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इंडस्ट्री बेहद क्रूर और निर्दयी, दीवार पर सिर मारने से क्या होगा: बॉलीवुड में नेपोटिज्म पर बरसे रणवीर शौरी

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या करने के बाद से सोशल मीडिया पर तेजी से इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि उन्हें आखिरकार ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा। बॉलीवुड से जुड़े लोग ही इंडस्ट्री में चल रहे नेपोटिज्म को इसका जिम्मेदार बता रहे हैं।

कंगना रनौत, रवीना टंडन, शेखर कपूर और अभिनव कश्यप के बाद एक्टर रणवीर शौरी ने भी नेपोटिज्म को लेकर बड़े सवाल खड़े किए हैं। रणवीर शौरी ने फिल्म इंडस्ट्री को बेहद क्रूर और निर्दयी बताया। सुशांत और रणवीर शौरी दोनों ‘सोनचिड़िया’ में साथ काम कर चुके हैं। दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे, लेकिन सुशांत के जाने के बाद रणवीर ने अपनी प्रतिक्रिया से इंडस्ट्री पर सवाल खड़े किए।

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, रणवीर ने कहा कि पूरी इंडस्ट्री पर नेपोटिज्म हावी है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में वे इस लालच में मेनस्ट्रीम में छोटे-मोटे रोल कर लेते थे कि शायद नोटिस होने से अच्छा काम मिलेगा। फिर समझ आया कि वे आपको नोटिस ही नहीं करना चाहते हैं। फिर दीवार में सर मारने से क्या होगा।

वो कहते हैं कि यही वजह है कि उन्होंने अपनी महत्वकांक्षाएँ कम कर ली। समझ गया कि मुझे कभी भी उनके मेनस्ट्रीम फिल्मों में लीड भूमिकाएँ नहीं मिलेगी। चाहे एक्टिंग कितनी ही अच्छी क्यों न हो। इसलिए उन्होंने छोटी फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया।

रणवीर आगे कहते हैं, “मुझे पता है कि जब मैं घर से निकलूँगा तो लोग मेरी गाड़ी को नहीं घेरेंगे और फोटो के लिए शोर करना शुरू नहीं करेंगे, लेकिन मेरा अपना काम चल जाएगा। कई बार ऐसा भी हुआ है कि मुझे दो-दो साल कोई काम नहीं मिला और मुझे घर पर बैठना पड़ा लेकिन मैंने इंतजार किया और आगे भी करूँगा।” 

गौरतलब है कि इससे पहले भी एक्टर रणवीर शौरी ने कुछ ट्वीट्स के जरिए बताया था कि कैसे बॉलीवुड के अंदर नेपोटिज्म चलता है। उन्होंने कहा कि एक अवॉर्ड फंक्शन में एक स्टार किड शो होस्ट कर रहा है। बेस्ट एक्टर की कैटेगिरी की घोषणा की जाती है। नॉमनीज में वो स्टार किड भी है जो शो होस्ट कर रहा है।

वे लिखते हैं, “विनर की घोषणा करने के लिए होस्ट दो फिल्म पर्सनालिटी को बुलाते हैं जो हो सकता है कि किसी स्टार किड के परिजन होते हैं। कितना प्यारा इत्तेफाक है। फिर प्रजेंटेटर्स लिफाफा खोलते हैं और विजेता के नाम की घोषणा करते हैं, जो कि एक स्टार किड ही होता है।”

अपने अंतिम ट्वीट में रणवीर लिखते हैं, “स्टार किड होस्ट के डाइस से अवॉर्ड स्वीकार करने के लिए आगे बढ़ता है और एक छोटा सा थैंक्यू स्पीच देता है और फिर बाकी के शो को हेस्ट करने के लिए वापस आता है… फिर ऐसे ही जारी रहता है। ये है मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फैमिली।”

सुशांत सिंह राजपूत के जाने के बाद तमाम स्टारकिड्स को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया। करण जौहर, यशराज फिल्म्स व बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस पर आरोप लगे कि वह आउटसाइडर्स पर दबाव बनाते हैं व काम नहीं देते।

एक बार फिर कंगना रनौत ने भी करण जौहर के अलावा तमाम बड़े प्रोडक्शन हाउस व निर्देशकों पर आरोप लगाए। उन्होंने इंडस्ट्री के असली चेहरे की पोल खोलते हुए सवाल पूछा था कि सुशांत की मौत आत्महत्या है मर्डर। रवीना टंडन ने भी बॉलीवुड की ‘गंदगी’ को लेकर ट्वीट किया था।

विवादित नक्शे के बाद FM चैनलों पर भारत विरोधी गाने, उत्तराखंड तक आ रही आवाज: नेपाल की नई करतूत

नेपाल ने कुछ दिनों पहले अपने विवादित नक्शे में भारत के कुछ इलाकों को शामिल किया था। अब वह अपने एफएम चैनल्स पर भारत विरोधी गानों का प्रसारण कर रहा है। इन गानों के जरिए वह लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा के इलाकों को भारत से वापस लेने की बात कह रहा है।

इन गानों का प्रसारण धारचुला एफएम समेत कुछ और चैनलों पर हो रहा है, जिसे उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय इलाकों में सुना जा सकता है। ये इलाके नेपाल की सीमा के पास हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में टीचर की नौकरी करने वाली बबिता सांवल बताती हैं कि वह रोज अपने स्कूल से लौटते वक्त नेपाल के धारचुला एफएम सुनती थीं। हाल के दिनों में इस एफएम चैनल पर भारत विरोधी गानों का प्रसारण शुरू हो गया है, जिन्हें हर घंटे कई बार बजाया जाता है। इसे देखते हुए अब उन्होंने इन चैनलों को सुनना बंद कर दिया है।

बबिता सांवल एक गाने के बोल को याद करते हुए बताती हैं कि इसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को वापस लेने की बात कही जाती है। एक अन्य गाने में कहा जा रहा है, “लिपुलेख और कालापानी हमारा होना चाहिए, यह हमारी भूमि है जो चोरी हो गई है।”

बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ गाने पुराने हैं तो कुछ गानों को हाल के कुछ महीनों में ही रिकॉर्ड कराया गया है। कुछ गाने यू-ट्यूब जैसे सोशल प्लेटफॉर्म पर भी शेयर किए गए हैं।

पिथौरागढ़ के धारचूला उपमंडल के दांटू गांव निवासी शालू दताल ने बताया कि कुछ नेपाली एफएम चैनलों ने नेपाली गीतों के बीच भारत विरोधी भाषण देना शुरू किया है। उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों ओर के लोग नेपाली गाने सुनते हैं। इस बीच वे नेपाली नेताओं के भारत विरोधी भाषण भी सुनते हैं।

नेपाल के मुख्य एफएम चैनलों के अलावा कुछ पुराने एफएम चैनल जैसे मल्लिकार्जुन रेडियो और annapurna.online जैसे वेबसाइट भारत विरोधी बातें रिपोर्ट करते हैं। कालापानी को नेपाल का हिस्सा बताते हैं।

