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पुरी रथ यात्रा: BJP ने कहा- फैसले में संशोधन के लिए SC जाए ओडिशा सरकार, शंकराचार्य से करे चर्चा

23 जून को आषाढ़ द्वितीया। इसी तिथि पर हर साल धूमधाम से जगन्नाथ महाप्रभु की रथ यात्रा आयोजित की जाती है। वैश्विक कोरोना संक्रमण को देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाले रथ यात्रा पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि अगर उन्होंने इस साल इसकी इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ उन्हें माफ नहीं करेंगे।

रविवार (जून 21, 2020) को ओडिशा भाजपा अध्यक्ष समीर मोहंती ने पुरी में रथ यात्रा के संचालन के लिए राज्य सरकार से पुरी के राजा गजपति दिब्यसिंह देब के प्रस्ताव के अनुसार कदम उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि ओडिशा सरकार को पुरी शंकराचार्य से भी चर्चा करनी चाहिए।

जारी किए गए एक वीडियो में समीर मोहंती ने कहा कि सरकार को दिए गए विस्तृत पत्र में गजपति द्वारा उठाए गए मुद्दों का विश्लेषण करना चाहिए और उसके अनुसार कदम उठाना चाहिए।

गजपति ने शनिवार (जून 20, 2020) को मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को पत्र लिख कर रथ यात्रा को अनुमति देने के लिए अपने आदेश को संशोधित करने के लिए तत्काल सुप्रीम कोर्ट का रूख करने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद, प्रबंध समिति और छठिहसा निजोगा ने सर्वसम्मति से सरकार से अपील करने का फैसला किया।

गजपति महाराजा ने COVID-19 महामारी के खिलाफ पर्याप्त सावधानियों के बीच रथ यात्रा आयोजित करने के अपने तर्क के लिए शास्त्रों, परंपराओं, ऐतिहासिक तथ्यों को उद्धृत करते हुए औचित्य को भी सामने रखा।

भाजपा नेता ने सरकार से इस मुद्दे पर पुरी शंकराचार्य से परामर्श करने को कहा, क्योंकि पिछले दो दिनों से अदालत के साथ-साथ अधिकारियों से भी अपील जा रही है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (जून 20, 2020) को भाजपा ने एक बयान में कहा था कि यद्यपि यह दुखद है, लेकिन हर किसी को रथयात्रा पर शीर्ष अदालत के आदेश का पालन करना चाहिए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष समीर मोहंती ने कहा था, “हमें सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कि इस महीने महामारी चरम पर है।” 

हालाँकि, भाजपा के वरिष्ठ नेता बिजय महापात्रा ने कहा कि भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े उत्सव को अचानक रद्द किए जाने से राज्य सरकार की भूमिका ‘‘संदेह’’ के दायरे में रहेगी। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के आदेश का पालन करना सभी का दायित्व है, लेकिन महामारी के बीच रथयात्रा के आयोजन को लेकर सरकार की तरफ से इच्छाशक्ति की कमी थी।

उल्लेखनीय है कि ओडिशा में रथ यात्रा को लेकर राज्य सरकार पहले से ही संदेह के घेरे में है। बुधवार (जून 10, 2020) को बीजेपी ने ओडिशा सरकार से इस पर स्थिति स्पष्ट करने की माँग की थी। भाजपा के प्रदेश महासचिव पृथ्वीराज हरिचंदन ने संवाददाताओं से कहा था कि रथ यात्रा में कुछ ही दिन बचे हैं और राज्य सरकार की चुप्पी से भक्तों और ओडिशा के 4.5 करोड़ लोगों में चिंता पैदा हो गई है।

भाजपा नेता ने कहा था कि इस समय तक उत्सव के लिए तैयारी बैठकें होनी चाहिए थीं लेकिन आयोजन को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण कोई चर्चा नहीं हुई है। हरिचंदन ने कहा कि मुख्यमंत्री को बयान देना चाहिए और राज्य तथा देश के लाखों लोगों के मन से संदेह दूर करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना वायरस महामारी के कारण राज्य सरकार रथ यात्रा कराने के पक्ष में नहीं दिख रही है।

120 सीटें… सूमो बाबू ही करा सकते हैं: भोलानाथ ठाकुर (टेलीग्राफ वाले) ने देर रात CM की बढ़ाई टेंशन

सेक्रेटरी: CM साहब, ठाकुर आया है।

इतनी रात गए, CM सोच मे पड़ गए? पहले सोचा कल बुला लेते हैं। नजर उठा के सेक्रेटरी को प्रश्नसूचक नजरों से देखा। सेक्रेटरी समझ गया। खुद ही बोल पड़ा- टेलीग्राफ वाला।

ऐसा नहीं था कि CM साहब जानते नहीं थे। पर सेक्रेटरी का मतलब था, “मिल लीजिए।” मुख्यमंत्री अनिच्छा से बोले, “भेजिए।”

ठाकुर भी मानो दरवाजे से लगा ही खड़ा था, झट से अंदर आ गया। CM साहब ने दूर से ही संबोधित किया, “आओ ठाकुर… अब देश का राजधानी छोड़ हमारा राजधानी पसंद आने लगा?” ठाकुर संकोचपूर्वक मुस्कुरा कर एक-एक कदम धीरे-धीरे रखता आगे आया। मुख्यमंत्री जी हँस कर बोले, “अरे आओ बैठो। तुमसे मिलने के लिए तो मै हमेशा बेताब रहता हूँ।”

भोलानाथ ठाकुर CM साहब को सालों से जानता था, पर आज भी वे उसके बारे में क्या सोचते थे, इसकी थाह नहीं पाता था। वह धीरे से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मेज पे रखा पानी पिया और चाय का कप हाथ में लेकर, बिना समय नष्ट किए सीधा मुद्दे पे आया, “यह मजदूरों का इशू गरमाया हुआ है। आपके बंधू पार्टी वाले भी पूरा फायदा लेंगे।”  ठाकुर, चाय की चुस्की लेने के लिए रुका, CM साहब, ध्यान देके सुन रहे थे।

“इन सबमें, सबसे ज्यादा हमारी छवि को नुकसान हुआ है।” 

CM की नजर में सवाल था। “राज्य की छवि को…” ठाकुर ने स्पष्ट किया। CM, “क्यों, UP में तो हमसे ज्यादा लोग वापस गए?” ठाकुर, “CM साहब, UP की बात अलग है। वहॉं तो कुछ गलत हो नहीं सकता। वहाँ आपके कर्मठ मित्र कुछ गलत होने नहीं देंगे।”

CM ने आग में तेल डाला, “तो यह कौन सा पराया राज्य है।” ठाकुर, “क्या सर, आप मुझ से ही मजाक कर रहे हैं? आप भी जानते हैं सच्चाई क्या है। सरजी, यह सुशासन बाबू का इमेज बनने में 15 साल लगे। यह एक कोरोना पूरा बॅंटाधार कर देगा।” CM साहब ने ठाकुर को पैनी नजर से देखा, “ठाकुर बात तो तुमने सही कही, पर यह या तो हम जानते हैं या तुम। और अगर हम तुमको ठीक से जानते है तो, यह बतलाने के लिए तो तुम ना आए।”

ठाकुर शर्माया, बोला, “आप तो दिल की बात पकड़ लेते हैं। CM साहब, ये जो अपने डॉक्टर साहब हैं, कमाल का काम करते है टीवी पर…” और अंदाज़ा लेने के लिए रुक गया। CM सुन रहे थे, “पर कभी-कभी बहुत ज्यादा मात्रा हो जा रहा रामधुन का… और देशभक्ति का… लगता है अपनी अपनी पार्टी के हैं भी कि नहीं।”

CM सोच में दिखे। उसने  फिर बोलना शुरू किया, “उनकी बातों का हमको तो कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा। इनसे अच्छे तो वही थे।”     

इस बात से CM का गुस्सा उमड़ पड़ा, “अरे धत्त…क्या  बोल रहे हैं? आप तो जानते है हमको। यही सब हमको अच्छा नहीं लगता आप पत्रकार लोगों का। चरवाहों के साथ? एक बार आपही के बात में आकर… और वोह आपकी दिल्ली वाली TV स्टार पत्रकार। पूरा टाइम उसी के साथ फोटो, इंटरव्यू…और हमारा सामने तरफदारी। जब बाद में जेल हुआ तब? सब गायब?”     

