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NIA की गिरफ्त में तानिया परवीन: हाफिज सईद को करती थी रिपोर्ट, हथियारों की ट्रेनिंग लेने जाना था पाकिस्तान

तानिया परवीन को शुक्रवार (जून 12, 2020) को केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने अपनी हिरासत में ले लिया। वह दमदम सेंट्रल जेल में बंद थी। कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने उसे उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया से लश्कर-ए-तैयबा से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

बताया जा रहा है कि NIA की पूछताछ में तानिया से लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी काफी जानकारी मिल सकती है, जिसका खुलासा उसने अब तक नहीं किया है। उसने बंगाल समेत किन-किन राज्यों में कितने स्लीपर सेल तैयार किए हैं इसका भी पता लगाया जाएगा। इसके साथ ही NIA उससे पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि उसने सेना के कितने कर्मचारियों को हनीट्रैप में फँसाया था एवं उसके इस अभियान में और कौन-कौन शामिल हैं।

तानिया परवीन को 20 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसे 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था। बताया जाता है कि तानिया 10 साल पहले बांग्लादेश से घुसपैठ कर भारत में आई थी। वह लश्कर के लिए युवाओं की भर्तियाँ करती थी। सरकारी सूचनाओं को पाने के लिए वो हनी-ट्रैपिंग का सहारा लेती थी। कई बड़े अधिकारियों व नेताओं तक उसकी पहुँच होने की बात कही जाती है। 

तानिया के पास से कई पाकिस्तानी सिम कार्ड्स मिले थे। उसके पास से जब्त की गई डायरी और दस्तावेजों से पता चला है कि उसने काफ़ी संवेदनशील सूचनाएँ जुटा ली थी। वह मुंबई के 26/11 हमलों के मास्टरमाइंड और आतंकी सरगना हाफ़िज़ सईद से भी 2 बार बातचीत कर चुकी है। वो पिछले 2 साल से लश्कर के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही थी और उस क्षेत्र में कई बार भड़काऊ भाषण भी दे चुकी है।

पश्चिम बंगाल की सोशल टास्क फोर्स द्वारा पूछताछ में पता चला था कि आतंकी तानिया परवीन के व्हाट्सप्प ग्रुप में हाफ़िज़ सईद के दो करीबियों के नंबर मिले थे। इन्हीं दोनों के माध्यम से मुंबई हमले का मास्टरमंड तानिया को सन्देश भेजा करता था। तानिया को हवाला का जरिए रुपए भी भेजे गए थे। गिरफ़्तारी से पहले वो बांग्लादेश सीमा पर विभिन्न आतंकी संगठनों को एकजुट कर बड़े हमले की साजिश रचने में लगी हुई थी। उसके बैंक खाते में करोड़ों रुपए का लेन-देन हो रहा था, इसके बाद से ही परवीन की गतिविधियों पर संदेह होने लगा था।

उल्लेखनीय है कि तानिया का मुख्य लक्ष्य इस्लामिक राज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उसे खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस से प्रेरणा मिली थी। वो उसी तर्ज पर काम करते हुए एक इस्लामिक स्टेट की स्थापना करना चाहती थी। पाकिस्तान से उसके आकाओं ने उसे कई भड़काऊ पुस्तकें भेजी थीं, जिसे पढ़ कर उसकी सोच और भी कट्टरवादी हो गई थी।

तानिया ने मुर्शिदाबाद में कई आतंकी शिविर भी बना रखे थे, जहाँ वो अपने लोगों को भड़काऊ भाषण देने के लिए प्रशिक्षण देती थी। वहाँ वो लोगों को ‘जिहाद’ सिखाती थी और आतंकी गतिविधियों के संचालन के गुर भी सिखाती थी। वो कुछ दिनों बाद अत्याधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान जाने वाली थी। वह बांग्लादेश होकर पाकिस्तान जाने वाली थी, जहाँ वो आईएसआई अधिकारियों से मिलने वाली थी। वो आतंकी संगठन के लिए मोटी रकम भी जुटा रही थी।

3 साल से लश्कर से जुडी तानिया को ‘जिहाद’ का प्रशिक्षण इन्हीं किताबों के जरिए मिला। पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हुए हमले के बाद उसकी फोटो शेयर कर के तानिया ने आतंकियों की प्रशंसा भी की थी। तानिया अक्सर मदरसों का दौरा करती थी और वहाँ भड़काऊ भाषण देकर लश्कर के लिए लोग जुटाती थी।

उसका उद्देश्य युवाओं, ख़ासकर छात्र-छात्राओं को कट्टरपंथी बना कर उन्हें आतंकी संगठनों से जोड़ना था। तानिया ने मुर्शिदाबाद में कई आतंकी शिविर भी बना रखे थे, जहाँ वो अपने लोगों को भड़काऊ भाषण देने के लिए प्रशिक्षण देती थी। वहाँ वो लोगों को ‘जिहाद’ सिखाती थी और आतंकी गतिविधियों के संचालन के गुर भी सिखाती थी। वो कुछ दिनों बाद अत्याधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान जाने वाली थी। वह बांग्लादेश होकर पाकिस्तान जाने वाली थी, जहाँ वो आईएसआई अधिकारियों से मिलने वाली थी। 

J&K: अनंतनाग और कुलगाम में मुठभेड़, 4 आतंकी ढेर, 2 हिजबुल मुजाहिदीन के

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में सुरक्षाबलों को बड़ी कामयाबी मिली है। शनिवार (जून 13, 2020) तड़के सुरक्षाबलों ने दो आंतवादियों को मार गिराया है। मारे गए दोनों आतंकवादी हिजबुल मुजाहिदीन के हैं।

इनके पास से गोला-बारूद के साथ 2 पिस्तौल और 3 ग्रेनेड बरामद हुए हैं। यह ऑपरेशन अब खत्म हो गया है। ऑपरेशन में भारतीय सेना की किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है।

जानकारी के मुताबिक अनंतनाग जिले के लल्लन में खुफिया इनपुट पर आज सुबह एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया गया था। आतंकियों की तरफ से गोलीबारी के बाद मुठभेड़ में तब्दील हो गया। इस दौरान हिजबुल के दो आतंकियों को ढेर कर दिया गया।

