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कॉन्ग्रेस के सस्ते ध्रुव राठी (जो स्वंय ही सस्ता है) बन कर रह गए हैं राहुल गाँधी!

वो वकील भी है, वो डॉक्टर भी है, वो जज भी है, वो पुलिस भी है। वो विषाणु विशेषज्ञ से लेकर आरबीआई का प्रबंधक भी है। नासा वाले किसी भी सैटेलाईट को अन्तरिक्ष भेजने से पहले उसके यूट्यूब वीडियो देखने लगे हैं। उसका नाम लेने भर से वो आपको ‘एक्स्पोज़’ कर सकता है। यहाँ आप ध्रुव राठी लिखिए और वहाँ आपको एक्स्पोज करता एक सनसनीखेज यूट्यूब वीडियो ‘वायरल’ हो पड़ता है।

यह डेढ़ जीबी दैनिक सस्ते इन्टरनेट का ही कमाल है कि जिस पार्टी के युवराज को अपने पार्टी के भीतर ही आए दिन खिसक रहे विधायकों की कानों कान खबर नहीं लगती, वह भी ट्विटर पर भावुक संगीत के साथ भारत के पड़ोसियों के साथ सम्बन्धों, विदेश नीति और फॉरेन पॉलिसी पर ज्ञान दे रहे हैं।

बहुत से बड़े और लम्बे वीडियो सेशंस के बाद राहुल गाँधी अब एक बेहद छोटा और महज साढ़े तीन मिनट का एक वीडियो लेकर आए हैं। इस वीडियो में उनका मुख्य मर्म यह है कि चीन ने गलवान घाटी में खुरापात करने के लिए यह समय क्यों चुना?

इसका जवाब बेहद साधारण सा है – जवाब यह है कि शायद चीन भी जानता था कि ऐसा अवसर उन्हें पहले कभी नहीं मिल पाता, जब भारत में ही रहकर विपक्ष में बैठकर बूढ़ा होता, इस देश में सबसे लम्बे समय तक राज करता सत्ता का लालची परिवार अपने ही देश के खिलाफ जाकर चीन के लिए समर्थन दे रहा होता है? ऐसे में, यह तो वास्तव में चीन के लिए आपदा को अवसर में बदलने वाली बात थी।

सबसे हास्यास्पद बात यह है कि आए दिन नया भावुक वीडियो बनाकर देश में रोजगार पर ऐसा व्यक्ति चिंता व्यक्त करता नजर आता है, जिसके अपने ही परिवार में आने वाली अभी कई पुस्तों को सिर्फ इस कारण रोजगार की चिंता नहीं करनी होगी क्योंकि उसके नाम के साथ किसी ना किसी तरह से ‘गाँधी’ या फिर ‘नेहरू’ जुड़ा हुआ है। संयोगवश, जिनके नाम में गाँधी नहीं भी जुड़े हों, उन्हें जोड़ लेने के लिए इस परिवार को किसी बाहरी व्यक्ति की सलाह लेने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

पड़ोसी मुल्कों के साथ भारत की विदेश नीति: मोदी सरकार के 6 साल ‘बनाम’ UPA

विदेशों से सम्बन्ध पर राहुल गाँधी का कहना है कि एक समय था जब अमेरिका, रूस और यूरोपीय देशों से भारत के अच्छे सम्बन्ध थे। लेकिन वह ये बताना भूल गए कि जिन अच्छे विदेशी सम्बन्धों की वो बात कर रहे हैं, वो मोदी सरकार के दोनों कार्यकालों से पहले शायद ही इतने गहरे रहे हों।

यह सिर्फ मोदी-ट्रम्प रिश्तों तक सीमित नहीं बल्कि इजराइल और रूस के साथ बढ़ते रक्षा सौदों और सामरिक सम्बन्धों से लेकर ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाले ट्रेड डील्स से ही पता चलता है, जिन्हें लेकर पिछली यूपीए सरकार पीछे हट गई थी।

चीन के व्यवहार के साथ ही जिन विदेशी सम्बन्धों का रोना राहुल गाँधी अपने इस तीन मिनट के वीडियो में रो रहे हैं, उन्हें इसकी गर्त में जाकर देखना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जब चीन डोकलाम सीमा में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था, तब कहीं कॉन्ग्रेस चीन की कम्युनिस्ट सरकार से अपने पारिवारिक राजीव गाँधी फाउंडेशन के लिए ‘वित्तीय सहायता’ लेने में व्यस्त तो नहीं थी?

या फिर राहुल गाँधी यह संदेश देना चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस की विदेश नीतियों का आधार ही यही है कि चीन हमारी सेना का निरंतर दमन करते जाएँ और परदे के पीछे गाँधी परिवार उसी देश से वित्तीय सहायता की भीख माँगता रहे?

नेपाल की कम्युनिस्ट सत्ता का इस्तेमाल चीन हमेशा से ही पड़ोसी मुल्कों के साथ अपने शत्रुतापूर्ण व्यवहार के लिए इस्तेमाल करता आया है। इसके बाद नेपाल की सत्ता में जब भी भारत विरोधी भावनाओं ने पैर पसारा है, उसकी बुनियाद 1986-87 में राजीव गाँधी रख चुके हैं, जब इन्हीं राहुल गाँधी के पिता ने देश का प्रधानमंत्री रहते हुए नेपाल की तीन महीने की नाकाबंदी कर दी थी।

विदेश नीति में कॉन्ग्रेस कितनी कुशल रही है इस बात का सबूत यही है कि नेपाल की इस नाकाबंदी के दौरान भारत से नेपाल पानी, नमक और तेल तक नहीं जा सका था। नेपाल को भारत कभी अपने भरोसे में ला ही नहीं सका था।

वर्ष 1971 से 1975 के बीच इंदिरा गाँधी ने बांग्‍लादेश के मुद्दे पर नेपाल को भरोसे में नहीं लिया था। जब सिक्किम भारत का हिस्सा बना, तब भी यही हुआ। भारत के चीन के 1962 युद्ध के दौरान जवाहर लाल नेहरू ने भी यही किया। यही वजह है कि नेपाल को आज भी लगता है कि भारत उसके साथ अन्‍याय करता है। नतीजा यह हुआ कि समय के साथ एकमात्र पूर्ण हिन्दू देश नेपाल भी धर्म निरपेक्षता का आडम्बर करने लगा।

इन समबन्धों में प्राण फूंकने की कोशिश एक बार फिर गत 6 सालों में पीएम मोदी ने की थी, नेपाल में आपदा और भूकम्प के दौरान भारत से हर सम्भव मदद भेजी गईं, और ये सभी प्रयास कांग्रेस के प्रपंच की भेंट चढ़ते रहे।

भारत के पड़ोसी देश, मॉरिशस, मालदीव के लिए कोरोना वायरस की मह्मारी के दौरान ही भारत द्वारा उन्हें हर सम्भव मदद भेजी जा रही हैं। भारत एयर इंडिया के विशेष विमान से मेडिकल इक्विपमेंट्स, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन टेबलेट, विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और अन्य राहत सामग्री मॉरीशस को भेज चुका है। सिर्फ मॉरिशस ही नहीं बल्कि मेडागास्कर, मालदीव्स, सेशेल्स, कोमोरोस आदि देशों को भी कोरोना वायरस के दौरान मदद के तौर पर भारत की ओर से दवाइयाँ भेजी गई हैं।

अपने सामुद्रिक पड़ोसी देश मालदीव के साथ भारत के सम्बन्धों में पीएम मोदी ने दुसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही सकारात्मक संकेत देते हुए ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति का विस्तार किया। दोबारा प्रधानमंत्री निर्वाचित होने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा पर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव द्वारा अपने सर्वोच्च सम्मान ‘रूल ऑफ निशान इज्जुद्दीन’ से सम्मानित किया गया था। इसी तरह अरब देशों ने भी पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि को सम्मानित करने का काम किया है।