और CM रुक गए। ठाकुर को कुछ पल के लिए लगा, कहीं भगा न दे। ऐसा कुछ नहीं हुआ। पर वह उठ के खड़े हो गए, बोले “और बताओ कब तक हो?” ठाकुर समझ गया। बोला “चलते-चलते एक बात कहने की इजाजत दीजिए। छोड़िए उनको। मैडम के साथ जाने में क्या खराबी है?” बिना जवाब दिए CM उठ के चल दिए। ठाकुर भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। 

CM काफी देर ठाकुर की बात पर सोचते रहे। नेशनल लीडर बनने का उनका ख्वाब, हिन्दू पॉलिटिक्स के चक्कर मे एक बार चकनाचूर हो चुका था। अब क्या यह ब्राह्मण-बनिया पार्टी मेरी इस कुर्सी की भी क़ुर्बानी लेगी? कैसे इतना सबकुछ बदल सकता है सिर्फ दो लोगों से? हजारों नेताओ की, लाखों कार्यकर्ताओं की और करोड़ों सदस्यों की पार्टी सिर्फ 2 लोगों ने बदल दी? 

उनको 20 साल पुराना समय याद आया। कैसा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण था दोनों पार्टियों में। फिर 2002 भी याद आया। तभी अगर कविवर, गुजरात मे किसी और को CM बना देते, तो आज NDA अपनी गिरफ्त में होता। और शायद आज प्रधानमंत्री भी…

पर 2014 तक तो सब ठीक ही था। ये दोनों जब से दिल्ली पहुँचे हैं सब बदल गया। अब तो डर लगता है हिन्दू शब्द से और इस पार्टी से। लगता है खा जाएँगे किसी दिन। ठाकुर बात तो सही कर रहा था। PK की  बात से मेल खाती!!!

PK की याद से CM के हृदय में आश्वासन का भाव जागा।  

सुबह इस खबर से हुई कि डिजिटल रैली को लोगों ने जबरदस्त सराहा है। CM को यह भी ठीक नहीं लगा था। अभी सीट शेयरिंग भी नहीं हुई और ये निकल भी पड़े, TV से लोगों को लुभाने। Seat Sharing से उनको तीसरे हिस्सेदार को भी समायोजित करना हैं, यह बात फिर चुभी। यह कौन कम थे, तो साथ में इनके मामा के लड़के…मौसम वैज्ञानिक बाप-बेटा। (राष्ट्रप्रेमी पार्टी के एक प्रेमी पत्रकार ने TV पर CM को भी मौसम वैज्ञानिक बुलाया था यह बात अलग है) हमेशा कुछ न कुछ माँगते रहते हैं… पिछड़ा-पिछड़ा बोल के मलाई खींचने के काम करते हैं दोनों। 

इन सब चिंताओं के साथ में कोरोना (corona) का डर था ही। पर CM को migrant labour वाली बात खाए जा रही थी। अगर ये नवंबर तक वापस नहीं गए तो? कितनी सीट पर असर होगा? CM जानते थे, मोटा भाई उनको 100 से ज्यादा सीटे देना नहीं चाहते। इस माइग्रेंट लेबर इश्यू के चलते CM को मोलभाव करनते की ताकत क्षीण होती दिख रही थी।

PK और ठाकुर जैसे अवसरवादियों की बातों पे गौर करना तो ठीक है, पर इस परिस्थिति में क्या इन पर भरोसा कर सकते हैं? CM इसका जवाब जानते थे। ऐसे में उनको लगा, उनके सबसे पुराने साथी, भले ही वो उस तरफ हो, पर उन पर ही भरोसा करना ठीक रहेगा।

CM को पूरा भरोसा था सूमो बाबू पर! पर उनकी दिल्ली में आज की परिस्थिति में कितनी सुनी जाती है? खैर, और कोई चारा नजर नहीं आ रहा था। चारा- यह शब्द कितने पुराने समीकरण याद दिला देता था।

शाम होते-होते CM के मन में योजना तैयार हो गई थी। 120 सीटों से कम कुछ भी मान लेना खतरनाक हो सकता है। सूमो बाबू ही हैं, जो यह करा सकते हैं। भले उसके लिए उन्हें कुछ अपनी पार्टी में तोड़-मरोड़ करनी पड़े।  उन्होंने सूमो बाबू को मिलने के लिए संदेशा भेजा और काम में जुट गए।

श्रीनगर में मार डाले गए 3 आतंकी: टॉप के 4 आतंकवादी संगठनों के चीफ का सफाया, J&K इतिहास में पहली बार

जम्मू और कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने आज (21 जून, 2020) तीन आंतकियों को मार गिराया है। तीनों आतंकी श्रीनगर के जदीबल इलाके में मारे गए हैं। श्रीनगर में पिछले कुछ समय में यह दूसरा इनकाउंटर है।

कश्मीर पुलिस के आईजी विजय कुमार ने बताया कि मारे गए आतंकियों में से एक आतंकी रमजान के दौरान 20 मई को पंडाच चौक के पास सीमा सुरक्षा में तैनात 2 बीएसएफ के जवानों पर किए गए हमले में शामिल था। इस हमले में दोनों जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

जानकारी के अनुसार शहर के जूनिमार और ज़दीबल के पोज़वालपुरा इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी की खुफिया जानकारी के आधार पर सुरक्षाबलों ने आज सुबह इलाके को घेर लिया और तलाशी अभियान शुरू किया था।

अधिकारियों ने बताया कि पुलिस के बार-बार प्रयास के बाद भी आतंकवादियों के परिवार के सदस्य उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मनाने में विफल रहे। और उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। जिस पर जवाबी कार्रवाही करते हुए जवानों ने उन्हें मार गिराया।

न्यूज़ एजेंसी एएनआई को विजय कुमार ने बताया, “हमनें आतंकियों की पहचान पता चलने पर उनके परिजनों को बुलाया। और उनसे अपील कि की वे आतंकवादियों को आत्मसमर्पण के लिए कहें। मगर आतंकवादियों ने अपने परिजनों के कहने पर भी आत्मसमर्पण नहीं किया।”

उन्होंने आगे कहा, “तीनों आतंकियों में दो आतंकी 2019 से आतंकी गतिविधियों में शामिल थे। वहीं एक आंतकी सीमा पर तैनात दो बीएसएफ जवानों पर हुए हमले में शामिल था।”

आईजी विजय कुमार के अनुसार चार प्रमुख आतंकी संगठन – लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन और गजवा-उल-हिंद के चारों चीफ कमांडर चार महीने के भीतर मार डाले गए। ऐसा जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार हुआ है।

