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‘आगरा में पिछले 48 घंटे में 28 मरे’: प्रियंका ने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए फैलाया झूठ, प्रशासन ने खोली पोल

कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को बदनाम करने के लिए कोरोना वायरस से हुई मौतों को लेकर झूठ फैलाया। उन्होंने एक ख़बर का हवाला देते हुए ट्वीट किया कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ 48 घंटे में भर्ती हुए 28 कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की मौत हो गई है।

प्रियंका गाँधी ने दावा किया कि सरकार की नो टेस्ट-नो कोरोना की नीति पर सवाल उठे थे लेकिन सरकार ने उसका कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अगर उत्तर प्रदेश की सरकार सच दबाकर कोरोना मामले में इसी तरह लगातार लापरवाही करती रही तो बहुत घातक होने वाला है।

राहुल गाँधी की बहन ने लिखा कि यूपी सरकार के लिए कितनी शर्म की बात है कि इसी मॉडल का झूठा प्रचार करके सच दबाने की कोशिश की गई। हालाँकि, प्रियंका गाँधी ने जो दावा पेश किया वो झूठा था और सन्दर्भ से हट कर था और प्रशासन ने ही उनके दावे को नकार दिया।

आगरा के डीएम ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से लिखा कि नवभारत टाइम्स द्वारा अब तक हुए कुल कोरोना पॉजिटिव मरीजों की मृत्यु के सम्बन्ध में डेथ ऑडिट का हवाला प्रियंका गाँधी वाड्रा ने दिया है। लेकिन उन्होंने जानकारी दी कि पिछले 109 दिनों में आगरा जिले में अब तक कुल 1136 कोरोना के केस आए हैं एवं 79 संक्रमितों की मृत्यु हुई है।

“पिछले 48 घंटों में भर्ती हुए 28 कोरोना मरीजों की मृत्यु” – खबर की सच्चाई

प्रियंका गाँधी ने ख़बर का लिंक तो शेयर कर दिया लेकिन उन्होंने हेडलाइन से आगे पढ़ने की जहमत नहीं उठाई, जिससे उन्होंने झूठा दावा कर दिया। दरअसल, यहाँ मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने के बाद के 48 घंटे की बात कही गई थी लेकिन प्रियंका गाँधी ने पिछले 48 घंटे समझ लिया।

‘नवभारत टाइम्स’ में ‘टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क’ के हवाले से प्रकाशित की गई इस ख़बर की बात करें तो उसमें स्पष्ट लिखा है:

“आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में कोरोना के इलाज के लिए भर्ती हुए 28 कोरोना मरीजों की एडमिट होने के 48 घंटे के भीतर ही मौत हुई है। इस बात का खुलासा खुद योगी सरकार की एक ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। बताया जा रहा है कि इन मरीजों को अलग-अलग तारीखों पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था और भर्ती होने के 48 घंटे के भीतर इनकी मौत हुई। अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग से उन 28 मरीजों की जानकारी माँगी है, जिनकी भर्ती होने के 48 घंटे के भीतर ही मौत हो गई।”

जैसा कि आप ऊपर देख सकते हैं, इन मरीजों को अलग-अलग तारीखों में भर्ती कराया गया था, पिछले 48 घंटे के भीतर इन लोगों की मृत्यु नहीं हुई है। आगरा में अब तक कुल 79 लोगों की मौत हुई है। इसीलिए 107 दिन में 51 मौतें और मात्र 48 घंटों में 28 मौतों का आँकड़ा वैसे भी विश्वसनीय नहीं है। प्रियंका गाँधी के इस ट्वीट के बाद लोगों ने उनकी आलोचना की और साथ ही कहा कि उन्हें कम से कम ख़बर तो पढ़ लेनी चाहिए थी।

आगरा में कोरोना से हुई मौतों को लेकर प्रियंका का भ्रामक ट्वीट

इससे पहले उत्तर प्रदेश में प्रवासी मजदूरों को घर भेजने के लिए 1000 बसें उपलब्ध करवाने के नाम पर भी प्रियंका गाँधी अपनी पार्टी की फजीहत करवा चुकी हैं। बसों की जो सूची यूपी सरकार को मुहैया कराई गई थी उसमें एंबुलेंस, निजी वाहन के साथ-साथ ऑटो रिक्शा भी शामिल थे। बाद में यह भी खबर आई कि राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार के विरोध में बस ड्राइवरों ने नारे लगाए। कई बस तो ख़राब भी थे।

…अब जापान के द्वीपों पर चीन का दावा, भेजे कई जहाज: अमेरिका ने 4 बड़े चीनी मीडिया को कहा – ‘विदेशी मिशन’

लद्दाख की गलवान घाटी में भारत से उलझने के बाद अब चीन के निशाने पर जापान हो सकता है। ऐसा सैन्य विशेषज्ञों का मानना है। इन्होंने आशंका जताई है कि चीन अब पूर्वी चीन सागर में भी जापान के साथ द्वीपों को लेकर उलझ सकता है।

दरअसल, चीन और जापान दोनों ही कुछ निर्जन द्वीपों पर अपना दावा करते हैं। जिन्हें जापान में सेनकाकु और चीन में डियाओस के नाम से जाना जाता है। इन द्वीपों का प्रशासन 1972 से जापान के हाथों में है। मगर, चीन का दावा है कि ये द्वीप उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं और जापान को अपना दावा छोड़ देना चाहिए। इतना ही नहीं चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी तो इसपर कब्जे के लिए सैन्य कार्रवाई तक की धमकी दे चुकी है।

