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उत्तर प्रदेश: अदिति और राकेश सिंह की विधायकी छीनने के लिए हाई कोर्ट पहुँची कॉन्ग्रेस

अदिति सिंह और राकेश सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए कॉन्ग्रेस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कॉन्ग्रेस के दोनों विधायकों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी।

सुनवाई जस्टिस पंकज कुमार जायसवाल और जस्टिस दिनेश कुमार सिंह की बेंच ने की। मामले में याची अराधना मिश्रा के वकील केसी कौशिक का तर्क था कि अदिति और राकेश 2017 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुँचे थे। लेकिन बाद में दोनों ने पार्टी विरोधी गतिविधियाँ शुरू कर दी।

कॉन्ग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को निर्देशित करने की अपील की है। कॉन्ग्रेस ने इनकी सदस्यता समाप्त करने को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के पास पहले से ही अर्जी दे रखी है।

याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि सदस्यता समाप्त करने वाली अर्जियां तीन सप्ताह के भीतर निस्तारित कर दी जाएँ। लेकिन इस मामले में तीन माह बाद भी स्पीकर ने अर्जी निस्तारित नहीं की है।

अदिति सिंह रायबरेली सदर से विधायक हैं। हाल में उन्होंने कई मसलों पर पार्टी स्टैंड के खिलाफ जाकर अपनी राय सार्वजनिक तौर पर जाहिर की है। अटकलें लगाई जा रही है कि वे बीजेपी में जा सकती हैं। वहीं रायबरेली के हरचंदपुर विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस विधायक राकेश सिंह भाजपा में शामिल हो चुके एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह के सगे भाई हैं।

अदिति सिंह ने 12 जून, 2020 को पार्टी के सभी व्हॉट्सअप ग्रुपों को छोड़ दिया था। इससे पहले अदिति सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कॉन्ग्रेस का नाम हटाते हुए उसकी जगह अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया था।

उनके ट्विटर से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया था। इस दौरान अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी थी।

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया गया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था।

‘मजाक’ में PM की माँ-बहन को गाली, देश तोड़ने की बात: कॉन्ग्रेस के खास संस्कारों की झाँकी है जाकिर हुसैन

संस्कार का मोटे तौर पर अर्थ होता है, अपने भीतर सद्गुणों का विकास। सनतान धर्म में तो बकायदा जन्म से मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं। शिशु जब मॉं के गर्भ में होता तभी से इसकी शुरुआत हो जाती है। इन सबका मकसद तन, मन, आत्मा की शुद्धता से है, ताकि वह व्यक्ति समाज के अनुकूल बने। सकारात्मक समाज का निर्माण करे।

इसलिए संस्कार बेहद सकारात्मक और पवित्र शब्द है। लेकिन, कलियुग में सब अपने-अपने हिसाब से शब्दों की व्याख्या कर लेते हैं। अपनी नीचता को भी संस्कार की चादर ओढ़ा देते हैं। जैसे, पाकिस्तान का संस्कार आतंकवाद है, चीन की धोखेबाजी, वैसे ही कॉन्ग्रेस का भी अपना एक अलग, विशेष संस्कार है।

इस संस्कार में पले-बढ़े कॉन्ग्रेसी ‘मजाक’ में प्रधानमंत्री की माँ-बहन को गाली दे देते हैं। देश के टुकड़े होने की बात करते हैं।

यह हम नहीं कह रहे। यह कहना है कॉन्ग्रेस नेता जाकिर हुसैन का। जाकिर लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) का पार्षद था। उसका एक ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें वह देश की सेना और प्रधानमंत्री के लिए बेदह आपत्तिजनक बातें कर रहा था।

अब इस ऑडियो को लेकर जाकिर का कहना है, “दोस्त के साथ मजाक में बात हुई थी। उसने धोखा किया। मुझे हमेशा से देश और लोगों पर नाज है। भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए माफी चाहता हूँ। ऐसा दोबारा नहीं होगा।”

अब यह जानिए कि जाकिर ने क्या कहा था, जिसे अब वह मजाक में हुई बात बता रहा। गलवान की घटना पर जाकिर अपने एक दोस्त से बात कर रहा होता है। इस दौरान उसका दोस्त कहता है कि अगर उसने कुछ पैसे जमा किए हुए हैं, तो वह उसके पास आ जाए, वह उसे मकान दिला देगा। इस पर जाकिर उसे आश्वस्त करता है कि आगे कुछ होने वाला नहीं है। वह कहता है, “सब ठीक हो जाएगा। बस लेह का आधा हिस्सा चाइना लेना चाहिए। फिर पता है क्या होगा… दिल्ली में मोदी की माँ-बहन हो जाएगी…। लद्दाख यूटी के फिर हजार टुकड़े हो जाएँगे।”

ऑडियो वायरल होने के बाद जाकिर पर एफआईआर दर्ज हुई और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। एलएएचडीसी से भी उसे निलंबित कर दिया। मामले के तूल पकड़ने के बाद कॉन्ग्रेस ने भी उसे निष्कासित कर दिया है।