अपने सामरिक हितों के लिए चीन भारत के सबसे करीबी देश श्रीलंका हम्बनटोटा बंदरगाह को विकसित करना चाहता है। श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह का नियंत्रण चीन को देने के सवाल पर भारत में पहले से ही चिताएँ थीं। 2008-09 में चीन के दख़ल की कोशिशें शुरू हुई थीं, और तब से भारत इसे लेकर चिंतित ही रहा है, यह कहने कि आवश्यकता नहीं है कि तब भारत में UPA की सरकार थी और हमारे पास एक रोबोट प्रधानमंत्री हुआ करते थे।

यह सरकार भारत के हितों के लिए कितनी सजग थी, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्रीलंका ने भारत को 2008 में इस बंदरगाह की पेशकश की थी लेकिन उस समय कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार, जिसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे, का पहला कार्यकाल खत्म होने के कगार पर था। तब भारत सरकार ने कहा था कि भारत 1.5 अरब डॉलर का निवेश करने की स्थिति में नहीं है।

इसके अलावा, इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है की एक परिवार के निजी स्वार्थ और देश के पहले प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत छवि के लिए यह देश अक्साई चिन की सीमा से लेकर कश्मीर की जनता तक का विश्वास खोता रहा है और यह सब समेटने के प्रयास भी इन्हीं छह सालों में किए गए हैं, जिन्हें लेकर राहुल गाँधी रोज किसी ना किसी तरह से प्रासंगिक बने हुए हैं। नेहरू ने तो जनता को यह भनक तक नहीं लगने दी थी कि देश की सीमा के एक बड़े हिस्से पर चीन अतिक्रमण कर चुका है।

लेकिन तथ्यों का यदि गाँधी परिवार से अगर कोई नाता होता तो आज वो राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा के हेयरस्टाइल में उनका भविष्य नहीं तलाश रही होती। फिलहाल राहुल गाँधी को अपने अगले वीडियो में एक ऐसा ग्राफ भी शेयर करना चाहिए, जिसमें दर्शाया गया हो कि किस तरह से किसी इंसान के अपने पिता से मिलते-जुलते हेयर स्टाइल और उस व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की सम्भावना के बीच व्युत्क्रम सम्बन्ध होता है।

पीएम इन वेटिंग का ‘पीएम मटेरियल’ से ध्रुव राठी बनने तक का सफ़र

कहाँ एक ओर तमाम पीआर एजेंसी की ताकत एक राहुल गाँधी को राजीव गाँधी तक नहीं बना पा रही है, और कहाँ राहुल गाँधी हैं कि खुद एक प्रायोजित एजेंडाबाज ध्रुव राठी होने का सपना मन में पालकर चल रहे हैं। ध्रुव राठी होने और राहुल गाँधी होने के लिए एकमात्र आवश्यकता तर्कों से सख्त बगावत की प्रवृत्ति है, और यह स्वाभाविक हुनर इन दोनों ही हस्तियों में मौजूद है।

अब शायद ही कोई ऐसा विषय रह गया हो, जिस पर उस विषय के जानकारों से ज्यादा जानकारी राहुल गाँधी ने ना दे दी हो। अगर इसी स्ट्राइक रेट के साथ राहुल गाँधी सभी घरेलू, देशी, विदेशी, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, आकाशगंगा, ब्लैकहोल्स के अंदरूनी मामलों पर भावुक संगीत के साथ वीडियो बनाते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब ‘रोजगार’ पर वीडियो बनाते-बनाते किसी दिन राहुल गाँधी खुद ध्रुव राठी का ही रोजगार ना खा बैठें।

टेलीविजन पर आने वाले ‘टेलेंट हंट’ प्रोग्राम्स, रियेलिटी शो और राहुल गाँधी के वीडियो में एक बात कॉमन है कि दोनों में ही माहौल बनाने के लिए बेहद भावुक और अप्रासंगिक संगीत की धुन बजाई जाती हैं। हालाँकि, दोनों ही जगह ‘टेलेंट खोजना’ और उसके लिए फिर ‘माहौल बनाना’, ये दोनों भी मिलती-जुलती चीजें ही हैं।

कोरोना वायरस की आपदा को अवसर में बदलने के लिए राहुल गाँधी शुरू से ही यत्न करते नजर आ रहे हैं। ऐसा करने के लिए उन्होंने अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, टीवी, सिनेमा से लेकर किसी आकाशगंगा में छुपे एलियंस और इटली की विलुप्त पशु-पक्षियों की प्रजातियों तक से भी बात कर ली है। हालाँकि, इतने सब के बीच भी वो आज तक स्वयं से बात कर थोड़ा सा आत्मचिंतन करने की फुर्सत नहीं निकाल सके हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के सरगना मुफ्ती नूर वली महसूद को घोषित किया ‘वैश्विक आतंकवादी’

आतंकवाद पर बड़ी चोट करते हुए संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक स्तर पर इसके विरुद्ध कदम उठाया है। संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान के आतंकी मुफ़्ती नूर वली महसूद (Mufti Noor Wali Mehsud) को वैश्विक स्तर का आतंकवादी घोषित कर दिया है। आतंकवाद के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के इस कदम को एक बड़ी कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है।  

संयुक्त राज्य सुरक्षा परिषद् 1267 अलक़ायदा प्रतिबन्ध समिति ने अपनी आईएसआईएल और और अलक़ायदा प्रतिबंध सूची में नूर वली महसूद का नाम शामिल किया है। पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन के इस नेता को अनुवर्ती 2368 (2017) के पैराग्राफ 2 और 4 के तहत सूची का हिस्सा बनाया गया है।  

दुनिया के कई देशों सहित अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले की प्रशंसा की है। अमेरिका के स्टेट विभाग ने इस मामले पर ट्वीट करके प्रतिक्रिया दी है। ट्वीट में लिखा था, “यह ख़बर स्वागत करने योग्य है कि संयुक्त राष्ट्र ने तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान के नेता मुफ़्ती नूर वली महसूद को वैश्विक स्तर का आतंकवादी करार दिया है। यह संगठन पाकिस्तान में हुए तमाम बड़े आतंकवादी हमलों के लिए ज़िम्मेदार है। पिछले साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने सितम्बर महीने के दौरान वली महसूद को आतंकवादी घोषित किया था।” 

तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान ऐसा संगठन है जिसने पाकिस्तान के भीतर पिछले कुछ समय में कई बड़े आतंकवादी हमले अंजाम दिए हैं। इस संगठन ने पाकिस्तान में कई आत्मघाती हमले भी करवाए हैं जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गँवाई है। जून 2018 के दौरान वली महसूद, तहरीक-ए-तालिबान के नेता मुल्ला फजलुल्लाह की मौत के बाद संगठन का नेता बन गया था। उसने बीते कुछ समय में अपने नेतृत्व में पाकिस्तान के भीतर कई बड़े आतंकवादी हमले कराए हैं।    

पहले CM गहलोत ने किया बहुमत का दावा, अब सुरजेवाला ‘ऑडियो ड्रामा’ के जरिए बीजेपी पर लगा रहे आरोप: मामला गड़बड़ है?

