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समुदाय विशेष द्वारा हिंदुओं पर भयावह अत्याचार की कहानी: मेवात में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की जुबानी

हरियाणा के मेवात में हिंदुओं पर होते अत्याचारों को रोकने के लिए कल (जून 16, 2020) मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कई घोषणाएँ की। इस बीच उन्होंने सभागार में मौजूद दोनों पक्षों को सुना और पत्रकारों से बात की। उन्होंने आश्वासन दिया कि इलाके में न्यायव्यवस्था कायम करने की हर संभव कोशिश की जाएगी।

उन्होंने बताया कि धर्मांतरण व लव जिहाद को रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाया जाएगा, गोकशी मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाएगा और हिंदुओं की धार्मिक व सार्वजनिक संपत्तियों पर से कब्जा हटाकर उनके लिए बोर्ड बनाया जाएगा। सीएम की इन घोषणाओं के बाद कई हिंदूवादी संगठनों और उन पत्रकारों में संतोष की स्थिति दिखी। जिन्होंने इस मुद्दे को उठाया और मेवात की धरती पर हिंदुओं को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी जी जान लगा दी।

जस्टिस पवन कुमार की 4 सदस्यीय रिपोर्ट से संबंधी प्रेस रिलीज सामने आने के बाद ऑपइंडिया ने मेवात का यह मुद्दा 1 जून को ही उठाया था। हमने जस्टिस पवन कुमार से बात करते हुए अपनी खबर में उन सभी मामलों का उल्लेख किया था। जिसके कारण मेवात को दलितों का कब्रिस्तान बताया गया।

इसके बाद हमने मेवात के हालातों को जानने के लिए कई स्थानीय लोगों से संपर्क किया। इस बीच हमारी बात उन पत्रकारों से भी हुई। जिन्होंने इस मामले के प्रकाश में आने के बाद वहाँ ग्राउंड रिपोर्टिंग की और मेवात की हकीकत अपने चैनलों के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश की। आज इन्हीं पत्रकारों की अनुमति से हम उनके अनुभव आपसे साझा कर रहे हैं।

क्या कहते हैं मेवात में रिपोर्टिंग करने के बाद पत्रकार, क्या है इनका अनुभव?

  • न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा से ऑपइंडिया की बातचीत के अंश

‘कश्मीर में भी अब वो हालात नहीं है, जो सालों से इस समय मेवात के हैं’- ये शब्द उस पत्रकार के हैं जिसने मेवात के गाँव-गाँव में घूमकर दलित हिंदुओं की हकीकत की परतें खोली। हम बात कर रहे हैं न्यूज नेशन के पत्रकार विकास चंद्रा की। 

विकास चंद्रा ने मेवात का मुद्दा प्रकाश में आने के बाद अपनी जान जोखिम में डालते हुए वहाँ रिपोर्टिंग की और पीड़ित परिवार के ऐसे बयान लिए, जिसने सवाल खड़े कर दिए कि क्या मेवात वाकई हिंदुस्तान का हिस्सा है।

बकौल विकास चंद्रा, “मेवात में ऐसी कई जगह हैं जहाँ पर अब हिंदू अपने बच्चों के नाम मुस्लिमों वाले रखते हैं। ताकि अगर वे बाहर अपना नाम बताएँ, तो उनकी जान बच जाए। मेवात के हिंदू अपने यहाँ शादियो में गाने नहीं बजा पाते, क्योंकि मुस्लिम बहुल आबादी के लोग आकर सारा सामान तोड़कर चले जाते हैं। वहाँ पर लड़कियों का अपहरण होना। बारातियों को मारा जाना – ये सब बहुत आम बातें हैं।”

विकास कहते हैं मेवात में अधिकांश हिंदू लड़कियाँ पाँचवीं या छठी क्लास के बाद स्कूल नहीं जाती हैं। क्योंकि लोगों को डर होता है कि कहीं उनकी बच्चियों को उठा न लिया जाए। वहाँ धर्मपरिवर्तन के लिए तरह-तरह के हथकंडे आजमाए जा रहे हैं। जैसे-डराना, धमकाना, मारना- पीटना, जमीन-घर-श्मशान पर कब्जा कर लेना आदि।

विकास के अनुसार, मेवात से हिंदुओं को भगाने के लिए वहाँ पर श्मशान पर कब्जा कर लिया जाता है, जब हिंदू अपने शमशानों में शवों को ही नहीं जला पाएगा, तो या तो इस्लाम अपनाएगा या फिर मेवात छोड़कर भाग जाएगा। इसके अलावा वहाँ मुस्लिम बहुल आबादी के लोग हिंदुओं को भगाने के लिए या फिर उन्हें इस्लाम कबूल करवाने के लिए लड़कियों से बदसलूकी भी करते हैं।

विकास बताते हैं कि उनकी अपनी पड़ताल बताती है करीब 110 गाँव हिंदू विहीन हो चुके हैं। जिन गाँवों को लेकर पहले कहा जा रहा था कि वहाँ पर हिंदू हैं, वहाँ भी जब हम गए, तब कोई हिंदू घर नहींं था। पुलिस की यदि बात करें, तो वहाँ पुलिस प्रशासन भी संतोषजनक कार्रवाई करने में असफल रहता है।

वे मेवात पर अपने अनुभवों को हमसे साझा करते हुए कहते हैं कि हम रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर गए। लेकिन वहाँ रिपोर्टिंग करना आसान काम नहीं है। मुस्लिम बहुल आबादी के लोग मारने-काटने पर उतारू हो जाते हैं। कई बार कई जगहों से हमें भागना पड़ा, तो कहीं-कहीं तो लॉकडाउन या फिर खेती पर अपनी रिपोर्टिंग करनी पड़ी। ताकि वह भ्रमित हो जाएँ। मेवात घूमते हुए आपको हर कोने में मस्जिद मिलेगा, मदरसा मिलेगा, मरकज मिलेगा। जहाँ जगह खाली होगी वहाँ इनके निर्माण का काम जारी होगा।

विकास कहते हैं कि भले ही बिजनेस क्लास को लेकर मेवात में हिंदुओं की संख्या 11 प्रतिशत बताया जाता है। लेकिन किसी गाँव का यदि औसत निकालें तो मालूम चलेगा कि 98% समुदाय विशेष के लोग हैं। विकास, खुद को पुन्हाना में हुई लूटपाट की एक घटना का प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं और कहते हैं कि उनकी आँखों के सामने एक व्यक्ति की दुकान को लूट लिया गया। व्यक्ति की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि उसने अपने दुकान के सामने एक युवक को पेशाब करने से मना कर दिया। जिसपर उस युवक ने दुकानदार को जवाब दिया कि ये क्या कम है कि तुम काफिरों पर या तुम्हारे शरीर पर नहीं कर रहे केवल दुकान के सामने कर रहे हैं।

मेवात के हालातों को समझाने के लिए विकास कहते हैं कि वहाँ हिंदुओं की हालत बिलकुल वैसी है, जेैसे 32 दांतों के बीच में जीभ। विकास, मेवात में रिपोर्टिंग करने के दौरान सबसे ज्यादा दुखी शासन प्रशासन के रवैये को देखकर होते हैं। अपनी निराशा व्यक्त करते हुए वे कहते हैं कि वहाँ वाकई में अपराधियों पर उपयुक्त कार्रवाई नहीं होती। वहाँ हत्या के मामलों को भी आत्महत्या में बदल दिया जाता है।

विकास के अनुसार, मेवात में 1992 से पहले वाकई हिंद-मुस्लिम मिलकर रहा करते थे। लेकिन बाद में तबलीगी और देवबंदियों ने वहाँ लोगों का माइंड वॉश करना शुरू किया। पहले वहाँ मुस्लिम भी हिंदुओं के रीति-रिवाजों को मानते थे। उनके त्यौहारों को मनाते थे। कोई मांस बेचने आता था, तो मना कर देते थे कि यहाँ हिंंदू भी रहते हैं। लेकिन 1992 के बाद सब बदलता गया। वहाँ मुस्लिमों के दिमाग के भरा जाने लगा कि तुम मुस्लिमों की तरह दिखो, उनकी तरह रहो, उनकी तरह बोलो, उनकी तरह खाओ। न्यूज नेशन पत्रकार दो टूक कहते हैं, “आज मुझे नहीं लगता, जितने कट्टर मेवात के मुस्लिम है, उतने कट्टर दुनिया में कोई और जगह के मुस्लिम होंगे।”

  • पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज- दिनेश देशवाल

ऑपइंडिया से बात करते हुए पंजाब केसरी अंबाला एडिशन के जिला इंचार्ज दिनेश देशवाल भी 1992 वाले एंगल का जिक्र करते हैं और बतौर स्थानीय व एक मीडियाकर्मी हमसे मेवात के हालात साझा करते हैं।

वे 1992 और 2020 की वोटर लिस्ट का हवाला देते हुए बताते हैं कि उन्होंने मेवात में कुछ हिंदू बहुल गाँवों को यदि छोड़ दिया जाए, तो जितने भी मुस्लिम बहुल गाँव हैं, वहाँ हर जगह हिंदुओं की संख्या घटी है। मेवात के एक हिंदू बहुल गाँव आलदो में रहने वाले दिनेश कहते हैं कि उन्होंने मेवात में रहते हुए अपने आसपास के गाँवों में ऐसी कई घटनाएँ देखी हैं और उन्होंने कई रिपोर्ट कवर भी की हैं। हालिया किसी घटना के बारे में पूछने पर दिनेश बताते हैं कि अभी हाल में एक पीड़िता परिवार ने यहाँ पर एक मीडिया चैनल को अपना बयान दे दिया था। जिसके बाद उनसे मारपीट की गई। यहाँ बता दें, ऑपइंडिया ने इस घटना की जानकारी मिलते ही पीड़ित परिवार से संपर्क करने की कोशिश की थी। मगर, जो नंबर हमें पीड़ित परिवार के नाम से मिला, वह गाँव के किसी और व्यक्ति ने उठाया। जिसके बाद हमने परिवार की सुरक्षा लिहाज से आगे उनसे पूछताछ नहीं की।