लेकिन सवाल जाकिर का नहीं है। सवाल उस कॉन्ग्रेसी संस्कार का है, जिसकी वजह से यह पार्टी राजनीतिक विरोध के नाम पर देश के खिलाफ खड़ी हो जाती है। गलवान के बलिदानी सैनिकों पर अनर्गल बयानबाजी इसका ताजा नमूना है। इसी संस्कार की व​जह से वे चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। मामले के तूल पकड़ने पर कभी अपने ही कहे से मुकर जाते हैं, तो कभी उसे मजाक बता देते हैं। यहॉं तक कि संवैधानिक संस्थाओं का हवाला देकर देश की जनता के सामने झूठ परोसने से भी कॉन्ग्रेसी बाज नहीं आते।

ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेस ने यह संस्कार अपने छोटे कार्यकर्ताओं को ही दिए हैं। पार्टी के शीर्ष परिवार और उसके चक्कर काटने वालों ने भी यही घुट्टी पी रखी है।

यही वजह थी कि 2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गॉंधी ने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया था। उस वक्त मोदी गुजरात के चुने हुए मुख्यमंत्री थे। हालॉंकि पार्टी फिर कभी इस शब्द पर नहीं लौटी, क्योंकि गुजरात की जनता ने उसे इसका करारा जवाब दिया था। लेकिन, मोदी को लेकर इसके बाद भी पार्टी के शब्द ही बदले, संस्कार नहीं।

जनवरी 2014 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुए कॉन्ग्रेस सम्मेलन के दौरान गाँधी परिवार के वफादार माने जाने वाले मणिशंकर अय्यर ने मोदी के चाय बेजने की पृष्ठभूमि को लेकर तंज कसा था। उस समय भी मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद अय्यर मोदी के लिए ‘नीच’ और ‘कातिल’ जैसे शब्द का भी इस्तेमाल कर चुके हैं।

पिछले ही साल आम चुनावों के दौरान राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर जनता के सामने झूठ परोसा था। प्रधानमंत्री के लिए ‘चौकीदार चोर है’ जैसे बेबुनियाद नारे गढ़े थे।

ऐसा नहीं है कि कॉन्ग्रेसी संस्कार सिर्फ मोदी के मामले में ही छिछला है। वे इसका प्रदर्शन हर उस मौके पर करते हैं, जब कोई उनकी मनमर्जी के आड़े आता है। पिछले साल दिसंबर में ऐसा वाकया लखनऊ में दिखा था। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी ने ड्यूटी कर रहीं एक महिला अधिकारी पर गला दबाने और जमीन पर गिराने का आरोप लगा दिया था। जबकि इस घटना के वीडियो में प्रियंका के साथ खड़े ‘गुंडे’ ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए थे।

कॉन्ग्रेसी संस्कारों के ये चंद नमूने। फेहरिस्त लंबी है। ऊपर से नीचे तक सब एक ही रंग में रंगे हैं। कभी उसका नाम जाकिर हुसैन हो जाता है, तो कभी मणिशंकर अय्यर। कभी सोनिया होतीं हैं, तो कभी राहुल।

पर सोचिए, जिस संस्कार में पले-बढ़े लोग मजाक में पीएम की मॉं-बहन को गाली और देश के टुकड़े होने की बात करते हैं, असल जिंदगी में उनके कारनामे कैसे होते होंगे?

इन्हीं कारनामों की उपलब्धि है कि जिस चीन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट ‘द ग्रेट फायरवॉल’ के जरिए ब्लॉक कर दी जाती है, वहॉं राहुल गाँधी की वेबसाइट पर कोई रोक नहीं होती।

दिल्ली दंगा: हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या वाले चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगे में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी, जबकि आईपीएस अमित शर्मा और अनुज कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था। रतन लाल की हत्या मामले में दाखिल चार्जशीट में योगेंद्र यादव का भी नाम है।

दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के अलावा छात्र नेता कंवलप्रीत कौर और वकील डीएस बिंद्रा के नाम का भी उल्लेख किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये तीनों 17 अभियुक्तों में तो शामिल नहीं हैं, लेकिन चार्जशीट में कहा गया है, “चाँद बाग में धरना प्रदर्शन के आयोजकों के संबंध डीएस बिंद्रा (AIMIM), कंवलप्रीत कौर (AISA), देवांगना कालिता (पिंजड़ा तोड़ ग्रुप), सफूरा जगरगर और योगेंद्र यादव जैसे लोगों से मिले हैं, जो कि साफ इशारा करते हैं कि हिंसा के पीछे कोई छुपा हुआ एजेंडा था।”

पुलिस के मुताबिक, चाँद बाग का प्रदर्शन मध्य-जनवरी से चल रहा था। 24 फरवरी को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गंभीर सांप्रदायिक दंगा हुआ जिसमें, हेड कॉन्सटेबल रतन लाल समेत 53 लोगों की जान गई। इस मामले में 750 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं। चार्जशीट के मुताबिक 17 आरोपितों की उम्र 18 से 50 के बीच है और उनमें से ज्यादातर चाँद बाग के ही रहने वाले हैं, जबकि कुछ पड़ोसी मुस्तफाबाद, जगत पुरी और प्रेम नगर में रहते हैं।