राजस्थान की सियासत में खींचतान का दौर अभी तक जारी है। राजस्थान कॉन्ग्रेस के दो दिग्गज नेताओं के बीच शुरू हुआ विवाद फिलहाल दूर-दूर तक ख़त्म होता नज़र नहीं आ रहा है।  इस विवाद में अब एक ऑडियो क्लिप सामने आया है जिसे आधार बना कर कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर विधायकों को खरीदने का आरोप लगाया है।  

जयपुर में हुई प्रेस वार्ता के दौरान कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा भाजपा के केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, भाजपा से संबंधित व्यक्ति संजय जैन, कॉन्ग्रेस विधायक भँवरलाल शर्मा के साथ मिल कर यह योजना तैयार कर रहे हैं। वायरल हो रहे ऑडियो के आधार पर रणदीप सुरजेवाला ने यह भी आरोप लगाया है कि गजेन्द्र सिंह शेखावत, भँवरलाल शर्मा के साथ बैठक में उन्हें अपनी तरफ लेकर आने की योजना बना रहे हैं।  

केंद्रीय मंत्री शेखावत और कॉन्ग्रेस विधायक भँवरलाल शर्मा के बीच हुई बातचीत को रणदीप सुरजेवाला ने टिप्पणी की। सुरजेवाला ने बताया, “भँवरलाल ने कहा उनके पास संख्या नहीं है, आखिर वह कितने समय तक विधायकों को होटल में रख सकते हैं?” प्रेस वार्ता के वीडियो में ठीक 8वें मिनट की शुरुआत में सुरजेवाला ने कहा कि भँवरलाल के मुताबिक़ गहलोत सरकार के पास विधायकों की संख्या नहीं है।  

जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दावा किया था कि उनके पास विधायकों का पर्याप्त संख्या बल है। जबकि ऑडियो क्लिप को लेकर प्रेस वार्ता में सुरजेवाला ने जितना कुछ कहा उसके आधार पर आधार पर ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि गहलोत सरकार के पास संख्या बल है। ऑडियो क्लिप के आधार पर भाजपा को विधायक खरीदने का आरोपित साबित करते हुए सुरजेवाला ने यह भी दावा किया कि केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के विरुद्ध एसओजी जाँच होनी चाहिए। साथ ही सरकार अस्थिर करने की कोशिश के चलते उन्हें गिरफ्तार भी किया जाना चाहिए। इसके अलावा सुरजेवाला का यह भी कहना था कि इस विधायक खरीदने की इस योजना पर पिछले एक महीने से काम हो रहा था।  

एक समाचार समूह में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ गजेन्द्र सिंह और संजय जैन के बीच बातचीत के कुल 3 ऑडियो सामने आए थे। जिस ऑडियो में लगाए गए आरोपों के आधार पर 30 विधायकों को खरीदने की बात हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक़ यह समझौता पहले ही हो गया था और दिल्ली में सब कुछ तय हुआ। इन ऑडियो की पुष्टि करते हुए समाचार समूह भास्कर ने कहा कुल तीन ऑडियो थे, दो राजस्थानी में और एक हिंदी-अंग्रेज़ी में। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि ऑडियो में एक व्यक्ति 30 विधायक खरीदने की बात कर रहा है, साथ ही उसने कहा जल्द ही यह लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। बातचीत से इस बात का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है कि उनसे जुड़े हुए लोग दिल्ली में मौजूद हैं।  

ऑडियो में जिस व्यक्ति को गजेन्द्र सिंह शेखावत बताया जा रहा है, उन्होंने कहा, “कोई भी 8-10 दिनों तक इंतज़ार नहीं कर सकता है। जितना जल्दी से जल्दी हो सके लोग आएँ और आधिकारिक तौर पर जुड़ें। ऑडियो में हुई बातचीत के आधार पर यह आरोप भी लगाया गया है कि बातचीत करने वाले लोगों से जुड़े दिल्ली में मौजूद लोगों ने इसकी पहली किस्त भी ले ली है। संभावित ऑडियो में दो व्यक्ति बात कर रहे हैं और बातचीत से इतना स्पष्ट है कि वह विधायक खरीदने की योजना बना रहे हैं।  

वहीं इस मामले पर कॉन्ग्रेस विधायक भँवरलाल शर्मा का कहना है कि ऑडियो फर्ज़ी है। उनके मुताबिक़ अशोक गहलोत सचिन पायलट के मुद्दे पर और बहुमत खोने को लेकर चिंता में हैं। भँवरलाल के मुताबिक अशोक गहलोत के ओएसडी ने यह ऑडियो विधायकों पर दबाव बनाने के लिए साझा किया है। वहीं सचिन पायलट के कुछ समर्थकों का कहना है कि यह कॉन्ग्रेस की तरफ से किए गए ‘स्टंट’ के अलावा कुछ और नहीं है।  

ठीक ऐसे ही कॉन्ग्रेस ने साल 2018 के दौरान कर्नाटक में ऑडियो जारी किया था। उस दौरान भी कॉन्ग्रेस ने अपने ही नेताओं पर आरोप लगाया कि वह भाजपा से संपर्क में हैं। इसके अलावा वह भाजपा की सरकार बनाने की योजना में शामिल हैं। जिसके बाद कॉन्ग्रेस विधायक शिवराम हेब्बर ने उस ऑडियो को फर्ज़ी बताया था और संयोग से पहले भी ऑडियो की संख्या 3 ही थी। उस ऑडियो क्लिप को आधार बनाते हुए कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर विधायक खरीदने का आरोप लगाया था।  

बीते दिन राजस्थान सरकार के ओएसडी ने एक ऑडियो साझा किया है, ऑडियो क्लिप सामने आने के बाद ऐसा दावा किया जा रहा है कि केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह जयपुर, संजय जैन नाम के व्यक्ति के ज़रिए विधायक भँवरलाल शर्मा के संपर्क में आए थे। यह ऑडियो राजस्थान के एक स्थानीय समाचार चैनल में भी यह ऑडियो चलाया जा चुका है।

वहीं दूसरी तरफ आज ही के दिन उच्च न्यायालय में सचिन पायलट और उनके साथ कुल 18 बागी विधायकों की याचिका पर सुनवाई भी होनी हैl बीते दिन यह सुनवाई टल गई थी, दरअसल राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष ने सचिन पायलट समेत कई विधायकों को अयोग्यता की सूचना जारी कर दी थी। इस आदेश के विरोध सचिन पायलट और कई विधायक उच्च न्यायालय चले गए थे, इस याचिका पर आज सुनवाई होनी है।

सोमवार के दिन सचिन पायलट पर कार्रवाई करते हुए उन्हें उप मुख्यमंत्री के साथ साथ पार्टी के अन्य पदों से भी मुक्त कर दिया गया था। कॉन्ग्रेस का आरोप था कि सचिन भाजपा से संपर्क में हैं, जिस पर सचिन ने सफाई देते हुए कहा था कि वह भाजपा में शामिल नहीं होंगे। इन बातों के इर्द-गिर्द पूरे राजस्थान की राजनीति में उतार चढ़ाव का दौर जारी है।  

गुजरात: मदरसे में 4 साल तक रेप करता रहा मौलाना, शादी के बाद पति के कहने पर किया केस, गिरफ्तार

गुजरात के कच्छ जिले में एक मदरसा शिक्षक मौलाना समसुद्दीन हाजी सुलेमान जाट को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है कि इस मदरसा शिक्षक ने चार साल तक एक छात्रा के साथ कथित रूप से बलात्कार किया था।

19 साल की बलात्कार पीड़िता की हाल ही में शादी हुई थी। उसके पति ने ही लड़की को आरोपित मौलाना के खिलाफ बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता की शारीरिक जाँच में यौन उत्पीड़न के सबूत मिले हैं। पुलिस ने आरोपित मदरसा शिक्षक समसुद्दीन हाजी सुलेमान को गिरफ्तार कर लिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के कच्छ जिले के नखतराणा तालुका के अंतर्गत नारा पुलिस स्टेशन में इस मदरसा शिक्षक मौलाना समसुद्दीन हाजी सुलेमान जाट के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी।

इस शिकायत में, पीड़िता ने कहा कि जब वह 15 साल की थी, तो उसे उर्दू और अरबी सीखने के लिए मदरसे में भेजा गया था।

अपने साथ हुए दुष्कर्म के बारे में बताते हुए, पीड़ित लड़की ने कहा कि 2015 में एक दिन, आरोपित मौलाना ने उसे कपड़े धोने के लिए दिए और क्लास खत्म होने के बाद उसे बाथरूम भेज दिया।

लड़की ने अपनी शिकायत में कहा, “मौलाना तभी पीछे से आया और उसने मेरे साथ बलात्कार किया। उसने मुझे धमकी भी दी कि वह इस घटना के बारे में कुछ भी न बताए अन्यथा वह मेरे चरित्र पर ही सवालिया निशान लगा देगा।”

इसके बाद मौलाना ने उसे जान से मारने और बलात्कार का वीडियो लीक करने की धमकी देकर चार साल तक प्रताड़ित किया।