कल से शुरू हुए इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ के तीन जवान भी घायल हुए हैं। अधिकारी ने बताया कि शहर में मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ एहतियातन निलंबित कर दी गई हैं। उन्होंने बताया कि शहर के व्यावसायिक क्षेत्रों के अधिकतर हिस्सों में लोगों के आवागमन पर प्रतिबंध लगाया गया है।

बता दें कि इसी साल मई में श्रीनगर के नवाकदल इलाके में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में जवानों ने हिजबुल मुजाहिदीन के दो आतंकी को मार गिराया था। जिसमें कश्मीर के अलगाववादी नेता का बेटा भी शामिल था। 19 मई को 12 घंटे सैनिकों और आतंकियों की इस मुठभेड़ में दर्जनों घर क्षतिग्रस्त हो गए थे। इलाके में भारी तबाही भी मची थी।

वहीं इससे पहले शुक्रवार (19 जून,2020) को कश्मीर के अवंतीपोरा और शोपियाँ जिले में सुरक्षा बलों ने मस्जिद में छुपे 2 आतंकियों के साथ-साथ कुल 8 आतंकियों को ढेर कर दिया था, जिसमें सेना के जवानों ने शोपियाँ जिले में पाँच और पांपोर जिले में तीन आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था। ये सभी आतंकवादी जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे।

गौरतलब है कि पिछले दो हफ्ते के अंदर सुरक्षाबलों ने करीब दो दर्जन आतंकियों को जम्मू कश्मीर मेंं ढेर कर दिया है। अगर पूरे साल की बात की जाए तो अब तक 100 से अधिक आतंकी मारे गए हैं। कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लागू के समय में भी सुरक्षाबलों का आतंकियों पर कड़ा प्रहार जारी है।

1 नहीं, 3 बार हुई थी लड़ाई… चीनियों ने ड्रोन का भी किया इस्तेमाल: गलवान घाटी में क्या-क्या, कब-कब – जानें पूरी कहानी

लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बारे में अभी तक मीडिया और सरकार के माध्यम से बहुत कुछ लोगों के सामने आया है, लेकिन दोनों सेनाओं के बीच हुए खूनी रक्तपात की पूरी जानकारी अभी तक स्पष्ट नहीं हो सकी थी। आज हम आपको बताते हैं कि आखिर उस दिन गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच क्या हुआ था।

जैसा कि सभी को जानकारी है कि दस दिन पहले दोनों सेनाओं के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता हुई थी, लेकिन दोनों पक्षों के बीच पट्रोलिंग पॉइंट 14 को लेकर विवाद शुरू हो गया था, क्योंकि दोनों सेनाएँ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के बहुत करीब पहुँच गई थीं।

यह साबित हो गया था कि चीनी सेना ने गलवान नदी के किनारे अपनी एक पोस्ट का निर्माण कर लिया था, जो कि भारतीय सीमा में आती है, जिसे हटाने को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति बन गई थी। वार्ता के कुछ दिन बाद चीनी सेना द्वारा पोस्ट को हटा दिया गया था।

पोस्ट हटने के बाद उसी दिन 16 बिहार रेजीमेंट बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल बी संतोष बाबू की एक समकक्ष चीनी अधिकारी के साथ बातचीत हुई थी, लेकिन 14 जून, 2020 को अचानक चीनी सेना ने रातों रात उसी पोस्ट को फिर से खड़ा कर दिया।

इसके बाद 15 जून को जब इसकी जानकारी भारतीय सैनिकों को हुई तो शाम करीब 5 बजे कर्नल संतोष बाबू ने अपनी 35 जवानों की टीम के साथ उस पोस्ट का स्वयं जाँच पड़ताल के लिए दौरा किया। जिस स्थान पर कर्नल बाबू अपनी टीम के साथ गए थे, वह स्थान कोई विवादित नहीं है। इसलिए जाँच टीम की कोई विशेष तैयारी भी नहीं थी।

भारतीय सेना जब उस पोस्ट पर पहुँची तो उन्होंने देखा कि पोस्ट पर नए चीनी सैनिक तैनात किए गए हैं और आम तौर पर उस क्षेत्र में PLA के इस तरह के सैनिक तैनात नहीं किए जाते हैं, यह एक चौंकाने वाली बात थी। बाद में सेना को पता चला कि विवादित पोस्ट पर वह सैनिक तैनात किए गए थे, जो तिब्बत में तैनात किए जाते हैं।

भारतीय सेना की टुकड़ी के पोस्ट पर पहुँचते ही चीनी सेना के जवान उग्र हो गए। जब कर्नल बाबू ने उस पोस्ट पर चीनी सेना की मौजूदगी का कारण पूछा तो एक चीनी सैनिक ने आगे बढ़कर गुस्से में चीनी भाषा में जोर से चिल्लाते हुए कर्नल बाबू को धक्का देकर पीछे की ओर धकेल दिया।

इसके बाद दोनों सेनाओं के बीच धक्का-मुक्की के साथ हाथापाई शुरू हो गई। यह पहला विवाद था, जो करीब 30 मिनट बाद शांत हो गया। इसमें दोनों ओर से कई सैनिक चोटिल हो गए, लेकिन भारतीय सैनिकों की टुकड़ी चीनी सैनिकों पर हावी रही। इसके बाद भारतीय सेना ने पोस्ट को तहस-नहस करके उसे आग के हवाले कर दिया।

इस दौरान भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को एलएसी के उस पार तक ढकेल दिया था। चीनी सैनिकों के इस तरह अचानक किए गए दुर्व्यवहार से कर्नल बाबू को आभास हो गया था कि कुछ बड़ा होने वाला है। इसी को ध्यान में रखते हुए कर्नल ने सभी घायलों को नीचे भेज दिया और पोस्ट पर अधिक संख्या में सैनिकों को बैकअप के लिए भेजने को कहा और अपने साथ मौजूद सैनिकों को कुछ समय के लिए शांत होने के लिए कहा।

इंडिया टुडे के शिव अरूर से बात करते हुए श्योक-गलवान पॉइंट पर तैनात सेना के एक अधिकारी ने कहा कि हमारे जवान बहुत अधिक गुस्से और जोश में थे और वह चीनी सेना को सबक सिखाना चाहते थे।

कर्नल बाबू को जिस बात का शक था, वह सही निकला और गलवान घाटी के किनारे बड़ी संख्या में घात लगाए चीनी सैनिकों ने भारतीय सेना के पहुँचते ही बड़े-बड़े पत्थरों से उन पर हमला कर दिया। यह दूसरी झड़प 300 सैनिकों के बीच करीब 45 मिनट तक चली। इसका परिणाम यह रहा कि दोनों ओर से कई सैनिक नदी में जा गिरे। इन्हीं में से एक कर्नल संतोष बाबू भी थे।

इस बीच दोनों देशों की सेनाओं ने अपने-अपने सैनिकों के शवों को उठाया। इस दौरान भारतीय सैनिकों ने नदी के ऊपर उड़ते एक चीनी ड्रोन को देखा। वह ड्रोन भारत के घायल सैनिकों के साथ-साथ शवों को देखकर नुकसान का अनुमान लगा रहा था। इसके बाद भारतीय सेना को आभास हुआ कि चीनी सेना इसके बाद भी शांत नहीं बैठेगी और वह तीसरी लड़ाई की तैयारी कर रही है।

