत को मैंगो शेक दिया और रात करीब 10.30 बजे वो सोने चला गया। दूसरे दिन यानी 14 जून को वो (दीपक) 5.30 सुबह बजे उठ कर अपने डेली रूटीन के काम कर 6.30 बजे सुशांत के कमरे का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा अंदर से बंद नहीं था।

दीपेश ने आगे कहा कि सुशांत पहले से जगे हुए थे। दीपेश के गुड मॉर्निंग बोलने पर उन्होंने उसका जवाब दिया और ब्रेकफास्ट लाने के लिए मना कर दिया। दीपेश के मुताबिक सुशांत का व्यवहार आम दिनों की तरह ही था। कमरे में सुशांत अकेले थे और रोजाना की तरह सिचुएशन था।

वहीं नीरज और केशव ने सीबीआई को बताया कि वे उस दिन सुबह 7 बजे उठे थे। नीरज ने बताया कि सुबह 9.30 बजे केशव ऊपर सुशांत के कमरे में गया और उन्हें अनार का जूस दिया, साथ में नारियल पानी भी दिया। केशव 10.30 बजे दोबारा सुशांत के कमरे में गया था। उसने यह पूछा था कि एक्टर को किसी और चीज की जरूरत तो नहीं और साथ ही ये भी कि लंच में क्या बनाया जाए। उस वक्त सुशांत का कमरा अंदर से बंद था। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था।

इंडिया टुडे को सूत्रों ने बताया कि केशव और नीरज द्वारा दिया गया बयान सीबीआई की पूछताछ में एक जैसा ही निकला। केशव ने जाँचकर्ताओं को बताया, “मैंने सुबह 9-9.15 बजे सुशांत सर को अनार का जूस और नारियल पानी दिया। करीब 10-10.30 बजे मैं फिर से उनके कमरे में गया और पूछा कि लंच के लिए क्या बनाना है? उनका दरवाजा बंद था, जो असामान्य था। बाद में, मैंने सिद्धार्थ सर को सूचित किया कि सुशांत सर दरवाजा नहीं खोल रहे हैं। सिद्धार्थ सर ने दरवाजा खटखटाया और कहा कि यह अंदर से बंद है। सुशांत सर तभी गेट बंद करते थे जब रिया मैडम उनके साथ रहती थीं। लगभग 15 मिनट बाद, सिद्धार्थ सर ने फिर से दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला।”

वहीं नीरज ने सीबीआई को यह भी बताया था कि सुशांत कभी कमरे को बंद नहीं करते थे। सिर्फ रिया चक्रवर्ती के कमरे में मौजूद रहने पर ही वे ऐसा करते थे। काफी देर तक जब सुशांत ने दरवाजा नहीं खोला तो केशव, दीपेश और सिद्धार्थ फिर सीढ़ियों से ऊपर गए और सुशांत के दरवाजे को फिर से खटखटाना शुरू किया। लेकिन कमरे से किसी भी तरह का रिस्पॉन्स नहीं मिल रहा था। नीरज को यह जानकारी दीपेश ने दी थी। सिद्धार्थ ने सुशांत को कई बार फोन भी लगाया। लेकिन उन्होंने फ़ोन भी नहीं उठाया।

नीरज ने जाँचकर्ताओं को बताया कि उन्होंने फिर रूम की एक्स्ट्रा चाबी ढूँढी। लेकिन वो नहीं मिली। इस बात की जनकारी सुशांत की बहन मीतू सिंह को दी गई। उन्होंने कहा कि किसी तरह दरवाजे को खोलने की कोशिश करो। इसके बाद उन्होंने कहा कि वो भी वहाँ पहुँच रही हैं। जिसके बाद सिद्धार्थ ने चाबी बनाने वाले को दरवाजा खोलने के लिए बुलाया।