चार्जशीट में कहा गया है, “रतन लाल और एसीपी (गोकुलपुरी) और डीसीपी (शाहदरा) और कुछ अन्य पुलिसकर्मी चाँद बाग के धरना स्थल पर मौजूद थे। इसी दौरान उन पर भीड़ ने हमला कर दिया। रतन लाल वजीराबाद रोड पर स्थित डिवाइडर को कूदकर पार नहीं कर सके और गोली तथा पत्थर लगने से वहीं गिर पड़े। बताया गया कि रतन लाल को लाठी-डंडों से भी पीटा गया। उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनका पोस्टमार्टम 25 फरवरी को हुआ। रतन लाल की मौत गोली लगने से हुई। इसके अलावा उनके शरीर पर 21 जगह चोट के निशान थे।”

चार्जशीट में कहा गया है कि विरोध स्थल पर उपस्थित एक गवाह ने भी अपने बयान में योगेंद्र यादव का नाम लिया था। गवाह ने बताया कि विरोध स्थल पर बाहर से लोगों को बुलाया जाता था। यहाँ पर भानु प्रताप, डीएस बिंद्रा, योगेंद्र यादव, जेएनयू, जामिया और डीयू के कई छात्र आते थे, जो सरकार और NRC के खिलाफ बोलते थे और कहते थे कि समुदाय विशेष को चिंतित होना चाहिए। यह सब जनवरी से 24 फरवरी तक, यानी 50 दिनों तक जारी रहा।

वहीं योगेन्द्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में कहा, “मैंने जो कुछ भी कहा है वह पब्लिक डोमेन में है और कोई एक घटना बता दीजिए जब मैंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से हिंसा को भड़काने की बात कही।”

उल्लेखनीय है कि चार्जशीट में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया, “आरोपित व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से खुलासा किया कि चाँद बाग दंगो के पीछे की साजिश में उनके साथ डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, अतहर, शाहदाब, उपासना, तबस्सुम, रवीश और अन्य लोग शामिल थे।”

इसके अलावा, गिरफ्तार अभियुक्त शाहनवाज़ और इब्राहिम ने यह खुलासा किया कि इस दंगे के आयोजक डीएस बिंद्रा, डॉ. रिज़वान, सुलेमान (सलमान), सलीम खान और सलीम मुन्ना थे। यह दंगा इन्हीं लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई साजिश का हिस्सा था।

शरजील इमाम के भड़काऊ भाषण से मंदिर की दानपेटी लूटी, आगजनी, पुलिस पर फायरिंग: SC में यूपी सरकार

देशद्रोह के आरोपित शरजील इमाम की सारी FIR की जाँच एक ही एजेंसी से कराने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार ने हलफनामा दाखिल किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि शरजील इमाम के खिलाफ यूपी पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को दिल्ली, मणिपुर, असम या अरुणाचल प्रदेश में पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि अलीगढ़ में उसके 16 जनवरी के भाषण ने सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ दिया। अगले दो महीने बड़े पैमाने पर आगजनी, पथराव और पुलिस पर गोलीबारी हुई।

बता दें कि ‘द वायर’ के स्तंभकार शरजील इमाम ने खिलाफ राज्यों में दर्ज सभी एफआईआर की जाँच एक ही एजेंसी से कराने की याचिका दायर की थी। योगी सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान आरोपी के भाषण का अलग-अलग स्थानीय प्रभाव हुआ। इसलिए ये उन अपराधों से अलग है जो अन्य राज्यों में किए गए थे, जैसा कि उन एफआईआर में दिखाया गया है।

राज्य सरकार ने कहा कि 16 जनवरी को एएमयू में भड़काऊ भाषण के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर वायरल होने के बाद अलीगढ़ जिले में बड़े पैमाने पर पथराव, आगजनी और गोलीबारी की घटनाएँ हुईं। 23 जनवरी को, एएमयू छात्रों सहित लगभग 150-200 प्रदर्शनकारियों ने सड़क जाम की और घृणा फ़ैलाने वाले नारे लगाए।

31 जनवरी को, एएमयू के छात्रों सहित 500 से अधिक व्यक्तियों ने एकत्र होकर सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान भयावह स्थिति पैदा कर दी। 23 फरवरी को, 500-600 से अधिक अज्ञात व्यक्तियों ने पथराव किया, मंदिरों में दान पेटी लूटी। पुजारियों के साथ हाथापाई की। जिससे तनाव और बढ़ गया।

23 फरवरी को फिर से, एक पूर्व-योजनाबद्ध तरीके से एक हजार से अधिक व्यक्तियों ने कोतवाली उपकोट में जबरन प्रवेश किया और अवैध हथियारों से गोलीबारी करके दंगे की स्थिति पैदा कर दी।

24 फरवरी को, एक समूह ने नफरत फैलाने वाले नारे लगाए और पुलिस पर पथराव और गोलीबारी की। अवैध हथियारों से कई पुलिसकर्मियों को घायल किया गया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया।

