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अफवाहों ने एक बार फिर बांद्रा पर इकट्ठा की हजारों मजदूरों की भीड़, सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियाँ

मुंबई के बांद्रा में एक बार फिर हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों का जमावड़ा दिखाई दिया। बताया जा रहा है कि गरीब मजदूरों की ये भीड़ एक बार किसी अफवाह का शिकार हुई, जहाँ इन्हें किसी ने ये बता दिया कि बांद्रा स्टेशन से बिहार जाने के लिए ट्रेन चलने वाली है।

हालाँकि, प्रवासियों की भीड़ देखकर, वहाँ इस बात को एक बार दोबारा स्पष्ट किया गया कि ये ट्रेन, विशेष ट्रेन है, जो केवल पंजीकृत मजदूरों को लेकर उनके गृह राज्य जाएगी। इसके अलावा ऐसे लोगों को सफर करने की अनुमति नहीं है, जिन्होंने न तो श्रमिक सूची में अपना रजिस्ट्रेशन कराया है और न ही उनके नाम कोई टोकन जारी किया गया। लेकिन, बावजूद इस स्पष्टीकरण के मजदूर ट्रेन में जगह मिलने की आस में डटे रहे।

इंडिया टीवी की खबर के अनुसार, बांद्रा पर ये भीड़ सुबह 9 बजे से लगनी शुरू हुई थी। पहले पुलिस को इतनी भारी मात्रा में इकट्ठा हुए लोगों की सूचना नहीं थी। मगर, जैसे ही स्टेशन पर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ने की खबर मिली और लोग भारी मात्रा में दिखाई दिए, उन्होंने फौरन एक्शन लेकर भीड़ को तितर-बितर किया।

इसके बाद, दोपहर 12 बजे तक भीड़ दोबारा स्टेशन पर जमा हुई और स्थिति पुलिस प्रशासन से हाथ से निकलती दिखाई दी। पुलिस ने इस दौरान बल का भी प्रयोग किया, जिसके कारण कई मजदूरों को चोटें आई।

रिपोर्ट की मानें, तो आज बांद्रा स्टेशन से 12 बजे बिहार के लिए छूटने वाली ट्रेन में कई ऐसे मजदूर चढ़कर चले गए हैं, जिनके पास टोकन भी नहीं था। क्योंकि टोकन वाले लोग तो रेलवे स्टेशन पर ही छूटे अपना टोकन दिखाते नजर आए।

रिपोर्ट में ये भी बताया गया कि कुछ प्रवासियों का वहाँ ये भी कहना है कि उन्हें लोकल पुलिस की ओर से फोन गया। कॉल में उन्हें बताया गया कि उनके लिए सुविधा उपलब्ध करवा दी गई है, बस वे कल (यानी आज सुबह) स्टेशन पर आ गएँ। मजदूरों का कहना है कि इसी कॉल के कारण वे लोग स्टेशन पर इकट्ठा हुए।

बता दें, स्टेशन के बाहर इस समय भी काफी अफरा-तफरी का माहौल है और पुलिस लोगों को घर जाने की अपील कर रही है। वहीं सीएसटी स्टेशन पर भी लोगों के इकट्ठा होने की सूचना है। सोशल मीडिया पर लोग उद्धव सरकार को टैग कर-करके एक ही बात पूछ रहे हैं कि आखिर राज्य के सामने विकट परिस्थितयाँ होने के बावजूद भी वह ऐसी स्थिति कैसे पैदा होने दे सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने 14 अप्रैल को भी लॉकडाउन के पहले चरण में रेलवे स्टेशन पर मजदूरों की ऐसी भारी भीड़ इकट्ठा हुई थी। उस समय भी उन्हें तितर-बितर करने के लिए प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। मगर, बाद में जाँच में खुलासा हुआ था कि वो सब एक सुनियोजित ढंग से नियमों को तोड़ने का प्रयास था। जिसके आरोप में विनय दुबे को गिरफ्तार किया गया था। विनय दुबे ने ही सरकार को सोशल मीडिया के जरिए धमकाया था और प्रवासी मजदूरों को पद यात्रा के लिए भड़काकर इकट्ठा किया था।