दोपहर करीब 1.30 बजे चाबी बनाने वाला आया। उसने दरवाजा खोलने के लिए नई चाबी बनानी शुरू की। जिस पर टाइम ज्यादा लगने पर सिद्धार्थ ने चाभी वाले को ताला तोड़ने के लिए कहा। इस काम में लगभग 10 मिनट लगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक सिद्धार्थ ने एजेंसी को बताया, “मैंने सैमुअल मिरांडा (सुशांत के मैनेजर) से भी फोन पर बात की और पूछा कि क्या उनके पास चाबी है। लेकिन सैमुअल ने मना किया। मैंने फिर से मीतू को फोन किया और यह तय किया गया कि चाबी बनाने वाले को बुलाया जाए। मैंने चाबी बनाने वाले का नंबर जानने के लिए बिल्डिंग सिक्योरिटी गार्ड राजू से बात की। मैंने गूगल किया और एक नंबर पाया। मैंने उसे फोन किया और उसने 2000 रुपए माँगे। उसने आकर ताला तोड़ा। मैंने पेमेंट किया और वो तभी वहाँ से चला गया। मैंने उसे यह नहीं बताया कि यह एक्टर सुशांत का घर है।”

सिद्धार्थ सुशांत के रूम के अंदर सबसे पहले जाने वाला शख्स था। नीरज के मुताबिक वह कुछ देर बाद अंदर गया और सुशांत को गले में हरे रंग के कुर्ते के साथ छत के पंखे से लटका पाया। कुर्ता सुशांत का था। नीरज ने सीबीआई को बताया कि इस दौरान वह यह सब देखकर घबरा कर रूम से बाहर निकल गया था।

सिद्धार्थ ने सीबीआई को बताया, “मैंने और दीपेश ने रूम में प्रवेश किया। लाइट बंद थीं और पर्दे ढके हुए थे। मैंने लाइट स्विच ऑन किया और सुशांत को पंखे से लटका हुआ देखकर चौंक गया। मैंने मीतू को फोन किया और बताया। नीरज और केशव तब कमरे के बाहर थे।”

सिद्धार्थ ने कहा, “मैंने एम्बुलेंस के लिए 108 को फोन किया और डॉक्टर के लिए कहा। मैंने उन्हें बताया कि मरीज का नाम सुशांत सिंह राजपूत है। मुझे मीतू का फोन आया और उन्होंने अपने पति से बात कराई, जिन्होंने मुझसे कहा कि मैं बॉडी को नीचे उतारूँ और यह देखूँ कि सुशांत की नब्ज चल रही है या नहीं। मैंने चाकू माँगा और उस कपड़े को काट दिया, जिससे सुशांत लटका हुआ था। मीतू ने कमरे में तभी प्रवेश किया और कहा, “गुलशन, तूने ये क्या किया, बाबू?” ’मैंने सुशांत की साँस लाने की कोशिश की लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। बाद में पुलिस और एम्बुलेंस पहुँची।” सिद्धार्थ ने फिर पुलिस को सुशांत की आत्महत्या के बारे में जानकारी दी। पुलिस भी कुछ देर में वहाँ पहुँच गई थी।

गौरतलब है कि सीबीआई को इन चारों के बयानों में विरोधाभास लगा था, इसीलिए इन्हें इंट्रोगेशन के लिए कई बार बुलाया जा रहा है। और इनके बयान इन कैमरा में दर्ज कर जाँच पड़ताल की जा रही है। सीबीआई को शक है कि इनमें से कोई कुछ बातें छुपा तो नहीं रहा है।

मंदिर में हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को किया क्षतिग्रस्त, आगरा में प्रदर्शन: नई प्रतिमाएँ स्थापित कराएगा प्रशासन

आगरा के एक मंदिर में हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किए जाने का मामला सामने आया है। ये घटना शहर के पालीवाल पार्क में सामने आई, जहाँ एक मंदिर में स्थित मूर्तियों के साथ तोड़फोड़ की गई। मंदिर में प्रतिमाओं को तोड़े जाने की खबर सुनते ही स्थानीय हिन्दुओं में रोष व्याप्त हो गया। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने घटनास्थल पर पहुँच कर विरोध प्रदर्शन किया।

दोनों हिंदूवादी संगठनों ने माँग करते हुए कहा कि मंदिर में जिन प्रतिमाओं को नुकसान पहुँचाया गया है, उन्हें प्रशासन द्वारा तुरंत बदला जाए। हरीपर्वत थाने को इस मामले की सूचना दी गई, जिसके बाद पुलिसकर्मियों ने घटनास्थल पर पहुँच कर लोगों को समझाया-बुझाया। पुलिस ने विरोध कर रहे विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को भी शांत कराया। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि मंदिर में नई प्रतिमाएँ स्थापित की जाएँगी।