इसके अलावा कश्मीर जोन के पुलिस ने ट्वीट करते हुए बताया कि कुलगाम के निपोरा इलाके में 2 आतंकियों को मार गिराया गया है। सुरक्षाबलों को खुफिया एजेंसियों से खबर मिली थी कि कुलगाम के निपोरा में आतंकवादी छिपे हुए हैं। इसके बाद भारतीय सेना के जवानों ने स्थानीय पुलिसकर्मियों की मदद से इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया। इस दौरान आतंकवादियों की ओर से गोली चलाई गई तो जवानों ने भी जवाबी फायरिंग की। 

काफी देर तक चले मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने दो आतंकवादियों को मार गिराया। मारे गए आतंकवादियों की अभी शिनाख्त नहीं हो पाई है। सर्च ऑपरेशन जारी है। अधिकारियों ने बताया कि आतंकवादियों की पहचान के अलावा यह पता करने की कोशिश की जा रही है कि वे किस आतंकवादी संगठन से जुड़े हुए थे।

गौरतलब है कि बुधवार (जून 10, 2020) को कश्मीर के शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकियों को मार गिराया था। पुलिस ने बताया था कि मारे गए आतंकी हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े हुए थे।

इससे पहले 8 जून को शोपियाँ के पिंजूरा इलाके में हुई मुठभेड़ में 4 आतंकी मारे गए थे। उससे एक दिन पहले रेबेन इलाके में 5 आतंकियों को सुरक्षाबल ने ढेर किया था। कुल मिलाकर 24 घंटों में सुरक्षाबलों ने 9 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था।

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने इन लगातार मुठभेड़ों के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि हाल के अभियानों में हिजबुल मुजाहिदीन के 9 आतंकवादी मारे गए हैं। पिछले 2 सप्ताह में 9 बड़े ऑपरेशन किए गए, जिसमें 22 आतंकवादियों का खात्मा किया गया है। इनमें आतंकी संगठनों के 8 शीर्ष कमांडर शामिल हैं।

जम्मू-कश्मीर के सुरक्षाबलों ने इस साल 11 जून तक 100 से ज्यादा आतंकवादियों को मार गिराया था। इनमें से 68 आतंकियों को 1 अप्रैल से 10 जून के बीच मार गिराया गया, जब कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन लागू था।

असम: आदिवासी युवक रितुपर्णा पेगु का गला रेता, हुसैन, इब्राहिम और उनकी अम्मी समेत 5 गिरफ्तार

असम के गुवाहाटी में एक आदिवासी हिन्दू युवक रितुपर्णा पेगु (Rituparna Pegu) को गला काटकर मौत के घाट उतार दिया गया। नूनमाटी पुलिस (Noonmati police) ने शुक्रवार (जून 12, 2020) दोपहर रितुपर्णा पेगु की निर्मम हत्या के मामले में 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

गिरफ्तार आरोपितों की पहचान दुलाल अली, इब्राहिम अली, इब्राहिम की अम्मी मनोवर खातुन, हुसैन अली और अरमान अली (Dulal Ali, Ibrahim Ali, Manowara Khatun, Hussain Ali and Arman Ali) के रूप में की गई है।

बताया जा रहा है कि यह विवाद एक कुर्सी को लेकर था। रिपोर्ट्स के अनुसार, ACP देबराज उपाध्याय ने इस हत्या के बारे में कहा, “यह घटना अरमान होम फर्निशिंग नामक एक दुकान में हुई। वहाँ आरोपित हुसैन अली और रितुपर्णा पेगू दुकान के अंदर बैठे थे। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन वे एक कुर्सी को लेकर बहस में उलझ गए। माहौल गरम होने पर रितुपर्णा पेगू ने आरोपित को थप्पड़ मार दिया। इस पर हुसैन अली आगबबूला हो गया। उसके परिवार के सदस्य भी घटनास्थल पर पहुँचे और रितुपर्णा पेगु की पिटाई शुरू कर दी। हुसैन अली ने उसे पीछे से धक्का दिया और पेगू सड़क किनारे गिर गया जहाँ उसकी मौत हो गई।”

जिस दुकान में यह वारदात हुई उसके मालिक अरमान अली ने कहा, “उनकी लड़ाई किसी चीज को लेकर हुई। बहस शुरू होने के बाद, हुसैन अली अपने परिवार के सदस्यों को लेकर आए, जिससे हादसा हुआ। मैंने ऐसा होने से रोकने की कोशिश की, लेकिन हुसैन ने रितुपर्णा की पीठ पर चाकू से वार किया।”

रितुपर्णो की हत्या के कई वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किए जा रहे हैं और इस निर्मम हत्या को लेकर लोग काफी आक्रोशित हैं।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों में से एक, अरमान अली उस दुकान के मालिक हैं, जहाँ रितुपर्णा पेगु (Rituparna Pegu) को चाक़ू से मारा गया और हुसैन अली इस स्टोर में काम करता है। पाँचों आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147/148/149/302 के तहत नूनमाटी पुलिस स्टेशन में केस नंबर 294/20 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

नूनमाटी पुलिस मामले की जाँच कर रही है। गुवाहाटी के निवासी रितुपर्णा पेगु की शुक्रवार दोपहर को चाकू मारकर हत्या कर दी गई और उसके बाद उनकी लाश को सड़क पर फेंक दिया गया।

ट्विटर पर इस घटना को शेयर करते हुई एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि अरमान अली और हुसैन अली ने रितुपर्णा पेगु की निर्ममता से हत्या कर दी गई।

यह घटना शहर के नूनमाटी इलाके में स्थित अरमान होम फर्निशिंग (Armaan Home Furnishing) नामक एक स्टोर में हुई। हत्या की यह पूरी घटना स्टोर के सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो गई और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर गिरफ्तारी की गई।

CCTV से ली गई घटना की तस्वीर (साभार – dailynv)

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे कुछ लोगों के अनुसार, मृतक युवक की हुसैन अली के साथ बहस हुई। विवाद बढ़ने पर हुसैन अली ने उसकी पीठ में चाकू मार दिया, जिसके बाद पेगु सड़क किनारे गिर गया। हालाँकि, कुछ रिपोर्ट्स में यह भी बताया जा रहा है कि रितुपर्णा पेगू को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसने वहाँ दम तोड़ दिया। यह घटना दुकान के सीसीटीवी में कैद हो गई।