फैज़ल सिद्दीकी का TikTok अकाउंट सस्पेंड: एसिड अटैक वाले वीडियो पर कहा- मैं तो पानी पी रहा था, लड़की अपना आर्ट दिखा रही थी

चाइनीज सोशल मीडिया एप्लीकेशन टिक-टॉक (TikTok) पर एसिड अटैक का महिमामंडन करने वाले फैज़ल सिद्दीकी का अकाउंट बैन कर दिया गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने ट्विटर पर इसकी सूचना दी। उन्होंने बताया कि उनके कार्यालय को टिक-टॉक (TikTok) की तरफ से सूचित किया गया है कि फैज़ल सिद्दीकी का अकाउंट सस्पेंड हो गया है। इसके बाद दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर बग्गा समेत अन्य लोगों ने भी रेखा शर्मा को धन्यवाद दिया।

फैज़ल सिद्दीकी के फिलहाल टिक-टॉक (TikTok) पर 1.35 करोड़ फॉलोवर्स हैं। कम्पनी ने जानकारी दी है कि बार-बार ‘कम्युनिटी गाइडलाइन्स’ का उल्लंघन करने के कारण फैज़ल सिद्दीकी के अकाउंट को सस्पेंड किया गया है। फैज़ल ‘टीम नवाब’ का सदस्य है।

उधर फैज़ल सिद्दीकी ने अपने एसिड अटैक वाले टिक-टॉक (TikTok) वीडियो को लेकर सफाई दी है। सिद्दीकी ने कहा कि ये एक अधूरा वीडियो है और वो किसी भी प्रकार से एसिड अटैक का महिमामंडन करने के पक्ष में नहीं हैं। अपने इंस्टाग्राम पर लिखे लम्बे-चौड़े पोस्ट में फैज़ल ने कहा कि एक वीडियो का सिर्फ़ आधा भाग दिखा कर ऐसा दावा किया जा रहा है कि वो एसिड अटैक को प्रमोट कर रहे हैं। फैज़ल ने लिखा:

“जैसा कि आप देख रहे हैं, मुझ पर एसिड अटैक को प्रमोट करने का इल्जाम लगाया जा रहा है। जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। अगर आप वीडियो के पहले भाग को देखेंगे तो पाएँगे कि मैं तो पानी पी रहा था। आप समझने की कोशिश कीजिए। भला एसिड कौन पीता है? जो लड़की वीडियो में दिख रही है, वो एक प्रोफेशनल मेकअप कलाकार हैं। मैंने पहले भी उसके साथ वीडियो बनाया है। ये तो उसके आर्ट को दिखाने का एक तरीका भर है। उसका एसिड अटैक से कुछ लेनादेना नहीं है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें ग़लतफ़हमी के कारण निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि एक महीने पुराने वीडियो को लेकर अभी हल्ला क्यों हो रहा है? उन्होंने इसे ‘यूट्यूब बनाम टिक-टॉक’ से जोड़ कर देखते हुए कहा कि ये व्यथित करने वाला है। उन्होंने लिखा कि वो एक ‘सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ होने के नाते माफ़ी माँगते हैं, अगर किसी को भी इस वीडियो के जरिए दुःख पहुँचा हो तो। इस इंस्टाग्राम पोस्ट पर भी लोगों, ख़ासकर महिलाओं ने फैज़ल सिद्दीकी की आलोचना की।

फैज़ल सिद्दीकी ने इंस्टाग्राम पोस्ट लिख कर अपनी बात रखी

बता दें कि वायरल वीडियो में फैज़ल लड़की से कहता है- “उसने तुम्हें छोड़ दिया, जिसके लिए तुमने मुझे छोड़ा था?” इसके बाद लड़की के चेहरे पर एक लिक्विड फेंका जाता है और उसका चेहरा पूरा जल जाता है। उसने एसिड अटैक को प्रमोट किया था। इस मामले में फैज़ल सिद्दीकी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है। वकील अभिषेक राजपूत ने एफआईआर की कॉपी ट्विटर पर शेयर की थी। एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल ने भी फैज़ल पर निशाना साधा था।