यूपी सरकार ने कहा कि अलीगढ़ एफआईआर को दिल्ली और अन्य राज्यों में दर्ज एफआईआर के साथ जोड़ना, अलीगढ़ में शरजील के भड़काऊ भाषण और उसके बाद की घटनाओं के साथ लिंक की जाँच के लिए घातक होगा, जिसने सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट कर दिया और समुदायों के बीच नफरत पैदा की। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में सुनवाई स्थगित कर दी है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (जून 19, 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम के ख़िलाफ विभिन्न अदालतों में मुकदमा चलाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इमाम की याचिका पर सभी पाँच राज्यों के जवाब देखे बगैर कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने इस संबंध में मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश से 2 सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने को कहा था।

350 चीनी, बिहार रेजिमेंट के 100 जवान: बरसते पत्थरों के बीच 3 घंटे, उखाड़ फेंके चीन के तम्बू

कहते हैं- एक बिहारी सौ पर भारी। भारत और चीन के बीच गलवान वैली में हुए हिंसक संघर्ष में ये कहावत एक बार फिर से चरितार्थ हुई। बिहारियों ने दिल्ली और पंजाब से लेकर गुजरात और मुंबई तक की आर्थिक प्रगति में लगातार योगदान दिया ही है। अब उन्होंने एक बार फिर से दिखाया है कि सीमा पर देश की सुरक्षा करने में भी उनका कोई तोड़ नहीं है। बिहार रेजिमेंट ने एक बार फिर से बिहार का सिर गर्व से ऊँचा किया है।

ये कहानी शुरू होती है सोमवार (जून 15, 2020) की शाम से, जब भारत के 3 इन्फेंट्री डिवीजन कमांडर अन्य अधिकारियों के साथ श्योक और गलवान रिवर वैली के वाई जंक्शन पर मौजूद थे। ईस्टर्न लद्दाख में दोनों ही देशों के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन चीन ने पीठ में छुरा घोंप दिया। भारतीय सशस्त्र बलों को ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो वहाँ से चीनियों पर नज़र रखें कि वो पोस्ट को खाली कर रहे हैं या नहीं।

16 बिहार रेजिमेंट को भी इसी काम में लगाया गया था। चाइनीज ऑब्जरवेशन पोस्ट में 10-12 सैनिक थे, जिन्हें भारतीय सेना ने वहाँ से जाने कह दिया था, क्योंकि दोनों ही देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच हुई बातचीत में यही समझौता हुआ था। भारतीय सेना के कहने के बावजूद वो लोग वहाँ से नहीं हट रहे थे। इसके बाद कर्नल संतोष बाबू लगभग 50 सैनिकों के साथ वहाँ चीनियों को ये कहने गए कि वे भारतीय सरजमीं को खाली करें।

चीनियों ने गलवान रिवर वैली में पीछे एक बैकअप टीम तैयार रखी थी। उसमें कम से कम 300-350 सैनिक थे। जब भारतीय पेट्रोलिंग यूनिट वहाँ से लौटी, तब तक उन्होंने बैकअप टीम को बुला लिया। जब भारतीय गश्ती दल वहाँ लौटा तो चीनियों ने पहले ही एक ऊँचे स्थान को देख कर वहाँ हथियारों संग डेरा जमा लिया था। वो हमले के लिए एकदम तैयार बैठे थे। उनके पास पत्थर, लोहे के रॉड्स, लाठी-डंडे व अन्य नुकीले हथियार थे।

दोनों ही देशों की सेनाओं के बीच जब बातचीत शुरू हुई तो जिद्दी चीनियों ने वापस जाने से इनकार कर दिया और बहस करने लगे। इसके बाद भारतीय सेना के जवानों ने उनके टेंट्स और अन्य संरचनाओं को उखाड़ना शुरू कर दिया, क्योंकि वो भारतीय ज़मीन कब्जा कर बैठे हुए थे। वो हमले के लिए तैयार थे, आक्रामक थे, उन्होंने अचानक से हमला कर भी दिया। बिहार रेजिमेंट के सीओ और एक हवलदार पर पहले हमला किया गया।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, जैसे ही सीओ नीचे गिरे, बिहारी रेजिमेंट के जवान क्रोधित हो गए। भले ही उनकी संख्या चीनियों से काफ़ी कम थी, भले ही चीनी पहले ही उचित स्थान देखकर हमले के लिए बैठे थे, भले ही चीनियों के पास जानलेवा हथियार थे- जब बिहारी रेजिमेंट ने बदले की कार्रवाई की तो उनके छक्के छूट गए। जवानों पर लगातार पत्थर बरस रहे थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

इसे संघर्ष या युद्ध कह लीजिए, ये लगभग तीन घंटों तक चला। बिहारी रेजिमेंट ने चीनी सेना को नाकों चने चबवा दिए। उनमें से कई मारे गए, कई घायल हुए। हमारे 20 जवान भी वीरगति को प्राप्त हुए। हमारे कुल 100 जवान थे, जिन्होंने 350 चीनी सैनिकों को परास्त किया। आखिरकार बिहारी रेजिमेंट ने भारत की ज़मीन पर स्थापित चीनी तम्बुओं को उखाड़ फेंका। हमारे बलिदानियों के बारे में पीएम मोदी ने ठीक ही कहा था- “वो मारते-मारते मरे हैं।”