बजरंग दल के महानगर गौरक्षा प्रमुख अनुपम पंडित ने इस घटनाक्रम पर अधिक जानकारी देते हुए ‘लाइव हिदुस्तान’ को बताया कि आगरा के उक्त मंदिर में कई धार्मिक कार्यक्रम होते रहे हैं। उन्होंने बताया कि सुबह के समय जब कुछ लोग मंदिर के पास पहुँचे तो उन्होंने पाया कि प्रतिमाओं को किसी ने खंडित कर दिया है। इसके बाद हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता वहाँ पर पहुँचने लगे, जिसके बाद पुलिस भी वहाँ आई।

हिन्दू संगठनों ने कहा कि न सिर्फ प्रतिमाओं को तुरंत बदलवाया जाए बल्कि आरोपितों को ढूँढ कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जाए। पुलिस ने उनकी बातें मान लीं, जिसके बाद हंगामा शांत हुआ। फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है और प्रतिमाओं को बदलवाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। हालाँकि, इस घटना में किन असामाजिक तत्वों का हाथ था- इस सम्बन्ध में अभी तक कुछ भी पता नहीं चल सका है।

बता दें कि आगरा सांप्रदायिक रूप से भी संवेदनशील है। यहाँ पशुओं की अवैध कटाई के मामले में भी हिन्दू संगठनों का विरोध प्रदर्शन जोरों पर है। शहर के मनटोआ में घर के अंदर पशुहत्या चल रही थी, जिस पर अखिल भारत हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता नाराज़ हो गए। उन्होंने मांस से लदी एक गाड़ी पकड़ भी ली। इलाक़े के बबलू कुरैशी पर गोहत्या का आरोप था। लोगों के विरोध के बीच उसने गोमांस को टेम्पो में डाल कर हटाना चाहा।

आदिवासियों को देश के खिलाफ भड़का रहे वामपंथी, पालघर में साधुओं की हत्या के पीछे हिन्दूघृणा: फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी

महाराष्ट्र के पालघर में अप्रैल 2020 में पुलिस के सामने ही एक बड़ी भीड़ ने दो साधुओं और एक ड्राइवर की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस मामले की जाँच के लिए एक स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी का गठन किया गया था। कमिटी ने साधुओं की मॉब लिंचिंग को लेकर चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि इसके पीछे गहरी साजिश थी। साथ ही इस घटना के तार नक्सलियों से भी जुड़ रहे हैं।

बता दें कि उक्त कमिटी में वकील, रिटायर्ड जज और पुलिस अधिकारियों को शामिल किया गया था। अब कमिटी ने कहा है कि पालघर में साधुओं की हत्या के मामले की जाँच सीबीआई और एनआईए करे। कमिटी ने यह भी पाया है कि वहाँ उपस्थित पुलिसकर्मी अगर चाहते तो इस हत्याकांड को रोक सकते थे लेकिन उन्होंने हिंसा की साजिश में शामिल होने का रास्ता चुना। शनिवार (अगस्त 29, 2020) को एक ऑनलाइन कार्यक्रम के जरिए कमिटी ने अपनी रिपोर्ट के कुछ अंश पेश किए।

याद हो कि पालघर में अप्रैल 20, 2020 को 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरी और 35 वर्षीय सुशील गिरी की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी। साथ ही उनके ड्राइवर नीलेश तेलगड़े को भी मार डाला गया था। ये सभी अपने गुरु महंत श्रीरामजी के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जा रहे थे, तभी उन पर हमला किया गया। गढ़चिंचले गाँव में उनकी गाड़ी को भी उपद्रवियों ने पलट दिया था और देखते ही देखते बड़ी भीड़ जमा हो गई थी।

