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ट्रक पर सवार होकर J&K से दिल्ली के लिए निकले आतंकी: कई राज्यों में है अलर्ट, सघन तलाशी शुरू

दिल्ली में आतंकी हमले की आशंका के बाद अलर्ट जारी कर दिया गया है। ख़ुफ़िया एजेंसियों को पता चला है कि जम्मू कश्मीर से दिल्ली के लिए ट्रक पर सवार होकर 4-5 आतंकी निकले हैं, जिसके बाद बीच में पड़ने वाले सभी राज्यों में है अलर्ट जारी कर दिया गया है ताकि उन्हें रोका जा सके। चूँकि दिल्ली में कोरोना के कारण सरकार और पुलिस-प्रशासन ख़ासा व्यस्त है, ऐसे में आतंकी अपनी मंसूबों को कामयाब करने के लिए मौके ढूँढ़ रहे हैं।

पुलिस को मिली सूचना ​के अनुसार, ट्रक, बस, कार या टैक्सी से जम्मू कश्मीर से कुछ आतंकी दिल्ली में प्रवेश कर चुके हैं। कुछ घुसने की ताक में लगे हुए हैं, जिसको लेकर सभी गेस्ट हाउस, होटलों और कश्मीर के नंबर के वाहनों की सघन तलाशी प्रारम्भ कर दी गई है। सभी बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों पर भी अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रारंभिक सूचना ये थी कि जम्मू-कश्मीर से 4 से 5 आतंकी ट्रक में सवार होकर दिल्ली के लिए निकले थे।

दिल्ली के आउटर नॉर्थ जिले के क्षेत्रों में पुलिस को अत्यधिक सतर्क रहने और सघन तलाशी अभियान चलाने को निर्देशित किया गया है। डीसीपी, स्पेशल सेल क्राइम ब्रांच, स्पेशल ब्रांच और अन्य यूनिट को पहले ही अलर्ट जारी कर दिया गया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सीमाओं पर भी विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है। भारत-चीन के बीच चल रहे तनाव के कारण सुरक्षा एजेंसियाँ पहले से ही अलर्ट पर हैं।

ज्ञात हो कि सशस्त्र बलों ने कश्मीर में पिछले 24 घंटों में कुलगाम व जडीबल में दो अलग-अलग मुठभेड़ों में चार आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया। मारे गए चारों आतंकवादियों में से तीन की पहचान कर ली गई जबकि एक आतंकवादी की पहचान अभी होनी बाकी है। पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों को सूचना मिली थी कि श्रीनगर के जडीबल में तीन आतंकवादी छिपे हुए हैं। इसके बाद तुरंत पुलिस व सीआरपीएफ ने संयुक्त अभियान शुरू किया, जिसमें सभी आतंकी मारे गए। 

जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार कल (21 जून, 2020) के मुठभेड़ में आतंकियों के मारे जाने के साथ ही घाटी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब 4 प्रमुख आतंकी संगठनों के सरगनाओं का 4 महीने में सफाया हो गया है। जम्मू-कश्मीर के आईजी विजय कुमार ने मीडिया को बताया कि पिछले 4 महीने में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और अंसार गजवत-उल हिंद के सरगनाओं को मुठभेड़ में मार गिराने में पुलिस ने सफलता पाई है। 

सफूरा जरगर ने राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला: दिल्ली पुलिस ने कहा, बेल पर सुनवाई टली

सफूरा जरगर की जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने 23 जून तक सुनवाई स्थगित कर दी। सफूरा के वकील द्वारा जमानत याचिका के बाद हाई कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट माँगी थी।

दिल्ली पुलिस ने 22 जून 2020 को हाई कोर्ट में सफूरा जरगर और उसके दिल्ली दंगों में संलिप्तता संबंधित रिपोर्ट पेश किया। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार की गई छात्र सफूरा ज़रगर ने अशांति पैदा की और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला था।

अपनी स्टेटस रिपोर्ट में, दिल्ली पुलिस ने कहा कि अभियुक्त सफूरा ज़रगर न केवल घृणा पैदा करने के लिए षड्यंत्रकारी डिजाइन का हिस्सा थी, बल्कि उसका षड्यंत्र किसी भी तरह के उपयोग से लोगों की मृत्यु और घायल होने का कारण बनता।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों की आरोपित और जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर के वकील ने चौथी बार उनकी जमानत के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इससे पहले तीन बार सफूरा की बेल याचिका खारिज की जा चुकी थी।

आज 22 जून को दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी याचिका पर सुनवाई है। लेकिन, यहाँ तक पहुँचने से पहले बता दें कि सफूरा की बेल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट विचार करने से मना कर चुका है। वहीं लोअर कोर्ट में भी यह याचिका खारिज हो चुकी है। मगर, इस बार सफूरा जरगर ने मामले में निचली अदालत के 4 जून के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अदालत ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया था।

कोर्ट ने कब-कब खारिज की सफूरा की जमानत याचिका

सबसे पहले 18 अप्रैल को सफूरा पर UAPA लगने से पूर्व एक याचिका दायर की गई थी। लेकिन 21 अप्रैल तक उसके ऊपर आतंकवाद विरोधी कानून लगने के कारण उसकी याचिका को खारिज कर दिया गया। उस समय मेट्रोपोलिटियन मजिस्ट्रेट वसुंधरा छौंकर ने सफूरा को आरोपों को मद्देनजर राहत देने से मना कर दिया था।