हाल ही में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने खुलासा किया है कि भारत ने चीन के कई सैनिकों को पकड़ा था लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। वीके सिंह ने गलवान घाटी संघर्ष को लेकर जानकारी दी कि इस झड़प में चीन के दोगुने सैनिक मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि हमारे 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो चीन के इससे ज्यादा सैनिक मारे गए हैं। लेकिन चीन कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं करेगा। 

इंडस्ट्री बेहद क्रूर और निर्दयी, दीवार पर सिर मारने से क्या होगा: बॉलीवुड में नेपोटिज्म पर बरसे रणवीर शौरी

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या करने के बाद से सोशल मीडिया पर तेजी से इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि उन्हें आखिरकार ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा। बॉलीवुड से जुड़े लोग ही इंडस्ट्री में चल रहे नेपोटिज्म को इसका जिम्मेदार बता रहे हैं।

कंगना रनौत, रवीना टंडन, शेखर कपूर और अभिनव कश्यप के बाद एक्टर रणवीर शौरी ने भी नेपोटिज्म को लेकर बड़े सवाल खड़े किए हैं। रणवीर शौरी ने फिल्म इंडस्ट्री को बेहद क्रूर और निर्दयी बताया। सुशांत और रणवीर शौरी दोनों ‘सोनचिड़िया’ में साथ काम कर चुके हैं। दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझते थे, लेकिन सुशांत के जाने के बाद रणवीर ने अपनी प्रतिक्रिया से इंडस्ट्री पर सवाल खड़े किए।

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, रणवीर ने कहा कि पूरी इंडस्ट्री पर नेपोटिज्म हावी है। उन्होंने कहा कि शुरुआत में वे इस लालच में मेनस्ट्रीम में छोटे-मोटे रोल कर लेते थे कि शायद नोटिस होने से अच्छा काम मिलेगा। फिर समझ आया कि वे आपको नोटिस ही नहीं करना चाहते हैं। फिर दीवार में सर मारने से क्या होगा।

वो कहते हैं कि यही वजह है कि उन्होंने अपनी महत्वकांक्षाएँ कम कर ली। समझ गया कि मुझे कभी भी उनके मेनस्ट्रीम फिल्मों में लीड भूमिकाएँ नहीं मिलेगी। चाहे एक्टिंग कितनी ही अच्छी क्यों न हो। इसलिए उन्होंने छोटी फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया।

रणवीर आगे कहते हैं, “मुझे पता है कि जब मैं घर से निकलूँगा तो लोग मेरी गाड़ी को नहीं घेरेंगे और फोटो के लिए शोर करना शुरू नहीं करेंगे, लेकिन मेरा अपना काम चल जाएगा। कई बार ऐसा भी हुआ है कि मुझे दो-दो साल कोई काम नहीं मिला और मुझे घर पर बैठना पड़ा लेकिन मैंने इंतजार किया और आगे भी करूँगा।” 

गौरतलब है कि इससे पहले भी एक्टर रणवीर शौरी ने कुछ ट्वीट्स के जरिए बताया था कि कैसे बॉलीवुड के अंदर नेपोटिज्म चलता है। उन्होंने कहा कि एक अवॉर्ड फंक्शन में एक स्टार किड शो होस्ट कर रहा है। बेस्ट एक्टर की कैटेगिरी की घोषणा की जाती है। नॉमनीज में वो स्टार किड भी है जो शो होस्ट कर रहा है।

वे लिखते हैं, “विनर की घोषणा करने के लिए होस्ट दो फिल्म पर्सनालिटी को बुलाते हैं जो हो सकता है कि किसी स्टार किड के परिजन होते हैं। कितना प्यारा इत्तेफाक है। फिर प्रजेंटेटर्स लिफाफा खोलते हैं और विजेता के नाम की घोषणा करते हैं, जो कि एक स्टार किड ही होता है।”

अपने अंतिम ट्वीट में रणवीर लिखते हैं, “स्टार किड होस्ट के डाइस से अवॉर्ड स्वीकार करने के लिए आगे बढ़ता है और एक छोटा सा थैंक्यू स्पीच देता है और फिर बाकी के शो को हेस्ट करने के लिए वापस आता है… फिर ऐसे ही जारी रहता है। ये है मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फैमिली।”

सुशांत सिंह राजपूत के जाने के बाद तमाम स्टारकिड्स को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया। करण जौहर, यशराज फिल्म्स व बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस पर आरोप लगे कि वह आउटसाइडर्स पर दबाव बनाते हैं व काम नहीं देते।

एक बार फिर कंगना रनौत ने भी करण जौहर के अलावा तमाम बड़े प्रोडक्शन हाउस व निर्देशकों पर आरोप लगाए। उन्होंने इंडस्ट्री के असली चेहरे की पोल खोलते हुए सवाल पूछा था कि सुशांत की मौत आत्महत्या है मर्डर। रवीना टंडन ने भी बॉलीवुड की ‘गंदगी’ को लेकर ट्वीट किया था।

विवादित नक्शे के बाद FM चैनलों पर भारत विरोधी गाने, उत्तराखंड तक आ रही आवाज: नेपाल की नई करतूत