इसके अलावा चाइनीज सोशल मीडिया ऐप टिक-टॉक (TikTok) पर रेप के महिमामंडन का वीडियो भी वायरल हो रहा है। टिक-टॉक (TikTok) पर वायरल हुए इस वीडियो में दो लड़के अपने कपड़े पहन रहे हैं, पैंट की चेन लगा रहे हैं और दूसरी तरफ एक लड़की रोती हुई दिखती है। लड़की भी अपने कपड़े सही कर रही होती है।

$30 लाख के वेंटिलेटर्स भारत को डोनेट करेगा अमेरिका: डोनाल्ड ट्रम्प ने की थी घोषणा, PM मोदी ने दिया धन्यवाद

अमेरिका ने भारत को 200 मोबाइल वेंटिलेटर्स देने का फ़ैसला लिया है। इन सबको एयरलिफ्ट कर के भारत लाया जाएगा। हर एक वेंटिलेटर्स की क़ीमत क़रीब 10 लाख रुपए है। कहा जा रहा है कि वेंटिलेटर्स की ये खेप मई के अंत तक या जून के शुरूआती हफ्ते में भारत पहुँच सकता है। अगर ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट को हटा दें तो प्रत्येक वेंटीलेटर की क़ीमत $13,000 है, यानी 9.6 लाख रुपए के क़रीब। ट्रांसपोर्टेशन को हटा कर इनकी कुल क़ीमत $26 लाख है, यानी 19.2 करोड़ रुपए। ये डोनेशन के रूप में आएगा

पत्रकार सीमा सिरोही और सुहासिनी हैदर जैसों ने सोशल मीडिया पर सवाल दाग कर भ्रम फैलाया था कि ये वेंटिलेटर्स मुफ्त में दिए जाएँगे या फिर भारत को इसे ख़रीदने के लिए भुगतान करना पड़ेगा। दरअसल, अमेरिका ये साफ़ कर चुका है कि ये वेंटिलेटर्स भारत आ रहे हैं। इसके बाद दोनों ने भी स्वीकार किया कि भारत को कोई शुल्क नहीं देना पड़ेगा। इससे पहले विदेश मंत्रालय से स्पष्टीकरण की माँग की जा रही थी। दरअसल, कुल मिला कर लगभग $30 लाख के वेंटिलेटर्स अमेरिका से डोनेशन के रूप में भारत आएँगे।

ख़ुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इन वेंटिलेटर्स को भारत भेजे जाने की घोषणा ट्विटर के माध्यम से की थी। उन्होंने इसे दोनों देशों के क़रीबी रिश्ते और साझी भागीदारी के रूप में प्रस्तुत किया था। अब जब देश में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या 1 लाख के पार हो गई है और 3167 लोग इस ख़तरनाक संक्रमण की वजह से अपनी जान गँवा चुके हैं, ऐसे में अमेरिका से आने वाली वेंटिलेटर्स के लिए ये सबसे उचित समय है। ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका इस महामारी के वक़्त भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूती से खड़ा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने जानकारी दी थी कि वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया में भी दोनों देश साथ मिल कर काम कर रहे हैं। ट्रम्प ने कहा था कि भारत और अमेरिका साथ मिल कर ‘अदृश्य दुश्मन’ को हराने में कामयाब होंगे। इसके कुछ ही देर बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने ट्रम्प ने अमेरिका में प्रवासी भारतीय समुदाय द्वारा दिए जा योगदान की चर्चा करते हुए फ़रवरी में हुए अपने भारत दौरे का भी जिक्र किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना ‘अच्छा दोस्त’ करार दिया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी डोनाल्ड ट्रम्प को धन्यवाद देते हुए इन आपदा के समय राष्ट्रों द्वारा विश्व को स्वस्थ बनाने के लिए साथ मिल कर काम करने पर बल दिया था। ट्रम्प ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन को कोरोना लड़ने में गेमचेंजर करार दिया था और भारत से इसके एक्सपोर्ट पर लगे प्रतिबन्ध को हटाने की अपील की थी। इसके बाद अमेरिका को भारत से ये दवा मिली थी।