सोशल मीडिया पर मृतक रितुपर्णा के बच्चे और पत्नी का वीडियो शेयर करते हुए स्क्विंट नियोन ने लिखा है, “यह 2 या 3 महीने के बच्चे के साथ रितुपर्णा पेगू (आदिवासी) की पत्नी का वीडियो है, जिसका गला आज गुवाहाटी में दिन के उजाले में हुसैन अली, इब्राहिम अली, दुलाल अली, अरमान अली और मुनवारा खातुन द्वारा तालिबानी शैली में काट दिया गया था।”

ट्विटर पर इस घटना का वीडियो शेयर करते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि एक आदिवासी रितुपर्णा पेगू की गुवाहाटी में अरमान अली, अली हुसैन और उसकी माँ और परिवार के सदस्यों द्वारा उसका गला काटकर हत्या कर दी गई।

फरार चल रहा तबलीगी जमात का मुखिया मौलाना साद दिल्ली की मस्जिद में दिखा, 20 लोगों के साथ पढ़ी नमाज

तबलीगी जमात का मुखिया मौलाना साद शुक्रवार (12 जून 2020) को सार्वजनिक तौर पर दिखा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उसने दिल्ली के जाकिर नगर की एक मस्जिद में नमाज अदा की। इस दौरान उसके साथ 20 लोग थे। इनमें एक बच्चा भी था।

तबलीगी जमात के निजामुद्दीन स्थित मरकज में लॉकडाउन के बावजूद लोगों को जमा रखने का मामला सामने आने के बाद मौलाना साद फरार चल रहा है। मार्च में मरकज कोरोना संक्रमण का हॉटस्पॉट बनकर उभरा था।

बताया जाता है कि मौलाना साद दोपहर के वक्त मस्जिद पहुॅंचा था। कुछ देर वहॉं रुकने के बाद चला गया। वह दिल्ली पुलिस की जॉंच से बचता फिर रहा है। अब तक पुलिस को अपनी कोरोना जॉंच की रिपोर्ट भी उसने नहीं सौंपी है।

क्राइम ब्रांच ने कार्रवाई करते हुए मौलाना साद समेत 7 लोगों को नोटिस भेजा था। उस समय मौलाना साद खुद को क्वारंटाइन करने की आड़ में गायब हो गया और जब पुलिस ने छानबीन शुरू की तब भी वह निकलकर सामने नहीं आया। पुलिस की पकड़ से बचने के लिए साद अलग-अलग जगह छुपता रहा।

मौलाना साद का एक ऑडियो भी सामने आया था, जिसमें वह कह रहा था कि ये ख्याल बेकार है कि मस्जिद में जमा होने से बीमारी पैदा होगी, मैं कहता हूँ कि अगर तुम्हें यह दिखे भी कि मस्जिद में आने से आदमी मर जाएगा तो इससे बेहतर मरने की जगह कोई और नहीं हो सकती।

वायरल ऑडियो में साद आगे कहता है कि अल्लाह पर भरोसा करो, कुरान नहीं पढ़ते अखबार पढ़ते हैं और डर जाते हैं, भागने लगते हैं। साद आगे कहते हैं कि अल्लाह कोई मुसीबत इसलिए ही लाता है कि देख सके कि इसमें मेरा बंदा क्या करता है। साद आगे कहते हैं कि कोई कहे कि मस्जिदों को बंद कर देना चाहिए, ताले लगा देना चाहिए क्योंकि इससे बीमारी बढ़ेगी तो आप इस खयाल को दिल से निकाल दो।

आए दिन मौलाना साद को लेकर हो रहे खुलासे की वजह से ईडी, आईटी और सीबीआई सभी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मरकज के जुड़ी सभी जनकरियों को इनसे साझा किया है। जिसमें हवाला कनेक्शन, विदेश से आने वाले रुपयों, मरकज पर मनी लॉड्रिंग जैसे मामले अहम है।

क्राइम ब्रांच ने तबलीगी मकरज जमात के बैंक ऑफ इंडिया के उस खाते के बारे में जानकारी हासिल की है, जिसमें पैसे आने के 24-28 घंटे के भीतर करोड़ों रुपए गायब कर दिए जाते थे। ये पैसे ज्यादा से ज्यादा 48 घंटे के भीतर अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे।

क्राइम ब्रांच ने मौलाना साद के 5 करीबियों का पासपोर्ट भी जब्त कर लिए थे। इन पाँचों लोगों पर पहले से इस मामले के संबंध में एफआईआर दर्ज था। कहा जाता है कि मरकज से जुड़े हर फैसले इनसे पूछकर लिए जाते थे। ऐसे में पासपोर्ट जब्त होने के बाद अब इनमें से कोई भी मामले की जाँच पूरी होने तक देश के बाहर नहीं जा सकता है।

मुरारी बापू जी, अली-मौला इतना ही पसंद है तो टोपी लगा कर नमाज पढ़ लीजिए, सत्संग-प्रवचन का नाम क्यों ले रहे?

कुछ समय पहले किसी के नाचने पर बवाल हुआ था, मैंने सोचा बेकार का विवाद है, नहीं लिखा। फिर अली-मौला पर मुरारी बापू (Morari Bapu) की एक क्लिप देखी, जाने दिया। आज फिर वो एक क्लिप देखा जिसमें वो कह रहे हैं कि त्रिपुंडधारियों और बाबाओं को उमर खैय्याम और रूमी पढ़ना चाहिए, तब पता लगेगा बंदगी क्या है!