धारचूला के रंग समुदाय के एक नेता कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि इन रेडियो स्टेशनों ने कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाली क्षेत्र मानते हुए यहाँ के मौसम की रिपोर्ट देना भी शुरू कर दिया है।

हालाँकि, जिला प्रशासन और पुलिस ने कहा कि उन्हें अपने एफएम रेडियो चैनलों के माध्यम से नेपाल द्वारा शुरू किए गए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पिथौरागढ़ की पुलिस अधीक्षक प्रीति प्रियदर्शनी ने कहा, “इस विषय पर हमारी खुफिया इकाइयों ने कोई फीडबैक नहीं दिया है।”

धारचूला सर्किल अधिकारी वीके आचार्य ने भी इस पर अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने कहा, “हमारी खुफिया इकाइयों ने अभी तक नेपाल द्वारा भारत विरोधी किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के बारे में नहीं बताया है।” वहीं व्यास घाटी के नेता अशोक नब्याल ने कहा कि सीमा पर सक्रिय भारतीय खुफिया एजेंसियों को प्रोपेगेंडा का जवाब देने में सक्षम होने के लिए स्थिति का संज्ञान लेने की आवश्यकता है।

चीन के साथ तनातनी के बीच सेना को इमरजेंसी फंड, 500 करोड़ रुपए तक के हथियार खरीद सकेंगे

चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच केन्द्र सरकार ने तीनों सेनाओं के लिए 500 करोड़ रुपए के इमरजेंसी फंड को मंजूरी दी है। इस रकम से सेना जरूरत के मुताबिक हथियार और गोला-बारूद खरीद सकती है।

इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक सरकार ने तीनों सेनाओं के उप प्रमुखों को खतरनाक हथियारों की तात्‍कालिक और आपात खरीद के लिए 500 करोड़ रुपए तक की वित्तीय शक्तियाँ दी हैं। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है कि जब पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना ने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों की तैनाती कर दी है।

इससे पहले सीमा पर बढ़ते तनाव को देखते हुए तीनों सेनाओं ने पहले ही आपात हथियारों की सूची को बनाना शुरू कर दिया था। इस सूचा में तात्कालिक जरूरत और कम समय में खरीदे जाने वाले हथियारों को रखा गया है।

आज तक की खबर के मुताबिक रक्षा मंत्री कल (22 जून, 2020) रूस जा रहे हैं। सम्भावना जताई जा रही है कि इस दौरान सेना के लिए इमरजेंसी हथियारों की खरीद की जा सकती है।

हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं है कि जब सरकार ने सेनाओं को हथियार खरीद के लिए आपात फंड को मंजूरी दी है। इससे पहले भी उरी हमले और पाकिस्तान के खिलाफ बालाकोट हवाई हमलों के बाद भी सशस्त्र बलों को इसी तरह की वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गईं थी। वैसे भी उरी हमले के बाद सेना ने बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों के साथ कुछ मिसाइलों का भी स्टॉक किया है।

गौरतलब है कि बीते सोमवार 15 जून को गलवान घाटी पर चीनी सैनिकों से हुई हिंसक झड़प में 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जबकि चीन के 43 सैनिकों के मार जाने की खबर है। लद्दाख में हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।

मीडिया ने सुशांत को किया गोल, पूरा फुटेज खा गई सारा अली खान: केदारनाथ के डायरेक्टर ने बताई अंदर की बात

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद लोग एक के बाद एक उनसे जुड़े अनुभवों को शेयर कर रहे हैं। कुछ बातें पुलिस पूछताछ में सामने आई हैं तो कुछ ने मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखी है।

फिल्म निर्देशक अभिषेक कपूर ने खुलासा किया है कि ‘केदारनाथ’ की रिलीज के बाद मीडिया ने सारा अली ख़ान को तो सिर-आँखों पर बिठा लिया था, लेकिन सुशांत सिंह राजपूत को नकार दिया था, जिससे वो बुझे-बुझे से रहते थे। इस फिल्म के डायरेक्टर अभिषेक ही थे। उन्होंने ही सुशांत की लॉचिंग फिल्म ‘काई पो चे’ को भी डायरेक्ट किया था।

बता दें कि उत्तराखंड बाढ़ आपदा पर आधारित ‘केदारनाथ’ दिसंबर 2018 में रिलीज हुई थी। इसमें सुशांत और सारा के अलावा नीतीश भारद्वाज ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक कारोबार ही किया, लेकिन फिल्म को अच्छी-ख़ासी चर्चा मिली थी। सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी सारा अली ख़ान ने इस फिल्म से बॉलीवुड में क़दम रखा था। उनकी तस्वीरें खूब वायरल हुई थी।

अभिषेक कपूर ने बताया कि उन्होंने पिछले डेढ़ साल से सुशांत से बातचीत नहीं की थी, क्योंकि उन्होंने क़रीब 50 बार अपना फोन नंबर बदला था। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी तरह याद है कि जब ‘केदारनाथ’ रिलीज हुई थी तो मीडिया ने उनकी जम कर आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि सुशांत को ऐसा महसूस हो रहा था कि उन्हें वैसा प्यार नहीं मिल रहा है, जबकि सारी चीजें सारा को लेकर ही कही जा रही है।

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अभिषेक कपूर ने इंस्टाग्राम पोस्ट के माध्यम से साझा की अपनी बात

अभिषेक कपूर के मुताबिक़, उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत को कुछ मैसेज भेजे भी थे। कपूर ने बताया कि मीडिया द्वारा इस तरह का भेदभाव किए जाने के कारण सुशांत अंदर से बुझे-बुझे से रहते थे। कपूर ने बताया कि फिल्म ने रिलीज के बाद काफी अच्छा किया और उसके बाद उन्होंने सुशांत को जो मैसेज भेजे, वो उन्हें अब तक याद है। उस मैसेज में कपूर ने सुशांत को लिखा था- “भाई, मैं लगातार आपसे बात करने का प्रयास कर रहा हूँ। मुझे कुछ नहीं पता है कि आप किसी कारणवश नाराज़ हो या फिर व्यस्त हो। हमने एक बार फिर से इतनी अच्छी फिल्म बनाई है। अगर हम ख़ुशी नहीं मनाएँगे तो फिर कौन मनाएगा? या नहीं तो फिर ज़िंदगी में और किस चीज की ख़ुशी मनाएँगे हम लोग?