पिछले साल जून में इसी तरह की एक अन्य घटना में, उत्तर प्रदेश में कानपुर के नौबस्ता इलाके में एक नाबालिग छात्रा से बलात्कार के आरोप में एक मदरसा शिक्षक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। पीड़ित अवध विकास हंसपुरम में एक मदरसे में छात्र था। बाद में, एक चिकित्सा परीक्षा में छात्र के बलात्कार की पुष्टि हुई। फोरेंसिक जाँच के लिए पुलिस ने मौलवी के कपड़े भी जब्त किए थे।

13 साल की बच्ची को गोद लेकर ढाई साल तक रेप करता रहा ‘अब्बू’: गर्भपात के लिए सहयोगियों को बताया परिजन, लाया गया भोपाल

भोपाल में नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के मुख्य आरोपित प्यारे मियाँ को एसआईटी कश्मीर से गिरफ्तार कर भोपाल ले आई है, वह पिछले चार दिन से फरार था। 68 साल के प्यारे मियाँ का दामन और इतिहास, दोनों ही दागदार हैं। प्यारे मियाँ ने बेटी के रूप में गोद ली गई 13 साल की बच्ची से भोपाल और इंदौर में दुष्कर्म किया था।

जाँच में सामने आया है कि प्यारे मियाँ का रैकेट नाबालिग बच्चियों को फँसाकर रसूखदारों के सामने पेश करता था। इस रैकेट में फँसाई गईं लड़कियाँ प्यारे मियाँ को ‘अब्बू’ कहकर बुलाती थीं।

इस मामले में प्यारे मियाँ से पहले दो महिलाओं सहित चार लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें महिला दलाल स्वीटी विश्वकर्मा (21), उवैस, अनस और राबिया भी शामिल हैं। उबेज और अनस मुख्य आरोपित प्यारे मियाँ के रिश्तेदार हैं। एक पीड़िता की दादी को भी गिरफ्तार किया गया है।

नाबालिग बच्चियों को प्यारे मियाँ से मिलवाने के आरोप ने पुलिस ने एक और महिला को गिरफ्तार किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस महिला का नाम गुलशन है, जो कि प्यारे मियाँ की दूर की रिश्तेदार है। प्यारे मियाँ उसे सबके सामने ‘बहू’ कहकर बुलाता था।

पुलिस का कहना है कि प्यारे मियाँ पैसों का लालच देकर और लड़कियों के रहने का खर्चा उठाने के बदले उनका बलात्कार करता था। अभी तक सात बच्चियाँ प्यारे मियाँ के कारनामों को उजागर कर चुकी हैं। यह मामला तीन-चार दिन पहले ही सामने आया था, लेकिन इस रैकेट का मुखिया प्यारे मियाँ अभी तक फरार चल रहा था।

प्यारे मियाँ के ड्राइवर के भाई उबेज ने भी किया था बच्ची से दुष्कर्म

आरोपित प्यारे मियाँ के ड्राइवर और रिश्तेदार अनस के भाई उबेज ने भी बच्ची से ज्यादती की थी। इंदौर में बच्ची के गर्भवती होने पर उसका गर्भपात भोपाल के शाहजहांनाबाद क्षेत्र के एक अस्पताल में कराया गया।

गर्भपात के दौरान उसे परिजन के रूप में अस्पताल में प्यारे मियाँ की ही एक सहयोगी 21 वर्षीय स्वीटी विश्वकर्मा मौजूद रही। चाइल्ड लाइन और कोहेफिजा पुलिस को प्यारे मियाँ की इन तमाम कारस्तानियों का पता उसकी हैवानियत की शिकार हुई 16 वर्षीय किशोरी के बयानों से हुआ है। फिलहाल उसे कई नाबालिगों के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

16 वर्षीय पीड़िता के बयानों से यह तथ्य भी सामने आया है कि प्यारे मियाँ ने उसे और उसकी माँ को जान से मारने की धमकी भी दी थी। इसी भय के कारण प्यारे मियाँ के चंगुल से आजाद होने के 10 माह बाद भी पीड़िता बच्ची और उसकी माँ ने इस बारे में पुलिस से शिकायत नहीं की।

बच्ची की माँ का कहना है कि बच्ची की नानी ने प्यारे मियाँ के भाई से दूसरी शादी की थी। उन्होंने 13 साल की बेटी को पढ़ाई और अच्छी परवरिश के लिए करीब तीन साल पहले प्यारे मियाँ को गोद दिया था। प्यारे मियाँ ने उसे इंदौर स्थित फ्लैट में एक अन्य बच्ची के साथ करीब ढाई साल तक रखा।

पीड़िता की माँ के अनुसार, गत सितंबर माह में ही उनकी बच्ची ने फोन पर उसके साथ हुए उत्पीड़न की जानकारी दी थी। इसके बाद वह बच्ची को अपने घर ले आई थी। लेकिन इसके कुछ समय बाद प्यारे मियाँ द्वारा पीड़िता और उसके माँ-बाप पर बच्ची को वापस उसे सौंपने के लिए धमकाया जाने लगा। यहाँ तक कि विरोध करने पर प्यारे मियाँ ने गुंडे भेजकर पीड़िता के माँ-बाप की पिटाई भी करवाई।

पीड़िता के पिता ऑटो चालक हैं। उनका कहना है कि प्यारे मियाँ और उसके गुंडों से तंग आकर आखिर में उन्हें अपना मकान बेचना पड़ा और उससे छुपकर गुमनामी की जिन्दगी जीने पर मजबूर होना पड़ा।

मध्य प्रदेश पुलिस ने प्यारे मियाँ के भोपाल और इंदौर स्थित ठिकानों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। इसमें पता चला है कि राज्य शासन ने उसे एक सरकारी बंगला भी दिया था जिसे खाली करवा लिया गया है। अब सभी लोग इस बात को लेकर आश्चर्य में हैं कि आखिर उसे सरकारी आवास मिला ही कैसे था?

प्यारे मियाँ के तमाम अवैध निर्माण और बाकी काले कारनामों पर प्रशासन जाँच कर रहा है। पुलिस शहर में उसके अवैध रूप से कब्जा किए गए शादी हॉल और कुछ मकानों को भी ढहा चुकी है। बाकी मकानों को ढहाने की प्रक्रिया जारी है।

कुलगाम मुठभेड़ में जैश के पाकिस्तानी कमांडर सहित तीन आतंकियों को सुरक्षाबलों ने किया ढेर, सेना के 3 जवान जख्मी

आज सुबह जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच हुई मुठभेड़ में तीन आतंकवादी मारे गए हैं। यह मुठभेड़ दक्षिण कश्मीर स्थित कुलगाम जिले के नागनाड़ चिम्मर क्षेत्र में हुई। इस दौरान तीन आतंकवादी मारे गए और सेना के तीन जवान घायल हुए हैं। इस बात की आशंका है कि इलाके में और आतंकवादी छिपे हो सकते हैं।  

सेना की तरफ से बड़े पैमाने पर खोजबीन अभियान जारी है। ख़बरों के मुताबिक़ इलाके में 3 से 4 आतंकवादी छिपे होने की उम्मीद है इसलिए सेना अपने मोर्चे पर सतर्क है। सेना ने घाटी के इस क्षेत्र में आज सुबह ही अपना ऑपरेशन शुरू कर दिया था जिसके चलते यह मुठभेड़ हुई। हालाँकि, अभी तक सभी आतंकियों की पहचान नहीं हुई है।  

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने बताया कि कुलगाम मुठभेड़ में मारे गए तीन आतंकियों में एक जैश ए मोहम्मद का पाकिस्तानी कमांडर भी है। यह पाकिस्तानी आतंकी आईईडी विशेषज्ञ था और बीते 2 माह के दौरान चार बार मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों के चंगुल से बच निकलने में कामयाब रहा था।

सेना को मिली जानकारी के मुताबिक़ दक्षिण कश्मीर स्थित कुलगाम जिले के नागनाड़ क्षेत्र में कई आतंकवादी छिपे थे। सेना ने पहले उनसे आत्मसमर्पण कराने का प्रयास किया लेकिन जवाब में आतंकियों ने गोलीबारी कर दी। जिसके बाद सेना ने जवाबी कार्रवाई की और उसमें 3 आतंकवादी मारे गए। सेना ने इलाके के लोगों कुछ समय तक घरों के भीतर रहने का ही आदेश दिया है। सेना को इस ऑपरेशन के दौरान उन आतंकवादियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक भी मिले हैं।  