मेवात के युवा समाजसेवी पेज पर साझा पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)

दिनेश दावा करते हैं कि उन्होंने स्वंय वोटर लिस्ट की छँटनी की है और अपनी सभी बाते वे सरकारी दस्तावेजों के आधार पर बता रहे हैं। उदहारण के तौर पर समझाने के लिए वे कहते हैं कि मान लीजिए अगर 1992 में मुस्लिम बहुल आबादी वाले किसी गाँव में हिंदुओं की 20 वोट थी तो अब 2020 में वह 8-10-12 ही बचे हैं। इसी प्रकार मुस्लिमों की वोटर लिस्ट देखें, तो वह 1992 में अगर 300 थे, तो आज ये संख्या 2020 तक 1000 या उसके पार पहुँच गई है। इसका मतलब तो यही है न कि इस बीच में मुस्लिमों की वोट अगर बहुत बड़ी संख्या में बढ़ी है, तो हिंदुओं की संख्या बहुत बढ़ी संख्या में घटी है।

दिनेश देशवाल द्वारा साझा की गई मेवात में एक वकील की हत्या की खबर

मेवात में पलायन के बारे में बताते हुए दिनेश कहते हैं कि 1992 में जब बाबरी विध्वंस हुआ, तो उसका असर यहाँ भी दिखा। उस समय तक हिंदू बाजार ज्यादा होते थे। लेकिन, 1992 की इस घटना के बाद मुस्लिमों ने हिंदुओं के बाजारों का बहिष्कार कर दिया था। इसके बाद जब भी कोई भी घटना होती है, जिसमें हिंदू विरोध करते हैं, तो यह लोग हिंदुओं के दुकानों से सामान लेने से मना कर देते हैं। जिसके कारण हिंदू पलायन करने को मजबूर हो गए।

मेवात में हिंदू बाजारों का बहिष्कार करने के लिए डाला गया पोस्ट (साभार: दिनेश देशवाल)

बाकायदा ‘बाजार जिहाद’ शब्द का जिक्र करते हुए दिनेश कहते हैं, आज ये लोग बड़े स्तर पर अपने बाजारों का विस्तार कर रहे हैं और हिंदुओं के बाजार का बहिष्कार कर रहे हैं। ऐसे में मानिए कि उन्होंने (मुस्लिमों ने) हमसे मारपीट नहीं भी की, हमारी बहन-बेटियों से बदसलूकी नहीं भी की… लेकिन जब कोई हमारे बिजनेस को ही प्रभावित कर देगा, उसका बहिष्कार कर देगा, तो इसका सीधा असर हम पर ही तो पड़ेगा। जाहिर है फिर हम यहाँ से निकलने का प्रयास करेंगे।

विकास चंद्रा की भाँति मेवात के स्थानीय व पंजाब केसरी के पत्रकार दिनेश देशवाल का भी यही मानना है कि मेवात में पहले हिन्दुओं की स्थिति ठीक-ठाक थी। लेकिन जमातियों के आने के बाद इनमें कट्टरपन आ गया और हालात ऐसे होते गए। गौतस्करी पर बोलते हुए वह बताते हैं कि कुछ दिन पहले जमाल गढ़ गाँव से 2572 गाय की खालें बरामद हुई थी।

  • सुदर्शन के पत्रकार गौरव मिश्रा से ऑपइंडिया की बातचीत

गौरव मिश्रा ने मेवात का मामला उठने के बाद वहाँ लगातार कई दिन ग्राउंड रिपोर्टिंग की। उन्होंने बताया कि वह 3 गाँवों में गए। उन्होंने वहाँ ऐसे घरों को देखा, जिनकी स्थिति एक समय में बहुत अच्छी रही होगी, घर बड़ा रहा होगा। लेकिन, उन घरों को लोगों ने वहाँ छोड़ दिया। जब गौरव ने इस संबंध में आसपास के लोगों से पूछा तो लगभग सबने एक जैसा जवाब बताया। जैसे- वहाँ अधिकांश हिंदू मानते थे कि अगर उनकी लड़की बड़ी हो गई। जवान हो गई है। तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है।

गौरव कहते हैं कि मुस्लिम बहुल आबादी का इतना दबाव है कि कोई घटना घटने पर और कार्रवाई न होता देख भी लोगों ने गाँवों से पलायन किया है। वहाँ हिंदू परिवार या तो लड़कियाँ को छठी-सातवीं तक पढ़वाते हैं या फिर अगर स्थिति अच्छी है तो वह उसे हिम्मत करके 10वीं करवा देते हैं, लेकिन इससे आगे पढ़ाई नहीं करने देते।

लड़कियों को ज्यादा न पढ़ाने के पीछे का कारण बताते हुए गौरव कहते हैं कि वहाँ पर अधिकाँश शैक्षणिक संस्थान मुस्लिम बहुल इलाकों में हैं। ऐसे में जब लड़कियाँ वहाँ जाती हैं, तो मुस्लिम लड़के उन्हें छेड़ते हैं, उनपर फब्तियाँ कसते हैं।

इसके अलावा एक लड़की के साथ साक्षात्कार का हवाला देते हुए गौरव ने कहा कि उन्हें लड़की ने इंटरव्यू देते हुए बताया कि जब वह कॉलेज जाती हैं, तो मुस्लिम युवक ट्रैक करते हैं। जिसके कारण उन्हें पिता या भाई को बुलाने की जरूरत पड़ती है।

कई बार ऐसे मामले भी आते हैं कि मुस्लिम लड़कियाँ ही हिंदू लड़कियों के साथ मिलकर अपने मजहब और मुस्लिम लड़कों की बहुत तारीफ करती हैं। जिससे लव जिहाद की शुरुआत होती है। इसके बाद ऐसे लड़कों से भी मिलवाया जाता है जो कलावा पहनकर आते हैं या फिर माथे पर टीका लगाकर आते हैं, ताकि लड़कियाँ उनपर मोहित हों।

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मेवात के मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू लड़कों की शादी के मुद्दे पर गौरव कहते हैं कि कई लोग इस बारे में वहाँ स्पष्ट नहीं बोलते। 100 में से 3-4 परिवार होंगे, जो बताते हैं कि यहाँ रहने के कारण बाहर के लोग उन्हें लड़की देने से मना कर देते हैं। उनका मानना है कि उनकी बेटी वहाँ सुरक्षित नहीं रहेगी।

मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पानी की समस्या पर भी गौरव हमसे बात करते हैं। वे कहते हैं कि एक गाँव है शहरी जिसे ‘शिरी’ भी कहा जाता है। बकौल गौरव, “इस गाँव में अधिकांश पानी के कनेक्शन मुस्लिम लोगों के पास हैं। इस गाँव में लगभग 50 घर हिंदुओं के बचे है, जिनमें साफ पानी नहीं आता। इस मामले में मैंने उस गाँव की एक बुजुर्ग महिला से बात की। जिन्होंने बताया कि जब वह लोग 1 km पानी लेने जाती हैं, तो उन्हें ‘कंजरी’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। इसलिए वे वहाँ बहु-बेटियों को नहीं भेजतीं। खुद ही पानी लेने चली जाती हैं।”

गौरव के मुताबिक, कोरोना के समय में घर से निकलकर उन्हें गाँव में कुछ भी खाने को नसीब नहीं होता था। घर से ले गए चनों को चबाते-चबाते वह भरी दोपहरी में रिपोर्ट करते और उसके बाद भी वहाँ जल्दी कोई बात करने को तैयार नहीं होता। क्यूँकि जो लोग बात करते हैं उन्हें बाद में धमकियाँ मिल जाती हैं। वे कहते हैं कि जिन लोगों ने उनसे बात की उन्होंने मुँह पर कपड़ा बाँधा, या फिर कैमरे की ओर पीठ करके जवाब दिए।

बता दें, सीएम मनोहर लाल खट्टर के साथ हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में गौरव ने हिस्सा लिया था। उन्होंने बताया कि दोनों पक्षों के साथ हुई इस बैठक में कई लोगों ने गंगा-जमुनी तहजीब को बचाने का हवाला देकर कई बातें कहीं। मगर, सीएम को ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाए। सीएम ने कई अहम फैसले लिए। जिन्हें अगर लागू किया गया तो मेवात में निश्चित ही स्थिति में सुधार आएगा।

गौरव कहते हैं कि रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें कई मुसीबतें आईं। उनकी गाड़ी की वीडियो बनाई गई। उनसे आ आकर पूछा गया कि कौन से रास्ते से जाओगे। हिम्मत है तो उस रास्ते से जाकर दिखाना। तुमने मुद्दा दिखाकर अच्छा नहीं किया- जैसी कई धमकी भरी बातें बोलीं गई। इस संबंध में तो गौरव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक ट्वीट भी किया था।

इतना ही नहीं, कॉन्फ्रेंस के दौरान सवाल उठाने पर कई अन्य रिपोर्टरों ने उनका विरोध किया। जिसके कारण उन्हें उस समय बाहर कर दिया गया। लेकिन सीएम खट्टर ने बाद में उनसे ऑफ कैमरा बातें कीं, जहाँ उन्होंने मामले की जमीनी हकीकत दिखाने पर चैनल की तारीफ की और नाराजगी जताते हुए यह भी पूछा कि सुदर्शन न्यूज ने उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास क्यों नहीं किया?