इस घटना के बाद विवेक विचार मंच ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश अंबादास जोशी, संपादक किरण शेलार, पालघर जिले के ऐक्टिविस्ट संतोष जनाठे, रिटायर्ड सहायक पुलिस आयुक्त लक्ष्मण खारपड़े व कुछ वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं की फैक्ट फाइंडिंग टीम बनाई थी। इसने पाया है कि झारखण्ड में पत्थलगड़ी की तर्ज पर ही पालघर में भी आंदोलन चल रहा है। आदिवासियों को वामपंथी भड़का रहे हैं कि वो क़ानून, सरकार और संविधान का सम्मान न करें।

आदिवासियों को वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा भड़काया जा रहा है कि उनके पास अपना संविधान है, जो 100 साल पुराना है और वो भारतीय संविधान के दायरे में नहीं आते हैं। कमिटी ने कुछ वामपंथी नेताओं के बयान और वीडियो जारी कर के बताया है कि किस तरह आदिवासियों को भारत का क़ानून न मानने के लिए भड़काया जा रहा है। साथ ही इन सबके पीछे हिन्दूघृणा भी है, जिसने पालघर में साधुओं की जान ले ली।

‘इंडिया टीवी’ की खबर के अनुसार, फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी ने जानकारी दी है कि वामपंथियों का पूरा जोर इस बात पर है कि आदिवासियों को हिन्दू समाज से अलग होने का एहसास दिलाते हुए उन्हें हिन्दू प्रथाओं का विरोध करने के लिए भड़काया जाए। कोशिश की जा रही है कि उन्हें संवैधानिक व्यवस्था का विरोधी बना कर नक्सल आंदोलन से जोड़ा जाए। 150 पेज की जाँच रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह स्थानीय लोगों के दिमाग में साधुओं और सरकार के प्रति नफरत पैदा की जा रही है।

साथ ही उस क्षेत्र में देश विरोधी गतिविधियों को भी जोर-शोर से चलाए जाने की बात पता चली है। काश्तकारी संगठन, आदिवासी एकता परिषद और भूमि सेना सहित कई संगठनों को इन साजिशों का कर्ताधर्ता बताते हुए कहा गया है कि गाँव में पत्थलगड़ी आंदोलन की तरह संकल्प पारित किया गया और इसमें आदिवासी एकता परिषद का सदस्य भी शामिल हुआ। साथ ही बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं का विरोध करने को भी कहा जा रहा है।

हाल ही में जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी ने साधुओं की हत्या मामले में ये माँग उठाई थी। उनका कहना था कि पालघर में साधुओं की हत्या को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इस मामले में अभी तक न्याय नहीं हो सका है, जिसे लेकर लोगों में गुस्सा है। साधुओं की माँग है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की तरह ही इस मामले की जाँच भी CBI को करनी चाहिए।

गद्दार को खदेड़ कर गोली मारने वाले कन्हाई: वो जो भगत सिंह से भी कम उम्र में फाँसी पर चढ़े, जिनका खुदीराम से है संबंध

मथुरा उत्तर प्रदेश में है और हुगली पश्चिम बंगाल में। जहाँ मथुरा में कन्हैया का जन्म हुआ था, हुगली के चंदननगर में कनाईलाल दत्त (कन्हाई लाल दत्त) जन्मे थे। दोनों का जन्म भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ था। दोनों के सिर्फ नाम व जन्मदिन ही समान नहीं हैं बल्कि कृष्ण की तरह कनाईलाल ने भी अपने लोगों को गुलामी के साम्राज्य से मुक्ति दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी थी। कनाईलाल दत्त ने अँग्रेजों के साथ संघर्ष में सर्वोच्च बलिदान दिया।

अगस्त 30, 1888 को जन्माष्टमी के दिन जन्मे कनाईलाल दत्त अपनी ज़िंदगी के 21 साल भी पूरे नहीं कर सके थे। 20 साल की उम्र में ही क्रूर अँग्रेजों ने उन्हें फाँसी और चढ़ा दिया था। वो 20वीं शताब्दी की शुरुआत के उन क्रांतिकारियों में शामिल थे, जिन्हें अँग्रेजों ने आँख मूँद कर फाँसी पर चढ़ाया। कनाईलाल दत्त को तो अपनी सजा के खिलाफ अपील करने तक का मौका नहीं दिया गया था। उन्होंने भारत माँ के लिए फाँसी को भी गले लगाया।