सेनकाकु या डियाओस द्वीपों की रखवाली वर्तमान समय में जापानी नौसेना करती है। ऐसी स्थिति में अगर चीन इन द्वीपों पर कब्जा करने की कोशिश करता है तो उसे जापान से युद्ध लड़ना होगा।

गौरतलब है कि यदि जापान और चीन के बीच हालातों के मद्देनजर कोई ऐसा युद्ध होता है तो यह तीसरी सबसे बड़ी सैन्य ताकत वाले चीन के लिए आसान नहीं होगा। पिछले हफ्ते भी चीनी सरकार के कई जहाज इस द्वीप के नजदीक पहुँच गए थे जिसके बाद दोनों देशों में टकराव की आशंका भी बढ़ गई थी।

बता दें कि द्वीपों के पास चीन की बढ़ती उपस्थिति के जवाब में जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव योशीहिदे सुगा ने इन द्वीपों को लेकर टोक्यो के संकल्प को फिर से व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सेनकाकु द्वीप उनके नियंत्रण में है और निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह जापान का ही है। अगर चीन कोई हरकत करता है तो उसका जवाब दिया जाएगा।

वहीं, चीन ने जापान पर पलटवार करते हुए लिखा कि डियाओस और उससे लगे हुए अन्य द्वीप चीन का अभिन्न हिस्सा हैं। इस कारण से यह उनके अधिकार-क्षेत्र में आता है और हम इन द्वीपों के पास पेट्रोलिंग और चीनी कानूनों को लागू किया जाएगा।

यहाँ ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार चीन अपनी विस्तारवादी मानसिकता के जरिए भारत और नेपाल पर मनमानियाँ करता दिख रहा है। वही चीन अगर जापान के साथ संबंध बिगाड़ने का प्रयास किया, तो ये कदम उस पर ही भारी पड़ सकता है।

बता दें कि अगर किसी भी मामले के मद्देनजर जापान और चीन आमने-सामने आए तो अमेरिका इसमें जरूर शामिल होगा। क्योंकि, जापान और अमेरिका के बीच 1951 में सेन फ्रांसिस्को संधि हुई थी, जिसके तहत जापान की रक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका की है।

इस संधि में यह भी बात लिखी है कि जापान पर हमला अमेरिका पर हमला माना जाएगा। इस कारण अगर चीन कभी भी जापान पर हमला करता है तो अमेरिका को इनके बीच आना पड़ेगा। और चीन को लेकर अमेरिका का रवैया इन दिनों कितना सख्त है, इससे सब वाकिफ हैं।

कोरोना वायरस से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देश यानी अमेरिका के राष्ट्रपति कोरोना के लिए पूर्ण रूप से चीन को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। वहीं, ताजा खबर के अनुसार तो अमेरिका ने चीन के 4 मीडिया कंपनियों को विदेशी मिशन तक कह डाला है।

जी हाँ, ट्रंप प्रशासन ने सोमवार को बताया कि चीनी मीडिया की तरफ से यूएस ऑपरेशन के लिए यह मिशन तैयार किया गया है। अमेरिकी राज्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि चार चीनी मीडिया संगठन अनिवार्य रूप से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र हैं और उन्हें सामान्य विदेशी मीडिया की तरह नहीं माना जाना चाहिए।

जानकारी के मुताबिक, यह चार चीनी मीडिया संगठन इस प्रकार हैं- सीसीटीवी, चाइना न्यूज सर्विस, पीपल्स डेली न्यूजपेपर और ग्लोबल टाइम्स। यह चारों मीडिया संगठन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और सरकार के मुखपत्र हैं। अमेरिका के अनुसार इनको दूसरी विदशी मीडिया के तरह सामान्य नहीं मानना चाहिए।

ज्ञात हो कि अमेरिका ने यह कार्रवाई ऐसे समय पर की है, जब चीनी मीडिया संगठनों ने न केवल अमेरिका बल्कि भारत और ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ रखा है। जिसके मद्देनजर पूर्वी एशिया और प्रशांत मामलों के सहायक विदेश मंत्री डेविड स्टिलवेल ने कहा, “चीन की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी हमेशा से ही चीन की आधिकारिक न्‍यूज एजेंसी को नियंत्रित करती है लेकिन शी जिनपिंग के राष्‍ट्रपति बनने के बाद पिछले कुछ सालों में यह नियंत्रण और ज्‍यादा बढ़ा है।” स्टिलवेल ने कहा, “ये संगठन केवल प्रोपेगेंडा ज्‍यादा कर रहे हैं।”

बता दें कि इससे पहले अमेरिका ने चीन के 5 अन्‍य मीडिया संस्‍थानों को विदेशी मिशन का दर्जा दे दिया था। यही नहीं, अमेरिका में काम कर रहे चीनी पत्रकारों की संख्‍या भी सीमित कर दी थी। इसके बाद चीन ने अमेरिका के कई पत्रकारों को देश छोड़कर जाने के लिए कह दिया था।

‘अनपढ़ लोग मुँह उठा कर सेना को गाली देने आ जाते हैं’: न्यूज डिबेट से भगाए गए उदित राज, बॉर्डर की कोई जानकारी नहीं

अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा नेता बताने वाले उदित राज की एक टीवी न्यूज डिबेट के दौरान जम कर बेइज्जती हो गई। कॉन्ग्रेस नेता भारत-चीन तनाव मुद्दे पर चर्चा में हिस्सा लेने पहुँचे थे लेकिन पता चला कि न तो उन्हें सीमा का कोई ज्ञान है और न ही सेना के बारे में उनके पास कोई जानकारी है। जब न्यूज़ एंकर ने उनसे पूछा कि DSDBO रोड क्या है, जिसे लेकर पूरा विवाद खड़ा हुआ है। इस सवाल के बाद उदित राज बगले झाँकते हुए बात बदलते नज़र आए।

बता दें कि DSDBO रोड का अर्थ है दरबुक-श्योक डीबीओ मार्ग, जो वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) का पास से गुजरती है। DSDBO मार्ग लद्दाख़ की राजधानी लेह से चलकर दरबुक और श्योक घाटी मे स्थित श्योक गाँवों से होती हुई उत्तर में चीन की सीमा के समीप स्थित दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) तक जाती है। श्योक से डीबीओ तक का मार्ग 220 किलोमीटर लम्बा है और इसका निर्माण 2000 से 2019 के बीच सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने किया था।

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज यूँ तो दावा करते रहे कि चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है लेकिन उन्हें सीमा की कोई जानकारी नहीं थी। वो बार-बार कहते रहे कि ‘देश हमारा चला गया’ लेकिन DSDBO रोड को लेकर जवाब नहीं दे पाए। इससे पता चलता है कि उन्होंने न्यूज़ डिबेट में आने से पहले भी कोई रिसर्च नहीं किया था। न्यूज़ एंकर ने कहा कि उदित राज को गलवान घाटी का क-ख-ग भी नहीं पता है।

इसके बाद उदित राज से पूछा गया कि गलवान नदी का उद्गम स्थल कहाँ है? इस सवाल का भी उनके पास कोई जवाब नहीं था। बता दें कि गलवान नदी अक्साई चीन से लद्दाख में बहती है। ये काराकोरम रेंज में सैमजुंगलिंग के पूरी हिस्से से ऑरिजिनेट होती है। फिर वो पश्चिम की तरह बहते हुए श्योक नदी में मिल जाती है। 80 किलोमीटर की इस नदी को लेकर 1962 युद्ध में भी घमासान हो चुका है।

देखें उदित राज की बेइज्जती 26:00 के बाद से (साभार: Zee News)

जब उदित राज बार-बार इन सवालों को टाल कर अपनी अज्ञानता का परिचय देते रहे तो न्यूज़ एंकर ने कहा कि अनपढ़ लोग मुँह उठा कर बिना पढ़े-लिखे सेना को गाली देने आ जाते हैं। इसके बाद उदित राज ने न्यूज़ एंकर को ‘सेना का चमचा’ करार दिया। वो चीनी सेना पीएलए के बारे में भी कुछ नहीं बता पाए। LAC के इस तरह और उस तरफ भारत-चीन में कितना हिस्सा है, इसे लेकर भी उनके पास कोई जानकारी नहीं थी।

इससे पहले उदित राज बोल रहे थे कि मीडिया ने झूठ बोल-बोल कर देश का सत्यानाश कर दिया है। वो मीडिया को बार-बार सेना का चमचा बताते रहे। उदित राज की इस हरकत से नाराज़ न्यूज़ एंकर ने उन्हें फटकारा और कहा कि अगर देश की बात करने से कोई सेना का चमचा हो जाता है तो हाँ, वो ‘सेना के चमचे’ हैं। बाद में उदित राज को इस डिबेट से निकाल कर भगा दिया गया। एंकर ने उन्हें बुलाने के लिए जनता से माफ़ी भी माँगी।

हाल ही में उदित राज ने ट्विटर पर दावा किया था कि 17 कंपनियाँ 500 रुपए में कोरोना टेस्ट किट बनाकर देने के लिए तैयार थी, लेकिन पीएम मोदी ने इसका ठेका गुजरात की एक कंपनी को दिला दिया, जो इस कोरोना टेस्ट किट को 4500 रुपए में बेच रहा है। ये जानकारी पूरी तरह फेक निकली। CMR द्वारा PT-PCR के लिए स्वीकृत कीमत 740 से 1150 रुपए है जबकि रैपिड टेस्ट किट के लिए यह 528 से 795 रुपए है।

चर्च के टीचर को बीवी पर हुआ शक, अपनी ही 54 दिन की बेटी के साथ दिखाई हैवानियत, हालत गंभीर

केरल के अर्नाकुलम जिले के अंगमाली में 54 दिन की एक बच्ची के साथ क्रूरता का मामला सामने आया है। खबर है कि 40 वर्षीय शैजू थॉमस ने अपनी पत्नी के ऊपर शक होने के कारण अपनी 54 दिन की नवजात बेटी को पहले थप्पड़ मारे और फिर उसे जोर से पलंग पर फेंक दिया। अब बच्ची की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं, आरोपित पिता गिरफ्तार हो चुका है।

पुलिस के अनुसार, पिता के पीटने और पटकने के बाद बच्ची को नाजुक हालत में कोलेनचेरी के पास ही एक निजी अस्पताल के ICU में भर्ती कराया गया। पुलिस ने बताया कि आरोपित व्यक्ति स्वभाव से गुस्सैल और शराबी है। उसे अपनी पत्नी पर शक रहता था और उसे ये भी लगता था कि वो बेटी उसकी नहीं है। इसलिए, इससे पहले भी उसने बच्ची को कई बार थप्पड़ों से मारा था। लेकिन गुरुवार को रात को ऐसे ही थप्पड़ों के प्रहार से बच्ची अचेत हो गई। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। 