ऑपइंडिया का मेवात पर प्रयास

यहाँ बता दें ऑपइंडिया भी मेवात के इस मामले पर लगातार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष, हरियाणा महिला आयोग अध्यक्ष और हरियाणा सीएम ऑफिस की प्रतिक्रिया जानने के लिए उनसे कई बार संपर्क करने का प्रयास कर रहा था। लेकिन संपर्क न हो पाने के कारण कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। इस बीच हमने स्थानीयों लोगों से बात की और इन पत्रकारों से भी उनके अनुभव जाने। ताकि हर पक्ष साफ हो सके।

आज भले ही कुछ तथाकथित सेकुलरिज्म का झंडा लेकर चलने वाले मेवात पर हुई इस रिपोर्टिंग को, इन पत्रकारों के अनुभवों को या हिंदूवादी संगठनों की माँग को एकतरफा करार दे दें। लेकिन उन प्रमाणों को, वीडियोज को, उन बयानों को, पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता वाली जाँच रिपोर्ट को, अनेकों खबरों को झुठलाया नहीं जाया सकता। जो मेवात की स्थिति पर वाकई ये सवाल खड़ा करते हैं कि क्या आज का मेवात पाकिस्तान जैसा है या इसकी स्थिति वाकई सन 90 के कश्मीर से भी बुरी है, जहाँ इसी तरह कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करके उन्हें घाटी से बाहर कर दिया गया था। आज मेवात में दलितों को आए दिन जिस तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है वो और भी गंभीर स्थितियों की तरफ स्पष्ट इशारा है।

हालाँकि, अब तसल्ली की बात बस यही है कि ये मामला लोगों के संज्ञान में आया है। कई संगठन इसपर लगातार नजर बनाए हुए हैं। मेवात के हिंदुओं को सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं मंगलवार को स्वयं मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस मामले के मद्देनजर बकायदा बैठक करके कड़े फैसले लिए हैं। हिंदुओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें इंसाफ मिलेगा। पानी से लेकर जमीन तक पर उन्हें उनका अधिकार दिलाया जाएगा।

आज सीएम की इन घोषणाओं को हम हिंदू समाज के प्रति जागरुक और इस मुद्दे को प्रकाश में लाने वालों की जीत के रूप में स्पष्ट तौर देख सकते हैं। साथ ही निष्पक्ष पत्रकारिता का दावे करने वाले उन मीडिया चैनलों की मंशा भी समझ सकते हैं। जिन्होंने चहुँओर मामले की चर्चा होने के बाद भी न इस मामले को प्राथमिकता दी और न इसपर कवरेज करना जरूरी समझा।

भारत-नेपाल तनाव के बीच सामने आया चीन कनेक्शन, सीमा पर भारत ने बढ़ाई सुरक्षा, तेज हुई पैट्रोलिंग

लद्दाख की गलवान घाटी में भारत-चीन सेना के बीच हुई आपसी झड़प के बाद नेपाल से सटी भारत की सोनौली सीमा पर सतर्कता बढ़ाते हुए SSB व पुलिस ने गश्त तेज कर दी है। सीमा के आसपास कड़ी नजर रखी जा रही है। सरहद की तरफ जाने वाले पगडंडी मार्गों पर जवान लगातार पैट्रोलिंग कर रहे हैं। इस बीच भारत-नेपाल की खुली सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर है।

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, एसपी रोहित सिंह सजवान ने बताया कि बॉर्डर की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियाँ भी लगी हुई हैं। नेपाल व भारत में आवाजाही के लिए सोनौली व ठूठीबारी बॉर्डर का इस्तेमाल किया जाता है। लॉकडाउन के कारण से इसको सील कर दिया गया है। शर्तों के साथ सोनौली बॉर्डर से एंट्री मिल रही है। खुली सीमा पर भारत की तरफ से SSB की तैनाती की गई है। संवेदनशील जगहों पर CCTV कैमरे भी लगाए गए हैं। उधर, बिहार के सीतामढ़ी में नेपाल पुलिस की ओर से फायरिंग व नक्शा विवाद को लेकर बॉर्डर पर अलर्ट जारी किया गया है।

कहाँ से शुरू हुआ भारत-नेपाल के बीच तनाव

दरअसल, अभी हाल में भारत ने लिपुलेख से धारचूला तक सड़क बनाई थी। जिसका उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया। इसके बाद ही नेपाल की सरकार ने विरोध जताते हुए 18 मई को नया नक्शा जारी किया था। भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी।

पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने नेपाली संसद में घोषणा की कि भारत के कब्जे वाले कालापानी क्षेत्र (पिथौरागढ़ जिला) पर नेपाल का ‘निर्विवाद रूप से’ हक है। इसलिए इस क्षेत्र को पाने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाने जा रही है। 

ओली की कैबिनेट ने नेपाल का एक नया राजनीतिक मानचित्र पेश किया है, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को नेपाल के क्षेत्र के रूप में दिखाया गया। हालाँकि, इस खबर की सूचना पाते ही भारत ने इसका विरोध किया। लेकिन 13 जून को नक्शे में बदलाव से जुड़ा बिल शनिवार को पास कर दिया गया।  वहाँ की संसद में इसके सपोर्ट में 258 वोट पड़े।

इसके बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ”हमने गौर किया है कि नेपाल की प्रतिनिधि सभा ने नक्शे में बदलाव के लिए संशोधन विधेयक पारित किया है ताकि वे कुछ भारतीय क्षेत्रों को अपने देश में दिखा सकें। हालाँकि, हमने इस बारे में पहले ही स्थिति स्पष्ट कर दी है। यह ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। ऐसे में उनका दावा जायज नहीं है। यह सीमा विवाद पर होने वाली बातचीत के हमारे मौजूदा समझौते का उल्लंघन भी है।”

लॉकडाउन में नेपाल पर बनी चौकियोंं पर नजर आई चीनी भाषा

लॉकडाउन में बॉर्डर पर नेपाल की ओर से अस्थाई चौकियाँ बनाने का मामला सामने आया था। इसके बाद पता चला कि बरगदवा सहित बॉर्डर की कई नेपाली चौकियों पर लगे टेंट पर चीनी भाषा का इस्तेमाल किया गया। जब मामले ने तूल पकड़ा तो एसएसबी ने छानबीन शुरू की, लेकिन तब कोई बड़ा मामला निकलकर सामने नहीं आया।

मगर, अब खुलासा हुआ है कि भारत से लगने वाली नेपाल की सीमा में हाल के फेरबदल के पीछे चीन का संबंध सामने आया है। दरअसल, खुफिया एजेंसियों को पता चला है कि नेपाल में चीन की युवा राजदूत होऊ यांगी ने इसमें अहम भूमिका निभाई और भारत के खिलाफ बड़ा कदम उठाने के लिए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को तैयार किया। इसी के बाद ओली ने ऐसी रूपरेखा तैयार की और राष्ट्रीय मानचित्र के विस्तार के इस प्रस्ताव पर विपक्षी नेपाली कॉन्ग्रेस भी सरकार के साथ आ गई। यहाँ बता दें ओली अपने पहले कार्यकाल में भी और मौजूदा कार्यकाल में भी चीन के साथ नए समीकरण बनाने की कोशिश कर चुके हैं।

वहीं, यांगी पहले पाकिस्तान में 3 साल काम कर चुकी हैं। वहाँ पर उनके काम को देखते हुए उन्हें नेपाल में स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका दिया गया। इसके बाद वह ओली के आवास पर भी धड़ल्ले से आने जाने लगी। बस इसी बात का संकेत मिलने के बाद ही थल सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने चीन का नाम लिए बगैर नेपाल के कदम को किसी की शह पर उठाया गया बताया था। साथ ही नेपाल के कदम पर हैरानी जताई थी कि चीन के प्रभाव में आकर ओली ने बिना सोचे समझे अप्रत्याशित काम कर डाला।

नेपाली नेताओं की क्या है प्रतिक्रिया?

हालाँकि, पीएम ओली द्वारा नक्शा लाए जाने के बाद नेपाल में कई जगह इस मैप का उत्साह मनाया जा रहा है। मगर, कुछ लोग ऐसे भी है, जो इससे बेहद नाराज हैं। दरअसल, नेपाल के विधायकों और कुछ नेताओं ने नेपाल के हालिया कदम पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। इन नेताओं ने कहा है कि नेपाल का नक्‍शा दोनो देशों की रिश्‍तों की डोर कमजोर कर रहा है।

नेपाल के मर्चवार क्षेत्र से कॉन्ग्रेसी विधायक अष्टभुजा पाठक, भैरहवां के विधायक संतोष पांडेय व राष्ट्रीय जनता समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता महेंद्र यादव ने कहा कि नेपाल की संसद ने नक्शे में बदलाव के लिए पहाड़ पर खींची जिस नई लकीर पर मुहर लगाई है, वह देश के मैदानी इलाकों में दरार का कारण बन रही है।

भारत से रोटी-बेटी का रिश्ता रखने वाले नवलपरासी, रूपनदेही समेत 22 जिलों के लगभग एक करोड़ मधेशी नागरिक इस नए नक्शे को स्वीकार नहीं कर पा रहे। लिपुलेख, कालापानी व लिंपियाधुरा के मुद्दे पर उपजे तनाव का असर भारत-नेपाल की 1751 km लंबी सरहद पर भी नजर आ रहा है, जहाँ मधेशी लोगों में किसी अनहोनी को लेकर संशय है।

रूपनदेही जिले में एक कार्यक्रम में इन नेताओं ने कहा कि भारत-नेपाल धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर जुड़े हैं। दोनों देशों की जनता में कटुता के लिए कोई जगह नहीं है। संसद के निचले सदन, प्रतिनिधि सभा में विवादित नक्शे को लेकर पेश संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी मिलने से तराई के सीमा के निकट रहने वाले लोग संशय में हैं।