इसके बाद 2 मई को दोबारा बेल के लिए अर्जी दी गई। मगर, इस बार भी लंबी बहस के बाद सफूरा को जमानत नहीं मिल पाई।

4 जून को सफूरा ने मेडिकल ग्राउंड पर दिल्ली के ट्रॉयल कोर्ट में फिर याचिका दायर की। इस याचिका में सफूरा को पॉलीसिस्टिक ओवेरी सिंड्रोम से पीड़ित बताकर रियायत की माँग की गई। लेकिन कोर्ट ने 4 जून को भी सफूरी की बेल के लिए मंजूरी नहीं दी। बल्कि जेल प्रशासन को यह आदेश दिया कि वह सफूरा को उपयुक्त मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध करवाएँ।

अपना आदेश सुनाते हुए कोर्ट ने कहा था, “जब आप अंगारे के साथ खेलना चुनते हैं, तो आप हवा को दोष नहीं दे सकते कि चिंगारी थोड़ी दूर तक पहुँच जाए और आग फैल जाए।”

ट्रायल कोर्ट ने दंगों के मद्देनजर कहाकि जाँच के दौरान एक बड़ी साजिश की जाँच की गई और अगर किसी साजिशकर्ता द्वारा किए गए षड्यंत्र, कृत्यों और बयानों के सबूत थे, तो यह सभी के खिलाफ स्वीकार्य है।

अदालत ने सफूरा पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि भले ही आरोपित (सफूरा) ने हिंसा का कोई काम नहीं किया था, लेकिन वह गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों के तहत अपने दायित्व से नहीं बच नहीं सकती।

सफूरा कब और क्यों हुई थी गिरफ्तार?

जामिया की छात्रा सफूरा जरगर के खिलाफ दिल्ली विरोधी दंगों के मद्देनजर यूएपीए के तहत मामला चल रहा है। उसे 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उसपर आरोप है कि उसने जाफराबाद-सीलमपुर में 50 दिनों के हंगामा की साजिश रची थी और वहाँ महिलाओं-बच्चों को बिठाने के लिए पूरा जोर लगाया था।

इसके अलावा दिल्ली पुलिस ने सफूरा के मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट को यह भी बताया था कि सफूरा जरगर ने भीड़ को उकसाने के लिए कथित तौर पर एक भड़काऊ भाषण दिया था, जिसके बाद फरवरी में दंगे हुए थे। इतना ही नहीं, सफूरा जरगर की एक वीडियो भी सामने आई थी। जिसमें उन्हें कहते सुना गया था, ‘दिल्ली तेरे खून से इंकलाब आएगा।’

सफूरा जरगर को रिहा कराने के लिए मीडिया गिरोह हुआ सक्रिय

सफूरा जरगर की गिरफ्तारी के बाद से ही उसके गर्भवती होने को लेकर मीडिया गिरोह लगातार विक्टिम कार्ड खेल रहा था। कभी उसके हालातों को गौर करवाते हुए भावनात्मक पोस्ट लिखे जा रहे थे। कभी गर्भवती हथिनी के समान रखते हुए भारत में मातृत्व के प्रति सम्मान पर सवाल उठाए जा रहे थे।

गिरफ्तारी से लेकर अब तक के अंतराल में स्क्रॉल,द प्रिंट, द वायर लगातार इन कोशिशों में जुटे थे कि किसी तरह उसके ख़िलाफ़ लिए एक्शन को गलत साबित कर दिया जाए और उसे रिहाई दिलवाई जाए। लेकिन सफूरा पर लगे आरोप इतने संगीन थे कि 2 महीने तक उनकी जमानत संभव न हो सकी और कोर्ट से हर बार सफूरा को निराशा मिली।

इसके अलावा सफूरा के लिए फर्जी व उन्मादी रिपोर्टिंग करने पर द वायर को भी दिल्ली पुलिस से फटकार मिली थी। क्योंकि द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बिना तथ्यों के आधार पर लिख दिया था कि दिल्ली पुलिस ने एक हिंदू और एक मुस्लिम को गिरफ्तार किया और बाद में दोनों के साथ अलग-अलग बर्ताव किया।

‘मंदिर के भगवान को बीच सड़क पर रख कर जूते से मारो’ – आसिफा गैंगरेप को हिंदुत्व से जोड़ने की कोशिश में पत्रकार

उत्तर प्रदेश के कुख्यात पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने एक बार फिर से अपनी गंदी जुबान का परिचय देते हुए हिन्दू देवी-देवताओं पर ओछी टिप्पणी की है। ट्विटर पर उसके द्वारा इस तरह की बयानबाजी के बाद कई हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँची। कनौजिया ने हिन्दू देवता की मूर्ति को जूते मारने की बात कही। हालाँकि, विरोध होने के बाद अब कनौजिया ने अपनी इस ट्वीट को डिलीट कर दिया है।

तथाकथित पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने इस बार हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा को प्रदर्शित करने के लिए एक छोटी बच्ची की लाश का सहारा लिया। जम्मू में आसिफा की बलात्कार वाली घटना का जिक्र करते हुए उसने कहा कि जिस मंदिर में आसिफा का बलात्कार हुआ, उस मंदिर के भगवान की मूर्ति को सड़क के बीच में रखकर जूता से मरना चाहिए और फिर उसे गटर में विसर्जित कर देना चाहिए।