इसके बाद बड़ी संख्या में सेना को बुलाया गया, जिसमें बैकअप के लिए 16 बिहार और साथ ही 3 पंजाब रेजिमेंट की प्लाटून भी शामिल थी। बैकअप आते ही भारतीय सेना ने एलएसी के उस पार कदम रखा और यह सुनिश्चित किया कि चीनी सेना एलएसी को पार नहीं कर सके।

11 बजे के बाद तीसरी बार दोनों देशों की सेनाओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई। आपस में चट्टानों पर लड़ते हुए दोनों तरफ के कई जवान घायल होकर गलवान नदी में गिर गए। 5 घंटे की झड़प के बाद दोनों ओर से लड़ाई शांत हो गई। इसके बाद दोनों ओर से सैनिकों के शवों और घायलों का आदान-प्रदान किया गया।

इस झड़प में 10 भारतीय सैनिक चीनी की ओर रह गए (कुछ मीडिया ने इसे बंदी बताया, जबकि ऐसा कुछ नहीं था), जहाँ उनका इलाज किया जा रहा था। इनमें 2 मेजर, 2 कप्तान और 6 जवान शामिल थे। इस बीच पूर्व सेना प्रमुख और वर्तमान मंत्री जनरल वीके सिंह ने मीडिया को बताया कि चीन को हमसे दो गुनी क्षति हुई है। वहीं इंडिया टुडे टीवी को मिली जानकारी के मुताबिक तीसरी झड़प के बाद भारतीय सेना ने 16 चीनी सैनिकों के शवों को वापस किया था, जिनमें 5 चीनी सेना के अफसर थे।

16 जून की सुबह होते-होते भारतीय सैनिक एलएसी के इस पार आ गए और इस दौरान दोनों ओर से मेजर जनरलों ने स्थिति को अपने हाथों में लिया और आपस में वार्ता शुरू कर दी।

सेना के एक शीर्ष अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया कि यह कोई बंदी वाली स्थित नहीं थी। हम उनके सैनिकों को और वह हमारे सैनिकों को इलाज दे रहे थे। 16 बिहार रेजीमेंट का चीनी सेना के साथ 2017 में हुए डोकलाम विवाद के दौरान भी सामना हो चुका है। रेजीमेंट ने आपनी आकलन रिपोर्ट में निश्चित किया है कि इस बार चीनी सेना ने गलवान पोस्ट पर कोई आम चीनी सेना को तैनात नहीं किया था।

यही कारण रहा कि इस बार चीनी सेना की नीयत बुरी थी और उनका मकसद गलवान वेली पर कब्जा करने का था। कर्नल बाबू का जाना यूनिट के लिए एक बड़ा झटका था। अब पट्रोलिंग पॉइंट 14 पर स्थिति सामान्य है।

‘नहीं हुई रथयात्रा तो 1 साल तक क्वारंटाइन रह सकते हैं भगवान जगन्नाथ, ओडिशा सरकार ने SC में बोला झूठ’

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जगन्नाथ पुरी में होने वाली वार्षिक रथयात्रा पर कोरोना वायरस संक्रमण के कारण रोक लगा दी है। इसके बाद से ही हिन्दुओं में आक्रोश का माहौल है। लोगों का कहना है कि जब अनलॉक के तहत सारी चीजें खुल ही रही हैं तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों?

पुरी शंकराचार्य ने भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को ये निर्णय लेने से पहले उनसे विमर्श करना चाहिए था। उन्होंने इस फ़ैसले की समीक्षा करने को कहा है।

ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व वकील और जगन्नाथ पुरी मुक्ति मंडल के उपाध्यक्ष अशोक महापात्रा ने इस विषय में ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पुरी में श्री जगन्नाथ की पूजा ऋग्वैदिक काल से होती रही है। उन्होंने बताया कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को इस्लामी आक्रांताओं से छिपाने के लिए कहीं और रख दिया गया था, जिसे आदि शंकराचार्य ने बाद में खोजा और उन्हें पुनर्स्थापित किया।

जगन्नाथ भगवान की पूजा स्कन्द पुराण और अन्य पवित्र पुस्तकों में वर्णित रीति-रिवाजों के अनुसार होती रही है। 1960 में ओडिशा सरकार ने जगन्नाथ पुरी का प्रबंधन अपने हाथों में लिया। महापात्रा बताते हैं कि 1964 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मंदिर के सारे धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाए और पुरातन परम्पराओं और पवित्र पुस्तकों में लिखित विधि के अनुसार सारी प्रक्रिया पूरी की जाए।

गोवर्धन मठ के शंकराचार्य को जगन्नाथ मंदिर का मुख्य पुजारी माना जाता है। उनकी मदद के लिए ब्राह्मणों का एक समूह होता है, जिसे मुक्ति मंडप के नाम से जाना जाता है। बकौल महापात्रा, सुप्रीम कोर्ट ने ही निर्देशित किया था कि शंकराचार्य और मुक्ति मंडप पंडित सभा की सलाह के बाद धार्मिक क्रियाकलाप का आयोजन किया जाए। साथ ही महापात्रा ने ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार पर आरोप लगाया कि वह इन परम्पराओं को ध्वस्त कर रही है।

बकौल माहापात्रा, ओडिशा सरकार ने ऐसा दिखावा किया कि वो जगन्नाथ पुरी मंदिर परिसर का विकास करना चाहती है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि इस मंदिर परिसर को संरक्षण की ज़रूरत है, लेकिन विकास और जीर्णोद्धार की आड़ में ओडिशा सरकार ने एक मठ को ही ढाह दिया। महापात्रा ने बताया कि पुरातन परम्पराओं के हिसाब से ही सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए रथयात्रा की योजना बनी थी।

उन्होंने बताया कि इसकी तैयारी के लिए सरकार के साथ पूरी तरह सहयोग किया गया, क्योंकि शुरू में ओडिशा सरकार ने भी ऐसा ही दिखाया कि वो रथयात्रा को लेकर गंभीर है। महापात्रा की मानें तो केंद्र सरकार द्वारा कुछ छूट दिए जाने के बावजूद ओडिशा सरकार ने 30 जून तक सारी धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगा दी। उन्होंने आरोप लगाया कि ओडिशा सरकार द्वारा जान-बूझकर ऐसा करना बताता है कि वो रथयात्रा को लेकर गंभीर ही नहीं थी।

बता दें कि ओडिशा में मंदिरों, मठों और हिन्दू धार्मिक स्थलों पर नवीन पटनायक सरकार की बुरी नज़र होने की बात सामने आई थी। बीजद सरकार ने सैकड़ों करोड़ रुपयों के नए प्रोजेक्ट का ऐलान किया था, जिसके तहत पुरी को एक ‘वर्ल्ड हेरिटेज सिटी’ के रूप में विकसित किया जाएगा। लेकिन, इसके लिए मठों को ढहाया जा रहा है। लांगुली मठ 300 वर्ष पुराना था। इसे रैपिड एक्शन फोर्स और पुलिस की मौजूदगी में ढाह दिया गया। 900 वर्ष पूर्व निर्मित एमार मठ को भी नहीं बख्शा गया।

अशोक महापात्रा ने कहा कि हाईकोर्ट में भी ओडिशा सरकार ने कह दिया कि वो इस साल जगन्नाथ पुरी रथयात्रा के प्रबंधन में सक्षम नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कहने को तो म्यूजियम बना कर चीजों को संरक्षित करना चाहती है, लेकिन उनका असली उद्देश्य इसके माध्यम से पैसे कमाना है, इसे कमर्शियलाइज करना है। उन्होंने कहा कि विभिन्न एनजीओ ने भी मिलकर रथयात्रा में व्यवधान डालने की कोशिश की है। महापात्रा ने कहा:

“जगन्नाथ जी की उपासना पुरातन काल से होती आ रही है, ऋग्वैदिक काल से। इस्लामी आक्रांताओं के कारण उन्हें भूगर्भ में छिपाया गया था लेकिन आदि शंकराचार्य ने उसका उद्धार कर के मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। शंकराचार्य और पवित्र पुस्तकों में वर्णित विधि-विधान से अब तक रथयात्रा और पूजा-पाठ होते आ रहे हैं। ओडिशा सरकार द्वारा इसमें व्यवधान डालना दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार जान-बूझकर ऐसा कर रही है। रथयात्रा आयोजित कराने में उसकी रूचि ही नहीं थी।”

उड़िया मीडिया ख़बरें हिंदी पट्टी से गायब हैं

विश्व हिन्दू परिषद ने भी रथयात्रा आयोजित कराए जाने की बात कही है। परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने ऑपइंडिया को इस सम्बन्ध में सूचना दी। विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के केन्द्रीय महामंत्री श्री मिलिंद परांडे ने कहा कि गत सैकड़ों वर्षों से अनवरत रूप से पुरी में निकाली जाने वाली भगवान श्रीजगन्नाथ की परम्परागत रथ यात्रा इस वर्ष भी निकाली जानी चाहिए। कोविड महामारी के संकट काल में भी सभी नियमों तथा जन स्वास्थ्य सम्बन्धी उपायों के साथ यात्रा निकाली जा सकती है।

उन्होंने आह्वान किया कि यात्रा की अखण्डता सुनिश्चित करने हेतु कोई मार्ग अवश्य ढूँढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि आज की परिस्थितियों में यह अपेक्षा कदापि नहीं है कि यात्रा में दस लाख भक्त एकत्रित हों। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की प्रार्थना भी की। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के संकट काल में भी, जन-स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए, प्राचीन परम्परा की अखण्डता सुनिश्चित करने हेतु उचित मार्ग निकालना राज्य सरकार का दायित्व है।

विहिप ने ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपने इस दायित्व के पालन में पूरी तरह विफल रही है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ओडिशा सरकार सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस सम्बन्ध में सभी पहलू ठीक से नहीं रख पाई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस सम्बन्ध में निर्णय लेने से पूर्व सभी सम्बन्धित पक्षों को सुनना चाहिए था। उन्होंने कहा:

“कम से कम पुरी के शंकराचार्य गोबर्धन पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के साथ मंदिर के ट्रस्टियों तथा यात्रा प्रबंधन समिति को तो सुना ही जाना चाहिए था। भगवान के रथ को प्रतीकात्मक रूप से हाथियों, यांत्रिक सहायता या कोविड परीक्षित पूरी तरह से स्वस्थ व सक्षम सीमित सेवाइतों के माध्यम से भी खींचा जा सकता है। यात्रा की इस पुरातन महान परम्परा के टूटने पर मंदिर के धार्मिक विधि-विधानों में व्यवधान उपस्थित होने की सम्भावना अनेक भक्तों ने व्यक्त की है।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए अधिवक्ता अशोक महापात्रा ने कहा कि अगर भगवान को रथयात्रा के जरिए मंदिर नहीं पहुँचाया जाता है तो वो अगले 1 साल क्वारंटाइन ही रहेंगे, जो कि कहीं से भी न्यायोचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का पूरी तरह पालन किया जाए तो रथयात्रा तो दूर, भगवान की पूजा तक नहीं हो पाएगी। हालाँकि, अब विरोध के बाद ओडिशा सरकार का रुख नरम हुआ है।

विश्व हिन्दू परिषद ने जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा पर लगी रोक हटाने की माँग की

उन्होंने ओडिशा सरकार को घेरते हुए कहा कि उसने सुप्रीम कोर्ट में रथयात्रा के लिए 12 से 15 लाख लोगों के इकट्ठे होने की संभावना जता दी, जबकि इसमें 1000 से ज्यादा लोग शामिल नहीं होंगे। महापात्रा ने कहा कि ओडिशा सरकार ने हाल ही में जब एक कार्यक्रम आयोजित किया था तब उसमें काफ़ी लोगों ने शिरकत की थी फिर रथयात्रा में दिक्कत क्या है? उन्होंने कहा कि मुद्दा लोगों का शामिल होना नहीं, बल्कि रथयात्रा का संचालित होना है।

इधर एक अन्य याचिका में पुरी शहर को पूरी तरह शटडाउन करके और जिले में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाकर रथयात्रा निकालने का प्रस्ताव दिया गया है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष और पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देब ने भी ओडिशा सरकार से कहा है कि वो तुरंत सुप्रीम कोर्ट को अपने फ़ैसले की समीक्षा करने को कहे। वहीं शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा–

‘‘किसी आस्तिक सज्जन की यह भावना हो सकती है कि अगर इस आपदा की स्थिति में रथयात्रा की अनुमति दी जाए तो भगवान जगन्नाथ कभी माफ नहीं करेंगे, लेकिन अगर विख्यात पुरातन परंपरा का विलोप हो जाए तो क्या भगवान जगन्नाथ क्षमा कर देंगे? विशेष परिस्थिति में न्यायालय अवकाश के दिनों में भी खुल सकता है। परसो रथयात्रा है; मध्य में केवल एक दिन शेष है। अतः रथयात्रा को पूर्णतः बन्द करने का यह सुनियोजित प्रकल्प है।“

सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रणय कुमार महापात्रा भी सुप्रीम कोर्ट में रथयात्रा आयोजित किए जाने के पक्ष में समाजसेवक आफताब हुसैन की तरफ से याचिका दायर की थी। अब सोमवार (जून 22, 2020) को उन याचिकाओं पर सुनवाई होनी है, जिसके बाद स्थिति स्पष्ट होगी। हालाँकि, बहुत कुछ राज्य सरकार पर निर्भर करता है। अगर वो गंभीर रही तो विधि-व्यवस्था बनाए रखकर रथयात्रा आयोजित हो सकती है।

भारत ने भी कई चीनी सैनिकों को बनाया था बंधक, बाद में उन्हें छोड़ा: जनरल वीके सिंह का खुलासा

केंद्रीय सड़क एवं परिवहन राज्यमंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने खुलासा किया है कि भारत ने चीन के कई सैनिकों को पकड़ा था लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। ‘एबीपी न्यूज़’ को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने ऐसा कहा। जनरल सिंह ने कहा कि पिछले सप्ताह गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए संघर्ष के दौरान ऐसा हुआ था। हालाँकि, चीन की तरफ से इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

बता दें कि कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि चीन ने भारत के 10 जवानों को पकड़ लिया था, जिन्हें बाद में छोड़ा गया। बाद में ख़ुद चीन ने ही इस दावे को नकार दिया था। बावजूद इसके कई प्रपंची पत्रकारों और नेताओं ने सरकार को घेरते हुए आरोप लगाए थे कि देश को इस सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया गया। उन्होंने मोदी सरकार पर जानकारी छिपाने के आरोप लगाए थे।