सुरजेवाला ने नेपाल की तस्वीर को भारत की बता फैलाया झूठ, लोगों ने कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा का कर दिया फैक्ट चेक

इस समय पूरा देश कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी इस समय भी झूठी और फर्जी खबरें फैलाकर ओछी राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी इस समय देश के विभिन्न हिस्सों में फँसे प्रवासी मजदूरों को घर पहुँचाने को लेकर राजनीति करने में मशगूल है और इसी राजनीति की आड़ में वो अपना फेक प्रोपेगेंडा भी चला रही है।

कॉन्ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मोदी सरकार को नीचा दिखाने के लिए मंगलवार (मई 19, 2020) अपने ट्विटर अकाउंट से एक तस्वीर शेयर किया। उन्होंने इस तस्वीर को कैप्शन दिया, “न्यू इंडिया का सच!” इस तस्वीर में एक महिला अपने बच्चे को पीठ पर बाँधे साइकल से जा रही है।

सुरजेवाला इस फोटो के माध्यम से ये दिखाना चाह रहे थे कि भारत में ऐसी स्थिति आ गई है कि अब महिलाओं को इस तरह से अपने घर जाना पड़ रहा है। सुरजेवाला यह संदेश देना चाह रहे थे कि राज्यों में प्रवासियों को अपने घर जाने में किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मगर उसका झूठ कुछ ही देर में खुलकर सामने आ गया और फिर सुरजेवाला को ट्वीट डिलीट करते भी देर नहीं लगी, क्योंकि उनका झूठ पकड़ा जा चुका था।

रणदीप सुरजेवाला के ट्वीट करते ही लोगों ने बता दिया कि यह तस्वीर भारत का नहीं, बल्कि नेपाल के नेपालगंज का है। वो भी 2014 का। यूजर्स ने न्यू इंडिया में रणदीप सुरजेवाला का झूठ लिखकर इसका खुलासा किया और साथ ही यह भी सवाल किया कि क्यों कॉन्ग्रेस नेपाल की पुरानी तस्वीर का इस्तेमाल करके भारत को शर्मिंदा करना चाहती है?

झूठ का खुलासा होते ही लोगों ने उन्हें आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया। एक यूजर ने लिखा कि फर्जीवाड़े का दूसरा नाम ही कॉन्ग्रेस है।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “भाई ये लोग तो बिल्कुल ही मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। कभी नेपाल की तो कभी बांग्लादेश की फोटो को इंडिया की बता कर राजनीति कर रहे है और एक चमचा है एनडीटीवी वाला वो कुंभ मेले की तस्वीर को प्रियंका गाँधी के द्वारा भेजी बसे की तस्वीर बता कर सोशल मीडिया पर झूठ बोलने लगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले सुरजेवाला ने छत्तीसगढ़ की एक तस्वीर शेयर करते हुए कहा था, “मोदी जी, इन्हीं को जहाज़ में बिठाने का सपना बेचा था ना!” हालाँकि जिस तस्वीर को पोस्ट कर के सुरजेवाला, PM मोदी से सवाल कर रहे थे, वो उनकी ही पार्टी यानी, कॉन्ग्रेस शासित राज्य छत्तीसगढ़ की निकली।

तस्वीर की सच्चाई सामने आने के बाद लोगों ने रणदीप सुरजेवाला से इसे डिलीट ना करने की बात कही थी। बता दें कि सुरजेवाला ने जो तस्वीर शेयर की थी, उसमें एक व्यक्ति को एक बच्चे को ट्रक की छत पर चढ़ाते हुए देखा जा सकता है।