प्रशांत कनौजिया पहले भी ऐसे ही अजीबोगरीब ट्वीट कर के सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश करता रहा है। बता दें कि कठुआ की नाबालिग आसिफा के गैंगरेप को हिंदुत्व से जबरदस्ती जोड़ने की कोशिश की गई थी। इस ख़बर के सामने आने के बाद त्रिशूल पर कंडोम दिखाने से लेकर मंदिरों को बलात्कार की जगह बताने तक की कुचेष्टा की गई थी। आसिफा गैंगरेप मामले में 6 आरोपितों को न्यायालय पहले ही सज़ा सुना चुका है।

प्रशांत कनौजिया ने इसी मामले को फिर से उठाया ताकि वो हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देकर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचा सके। प्रशांत कनौजिया ने एफआईआर की चेतावनी के बाद ट्वीट डिलीट तो कर दिया लेकिन उसने अभी तक इस मामले में माफ़ी नहीं माँगी है। कई हिंदूवादी संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की माँग की है। कनौजिया द्वारा चुपके से ट्वीट डिलीट करने के बाद भी लोग उसके कृत्य से आहत हैं।

प्रशांत कनौजिया ने लोगों के विरोध के बाद चुपके से डिलीट किया अपना ट्वीट

वैसे ये पहली बार नहीं है जब प्रशांत कनौजिया ने इस तरह की हरकत की हो। फेसबुक और ट्विटर पर आपत्तिजनक पोस्ट शेयर करने के आरोप में लखनऊ पुलिस ने 8 जून 2019 को स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत जगदीश कनौजिया को उसके आवास से गिरफ्तार किया था। दरअसल, जून 6, 2019 को कनौजिया ने फेसबुक और ट्विटर पर एक वीडियो अपलोड किया था, जिसमें हेमा नाम की एक युवती मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर खड़ी होकर खुद को योगी आदित्यनाथ की प्रेमिका बता रही थी।

साथ ही वो ये भी दावा कर रही थी कि सीएम योगी उसके साथ एक साल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बात कर रहे हैं। प्रशांत ने इस वीडियो को ‘इश्क छुपता नहीं छुपाने से योगी जी’ कैप्शन के साथ शेयर किया था। जिसके बाद यूपी पुलिस ने उस पर एक्शन लेते हुए उसे गिरफ्तार किया था और फिर जमानत के लिए उसकी पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर आरोपित कनौजिया को 11 जून को जमानत मिली थी। 

इसके कुछ ही दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट करने को लेकर यूपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए पत्रकार प्रकाश कनौजिया को फौरन रिहा करने का आदेश दिया था। यही नहीं, मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने यूपी पुलिस को फटकार भी लगाई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रशांत कनौजिया ने जो शेयर किया और लिखा, इस पर यह कहा जा सकता है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लेकिन, उसे अरेस्ट किस आधार पर किया गया था?

जवान और जुबान से चीन को जवाब: जरूरत पड़ने पर प्रोटोकॉल नहीं, अपने हिसाब से कार्रवाई करने की सेना को खुली छूट


गलवान घाटी में भारत-चीन सेना के बीच चल रहे विवाद के मद्देनजर भारत सरकार ने सीमा पर तैनात भारतीय सेना को मौका आने पर अपने हिसाब से कार्रवाई करने की खुली छूट दे दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ लद्दाख में हालात पर उच्च स्तरीय बैठक के बाद सूत्रों ने यह जानकारी मीडिया को दी।

रक्षा मंत्री के साथ इस बैठक में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे, नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह और वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया ने हिस्सा लिया। इस बैठक में सेना को सरकार की ओर से यह साफ कर दिया गया कि वह कोई भी एक्शन ले सकती है।

इस बैठक में सरकार ने LAC के नियमों में बदलाव किया और सेना के फील्ड कमांडरों को यह अधिकार दिया कि वह परिस्थितियों में जवानों को हथियार के इस्तेमाल की आजादी दे सकते हैं।

इसके अलावा सीमा पर चीन के साथ तनाव बढ़ने के मद्देनजर सरकार ने हथियार और गोला बारूद खरीदने के लिए सेना के तीनों अंगों को 500 करोड़ रुपए तक की प्रति खरीद परियोजना की आपात वित्तीय शक्तियाँ दी हैं।

सरकार की ओर से कहा गया है कि अगर सैनिकों की जान खतरे में पड़ती है और चीनी सैनिक खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं तो सेल्फ डिफेंस करते वक्त किसी प्रोटोकॉल की ना सोचें।

वहीं, एयरफोर्स के जवानों की छुट्टियाँ भी रद्द होने की खबर मीडिया में है। वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया ने पहले ही कहा है कि वायुसेना अब किसी भी चुनौती के लिए तैयार है।

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ सेना को सीमा पर कार्रवाई करने की खुली छूट दी गई है। वहीं बातचीत के रास्ते को भी खुला रखा गया है। कहा जा रहा है कि इस हफ्ते दोनों देशों के बीच एक बार फिर सैन्य और डिप्लोमेटिक लेवल की बातचीत हो सकती है। इसके अलावा इसमें सैनिकों को पीछे करने और अप्रैल से पहले की स्थिति को लागू करने पर चर्चा हो सकती है।

हालाँकि, यहाँ याद दिला दें कि इससे पहले भी भारत चीन मसले को सुलझाने के लिए कुछ बैठकें हुईं थीं। लेकिन, उस समय उनसे कोई हल नहीं निकला। हर बातचीत में भारत की ओर से यही कहा गया कि चीनी सैनिक पूरी तरह से पीछे हटें और अप्रैल से पूर्व की स्थिति को सीमा पर लागू कंरे। लेकिन चीनी सैनिक इस बात को मानने को ही तैयार नहीं हुए।