नेपाल ने कुछ दिनों पहले अपने विवादित नक्शे में भारत के कुछ इलाकों को शामिल किया था। अब वह अपने एफएम चैनल्स पर भारत विरोधी गानों का प्रसारण कर रहा है। इन गानों के जरिए वह लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा के इलाकों को भारत से वापस लेने की बात कह रहा है।

इन गानों का प्रसारण धारचुला एफएम समेत कुछ और चैनलों पर हो रहा है, जिसे उत्तराखंड के तमाम पर्वतीय इलाकों में सुना जा सकता है। ये इलाके नेपाल की सीमा के पास हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में टीचर की नौकरी करने वाली बबिता सांवल बताती हैं कि वह रोज अपने स्कूल से लौटते वक्त नेपाल के धारचुला एफएम सुनती थीं। हाल के दिनों में इस एफएम चैनल पर भारत विरोधी गानों का प्रसारण शुरू हो गया है, जिन्हें हर घंटे कई बार बजाया जाता है। इसे देखते हुए अब उन्होंने इन चैनलों को सुनना बंद कर दिया है।

बबिता सांवल एक गाने के बोल को याद करते हुए बताती हैं कि इसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को वापस लेने की बात कही जाती है। एक अन्य गाने में कहा जा रहा है, “लिपुलेख और कालापानी हमारा होना चाहिए, यह हमारी भूमि है जो चोरी हो गई है।”

बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ गाने पुराने हैं तो कुछ गानों को हाल के कुछ महीनों में ही रिकॉर्ड कराया गया है। कुछ गाने यू-ट्यूब जैसे सोशल प्लेटफॉर्म पर भी शेयर किए गए हैं।

पिथौरागढ़ के धारचूला उपमंडल के दांटू गांव निवासी शालू दताल ने बताया कि कुछ नेपाली एफएम चैनलों ने नेपाली गीतों के बीच भारत विरोधी भाषण देना शुरू किया है। उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों ओर के लोग नेपाली गाने सुनते हैं। इस बीच वे नेपाली नेताओं के भारत विरोधी भाषण भी सुनते हैं।

नेपाल के मुख्य एफएम चैनलों के अलावा कुछ पुराने एफएम चैनल जैसे मल्लिकार्जुन रेडियो और annapurna.online जैसे वेबसाइट भारत विरोधी बातें रिपोर्ट करते हैं। कालापानी को नेपाल का हिस्सा बताते हैं।

धारचूला के रंग समुदाय के एक नेता कृष्णा गर्ब्याल ने बताया कि इन रेडियो स्टेशनों ने कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को नेपाली क्षेत्र मानते हुए यहाँ के मौसम की रिपोर्ट देना भी शुरू कर दिया है।

हालाँकि, जिला प्रशासन और पुलिस ने कहा कि उन्हें अपने एफएम रेडियो चैनलों के माध्यम से नेपाल द्वारा शुरू किए गए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पिथौरागढ़ की पुलिस अधीक्षक प्रीति प्रियदर्शनी ने कहा, “इस विषय पर हमारी खुफिया इकाइयों ने कोई फीडबैक नहीं दिया है।”

धारचूला सर्किल अधिकारी वीके आचार्य ने भी इस पर अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने कहा, “हमारी खुफिया इकाइयों ने अभी तक नेपाल द्वारा भारत विरोधी किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के बारे में नहीं बताया है।” वहीं व्यास घाटी के नेता अशोक नब्याल ने कहा कि सीमा पर सक्रिय भारतीय खुफिया एजेंसियों को प्रोपेगेंडा का जवाब देने में सक्षम होने के लिए स्थिति का संज्ञान लेने की आवश्यकता है।

चीन के साथ तनातनी के बीच सेना को इमरजेंसी फंड, 500 करोड़ रुपए तक के हथियार खरीद सकेंगे

चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच केन्द्र सरकार ने तीनों सेनाओं के लिए 500 करोड़ रुपए के इमरजेंसी फंड को मंजूरी दी है। इस रकम से सेना जरूरत के मुताबिक हथियार और गोला-बारूद खरीद सकती है।

इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक सरकार ने तीनों सेनाओं के उप प्रमुखों को खतरनाक हथियारों की तात्‍कालिक और आपात खरीद के लिए 500 करोड़ रुपए तक की वित्तीय शक्तियाँ दी हैं। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है कि जब पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना ने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों की तैनाती कर दी है।

इससे पहले सीमा पर बढ़ते तनाव को देखते हुए तीनों सेनाओं ने पहले ही आपात हथियारों की सूची को बनाना शुरू कर दिया था। इस सूचा में तात्कालिक जरूरत और कम समय में खरीदे जाने वाले हथियारों को रखा गया है।

आज तक की खबर के मुताबिक रक्षा मंत्री कल (22 जून, 2020) रूस जा रहे हैं। सम्भावना जताई जा रही है कि इस दौरान सेना के लिए इमरजेंसी हथियारों की खरीद की जा सकती है।

हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं है कि जब सरकार ने सेनाओं को हथियार खरीद के लिए आपात फंड को मंजूरी दी है। इससे पहले भी उरी हमले और पाकिस्तान के खिलाफ बालाकोट हवाई हमलों के बाद भी सशस्त्र बलों को इसी तरह की वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गईं थी। वैसे भी उरी हमले के बाद सेना ने बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों के साथ कुछ मिसाइलों का भी स्टॉक किया है।

गौरतलब है कि बीते सोमवार 15 जून को गलवान घाटी पर चीनी सैनिकों से हुई हिंसक झड़प में 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जबकि चीन के 43 सैनिकों के मार जाने की खबर है। लद्दाख में हुई हिंसक झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं।

मीडिया ने सुशांत को किया गोल, पूरा फुटेज खा गई सारा अली खान: केदारनाथ के डायरेक्टर ने बताई अंदर की बात

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद लोग एक के बाद एक उनसे जुड़े अनुभवों को शेयर कर रहे हैं। कुछ बातें पुलिस पूछताछ में सामने आई हैं तो कुछ ने मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखी है।

फिल्म निर्देशक अभिषेक कपूर ने खुलासा किया है कि ‘केदारनाथ’ की रिलीज के बाद मीडिया ने सारा अली ख़ान को तो सिर-आँखों पर बिठा लिया था, लेकिन सुशांत सिंह राजपूत को नकार दिया था, जिससे वो बुझे-बुझे से रहते थे। इस फिल्म के डायरेक्टर अभिषेक ही थे। उन्होंने ही सुशांत की लॉचिंग फिल्म ‘काई पो चे’ को भी डायरेक्ट किया था।

बता दें कि उत्तराखंड बाढ़ आपदा पर आधारित ‘केदारनाथ’ दिसंबर 2018 में रिलीज हुई थी। इसमें सुशांत और सारा के अलावा नीतीश भारद्वाज ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक कारोबार ही किया, लेकिन फिल्म को अच्छी-ख़ासी चर्चा मिली थी। सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी सारा अली ख़ान ने इस फिल्म से बॉलीवुड में क़दम रखा था। उनकी तस्वीरें खूब वायरल हुई थी।

अभिषेक कपूर ने बताया कि उन्होंने पिछले डेढ़ साल से सुशांत से बातचीत नहीं की थी, क्योंकि उन्होंने क़रीब 50 बार अपना फोन नंबर बदला था। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरी तरह याद है कि जब ‘केदारनाथ’ रिलीज हुई थी तो मीडिया ने उनकी जम कर आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि सुशांत को ऐसा महसूस हो रहा था कि उन्हें वैसा प्यार नहीं मिल रहा है, जबकि सारी चीजें सारा को लेकर ही कही जा रही है।

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अभिषेक कपूर ने इंस्टाग्राम पोस्ट के माध्यम से साझा की अपनी बात

अभिषेक कपूर के मुताबिक़, उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत को कुछ मैसेज भेजे भी थे। कपूर ने बताया कि मीडिया द्वारा इस तरह का भेदभाव किए जाने के कारण सुशांत अंदर से बुझे-बुझे से रहते थे। कपूर ने बताया कि फिल्म ने रिलीज के बाद काफी अच्छा किया और उसके बाद उन्होंने सुशांत को जो मैसेज भेजे, वो उन्हें अब तक याद है। उस मैसेज में कपूर ने सुशांत को लिखा था- “भाई, मैं लगातार आपसे बात करने का प्रयास कर रहा हूँ। मुझे कुछ नहीं पता है कि आप किसी कारणवश नाराज़ हो या फिर व्यस्त हो। हमने एक बार फिर से इतनी अच्छी फिल्म बनाई है। अगर हम ख़ुशी नहीं मनाएँगे तो फिर कौन मनाएगा? या नहीं तो फिर ज़िंदगी में और किस चीज की ख़ुशी मनाएँगे हम लोग?“

अभिषेक कपूर ने जनवरी में सुशांत सिंह राजपूत को फिर से मैसेज भेज कर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ दी। कपूर ने कहा कि मैसेज का रिप्लाई नहीं आया तो उन्होंने इस चीज को हलके में लिया और सोचा कि वो गए हैं तो फिर आएँगे ही। कपूर ने बताया कि सुशांत की विज्ञान में रूचि थी और वो ब्रह्माण्ड की अनसुलझी चीजों का अध्ययन करते रहते थे।

कंगना रनौत ने भी कहा था कि न्यूज में ब्लाइंड आइटम लिखे ही इसलिए जाते हैं, ताकि जब कोई झूठ बोले, तो उसके ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न हो सके। मगर, उसके भीतर में जो व्यक्ति से जुड़ा विवरण होता है, वो सभी बातों को स्पष्ट कर देता है। जैसे यदि मेरे बारे में कोई लिखे तो उसमें लिखेगा- वो लड़की जिसके घुंघराले बाल हैं, नेशनल अवॉर्ड मिला हुआ, साइकोटिक है, मनाली से है… इस तरह मेरे ख़िलाफ़ लिखते हुए मेरा विवरण पूरा लिख दिया जाएगा लेकिन नाम नहीं लिखा जाएगा।”

लिबरल गिरोह ने गलवान में सैनिकों के बलिदान का उड़ाया मजाक, बिहार चुनाव से जोड़ रचा प्रोपेगेंडा