सवाल यह है कि क्या ऐसा कहना या मानना गलत है? बिलकुल नहीं। तो फिर मैं इस पर लिख-बोल क्यों रहा हूँ? वो इसलिए क्योंकि मेरे हिसाब से क्रिकेट की पिच पर फुटबॉल खेलना, खेल और देखने आए दर्शक, दोनों का ही, अपमान है। जैसा कि हजारों बार हम सबने सुना है कि व्यक्ति को समय, जगह, परिस्थिति और पात्र देख कर बोलना चाहिए। संतों को तो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

मुरारी बापू ने जो कहा, वो किसी महफिल में, मुशायरे में करते तो बड़ा अच्छा लगता। जिस शराब और सौंदर्य की उपमाएँ दे रहे हैं, वो अगर किसी प्राइवेट पार्टी में पीते वक्त भी देते, तो भी अच्छा रहता। लेकिन, हिन्दू श्रद्धालुओं की भरी सभा में, जब आप अली-मौला करने लगते हैं, या करवाने लगते हैं, तो आप मानें या न मानें, सेकुलरिज्म की बयार में नाक घुसाना चाह रहे हैं।

अपने कार्यक्रमों में गजल गायक को जगह देना, मनोरंजन के लिए गीत-गजल सुनना अलग बात है। लम्बी कथा हो, तो बीच-बीच में संगीत का सहारा लेना उचित लगता है। लेकिन, समस्या तब हो जाती है जब, आप उन गजलों की व्याख्या करते हुए उसमें हिन्दू और राम खींच लाते हैं। समस्या तब होती है जब आपके लिए ईश्वर और अल्लाह एक हो जाता है, भक्ति और बंदगी एक हो जाती है।

जबकि ऐसा है नहीं। मेरी बात मत मानिए, अल्लाह को मानने वाले से ही पूछ लीजिए कि क्या ईश्वर और अल्लाह एक है, समान है, जवाब आपको मिल जाएगा। अल्लाह को मानने वाला और कुछ मानता ही नहीं, वो यह गाता है ‘मोहम्मद का सानी, मोहम्मद का हमसर, न पहले था कोई, न अब है, न होगा’। फिर आप किस हिसाब से दोनों को बराबर करना चाह रहे हैं?

आवश्यकता क्या आन पड़ी है कि आपको प्रवचन और सत्संग में अली-मौला और अल्लाह की बंदगी की याद आ रही है? एक तरफ एक मजहब है, जो कि अपने मूल रूप में प्रसारवादी, राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर हिंसक और लूट-पाट से लेकर आतंक का शासन स्थापित करने पर तुला हुआ है, और दूसरी तरफ उसी की प्रसारवादी नीतियों को झेल कर हर बार खड़ा होने वाला धर्म!

दोनों एक हैं ही नहीं, आप क्यों इसको मिलाने पर तुले हुए हैं? आखिर, आवश्यकता क्या है? क्या भजन खत्म हो गए? क्या वेदवाणी का लोप हो गया? क्या उपनिषदों के सूक्तिवाक्य गायब हो गए? क्या पुराणों के सुभाषित पन्नों से उड़ गए? क्या सनातनियों के अनगिनत ग्रंथों के अनगिनत श्लोकों की कमी पड़ गई कि राम कथा के लिए जाने वाला प्रवचनकर्ता अली मौला पर न सिर्फ नाच रहा है, बल्कि उस नाच को सही भी कह रहा है?

वस्तुतः धर्म एक व्यक्तिगत विषय है, हर व्यक्ति को अपने दृष्टिकोण से उसे देखने की स्वतंत्रता है, परन्तु हर व्यक्ति की समझ का स्तर उतना ऊँचा या व्यापक नहीं होता कि वो स्वयं ही इसे समझ सके। इसी कारण कथावाचक हुए, प्रवचन करने वाले हुए, सत्संग का आयोजन होता है। ये एक सामान्य व्यक्ति को धर्म की जानकारी देने, एक बेहतर जीवन जीने का तरीका बताने का मार्ग है।

किसी अनभिज्ञ व्यक्ति को अपने टेंट में बिठा कर अली-मौला और अल्लाह की बंदगी बताना यह बताता है कि कथा का ज्ञान होना अलग बात है, और प्रवचन के नाम पर तत्कालीन राजनैतिक विषयों में रुचि लेते हुए, धार्मिकता के नाम पर सोशल मीडिया ट्रेंड का हिस्सा बनना अलग। मुरारी बापू को रामकथा कहनी चाहिए क्योंकि मंच का पूरा प्रयोजन ही वही है।

रामकथा में न तो अल्लाह आते हैं, न आने का कोई औचित्य है। कोई अल्लाह को रामकथा में ला रहा है तो इससे राम वालों को भी समस्या होनी चाहिए, और अल्लाह वालों को भी। भक्ति में श्रद्धा है, बंदगी में गुलामी है जो तथाकथित नेक बंदों से आइसिस जैसे प्रतिष्ठान बनवाती है। दोनों एक नहीं हैं, दोनों में पारिभाषिक तौर पर बुनियादी अंतर है, और वो बना रहना आवश्यक है।

आप बॉब मार्ले को सुनिए बापू जी, अरियाना ग्रांडे को सुनिए, एकॉन की धुन पर नाचिए… आपका समय, आपका घर, आपका म्यूजिक सिस्टम… लेकिन हाँ, ये काम अपने व्यक्तिगत दायरे से बाहर मत कीजिए क्योंकि आप एक व्यक्ति मात्र नहीं हैं, न ही आप एक व्यक्ति के रूप में कहीं बुलाए जाते हैं, या आपका कहीं आयोजन होता है। आपके नाम के पहले ‘राम कथावाचक’ जैसे विशेषण लगते हैं।

आपको अली-मौला में भी रुचि है तो टेंट लगवाइए और बड़े-बड़े बैनर पोस्टर पर ‘अल्लाह कथावाचक मुरारी बापू’ लिखवाइए, वहाँ गाइए और लोगों को बंदगी के मायने समझाइए। रूमी ने बहुत अच्छी बातें कही हैं, उमर खैय्याम की रुबाइयाँ भी कमाल की हैं, लेकिन कमाल का तो शकीरा का ‘हिप्स डोन्ट लाय’ भी है, कमाल तो ट्वर्किंग भी है… कीजिए! कर पाएँगे?

गाँधी बाबा वाला रोग मत फैलाइए, उसके कम्यूनिटी ट्रांसमिशन से भारत उबर नहीं पाया है। गाँधी ने दिल्ली के बंगाली कॉलोनी के एक मंदिर में कुरान पाठ करवाया था। बात यह नहीं है कि उससे क्या हो गया, बात यह है कि आवश्यकता क्या है इस दिखावे की? और हाँ, यहाँ यह सवाल भी बिलकुल जायज है कि क्या किसी मस्जिद में भारत का कट्टरपंथी रामलीला होने देगा? क्या किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर से गीता पाठ संभव है?