इसी का नतीजा था कि 15 जून को डि-एस्केलेशन प्रक्रिया के दौरान चीनी फौजियों ने लाठी-डंडे, लोहे की कँटीली तारों से लिपटे डंडे और पत्थरों का इस्तेमाल कर भारतीय सेना पर हमला किया। इस हमले में भारत ने अपने 20 जवान खोए। लेकिन, इन 20 जांबाजों ने जाते-जाते भी चीन को भी मुँहतोड़ जवाब दिया और कम से कम चीन के 43 सैनिक मारे गए।

अपने कर्म से अनिल कपूर के घर पैदा हुई, फायदा मिला: सोनम कपूर ने नेपोटिज्म का किया बचाव

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद बॉलीवुड में नेपोटिज्म भाई-भतीजावाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसकी वजह से स्टार किड्स को होने वाले फायदों को लेकर लोग मुखर हैं। जिन लोगों को इस वजह से निशाना बनाया जा रहा उनमें एक नाम सोनम कपूर का भी है। ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर लोग कह रहे हैं कि ‘भाई-भतीजावाद’ की वजह से ही सोनम फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हैं।

इस बीच रविवार (जून 21, 2020) को सोनम कपूर ने फादर्स डे के मौके पर ट्विटर पर नेपोटिज्म का बचाव किया। उन्होंने कहा है कि अनिल कपूर की बेटी होने पर उन्हें गर्व है। उन्हें यह बात कहने में हिचक नहीं है कि अपने कर्म की वजह से वह उनके घर पैदा हुईं और इसका उन्हें फायदा हुआ।

‘स्टारकिड’ होने की वजह से इंडस्ट्री में टिके होने के आरोपों का जवाब देते हुए सोनम कपूर ने ट्वीट किया, “आज फादर्स डे पर मैं एक बात कहना चाहूँगी। हाँ, मैं अपने पिता की बेटी हूँ और मैं उन्हीं की वजह से यहाँ हूँ। यह मेरा सौभाग्य है। यह कोई अपमान नहीं है। मेरे पिता ने मुझे यह सब देने के लिए कड़ी मेहनत की है और यह मेरे कर्म हैं, जहाँ मैं पैदा हुई हूँ और जिनके यहाँ पैदा हुई हूँ। मुझे गर्व है उनकी बेटी होने पर।”

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद निर्माता, निर्देशकों, स्टारकिडों के एक समूह के खिलाफ नेपोटिज्म के आरोप का सोनम कपूर द्वारा बचाव करने के बाद भी सोशल मीडिया यूजर्स ने अभिनेत्री के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया था और कड़े सवाल उठाए।

सोनम कपूर भी इंडस्ट्री के कई कलाकारों में से एक थीं, जिन्हें सुशांत सिंह राजपूत की मौत के लिए दोषी ठहराया गया था। प्रशंसकों ने निर्माता, निर्देशक और स्टार किड्स के खिलाफ नाराजगी व्यक्त की, जिन्हें उन्होंने ‘इनसाइडर’ बताते हुए बाहरी लोगों को धमकाने और बिना किसी कारण के अलग-थलग करने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

गौरतलब है कि बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के मौत के बाद बॉलीवुड के कुछ स्टार्स पर लोगों का गुस्सा फूट रहा है। सोशल मीडिया पर यूजर्स बॉलीवुड इंडस्ट्री पर निशाना साध रहे हैं कि यहाँ सिर्फ स्टार्स के बच्चों को मौका मिलता है और आउटसाइडर्स को नहीं।

इसके साथ ही सोशल मीडिया यूजर्स ने सोनम कपूर से जवाब माँगा। इसके बाद सोनम कपूर ने अपना कमेंट सेक्शन बंद कर दिया। फिर यूजर्स ने उनके मैसेज बॉक्स में जाकर जवाब माँगना शुरू कर दिया।

17 जून को सोनम ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा था, “दोस्तों मैं आमतौर पर नफरत और नकारात्मकता से दूर नहीं भागती, क्योंकि मुझे उन लोगों पर तरस आती है, जिनके दिलों में इतनी नफरत है, क्योंकि यह उन्हें ज्यादा परेशान करता है। लेकिन यह मेरे दोस्तों और परिवार को ट्रिगर कर रहा है। मैं समझती हूँ। ये वे लोग हैं जो रूढ़िवादी दक्षिणपंथी एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। मैं अपने कमेंट्स सेक्शन को बंद कर रही हूँ।” इसे सोनम ने बाद में हटा दिया था। 

रविवार को सोनम कपूर ने ‘नेपोटिज्म’ का बचाव करने के साथ ही सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा किए गए कमेंट्स और मैसेज को शेयर करते हुए सोनम लिखती हैं, “ये कुछ कमेंट्स हैं जो मुझे सुनने को मिल रहे हैं। जो भी मीडिया और अन्य लोगों ने इस बात को बढ़ावा दिया है। मैं आप सबको इसका जिम्मेदार मानती हूँ। जो लोग दूसरों के साथ अच्छा बर्ताव करने का संदेश दे रहे हैं, वो खुद दूसरे का बुरा कर रहे हैं।”