इस जानकारी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आतंकवादी किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फिराक में थे। लेकिन सेना की सक्रियता के चलते ऐसा नहीं हो पाया, केवल इस महीने के भीतर ही भारतीय सेना ने घाटी में 14 आतंकवादियों को मार गिराया है। हाल ही में 13 जुलाई के दिन अनंतनाग के श्रीगुफ़वाड़ा क्षेत्र में जैश-ए-मोहम्मद के 2 आतंकी मारे गए थे। सेना ने मालबाग़ (श्रीनगर), अर्राह (श्रीनगर), गोसू (पुलवामा), नौगाम (कुपवाड़ा), सोपोर (बारामूला), श्रीगुफ़वाड़ा (अनंतनाग) और नागनाड़ चिम्मर (कुलगाम) इन इलाकों में आतंकवादियों को मार गिराया था।  

गुना: पूर्व BSP पार्षद, भूमाफिया पति का 30 साल से है सरकारी भूमि पर कब्ज़ा, कार्रवाई पर पहले भी हो चुका है जीने-मरने का ड्रामा

मध्य प्रदेश के गुना में दलित परिवार पर पुलिस द्वारा लाठी चलाने वाले वीडियो में मीडिया की बड़ी भूमिका सामने आ रही है। यानी, मीडिया ने सिर्फ उस पहलू को दिखाया है, जहाँ पुलिस इस दंपति पर लाठियाँ बरसा रही है, जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि इससे पहले राजू के परिवार द्वारा पुलिस के साथ की गई हाथापाई का कहीं जिक्र तक नहीं है।

पुलिस और अधिकारियों पर शासन द्वारा जल्दबाजी में और बिना इस विवादित जमीन का इतिहास देखे ही जल्दबाजी में फैसला ले लिया गया। दरअसल, जिस जमीन को लेकर यह वीडियो सामने आया, वह वर्षों से विवादित है और इस विवाद का कारण एक BSP लीडर नागकन्या है, जिसने कि इस पूरे प्रकरण को दूर से ही देखा और राजू अहिरवार और उसके परिवार को ही मुख्य चेहरा बनाकर बचती रही।

शहर से लगी 50 करोड़ की बेशकीमती जमीन पर 30 साल से बसपा की पूर्व पार्षद नागकन्या और उसके भूमाफ़िया पति गब्बू पारदी का कब्‍जा है। हैरानी की बात है कि BSP प्रमुख मायावती ने भी इस घटना को दलितों पर अत्याचार बताया है और कहा है कि भाजपा और कॉन्ग्रेस मिलकर दलितों के खिलाफ अत्याचार करते हैं।

विवादित जमीन, भू-माफ़िया और बसपा कनेक्शन

मध्य प्रदेश के गुना जिले में जिस जमीन से कब्जा हटाने को लेकर पुलिस और दलित परिवार के बीच हाथापाई की घटना हुई, वह वास्तव में एक सरकारी जमीन है। लगभग 50 करोड़ रुपए कीमत की इस 45 बीघा जमीन, जो कि शासन ने कॉलेज निर्माण के लिए आरक्षित की है, पर पिछले 30 वर्षों से बसपा की पूर्व पार्षद नागकन्या और उनके पति गब्बू पारदी ने कब्जा कर रखा है।

वर्ष 2009-13 के बीच गुना के वार्ड 23 से नागकन्या बहुजन समाज पार्टी (BSP) की पार्षद रही हैं। पुलिस द्वारा कब्जा हटाने के लिए की गई पिटाई के बाद शासन द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई में हटाए गए गुना के कलेक्टर एस विश्वनाथन का कहना है कि नागकन्या का पति गब्बू पारदी भू-माफिया की श्रेणी में आता है, जो कि हमेशा ही विवाद के समय मौके से गायब हो जाता है।

गुना के पूर्व कलेक्टर एस विश्वनाथ का कहना है गब्बू पारदी के नाम पर सरकारी रिकॉर्ड में 80 बीघा से अधिक जमीन है। दो से तीन बीघा में उसका आलीशान आवास बना हुआ है। और अब वह तकरीबन 50 करोड़ रुपए कीमत की इस सरकारी जमीन को कब्जाने के फेर में था।

इस जमीन के विवादित होने के चलते दो साल नागकन्या और गब्बू पारदी ने फसल की बोआई के लिए राजू अहिरवार को इसकी जिम्मेदारी दी थी। सत्ता में मजबूत पकड़ होने के चलते बसपा नेता नागकन्या के चंगुल से इस जगह को मुक्त कराने में प्रशासन को भी लंबे समय से समस्या का सामना करना पड़ रहा था। और यह पहली बार नहीं था, जब प्रशासन की टीम वहाँ अवैध कब्जा हटाने पहुँची हो।

मंगलवार (जुलाई 14, 2020) को जब पुलिस और प्रशासन की टीम ने इस भूमि पर पहुँचकर एक बार फिर कब्जा हटाने की शुरुआत की तो विवाद हो गया। इस कार्रवाई में अवैध कब्जाधारियों के इतिहास को सामने लाने के बजाए मीडिया द्वारा पुलिस और प्रशासन को ही विलेन साबित कर दिया गया।

लेकिन इससे पहले भी दो बार इस विवादित जमीन से प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाया गया था। शहर की एसडीएम शिवानी गर्ग के नेतृत्व में पिछले दिसंबर में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई थी।

उस दौरान भी इस प्रकरण को लेकर भारी हंगामा हुआ था। कब्जाधारी महिलाओं ने एक महिला आरक्षक से मारपीट की थी लेकिन उसका वीडियो बनाकार सोशल मीडिया पर वायरल नहीं किया गया।

अतिक्रमण हटाए जाने की प्रक्रिया के दौरान अतिक्रमणकारी गब्बू पारदी की पत्नी और बसपा नेता नागकन्या ने 7-8 माह के बच्चे को जमीन पर पटकने की कोशिश की थी, जिसे महिला अधिकारी शिवानी गर्ग ने तत्परता दिखाते हुए अपनी गोद में पकड़ लिया और एक अनहोनी होने से बचाया।

एसडीएम शिवानी गर्ग न केवल इस घटना को रोका बल्कि उक्त जमीन को पारदी परिवार से मुक्त करा कर संबंधित विभाग को सौंप दिया था। तब, कलेक्टर गाइड लाइन के अनुसार, इस जमीन की कीमत करीब 20 करोड़ रुपए आँकी गई थी।

इस दौरान पुलिस ने हंगामा करने वाले गब्बू पारदी, नागकन्या सहित उसके परिवार के 8 लोगों को गिरफ्तार किया है। लेकिन ऊँची राजनीतिक पकड़ वाले पारदी समुदाय की धमकियों से प्रशासन भी सहम गया था।

इसके बाद एसडीएम ने खुद जेसीबी चलाई और फसल को नष्ट करना शुरू कर दिया। इसके बाद 4 जेसीबी मशीनों से अवैध रूप से कब्जाई गई जमीन पर फसल को नष्ट कर दिया और जमीन के बीच जेसीबी से खोदकर सीमा भी तय कर दी।

जिसके बाद आधी जमीन पर कॉलेज निर्माण कार्य शुरू हुआ था। अब इसे विभाग की लापरवाही ही कहा जा सकता है कि दिसंबर से जुलाई तक, 7 माह गुजर जाने के बाद भी यह निर्माण कार्य शुरू नहीं हो सका था और दोबारा इस पर कब्जाधारियों द्वारा फसल बो दी गई।

पारदी समुदाय के भारी नाटक के बीच अधिकारियों द्वारा कड़ाके की ठंड में इस जगह पर सफाई और कब्जा हटाने का काम तत्परता से भी किया गया। वह जमीन न्यायाधीश आवास और सरकारी कालेज के लिए आवंटित थी।