और एक बात, अगर किसी समानांतर ब्रह्मांड की भारतभूमि पर बने किसी मस्जिद में अगर मजहब विशेष वाले गीता-पाठ कर भी दे, तो भी सवाल वही है कि हम क्यों अली-मौला करें! उसको गीता पढ़ना है, उसका सरदर्द है, उसको रामलीला करना है, वो करे। वो कहीं हनुमान का रोल कर रहा है, बिलकुल करे… करे क्या, हिन्दू ही बन जाए, हमें कोई समस्या नहीं। लेकिन, हिन्दुओं की रामकथा के बीच में ये रूमी और खैय्याम की बकैती नहीं होनी चाहिए।

आप ने न सिर्फ जगह और आयोजन की सीमाओं का उल्लंघन किया, बल्कि आप उससे और आगे जा कर त्रिपुंड लगाने वाले और बाकी धर्मगुरुओं पर ताना भी मार रहे हो कि उन्होंने जलालुद्दीन रूमी को नहीं पढ़ा! पढ़ा तो आपने भी बहुत कुछ नहीं होगा, लेकिन मतलब उससे नहीं है। मतलब इससे है कि जो पढ़ा है, उसे अच्छे से समझते हैं या नहीं? समझते हैं तो दूसरों में इस ज्ञान का प्रसार कीजिए।

समझने में कहीं दिक़्क़त रह गई हो, तो दोबारा पढ़िए कि किस जगह पर अल्लाह और बंदगी की बात लिखी हुई है या उस पर चर्चा करने किस श्रद्धालु ने बोला? क्या आपसे किसी ने कहा कि दोनों के अंतर गिनाएँ, या समानता बताएँ? अगर संदर्भ वह रहा हो, तो आपकी बातें ठीक लगेंगी, लेकिन संदर्भ वो नहीं था।

मेरी न तो समझ उतनी है, न ही ज्ञान का वृत्त उतना वृहद की मुरारी बापू को निर्देश दे सकूँ। एक सामान्य हिन्दू के तौर पर, पहले विवाद की उपेक्षा के बाद, दोबारा जब स्वयं का बचाव करते हुए, दूसरे धर्माचार्यों पर ताने मारने और उन्हें अज्ञानी कहने की जो धृष्टता उन्होंने की, तो मेरा भी एक लेख तो उचित ही लगता है।

आप ज्ञानी हैं, बने रहें। आपको अली-मौला करना है तो टोपी पहन लें, और भरी सभा में नमाज ही पढ़ लें, हमें समस्या नहीं है। आप अपने पैसों से दो-चार मस्जिद बनवा दें, वो भी ठीक है। लेकिन, इन सब में पारदर्शिता होनी चाहिए। रामकथा सुनने के लिए बुला कर, बिना किसी संदर्भ के अल्लाह की बंदगी के रस में डूबने की बातें कहना श्रद्धालुओं को ठगने जैसा है।

इसी लेख को वीडियो में यहाँ देखें:

4 साल पुरानी फोटो से अलका लांबा ने मंदिरों को बदनाम करने की कोशिश की, कहा- दान बटोरने के लिए खोले गए हैं

AAP की पूर्व विधायक और वर्तमान में कॉन्ग्रेस नेता अलका लांबा ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को अपने ट्विटर अकाउंट से एक फोटो शेयर की। इस फोटो के जरिए उन्होंने आरोप लगाया कि लॉकडाउन के बाद मंदिरों को इसलिए खोला गया, ताकि भक्तों से दान लिया जा सके।

अलका लांबा ने एक हिंदू मंदिर की तस्वीर शेयर की। इस तस्वीर में भक्त मोबाइल के जरिए डिजिटल तरीके से दान करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

अलका लांबा का ट्वीट

तस्वीर को ट्वीट करते हुए अलका लांबा ने लिखा है, “लगता है धार्मिक स्थलों को तो मात्र दक्षिणा के लिए ही खोला गया है। वरना हनुमान जी की मानें तो भगवान तो भक्तों के हृदय में वास करते हैं। ऐसा उन्होंने साबित करके भी दिखाया था। सच है ना? घरों में रहो, सुरक्षित रहो।”

अलका लांबा ने आरोप लगाया कि मंदिर केवल दान लेने के लिए उद्देश्य से खोला गया है। हालाँकि इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है। अलका लांबा ने जिस फोटो को शेयर करते हुए ये आरोप लगाया है, वह तस्वीर 4 साल पुरानी यानी 2016 की है। इसके अलावा, यह ऑनलाइन खरीद के लिए उपलब्ध स्टॉक इमेज है।

अलका लांबा ने 4 साल पुरानी इस तस्वीर का इस्तेमाल हिंदू मंदिरो की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से किया और दावा किया कि मंदिर लॉकडाउन के बाद खजाना भरने के लिए खोले गए हैं। कॉन्ग्रेस नेता ने जो तस्वीर शेयर की है, उसमें भी कॉपीराइट का वॉटरमार्क देखा जा सकता है, जो यह साबित करता है कि यह फोटो स्टॉक इमेज साइट से ली गई है।

इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि यह 2016 की है, जहाँ लोग राजस्थान के जोधपुर के शास्त्री नगर में शनि मंदिर में दान देने के लिए PayTM का उपयोग कर रहे हैं। हालाँकि अलका लांबा ने सत्यता की पुष्टि की परवाह किए बिना यह कहते हुए हिंदू मंदिरों को बदनाम करने की कोशिश की कि देश के  ‘Unlock-1’ फेज में प्रवेश करने के दौरान जब अधिकारियों द्वारा कुछ प्रतिबंध हटाए जा रहे थे, उस समय मंदिर दान लेने में व्यस्त था।

31 मई को लॉकडाउन समाप्त होने के बाद सरकार की तरफ से कुछ राहतें दी गई। एक नई गाइडलाइन जारी की गई कि क्या करना है और क्या नहीं। इसके बाद 8 जून को ऑफिस, मॉल, रेस्टॉरेंट और धार्मिक स्थलों को खोलने का निर्देश दिया गया था।

गौरतलब है कि अलका लांबा ने इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए ‘ढोंगी’ शब्द का प्रयोग किया और कहा कि जिन बलात्कारियों पर उनका, साक्षी महाराज का अमित शाह और पीएम मोदी का आशीर्वाद हो, उन्हें रिहा होने से कोई नहीं रोक सकता है। अलका लांबा ने कुलदीप सेंगर के रिहा होने की झूठी ख़बर पर यह प्रतिक्रिया दी थी। इसके बाद सेंगर की बेटी ऐश्वर्या ने अलका लांबा के खिलाफ उन्नाव पुलिस के समक्ष एफआईआर दर्ज करवाई थी।