जब एक यूजर ने कमेंट को बंद करने के बारे में पूछा तो सोनम ने कहा, “हाँ मैंने अपने और अपने माता-पिता के कमेंट सेक्शन को बंद कर दिया है, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरे 64 वर्षीय माता-पिता भी इससे गुजरें। उन्होंने कुछ नहीं किया और मैं ऐसा डर कर नहीं कर रही हूँ, बल्कि मैं अपने मानसिक स्वास्थ्य और मेरे माता-पिता के संरक्षण के लिए ऐसा कर रही हूँ।”

सोशल मीडिया पर एक पुराना वीडियो जमकर शेयर किया जा रहा है। इसमें सोनम कपूर, करण जौहर से कह रही हैं कि वे सुशांत सिंह राजपूत को नहीं जानती हैं। इस वीडियो को शेयर करके सुशांत के फैंस ने उन्हें सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल किया है। सोनम ने लिखा कि लोग मेरे उस बच्चे की मौत की दुआ माँग रहे हैं, जो अभी पैदा भी नहीं हुआ। उन्होंने वीडियो पर सफाई देते हुए कहा कि ये वीडियो 7 साल पुराना है, जब उनकी एक फिल्म आई थी। वो उनको नहीं जानती थीं।

उत्तर प्रदेश: अदिति और राकेश सिंह की विधायकी छीनने के लिए हाई कोर्ट पहुँची कॉन्ग्रेस

अदिति सिंह और राकेश सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए कॉन्ग्रेस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कॉन्ग्रेस के दोनों विधायकों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी।

सुनवाई जस्टिस पंकज कुमार जायसवाल और जस्टिस दिनेश कुमार सिंह की बेंच ने की। मामले में याची अराधना मिश्रा के वकील केसी कौशिक का तर्क था कि अदिति और राकेश 2017 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुँचे थे। लेकिन बाद में दोनों ने पार्टी विरोधी गतिविधियाँ शुरू कर दी।

कॉन्ग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को निर्देशित करने की अपील की है। कॉन्ग्रेस ने इनकी सदस्यता समाप्त करने को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के पास पहले से ही अर्जी दे रखी है।

याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि सदस्यता समाप्त करने वाली अर्जियां तीन सप्ताह के भीतर निस्तारित कर दी जाएँ। लेकिन इस मामले में तीन माह बाद भी स्पीकर ने अर्जी निस्तारित नहीं की है।

अदिति सिंह रायबरेली सदर से विधायक हैं। हाल में उन्होंने कई मसलों पर पार्टी स्टैंड के खिलाफ जाकर अपनी राय सार्वजनिक तौर पर जाहिर की है। अटकलें लगाई जा रही है कि वे बीजेपी में जा सकती हैं। वहीं रायबरेली के हरचंदपुर विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस विधायक राकेश सिंह भाजपा में शामिल हो चुके एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह के सगे भाई हैं।

अदिति सिंह ने 12 जून, 2020 को पार्टी के सभी व्हॉट्सअप ग्रुपों को छोड़ दिया था। इससे पहले अदिति सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कॉन्ग्रेस का नाम हटाते हुए उसकी जगह अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया था।

उनके ट्विटर से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया था। इस दौरान अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी थी।

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया गया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था।

‘मजाक’ में PM की माँ-बहन को गाली, देश तोड़ने की बात: कॉन्ग्रेस के खास संस्कारों की झाँकी है जाकिर हुसैन

संस्कार का मोटे तौर पर अर्थ होता है, अपने भीतर सद्गुणों का विकास। सनतान धर्म में तो बकायदा जन्म से मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं। शिशु जब मॉं के गर्भ में होता तभी से इसकी शुरुआत हो जाती है। इन सबका मकसद तन, मन, आत्मा की शुद्धता से है, ताकि वह व्यक्ति समाज के अनुकूल बने। सकारात्मक समाज का निर्माण करे।

इसलिए संस्कार बेहद सकारात्मक और पवित्र शब्द है। लेकिन, कलियुग में सब अपने-अपने हिसाब से शब्दों की व्याख्या कर लेते हैं। अपनी नीचता को भी संस्कार की चादर ओढ़ा देते हैं। जैसे, पाकिस्तान का संस्कार आतंकवाद है, चीन की धोखेबाजी, वैसे ही कॉन्ग्रेस का भी अपना एक अलग, विशेष संस्कार है।

इस संस्कार में पले-बढ़े कॉन्ग्रेसी ‘मजाक’ में प्रधानमंत्री की माँ-बहन को गाली दे देते हैं। देश के टुकड़े होने की बात करते हैं।

यह हम नहीं कह रहे। यह कहना है कॉन्ग्रेस नेता जाकिर हुसैन का। जाकिर लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) का पार्षद था। उसका एक ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें वह देश की सेना और प्रधानमंत्री के लिए बेदह आपत्तिजनक बातें कर रहा था।

अब इस ऑडियो को लेकर जाकिर का कहना है, “दोस्त के साथ मजाक में बात हुई थी। उसने धोखा किया। मुझे हमेशा से देश और लोगों पर नाज है। भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए माफी चाहता हूँ। ऐसा दोबारा नहीं होगा।”