अभिषेक कपूर ने जनवरी में सुशांत सिंह राजपूत को फिर से मैसेज भेज कर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी। कपूर ने कहा कि मैसेज का रिप्लाई नहीं आया तो उन्होंने इस चीज को हलके में लिया और सोचा कि वो गए हैं तो फिर आएँगे ही। कपूर ने बताया कि सुशांत की विज्ञान में रूचि थी और वो ब्रह्माण्ड की अनसुलझी चीजों का अध्ययन करते रहते थे।

कंगना रनौत ने भी कहा था कि न्यूज में ब्लाइंड आइटम लिखे ही इसलिए जाते हैं, ताकि जब कोई झूठ बोले, तो उसके ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न हो सके। मगर, उसके भीतर में जो व्यक्ति से जुड़ा विवरण होता है, वो सभी बातों को स्पष्ट कर देता है। जैसे यदि मेरे बारे में कोई लिखे तो उसमें लिखेगा- वो लड़की जिसके घुंघराले बाल हैं, नेशनल अवॉर्ड मिला हुआ, साइकोटिक है, मनाली से है… इस तरह मेरे ख़िलाफ़ लिखते हुए मेरा विवरण पूरा लिख दिया जाएगा लेकिन नाम नहीं लिखा जाएगा।”

लिबरल गिरोह ने गलवान में सैनिकों के बलिदान का उड़ाया मजाक, बिहार चुनाव से जोड़ रचा प्रोपेगेंडा

भारत और चीन के बीच तनाव ने 15 जून 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसक रूप ले लिया था। खूनी झड़प में भारत के 20 जवान बलिदान हो गए थे। वहीं सोशल मीडिया पर जंग लड़ने वाले लिबरल गैंग ने इस दुखद घटना को लेकर अपनी घटिया मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया है।

हमेशा की तरह लिबरल्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मगर इस बार लिबरल्स न केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का, बल्कि सैनिकों के बलिदानी का भी मजाक उड़ाया है। इतना ही नहीं इस पूरे मामले को लिबरल गैंग ने बिहार में आने वाले चुनावों से जोड़ा है।

@BrandySahni नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “अजीब बात है कि हर चुनाव से पहले हमेशा शहीद होने वाले जवानों का इस्तेमाल किया जाता है, इस बार भी (पीएम मोदी) ने फिर से सैनिकों को निशाना बनाया है। बिहार रेजिमेंट के सैनिक बिहार में चुनाव से पहले मारे गए हैं। यह महज संयोग नहीं हो सकता अगर यह पूर्वनियोजित है तो।”

वहीं ट्विटर पर अपने आप को एएफपी का फैक्ट चेकर’ होने का दावा करने वाले उज़ैर हसन रिज़वी ने लिखा कि भारतीय सेना के बिहार रेजिमेंट में विभिन्न राज्यों के सैनिक हैं। इसके बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पीएम मोदी के अपने शोक संदेश में बिहार का उल्लेख आगामी बिहार चुनावों में फायदा पाने के लिए किया है।

एक अन्य ट्विटर यूजर @ jameel7866786 ने 2019 में पुलवामा में सैनिकों की शहादत और हाल ही में हुए भारतीय और चीनी सेना के बीच सीमा पर खूनी हिंसक झड़प को एक बड़ा षड्यंत्र बताया है। 2019 के जनरल इलेक्शन को दुखद पुलवामा हमले और बिहार रेजिमेंट के 20 जवानों की शहादत को बिहार चुनाव से जोड़ते हुए, उन्होंने लोगों को दो परस्पर घटनाओं को लेकर इन्हें आपस में जोड़ने को कहा।

वहीं प्रोफेसर नाम के एक ट्विटर यूजर ने तो बिहार चुनावों के समय के ‘संयोग’ और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर बिहार रेजिमेंट को तैनाती करने के निर्णय पर सवाल उठाया।

“पीएम मोदी ने चीन को गैलवान घाटी दे दी” जैसे एक बेतुके और बेबुनियाद ट्वीट का जवाब देते हुए कॉन्ग्रेस समर्थक @ SamanSutiya1 ने लिखा कि 20 भारतीय सैनिकों की शहादत असल में बिहार चुनाव के जीत से जुड़ी थी। उन्होंने दावा करते हुए लिखा “20 में से 13 बिहार के थे। अब (बीजेपी) बेनिफिट ले सकती है।”

वहीं ससिधरन पझूर ने लिखा, “बिहार चुनाव आ रहे है। बिहार रेजिमेंट दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। नहीं, मैं कोई सुझाव नहीं दे रहा हूँ। ” दिलचस्प बात है कि ऐसी रणनीति लिबरल्स के पाठ्यपुस्तक में ही देखी जा सकती है कि किस तरह लोगों के सामने झूठ पेश करके उनके मन में संदेह के बीज बोए जा सकते हैं।

हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई के एक ट्वीट का जवाब देते हुए देश नामक एक यूजर दावा करता है कि उसने बिहार चुनाव में फायदे के लिए सीमा पर बिहार रेजिमेंट को तैनात करने के इस षड्यंत्र में अपने भाई को खो दिया है।

उल्लेखनीय हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब लिबरल जमात के गैंग द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश रची गई हो। पुलवामा हमले पर भी कई कॉन्ग्रेस समर्थकों ने उस घटना को षड्यंत्र बताते हुए कहा था कि पुलवामा अटैक प्रधानमंत्री के इशारे पर हुआ था।

कॉन्ग्रेस का विश्वास जीतने के लिए उनके ही एक नेता ने पुलवामा से ‘इनसाइड जॉब’ करार देते हुए यह सवाल किया था। जिसके बाद उसे पार्टी द्वारा लोकसभा टिकट भी दिया गया था। वहीं दूसरी ओर गोवा कॉन्ग्रेस के एक नेता ने भी आतंकी हमले के सबूत माँगे थे। इसके साथ ही पीएम मोदी पर पुलवामा हमले की योजना बनाने का आरोप भी लगाया था।

गौरतलब है कि कर्नाटक कॉन्ग्रेस के एक सांसद ने तो यहाँ तक कह दिया था कि पुलवामा हमला पीएम मोदी और पाकिस्तान के बीच एक ‘मैच फिक्सिंग’ था। कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार को घेरने के लिए यह ​​सवाल भी उठाया था कि कैसे विस्फोटक वहाँ तक पहुँचा?

वहीं पुलवामा अटैक को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि पीएम मोदी को पुलवामा हमले के बारे में पहले से पता था और उन्होंने फिर भी इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया था।

पुरी रथ यात्रा: BJP ने कहा- फैसले में संशोधन के लिए SC जाए ओडिशा सरकार, शंकराचार्य से करे चर्चा

23 जून को आषाढ़ द्वितीया। इसी तिथि पर हर साल धूमधाम से जगन्नाथ महाप्रभु की रथ यात्रा आयोजित की जाती है। वैश्विक कोरोना संक्रमण को देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाले रथ यात्रा पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि अगर उन्होंने इस साल इसकी इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ उन्हें माफ नहीं करेंगे।

रविवार (जून 21, 2020) को ओडिशा भाजपा अध्यक्ष समीर मोहंती ने पुरी में रथ यात्रा के संचालन के लिए राज्य सरकार से पुरी के राजा गजपति दिब्यसिंह देब के प्रस्ताव के अनुसार कदम उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि ओडिशा सरकार को पुरी शंकराचार्य से भी चर्चा करनी चाहिए।