गाजियाबाद से लगातार दूसरी बार सांसद चुने गए वीके सिंह ने गलवान घाटी संघर्ष को लेकर जानकारी दी कि इस झड़प में चीन के दोगुने सैनिक मारे गए हैं। उन्होंने कहा कि हमारे 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो चीन के इससे ज्यादा सैनिक मारे गए हैं लेकिन चीन कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने ध्यान दिलाया कि चीन में हर चीज छुपाई जाती है। हमारे सैनिकों ने बदला लेकर बलिदान दिया है।

जनरल वीके सिंह ने चीन विवाद पर रखी अपनी बात (साभार: ABP न्यूज़)

ज्ञात हो कि लद्दाख के गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद भारत अब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को बढ़ा रहा है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक ख़बर के अनुसार, भारत ने अपने फॉरवर्ड बेसेज पर फाइटर जेट्स और हेलिकॉप्टर्स को आगे बढ़ाया है, तैनाती में तेज़ी लाई है। ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल’ की सीमा 3488 किलोमीटर लम्बी है, जहाँ विभिन्न बिंदुओं पर भारत ने सेना और अस्त्रों की तैनाती की है।

बंगाल की खाड़ी वाले इलाक़े में भी नौसेना के वॉरशिप्स की तैनाती की गई है। फॉरवर्ड बेसेज पर चिनूक हेवी-लिफ्ट हेलिकॉप्टर्स और अपाची हेलिकॉप्टर्स की तैनाती की गई है। आगे होने वाले किसी भी हमले और हिंसा की स्थिति को रोकने के लिए जिन हेलिकॉप्टरों को तैनात किया गया है, उसके साथ सेना के कई जवान भी गए हैं। ऊँचे इलाक़ों में होवित्जर को तैनात किया गया है। वायुसेना पूरी तरह तैयार है।

भ*#, ये नौटंकी मत कर पाँच टाइम का नमाज पढ़: योगा डे पर मोहम्मद कैफ को कट्टरपंथियों ने गरियाया

मौका कोई भी पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ अपने मजहब के लोगों के निशाने पर आ ही जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून 2020) पर भी यही हुआ।

मोहम्मद कैफ ने योग करती अपनी तस्वीर सोशल मीडिया में शेयर की और उन पर गालियों के साथ उन्हीं के मजहब के नाम वाले यूजर्स टूट पड़े। किसी ने इसे नौटंकी कहा तो किसी ने उन्हें भ*# बता दिया।

कैफ ने ट्वीट किया, ‘खुद से प्यार कीजिए। तन, मन, आत्मा से प्यार कीजिए।’

लेकिन, इस्लामी यूजर्स को यह पसंद नहीं आया। आजम ने लिखा, “भाई ये नौटंकी मत कर। पॉंच टाइम नमाज पढ़ ले फुल फिट रहेगा।” उसने मजहब की ओर इशारा करते हुए कहा कि कैफ, इरफान, यूसुफ जैसों को इस नौटंकी में नहीं फॅंसना चाहिए।

रुओ अदनान ने मुस्लिम धर्म के खतरे की बात करते हुए, कैफ के इमाम भटकने की बात कही। साथ ही गद्दार बताते हुए कैफ के लिए अश्लील शब्दों का प्रयोग किया।

जिब्रान अहमद ने कैफ मजाक बनाते हुए कहा “अबे क्या कर रहा है।”

फारुख खान नाम के यूजर योगासन पर उन्हें भ*# कहा।

इमदाद अब्दुल्ला ने कैफ के योगा को पॉलिटिकल स्टंट करार देते हुए इसे बीजेपी से टिकट लेने की तैयारी बता डाला।

फेसबुक पर भी इसी तरह की अश्नलील टिप्पणियॉं देखने को मिली।

इंस्टाग्राम पर भी लोगों ने मजहब का हवाला देते हुए नमाज़ पढ़ने की सीख दी।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया एक ऐसी जगह है, जहाँ अक्सर इस्लामी क़ट्टरपंथियों की मन की बात किसी न किसी जरिए सामने आती रहती है। कई मुस्लिम सेलेब्रेटी जब हिंदू त्योहारों को उत्साह के साथ मनाते दिखते हैं या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील मानकर उसका अनुसरण करते दिखते हैं, तब अक्सर ऐसे कमेंट और मजहबी बातें उनके ट्विट्स का हिस्सा होती हैं।

कोरोना योद्धाओं के लिए कैफ द्वारा 9 मिनट मोमबत्ती जलाने पर

उल्लेखनीय है पीएम मोदी के अपील पर कैफ ने अपनी पत्नी के साथ मोमबत्ती जलाया था। साथ ही कैफ ने कोरोना योद्धाओं को धन्यवाद देते हुए अपने ट्विटर पर रात का विडियो को शेयर भी किया था। मगर, प्रधानमंत्री की बात को मानता देख समुदाय विशेष के कुछ लोग बिदक गिए और उन पर भद्दी और अश्लील टिप्पणियों के ढेर लगा दिए।

जनता कर्फ़्यू का पालन और थाली बजाना भी पड़ा था महँगा

कट्टरपंथियों ने कैफ को जनता कर्फ्यू पर नरेंद्र मोदी की अपील का पालन करता देख भी उलटा-सीधा बोला था। किसी ने उन्हें ताली-थाली बजाने पर कोसा था। तो किसी ने उन्हें अल्लाह से दुआ करने की सलाह दी थी। एक ने तो उन्हें यहाँ तक कहा था, “कैफ भाई, भाभी और आप थाली और बर्तन लेकर रेलवे पर जाओ और नौकरी करो। हिजड़ा की तरह पैसा मिलेंगे बहुत आपको। थाली और ताली बजाते रहो।”

कट्टरपंथियों को नहीं भाया खुद को सुदामा कहना

एक बार तो कैफ द्वारा अपने आप को सुदामा और क्रिकेट के मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को भगवान कृष्ण का दर्जा देने पर भी कट्टरपंथियों ने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई थी। कुछ ने उनके खिलाफ फ़तवा जारी करने की भी बात कही थी।

चीनी एक भी नहीं मरा, ऑक्सीजन देकर 10 भारतीय सैनिक बचाए: थरूर और पूरा कॉन्ग्रेसी-तंत्र फैला रहा यह झूठ

कॉन्ग्रेस का पूरा इकोसिस्टम अब चीन का पक्ष लेकर भारतीय सेना को कमतर दिखाने और बदनाम करने में लग गया है। शनिवार (जून 20, 2020) को ईवा झेंग नामक ट्विटर यूजर ने एक वीडियो शेयर किया, जिसके बारे में बताया गया कि ये गलवान घाटी के उस जगह का है, जहाँ भारत और चीन की सेनाओं के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। झेंग ने दावा किया कि वो चीन से है। मजे की बात तो ये कि चीन में ट्विटर प्रतिबंधित है, इसे ब्लॉक कर के रखा गया है।

उसने दावा किया कि इस संघर्ष में चीन की पीपल लिबरेशन आर्मी के एक भी जवान की मौत नहीं हुई है जबकि मात्र 5 जवान घायल हुए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि इस संघर्ष में घायल 10 भारतीय जवानों को चीनी सेना ने मदद पहुँचाई। ट्वीट के अनुसार, पीएलए पोस्ट के पास चीनी सेना ने घायल भारतीय जवानों को हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी देकर उनकी जान बचाई। हैरत की बात ये है कि इस झूठे ट्वीट को कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने लाइक किया।