इससे पहले ‘दलित कॉन्ग्रेस’ नाम के ट्विटर एकाउंट से एक ऐसी तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी पीठ पर बूढ़ी महिला को ले जाते हुए देखा जा सकता है। कॉन्ग्रेस के इस ट्विटर अकाउंट में बताया गया है कि यह कॉन्ग्रेस का SC विभाग है। हालाँकि, बाद में खुलासा हुआ कि जिस तस्वीर को कॉन्ग्रेस के ये एकाउंट शेयर कर रहे थे, वो बांग्लादेशी रोहिंग्याओं की थी।

कौन हैं 1947 में POK से विस्थापित हुए 5300 परिवार? जिन्हें सरकार ने J&K का स्थाई निवासी बनाने का दिया आदेश

जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के अन्य राज्यों में POJK विस्थापितों को केंद्र शासित प्रदेश (J&K) की सरकार ने उनकी पहचान वापस लौटाने का ऐतिहासिक फैसला लेते हुए डोमिसाइल सर्टिफिकेट (प्रोसिजर) रूल्स, 2020 की अधिसूचना सोमवार (मई 18, 2020) को जारी कर दी। अब इसी के जरिए प्रमाण पत्र पाने वाले लोगों को राज्य में नौकरी व अन्य सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

जम्मू-कश्मीर नॉउ के मुताबिक, सरकार के डिजास्टर मैनेजमेंट, रिलीफ रीहैबिलिटेशन एंड रीकंस्ट्रक्शन, की ओर से दिए गए आदेश के बाद अब करीब 5300 परिवारों को सरकार जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवासी होने का प्रमाण देगी। ये सभी परिवार यहाँ से 1947 में विस्थापित हुए थे।

इसके अलावा, सरकार ने 1989 के बाद कश्मीर घाटी से विस्थापित उन सभी हिंदू परिवारों को प्रदेश का स्थाई निवासी होने का प्रमाण पत्र जारी करने का फैसला भी किया है, जो प्रदेश से निकलकर देश के अन्य हिस्सों में बस गए। मगर, उनके बच्चों या परिवार के अन्य सदस्यों को राज्य का स्थाई निवासी होने का प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया।

इसका मतलब साफ है कि रिलीफ एंड रीहैबिलिटेशन कमिश्नर के पास रजिस्ट्रेशन कराने से चूँकने वाले विस्थापित परिवारों को भी इस आदेश में जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी बनने के लिए मौका दिया जा रहा है।

गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत अधिकार और जम्मू-कश्मीर नागरिक सेवा अधिनियम, 2010 के नियमों के तहत डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा। डोमिसाइल प्रमाणपत्र के आवेदन के लिए प्रारूप भी जारी कर दिया गया है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन के प्रवक्ता रोहित कंसल के मुताबिक, जिन लोगों के पास राज्य विषय प्रमाण पत्र है, वे स्वचालित रूप से अधिवास प्रमाण पत्र प्राप्त करेंगे। वहीं, विस्थापित कश्मीरी पंडित जो पंजीकृत नहीं हैं, वे स्थाई प्रमाणपत्र होने पर भी अधिवास प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते हैं।

जम्मू-कश्मीर में 15 साल तक निवास करने वाले व्यक्ति या फिर 7 साल तक पढ़ाई करने वाले को भी डोमिसाइल सर्टिफिकेट (Domicile certificate) जारी किया जाएगा। प्रदेश में पढ़ाई करने वाले के लिए शर्त यह है कि संबंधित व्यक्ति ने जम्मू-कश्मीर के शिक्षण संस्थानों से कक्षा 10 वीं या 12 वीं की परीक्षा भी दी हो।

जम्मू-कश्मीर में 10 साल तक सेवा करने वाले केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के बच्चे, अखिल भारतीय सेवा, बैंक और पीएसयू, वैधानिक निकाय और केंद्रीय विश्वविद्यालय के अधिकारी भी इसके लिए पात्र होंगे। डोमिसाइल प्रमाणपत्र के लिए जो भी व्यक्ति तय शर्तें पूरी करेगा, उसे सक्षम प्राधिकारी प्रमाणपत्र जारी करेगा।