जारी किए गए एक वीडियो में समीर मोहंती ने कहा कि सरकार को दिए गए विस्तृत पत्र में गजपति द्वारा उठाए गए मुद्दों का विश्लेषण करना चाहिए और उसके अनुसार कदम उठाना चाहिए।

गजपति ने शनिवार (जून 20, 2020) को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पत्र लिख कर रथ यात्रा को अनुमति देने के लिए अपने आदेश को संशोधित करने के लिए तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रूख करने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद, प्रबंध समिति और छठिहसा निजोगा ने सर्वसम्मति से सरकार से अपील करने का फैसला किया।

गजपति महाराजा ने COVID-19 महामारी के खिलाफ पर्याप्त सावधानियों के बीच रथ यात्रा आयोजित करने के अपने तर्क के लिए शास्त्रों, परंपराओं, ऐतिहासिक तथ्यों को उद्धृत करते हुए औचित्य को भी सामने रखा।

भाजपा नेता ने सरकार से इस मुद्दे पर पुरी शंकराचार्य से परामर्श करने को कहा, क्योंकि पिछले दो दिनों से अदालत के साथ-साथ अधिकारियों से भी अपील जा रही है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (जून 20, 2020) को भाजपा ने एक बयान में कहा था कि यद्यपि यह दुखद है, लेकिन हर किसी को रथयात्रा पर शीर्ष अदालत के आदेश का पालन करना चाहिए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष समीर मोहंती ने कहा था, “हमें सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कि इस महीने महामारी चरम पर है।” 

हालाँकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता बिजय महापात्रा ने कहा कि भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े उत्सव को अचानक रद्द किए जाने से राज्य सरकार की भूमिका ‘‘संदेह’’ के दायरे में रहेगी। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के आदेश का पालन करना सभी का दायित्व है, लेकिन महामारी के बीच रथयात्रा के आयोजन को लेकर सरकार की तरफ से इच्छाशक्ति की कमी थी।

उल्लेखनीय है कि ओडिशा में रथ यात्रा को लेकर राज्य सरकार पहले से ही संदेह के घेरे में है। बुधवार (जून 10, 2020) को बीजेपी ने ओडिशा सरकार से इस पर स्थिति स्पष्ट करने की माँग की थी। भाजपा के प्रदेश महासचिव पृथ्वीराज हरिचंदन ने संवाददाताओं से कहा था कि रथ यात्रा में कुछ ही दिन बचे हैं और राज्य सरकार की चुप्पी से भक्तों और ओडिशा के 4.5 करोड़ लोगों में चिंता पैदा हो गई है।

भाजपा नेता ने कहा था कि इस समय तक उत्सव के लिए तैयारी बैठकें होनी चाहिए थीं लेकिन आयोजन को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण कोई चर्चा नहीं हुई है। हरिचंदन ने कहा कि मुख्यमंत्री को बयान देना चाहिए और राज्य तथा देश के लाखों लोगों के मन से संदेह दूर करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना वायरस महामारी के कारण राज्य सरकार रथ यात्रा कराने के पक्ष में नहीं दिख रही है।

120 सीटें… सूमो बाबू ही करा सकते हैं: भोलानाथ ठाकुर (टेलीग्राफ वाले) ने देर रात CM की बढ़ाई टेंशन

सेक्रेटरी: CM साहब, ठाकुर आया है।

इतनी रात गए, CM सोच मे पड़ गए? पहले सोचा कल बुला लेते हैं। नजर उठा के सेक्रेटरी को प्रश्नसूचक नजरों से देखा। सेक्रेटरी समझ गया। खुद ही बोल पड़ा- टेलीग्राफ वाला।

ऐसा नहीं था कि CM साहब जानते नहीं थे। पर सेक्रेटरी का मतलब था, “मिल लीजिए।” मुख्यमंत्री अनिच्छा से बोले, “भेजिए।”

ठाकुर भी मानो दरवाजे से लगा ही खड़ा था, झट से अंदर आ गया। CM साहब ने दूर से ही संबोधित किया, “आओ ठाकुर… अब देश का राजधानी छोड़ हमारा राजधानी पसंद आने लगा?” ठाकुर संकोचपूर्वक मुस्कुरा कर एक-एक कदम धीरे-धीरे रखता आगे आया। मुख्यमंत्री जी हँस कर बोले, “अरे आओ बैठो। तुमसे मिलने के लिए तो मै हमेशा बेताब रहता हूँ।”

भोलानाथ ठाकुर CM साहब को सालों से जानता था, पर आज भी वे उसके बारे में क्या सोचते थे, इसकी थाह नहीं पाता था। वह धीरे से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मेज पे रखा पानी पिया और चाय का कप हाथ में लेकर, बिना समय नष्ट किए सीधा मुद्दे पे आया, “यह मजदूरों का इशू गरमाया हुआ है। आपके बंधू पार्टी वाले भी पूरा फायदा लेंगे।”  ठाकुर, चाय की चुस्की लेने के लिए रुका, CM साहब, ध्यान देके सुन रहे थे।

“इन सबमें, सबसे ज्यादा हमारी छवि को नुकसान हुआ है।” 

CM की नजर में सवाल था। “राज्य की छवि को…” ठाकुर ने स्पष्ट किया। CM, “क्यों, UP में तो हमसे ज्यादा लोग वापस गए?” ठाकुर, “CM साहब, UP की बात अलग है। वहॉं तो कुछ गलत हो नहीं सकता। वहाँ आपके कर्मठ मित्र कुछ गलत होने नहीं देंगे।”

CM ने आग में तेल डाला, “तो यह कौन सा पराया राज्य है।” ठाकुर, “क्या सर, आप मुझ से ही मजाक कर रहे हैं? आप भी जानते हैं सच्चाई क्या है। सरजी, यह सुशासन बाबू का इमेज बनने में 15 साल लगे। यह एक कोरोना पूरा बॅंटाधार कर देगा।” CM साहब ने ठाकुर को पैनी नजर से देखा, “ठाकुर बात तो तुमने सही कही, पर यह या तो हम जानते हैं या तुम। और अगर हम तुमको ठीक से जानते है तो, यह बतलाने के लिए तो तुम ना आए।”

ठाकुर शर्माया, बोला, “आप तो दिल की बात पकड़ लेते हैं। CM साहब, ये जो अपने डॉक्टर साहब हैं, कमाल का काम करते है टीवी पर…” और अंदाज़ा लेने के लिए रुक गया। CM सुन रहे थे, “पर कभी-कभी बहुत ज्यादा मात्रा हो जा रहा रामधुन का… और देशभक्ति का… लगता है अपनी अपनी पार्टी के हैं भी कि नहीं।”

CM सोच में दिखे। उसने  फिर बोलना शुरू किया, “उनकी बातों का हमको तो कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा। इनसे अच्छे तो वही थे।”     

इस बात से CM का गुस्सा उमड़ पड़ा, “अरे धत्त…क्या  बोल रहे हैं? आप तो जानते है हमको। यही सब हमको अच्छा नहीं लगता आप पत्रकार लोगों का। चरवाहों के साथ? एक बार आपही के बात में आकर… और वोह आपकी दिल्ली वाली TV स्टार पत्रकार। पूरा टाइम उसी के साथ फोटो, इंटरव्यू…और हमारा सामने तरफदारी। जब बाद में जेल हुआ तब? सब गायब?”     