शशि थरूर ने झेंग के ट्वीट को किया लाइक

इस ट्वीट के साथ एक संदिग्ध वीडियो भी डाला गया था, जिसमें यूनिफार्म में कुछ जवानों को ऑक्सीजन सप्लाई की जा रही थी। कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम की पत्रकार मानी जाने वाली स्वाति चतुर्वेदी ने भी चीन के समर्थन में इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने ये तक पता लगाने की कोशिश नहीं की कि ये झेंग है कौन और उसके ही आँकड़ों को चीन का आधिकारिक बयान बताते हुए सोशल मीडिया पर फैलाने का काम किया।

स्वाति चतुर्वेदी ने अपने साथी पत्रकार माइकल सैफी के ट्वीट को भी आगे बढ़ाया, जिसमें दावा किया गया था कि झेंग द्वारा ट्वीट किए गए आँकड़े चीन के आधिकरिक आँकड़े हैं। प्रोफेसर अशोक स्वेन ने भी इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने झेंग के हैंडल को ‘चायनीज अकाउंट’ बताते हुए दावा किया कि ये पहली बार है, जब किसी चीनी ने इस तरह से घायलों के आँकड़े सार्वजनिक किए हैं।

स्वाति चतुर्वेदी ने इस प्रपंच को आगे बढ़ाया

बता दें कि स्वेन वही आदमी है, जिसने हाल ही में अमेरिका की तर्ज पर भारत में दंगे भड़काने के इरादे से प्रदर्शन किए जाने की बात कही थी। दरअसल, इस पूरे इकोसिस्टम ने जो घायल भारतीय सैनिकों को चीनियों द्वारा ऑक्सीजन थेरेपी दिए जाने का वीडियो शेयर किया, वो फेक है। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। न सिर्फ़ चीनियों के घायलों का आँकड़ा गलत है बल्कि वीडियो भी फेक है। ऊपर से ये आधिकारिक तो है ही नहीं।

चीन की सरकार के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी स्वीकार किया था कि भारत-चीन की सेनाओं के बीच गलवान में हुए संघर्ष में दोनों तरफ से जानें गई हैं। उसने पिछले 40 साल में इसे भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा संघर्ष करार दिया था। केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने बताया था कि चीन के 43 जवान मौत के घाट उतारे गए। पीएम मोदी ने भी इसकी पुष्टि की थी कि हमारे जवान मारते-मारते वीरगति को प्राप्त हुए।

शेयर किया जा रहा वीडियो फ़रवरी 2017 का है

जहाँ तक ऑक्सीजन वाले वीडियो की बात है, उसे Bilbilli.Com नामक वेबसाइट पर अपलोड किया गया था। ये फ़रवरी 14, 2017 का वीडियो है अर्थात 3 साल से भी ज्यादा पुराना है। ये वीडियो तिब्बती आर्मी पुलिस के लिए स्थापित किए गए गोल्डन ऑक्सीजन चैंबर का है। इस वीडियो का भारतीय सैनिकों से कोई लेनादेना नहीं है। बावजूद इसके शशि थरूर और स्वाति चतुर्वेदी जैसों ने इसे लेकर प्रपंच फैलाया।

भारतीय विदेश मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जून के ही मध्य में चीनी सेना ने वेस्टर्न सेक्टर में घुसपैठ का प्रयास किया था, जिसका उसे जवाब दिया गया। बताया गया है कि 6 जून को दोनों पक्षों के बीच बैठक कर के तनाव कम करने के लिए समझौता भी कर लिया गया था लेकिन चीनी बाज नहीं आए और उन्होंने अवैध रूप से निर्माण कार्य जारी रखा, इस पर भारतीय पक्ष ने आपत्ति जताई और हिंसा व क्षति का कारण भी वही बना।

‘एक ने अंग्रेजों के सामने सिर झुका दिया, दूसरे ने चाइना के सामने’ – झूठ फैलाने पर AAP नेता पर FIR

प्रधानमंत्री मोदी, सुरक्षाबलों और वीर सावरकर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पदाधिकारी अमित मिश्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। यह एफआईआर बीजेपी के प्रवक्ता सुरेश नखुआ की शिकायत पर मुंबई में दर्ज कराई गई।

बता दें कि आम आदमी पार्टी के पदाधिकारी अमित मिश्रा ने 20 जून, 2020 को अपने ट्विटर एकाउंट से एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को चीन के प्रधानमंत्री के सामने सिर झुकाते हुए वाला फोटो (जबकि यह फोटो ही फेक है, फोटोशॉप्ड है) लगाया था। साथ ही उन्होंने वीर सावरकर की फ़ोटो को भी लगाया। यह ट्वीट उन्होंने तब किया जब चीन के साथ हुए हिंसक झड़प में भारत के 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

बीजेपी के प्रवक्ता सुरेश नखुआ ने अपनी शिकायत में कहा कि अमित मिश्रा ने ऐसा ट्वीट कर न सिर्फ पीएम की गरिमा को बदनाम किया है बल्कि उन्होंने वीर सावरकर को मानने वाले लोगों की भावनाओं को भी ठेस पहुँचाया है। प्रधानमंत्री की फ़ोटो को फोटोशॉप करके चीन के प्रधानमंत्री के सामने झुका कर उन्होंने भारतीय सेना का सम्मान करने वाले लोगों के भावनाओं को भी तकलीफ पहुँचाने का काम किया है।

नखुआ ने कहा कि मिश्रा द्वारा पोस्ट किए गए ऐसे ट्वीट के लिए उनके एकाउंट को सस्पेंड किया जाए। और इस पर संज्ञान लेते हुए जल्द से जल्द कार्रवाई हो।

दरअसल इस ट्वीट ने न सिर्फ उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को बदनाम किया बल्कि सैनिकों द्वारा देश की रक्षा में बलिदान हुए सैनिकों का भी अपमान किया है। इस ट्वीट में उन्होंने वीर सावरकर और प्रधानमंत्री के लिए लिखा, “एक ने अंग्रेजों के सामने सर झुका दिया था और दूसरे ने चाइना के सामने…” इस विवादित ट्वीट पर सोशल मीडिया यूज़र्स ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

अमित मिश्रा आम आदमी पार्टी में 2008 से आरटीआई एक्टिविस्ट हैं। और यह उनका कोई पहला विवादित ट्वीट नहीं है। आए दिन वे इस तरह कई विवादित टिप्पणियाँ अपने एकाउंट पर पोस्ट करते रहते हैं।

गौरतलब है कि जहाँ एक तरफ पूरा देश सैनिकों के बलिदान को पर गम और गुस्से में है, वहीं AAP के पदाधिकारी द्वारा इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना हरक़त से उन्होंने सिर्फ़ घटिया राजनीति ही नहीं की बल्कि देश के सम्मान को भी ठेस पहुँचाया है।

‘घायल जवानों के लिए रक्तदान करना पार्टी विरोधी’ – भारत में चीन के एजेंडे को बढ़ाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियाँ

दुनिया भर में कम्युनिस्ट अथवा वामपंथी एक ऐसी प्रजाति है, जो लोकतान्त्रिक देशों में लोकतंत्र ख़त्म होने की बात करते हैं लेकिन जहाँ उन्हें सत्ता मिल जाती है वहाँ वो लोकतंत्र का गला घोंट देते हैं। भारत-चीन तनाव के बीच भारतीय वामपंथियों का भी चेहरा बेनकाब हुआ है, जिन्होंने चीन की निंदा में अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा। इन कम्युनिस्टों ने उलटा अमेरिका और भाजपा को इस विवाद के लिए दोषी ठहरा दिया।