जैसे, जारी निर्देशों के अनुसार, आवेदक को प्रमाण पत्र पाने के लिए राशन कार्ड, शिक्षण रिकॉर्ड आदि पेश करने होंगे। 15 साल जम्मू-कश्मीर में रहे व्यक्ति के बच्चों के मामले में भी तहसीलदार सक्षम प्राधिकारी रहेगा।

वहीं, विस्थापितों को डोमिसाइल प्रमाणपत्र राहत और पुनर्वास आयुक्त माइग्रेंट जारी करेंगे। व केंद्रीय विभागों या संस्थानों के कर्मचारियों के बच्चों को डोमिसाइल प्रमाणपत्र सामान्य प्रशासनिक विभाग के अतिरिक्त सचिव या डिवीजनल कमिश्नर कार्यालयों में अतिरिक्त कमिश्नर जारी करेंगे।

कौन हैं 5300 पीओजेके से विस्थापित हुए परिवार?

साल 1947 में आजादी व भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद 22 अक्टूबर 1947 को राजा हरिसिंह द्वारा भारत के अधिमिलन करने के फैसले से पहले पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला बोला था। इस हमले के बाद उन्होंने कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया था। उस दौरान करीब 50 हजार परिवार विस्थापित हुए।

इनमें से अधिकांश परिवार तो जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में जाकर बस गए थे। मगर, 5300 ऐसे परिवार थे जो देश के अन्य हिस्सों में बसे और करीब 72 साल तक आर्टिकल 35ए और आर्टिकल 370 के कारण इन्हें अपना अधिकार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा।

ऐसे में पिछले साल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 35ए और आर्टिकल 370 हटने के बाद नई डोमिसाइल पॉलिसी बनाई गई। इस नई नीति के तहत 37,000 पीओजेके विस्थापित परिवारों को तो स्थाई निवासी मान लिया गया जो 1947 या फिर 1971 में विस्थापित होकर जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग राज्यों में बसे थे। लेकिन, इस फैसले में वे 5,300 परिवार छूट गए थे। इसी कारण अब इन परिवारों को भी डोमिसाइल प्रमाण पत्र देने का फैसला करके सरकार ने परिवारों को स्थाई नागरिकता देकर उनकी 73 वर्ष पुरानी माँग को पूरा किया।

कोरोना संकट में भी सरकार का साथ देती नजर आई जनता, विपक्ष उलझा रहा राजनीति में

इतिहास में संभवत: यह पहला अवसर है, जब पूरा संसार एक महामारी से त्रस्त होकर ठप पड़ा है। ऐसी आपदा में जहाँ देश के नागरिकों का व्यवहार राष्ट्रीय चरित्र की झलक देता है, वहीं राजनीतिक दलों, सामाजिक व धार्मिक संगठनों एवं समाज के उच्च पायदान पर बैठे व्यक्तियों के कार्य व आचरण समाज को दिशा देकर चेतना व आत्मबल ​का संचार करने में सहायक होते हैं।

पर दुर्भाग्य यह है कि जनता की ओर से इस महामारी से निपटने में जितनी समझदारी, संयम और सहयोग मिला है, विपक्षी राजनीतिक दलों की ओर से उतना ही असंवेदनशील एवं असहयोगी रूख रहा है।

ऐसे समय में जब एकजुट होकर जनता के साथ खड़े रहकर, सरकार द्वारा इस महामारी से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों में सहयोग देकर और एक राजनीतिक दल के रूप में अपने तंत्र का प्रयोग जन समस्याओं को दूर करने के​ लिए होना चाहिए था, तब अधिकांश विपक्षी दल राजनीतिक बयानबाजी और जनता में भ्रम फैलाने का काम करते रहे।