मधेशी समुदाय

नेपाल की संसद में मधेशी समुदाय के 33 जनप्रतिनिधियों की सहभागिता होने के बाद भी यह समुदाय नेपाल में उपेक्षित है। इसके लेकर इन्होंने कई बार आंदोलन भी किए, सड़कों पर भी आए। लेकिन भी नेपाल के संविधान में मधेशी समुदाय को नेपाल के लोकतंत्र में जगह नहीं मिल पाई।

बता दें, इन सबका एक कारण यह भी बताया जाता है कि नेपाल के नवलपरासी, रूपनदेही, कपिलवस्तु, झापा, मोरंग, सुनसरी, सप्तसरी, धनुषा, भोजपुर समेत तराई के 22 जिलों में रहने वाले मधेशियों की बोली-भाषा, खान-पान, रहन-सहन पहाड़ी नेपालियों से अलग है। इसी कारण इन्हें वहाँ उपेक्षा झेलनी पड़ती है। इनके जनप्रतिनिधियों का कहना है कि नेपाल में भारत के खिलाफ मुहिम चला कर चुनाव जीतना अब यहाँ की परंपरा बन चुकी है।

सितंबर 1957 से अक्टूबर 1962 तक PM नेहरू की विदेश नीति… और चीन के कब्जे में चला गया 37544 वर्ग km

चीन ने सितम्बर 1957 में शिजियांग से तिब्बत के गरटोक तक एक हाईवे का निर्माण कार्य समाप्त किया था। यह क्षेत्र अक्साई चिन के पठार यानी भारत के लद्दाख का सीमावर्ती हिस्सा है। इस सड़क निर्माण का एकमात्र उद्देश्य चीनी वामपंथी सरकार की विस्तारवादी नीतियों को बढ़ावा देने के लिए था। इसी के साथ जल्दी ही 28 जुलाई, 1959 को उत्तरी पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना ने घुसपैठ भी शुरू कर दी।

संभवतः यह भारत-चीन युद्ध की पहली एक आहट थी, जिसे तत्कालीन भारत सरकार ने समझने में चूक कर दी। एक महीने बाद ही 25-26 अगस्त को लोंग्जू में चीनी सेना दूसरी बार घुसपैठ कर चुकी थी। इस बार दोनों देशों की सेनाओं के बीच गोलीबारी की भी ख़बरें सामने आई थी।

इसी साल 20 अक्टूबर को चीन ने लद्दाख में फिर से घुसपैठ कर तीन भारतीय जवानों को बंधक बना लिया। इस दिन भारत और चीन की सेनाओं के बीच दूसरी बार गोलीबारी हुई, जिसमें कुछ भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान दिया। हालाँकि, इस मुठभेड़ में पहली बार चीन के कई सैनिक भी मारे गए थे।

इस मुठभेड़ के बाद 14 नवंबर, 1959 को हमारे सैनिकों को चीन के कब्जे से छुड़ाने के लिए दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच एक समझौता वार्ता बुलाई गई। परिणामस्वरूप 10 भारतीय जवानों को चीन सरकार ने वापस भारत को सौंप दिया।

इसी दौरान 1 सितम्बर, 1959 को द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भारतीय सीमा के साथ चीन का एक नक्शा प्रकाशित किया। जिसमें अखबार ने चीन की विस्तारवादी नीति का उल्लेख करते हुए बताया कि वह कुल 57,000 वर्ग किलोमीटर के विदेशी भूभाग पर कब्ज़ा करना चाहता है – जिसमें भारत के असम – 17,000 वर्ग किलोमीटर और कश्मीर – 22,000 वर्ग किलोमीटर हिस्सा शामिल था।

अगले साल अप्रैल 1960 में चीन के प्रधानमंत्री झ़ोउ एनलाई की पांच दिवसीय भारत यात्रा प्रस्तावित थी। इसे ध्यान में रखते हुए भारत के मुख्य विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नेहरू को भारतीय पक्ष के संदर्भ में ठोस कदम उठाने की नसीहत दी। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच सीमा विवाद के समाधान के लिए कई बैठकें हुई लेकिन दुर्भाग्य से बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी।

हालाँकि, इन बैठकों में दोनों प्रधानमंत्री राजनायिक तौर पर सीमा विवाद को सुलझाने के लिए तैयार हो गए थे। इस प्रकार अधिकारी स्तर पर कुल तीन बैठकें हुईं – जिसमें आखिरी बैठक 7-12 दिसंबर, 1960 को हुई। जिसके बाद दोनों देशों के अधिकारियों ने सीमा पर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट बनाकर अपने-अपने देश की सरकारों को सौंप दिया।

इन रिपोर्ट्स को 14 फरवरी, 1961 को प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद के समक्ष पेश किया। दरअसल, प्रधानमंत्री ने दो रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी थी – इसमें एक भारतीय अधिकारियों की तरफ से तैयार की गई, और दूसरी चीन के अधिकारियों की रिपोर्ट शामिल थी। चीन की वास्तविक रिपोर्ट उनकी मन्दारिन भाषा में थी। इसे चीन की सरकार ने अंग्रेजी में अनुवादित कर भारत को सौंपा था लेकिन ऊपर ‘अनाधिकारिक’ लिख दिया था।

जब प्रधानमंत्री नेहरू ने चीन सरकार से इस बात का स्पष्टीकरण माँगा और बताया कि उन्हें परंपरा के अनुसार इस रिपोर्ट को संसद के समक्ष पेश करना है तो इस पर चीन की तरफ से जवाब आया कि अंग्रेजी की रिपोर्ट ‘अनाधिकारिक’ ही रहेगी क्योंकि उसमें कुछ गलतियाँ हो सकती हैं। चूँकि चाइनीज भाषा किसी संसद सदस्य को आती नहीं थी इसलिए मात्र इसी कारण से रिपोर्ट पर संसद में चर्चा नहीं हो सकी। (लोकसभा – 14 फरवरी, 1961)

यह भारत के प्रधानमंत्री नेहरू की विदेश नीति थी, जिसमें भाषाई कमियों को दूर करने का भी कोई समाधान नहीं था। अगर उस दिन संसद में रिपोर्ट पर चर्चा हो जाती तो संभवतः चीन की सोच का आकलन किया जा सकता था। अतः भारत की सीमा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक सामरिक रणनीति बनाई जा सकती थी। शायद एक साल बाद होने वाले भारत-चीन युद्ध में भी भारत को कोई लाभ मिल जाता।

एकतरफ प्रधानमंत्री की वार्ता निष्फल रही तो दूसरी तरफ उनके लिए महत्वपूर्ण सामरिक रिपोर्ट्स कोई मायने तक नहीं रखती थी। इस तरह वे भारत-चीन सीमा विवाद को सुलझाने की बनावटी कवायदों में लगे हुए थे।

साल 1959 से लेकर 1961 तक भारत-चीन सीमा विवाद अपने चरम पर था। जब धीरे-धीरे मौके हाथ से फिसल रहे थे, तो प्रधानमंत्री के साथ उनके करीबी और खास समझे जाने वाले रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन पर भी सवाल उठने लगे। उस दौरान अधिकतर नेताओं और सेना अधिकारियों का मानना था कि भारत-चीन के बीच पैदा हो रहे गतिरोधों में कृष्णा मेनन की भूमिका संदिग्ध है। इसलिए उन्हें मंत्रिपद से हटाने के भरसक प्रयास किए गए।

इस क्रम में सबसे बड़ा कदम जनरल थिमैय्या ने उठाया – उन्होंने 31 मई, 1959 को मेनन के विरोध में प्रधानमंत्री नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालाँकि, प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया लेकिन मेनन को भी नहीं हटाया।

प्रधानमंत्री नेहरू के इस ‘मेनन प्रेम’ का नुकसान हमारी विदेश नीति के साथ-साथ भारतीय सेना को उठाना पड़ रहा था। इसका विरोध कॉन्ग्रेस के नेताओं सहित प्रमुख विपक्षी दलों के नेता भी कर रहे थे। इसमें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता आचार्य कृपलानी और भारतीय जनसंघ के महामंत्री दीनदयाल उपाध्याय जैसे नाम शामिल थे।

उधर, कॉन्ग्रेस की कार्यसमिति के सदस्य मोरारजी देसाई और तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नीलम संजीवा रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री से भारत-चीन सीमा विवाद को जल्दी सुलझाने के लिए अपील की थी। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यूएन ढेबर का भी यही मत था। साथ ही उन्होंने इस पूरी समस्या का दोष भारत के कम्युनिस्टों पर मढ़ते हुए बताया था कि वे लोग भारत को चीन के साथ युद्ध की ओर धकेल रहे हैं। (द हिंदुस्तान टाइम्स – 29 अप्रैल, 1959)

आखिरकार, सितम्बर 1962 में प्रधानमंत्री नेहरू को जानकारी मिली कि लद्दाख की गलवान नदी तक के इलाके तक चीनी सेना अवैध कब्जा जमा चुकी है। एक महीने बाद दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के सामने थीं। लगभग एक महीने चले इस युद्ध में चीन ने गलवान नदी तक अपनी स्थिति को बरकरार रखा। प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इस इलाके को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

इस कथित विदेश नीति के तहत जम्मू-कश्मीर का 37,544 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा चीन के कब्जे में चला गया। साल 1963 में पाकिस्तान ने 5,180 वर्ग किलोमीटर का इलाका भी गैर-कानूनी रूप से चीन को दे दिया। इस तरह अक्साई चिन, मनसार और शाक्सगाम घाटी का कुल 42,735 वर्ग किलोमीटर का भूभाग चीन अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (सीओजेके) कहलाता है।