उनके पिता बॉम्बे में अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। उनकी शुरूआती शिक्षा-दीक्षा बॉम्बे के आर्यन सोसाइटी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हुगली मोहसिन कॉलेज से बीए की परीक्षा दी। कॉलेज के दिनों में ही वो प्रोफेसर चारु चंद्र रॉय के प्रभाव में आकर स्वतंत्रता संग्राम की ओर आकर्षित हो गए थे। 1908 में उन्होंने कोलकाता का क्रान्तिकारी समूह ‘युगांतर’ ज्वाइन कर लिया था।

भारतवर्ष समय-समय पर विदेशी आक्रांताओं का गुलाम बना, उसमें हमारे अपने ही देश के गद्दारों का अहम रोल था। अँग्रेजों के समय भी ऐसे कई गद्दार थे, जिनमें से एक था नरेन्द्रनाथ गोस्वामी। कनाईलाल दत्त की कहानी भी उसी के इर्दगिर्द घूमती है क्योंकि यही वो व्यक्ति था, जिसने 33 क्रांतिकारियों को फाँसी के फंदे पर झुलवाने के लिए सरकारी गवाह बनने का फैसला लिया था। इसे समझने के लिए पूरे घटनाक्रम को जानते हैं।

उस समय कोलकाता का चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट था डगलस किंग्सफोर्ड, जो क्रांतिकारियों से अपनी नफरत के लिए जाना जाता था। वो युवा स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति काफी क्रूर रवैया अपनाता था। स्वदेशी आंदोलनकारियों को वो अमानवीय तरीके से प्रताड़ित करता था। बदले की भावना लिए उनके साथ पेश आता था। उसे पसंद थे तो सिर्फ वही लोग, जो ब्रिटिश साम्राज्य के वफादार थे, उनका कहा मानते थे।

वो ये दौर भी था, जब क्रन्तिकारी न सिर्फ अँग्रेजों को धूल चटाते थे बल्कि कई पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जनता को अँग्रेजों की क्रूरता और भारत के लोगों के शोषण के बारे में अवगत करा कर उनमें क्रांति की ज्वाला भरते रहते थे। उस समय बंगाल में ‘युगांतर’, ‘वन्दे मातरम्’, ‘संध्या’ और ‘शक्ति’ जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन होता था, जिनसे किंग्सफोर्ड को ख़ासी खुन्नस थी। उसने क्रांतिकारियों से बदला लेने की ठान ली।

मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड को मार डालने की योजना बनाई गई, जिसके लिए श्री अरविन्द से भी आशीर्वाद लिया गया। इसके लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को वहाँ भेजा गया। लेकिन, ब्रिटिश सरकार को उनके प्लान की भनक लग गई और इन दोनों के पीछे सीआईडी लगा दी गई। बावजूद इसके ब्रिटिश जासूसों को चकमा देकर ये दोनों मुजफ्फरपुर पहुँच गए और वहाँ कई दिनों तक योजना बनाने के बाद किंग्सफोर्ड पर हमला बोला।

क्रान्तिकारी चाहते थे कि उनके हमलों में किसी निर्दोष की जान न जाए, इसीलिए वो क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों पर हमले के समय भी इस बात का ख्याल रखते थे कि कहीं किसी किसी निर्दोष को नुकसान न पहुँच जाए। अप्रैल 30, 1908 को हमला किया गया लेकिन किंग्सफोर्ड बच गया। खुदीराम बोस पकड़ लिए गए। इसके बाद गुस्साए किंग्सफोर्ड ने बंगाल में क्रांतिकारियों का क्रूर दमन प्रारम्भ किया।

33 क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। उनमें से एक कनाईलाल दत्त भी थे, जिन्हें मई 2, 1908 को गिरफ्तार कर लिया गया। क्रांतिकारियों के प्रेस पर छापा मारा गया। उनकी बम फैक्ट्री को जब्त कर लिया गया। बंगाल और बिहार में हाहाकार मच गया। खुद श्री अरविन्द घोष भी गिरफ्तार कर लिए गए। बंगाल और बिहार में हुई कई छापेमारियों में क्रांतिकारियों के साहित्यों को भी जब्त कर लिया गया।