यहाँ 12 करोड़ की लागत से एक्सीलेंस कॉलेज बनाया जाना है, लेकिन अतिक्रमण की वजह से काम शुरू नहीं हो सका। पारदी समुदाय तब भी प्रशासन को इसे उन्हें वापस सौंप देने की दलील देता रहा।

सबसे हालिया प्रकरण में जिस राजू अहिरवार की पुलिस द्वारा पिटाई का मामला सामने आया है, उसके भाई का कहना है कि उनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है और वो सभी भाई बटाई पर जमीन लेकर ही परिवार पाल रहे हैं। करीब दो साल पहले उनका गब्बू पारदी से संपर्क हुआ था, जिसके बाद यह जमीन उन्हें बटाई पर मिली थी।

दुर्भाग्यवश कीटनाशक पीना, अपने नवजात बच्चे को जमीन पर पटकना और प्रशासन के साथ हाथापाई की घटनाएँ मीडिया की सुर्ख़ियों से गायब हैं। मीडिया ऐसा कर के इस पूरे किस्से में भू-माफियाओं के प्रवक्ता की तरह पेश आया है, जबकि हम सभी इस घटना में मीडिया के बनाए नैरेटिव पर प्रशासन की कार्रवाई को अमानवीय और दरिंदगी बताते आए हैं।

बसपा प्रमुख मायावती ने गुना की इस घटना को लेकर एक के बाद एक ट्वीट करते हुए कई सवाल किए हैं। मायावती ने कहा कि एक ओर तो भाजपा और इसकी सरकार दलितों को बसाने का ढिंढोरा पीटती है।

दलितों की शुभचिंतक बसपा प्रमुख ने सवाल किया है कि यही पहले कॉन्ग्रेस के शासन में हुआ करता था तो फिर दोनों सरकारों में क्या अंतर है।

जबकि इस पूरी घटना में भूमाफियाओं और कब्जाधारियों के बसपा सम्बन्ध के सामने आने से एकमात्र सवाल बसपा प्रमुख से सिर्फ यह किया जाना चाहिए कि सरकारें कोई भी हों, किस्सा किसी भी राज्य का क्यों न हो? लेकिन बसपा कार्यकर्ता और उनकी कार्यशैली में गुंडावाद और भूमाफिया होना पहली आवश्यकता क्यों है?

AMU ‘हिन्दू छात्रा’ को ‘पीतल का हिजाब’ पहनाने की बात कर रहा था रहबर दानिश, अब FIR होने पर माँग रहा माफी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की एक ‘हिन्दू छात्रा’ की शिकायत के बाद रहबर दानिश नाम के AMU छात्र पर पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। रहबर पर आरोप है कि उसने छात्रा को लड़कियों पर गलत असर डालने के नाम पर लगातार प्रताड़ित किया और धमकियाँ दी। महिला आयोग ने इस संज्ञान लेकर आगे कार्रवाई की बात कही है।

ऑपइंडिया ने इस मामले में उस छात्रा से संपर्क किया। छात्रा ने हमसे बात करते हुए इस बात की पुष्टि की। उसने बताया कि मामले में एफआईआर दर्ज हो गई है। अब पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही है।

छात्रा ने ये भी बताया कि जब उसने उस लड़के के बर्ताव पर पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। तब उस लड़के ने खुद उससे संपर्क किया और माफी माँगने लगा। छात्रा के अनुसार, उसे पक्का तो नहीं मालूम मगर लड़का उससे बात करते हुए डिप्रेशन में लग रहा था। जिसे सुनकर उसने उससे लिखित में माफी माँगी।

छात्रा बताती है कि कॉल पर दानिश ने उसे बताया कि उसे और उसके परिवार वालों को धमकियाँ मिल रही हैं। कोई उसकी माँ और बहन के साथ बलात्कार की बातें कह रहा है।

हैरानी की बात है कि शिकायत दर्ज होने के बाद जिस रहबर नाम के युवक का हृदय परिवर्तन लड़कियों के प्रति हुआ और वह गिड़गिड़ाकर माफी माँगने लगा। वही रहबर छात्रा को पीतल का हिजाब पहनाने की बातें तक कर चुका है।

छात्रा ही इस बात को कहती है कि लॉकडाउन के बाद यूनिवर्सिटी खुलने पर उसे पीतल का हिजाब पहनाने की बात कहने वाला व्यक्ति अब उससे माफी माँग रहा है। लेकिन किसे क्या मालूम है कि कब क्या हो जाएगा? छात्रा के अनुसार, उसके परिवार वाले इस मामले में उसके साथ खड़े हुए हैं और उसका समर्थन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले इसी छात्रा ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि कैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्याल के हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों को खुद को ढँकने के लिए मजबूर किया जाता है और महिलाओं को उनके कपड़ों के आधार पर कैसे ऑब्जेक्टिफाइड किया जाता है। छात्रा के इस पोस्ट के बाद दानिश और उसके बाकी साथी उस पर हमलावर हो गए और अपमानजनक और भद्दी भद्दी-भद्दी गालियाँ देने लगे। जिसका छात्रा ने स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए शिकायत दर्ज कराई।

उसने लिखा कि उसके पोस्ट के बाद एएमयू के मुस्लिम छात्रों द्वारा लागातार हमला किया जा रहा था। उसके पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए छात्रों ने उसे धमकी दी थी कि जब लॉकडाउन के बाद फिर से विश्वविद्यालय खुलेगा, तो उसे “पीतल से बना हिजाब” पहनने के लिए मजबूर किया जाएगा।

लड़की ऑपइंडिया से बात करते हुए यह भी कहती है कि उसे इन लोगों ने तब भी टारगेट किया था जब उसने सीएए/एनआरसी के समर्थन में बोला। लेकिन तब उसे ऐसा नहीं लगा कि एफआईआर करनी चाहिए। मगर अब उसने इस मामले में पुलिस तक बात पहुँचाने का निर्णय ले लिया।

बिंदी का सरोकार भारतीय पृष्ठभूमि से है: ‘लोगो’ हटाने से पहले ‘स्कॉच ब्राइट’ ये तो बताएँ ये रिग्रेसिव कैसे हुई?

हिंदुओं की वेशभूषा और उनकी संस्कृति से जुड़े चिह्नों को लेकर अक्सर सवाल जवाब होता रहता है। एक पूरा तबका इस विषय को विचार-विमर्श योग्य मानता है। कभी घूँघट पर सवाल उठाया जाता है तो कभी सिंदूर पर। हर बार तर्क-कुतर्क से यह साबित करने की कोशिश होती है कि हिंदुओं की पारंपरिक मान्यताएँ आखिर कितनी खोखली हैं।

अब इसी क्रम में इस बार निशाना बिंदी पर साधा गया है। शृंगार के दौरान बिंदी की महत्ता क्या होती है। इसे भारतीय नारियाँ अच्छे से जानती है। लेकिन उनके लिए एक प्रॉडक्ट स्कॉच ब्राइट बनाने वाली कंपनी के मार्केटिंग हेड इसे ‘Regressive’ अर्थात पिछड़ा हुआ मानते हैं और कार्तिक श्रीनिवासन नामक युवक के बिना सिर-पैर के सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि वे जल्द ही स्कॉच ब्राइट से उस ‘लोगो’ को हटाएँगे जिसके माथे पर बिंदी है।

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बात सिर्फ अपने प्रॉडक्ट से महिला के माथे पर बिंदी वाले ‘लोगो’ से बिंदी हटाने की नहीं है। बल्कि बिंदी को रिग्रेसिव मानने की है। बात भारतीय नारी की उस पहचान को नकारने की है जिसे आज पूरा विश्व स्वीकार चुका है। 

आप अक्सर ऐसी तस्वीरें देखते होंगे जिसमें विदेशी महिलाएँ भारतीय लिबास में नजर आती है और खुद को सम्पूर्ण भारतीय शृंगार के साथ दर्शाने के लिए वो अपने माथे पर बिंदी जरूर लगाती हैं। इसके अलावा अगर भारत की बात की जाए तो केरल को ही उदहारण के तौर पर लेती हूँ, जहाँ वामपंथ के पैर भी सबसे ज्यादा क्षेत्र में फैले हुए और वहाँ के साक्षरता दर भी सबसे अधिक है। लेकिन केरल जैसे वामपंथ के गढ़ में ही वहाँ की महिलाओं के स्थानीय लिबास में माथे पर बिंदी एक बेहद सामान्य बात है।