एक बार सरदार पटेल ने भी चीन से उभरते खतरे की तरफ प्रधानमंत्री नेहरू का ध्यान दिलाने की कोशिश की थी। उन्होंने 7 नवंबर, 1950 को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर कहा, “चीन सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों के बल पर हमें बहकाने की कोशिश की है… हालाँकि हम खुद को चीन का मित्र मानते हैं, चीनी हमें अपना मित्र नहीं मानते।”

सरदार पटेल चीन के संबंध में भारत की विदेश नीति को ठोस और सुरक्षित रखना चाहते थे। हालाँकि, प्रधानमंत्री नेहरू हमेशा उचित सलाह नजरंदाज कर दिया करते थे और इसी बात का खामियाजा आज तक भारत को भुगतना पड़ रहा है।

कॉन्ग्रेस की बैठक छोड़ इन ‘खास’ विधायकों ने किया बीजेपी दफ्तर में डिनर: MP राज्यसभा चुनाव में तेज हुई सियासी हलचल

मध्यप्रदेश में तीन राज्यसभा सीटों के लिए 19 जून को चुनाव होने वाले हैं। इस बीच प्रदेश में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। खबर है कि सपा, बसपा, समेत निर्दलीय विधायकों का झुकाव भाजपा की ओर है। बुधवार (जून 17, 2020) को तो यह खास विधायक कॉन्ग्रेस पार्टी की अहम बैठक छोड़कर भाजपा कार्यालय में हुए डिनर तक में नजर आए। जिससे कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार को ये सभी विधायक भाजपा दफ्तर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रकाश जावड़ेकर, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा समेत तमाम दिग्गज नेताओं से मुलाकात के बाद बाहर निकले।

भाजपा दफ्तर में दिखने वाले नेताओं में विधायक रामबाई, संजीव सिंह कुशवाह, सपा विधायक राजेश शुक्ला निर्दलीय विधायक विक्रम सिंह राणा और सुरेंद्र सिंह शेरा शामिल थे। न्यूज 18 की खबर के अनुसार, इन सभी विधायकों ने साफ किया है कि वह राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के लिए वोट करेंगे।

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और निर्दलीय विधायकों के इस फैसले से भाजपा में खुशी की लहर है। वहीं कॉन्ग्रेस अब भी परेशान है। हालाँकि 3 तीन सीटों पर होने वाले इन चुनावों में कॉन्ग्रेस के खाते में एक सीट पक्की मानी जा रही है। जबकि 2 भाजपा के पाले में जानी स्पष्ट दिख रही हैं।

3 सीटों के लिए होने वाले चुनाव के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और पार्टी महासचिव बैजयंत जय पांडा बुधवार को भोपाल पहुँचे। वहीं, कॉन्ग्रेस के महासचिव और प्रदेश के नए प्रभारी मुकुल वासनिक भी मध्यप्रदेश पहुँच गए। वासनिक ने कॉन्ग्रेस के विधायकों के साथ बुधवार को बैठक की।

यहाँ बता दें 230 सीटों वाले MP विधानसभा में फिलहाल 24 सीट खाली हैं। इनमें से 2 सीट तो विधायकों के निधन की वजह से रिक्त हुई। जबकि 22 सीटों पर कॉन्ग्रेस विधायकों ने सिंधिया के समर्थन में इस्तीफ़े दिए।

सीटों की गणित के हिसाब से देखें तो कॉन्ग्रेस के 114 में से 22 विधायक कम हुए हैं। इसलिए उनका मौजूदा आँकड़ा 92 है, जबकि बीजेपी के पास अभी 107 विधायक है। 4 निर्दलीय, 2 बीएसपी और 1 एसपी।

बीजेपी को अपने दोनों उम्मीदवारों की जीत के लिए 104 वोट चाहिए। जबकि उसके पास 107 वोट हैं। एक सीट पर जीत हासिल करने के लिए 52 वोटों की जरूरत है। इस हिसाब से कॉन्ग्रेस को तीसरी सीट मिलने की पूरी संभावना है। राज्यसभा के लिए कॉन्ग्रेस की पहली प्रमुखता दिग्विजय सिंह हैं।

UN सुरक्षा परिषद का आठवीं बार अस्थाई सदस्य बना भारत: 184 मतों के साथ निर्विरोध जीता चुनाव

भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अस्थाई सदस्य के तौर पर चुना गया। बुधवार (17 जून, 2020) को हुए इस चुनाव में भारत ने जनरल असेम्बली में 192 वैध वोटों में से 184 वोट हासिल किए। इस चुनाव में भारत के साथ-साथ आयरलैंड, मैक्सिको और नॉर्वे भी अस्थाई सदस्य चुने गए हैं।

भारत आठवीं बार सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य चुना जा रहा है। जोकि हर एक भारतीय के लिए गर्व की बात हैं। इसके पहले 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में भारत यह जिम्मेदारी निभा चुका है।

इंडिया एट यूएन, एनवाई ने इस जानकारी को आधिकारिक ट्विटर हैंडल के ज़रिए शेयर किया हैं। जिसमें भारत की इस बड़ी कामयाबी पर टीएस त्रिमूर्ति ने अपने एक वीडियो संदेश के साथ लिखा, “सदस्य देशों ने भारी समर्थन के साथ साल 2021-22 के लिए सुरक्षा परिषद की गैर-स्थाई सीट के लिए भारत का चुनाव किया। भारत को 192 मतों में से 184 मत पड़े।”

बता दें 193 सदस्यों वाले संयुक्त राष्ट्र में जीत के लिए दो-तिहाई यानी 128 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए। जिसमें भारत को 184 वोट्स मिले हैं। हर साल पाँच अस्थाई सदस्य चुने जाते हैं। अस्थाई सदस्यों का कार्यकाल दो साल होता है।

भारत अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में शामिल होगा। इसका कार्यकाल 1 जनवरी 2021 से शुरू होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 देश हैं। इनमें पाँच अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन स्थाई सदस्य हैं। वहीं एस्तोनिया, नाइजर, सेंट विंसेंट, ग्रेनैडिनेस, ट्यूनीशिया और वियतनाम इन 10 देशों को अस्थाई सदस्यता दी गई है। इसी क्रम में बेल्जियम, डोमिनिकन रिपब्लिक, जर्मनी, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका का दो साल का कार्यकाल इस साल के अंत में समाप्त हो जाएगा।

सोशल डिस्टेंसिग का पालन करते हुए कराएँ गए चुनाव

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने 75वें सत्र के लिए अध्यक्ष, सुरक्षा परिषद के पाँच अस्थाई सदस्यों और आर्थिक एवं सामाजिक परिषद के सदस्यों के चयन के लिए विशेष मतदान व्यवस्था के तहत बुधवार को चुनाव शुरू किया था। जिसमें कोविड-19 संबंधी पाबंदियों के चलते मतदान के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए थे। इस सभा में पश्चिमी यूरोपीय और अन्य राज्यों के बीच से समर्थित उम्मीदवार तुर्की के डिप्लोमेट और पॉलिटिशियन वोलकान बोज़किर को अध्यक्ष के रूप में चुना गया था।

यह चुनाव बुधवार सुबह करीब नौ बजे चुनाव आरंभ हुआ। इससे पहले के वर्षों में, चुनाव के दौरान महासभा का हॉल खचाखच भरा होता था। संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक, कर्मचारी तथा अन्य अधिकारी महासभा के हॉल में मास्क पहनकर आए और मतदान करने के तुरंत बाद वहाँ से चले गए

कोरोना वायरस को मद्देनजर रखते हुए 193 सदस्य राज्यों द्वारा मतदान के लिए आठ अलग-अलग स्लॉट तय किए गए थे। मतदान सुबह नौ बजे से शुरू हुआ और दोपहर एक बजे तक चला। अतिरिक्त आधे घंटे का समय उन सदस्यों के लिए रखा गया था जो निर्धारित वक्त पर मतदान नहीं कर पाए। भारत को वोट देने लिए 11.30 से 12.00 बजे का समय निर्धारित किया गया था।

जनरल असेम्बली में चुनाव की पूरी प्रक्रिया को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष तिजानी मुहम्मद बंदे (Tijjani Muhammad-Bande) की निगरानी में सम्पन्न हुआ।

अमेरिका ने किया भारत का स्वागत

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के अस्थाई सदस्य चुने जाने पर गर्मजोशी से स्वागत किया है। अमेरिका ने कहा कि हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की जीत पर हम उन्हें बधाई देते हैं। हम अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के मुद्दों पर एक साथ काम करने के लिए तत्पर हैं।

क्या है UNSC

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र संघ के 6 प्रमुख हिस्सों में से एक है। जिसका उत्तरदायित्व है अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ में नए सदस्यों को जोड़ना और इसके चार्टर में बदलाव से जुड़ा काम भी सुरक्षा परिषद के काम का हिस्सा है। परिषद को अनिवार्य निर्णयों को घोषित करने का अधिकार भी है। ऐसे किसी निर्णय को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव कहा जाता है। इसे विश्व का सिपाही भी कहते है क्योंकि वैश्विक शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी इसी के पास में है। अगर दुनिया के किसी हिस्से में मिलिट्री ऐक्शन की जरूरत होती है तो सुरक्षा परिषद रेजोल्यूशन के जरिए उसे लागू भी करता है।

चीन के लिए भारत में बल्लेबाजी करने वाले कौन: अजीत भारती का सवाल | Ajeet Bharti on China backers in India

जब सभी देशवासियों को देश के साथ खड़े होकर सेना का मनोबल बढ़ाने का समय होता है, ऐसे हर वक्त पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने सेना पर सवाल उठाए हैं। गलवान घाटी में 20 सैनिकों के बलिदान को लेकर पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने लिखा कि पीएम मोदी चुप क्यों हैं? कहाँ छुपे हुए हैं? वहाँ क्या हुआ है, ये देश को बताते क्यों नहीं? चीन की हिम्मत कैसे हुई हमारे जवानों को मारने की? वो हमारी जमीन कैसे ले सकते हैं?