कोलेनचेरी स्थित एमओएससी मेडिकल कॉलेज हास्पिटल के डॉक्टर सोजन आईपे ने कहा कि मस्तिष्क को हुई क्षति काफी गंभीर है। बच्ची को शुक्रवार को भर्ती किया गया था उस वक्त उसके मस्तिष्क में खून बह रहा था।

बता दें कि इस संबंध में पुलिस ने आरोपित व्यक्ति पर धारा 307 के तहत मामला दर्ज किया है। साथ ही उसके ऊपर बच्चे के साथ क्रूरता करने के आरोप में धारा 75 भी लगाई गई है। गिरफ्तारी के बाद उसे कोर्ट में पेश किया जा चुका है। अब फिलहाल वो न्यायिक हिरासत में है।

मुंबई मिरर की रिपोर्ट के अनुसार, शैजू थॉमस, कन्नौर निवासी है और पेंटेकोस्टल चर्च से जुड़ा हुआ है। वह एक काउंसलिंग टीचर है, जो उत्तर भारत में कई जगह काम चुका है। इसी दौरान वह 33 वर्षीय नेपाली महिला सांचा माया से भी मिला। दोनों में प्रेम हुआ और दोनों ने मई 2019 में शादी कर ली। इसके बाद से दोनों अंगमाली में रहने लगे।

मगर, बच्ची के जन्म के बाद शैजू के व्यवहार में बदलाव आ गया। अंगमाली थाने के सब इंस्पेक्टर अशोक केएम ने मीडिया को बताया कि शैजू बच्ची के जन्म के बाद से ही नाराज था और उसे ये भी शक था कि बच्ची उसकी नहीं है। इसी नाराजगी के चलते उसने 18 जून को बच्ची को पलंग पर पटका। बाद में वे उसे पास के मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर भागे।

शुरुआत में तो शैजू ने अस्पताल प्रशासन को बताया कि बच्ची का एक्सिडेंट हुआ है। लेकिन जाँच के दौरान अस्पताल को संदेह हुआ और उन्होंने पुलिस को बुलवाया। इसके बाद बच्ची की गंभीर अवस्था देखते हुए उसे आईसीयू में भर्ती करवाया गया। लेकिन बच्ची के दिमाग में चोट आने से उसे दौरे आते रहे। स्कैन रिपोर्ट में यह भी आया कि उसे अंदरुनी ब्लीडिंग हुई।

रथ यात्रा रोकने की साजिश किसने की: अजीत भारती का सवाल | Ajeet Bharti on who wanted to stop Puri Rath Yatra

जून 22, 2020 को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की अनुमति दे दी। यात्रा पर रोक लगाए जाने के बाद कई याचिकाएँ दाखिल कर शीर्ष अदालत से पुनर्विचार का आग्रह किया गया था। इन याचिकाओं में कहा गया कि यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए। जगन्नाथ यात्रा को रोकने के लिए ‘ओडिशा विकास परिषद’ की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई थी। 

‘ओडिशा विकास परिषद’ NGO का नाम शायद ही कभी पहले सामने आया हो। ये एक अनजाना सा ही नाम है, मगर इसने मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार जैसे वरिष्ठ वकील को अपना पक्ष रखने के लिए चुना। अगर ओडिशा विकास परिषद को कोरोना को फैलने से रोकने, इसके प्रति जागरुक करने या फिर उनकी स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही चिंता थी, तो क्या उन्होंने पहले किसी प्रकार का अभियान चलाया? किसी तरह की सेवा प्रदान की?

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

रथ यात्रा रोकने की साजिश: एक अनजाने NGO को इतने बड़े वकील उतारने के लिए फंड कहाँ से आए?

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रोक लगाई थी उसे हटा लिया है। सोमवार (जून 22, 2020) को सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ रथयात्रा निकालने की अनुमति दी है।

यात्रा पर रोक लगाए जाने के बाद कई याचिकाएँ दाखिल कर शीर्ष अदालत से पुनर्विचार का आग्रह किया गया था। इन याचिकाओं में कहा गया था कि जगन्नाथ रथयात्रा सदियों पुरानी परंपरा है। इससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। इस यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए।

याचिका में माँग की गई थी कि पुरी की मुख्य रथ यात्रा को ही अनुमति दे दी जाए। कोर्ट से आग्रह किया गया कि यात्रा निकालने और पूजा के लिए लाखों लोगों के बजाय सिर्फ 500-600 लोगों को ही अनुमति दी जाए। इस दौरान कोरोना से बचाव संबंधी सभी गाइडलाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने का भरोसा भी दिलाया गया।

ओडिशा विकास परिषद की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि जगन्नाथ यात्रा को रोकने के लिए ‘ओडिशा विकास परिषद’ की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई थी। ‘ओडिशा विकास परिषद’ NGO का नाम शायद ही कभी प्रकाश में आया हो। ये एक अनजाना सा ही नाम है, मगर इसने मुकुल रोहतगी, रंजीत कुमार जैसे वरिष्ठ वकील को अपना पक्ष रखने के लिए रखा।

ऐसे में ये सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है कि ये NGO नक्सलियों द्वारा या फिर ईसाई मिशनरियों द्वारा बनाया गया है, या फिर पहले से ही था।