अब यह जानिए कि जाकिर ने क्या कहा था, जिसे अब वह मजाक में हुई बात बता रहा। गलवान की घटना पर जाकिर अपने एक दोस्त से बात कर रहा होता है। इस दौरान उसका दोस्त कहता है कि अगर उसने कुछ पैसे जमा किए हुए हैं, तो वह उसके पास आ जाए, वह उसे मकान दिला देगा। इस पर जाकिर उसे आश्वस्त करता है कि आगे कुछ होने वाला नहीं है। वह कहता है, “सब ठीक हो जाएगा। बस लेह का आधा हिस्सा चाइना लेना चाहिए। फिर पता है क्या होगा… दिल्ली में मोदी की माँ-बहन हो जाएगी…। लद्दाख यूटी के फिर हजार टुकड़े हो जाएँगे।”

ऑडियो वायरल होने के बाद जाकिर पर एफआईआर दर्ज हुई और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। एलएएचडीसी से भी उसे निलंबित कर दिया। मामले के तूल पकड़ने के बाद कॉन्ग्रेस ने भी उसे निष्कासित कर दिया है।

लेकिन सवाल जाकिर का नहीं है। सवाल उस कॉन्ग्रेसी संस्कार का है, जिसकी वजह से यह पार्टी राजनीतिक विरोध के नाम पर देश के खिलाफ खड़ी हो जाती है। गलवान के बलिदानी सैनिकों पर अनर्गल बयानबाजी इसका ताजा नमूना है। इसी संस्कार की व​जह से वे चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। मामले के तूल पकड़ने पर कभी अपने ही कहे से मुकर जाते हैं, तो कभी उसे मजाक बता देते हैं। यहॉं तक कि संवैधानिक संस्थाओं का हवाला देकर देश की जनता के सामने झूठ परोसने से भी कॉन्ग्रेसी बाज नहीं आते।

ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस ने यह संस्कार अपने छोटे कार्यकर्ताओं को ही दिए हैं। पार्टी के शीर्ष परिवार और उसके चक्कर काटने वालों ने भी यही घुट्टी पी रखी है।

यही वजह थी कि 2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गॉंधी ने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया था। उस वक्त मोदी गुजरात के चुने हुए मुख्यमंत्री थे। हालॉंकि पार्टी फिर कभी इस शब्द पर नहीं लौटी, क्योंकि गुजरात की जनता ने उसे इसका करारा जवाब दिया था। लेकिन, मोदी को लेकर इसके बाद भी पार्टी के शब्द ही बदले, संस्कार नहीं।

जनवरी 2014 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुए कॉन्ग्रेस सम्मेलन के दौरान गाँधी परिवार के वफादार माने जाने वाले मणिशंकर अय्यर ने मोदी के चाय बेजने की पृष्ठभूमि को लेकर तंज कसा था। उस समय भी मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद अय्यर मोदी के लिए ‘नीच’ और ‘कातिल’ जैसे शब्द का भी इस्तेमाल कर चुके हैं।

पिछले ही साल आम चुनावों के दौरान राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर जनता के सामने झूठ परोसा था। प्रधानमंत्री के लिए ‘चौकीदार चोर है’ जैसे बेबुनियाद नारे गढ़े थे।

ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेसी संस्कार सिर्फ मोदी के मामले में ही छिछला है। वे इसका प्रदर्शन हर उस मौके पर करते हैं, जब कोई उनकी मनमर्जी के आड़े आता है। पिछले साल दिसंबर में ऐसा वाकया लखनऊ में दिखा था। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी ने ड्यूटी कर रहीं एक महिला अधिकारी पर गला दबाने और जमीन पर गिराने का आरोप लगा दिया था। जबकि इस घटना के वीडियो में प्रियंका के साथ खड़े ‘गुंडे’ ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए थे।

कॉन्ग्रेसी संस्कारों के ये चंद नमूने। फेहरिस्त लंबी है। ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे हैं। कभी उसका नाम जाकिर हुसैन हो जाता है, तो कभी मणिशंकर अय्यर। कभी सोनिया होतीं हैं, तो कभी राहुल।

पर सोचिए, जिस संस्कार में पले-बढ़े लोग मजाक में पीएम की मॉं-बहन को गाली और देश के टुकड़े होने की बात करते हैं, असल जिंदगी में उनके कारनामे कैसे होते होंगे?

इन्हीं कारनामों की उपलब्धि है कि जिस चीन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट ‘द ग्रेट फायरवॉल’ के जरिए ब्लॉक कर दी जाती है, वहॉं राहुल गाँधी की वेबसाइट पर कोई रोक नहीं होती।

दिल्ली दंगा: हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या वाले चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी, जबकि आईपीएस अमित शर्मा और अनुज कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था। रतन लाल की हत्या मामले में दाखिल चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम है।

दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के अलावा छात्र नेता कंवलप्रीत कौर और वकील डीएस बिंद्रा के नाम का भी उल्लेख किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये तीनों 17 अभियुक्तों में तो शामिल नहीं हैं, लेकिन चार्जशीट में कहा गया है, “चाँद बाग में धरना प्रदर्शन के आयोजकों के संबंध डीएस बिंद्रा (AIMIM), कंवलप्रीत कौर (AISA), देवांगना कालिता (पिंजड़ा तोड़ ग्रुप), सफूरा जगरगर और योगेंद्र यादव जैसे लोगों से मिले हैं, जो कि साफ इशारा करते हैं कि हिंसा के पीछे कोई छुपा हुआ एजेंडा था।”

पुलिस के मुताबिक, चाँद बाग का प्रदर्शन मध्य-जनवरी से चल रहा था। 24 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गंभीर सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें, हेड कॉन्सटेबल रतन लाल समेत 53 लोगों की जान गई। इस मामले में 750 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। चार्जशीट के मुताबिक 17 आरोपितों की उम्र 18 से 50 के बीच है और उनमें से ज्यादातर चाँद बाग के ही रहने वाले हैं, जबकि कुछ पड़ोसी मुस्तफाबाद, जगत पुरी और प्रेम नगर में रहते हैं।