इस ट्वीट के जरिए राहुल गाँधी ने प्रश्न पूछने का ढोंग रचा है। वो भी ऐसे समय में जब भारतीय सेना प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जानकारी दे चुकी है। तो क्या उनकी जानकारी इतनी अविश्वसनीय है कि राहुल गाँधी को पीएम से जवाब चाहिए। चीन ने कितनी जमीन पर, कॉन्ग्रेस के किस और यूपीए के किस प्रधानमंत्री के काल में कब्जा किया है, इसका राहुल गाँधी को तनिक भी ज्ञान नहीं है।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

इस्लामी कट्टरपंथियों के बाद ऑल्टन्यूज ‘फैक्टचेक’ के बहाने चीनी प्रोपेगेंडा को क्यों दे रहा है बढ़ावा

यदि आप सोच रहे हैं कि सिर्फ चीन ही अपने मारे गए सैनिकों पर बात नहीं करना चाहता है, तो आप गलत हैं। इस्लामिक विचारधारा की समर्थक वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ भी नहीं चाहता है कि भारतीय मीडिया और सेना इन आँकड़ों पर बात करे। इस प्रकार यदि देखा जाए तो ऑल्टन्यूज़ ‘फैक्ट चेक’ नामक विधा के चायनीज संस्करण से अधिक कुछ नहीं है। चीन की ही तरह यह भी नहीं चाहता कि चीनी सैनिकों के घायल होने या उनके मारे जाने की ख़बरों पर बात की जाए।

यह तो स्पष्ट है कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर पाकिस्तान के साथ तो संघर्षरत था ही लेकिन पिछले कुछ समय से हम चीन के साथ भी एक किस्म का युद्ध लड़ रहे हैं। लेकिन इससे भी बड़ा वैचारिक युद्ध कुछ लोगों के बीच इस विवाद को लेकर चल रहा है कि उन्हें पाकिस्तान और चीन में से किसे अपना आधिकारिक अन्नदाता स्वीकार करना है।

क्योंकि, जिस तेजी से ऑल्ट न्यूज़ जैसे तथाकथित फैक्ट चेकर्स अपने अन्नदाताओं को संतुष्ट करने के लिए कभी पाकिस्तान तो कभी चीन की सत्ता के हितों में काम करते देखे जाते हैं, यह आश्चर्य होता है कि आखिर एक ही समय में इस्लामिक विचारधारा और कम्युनिस्ट विचारधारा में से किसी एक को चुनना कितना मुश्किल होता होगा। हालाँकि, तब भी ‘भारत विरोध’ कम से कम एकसूत्रीय एजेंडा जरुर है, जो उन्हें उनके वास्तविक मसकद से बाँधे रखता है।

क्या है मामला

ऑल्ट न्यूज़ ने भारत और चीन की सेना के बीच हुए हिंसक संघर्ष में चीनी सत्ता के मुखपत्र के रूप में काम करते हुए भारतीय जवानों के बलिदान और चीनी सैनिकों की मौत की खबरों पर अपने एजंडे को सर्वोपरी रखा है। इस क्रम में ऑल्ट न्यूज़ द्वारा 2 ‘फैक्ट चेक’ किए गए।

पहले फैक्ट चेक में ऑल्ट न्यूज़ ने यह साबित करने का प्रयास किया कि भारतीय सेना नहीं बल्कि चीनी मुख पत्र ग्लोबल टाइम्स और उनके रिपोर्टर्स की बदलती जुबान के आँकड़े ज्यादा स्पष्ट और विश्वसनीय हैं। जबकि दूसरे फैक्ट चेक में ऑल्ट न्यूज़ ने चीन के हताहत या मरे गए सैनिकों की गिनती के लिए भारतीय मीडिया को गलत ठहराया है।

दरअसल, भारतीय सैनिकों की मौत की ख़बरों के बाद चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्टर वांग वेनवेन ने एक ट्वीट में लिखा कि भारत ही नहीं बल्कि चीनी सैनिक भी इस झड़प में मारे गए हैं। उसने लिखा कि इस झड़प के दौरान 5 चीनी सैनिक मारे गए और 11 घायल हुए। इस खबर को कई भारतीय पत्रकारों और मीडिया घरानों ने प्रकाशित किया था।

यह भी ध्यान देने की बात है कि ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्टर द्वारा जारी की गई इस सूचना के आने तक यह पुष्टि हो चुकी थी कि भारत ने इस झड़प में 3 सैनिकों को खो दिया था, जिसमें बटालियन के एक कमांडिंग ऑफिसर भी शामिल थे।

अब, यदि ग्लोबल टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर, जो कि एक चीनी शासन का मुखपत्र है, अपने देश के हताहत सैनिकों की संख्या को ट्वीट करती है, तो इस सूचना पर आखिर क्यों नहीं विश्वास किया जाना चाहिए? लेकिन मानो ग्लोबल टाइम्स और कम्युनिस्ट चीनी शासन इस खबर को बाहर नहीं आने देना चाहता था और फ़ौरन बाद ग्लोबल टाइम्स के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से एक और ट्वीट करते हुए लिखा गया कि हालाँकि, वह पुष्टि नहीं करता है किन्तु इस झड़प में उनके भी ‘कुछ’ सैनिक हताहत हुए हैं।

इसके बाद ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्टर वांग वेनवेन ने तुरंत अपने ट्वीट को हटा दिया और बिना सोचे समझे भारतीय मीडिया को उनकी ‘गलत सूचना’ के लिए दोषी ठहराते हुए दावा किया कि उनका ट्वीट भारतीय मीडिया पर आधारित था।

दिलचस्प बात यह है कि ग्लोबल टाइम्स द्वारा ‘स्पष्टीकरण’ चंद मिनट पहले ही उनकी रिपोर्टर द्वारा ट्वीट में भारत की मीडिया को गैर जिम्मेदाराना बताया गया था।

यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि पत्रकार वांग वेनवेन और ग्लोबल टाइम्स – ये दोनों ट्विटर पर चीन सरकार की विशेष स्वीकृति के बाद ही हैं, क्योंकि माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाईट ट्विटर चीन में प्रतिबंधित है। ऐसे में काम शुरू होता था ऑल्ट न्यूज़ का, जिसे कि चीन के कम्युनिस्ट राज्य द्वारा फैलाई जा रही गफलत और अस्पष्टता को भारतीय मीडिया के खिलाफ इस्तेमाल करने की ‘जिम्मेदारी’ मिल गई।

ऑल्टन्यूज़ ने फ़ौरन चीनी मुखपत्र के ट्वीट के आधार पर भारतीय मीडिया को अपने ‘फैक्ट चेक’ के माध्यम से झूठा साबित करने का प्रयास शुरू कर दिया। यह भारत-चीन फेस ऑफ़ के दौरान ऑल्टन्यूज़ का पहला कारनामा था।

ऑल्टन्यूज़ द्वारा प्रकाशित दूसरे लेख (फैक्ट चेक) का शीर्षक था – “भारत-चीन विवाद: 43 चीनी सैनिक मारे गए? मीडिया के आउटलेट और पत्रकार गुमराह कर रहे हैं।”

इस ‘फैक्ट चेक’ में ऑल्टन्यूज़ ने उन समाचारों को झूठा साबित करने का प्रयास किया जिसमें बताया जा रहा था कि चीन ही नहीं बल्कि भारत ने भी चीन के सैनिकों को हताहत किया है, जिसमें 43 चीनी सैनिकों के हताहत होने की खबरें सामने आई हैं। मीडिया ने बताया कि ये उन चीनी सैनिकों की संख्या है जो स्पष्ट तौर पर गायब, घायल, गंभीर रूप से ज़ख्मी और मारे गए हैं।

लेकिन मानों ऑल्टन्यूज़ को चीनी सैनिकों के घायल होने या उनके मारे जाने की खबरें ज्यादा पसंद नहीं आईं और उन्होंने इसका भी फैक्ट चेक करते हुए भारतीय मीडिया को फर्जी साबित करने का प्रयास किया है।

यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि ये वही ऑल्टन्यूज़ है, जो फलों पर थूक लगा रहे शेरू मियाँ के वीडियो का फैक्ट चेक यह कहते हुए सनसनीखेज तरीके से पेश करता है कि शेरू मियाँ इस फरवरी में नहीं बल्कि 1857 की फरवरी में अंग्रेजों को मारने के लिए फलों पर थूक लगा रहे थे और इस क्रांति के सूत्रधार इस कारण शेरू मियाँ ही थे (इस तथ्य का फैक्ट चेक करने के लिए ऑल्टन्यूज़ स्वतंत्र है।)

इसके अलावा, जिस प्रकार से यह ऑल्टन्यूज़ पत्थर को वॉलेट साबित करने का अनोखा हुनर रखता है, चीन को वास्तव में इसके संस्थापकों की पीठ थपथपानी चाहिए। वैसे भी यह ऑल्टन्यूज़ ‘फैक्ट चेक’ नामक विधा के चायनीज संस्करण से अधिक कुछ नहीं है।

पहला तथ्य तो यहाँ पर यही है कि कोरोना वायरस की महामारी के जनक चीन की सत्ता ने ना तो कोरोना वायरस के कारण हुई मौत के आँकड़े आज तक सामने रखे हैं ना ही वह लद्दाख में हुई झड़प पर आँकड़े सामने रखने का साहस जुटा पा रहा है।