रथयात्रा रोकने की साजिश पर अजीत भारती का नजरिया

इससे पहले इस एनजीओ ने 5 जून को होने वाले स्नान पूर्णिमा पर रोक लगाए जाने को लेकर ओडिशा हाईकोर्ट का रुख किया था कि अगर ये उत्सव मनाया गया तो महामारी फैल जाएगा। जब देश पहले से ही कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी से जूझ रही है, ऐसे में इस तरह की बातें करना भय को बढ़ावा देने से ज्यादा कुछ नहीं है।

अगर ओडिशा विकास परिषद को कोरोना को फैलने से रोकने, लोगों को इसके प्रति जागरुक करने या फिर उनकी स्वास्थ्य को लेकर इतनी ही चिंता थी, तो क्या उन्होंने इसको लेकर किसी प्रकार का अभियान चलाया? किसी तरह की सेवा प्रदान की? इस बारे में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

खैर, ये एक अनजाना सा नाम है, जिसे एक जरिया के तौर पर इस्तेमाल किया गया। ये लोग स्नान पूर्णिमा को रुकवाना चाहते थे। इस मामले में केंद्र सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए थे कि यह राज्य सरकार का विषय है कि वो इसे करवाना चाहती है या नहीं।

शुक्रवार तक जब तक कि रोक हटवाने की मुहिम पब्लिक मूवमेंट नहीं बनी थी, न तो केंद्र सरकार, न राज्य सरकार और न ही कोई भी पार्टी इसको लेकर गंभीर थी। किसी भी बीजेपी नेता ने न तो इसको लेकर ट्वीट किया और न ही कोई मुहिम चलाई।

हम चाहते हैं कि रथ यात्रा की परंपरा चलती रहे, लेकिन हम ये नहीं चाहते कि लोग इकट्ठा हों, क्योंकि ये महामारी का समय है। अगर हम भी ऐसा करेंगे तो तबलीगी जमात और हम में क्या अंतर रह जाता है। स्नान पूर्णिमा के दिन वहाँ पर पुजारियों और संतों के अलावा एक भी इंसान नहीं आया। इतनी समझ तो है हिंदू में।

मगर ओडिशा विकास परिषद का तो ये मकसद था ही नहीं। ये नक्सली, आतंकियों के हिमायती, हिंदू से घृणा करने वाले और वामपंथी विचारधारा की पूरी लॉबी हिंदुओं के हर प्रतीक को नष्ट करना चाहती है। महामारी के इस समय में हिंदुओं के परंपरा को तोड़ना चाहती है।

और फिर बाद में इसको लेकर ताना भी देती है कि हमने जगन्नाथ रथ यात्रा रुकवा दिया। हमने तो तुम्हारे भगवान को 70 सालों तक टेंट में बैठाकर रखा। इसे सुनकर हिंदुओं के मन में हीन भावना आती है कि 80% आबादी हमारी है, सरकार भी इसी मुद्दे पर सत्ता में आती है, लेकिन इसके बावजूद ओडिशा विकास परिषद जैसा संस्थान सीधा सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाता है। लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पाते हैं। 

जब सुप्रीम कोर्ट ने रथ यात्रा की इजाजत दे दी तो लिबरल गिरोह ने एक नया प्रपंच फैलाना शुरू किया कि आफताब हुसैन नाम के मुस्लिम लड़के ने रथ यात्रा की परंपरा टूटने से बचा लिया। हाँ, ये सच है कि मुस्लिम लड़के ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। मगर वो इकलौता नहीं था। और भी लोग थे जिन्होंने याचिका दायर की।

गजपति महाराज जैसे लोग थे जो सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद से ही इसे हटाने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास कर रहे थे। लेकिन लिबरल गिरोह का प्रोपेगेंडा देखिए, पहले तो रथ यात्रा न हो इसके लिए तमाम प्रयास किए और जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, कोर्ट ने मंजूरी दे दी तो सिक्यूलर छवि के नाम पर एक मुस्लिम याचिकाकर्ता को हीरो बनाया जा रहा है।

बता दें कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार, बीजेपी नेता संबित पात्रा, जगन्नाथ संस्कृत जन जागरण मंच, अंतरराष्ट्रीय हिंदू महासभा संघ, लक्ष्मी बिस्बाल आदि की तरफ से कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दी गई थी, जिसमें कहा गया कि मंदिर में 1172 सेवक हैं। इन सभी का कोविड-19 टेस्ट किया जा चुका है जो निगेटिव आया है। तीनों रथ खींचने के लिए 750 लोगों की आवश्यकता होती है। मंदिर के पास 1172 सेवक हैं। ये लोग ही रथों को खींचकर गुंडिचा मंदिर तक ले जा सकते हैं। इस तरह रथयात्रा बिना बाहरी लोगों के शामिल हुए भी निकाली जा सकती है।

मगर एनडीटीवी, द वायर जैसी कई मीडिया संस्थान मे मुस्लिम लड़के आफताब का ऐसे महिमामंडन किया कि उसने हिंदुओं की परंपरा को टूटने से बचा लिया और हिंदुओं को इसके लिए उसका आभारी होना चाहिए। मीडिया पोर्टल ने इसके माध्यम से मुस्लिम की हिन्दू देवताओं के प्रति ‘आस्था’ दिखाने का भी भरसक प्रयास किया।

दिल्ली दंगा: राजधानी स्कूल के मालिक फैजल फारुख को बेल, स्कूल की छत से हिंदुओं पर फेंके गए थे पत्थर-पेट्रोल बम

दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को फैजल फारुख (Faisal Farooque) को जमानत दे दी। वह राजधानी स्कूल का मालिक और प्रिंसिपल है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान इस स्कूल का इस्तेमाल अटैक बेस की तौर पर किया गया था।