भारत और चीन के बीच तनाव ने 15 जून 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसक रूप ले लिया था। खूनी झड़प में भारत के 20 जवान बलिदान हो गए थे। वहीं सोशल मीडिया पर जंग लड़ने वाले लिबरल गैंग ने इस दुखद घटना को लेकर अपनी घटिया मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया है।

हमेशा की तरह लिबरल्स ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मगर इस बार लिबरल्स न केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का, बल्कि सैनिकों के बलिदानी का भी मजाक उड़ाया है। इतना ही नहीं इस पूरे मामले को लिबरल गैंग ने बिहार में आने वाले चुनावों से जोड़ा है।

@BrandySahni नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “अजीब बात है कि हर चुनाव से पहले हमेशा शहीद होने वाले जवानों का इस्तेमाल किया जाता है, इस बार भी (पीएम मोदी) ने फिर से सैनिकों को निशाना बनाया है। बिहार रेजिमेंट के सैनिक बिहार में चुनाव से पहले मारे गए हैं। यह महज संयोग नहीं हो सकता अगर यह पूर्वनियोजित है तो।”

वहीं ट्विटर पर अपने आप को एएफपी का फैक्ट चेकर’ होने का दावा करने वाले उज़ैर हसन रिज़वी ने लिखा कि भारतीय सेना के बिहार रेजिमेंट में विभिन्न राज्यों के सैनिक हैं। इसके बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पीएम मोदी के अपने शोक संदेश में बिहार का उल्लेख आगामी बिहार चुनावों में फायदा पाने के लिए किया है।

एक अन्य ट्विटर यूजर @ jameel7866786 ने 2019 में पुलवामा में सैनिकों की शहादत और हाल ही में हुए भारतीय और चीनी सेना के बीच सीमा पर खूनी हिंसक झड़प को एक बड़ा षड्यंत्र बताया है। 2019 के जनरल इलेक्शन को दुखद पुलवामा हमले और बिहार रेजिमेंट के 20 जवानों की शहादत को बिहार चुनाव से जोड़ते हुए, उन्होंने लोगों को दो परस्पर घटनाओं को लेकर इन्हें आपस में जोड़ने को कहा।

वहीं प्रोफेसर नाम के एक ट्विटर यूजर ने तो बिहार चुनावों के समय के ‘संयोग’ और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर बिहार रेजिमेंट को तैनाती करने के निर्णय पर सवाल उठाया।

“पीएम मोदी ने चीन को गैलवान घाटी दे दी” जैसे एक बेतुके और बेबुनियाद ट्वीट का जवाब देते हुए कॉन्ग्रेस समर्थक @ SamanSutiya1 ने लिखा कि 20 भारतीय सैनिकों की शहादत असल में बिहार चुनाव के जीत से जुड़ी थी। उन्होंने दावा करते हुए लिखा “20 में से 13 बिहार के थे। अब (बीजेपी) बेनिफिट ले सकती है।”

वहीं ससिधरन पझूर ने लिखा, “बिहार चुनाव आ रहे है। बिहार रेजिमेंट दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। नहीं, मैं कोई सुझाव नहीं दे रहा हूँ। ” दिलचस्प बात है कि ऐसी रणनीति लिबरल्स के पाठ्यपुस्तक में ही देखी जा सकती है कि किस तरह लोगों के सामने झूठ पेश करके उनके मन में संदेह के बीज बोए जा सकते हैं।

हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई के एक ट्वीट का जवाब देते हुए देश नामक एक यूजर दावा करता है कि उसने बिहार चुनाव में फायदे के लिए सीमा पर बिहार रेजिमेंट को तैनात करने के इस षड्यंत्र में अपने भाई को खो दिया है।

उल्लेखनीय हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब लिबरल जमात के गैंग द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश रची गई हो। पुलवामा हमले पर भी कई कॉन्ग्रेस समर्थकों ने उस घटना को षड्यंत्र बताते हुए कहा था कि पुलवामा अटैक प्रधानमंत्री के इशारे पर हुआ था।

कॉन्ग्रेस का विश्वास जीतने के लिए उनके ही एक नेता ने पुलवामा से ‘इनसाइड जॉब’ करार देते हुए यह सवाल किया था। जिसके बाद उसे पार्टी द्वारा लोकसभा टिकट भी दिया गया था। वहीं दूसरी ओर गोवा कॉन्ग्रेस के एक नेता ने भी आतंकी हमले के सबूत माँगे थे। इसके साथ ही पीएम मोदी पर पुलवामा हमले की योजना बनाने का आरोप भी लगाया था।

गौरतलब है कि कर्नाटक कॉन्ग्रेस के एक सांसद ने तो यहाँ तक कह दिया था कि पुलवामा हमला पीएम मोदी और पाकिस्तान के बीच एक ‘मैच फिक्सिंग’ था। कॉन्ग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार को घेरने के लिए यह ​​सवाल भी उठाया था कि कैसे विस्फोटक वहाँ तक पहुँचा?

वहीं पुलवामा अटैक को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि पीएम मोदी को पुलवामा हमले के बारे में पहले से पता था और उन्होंने फिर भी इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया था।