इसके बाद भारत के पिछड़े गाँवों से लेकर अत्याधुनिक तकनीक से लबरेज शहरों तक में यदि कुछ एक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो स्त्रियाँ भारतीय पहनावे के साथ बिंदी लगाना कभी नहीं भूलतीं। बिंदी के बिना तो सम्पूर्ण शृंगार ही अधूरा लगने लगता है। एक छोटी सी बिंदी सुने माथे को रौशन कर देती है।

यानी इस बात में कोई संदेह नहीं है कि माथे पर बिंदी भारत में महिलाओं के पारंपरिक शृंगार की न सिर्फ पहचान है बल्कि अभिन्न हिस्सा भी। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि बिंदी को आखिर कोई रिग्रेसिव कैसे कह सकता है? क्या एक मार्केटिंग हेड के पद पर बैठे व्यक्ति को ये भी नहीं मालूम कि जिस चिह्न को वो रिग्रेसिव या रुढिवादी बता रहा है वो उसके उपभोक्ताओं की पृष्ठभूमि का ही हिस्सा है।

अमूमन माना जाता है कि कोई भी उत्पाद बेचने से पहले किसी भी छोटे व्यापारी या फिर बिजनेसमैन को अपने उपभोक्ता से जुड़ी कुछ बातें ध्यान में अवश्य रखनी चाहिए। आर्थिक पहलू से लेकर सांस्कृतिक पहलू उसमें ये सब ज़रूरी बातें शामिल होनी चाहिए। फिर आखिर इतनी बड़ी कंपनी और उसका मार्केटिंग हेड इस प्रकार से बिना सोचे-समझे किसी मूढ़ जैसी टिप्पणी कैसे कर सकता है? क्या स्कॉच ब्राइट का मार्केटिंग हेड इस बात से अनभिज्ञ है कि उनकी बहुत बड़ी उपभोक्ताएँ भारतीय महिलाएँ भी है, जिनकी सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाएँ बिंदी से जुड़ी है।

कत्थक से लेकर कत्थककली और कुचिपुड़ी से लेकर मणिपुरी तक क्या किसी नृत्य विधा में आपने भारतीय नारी को बिना बिंदी के देखा है? शायद कभी नहीं, क्योंकि ये भारतीय शृंगार की पहचान है। क्या ये महिलाएँ इन नृत्य विधाओं का प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिग्रेसिव लगती हैं?

Indian Classical Dance Forms – EMOM – Kids Virtual Mother

आपने कभी सोचा है क्या कि एक ओर जहाँ बिंदी और सिंदूर को लेकर एक तय तबका इतनी बहस कर पा रहा है। वहीं पर नाइकी जैसी कंपनी स्पोर्ट्स क्षेत्र में भी मुस्लिम लड़कियों के लिए भी हिजाब बतौर ब्रांड या विकल्प क्यों उतार रही है? उसे आजादी का प्रतिबिंब क्यों बता रही है? शायद नहीं। क्योंकि हमें यह स्पेस ही नहीं दिया गया है कि हम किसी समुदाय विशेष या कुछ और मजहबों में प्रचलित कुरीतियों या उनसे जुड़े किसी चिह्न पर आवाज बुलंद कर सकें या उसपर सवाल उठा सकें। लेकिन, आज ये माहौल जरूर बना दिया गया है कि हम घूँघट को बंदिशों का अंजाम बताएँ और माथे की बिंदी को रिग्रेसिव।

आज इन उदाहरणों से हम किसी के कंपनी के ‘लोगो’ बदलने के अधिकारों या उनकी बदलाव की स्वेच्छा पर अपने सवाल नहीं खड़े कर रहे हैं। लेकिन ये जरूर पूछ रहे हैं कि क्या जिस कंपनी ने जेंडर स्टीरियोटाइप की आड़ में पूछे गए कार्तिक के अनर्गल प्रश्न पर इतना बड़ा फैसला लिया। वो अपना ‘लोगो’ बदलने से पहले बता सकती है कि बिंदी रिग्रेसिव कैसे है?

आज इस मामले के तूल पकड़ने के बाद कई लोगों ने स्कॉच ब्राइट नामक उत्पाद बनाने वाली कंपनी 3M को आड़े हाथों लिया है। वकालत में पीएचडी कर रही मधुबंती चटर्जी ने ट्वीट कर इस मामले से जुड़ी खबर को अपनी बिंदी वाली फोटो के साथ पोस्ट करके लिखा है, “मैं लॉ में मास्टर कर चुकी हूँ। अब पीएचडी कर रही हूँ। मैंने लॉ प्रैक्टिस की है और मेरे अंदर एक इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कंपनी में 37 ऑफिस स्टॉफ हैं। मैनेजर और अन्य कर्मचारी मेरे अंतर्गत काम करते हैं? क्या मैं रिग्रेसिव बैकग्राउंड से लगती हूँ? मैं अपनी बिंदी वाली तस्वीर भी लगा रही हूँ।”

भाई तारू सिंह: केश के बदले खोपड़ी उतरवाने वाला वो सिख… जिसने अंतिम साँस तक इस्लाम नहीं कबूला

गुरुगोविंद जी ने कहा था कि सिख की पहली पहचान उसके केश होते हैं। इसलिए सिखों को अपने केश नहीं कटवाने चाहिए। गुरुगोविंद जी की इस बात का अनुसरण लंबे समय से हर सिख करता आ रहा है। मगर, भाई तारू सिंह इतिहास के पन्नों में दर्ज वो नाम हैं जिन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी व सिखों पर अत्याचार करने वाले लाहौर गवर्नर जकारिया खान बहादुर के कहने पर भी अपने केश नहीं उतारे बल्कि जब दबाव बनाया गया तो केश उतरवाने की जगह पूरी खोपड़ी ही उसके हवाले कर दी और कहा, “ज्यादा खुश मत हो मैं तुझे जूतियों से मारकर पहले नरक में भेजूँगा और फिर दरगाह जाऊँगा।”

आज ‘भाई तारू सिंह’ सिखों के बीच वो नाम है जिसे सिख धर्म के इतिहास में गर्व से लिया जाता है। उनकी शहीदी को कोई भी सिख भूल नहीं सकता, यही कारण है कि उनके नाम तारू सिंह के सामने सिख उन्हें भाई लगाकर सम्मान देते हैं और उन्हें भाई साहिब भी कहा जाता है।

भाई तारू सिंह का किस्सा उस समय का है जब पंजाब के अमृतसर में मुगलों का राज शुरू हो चुका था और लाहौर का गवर्नर जकारिया खान था। मुगल ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस्लाम कबूल करवाकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहते थे। मगर भाई तारू सिंह को यह अत्याचार मंजूर नहीं था। वह अपनी माता के साथ पहूला गाँव में रहते थे और सिख धर्म ही उनके लिए सब कुछ था।

भाई तारू सिंह अपने धर्म के प्रति इतने ईमानदार थे कि रोजाना सुबह 21 बार जपुजी साहिब का पाठ करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते थे और गाँव में आने जाने वाले प्रत्येक गुरुसिक्ख के रहने की व्यवस्था करना और जंगलों में रहने वाले सिंखों के लिए लंगर तैयार कर उन तक पहुँचाने की सेवा उनकी दिनचर्या थी।

एक बार की बात है कि अपने इसी स्वभाव के कारण उन्होंने एक रहीम बख्स नाम के मछुआरे की मदद की। पहले विश्राम की जगह ढूँढते हुए भाई साहिब के पास आए रहीम बख्स को भाई साहिब ने विश्राम करवाया और फिर रात का भोजन। रहीम ने इसी दौरान तारू सिंह से अपना दुख साझा किया और कहा कि पट्टे जिले से कुछ मुगल उनकी बेटी को अगवा कर ले गए है इसलिए वह नजर चुराते घूम रहे है। रहीम ने कहा कि उसने इस बारे में कई लोगों से शिकायत की है। लेकिन कहीं उसकी सुनवाई नहीं हुई।