स्कूल की छत पर एक बड़ा गुलेल लगाया था। इसकी मदद से हिंदुओं और उनकी संपत्तियों और पेट्रोल बम से निशाना बनाया गया था। दंगों में इस स्कूल को कोई नुकसान नहीं पहुॅंचा था। लेकिन इस ठीक बगल में स्थित स्कूल तबाह हो गया था।

फैजल फारुख को जमानत देते हुए अदालत ने कहा कि पिंजरा तोड़, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और मरकज से उसके संबंध में प्रथम दृष्टया प्रमाण नहीं हैं। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में इन संगठनों के साथ फैजल के संबंधों की ओर इशारा किया गया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दंगों के वक्त फैजल मौके पर मौजूद था इसे साबित करने के लिए भी साक्ष्य नहीं हैं।

दरअसल दिल्ली पुलिस फारुख और निजामुद्दीन मरकज के बीच संबंधों की जाँच कर रही है। दिल्ली पुलिस ने उसके पीएफआई, पिंजरा तोड़ और मरकज के संपर्क में होने की बात कही थी।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह जिन लोगों के साथ संपर्क में था वह निजामुद्दीन मरकज के प्रभावशाली लोग थे। दिल्ली पुलिस ने जाँच के दौरान पाया था कि फारुख दिल्ली दंगों से एक दिन परहले देवबंद भी गया था। अब क्राइम ब्रांच दिल्ली दंगों में निजामुद्दीन मरकज की भूमिका की जाँच कर रही है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के दौरान दंगाइयों ने दिल्ली के दयालपुर क्षेत्र में स्थित राजधानी स्कूल को अपना गढ़ बना लिया था। फैसल फारूक राजधानी स्कूल का मालिक है। दिल्ली दंगों में संलिप्तता के आरोप में फैसल को दिल्ली पुलिस ने मार्च महीने में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने फारुख को 18 अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया था।

क्राइम ब्रांच के अनुसार फैसल फारूक दिल्ली में तीन स्कूलों का मालिक है;

क्राउन पब्लिक स्कूल, सीलमपुर
राजधानी स्कूल, शिव विहार
विक्टोरिया पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, वजीराबाद रोड

इतना ही नहीं फारुख ने 2014 में यमुना विहार C-1/9 में लगभग 6 करोड़ में एक संपत्ति खरीदी थी। वर्ष 2017 में यमुना विहार में लगभग 7.5 करोड़ रुपये मूल्य का सी-3/59ए खरीदा। वर्ष 2018 और 2019 में यमुना विहार में 2 दुकानें 10 करोड़ में खरीदी और 2020 में यमुना विहार में बी-1/1 की संपत्ति लगभग 10 करोड़ में खरीदी।

क्राइम ब्रांच को जाँच में पता चला कि फारुख कथित रूप से पीएफआई और निजामुद्दीन मरकज के साथ जुड़े लोगों के संपर्क में था। यही कारण था कि पुलिस पीएफआई और उनकी संपत्तियों के कनेक्शन की जाँच कर रही थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली दंगों के दौरान दंगाइयों ने राजधानी स्कूल को अपना केन्द्र बनाते हुए उसकी छत से ही गोलियाँ चलाईं थीं। उसकी छत पर लगी बड़ी लोहे की गुलेल का उपयोग पेट्रोल बम, एसिड, ईंट, पत्थरों को दूर तक फेंकने के लिए किया गया था। इस दौरान दंगाइयों की भीड़ ने राजधानी स्कूल की छत से रस्सियों की मदद से डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल के परिसर में उतरकर स्कूल में आग लगा दी थी।

इस मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। यह रिपोर्ट 5 मार्च को दिल्ली के न्यू मुस्तफाबाद स्थित राजधानी स्कूल शिव विहार के परिसर के बाहर 24 फरवरी को हुए दंगों में दर्ज की गई थी। यह शिकायत डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल के मालिक और प्रबंधक द्वारा दर्ज कराई गई थी। यह स्कूल राजधानी स्कूल के भवन से सटा हुआ है।

चार्जशीट में कहा गया है कि 24 फरवरी को मुस्लिम परिवारों के बच्चों को उनके माता-पिता स्कूल से जल्दी लेकर चले गए, जो साबित करता है कि दंगा पूर्व नियोजित था। इतना ही नहीं दिल्ली पुलिस को राजधानी स्कूल की छत से काँच की बोतलें, टाइल्स, रस्सी और लोहे की गुलेलें मिलीं थीं, जिसकी मदद से दंगाइयों ने हिंदुओं और उनके घरों को निशाना बनाया था।

महाराष्ट्र में ₹5000 करोड़ के 3 चीनी प्रोजक्ट पर रोक, चीनी माल के आयात में ₹1 लाख करोड़ की कमी लाएगा CAIT

महाराष्ट्र सरकार ने चीनी प्रोजेक्ट्स को लेकर बड़ा फैसला लिया है। चीन की तीन कंपनियों के साथ हुए करार पर रोक लगा दी है। राज्य सरकार ने मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0 समिट में तीन चीनी कंपनियों के साथ पाँच हजार करोड़ के निवेश के प्रोजेक्ट साइन किए थे। 

महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने कहा कि राज्य सरकार ने यह फैसला केंद्र सरकार के परामर्श से लिया है। उन्होंने बताया कि भारत-चीन सीमा पर 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान होने से पहले इन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्रालय ने चीनी कंपनियों के साथ किसी भी अन्य समझौते पर हस्ताक्षर न करने की राज्य सरकार को सलाह दी है।