पहले ऑल्टन्यूज़ खुद तय करे कि ग्लोबल टाइम्स विश्वसनीय है या नहीं

ऐसे में चीनी सैनिकों के मरने या हताहत होने की सम्भावना यदि 43 नहीं है तो यह 43 से कम भी नहीं है इसकी सौ प्रतिशत सम्भावना है, क्योंकि यह पचास से सौ और दो सौ के बीच कुछ भी हो सकती है। यह अन्य बात है कि चीन की सरकार ने ऑल्टन्यूज़ को व्यक्तिगत रूप से कुछ आँकड़े थमा दिए हों, जिनके आधार पर वह चीनी सेना के प्रवक्ता के रूप में पेश आ रहा है।

कम से कम यह तो स्पष्ट है कि ऑल्टन्यूज़ की मंशा सत्य को सामने लाने की नहीं बल्कि भारत-विरोध के अपने एकसूत्रीय एजेंडा के द्वारा इस्लामिक विचारधारा के तले चीनी सत्ता की नजरों में आना है या फिर कम से कम उनका काम आसान करना है।

ऑल्टन्यूज़ के लिए कितना बड़ा द्वन्द है कि पहले फैक्ट चेक में अपनी सुविधानुसार जहाँ भारतीय मीडिया के उस दावे को वह झूठा बताने का प्रयास करता है, जिसमें भारतीय मीडिया ने ग्लोबल टाइम्स के ही चीफ रिपोर्टर को आधार स्रोत बनाया है, वही दूसरे फैक्ट चेक में ऑल्टन्यूज़ उसी झूठे ग्लोबल टाइम्स के दावों को सूचना का अंतिम स्रोत साबित करने का प्रयास करता नजर आता है।

ऑल्टन्यूज़ के इस तथाकथित फैक्ट चेक में भारतीय स्रोतों को ‘दावा’ कहकर सामने रखा गया है जबकि चीन के विदेश मंत्रालय के हवाले से लिखा गया है कि उन्होंने भारत पर इस झड़प का दोष लगाया है।

ऑल्टन्यूज़ के ‘फैक्ट चेक’ से लिया गया स्क्रीनशॉट

हो सकता है, लेखन शैली से इसमें कुछ भी गलत नजर ना आए, लेकिन इसे पढ़ते हुए लगता है कि आप चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के प्रोपेगेंडा को पढ़ रहे हों। यह तय है कि पाकिस्तान और चीन में से यदि ऑल्टन्यूज़ को कुछ चुनना होगा, तो वह निश्चित रूप से भारत विरोध को ही चुनेगा।

कांस्टेबल रतनलाल की हत्या के मामले में चार्जशीट में ओवैसी से जुड़े डीएस बिंद्रा का नाम, मीडिया ने किया था महिमामंडन

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में देश की राजधानी दिल्ली को दहलाने की साजिश रची गई थी। उस दौरान उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या कर दी गई थी। साथ ही IPS अमित शर्मा और अनुज कुमार पर जानलेवा हमला किया गया था।

दिल्ली पुलिस की विशेष जाँच टीम ने हाल ही में रतन लाल की हत्या, IPS अमित शर्मा और IPS अनुज कुमार पर दंगाइयों द्वारा किए गए घातक हमलों में 1,100 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। चार्जशीट में कम से कम 17 आरोपितों को नामजद किया गया है। इस पूरे मामले में लगभग 4 से 5 मुख्य साजिशकर्ता हैं, जिनमें सलीम खान, सलीम मुन्ना और शादाब शामिल हैं। पुलिस ने कहा कि देश की छवि खराब करने के लिए एक साजिश के तहत दंगे को अंजाम दिया गया।

चार्जशीट से कई अन्य बेहद परेशान करने वाले विवरण सामने आए, जिनमें से एक हिस्सा ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किया गया है। बता दें कि चार्जशीट में एक नाम का बार-बार जिक्र किया गया है। वो नाम है- डीएस बिंद्रा का। वही डीएस बिंद्र जिनके बारे में फरवरी में सोशल मीडिया पर खबरें वायरल हुई कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को लंगर खिलाने के लिए अपना फ्लैट तक बेच दिया। लोगों ने बिंद्रा की ‘उदारता’ के लिए काफी तारीफें की। मीडिया गिरोह ने इसे ‘मजहब-सिख एकता’ की चासनी में डूबो कर बेचा।

इंडिया टुडे ने इसे मानवता की सेवा करार देते हुए खबरें चलाई।

India Today की हेडलाइन

शाहीन बाग के ट्विटर हैंडल ने भी डीएस बिंद्रा का महिमामंडन करते हुए इसे ‘मजहब-सिख एकता’ की मिसाल बताया।

आज तक और लल्लनटॉप ने भी इस खबर को खूब भुनाया और इसे ‘नि:स्वार्थ सेवा’ करार दिया। हालाँकि, ये सब करते हुए उन्होंने दो चीजों का बिल्कुल भी जिक्र नहीं किया।

1. डीएस बिंद्रा AIMIM नेता थे।

2. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बिंद्रा दिल्ली के मुस्तफाबाद और खूँरेजी में सीएए विरोध प्रदर्शनों में भी मुख्य रूप से शामिल रहे।

बिंद्रा एआईएमआईएम के नेता थे और वो मुस्तफाबाद में सीएए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे थे। मीडिया को अलर्ट करना चाहिए था। हालाँकि, मीडिया ने अपना हीरो ढूँढ लिया था, जिसके माध्यम से इस्लामवादियों के कारनामों पर लीपापोती की जा सकती थी।

अब, डीएस बिंद्रा को दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा दायर चार्जशीट में उन प्रमुख लोगों में नामित किया गया है जिन्होंने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान कांस्टेबल रतन लाल की हत्या करने वाली भीड़ को उकसाया था।

आरोप पत्र में कहा गया है कि बीट अधिकारियों को नियमित रूप से विरोध के क्षेत्र में तैनात किया गया था, ताकि कानून व्यवस्था सुनिश्चित किया जा सके। रतन लाल की हत्या के बाद, दो बीट अधिकारियों से भी पूछताछ की गई और उनके बयानों से तथ्यों का पता लगाया गया। उन्होंने खुलासा किया कि सलीम खान, सलीम मुन्ना, डीएस बिंद्रा, सुलेमान सिद्दीकी, अयूब, अतहर, शाहदाब, उपासना, रविशंद अन्य लोग विरोध स्थल के आयोजक थे।

प्रोटेस्ट साइट पर, समुदाय विशेष को उकसाने वाले भड़काऊ बयान हर दिन दिए गए थे। चार्जशीट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि बीट अधिकारियों के अनुसार, इस साइट पर दंगा स्थानीय दंगाइयों के साथ डीएस बिंद्रा, सलमान सिद्दीकी, सलीम खान, सलीम मुन्ना और अतहर आदि का काम था।

चार्जशीट में स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया है, “आरोपित व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से खुलासा किया कि चाँदबाग दंगो के पीछे की साजिश में उनके साथ डीएस बिंद्रा, डॉ रिज़वान, अतहर, शाहदाब, उपासना, तबस्सुम, रवीश और अन्य लोग शामिल थे।”

इसके अलावा, गिरफ्तार अभियुक्त शाहनवाज़ और इब्राहिम ने यह खुलासा किया कि इस दंगे के आयोजक डीएस बिंद्रा, डॉ रिज़वान, सुलेमान (सलमान), सलीम खान और सलीम मुन्ना थे। यह दंगा इन्हीं लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई साजिश का हिस्सा था।

एक अन्य आरोपित मोहम्मद सलीम खान (चाँद बाग के प्रोटेस्ट का आयोजक) ने खुलासा किया था कि लगभग दो महीने पहले, डीएस बिंद्रा ने सर्विस रोड, वज़ीराबाद रोड, चाँदबाग में सामुदायिक रसोई की शुरुआत की थी। सामुदायिक रसोई की वजह से बड़ी संख्या में वहाँ पर भीड़ इकट्ठा होती थी। सलीम खान, सलमान सिद्दीकी, डॉ रिज़वान, सलीम मुन्ना और अन्य लोगों के साथ सामुदायिक रसोई में जाता था। डीएस बिंद्रा ने CAA/ NRC का जोरदार विरोध करने के लिए उसे और अन्य लोगों को उकसाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोगों को अपना असंतोष दिखाने के लिए सड़क पर आना चाहिए।

इसके अलावा, आरोप पत्र में कहा गया है, “ये वे लोग हैं जिन्होंने विरोध स्थल की नींव रखी है। शुरुआत में वे स्थानीय लोगों से मिले। उनके साथ बैठकें कीं, उन्हें विश्वास दिलाया कि वे एक कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं और फिर लोगों में विरोध की चिंगारी जलाई। इनमें राजनेता, AISA, JCC आदि संगठनों के सदस्य शामिल थे। डीएस बिंद्रा साजिशकर्ताओं में से एक हैं। यह पता चला है कि उन्होंने पहली बार चांद बाग में एक सामुदायिक रसोईघर “लंगर” बनाया था। जिसमें कुछ स्थानीय निवासी शामिल हो गए, जिन्हें हम स्थानीय आयोजक कह सकते हैं। फिर प्रोटेस्ट साइट की स्थापना से लेकर 24 फरवरी 2020 को हिंसा भड़कने तक वो स्थानीय आयोजकों के साथ लगातार संपर्क में थे।” आरोप पत्र में रतन लाल की हत्या के अलावा दंगें में 49 अन्य पुलिसकर्मी गंभीर रुप से घायल हो गए।

पुलिस ने चार्जशीट में खुलासा किया है कि रतन लाल की हत्या से 2 दिन पहले 22 फ़रवरी को ही 50 लोगों के एक समूह ने बैठक की थी, जहाँ हिंसा की पूरी साज़िश रची गई। दंगाइयों ने अपने घर के बच्चों व बुजुर्गों को पहले ही घर के भीतर रहने को बोल दिया था और ख़ुद हथियार लेकर निकले।