भारतीय कम्युनिस्टों की एक ख़ास बात यह है कि ये अपने धर्म और मातृभूमि के नहीं होते। ये चीन, क्यूबा और उत्तर कोरिया को अपना देश मानते हैं, जहाँ लोकतंत्र नाम की कोई चीज है ही नहीं। ये अपने देश की सेना का सम्मान नहीं करते। ये कम्युनिस्ट समस्याओं के समय अपनी सरकार के साथ खड़े नहीं होते। कुछ ऐसा ही इन्होने इस बार भी किया है। सीपीआई व अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के रुख को देख कर तो ऐसा ही लगता है।

उदाहरण के लिए आइए देखते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के बांग्ला मुखपत्र ने क्या लिखा है। ‘गणशक्ति’ ने अपने पहले ही पन्ने पर भारतीय सेना के बलिदान का मखौल उड़ाते हुए उन्हें ही दोषी ठहराया है। इसके लिए किसी भारतीय नहीं बल्कि चीनी प्रवक्ता का बयान छापा गया है। वही चीन, जिसने सरहद पर हमारे 20 सैनिकों की जान ले ली। चीनी प्रवक्ता के हवाले से दावा किया गया है कि भारतीय सेना ने न सिर्फ़ सीमा सम्बन्धी नियमों का उल्लंघन किया बल्कि गलवान घाटी में भी स्थिति से छेड़छाड़ किया।

यानी, देश की सीमा पर हमारे लिए सुरक्षा करते हुए चीनी सैनिकों की धोखेबाजी भरे हमले में जान गँवाने वाले हमारे ही सैनिकों पर सवाल उठाया जा रहा है और वो भी उनके बयान को आधार बना कर, जिनकी सेना ने ये घिनौना कृत्य किया है। ऐसा काम वामपंथी ही कर सकते हैं। हालाँकि, सीपीआई का कहना है कि वो हमेशा से भारत और चीन, दोनों ही का पक्ष रखता रहा है। लेकिन अभी तक ऐसा दिख तो नहीं रहा है।

इसी ‘गणशक्ति’ में चीनी प्रवक्ता के उस बयान को भी पेश किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका कोई सैनिक हताहत नहीं हुआ है। हालाँकि, केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि 43 चीनी सैनिकों की मौत हुई है। लेकिन, वामपंथी दलों के लिए आधिकारिक वर्जन चीन वाला है, भारत का नहीं। घुसपैठ की चीनियों ने, धोखा देकर हमला किया चीनियों ने लेकिन वामपंथी उन्हीं चीनियों के महिमामंडन में लगे हुए हैं।

सीपीआई लाख सफाई दे कि उसने दोनों पक्षों को दिखाया है, वो पत्रकारिता के नियमों का पालन कर रहा है या फिर वो चीन का एजेंट नहीं है लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि वो प्रो-इंडिया तो नहीं ही हैं। उसे भारत का पक्ष दिखाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जहाँ बात सेना और देश की सुरक्षा की आती है, वहाँ संवेदनशीलता से काम लिया जाता है। ये ठीक उसी तरह है, जैसे कश्मीर का कोई इस्लामी आतंकी संगठन हमेशा पाकिस्तान के लिए काम करता है।

यहाँ सीपीएम व अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार को समझने के लिए 1962 के युद्ध की चर्चा भी ज़रूरी है। उस समय जब युद्ध छिड़ा था और चेयरमैन माओ ने भारत की पीठ में छुरी घोंपते हुए हमला कर दिया था, तब वामपंथियों ने केंद्र सरकार का समर्थन नहीं किया था। नेहरू सरकार की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर लगभग सभी पार्टियाँ उस युद्ध में सरकार के साथ खड़ी थीं लेकिन वामपंथी चीन के समर्थन में थे।

इस दौरान नीचे संलग्न किए गए इस पोस्टर को देखिए, जो वामपंथियों द्वारा 70 के दशक में डिजाइन किया हुआ बताया जाता है। हालाँकि, इसका सीपीआई से आधिकारिक लिंक क्या है ये तो सामने नहीं आया है लेकिन बांग्ला में यही लिखा हुआ है कि चेयरमैन माओ हमारे चेयरमैन हैं। कइयों ने सीताराम येचुरी और प्रकाश करात से इस सम्बन्ध में सवाल पूछे लेकिन वामपंथी नेताओं ने कोई जवाब नहीं दिया।

आप सोचिए, 1962 में चीन भारत को इतना बड़ा घाव देता है और उसके कुछ ही सालों बाद हमारे ही देश के वामपंथी कहते हैं कि भारत पर हमला करने वाले माओ उनके भी चेयरमैन हैं। कम्युनिस्टों ने 16 जून को पूरे भारत में देशव्यापी बंद का आह्वान किया। जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। कहा गया कि मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरोध में ये प्रदर्शन हो रहे हैं। क्या भारत-चीन तनाव के बीच इस तरह की हरकत उन्हें चीन की प्रॉक्सी नहीं बनाती?

हालिया भारत-चीन विवाद को लेकर सीपीएम के बयान को ही देख लीजिए, इसने न तो चीन की आलोचना की है और न ही भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाने वाला एक भी शब्द कहा। उसने उलटा भारत सरकार से ही सवाल दागा कि वो बताए कि सीमा पर क्या हुआ है? उसने दोनों देशों को मिल-बैठ कर मामला सुलझाने की सलाह तो दी लेकिन कहीं भी चीन की अप्रत्यक्ष आलोचना नहीं की। क्या ऐसी पार्टियों को भारत में चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए?

डोकलाम विवाद भी देश अभी तक भूला नहीं है। अगर आप याद कीजिए तो उस समय भी ये वामपंथी पार्टियाँ सरकार के साथ खड़ी नहीं हुई थी। उनका रवैया तब भी देशविरोधी ही था। उसने दावा किया था कि सीमा विवाद के विषय में भूटान 1984 से ही चीन के साथ सीधे बातचीत करता रहा है, इसीलिए अच्छा यही होगा कि भारत अब भूटान को ही बातचीत करने दे और ख़ुद पीछे हट जाए। क्या ये वामपंथी चाहते थे कि भारत पर चीन थोड़ा-थोड़ा कर के कब्जा करते जाए?

साथ ही वामपंथी पार्टियाँ दलाई लामा को भारत द्वारा शरण देने से भी नाराजगी जताती रहती है। सीपीएम ने तब ये भी आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने दलाई लामा को एक केंद्रीय मंत्री के साथ अरुणाचल का दौरा करा कर स्थिति बिगाड़ी है और चीन को गुस्सा दिलाया है। दलाई लामा से जिस तरह से चीन चिढ़ता है, ठीक उसी तरह वामपंथी भी चिढ़ते हैं। लेकिन क्या भारत चीन के आगे झुक कर दलाई लामा को प्रताड़ित करे?

1962 के युद्ध में तो सीपीआई ने देशद्रोह का खुलेआम प्रदर्शन करते हुए यहाँ तक कहा था कि घायल जवानों को रक्तदान करना पार्टी विरोधी गतिविधियों में गिना जाएगा। वीएस अच्युतानंदम तब पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य थे लेकिन उन्हें सिर्फ़ इसीलिए हटा दिया गया था क्योंकि उन्होंने जवानों के लिए रक्तदान करने की योजना बनाई थी। अच्युतानंदम ने भी पार्टी की इमेज बदलने किए लिए ही ऐसी अपील की थी, जो दिखावा ही थी।