उन्होंने बताया कि मैग्नेटिक महाराष्ट्र 2.0 समिट में राज्य सरकार ने दुनिया भर की कंपनियों से 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे जिनमें तीन चीनी कंपनियाँ भी शामिल थीं। 

इसमें पुणे में तालेगाँव में ऑटोमोबाइल विनिर्माण इकाई स्थापित करने के लिए चीन की ग्रेट वॉल मोटर्स के साथ 3,770 करोड़ रुपए का MoU साइन किया था। इसके अलावा चीन की फोटॉन और पीएमआई इलेक्ट्रो मोबिलिटी के बीच 1,000 करोड़ रुपए की साझेदारी शामिल है। अन्य चीनी कंपनियों में, एक हेंगली इंजीनियरिंग कंपनी थी, जो तालेगाँव प्रोजेक्ट में 250 करोड़ रुपए के निवेश के साथ अपने दूसरे चरण का विस्तार करने वाली थी। कंपनी की तरफ से कहा गया था कि इस प्रोजेक्ट से 150 नौकरियाँ पैदा होंगी। 

इससे पहले, व्यापारियों के संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने महाराष्ट्र सरकार से चीन की तीन कंपनियों के साथ सहमति ज्ञापन (MoU) रद्द करने की माँग की थी। CAIT ने इस बारे में मुख्यमंत्री उद्भव ठाकरे को एक पत्र भी लिखा था मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में CAIT ने कहा कि हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने चीन की तीन कंपनियों के साथ जो समझौता किया है, उसे चीन के खिलाफ देशवासियों के रोष और आक्रोश को देखते हुए तुरंत रद्द कर देना चाहिए।

वहीं उत्तर प्रदेश भी चीनी उत्पादों को बहिष्कार किए जाने की तैयारी में है। उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि राज्य अपने ऊर्जा क्षेत्र के लिए कोई भी चीनी उत्पाद नहीं खरीदेगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि विक्रेता चीन में बने सामानों की आपूर्ति या उपयोग नहीं करे।

नोएडा की करीब 20 हजार MSME निर्माण प्रक्रिया में चीनी उत्पादों और उपकरणों के बहिष्कार करने का निर्णय पहले ही कर चुकी हैं। यह निर्णय सामूहिक रूप से गौतम बुद्ध नगर में MSME क्षेत्र के संघ द्वारा लिया गया था। गौतम बुद्ध नगर में MSME एसोसिएशन के अध्यक्ष ने सभी कारखानों को पत्र लिखकर चीनी उत्पादों के बहिष्कार का अनुरोध किया है।

वहीं CAIT ने चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए चलाए जा रहे राष्ट्रीय अभियान ‘भारतीय सामान-हमारा अभिमान’ के तहत सोमवार (जून 22, 2020) को दिल्ली के करोल बाग में चीनी वस्तुओं की होली जलाई। इस मौके पर CAIT के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा, “हमने दिसंबर 2021 तक चीनी माल के आयात में 1 लाख करोड़ रुपए की कमी करने का फैसला किया है।”

इसके साथ ही प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि देश भर के व्यापारियों एवं नागरिकों में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर बेहद उत्साह और बड़ा समर्थन प्राप्त है। उन्‍होंने कहा कि इस अभियान की पहली बानगी अगस्त महीने में राखी के त्योहार पर दिखेगी, जब इस वर्ष देशभर की बहनें चीनी राखी का बहिष्कार कर भारतीय राखी अपने भाइयों की कलाई पर बाँधेगी।

इसी तरह जन्माष्टमी का त्योहार भी पूर्ण भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाया जाएगा, जिसमें चीनी वस्तुओं का कोई स्थान नहीं होगा। साथ ही उन्होंने महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री उद्धव ठाकरे के फैसले को स्वागतयोग्य बताया और कहा कि ये देश के नागरिकों की भावनाओं का सम्मान है।  

पूरे देश में उत्साह और आनंद का माहौल है, जय जगन्नाथ: रथयात्रा को मँजूरी मिलने पर अमित शाह

ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सशर्त मॅंजूरी दे दी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस फैसले के लिए पूरे देश को बधाई दी है।

उन्होंने ट्वीट कर कहा, “आज का दिन हम सबके लिए, विशेषकर ओडिशा के हमारे भाइयों-बहनों और भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए एक शुभ दिन है। रथयात्रा को सुप्रीम कोर्ट की मॅंजूरी मिलने से पूरे देश में उत्साह और आनंद का माहौल है। जय जगन्नाथ!”