और CM रुक गए। ठाकुर को कुछ पल के लिए लगा, कहीं भगा न दे। ऐसा कुछ नहीं हुआ। पर वह उठ के खड़े हो गए, बोले “और बताओ कब तक हो?” ठाकुर समझ गया। बोला “चलते-चलते एक बात कहने की इजाजत दीजिए। छोड़िए उनको। मैडम के साथ जाने में क्या खराबी है?” बिना जवाब दिए CM उठ के चल दिए। ठाकुर भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। 

CM काफी देर ठाकुर की बात पर सोचते रहे। नेशनल लीडर बनने का उनका ख्वाब, हिन्दू पॉलिटिक्स के चक्कर मे एक बार चकनाचूर हो चुका था। अब क्या यह ब्राह्मण-बनिया पार्टी मेरी इस कुर्सी की भी क़ुर्बानी लेगी? कैसे इतना सबकुछ बदल सकता है सिर्फ दो लोगों से? हजारों नेताओ की, लाखों कार्यकर्ताओं की और करोड़ों सदस्यों की पार्टी सिर्फ 2 लोगों ने बदल दी? 

उनको 20 साल पुराना समय याद आया। कैसा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण था दोनों पार्टियों में। फिर 2002 भी याद आया। तभी अगर कविवर, गुजरात मे किसी और को CM बना देते, तो आज NDA अपनी गिरफ्त में होता। और शायद आज प्रधानमंत्री भी…

पर 2014 तक तो सब ठीक ही था। ये दोनों जब से दिल्ली पहुँचे हैं सब बदल गया। अब तो डर लगता है हिन्दू शब्द से और इस पार्टी से। लगता है खा जाएँगे किसी दिन। ठाकुर बात तो सही कर रहा था। PK की  बात से मेल खाती!!!

PK की याद से CM के हृदय में आश्वासन का भाव जागा।  

सुबह इस खबर से हुई कि डिजिटल रैली को लोगों ने जबरदस्त सराहा है। CM को यह भी ठीक नहीं लगा था। अभी सीट शेयरिंग भी नहीं हुई और ये निकल भी पड़े, TV से लोगों को लुभाने। Seat Sharing से उनको तीसरे हिस्सेदार को भी समायोजित करना हैं, यह बात फिर चुभी। यह कौन कम थे, तो साथ में इनके मामा के लड़के…मौसम वैज्ञानिक बाप-बेटा। (राष्ट्रप्रेमी पार्टी के एक प्रेमी पत्रकार ने TV पर CM को भी मौसम वैज्ञानिक बुलाया था यह बात अलग है) हमेशा कुछ न कुछ माँगते रहते हैं… पिछड़ा-पिछड़ा बोल के मलाई खींचने के काम करते हैं दोनों। 

इन सब चिंताओं के साथ में कोरोना (corona) का डर था ही। पर CM को migrant labour वाली बात खाए जा रही थी। अगर ये नवंबर तक वापस नहीं गए तो? कितनी सीट पर असर होगा? CM जानते थे, मोटा भाई उनको 100 से ज्यादा सीटे देना नहीं चाहते। इस माइग्रेंट लेबर इश्यू के चलते CM को मोलभाव करनते की ताकत क्षीण होती दिख रही थी।

PK और ठाकुर जैसे अवसरवादियों की बातों पे गौर करना तो ठीक है, पर इस परिस्थिति में क्या इन पर भरोसा कर सकते हैं? CM इसका जवाब जानते थे। ऐसे में उनको लगा, उनके सबसे पुराने साथी, भले ही वो उस तरफ हो, पर उन पर ही भरोसा करना ठीक रहेगा।

CM को पूरा भरोसा था सूमो बाबू पर! पर उनकी दिल्ली में आज की परिस्थिति में कितनी सुनी जाती है? खैर, और कोई चारा नजर नहीं आ रहा था। चारा- यह शब्द कितने पुराने समीकरण याद दिला देता था।

शाम होते-होते CM के मन में योजना तैयार हो गई थी। 120 सीटों से कम कुछ भी मान लेना खतरनाक हो सकता है। सूमो बाबू ही हैं, जो यह करा सकते हैं। भले उसके लिए उन्हें कुछ अपनी पार्टी में तोड़-मरोड़ करनी पड़े।  उन्होंने सूमो बाबू को मिलने के लिए संदेशा भेजा और काम में जुट गए।

श्रीनगर में मार डाले गए 3 आतंकी: टॉप के 4 आतंकवादी संगठनों के चीफ का सफाया, J&K इतिहास में पहली बार

जम्मू और कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने आज (21 जून, 2020) तीन आंतकियों को मार गिराया है। तीनों आतंकी श्रीनगर के जदीबल इलाके में मारे गए हैं। श्रीनगर में पिछले कुछ समय में यह दूसरा इनकाउंटर है।

कश्मीर पुलिस के आईजी विजय कुमार ने बताया कि मारे गए आतंकियों में से एक आतंकी रमजान के दौरान 20 मई को पंडाच चौक के पास सीमा सुरक्षा में तैनात 2 बीएसएफ के जवानों पर किए गए हमले में शामिल था। इस हमले में दोनों जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

जानकारी के अनुसार शहर के जूनिमार और ज़दीबल के पोज़वालपुरा इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी की खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षाबलों ने आज सुबह इलाके को घेर लिया और तलाशी अभियान शुरू किया था।

अधिकारियों ने बताया कि पुलिस के बार-बार प्रयास के बाद भी आतंकवादियों के परिवार के सदस्य उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मनाने में विफल रहे। और उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। जिस पर जवाबी कार्रवाही करते हुए जवानों ने उन्हें मार गिराया।

न्यूज़ एजेंसी एएनआई को विजय कुमार ने बताया, “हमनें आतंकियों की पहचान पता चलने पर उनके परिजनों को बुलाया। और उनसे अपील कि की वे आतंकवादियों को आत्मसमर्पण के लिए कहें। मगर आतंकवादियों ने अपने परिजनों के कहने पर भी आत्मसमर्पण नहीं किया।”

उन्होंने आगे कहा, “तीनों आतंकियों में दो आतंकी 2019 से आतंकी गतिविधियों में शामिल थे। वहीं एक आंतकी सीमा पर तैनात दो बीएसएफ जवानों पर हुए हमले में शामिल था।”

आईजी विजय कुमार के अनुसार चार प्रमुख आतंकी संगठन – लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और गजवा-उल-हिंद के चारों चीफ कमांडर चार महीने के भीतर मार डाले गए। ऐसा जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार हुआ है।