भाई का ‘जहर’ बिका नहीं, बहन नमक पर बनाने चली ‘लल्लू’: कॉन्ग्रेसी मुखपत्र में प्रियंका गाँधी का इमोशनल अत्याचार

कॉन्ग्रेस का मुखपत्र है नेशनल हेराल्ड। इसका हिंदी वर्जन है नवजीवन। नवजीवन में एक लेख कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का छपा है। शीर्षक है- प्रियंका गाँधी का लेख: अडिग और अजय ‘लल्लू’।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को यह कहानी (लेख की बजाए इसे कहानी कहना ज्यादा समुचित होगा) समर्पित है। इसमें प्रियंका कहती हैं, “अजय लल्लू कक्षा 6 के छात्र थे जब उन्होंने सड़क पर ठेला लगाया। दीवाली में पटाखे बेचे, बुआई के मौसम में खाद और बाकी के दिनों में नमक।”

भावनाओं में पिरोए इस कहानी पर चर्चा करने से पहले वक्त को थोड़ा पीछे ले जाते हैं। जनवरी का महीना था और साल था 2014। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कॉन्ग्रेस का सम्मेलन चल रहा था। मनमोहन सरकार में मंत्री रहे और गाँधी परिवार के वफादार माने जाने वाले मणिशंकर अय्यर ने इसी सम्मेलन में कहा था, “मैं आपसे वादा करता हूँ कि 21वीं सदी में नरेंद्र मोदी कभी भी देश के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। लेकिन अगर वो यहाँ चाय बेचना चाहते हैं तो हम उनके लिए एक जगह तलाश लेंगे।”

हालॉंकि जब उस साल हुए आम चुनावों में कॉन्ग्रेस को अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय मिली तो अय्यर इस बयान से पलट गए। मई 2014 में एक इंटरव्यू के दौरान बीबीसी के सलमान रावी ने इस बयान को लेकर अय्यर से सवाल किया तो उनका जवाब था, “माफ कीजिएगा, इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहा हूँ। मगर यह आपका सवाल बिल्कुल बकवास है। मैंने उनको कभी चायवाला नहीं कहा और न वह कभी चायवाले ही थे। वह तो खुद अपने भाषणों में जगह-जगह इस बात को कहा करते थे। अहमद पटेल ने मुझे बताया कि वह ठेके पर कैंटीन चलाया करते थे। मैंने तो बस इतना कहा था कि प्रधानमंत्री बनने की क्षमता उनमें नहीं है।”

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आप एक बार फिर अय्यर को सुने और जान लें कि उन्होंने कहा क्या था। वीडियो कॉन्ग्रेस के ही ‘अघोषित’ चैनल एनडीटीवी से लिया गया है, ताकि कोई यह न कह सके कि इसके साथ छेड़छाड़ की गई है।

असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद सामान्य पृष्ठभूमि के परिवार से हैं। बचपन में वे वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। इस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर संघर्ष में तपकर ऊँचाइयों को छूने वाले बहुतेरे हैं। लेकिन, जब मोदी के बचपन में चाय बेचने की बात निकलकर पब्लिक डोमेन में आई तो कॉन्ग्रेस ने इसका खूब मजाक बनाया। मोदी उस समय भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अय्यर का बयान ‘चायवाले का मजाक बनाने’ की कॉन्ग्रेस की उसी रणनीति की बानगी है।

अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं। 2018 के आखिर में एक साक्षात्कार के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि ‘पकौड़ा बेचना’ भी एक तरह का काम है। अगले साल आम चुनाव थे। इसलिए कॉन्ग्रेसियों ने इस बयान का भी जमकर मजाक उड़ाया। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इसका मखौल बनाते हुए कहा था, “मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, सिट डाउन इंडिया, पकौड़ा…। शुरू में उन्होंने मेक इन इंडिया की बात की फिर स्टार्ट अप इंडिया की बात की, इसके बाद स्टैंड अप इंडिया की बात की और आखिर में वह पकौड़ा पर जाकर रुके।”

इससे आप समझ सकते हैं कि सामान्य पृष्ठभूमि के छोटे-छोटे रोजगार करने वाले लोगों के लिए कॉन्ग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कितनी हीन भावना रखता है। लेकिन, समय का चक्र देखिए कि आज उसी राहुल गॉंधी की बहन, उसी गाँधी परिवार की सदस्य प्रियंका गॉंधी एक प्रदेश के अपने पार्टी अध्यक्ष के बचपन में ठेला लगाने, पटाखे, खाद और नमक बेचने की कहानी बेच रही हैं।

नवजीवन में प्रकाशित प्रियंका गॉंधी का कथित लेख

इतना ही नहीं इस कहानी में प्रियंका गाँधी ने यह भी बताया है कि लल्लू दिल्ली में एक झुग्गी में मजदूरों के साथ रहते थे। उनकी रोजाना कमाई थी 90 रुपया। फिर वह बताती है कि दो साल बाद लल्लू दिल्ली से लौटकर कैसे कॉन्ग्रेस में सक्रिय हुए और विधायक बने। वगैरह, वगैरह।

लल्लू ने अपने जीवन में क्या-क्या किया है और क्या-क्या पाया है, इस पर बात करने की बजाए हम यह जानते हैं कि वे फिलहाल चर्चा में क्यों हैं।

लल्लू मई में बसों की गलत जानकारी और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। उनकी जमानत याचिका पर 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सुनवाई की। सरकार से जवाब मॉंगते हुए अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 16 जून की मुकर्रर की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 12 जून को ही लल्लू को समर्पित प्रियंका गॉंधी का लेख नवजीवन में प्रकाशित हुआ है।

लेकिन, इस पूरे लेख में प्रियंका गाँधी ने उन सवालों का जवाब नहीं दिया है जो लॉकडाउन के दौरान उनकी बस पॉलिटिक्स के कारण उठे थे। यहॉं तक कि रायबरेली की कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने भी इस मामले में पार्टी के स्टैंड का विरोध किया था। अदिति सिंह ने ट्वीट कर कहा था था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें। तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

इन सवालों के जवाब देने की बजाए कॉन्ग्रेस ने अदिति सिंह को पार्टी की महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया था। तुर्रा ये कि अपने लेख में लल्लू की गिरफ्तारी की चर्चा करते हुए प्रियंका गॉंधी ने यूपी सरकार पर उनके खिलाफ कई धाराओं में फर्जी मुकदमे लादने का आरोप मढ़ दिया है।