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 23 जून को निकलनी है।

शाह ने लिखा, “यह मेरे साथ-साथ देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए हर्ष की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने न केवल श्रद्धालुओं की भावनाओं को समझा, बल्कि इस मामले का सकारात्मक हल निकले, इसके लिए तुरंत प्रयास शुरू किए, जिससे हमारी यह महान परंपरा कायम रही। कल शाम मैंने प्रधानमंत्री जी की सलाह पर गजपति महाराज जी (पुरी के राजा) और पुरी के शंकराचार्य जी से बात की और यात्रा को लेकर उनके विचारों को जानकर प्रधानमंत्री जी को अवगत कराया। आज सुबह प्रधानमंत्री के निर्देश पर सॉलिसिटर जनरल से भी बातचीत की।”

अमित शाह ने फोन के जरिए पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंहदेव के साथ मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा भी की है।

सोमवार (22 जून, 2020) को श्रीजगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रशासक डॉ. किशन कुमार की अध्यक्षता में स्थानीय नीलाचल भक्त निवास में रथयात्रा को लेकर बैठक हुई, जिसमें जिलाधिकारी बलवंत सिंह भी मौजूद रहे। बलवंत सिंह ने बताया कि रथयात्रा को लेकर श्रीक्षेत्र धाम पूरी तरह से तैयार है। सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्देशों का पालन किया जाएगा।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में मामले पर हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने शर्तों के साथ जगन्नाथ रथयात्रा को निकालने की अनुमति जारी कर दी। कोर्ट ने कहा है कि पुरी रथ यात्रा स्वास्थ्य से समझौता किए बिना मंदिर समिति, राज्य और केंद्र सरकार के समन्वय के साथ आयोजित की जाएगी।

इस रथयात्रा को निकाले जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 16 पिटीशन दाखिल की गईं थीं। इसके बाद मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोवडे ने तीन जजों की एक बेंच गठित की। इस बेंच में सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी शामिल हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को निकलने वाली जगन्नाथ रथयात्रा पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए एक स्थान पर लाखों लोगों के जमा होने की अनुमति नहीं दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिकाओं में कहा गया था कि जगन्नाथ रथयात्रा सदियों पुरानी परंपरा है, जिसमें करोड़ों लोगों की आस्था है। इस यात्रा को सिर्फ पुरी में ही निकालने की इजाजत दी जाए। माँग की गई थी कि पुरी की मुख्य रथयात्रा को ही अनुमति दे दी जाए।

साथ ही कोर्ट से आग्रह किया गया था कि यात्रा निकालने और पूजा करने के लिए लाखों लोगों के बजाय सिर्फ 500-600 लोगों को ही अनुमति दी जाए। इस दौरान कोरोना से बचाव संबंधी सभी गाइडलाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा।

इतना ही नहीं इस माँग को लेकर बीजेपी नेता संबित पात्रा की ओर से भी सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की थी। याचिका में उन्होंने कहा था कि भगवान जगन्नाथ के उन 800 सेवायतों के माध्यम से भक्तों की मंडली के बिना रथयात्रा को निकालने की अनुमति दी जा सकती है।

चीन से लगी LAC पर माउंटेन फोर्स की तैनाती, ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध करने में हैं दक्ष

गलवान में चीनी धोखे के बाद भारत अब उससे लगती सीमा पर सेना की तैनाती लगातार बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में माउंटेन फोर्स की तैनाती 3488 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर की गई है। माउंटेन फोर्स के जवान ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध करने में खास तौर से निपुण होते हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स ने शीर्ष आधिकारिक सूत्रों के हवाले से यह खबर दी है। सूत्रों ने सेना को चीनी सेना कि किसी भी हरकत का जवाब देने का आदेश दिया गया है। माना जाता है कि माउंटेन फोर्स के जवानों को भारत ने पिछले दशकों में उत्तरी फ्रंट पर लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया है। चीनी सेना जहॉं सड़क के रास्ते सैन्य साजो-सामान सीमा पर ला रहे हैं, वहीं माउंटेन फोर्स का दस्ता ऊँचाई वाले इलाके में गुरिल्ला युद्ध के लिए ट्रेंड होते हैं, जैसा हम करगिल के युद्ध में देख चुके हैं।

एक पूर्व आर्मी चीफ के हवाले से बताया गया है, “पहाड़ों पर युद्ध करना खासा मुश्‍किल होता है। माउंटेन फोर्स को खास इसी तरह के इलाके में युद्ध के लिए ट्रेंड किया जाता है। ये उत्तराखंड, लद्दाख, गोरखा, अरुणाचल और सिक्‍किम की पहाड़ियों में युद्ध करने में माहिर हैं। पहाड़ों पर आर्टिलरी और मिसाइल के निशाना चूक जाने की आशंका अधिक होती है। ऐसे में माउंटेन फोर्स की तैनाती से सेना को बड़ी ताकत मिली है।”

इंडिया टुडे ने एक अधिकारी के हवाले से बताया है कि प्वाइंट 14 को लेकर हुई लड़ाई के बाद से गलवान घाटी और पैंगोंग लेक में दोनों देशों के बीच तनाव जारी है। 15 जून के बाद से स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। दोनों सेनाओं के बीच विश्वास की कमी आई है। यहाँ निचले हिस्सों में टैंक और तोपों की भी तैनाती की गई है।

भारत ने किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए सभी विकल्पों को खोल दिया है। साथ ही अपनी सेना को खुली छूट दी है। इससे साफ है कि भारत पैंगोंग लेक में विशेष अभियान शुरू कर सकता है।

लेह के रिटार्यड कर्नल सोनम वांगचुक ने कहा कि हमें लद्दाख स्काउट्स की बटालियनों को और बढ़ाना चाहिए, क्योंकि स्काउट्स के सैनिक इस क्षेत्र से संबंधित हैं, वे जगह और पर्यावरण के अनुकूल हैं और इलाके से परिचित भी हैं जो हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

आपको बता दें कि 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई हिंसक झड़क में भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इसके बाद से ही सीमा पर तनाव जारी है। भारत ने अपने सैनिकों को खुली छूट देते हुए तीनों सेनाओं को हथियार खरीदने के लिए 500 करोड़ रुपए के आपात फंड को भी मंजूरी दी।