कल से शुरू हुए इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ के तीन जवान भी घायल हुए हैं। अधिकारी ने बताया कि शहर में मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ एहतियातन निलंबित कर दी गई हैं। उन्होंने बताया कि शहर के व्यावसायिक क्षेत्रों के अधिकतर हिस्सों में लोगों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाया गया है।

बता दें कि इसी साल मई में श्रीनगर के नवाकदल इलाके में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में जवानों ने हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकी को मार गिराया था। जिसमें कश्मीर के अलगाववादी नेता का बेटा भी शामिल था। 19 मई को 12 घंटे सैनिकों और आतंकियों की इस मुठभेड़ में दर्जनों घर क्षतिग्रस्त हो गए थे। इलाके में भारी तबाही भी मची थी।

वहीं इससे पहले शुक्रवार (19 जून,2020) को कश्मीर के अवंतीपोरा और शोपियाँ जिले में सुरक्षा बलों ने मस्जिद में छुपे 2 आतंकियों के साथ-साथ कुल 8 आतंकियों को ढेर कर दिया था, जिसमें सेना के जवानों ने शोपियाँ जिले में पाँच और पांपोर जिले में तीन आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था। ये सभी आतंकवादी जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे।

गौरतलब है कि पिछले दो हफ्ते के अंदर सुरक्षाबलों ने करीब दो दर्जन आतंकियों को जम्मू कश्मीर मेंं ढेर कर दिया है। अगर पूरे साल की बात की जाए तो अब तक 100 से अधिक आतंकी मारे गए हैं। कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लागू के समय में भी सुरक्षाबलों का आतंकियों पर कड़ा प्रहार जारी है।

1 नहीं, 3 बार हुई थी लड़ाई… चीनियों ने ड्रोन का भी किया इस्तेमाल: गलवान घाटी में क्या-क्या, कब-कब – जानें पूरी कहानी

लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बारे में अभी तक मीडिया और सरकार के माध्यम से बहुत कुछ लोगों के सामने आया है, लेकिन दोनों सेनाओं के बीच हुए खूनी रक्तपात की पूरी जानकारी अभी तक स्पष्ट नहीं हो सकी थी। आज हम आपको बताते हैं कि आखिर उस दिन गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच क्या हुआ था।

जैसा कि सभी को जानकारी है कि दस दिन पहले दोनों सेनाओं के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता हुई थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच पट्रोलिंग पॉइंट 14 को लेकर विवाद शुरू हो गया था, क्योंकि दोनों सेनाएँ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के बहुत करीब पहुँच गई थीं।

यह साबित हो गया था कि चीनी सेना ने गलवान नदी के किनारे अपनी एक पोस्ट का निर्माण कर लिया था, जो कि भारतीय सीमा में आती है, जिसे हटाने को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति बन गई थी। वार्ता के कुछ दिन बाद चीनी सेना द्वारा पोस्ट को हटा दिया गया था।

पोस्ट हटने के बाद उसी दिन 16 बिहार रेजीमेंट बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल बी संतोष बाबू की एक समकक्ष चीनी अधिकारी के साथ बातचीत हुई थी, लेकिन 14 जून, 2020 को अचानक चीनी सेना ने रातों रात उसी पोस्ट को फिर से खड़ा कर दिया।

इसके बाद 15 जून को जब इसकी जानकारी भारतीय सैनिकों को हुई तो शाम करीब 5 बजे कर्नल संतोष बाबू ने अपनी 35 जवानों की टीम के साथ उस पोस्ट का स्वयं जाँच पड़ताल के लिए दौरा किया। जिस स्थान पर कर्नल बाबू अपनी टीम के साथ गए थे, वह स्थान कोई विवादित नहीं है। इसलिए जाँच टीम की कोई विशेष तैयारी भी नहीं थी।

भारतीय सेना जब उस पोस्ट पर पहुँची तो उन्होंने देखा कि पोस्ट पर नए चीनी सैनिक तैनात किए गए हैं और आम तौर पर उस क्षेत्र में PLA के इस तरह के सैनिक तैनात नहीं किए जाते हैं, यह एक चौंकाने वाली बात थी। बाद में सेना को पता चला कि विवादित पोस्ट पर वह सैनिक तैनात किए गए थे, जो तिब्बत में तैनात किए जाते हैं।

भारतीय सेना की टुकड़ी के पोस्ट पर पहुँचते ही चीनी सेना के जवान उग्र हो गए। जब कर्नल बाबू ने उस पोस्ट पर चीनी सेना की मौजूदगी का कारण पूछा तो एक चीनी सैनिक ने आगे बढ़कर गुस्से में चीनी भाषा में जोर से चिल्लाते हुए कर्नल बाबू को धक्का देकर पीछे की ओर धकेल दिया।

इसके बाद दोनों सेनाओं के बीच धक्का-मुक्की के साथ हाथापाई शुरू हो गई। यह पहला विवाद था, जो करीब 30 मिनट बाद शांत हो गया। इसमें दोनों ओर से कई सैनिक चोटिल हो गए, लेकिन भारतीय सैनिकों की टुकड़ी चीनी सैनिकों पर हावी रही। इसके बाद भारतीय सेना ने पोस्ट को तहस-नहस करके उसे आग के हवाले कर दिया।

इस दौरान भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को एलएसी के उस पार तक ढकेल दिया था। चीनी सैनिकों के इस तरह अचानक किए गए दुर्व्यवहार से कर्नल बाबू को आभास हो गया था कि कुछ बड़ा होने वाला है। इसी को ध्यान में रखते हुए कर्नल ने सभी घायलों को नीचे भेज दिया और पोस्ट पर अधिक संख्या में सैनिकों को बैकअप के लिए भेजने को कहा और अपने साथ मौजूद सैनिकों को कुछ समय के लिए शांत होने के लिए कहा।

इंडिया टुडे के शिव अरूर से बात करते हुए श्योक-गलवान पॉइंट पर तैनात सेना के एक अधिकारी ने कहा कि हमारे जवान बहुत अधिक गुस्से और जोश में थे और वह चीनी सेना को सबक सिखाना चाहते थे।

कर्नल बाबू को जिस बात का शक था, वह सही निकला और गलवान घाटी के किनारे बड़ी संख्या में घात लगाए चीनी सैनिकों ने भारतीय सेना के पहुँचते ही बड़े-बड़े पत्थरों से उन पर हमला कर दिया। यह दूसरी झड़प 300 सैनिकों के बीच करीब 45 मिनट तक चली। इसका परिणाम यह रहा कि दोनों ओर से कई सैनिक नदी में जा गिरे। इन्हीं में से एक कर्नल संतोष बाबू भी थे।

इस बीच दोनों देशों की सेनाओं ने अपने-अपने सैनिकों के शवों को उठाया। इस दौरान भारतीय सैनिकों ने नदी के ऊपर उड़ते एक चीनी ड्रोन को देखा। वह ड्रोन भारत के घायल सैनिकों के साथ-साथ शवों को देखकर नुकसान का अनुमान लगा रहा था। इसके बाद भारतीय सेना को आभास हुआ कि चीनी सेना इसके बाद भी शांत नहीं बैठेगी और वह तीसरी लड़ाई की तैयारी कर रही है।