उन्हीं में से एक था नरेंद्र नाथ गोस्वामी, जिसे क्रांतिकारियों की पूरी योजनाओं और उनके कार्यों की जानकारियाँ थीं। चंदरनगर के श्रीरामपुर के रहने वाले गोस्वामी ने कोर्ट में अपने ही साथियों के बारे में अंग्रेजों को सब कुछ सच-सच बता दिया। एक ट्रेन हमले के मामले में उसने बरिन घोष, शांति घोष उलास्कर दत्त का नाम लिया। ऐसा कर के उसने सारे क्रांतिकरियों के बारे में अंग्रेजों के सामने सब कुछ उगल दिया।

बरिन घोष चिंतित हो गए। उन्होंने जेल से निकलने की योजना बनानी शुरू कर दी। इसी बीच एक पिस्टल जेल में ही किसी तरह मँगाया गया। बरिन ने ये पिस्टल सत्येन्द्रनाथ बोस को दिया लेकिन जेल के हॉस्पिटल में भर्ती होने के कारण उन्होंने इतने बड़े पिस्टल का प्रयोग करने में असमर्थता जताई। इसके बाद एक छोटा पिस्टल आया। बस यहीं कनाईलाल दत्त की एंट्री होती है, जिन्होंने अपने हाथ में वो पिस्टल लिया।

इसके बाद वो जेल में एडमिट हो गए। नरेन्द्रनाथ को पहले अलग जेल में रखा गया था, फिर उसे अलीपुर के जेल में लाया गया, जिसके बाद वो हॉस्पिटल में भर्ती हुआ था। बस यहीं क्रांतिकारियों को मौक़ा मिल गया। सत्येंद्र नाथ और कनाईलाल दत्त ने नरेन्द्रनाथ गोस्वामी पर गोली चलाई। इसके बावजूद वो भागने की कोशिश करता रहा। कनाईलाल दत्त ने उसे खदेड़ा और उसकी पीठ पर गोली मारी। वो मारा गया।

यूँ तो उस पूरे घटनाक्रम में 9 गोलियाँ चलाई गई थीं लेकिन मजिस्ट्रेट के आदेश की कॉपी देखें तो अँग्रेजों ने पाया था कि जो गोली अंत में पीठ से जाते हुए छाती के पास अटक गई थी, जिसने गोस्वामी के स्पाइनल कॉर्ड को चीर दिया था, उसी गोली से उसकी मौत हुई। ये शॉट बड़े वाले पिस्टल से फायर किया गया था। डीएम के सामने खड़े होकर दत्त ने खम ठोक कर कहा कि उन्होंने देश के एक गद्दार को मारा है।

नवंबर 10, 1908 को अलीपुर जेल में ही कनाईलाल दत्त को सुबह के 7 बजे फाँसी पर चढ़ा दिया गया। चारु चंद्र रॉय ने इसे लेकर एक किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया था कि कनाईलाल फाँसी की सजा से 1 दिन पहले मुस्कुरा रहे थे, जिस पर ब्रिटीश जेल के वार्डन ने उनसे कहा कि आज तुम हँस रहे हो लेकिन कल देखना, तुम जब फाँसी पर चढ़ने जाओगे तब तुम्हारे होंठों से मुस्कुराहट गायब हो जाएगी। कनाईलाल ने कुछ जवाब नहीं दिया।

अगले दिन जब कनाईलाल को फाँसी के फंदे तक ले जाया जा रहा था, तब वो वार्डन भी वहीं पर था। भारत माँ के लिए बलिदान होने से पहले कनाईलाल ने मुसकुराते हुए वार्डन से पूछा – “मैं कैसा दिख रहा हूँ?” वार्डन के पास कोई जवाब नहीं था। बाद में उस वार्डन ने चारु से कहा कि उसने कनाईलाल को फाँसी देकर एक बहुत बड़ा पाप किया है, अगर देश भर में ऐसे 100 लोग हो जाएँ तो क्रांतिकारियों का उद्देश्य पूरा हो जाए।