रहीम बख्स की सारी बातें सुनकर भाई साहिब मुस्कुरा दिए और कहा गुरु के दरबार में तुम्हारी पुकार पहुँच गई है। अब तुम्हें बेटी मिल जाएगी। रहीम के वहाँ से जाने के बाद भाई तारू सिंह ने ये बात सिंखों के गुट को बताई और उस गुट के सभी सिखों ने मिलकर रहीम की बेटी को छुड़वा लिया।

रहीम की बेटी की रिहाई पर तारू सिंह बहुत खुश थे। लेकिन लाहौर का गवर्नर जकारिया खान इस खबर को सुनकर भीतर ही भीतर झुलस चुका था। दरअसल, एक ओर तो वो लोगों को इस्लाम कबूल करवाकर मुस्लिम बनाना चाह रहा था और दूसरी ओर मुस्लिमों को सिखों के एक गुट ने मार दिया। ये बात उसे किसी कीमत पर गँवारा नहीं थी। उसने तारू सिंह को अपने पास गिरफ्तार करके लाने को कहा।

बस फिर क्या, मुगल सैनिक पहुँचे तारू सिंह के घर और जकारिया खान का आदेश सुनाया। इसके बाद भाई तारू घबराए नहीं। बल्कि उन्होंने उन लोगों को खाना खाने का आग्रह किया। पहले तो सैनिकों ने मना किया। लेकिन बाद में वह भी मान गए। सबने भाई तारू के घर भोजन किया और फिर उन्हें गिरफ्तार करके जकारिया खान के पास ले आए।

भाई तारू सिंह को कैदी के रूप में देखकर जकारिया खान बहुत खुश हुआ। उसने सिखों की बहादुरी के किस्से सुने ही हुए थे बस उसने अपने चालाक दिमाग में तारू सिंह को इस्लाम कबूल करवाने की युक्तियाँ जुटानी शुरू कर दी। उसका सोचना था कि अगर आज तारू सिंह मान गया तो कल को और सिख भी मानेंगे। मगर अफसोस, उसकी कोई जुगत काम न आई।

ज़कारिया खान ने तारू सिंह से कहा, “तारू सिंह… तुमने जो किया वह माफी के लायक बिलकुल नहीं है, लेकिन मैं तुम्हें एक शर्त पर छोड़ सकता हूँ। तुम इस्लाम कबूल कर लो, हमारे मित्र बन जाओ मैं तुम्हारी सभी गलतियों को नजरअंदाज कर दूँगा।“

मौत के सामने कोई जिंदगी के लिए सौदा कर रहा था। लेकिन तारू सिंह का जवाब बेहद निर्भीक था। वे जकारिया खान की ओर देखकर मुस्कुराए और कहा चाहे जान चली जाए लेकिन वह अपने गुरुओं के साथ गद्दारी कभी नहीं करेंगे।

इसके बाद तारू सिंह ने ज़कारिया खान की मानसिकता को समझते हुए उन्हें बिना किसी डर के ललकारा और जकारिया खान ने उन्हें कैदखाने में बंद करवा दिया। कैदखाने से गुजरते लोग उन्हें हर रोज इस्लाम कबूल करने का लालच देते। लेकिन भाई तारू सिंह हमेशा अपना जवाब तैयार रखते।

देखते ही देखते जकारिया खान परेशान हो गया। उसने तंग आकर उन्हें सजा देने का फैसला किया। लेकिन जब प्रताड़नाएँ झेल कर भी भाई तारू सिंह ने उफ्फ नहीं किया तो उनके केश काटने का फैसला हुआ। लेकिन सवाल ये था कि केश काटता कौन? क्योंकि कोई नाई उनके बाल काटने की हिम्मत न जुटा सका।

इसे देखते हुए जकारिया खान ने एक नई जुगत लगाई। (सिख साहित्य में मौजूद जानकारी के अनुसार) उसने चालाकी दिखाते हुए भाई तारू सिंह से कहा, “मैंने सुना है कि आपके गुरु और गुरु के सिक्खों से अगर कुछ माँगा जाए तो वो जरूर मिलता है। मैं भी आपसे एक चीज की माँग करता हूँ, मुझे आपके केश चाहिए।” भाई तारू सिंह ने इस बात को सुनकर दो टूक जवाब दिया, “केश दूँगा, जरूर दूँगा लेकिन काट कर नहीं, खोपड़ी सहित दूँगा।”

इसके बाद जल्लाद को बुलवाकर उनकी खोपड़ी काटनी शुरू हुई और इस अत्याचार को अपनी जीत समझकर जकारिया खान बहुत खुश हुआ। जिसे देख भाई तारू सिंह जी के मुख से सहज ही निकल गया, “ज्यादा खुश मत हो जकारिया खान, मैं तुम्हें जूतियाँ मारते हुए नरक में पहले भेजूँगा और खुद दरगाह बाद में जाऊँगा।”

इसके बाद उनकी खोपड़ी उतार ली गई और उन्हें खाई में फेंक दिया गया। कहते हैं कि जब तारू सिंह पर यह दर्दनाक प्रहार किया जा रहा था तब भी वे चुप थे और मन ही मन सिख धर्म के पहले गुरु नानक देवजी द्वारा रचा गया ‘जपुजी साहिब’ का पाठ कर रहे थे।

जब उनके साथ हुई इस घटना की सूचना खालसा पंथ के कुछ लोगों तक पहुँची तो वे फटाफट जाकर खाई में से तारू सिंह को बाहर निकालकर ले आए। फिर उन्हें एक धर्मशाला में लाया गया जहाँ उनकी मरहम-पट्टी की गई, लेकिन कुछ संभव इलाज के बाद तारू सिंह ने आगे का इलाज कराने से मना कर दिया और अपना ध्यान ‘गुरु को याद’ करने में लगा दिया।

दूसरी ओर उनकी वो बात सच हो गई जहाँ उन्होंने जकरियाँ खाँ को कहा था कि वे उसे जूतियाँ मारकर नरक भेजेंगे फिर कहीं जाएँगे।

दरअसल कहा जाता है कि तारू सिंह के साथ ये अत्याचार करने के बाद जकारिया खान को अचानक पेशाब आना बंद हो गया और पेट में असहनीय दर्द होने लगा। उसे याद आया कि ये सब उसी का परिणाम है जो उसे भाई तारू सिंह के साथ किया। उसने जल्द से जल्द खालसा पंथ के अनुयाई के पास क्षमा पत्र भिजवाया और तकलीफ का उपाय भी पूछा। जिसपर उन्होंने बताया कि उसकी समस्या का हल भी स्वयं तारू सिंह ही है।

उन्होंने कहा, तारू सिंह द्वारा पहने गए जूते को यदि ज़करिया खान अपने सिर पर मारेगा तो उसे पेशाब आ जाएगा, लेकिन फिर भी वह जल्द ही मर जाएगा।

हुआ भी यही… ज़कारिया खान ने तारू सिंह का जूता मँगवाया और जैसे ही उसे अपने सिर पर मारा तो उसे पेशाब आया और कुछ राहत मिली। कुल 21 दिनों तक यही सब चला लेकिन 22वें दिन 1 जुलाई 1745 ई को वह मर गया। उसकी मौत की खबर सुनने के बाद भाई तारू सिंह ने भी अपने प्राण त्यागे।

आज तारू सिंह की शूरता को पूरा सिख समुदाय नमन करता है। उन्हें भाई तारू सिंह का दर्जा दिया जाता है। उनके त्याग को सिख धर्म में इतनी महत्ता दी जाती है कि सिखों की अरदास में भी उनकी शहीदी को दर्जा मिला है। आज उनके शहीदी दिवस पर सोशल मीडिया पर उनकी कहानी को साझा करके उन्हें याद किया जा रहा है। इसलिए हमने भी भाई तारू सिंह पर जानकारी जुटाकर उनसे जुड़ी कहानी आपतक साझा करने का प्रयास किया है।