चार्जशीट में कहा गया है, “रतन लाल और एसीपी (गोकुलपुरी) और डीसीपी (शाहदरा) और कुछ अन्य पुलिसकर्मी चाँद बाग के धरना स्थल पर मौजूद थे। इसी दौरान उन पर भीड़ ने हमला कर दिया। रतन लाल वजीराबाद रोड पर स्थित डिवाइडर को कूदकर पार नहीं कर सके और गोली तथा पत्थर लगने से वहीं गिर पड़े। बताया गया कि रतन लाल को लाठी-डंडों से भी पीटा गया। उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनका पोस्टमार्टम 25 फरवरी को हुआ। रतन लाल की मौत गोली लगने से हुई। इसके अलावा उनके शरीर पर 21 जगह चोट के निशान थे।”

चार्जशीट में कहा गया है कि विरोध स्थल पर उपस्थित एक गवाह ने भी अपने बयान में योगेंद्र यादव का नाम लिया था। गवाह ने बताया कि विरोध स्थल पर बाहर से लोगों को बुलाया जाता था। यहाँ पर भानु प्रताप, डीएस बिंद्रा, योगेंद्र यादव, जेएनयू, जामिया और डीयू के कई छात्र आते थे, जो सरकार और NRC के खिलाफ बोलते थे और कहते थे कि समुदाय विशेष को चिंतित होना चाहिए। यह सब जनवरी से 24 फरवरी तक, यानी 50 दिनों तक जारी रहा।

वहीं योगेन्द्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में कहा, “मैंने जो कुछ भी कहा है वह पब्लिक डोमेन में है और कोई एक घटना बता दीजिए जब मैंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से हिंसा को भड़काने की बात कही।”

उल्लेखनीय है कि चार्जशीट में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया, “आरोपित व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से खुलासा किया कि चाँद बाग दंगो के पीछे की साजिश में उनके साथ डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, अतहर, शाहदाब, उपासना, तबस्सुम, रवीश और अन्य लोग शामिल थे।”

इसके अलावा, गिरफ्तार अभियुक्त शाहनवाज़ और इब्राहिम ने यह खुलासा किया कि इस दंगे के आयोजक डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, सुलेमान (सलमान), सलीम खान और सलीम मुन्ना थे। यह दंगा इन्हीं लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई साजिश का हिस्सा था।

शरजील इमाम के भड़काऊ भाषण से मंदिर की दानपेटी लूटी, आगजनी, पुलिस पर फायरिंग: SC में यूपी सरकार

देशद्रोह के आरोपित शरजील इमाम की सारी FIR की जाँच एक ही एजेंसी से कराने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने हलफनामा दाखिल किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि शरजील इमाम के खिलाफ यूपी पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को दिल्ली, मणिपुर, असम या अरुणाचल प्रदेश में पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि अलीगढ़ में उसके 16 जनवरी के भाषण ने सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ दिया। अगले दो महीने बड़े पैमाने पर आगजनी, पथराव और पुलिस पर गोलीबारी हुई।

बता दें कि ‘द वायर’ के स्तंभकार शरजील इमाम ने खिलाफ राज्यों में दर्ज सभी एफआईआर की जाँच एक ही एजेंसी से कराने की याचिका दायर की थी। योगी सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान आरोपी के भाषण का अलग-अलग स्थानीय प्रभाव हुआ। इसलिए ये उन अपराधों से अलग है जो अन्य राज्यों में किए गए थे, जैसा कि उन एफआईआर में दिखाया गया है।

राज्य सरकार ने कहा कि 16 जनवरी को एएमयू में भड़काऊ भाषण के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर वायरल होने के बाद अलीगढ़ जिले में बड़े पैमाने पर पथराव, आगजनी और गोलीबारी की घटनाएँ हुईं। 23 जनवरी को, एएमयू छात्रों सहित लगभग 150-200 प्रदर्शनकारियों ने सड़क जाम की और घृणा फ़ैलाने वाले नारे लगाए।

31 जनवरी को, एएमयू के छात्रों सहित 500 से अधिक व्यक्तियों ने एकत्र होकर सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान भयावह स्थिति पैदा कर दी। 23 फरवरी को, 500-600 से अधिक अज्ञात व्यक्तियों ने पथराव किया, मंदिरों में दान पेटी लूटी। पुजारियों के साथ हाथापाई की। जिससे तनाव और बढ़ गया।

23 फरवरी को फिर से, एक पूर्व-योजनाबद्ध तरीके से एक हजार से अधिक व्यक्तियों ने कोतवाली उपकोट में जबरन प्रवेश किया और अवैध हथियारों से गोलीबारी करके दंगे की स्थिति पैदा कर दी।

24 फरवरी को, एक समूह ने नफरत फैलाने वाले नारे लगाए और पुलिस पर पथराव और गोलीबारी की। अवैध हथियारों से कई पुलिसकर्मियों को घायल किया गया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया।