पुलिस ने चार्जशीट में ये भी कहा है कि रतनलाल की हत्या एक गहरी साजिश का हिस्सा थी। 24 फरवरी को मौजपुर क्रॉसिंग के पास हिन्दुओं और कट्टरपंथियों के बीच झड़प से दोपहर 12 बजे के क़रीब हिंसा भड़क उठी थी। 5000 लोग वहाँ जुट गए थे और पत्थरबाजी भी हो रही थी। 1 बजे एक बड़ी भीड़ ने चाँदबाग में डीसीपी और अन्य पुलिस अधिकारियों पर हमला बोल दिया, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

दिल्ली पुलिस की मानें तो चाँदबाग में जिस तरह से सीएए विरोधी प्रदर्शन में लोगों को भड़काया गया और धरने पर बिठाया गया, उसका दंगे फैलाने में अहम रोल था। रतन लाल की हत्या भी इसी साज़िश का हिस्सा थी।

देश सेवा में बलिदान हुए झारखण्ड के कुंदन कुमार ओझा, नहीं देख पाए अपनी 17 दिनों पहले जन्मी बेटी का मुख

भारत चीन सीमा पर सोमवार (15 जून, 2020) को लद्दाख में चीनी सैनिकों से हुई खूनी हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए हैं। वहीं चीन के भी लगभग 45 सैनिकों के मारे जाने की खबर है। इस खूनी हिंसा में वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों में एक झारखंड के साहिबगंज के रहने वाले कुंदन कुमार ओझा भी है। 28 वर्षीय कुंदन ओझा की 17 दिन की दुधमुँही बच्ची हैं। जिसकी शक्ल देखने से पहले ही वो दुनिया को अलविदा कह गए।

डिहारी गाँव में रहने वाले कुंदन कुमार ओझा के बलिदान की खबर परिवार को मंगलवार (16 जून, 2020) की शाम को मिली। जिसे सुनते ही परिवार के सभी जन स्तब्ध रह गए। परिवारवालों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। सबके मुँह से सिर्फ एक बात निकल रही थी कि एक बार बच्ची को बस गोद में खिला लेते।

आपको बता दें बलिदानी कुन्दन इसी साल जनवरी में छुट्टी लेकर अपने गाँव डिहारी आए थे। कुछ दिन रहने के बाद वो 2 फरवरी को वापस अपनी ड्यूटी पर लेह चले गए थे। उन्होंने जाते वक्त अपनी गर्भवती पत्नी से जल्द ही बच्चे के जन्म के बाद वापस आने का वादा किया था।

बच्ची का मुख देखने जल्द ही जाने वाले थे घर

सीमा पर चल रहे तनाव की वजह से मोबाइल नेटवर्क में काफी परेशानी आ रहीं थी। जिसकी वजह से कुंदन ने आखिरी बार अपने परिजनों से सेटेलाइट फोन के जरिए बात की थी। जहाँ बच्ची के जन्म पर खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने बताया था कि, लॉकडाउन व चीन सीमा पर विवाद कुछ थमने के बाद वह बेटी को देखने घर देखने जल्द ही आएँगे। लेकिन, शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

परिजनों ने बताया कि कुंदन की 2 साल पहले ही सुल्तानगंज के मिरहट्टी की रहने वाली नेहा से शादी हुई थी। हाल ही में उसकी पत्नी ने फूल सी सुंदर बच्ची को जन्म दिया था। कुंदन 7 साल से सेना में तैनात देश की सेवा में जुटे थे। बुढ़ापे में उनकी जिंदगी का सहारा उन्हें छोड़ कर चला गया। मगर उन्हें सुकून हैं कि उनके बच्चे ने अपना जीवन देश को समर्पित कर उनका सर गर्व से ऊँचा कर दिया है।

झारखंड सीएम और पूर्व सीएम ने ट्वीट कर जताया दुख

देश के लिए बलिदान हुए कुंदन पर गर्व करते हुए झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन और पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी ने सैल्यूट किया। सीएम हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर दुख जाहिर करते हुए कहा कि झारखंड सरकार और पूरा राज्य अपने वीर जवान के परिवार के साथ खड़ा है।

दानापुर रेजिमेंट में हुआ था चयन

आपको बता दें कुंदन कुमार ओझा का वर्ष 2011 में 16 बिहार दानापुर रेजिमेंट की बहाली में चयन हुआ था। 2012 में उन्होंने भारतीय थल सेना के रूप में अपना योगदान देने की शुरुआत की थी। कुन्दन ने साहिबगंज कॉलेज से इंटर व बीए की डिग्री प्राप्त की थी। इसी दौरान उन्होंने एनसीसी में भी हिस्सा लिया था। जहाँ बतौर कैडेट उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए बी सर्टिफिकेट मिला था। सेना के चयन के वक़्त एनसीसी के दौरान किए गए मेहनत से उन्हें सेना में भर्ती होने में भी मदद मिली।

करीब तीन साल पहले ही उनकी तैनाती लेह में हुई थी। सभी सहपाठियों, गाँव के लोगों को कुंदन के जाने का दुख तो है ही मगर भारत माता की रक्षा के लिए कुंदन के वीर गति को प्राप्त होने पर गर्व भी हो रहा है।

गाँव पहुँचेगा कुंदन का पार्थिव शरीर

वीरगति को प्राप्त कुंदन कुमार ओझा का पार्थिव शरीर गुरुवार को उनके गाँव आने की उम्मीद है। हालाँकि, मंगलवार देर शाम तक जिला प्रशासन को इस संबंध में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली थी। उपायुक्त वरुण रंजन ने देर शाम बताया कि कुंदन कुमार ओझा के परिजनों को वहाँ के सूबेदार ने कॉल किया था।

कश्मीरी कट्टरपंथियों को चीन की दोस्ती के चक्कर में न पड़ने की चेतावनी के बाद उमर अब्दुल्ला ट्विटर से गायब

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्‍यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपना ट्विटर एकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया है और वो ट्विटर छोड़ चुके हैं। इसके पीछे एक प्रमुख कारण उनका वह ट्वीट माना जा रहा है जिसमें उन्होंने उन लोगों को कड़ी फटकार लगाई थी जो भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच झड़प में चीन की तारीफ कर रहे थे।

भारत-चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग चीनी सेना के समर्थन में नजर आ रहे थे। इस पर उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि चीन की तारीफ करने से पहले चीन में रह रहे उइगर मुस्लिमों की स्थिति के बारे में भी पता लगा लें। उमर अब्दुल्ला के इस ट्‍वीट के बाद उन्हें कुछ लोगों का समर्थन मिला, लेकिन एक बड़े वर्ग की सख्त प्रतिक्रिया भी झेलनी पड़ी।

उमर अब्दुल्ला का अकाउंट अब ट्विटर पर निष्क्रीय नजर आ रहा है –

दरअसल, चीन में उइगर मुस्लिमों पर वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा कई प्रकार के अत्याचार किए जाते हैं, जिन्हें कि मीडिया के सामने आने से भी रोक दिया जाता है। यह भी दिलचस्प है कि दुनियाभर के मुस्लिम एक ओर जहाँ मुस्लिमों की छवि और उनके अधिकारों को लेकर चिंतित रहते हैं, वहीं वह चीन में उइगर मुस्लिमों की प्रताड़ना को लेकर उदासीन ही नजर आते हैं।

यह आशंका जताई जा रही है कि उमर अब्दुल्ला इसी उदासीनता का शिकार हुए हैं, जिस कारण उन्हें ट्विटर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इससे एक संकेत यह भी मिलता है कि चीन के उइगर मुस्लिमों की चिंता एक समुदाय विशेष के लिए चीन की वैश्विक छवि के सामने कुछ नहीं है।

जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला को घाटी से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय करने के लगभग 8 महीने बाद मार्च के माह हिरासत से रिहा कर दिया गया था। जनसुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत लगाए गए आरोप हटाए जाने के बाद उनकी रिहाई का आदेश जारी किया गया।

उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी करीब 7 महीने तक रही थी। उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की 6 महीने की ‘एहतियातन हिरासत’ पूरी होने से महज कुछ घंटे पहले ही उनके खिलाफ जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

यह भी ध्यान देने की बात है कि गत मई माह में ही कॉन्ग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी को भी चीन और भारतीय सेना को लेकर कुछ ट्वीट किए थे जिसके बाद कॉन्ग्रेस ने भी उनके बयानों से किनारा कर लिया था और अधीर चौधरी को अपने ट्वीट डिलीट करने पड़े थे।

दरअसल, अधीर रंजन चौधरी ने लद्दाख और सिक्किम में भारतीय सैनिकों के साथ चीनी सैनिकों की हुई झड़प को लेकर चीन को ‘जहरीला साँप’ बताया था।उन्होंने ट्वीट में लिखा था – “सावधान हो जाओ चीन, भारतीय बलों को पता है कि तुम जैसे जहरीले साँपों का फन कैसे कुचला जाता है। पूरी दुनिया की नजर तुम्हारी विस्तारवाद की कुटिल चाल पर है। मैं सरकार को अब बिना समय गँवाए ताइवान से राजनयिक संबंध स्थापित करने का सुझाव देता हूँ।”

इस पर कॉन्ग्रेस ने बयान दिया कि अधीर चौधरी ने चीन को लेकर जो कुछ भी कहा वो कॉन्ग्रेस की राय नहीं है। इस पर कॉन्ग्रेस पार्टी की नाराजगी को देखते हुए अधीर रंजन चौधरी ने अपने ट्वीट डिलीट करने पड़े थे।