प्रियंका बखूबी जानती थीं कि जब वे यूपी सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई के आरोप लगाएँगी तो वे सारे सवाल फिर खड़े होंगे जिसके कारण लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के नाम पर सियासत करने को लेकर कॉन्ग्रेस और उनकी छीछालेदर हुई थी। इसलिए किसी किस्सागोई की तरह उन्होंने अपनी कहानी भावनाओं में लपेट कर शुरू की है।

उन्नाव रेप पीड़िता के दर्द को बेचने के साथ उन्होंने अपनी इस कहानी की शुरुआती की है। साथ ही साथ यह भी बताया है कि लल्लू उन्हें ‘दीदी’ और वे उन्हें ‘अजय भैया’ के नाम से संबोधित करती हैं। आगे उन्होंने 40 साल के लल्लू (2017 में लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए थे) के बचपन और जवानी का संघर्ष बेचा है। आखिर में वे अपनी बस पॉलिटिक्स पर आती हैं। इस दौरान प्रियंका गॉंधी ने भरपूर कोशिश की है कि भावनाओं का डोज कम नहीं हो ताकि कोई वे सवाल नहीं पूछ सके जिसका वह जवाब नहीं देना चाहतीं।

ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जो मैनपुरी में फसल काटने को लेकर ठाकुरों के दो समूहों के विवाद को दलित की पिटाई बताकर परोस चुकी हैं। ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जिन्होंने बीते साल दिसंबर में लखनऊ में ड्यूटी कर रहीं महिला अधिकारी पर गला दबाने और जमीन पर गिराने का आरोप लगा दिया था। जबकि इस घटना के वीडियो में प्रियंका के साथ खड़े ‘गुंडे’ ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए थे।

जाहिर है प्रियंका गॉंधी का संवेदनाओं से कोई साबका नहीं है। उन्होंने भावनाओं के चूल्हे पर अपनी सियासी रोटी सेंकने की कोशिश की है।

ऐसी ही कोशिश उनके भाई राहुल गॉंधी ने 20 जनवरी 2013 को किया था। पार्टी उपाध्यक्ष बनने पर जयपुर में कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए राहुल गॉंधी ने भावना से सराबोर 38 मिनट का एक भाषण दिया था। ‘सत्ता जहर है’ वाले इस मशहूर भाषण पर उस समय मीडिया लहालोट हो गई थी।

लेकिन ये 2020 का भारत है। मेनस्ट्रीम मीडिया के प्रोपेगेंडा को हर कदम पर तार-तार करने के लिए एक पैरलेल मीडिया है। ऐसे में प्रियंका गॉंधी अपनी ही इमोशनल अत्याचार में उलझी नजर आतीं हैं। कहानी के अंत में उन्होंने लिखा है, “अजय लल्लू उस भारत के सच्चे नागरिक हैं जिसके लिए महात्मा गॉंधी ने लड़ाई लड़ी थी। वे इंसाफ के हकदार हैं। उनके साथ न्याय होना चाहिए।” यकीनन ये महात्मा गॉंधी का भारत है और कॉन्ग्रेस के कुकर्मों का इंसाफ भी कर रही है।

‘भारत के बेटे’ की हत्या पर राजनीति न करे कॉन्ग्रेस: अजय पंडिता की बेटी ने शशि थरूर को लताड़ा

कश्मीर में पिछले दिनों सरपंच अजय पंडिता की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। इस मामले को सियासी रंग देने की कोशिश करने पर पंडिता के परिजनों ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को जमकर सुनाया है।

दिवंगत अजय पंडिता की बेटी नियंता ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को कहा कि कॉन्ग्रेस को भारत के बेटे (son of India) की हत्या पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके पिता की हत्या पर राजनीति करने की जरूरत नहीं है। उनका परिवार किसी से कुछ नहीं माँग रहा। उन्हें बस इंसाफ चाहिए।

रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए नियंता ने कहा, “मैं इस मामले का राजनीतिकरण करने की आवश्यकता समझ नहीं पाई। उन्होंने अपने नाम के साथ भारती शब्द इसलिए जोड़ा था क्योंकि वह देश के साथ जुड़ना चाहते थे, न कि किसी राजनीतिक दल के साथ।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं राजनीति को लेकर अभी अनजान हूँ। लेकिन मुझे जो पता है वो यह कि मेरे पिता ने जो कुछ भी किया वह राजनीति के लिए नहीं था। हम न्याय चाहते हैं और कुछ नहीं।”

अजय पंडिता की बेटी के अलावा उनके पिता ने भी बेवजह मामले का राजनीतिकरण करने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की निंदा की। उन्होंने कहा, “शशि थरूर क्या जानते हैं? अजय ने इस देश के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया है। उनका बयान पूर्ण रूप से गलत है। हम न्याय चाहते हैं। राजनीतिक नेतृत्व इस घटना को तोड़-मरोड़कर पेश करेगा, लेकिन हम न्याय चाहते हैं।”

क्या बोला था शशि थरूर ने?

अजय पंडिता की हत्या के बाद कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने इस पूरे मामले को कॉन्ग्रेस पर हमला करार दिया था। थरूर ने लिखा था, “धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के लिए खड़े होने के लिए कश्मीर से केरल तक कॉन्ग्रेसियों की हत्या की जा रही है। संदेश साफ है- कॉन्ग्रेस मुक्त भारत।”

अनुपम खेर ने दिया शशि थरूर को जवाब

इस ट्वीट के बाद बॉलीवुड कलाकार अनुपम खेर ने भी उन्हें आड़े हाथों लिया और पूछा कि आखिर उनकी सोच के साथ क्या हो गया है। उन्होंने लिखा, “प्रिय, शशि थरूर!! आप एक शिक्षित व्यक्ति हैं। आपकी सोच को क्या हो गया है? इस परिदृश्य में जब एक आतंकवादी कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी को मारता है, तो वह एक भारतीय को मार देता है। राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होता। घुमा फिराकर बात करने का क्‍या तरीका है!! संगत का इतना बुरा असर!!”