इसके बाद बड़ी संख्या में सेना को बुलाया गया, जिसमें बैकअप के लिए 16 बिहार और साथ ही 3 पंजाब रेजिमेंट की प्लाटून भी शामिल थी। बैकअप आते ही भारतीय सेना ने एलएसी के उस पार कदम रखा और यह सुनिश्चित किया कि चीनी सेना एलएसी को पार नहीं कर सके।

11 बजे के बाद तीसरी बार दोनों देशों की सेनाओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। आपस में चट्टानों पर लड़ते हुए दोनों तरफ के कई जवान घायल होकर गलवान नदी में गिर गए। 5 घंटे की झड़प के बाद दोनों ओर से लड़ाई शांत हो गई। इसके बाद दोनों ओर से सैनिकों के शवों और घायलों का आदान-प्रदान किया गया।

इस झड़प में 10 भारतीय सैनिक चीनी की ओर रह गए (कुछ मीडिया ने इसे बंदी बताया, जबकि ऐसा कुछ नहीं था), जहाँ उनका इलाज किया जा रहा था। इनमें 2 मेजर, 2 कप्तान और 6 जवान शामिल थे। इस बीच पूर्व सेना प्रमुख और वर्तमान मंत्री जनरल वीके सिंह ने मीडिया को बताया कि चीन को हमसे दो गुनी क्षति हुई है। वहीं इंडिया टुडे टीवी को मिली जानकारी के मुताबिक तीसरी झड़प के बाद भारतीय सेना ने 16 चीनी सैनिकों के शवों को वापस किया था, जिनमें 5 चीनी सेना के अफसर थे।

16 जून की सुबह होते-होते भारतीय सैनिक एलएसी के इस पार आ गए और इस दौरान दोनों ओर से मेजर जनरलों ने स्थिति को अपने हाथों में लिया और आपस में वार्ता शुरू कर दी।

सेना के एक शीर्ष अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया कि यह कोई बंदी वाली स्थित नहीं थी। हम उनके सैनिकों को और वह हमारे सैनिकों को इलाज दे रहे थे। 16 बिहार रेजीमेंट का चीनी सेना के साथ 2017 में हुए डोकलाम विवाद के दौरान भी सामना हो चुका है। रेजीमेंट ने आपनी आकलन रिपोर्ट में निश्चित किया है कि इस बार चीनी सेना ने गलवान पोस्ट पर कोई आम चीनी सेना को तैनात नहीं किया था।

यही कारण रहा कि इस बार चीनी सेना की नीयत बुरी थी और उनका मकसद गलवान वेली पर कब्जा करने का था। कर्नल बाबू का जाना यूनिट के लिए एक बड़ा झटका था। अब पट्रोलिंग पॉइंट 14 पर स्थिति सामान्य है।

‘नहीं हुई रथयात्रा तो 1 साल तक क्वारंटाइन रह सकते हैं भगवान जगन्नाथ, ओडिशा सरकार ने SC में बोला झूठ’

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जगन्नाथ पुरी में होने वाली वार्षिक रथयात्रा पर कोरोना वायरस संक्रमण के कारण रोक लगा दी है। इसके बाद से ही हिन्दुओं में आक्रोश का माहौल है। लोगों का कहना है कि जब अनलॉक के तहत सारी चीजें खुल ही रही हैं तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों?

पुरी शंकराचार्य ने भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को ये निर्णय लेने से पहले उनसे विमर्श करना चाहिए था। उन्होंने इस फ़ैसले की समीक्षा करने को कहा है।

ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व वकील और जगन्नाथ पुरी मुक्ति मंडल के उपाध्यक्ष अशोक महापात्रा ने इस विषय में ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पुरी में श्री जगन्नाथ की पूजा ऋग्वैदिक काल से होती रही है। उन्होंने बताया कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को इस्लामी आक्रांताओं से छिपाने के लिए कहीं और रख दिया गया था, जिसे आदि शंकराचार्य ने बाद में खोजा और उन्हें पुनर्स्थापित किया।

जगन्नाथ भगवान की पूजा स्कन्द पुराण और अन्य पवित्र पुस्तकों में वर्णित रीति-रिवाजों के अनुसार होती रही है। 1960 में ओडिशा सरकार ने जगन्नाथ पुरी का प्रबंधन अपने हाथों में लिया। महापात्रा बताते हैं कि 1964 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर के सारे धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाए और पुरातन परम्पराओं और पवित्र पुस्तकों में लिखित विधि के अनुसार सारी प्रक्रिया पूरी की जाए।

गोवर्धन मठ के शंकराचार्य को जगन्नाथ मंदिर का मुख्य पुजारी माना जाता है। उनकी मदद के लिए ब्राह्मणों का एक समूह होता है, जिसे मुक्ति मंडप के नाम से जाना जाता है। बकौल महापात्रा, सुप्रीम कोर्ट ने ही निर्देशित किया था कि शंकराचार्य और मुक्ति मंडप पंडित सभा की सलाह के बाद धार्मिक क्रियाकलाप का आयोजन किया जाए। साथ ही महापात्रा ने ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार पर आरोप लगाया कि वह इन परम्पराओं को ध्वस्त कर रही है।

बकौल माहापात्रा, ओडिशा सरकार ने ऐसा दिखावा किया कि वो जगन्नाथ पुरी मंदिर परिसर का विकास करना चाहती है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि इस मंदिर परिसर को संरक्षण की ज़रूरत है, लेकिन विकास और जीर्णोद्धार की आड़ में ओडिशा सरकार ने एक मठ को ही ढाह दिया। महापात्रा ने बताया कि पुरातन परम्पराओं के हिसाब से ही सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए रथयात्रा की योजना बनी थी।

उन्होंने बताया कि इसकी तैयारी के लिए सरकार के साथ पूरी तरह सहयोग किया गया, क्योंकि शुरू में ओडिशा सरकार ने भी ऐसा ही दिखाया कि वो रथयात्रा को लेकर गंभीर है। महापात्रा की मानें तो केंद्र सरकार द्वारा कुछ छूट दिए जाने के बावजूद ओडिशा सरकार ने 30 जून तक सारी धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा दी। उन्होंने आरोप लगाया कि ओडिशा सरकार द्वारा जान-बूझकर ऐसा करना बताता है कि वो रथयात्रा को लेकर गंभीर ही नहीं थी।