यूपी सरकार ने कहा कि अलीगढ़ एफआईआर को दिल्ली और अन्य राज्यों में दर्ज एफआईआर के साथ जोड़ना, अलीगढ़ में शरजील के भड़काऊ भाषण और उसके बाद की घटनाओं के साथ लिंक की जाँच के लिए घातक होगा, जिसने सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट कर दिया और समुदायों के बीच नफरत पैदा की। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में सुनवाई स्थगित कर दी है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (जून 19, 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम के ख़िलाफ विभिन्न अदालतों में मुकदमा चलाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इमाम की याचिका पर सभी पाँच राज्यों के जवाब देखे बगैर कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने इस संबंध में मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश से 2 सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने को कहा था।

350 चीनी, बिहार रेजिमेंट के 100 जवान: बरसते पत्थरों के बीच 3 घंटे, उखाड़ फेंके चीन के तम्बू

कहते हैं- एक बिहारी सौ पर भारी। भारत और चीन के बीच गलवान वैली में हुए हिंसक संघर्ष में ये कहावत एक बार फिर से चरितार्थ हुई। बिहारियों ने दिल्ली और पंजाब से लेकर गुजरात और मुंबई तक की आर्थिक प्रगति में लगातार योगदान दिया ही है। अब उन्होंने एक बार फिर से दिखाया है कि सीमा पर देश की सुरक्षा करने में भी उनका कोई तोड़ नहीं है। बिहार रेजिमेंट ने एक बार फिर से बिहार का सिर गर्व से ऊँचा किया है।

ये कहानी शुरू होती है सोमवार (जून 15, 2020) की शाम से, जब भारत के 3 इन्फेंट्री डिवीजन कमांडर अन्य अधिकारियों के साथ श्योक और गलवान रिवर वैली के वाई जंक्शन पर मौजूद थे। ईस्टर्न लद्दाख में दोनों ही देशों के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन चीन ने पीठ में छुरा घोंप दिया। भारतीय सशस्त्र बलों को ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो वहाँ से चीनियों पर नज़र रखें कि वो पोस्ट को खाली कर रहे हैं या नहीं।

16 बिहार रेजिमेंट को भी इसी काम में लगाया गया था। चाइनीज ऑब्जरवेशन पोस्ट में 10-12 सैनिक थे, जिन्हें भारतीय सेना ने वहाँ से जाने कह दिया था, क्योंकि दोनों ही देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में यही समझौता हुआ था। भारतीय सेना के कहने के बावजूद वो लोग वहाँ से नहीं हट रहे थे। इसके बाद कर्नल संतोष बाबू लगभग 50 सैनिकों के साथ वहाँ चीनियों को ये कहने गए कि वे भारतीय सरजमीं को खाली करें।

चीनियों ने गलवान रिवर वैली में पीछे एक बैकअप टीम तैयार रखी थी। उसमें कम से कम 300-350 सैनिक थे। जब भारतीय पेट्रोलिंग यूनिट वहाँ से लौटी, तब तक उन्होंने बैकअप टीम को बुला लिया। जब भारतीय गश्ती दल वहाँ लौटा तो चीनियों ने पहले ही एक ऊँचे स्थान को देख कर वहाँ हथियारों संग डेरा जमा लिया था। वो हमले के लिए एकदम तैयार बैठे थे। उनके पास पत्थर, लोहे के रॉड्स, लाठी-डंडे व अन्य नुकीले हथियार थे।

दोनों ही देशों की सेनाओं के बीच जब बातचीत शुरू हुई तो जिद्दी चीनियों ने वापस जाने से इनकार कर दिया और बहस करने लगे। इसके बाद भारतीय सेना के जवानों ने उनके टेंट्स और अन्य संरचनाओं को उखाड़ना शुरू कर दिया, क्योंकि वो भारतीय ज़मीन कब्जा कर बैठे हुए थे। वो हमले के लिए तैयार थे, आक्रामक थे, उन्होंने अचानक से हमला कर भी दिया। बिहार रेजिमेंट के सीओ और एक हवलदार पर पहले हमला किया गया।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, जैसे ही सीओ नीचे गिरे, बिहारी रेजिमेंट के जवान क्रोधित हो गए। भले ही उनकी संख्या चीनियों से काफ़ी कम थी, भले ही चीनी पहले ही उचित स्थान देखकर हमले के लिए बैठे थे, भले ही चीनियों के पास जानलेवा हथियार थे- जब बिहारी रेजिमेंट ने बदले की कार्रवाई की तो उनके छक्के छूट गए। जवानों पर लगातार पत्थर बरस रहे थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

इसे संघर्ष या युद्ध कह लीजिए, ये लगभग तीन घंटों तक चला। बिहारी रेजिमेंट ने चीनी सेना को नाकों चने चबवा दिए। उनमें से कई मारे गए, कई घायल हुए। हमारे 20 जवान भी वीरगति को प्राप्त हुए। हमारे कुल 100 जवान थे, जिन्होंने 350 चीनी सैनिकों को परास्त किया। आखिरकार बिहारी रेजिमेंट ने भारत की ज़मीन पर स्थापित चीनी तम्बुओं को उखाड़ फेंका। हमारे बलिदानियों के बारे में पीएम मोदी ने ठीक ही कहा था- “वो मारते-मारते मरे हैं।”

हाल ही में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने खुलासा किया है कि भारत ने चीन के कई सैनिकों को पकड़ा था लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। वीके सिंह ने गलवान घाटी संघर्ष को लेकर जानकारी दी कि इस झड़प में चीन के दोगुने सैनिक मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि हमारे 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो चीन के इससे ज्यादा सैनिक मारे गए हैं। लेकिन चीन कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं करेगा।