बता दें, 8 जून को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के लोकभवन लरकीपोरा में सरपंच अजय पंडिता की गोली मारकर हत्या की गई थी। पुलिस ने बताया था कि सोमवार (08 जून, 2020) की शाम करीब 6 बजे कुछ आतंकवादियों ने 40 वर्षीय सरपंच अजय पंडिता उर्फ भारती को गोली मार दी। घटना को अंजाम देकर आतंकवादी मौके से फरार हो गए थे। घटना को उस समय अंजाम दिया गया था कि जब सरपंच अपने बागान में थे।

उनकी हत्या के बाद आतंकवादियों को चेतावनी देते हुए नियंता ने कहा था, “तुझे क्या लगता है, तूने अजय भारती को मारा है। उनका शेर अभी जिंदा है। जिंदा नहीं छोड़ूँगी तुम्हें। एक गोली तो मारुँगी मैं उसे, सिर्फ एक गोली जाएगी मेरी तरफ से उसे। मेरे पापा मुझे शेरा बुलाते थे और मैं हूँ वो। मैं किसी से नहीं डरती। सामने बोल रही हूँ कि जिसने भी मेरे पापा के साथ ऐसा किया है, उसकी गर्दन हाथ में पकड़कर ऐसे तोड़ूँगी न कि उसकी रुह तक काँपनी चाहिए।”

बंगाल: शवों के साथ बर्बरता वाले वीडियो पर गवर्नर ने माँगा जवाब, कहा- घिनौने तरीके से दुखी हूँ

पश्चिम बंगाल में शवों को घसीटने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के बाद मामले का संज्ञान लेते हुए राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य के मुख्य सचिव और गृह सचिव से जवाब माँगा है।

मामले पर शुक्रवार (12 जून, 2020) को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ट्वीट कर कहा, “मैं उस घिनौने तरीके से दुखी हूँ, जिसमें 14 शवों को सड़क पर घसीटा गया था। मैंने मुख्य सचिव और गृह सचिव को पत्र लिखा है। गृह सचिव ने जवाब दिया है। उनकी प्रतिक्रिया इस तरह की है जैसे इस जगह पर प्रोटोकॉल लागू नहीं था।”

राज्यपाल ने आगे लिखा कि सवाल तो यह है ही की ये मौतें कोरोना से हुई हैं या नहीं। जिस तरह से शवों को घसीटा गया, ये देखकर मुझे पीड़ा हो रही है।

आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में एक श्मशान घाट पर कुछ शवों को जलाने के दौरान इलाके में बदबू फैल गई थी। इस पर स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई और विरोध के साथ हंगामा करने लगी। इसके बाद नगर निगम के कर्मचारियों ने अधजली लाशें घसीटते हुए गाड़ी में भरी।

इस अमानीय घटना का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो गया। हालाँकि प्रशासन ने इससे इनकार किया है। सोशल मीडिया पर आए वाडियो में आप देख सकते हैं कि कर्मचारी कोलकाता में गारिया शवदाह गृह में रखे शवों को हुक से घसीटते हुए बाहर खड़ी गाड़ी में फेंक रहे हैं।

इस मामले को लेकर मचे हंगामे के बाद अब राज्य प्रशासन में हड़कंप मच गया है। वहीं ममता सरकार ने दलील दी कि शव कोरोना पीड़ितों के नहीं थे। कोलकाता पुलिस ने भी कहा कि शव कोरोना पीड़ितों के नहीं थे, कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

गौरतलब है कि बंगाल में अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण के कुल 9768 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि कुल 442 मौतें हो चुकी हैं।

रायबरेली की MLA अदिति सिंह ने कॉन्ग्रेस के Whatsapp ग्रुप भी छोड़े, ट्विटर पर पहले ही मिटा चुकी हैं पार्टी का नाम

उत्तर प्रदेश के रायबरेली से कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने शुक्रवार (जून 12, 2020) को पार्टी के सभी व्हॉट्सअप ग्रुपों को छोड़ दिया। रिपब्लिक भारत ने सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है।

इससे पहले अदिति सिंह ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से कॉन्ग्रेस का नाम हटा दिया था और उसकी जगह उन्होंने अपना हैंडल @AditiSinghRBL कर लिया था। उनके ट्विटर से INC (Indian National Congress) हटाते ही ट्विटर ने अदिति के आईडी से ब्लूटिक हटा दिया था।

इस दौरान , अदिति सिंह ने अपने सोशल मीडिया की प्रोफाइल से कॉन्ग्रेस के नाम सहित राहुल और सोनिया गाँधी की फोटो भी हटा दी थी। विधायक के इस तेवर के बाद माना जा रहा था कि वह अब पार्टी से जल्दी ही किनारा कर सकती हैं।

इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपना ट्विटर प्रोफाइल और बॉयो बदला था। इसके कुछ महीनों बाद मध्य प्रदेश में बड़ा सियासी उलटफेर हुआ और कमलनाथ सरकार गिर गई थी।

अब उसी तरह कॉन्ग्रेस के गढ़ रायबरेली सदर की विधायक भी अलग राह चुनती दिख रही हैं। अदिति सिंह की इस कवायद को कहीं न कहीं उनकी पार्टी से बगावत से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें पिछले कुछ समय से अदिति सिंह और कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच सब ठीक नहीं चल रहा।

पिछले दिनों ये खबरें भी आईं थीं कि अदिति सिंह को कॉन्ग्रेस ने महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया गया है। नवंबर में अदिति की विधायक की सदस्यता खत्म करने को लेकर भी कॉन्ग्रेस ने यूपी विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को नोटिस दिया गया था। अदिति ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने का भी समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने गाँधी जयंती पर पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए यूपी विधानसभा के विशेष सत्र में हिस्सा लिया था, जिसके बाद उन्हें नोटिस भी भेजा गया था। हालाँकि कॉन्ग्रेस विधायक ने नोटिस को ठेंगा दिखा दिया था।

लॉकडाउन के दौरान कॉन्ग्रेस और योगी सरकार में बसों की सियासत गर्म हुई तो अदिति सिंह का ट्वीट चर्चा का विषय बना। इसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार पर सवाल खड़े किए थे। इस पूरे मामले में विधायक अदिति सिंह ने योगी सरकार के रुख का समर्थन किया था।

अदिति सिंह ने ट्वीट कर लिखा था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

इसके अलावा उन्‍होंने एक और ट्वीट में लिखा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें, तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”