बता दें कि ओडिशा में मंदिरों, मठों और हिन्दू धार्मिक स्थलों पर नवीन पटनायक सरकार की बुरी नज़र होने की बात सामने आई थी। बीजद सरकार ने सैकड़ों करोड़ रुपयों के नए प्रोजेक्ट का ऐलान किया था, जिसके तहत पुरी को एक ‘वर्ल्ड हेरिटेज सिटी’ के रूप में विकसित किया जाएगा। लेकिन, इसके लिए मठों को ढहाया जा रहा है। लांगुली मठ 300 वर्ष पुराना था। इसे रैपिड एक्शन फोर्स और पुलिस की मौजूदगी में ढाह दिया गया। 900 वर्ष पूर्व निर्मित एमार मठ को भी नहीं बख्शा गया।

अशोक महापात्रा ने कहा कि हाईकोर्ट में भी ओडिशा सरकार ने कह दिया कि वो इस साल जगन्नाथ पुरी रथयात्रा के प्रबंधन में सक्षम नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कहने को तो म्यूजियम बना कर चीजों को संरक्षित करना चाहती है, लेकिन उनका असली उद्देश्य इसके माध्यम से पैसे कमाना है, इसे कमर्शियलाइज करना है। उन्होंने कहा कि विभिन्न एनजीओ ने भी मिलकर रथयात्रा में व्यवधान डालने की कोशिश की है। महापात्रा ने कहा:

“जगन्नाथ जी की उपासना पुरातन काल से होती आ रही है, ऋग्वैदिक काल से। इस्लामी आक्रांताओं के कारण उन्हें भूगर्भ में छिपाया गया था लेकिन आदि शंकराचार्य ने उसका उद्धार कर के मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। शंकराचार्य और पवित्र पुस्तकों में वर्णित विधि-विधान से अब तक रथयात्रा और पूजा-पाठ होते आ रहे हैं। ओडिशा सरकार द्वारा इसमें व्यवधान डालना दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार जान-बूझकर ऐसा कर रही है। रथयात्रा आयोजित कराने में उसकी रूचि ही नहीं थी।”

उड़िया मीडिया ख़बरें हिंदी पट्टी से गायब हैं

विश्व हिन्दू परिषद ने भी रथयात्रा आयोजित कराए जाने की बात कही है। परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने ऑपइंडिया को इस सम्बन्ध में सूचना दी। विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के केन्द्रीय महामंत्री श्री मिलिंद परांडे ने कहा कि गत सैकड़ों वर्षों से अनवरत रूप से पुरी में निकाली जाने वाली भगवान श्रीजगन्नाथ की परम्परागत रथ यात्रा इस वर्ष भी निकाली जानी चाहिए। कोविड महामारी के संकट काल में भी सभी नियमों तथा जन स्वास्थ्य सम्बन्धी उपायों के साथ यात्रा निकाली जा सकती है।

उन्होंने आह्वान किया कि यात्रा की अखण्डता सुनिश्चित करने हेतु कोई मार्ग अवश्य ढूँढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि आज की परिस्थितियों में यह अपेक्षा कदापि नहीं है कि यात्रा में दस लाख भक्त एकत्रित हों। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की प्रार्थना भी की। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के संकट काल में भी, जन-स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए, प्राचीन परम्परा की अखण्डता सुनिश्चित करने हेतु उचित मार्ग निकालना राज्य सरकार का दायित्व है।

विहिप ने ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपने इस दायित्व के पालन में पूरी तरह विफल रही है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ओडिशा सरकार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस सम्बन्ध में सभी पहलू ठीक से नहीं रख पाई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस सम्बन्ध में निर्णय लेने से पूर्व सभी सम्बन्धित पक्षों को सुनना चाहिए था। उन्होंने कहा:

“कम से कम पुरी के शंकराचार्य गोबर्धन पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के साथ मंदिर के ट्रस्टियों तथा यात्रा प्रबंधन समिति को तो सुना ही जाना चाहिए था। भगवान के रथ को प्रतीकात्मक रूप से हाथियों, यांत्रिक सहायता या कोविड परीक्षित पूरी तरह से स्वस्थ व सक्षम सीमित सेवाइतों के माध्यम से भी खींचा जा सकता है। यात्रा की इस पुरातन महान परम्परा के टूटने पर मंदिर के धार्मिक विधि-विधानों में व्यवधान उपस्थित होने की सम्भावना अनेक भक्तों ने व्यक्त की है।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए अधिवक्ता अशोक महापात्रा ने कहा कि अगर भगवान को रथयात्रा के जरिए मंदिर नहीं पहुँचाया जाता है तो वो अगले 1 साल क्वारंटाइन ही रहेंगे, जो कि कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का पूरी तरह पालन किया जाए तो रथयात्रा तो दूर, भगवान की पूजा तक नहीं हो पाएगी। हालाँकि, अब विरोध के बाद ओडिशा सरकार का रुख नरम हुआ है।

विश्व हिन्दू परिषद ने जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा पर लगी रोक हटाने की माँग की

उन्होंने ओडिशा सरकार को घेरते हुए कहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट में रथयात्रा के लिए 12 से 15 लाख लोगों के इकट्ठे होने की संभावना जता दी, जबकि इसमें 1000 से ज्यादा लोग शामिल नहीं होंगे। महापात्रा ने कहा कि ओडिशा सरकार ने हाल ही में जब एक कार्यक्रम आयोजित किया था तब उसमें काफ़ी लोगों ने शिरकत की थी फिर रथयात्रा में दिक्कत क्या है? उन्होंने कहा कि मुद्दा लोगों का शामिल होना नहीं, बल्कि रथयात्रा का संचालित होना है।

इधर एक अन्य याचिका में पुरी शहर को पूरी तरह शटडाउन करके और जिले में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाकर रथयात्रा निकालने का प्रस्ताव दिया गया है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष और पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देब ने भी ओडिशा सरकार से कहा है कि वो तुरंत सुप्रीम कोर्ट को अपने फ़ैसले की समीक्षा करने को कहे। वहीं शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा

‘‘किसी आस्तिक सज्जन की यह भावना हो सकती है कि अगर इस आपदा की स्थिति में रथयात्रा की अनुमति दी जाए तो भगवान जगन्नाथ कभी माफ नहीं करेंगे, लेकिन अगर विख्यात पुरातन परंपरा का विलोप हो जाए तो क्या भगवान जगन्नाथ क्षमा कर देंगे? विशेष परिस्थिति में न्यायालय अवकाश के दिनों में भी खुल सकता है। परसो रथयात्रा है; मध्य में केवल एक दिन शेष है। अतः रथयात्रा को पूर्णतः बन्द करने का यह सुनियोजित प्रकल्प है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रणय कुमार महापात्रा भी सुप्रीम कोर्ट में रथयात्रा आयोजित किए जाने के पक्ष में समाजसेवक आफताब हुसैन की तरफ से याचिका दायर की थी। अब सोमवार (जून 22, 2020) को उन याचिकाओं पर सुनवाई होनी है, जिसके बाद स्थिति स्पष्ट होगी। हालाँकि, बहुत कुछ राज्य सरकार पर निर्भर करता है। अगर वो गंभीर रही तो विधि-व्यवस्था बनाए रखकर रथयात्रा आयोजित हो सकती है।