लोकतंत्र की शक्ति अक्षुण्ण रखने और लोकतंत्र के उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक है कि आपद काल में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों दलीय विसंगतियों से ऊपर उठकर साथ मिलकर दलीय तंत्र का उपयोग जनहित व जनता के संकट को दूर करने में करें।

पर, दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसा करने के ​बजाय अनेक विपक्षी दल निंदा व टाँग खिंचाई में अधिक व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। जबकि यह समय सरकार व जनता के साथ खड़े होकर सुझाव देने और दलतंत्र के बजाय समाज-तंत्र बनकर जनता की पीड़ा को कम करने में अधिकाधिक योगदान देने का है।

वैसे उत्तर प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, असम और उत्तर-पूर्व के राज्यों ने इस महामारी से निपटने में तत्परता व सकारात्मक कदम उठाए हैं, उससे कॉन्ग्रेस व उन अन्य दलों को सीखना चाहिए जिनका उद्देश्य जनता की सहायता के बजाय केवल और केवल छुद्र राजनीति रहा।

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रकार दूसरे प्रांतों के 13 लाख से अधिक श्रमिकों को लाकर उनके घर तक पूरी सतर्कता, राशन व आवश्यक वस्तुएँ देकर पहुँचाया, वह सराहनीय है।

योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में योगदान देने के लिए जिस प्रकार कमर कसी है और संकट के इस अवसर को राज्य के विकास व जनता के कल्याण का अवसर बनाने का प्रयास कर रहे हैं तथा अन्य राज्यों से आए प्रवासी श्रमिकों के लिए उत्तर प्रदेश में ही 50 लाख रोजगार सृजन की दिशा में कार्यरत हैं, वह प्रशंसनीय है।

इसी प्रकार भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई ने भी जिस प्रकार पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं को लगाकर जरूरतमंदों तक भोजन, मास्क व अन्य सहायता निरंतर पहुँचा रही है तथा प्रवासी श्रमिकों के लिए शिविर लगाकर उनकी सहायता कर रही है, वह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल की सार्थकता को प्रकट करती है।

यद्यपि लोकतंत्र की इस दलीय व्यवस्था का पक्ष आशा की किरण भी दिखाता है। विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल होने की जिम्मेदारी पूरी गंभीरता से निभाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने लॉकडाउन में देशभर में गरीबों, जरूरतमंदों व आपद स्थिति में फँसे श्रमिकों, परिवारों को भोजन पहुँचाने का अभिनंदनीय कार्य सफलतापूर्वक किया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने लॉकडाउन की घोषणा करने के साथ ही मार्मिक अपील की थी कि सक्षम व समर्थ लोग अपने आसपास के गरीबों, मजबूरों, मजदूरों और प्राणियों की चिंता करें, जिससे कि न तो कोई मनुष्य भूखा रहे और न ही पशु-पक्षी।

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के निर्देश पर 18 लाख भाजपा कार्यकर्ता लॉकडाउन की अवधि में देश भर में लोगों की सेवा कर रहे हैं। भाजपा ने अब तक दो करोड़ जरूरतमंद परिवारों को भोजन सामग्री वाला राशन किट और 6 करोड़ से अधिक परिवारों को भोजन के पैकेट वितरित किए हैं।

इसके अतिरिक्त भाजपा विभिन्न राज्यों से अपने गृह प्रांतों को जा रहे श्रमिकों व उनके परिवारों के लिये मार्ग में भोजन व अन्य आवश्यक वस्तुओं को पहुँचा रही है, साथ ही प्रवासी श्रमिकों के लिए शिविर लगा रही है।

भाजपा ने ‘फीड द नीडी’ (जरूरतमंद को भोजन कराएँ) कार्यक्रम चलाकर सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि देश के किसी भाग में कोई व्यक्ति लॉकडाउन में भूखा न रहे तथा इस कार्यक्रम के अंतर्गत 10 करोड़ लोगों को हाथ से बने फेस मास्क प्रदान किए जा रहे हैं।

साथ ही भाजपा ने अंबेडकर जयंती पर झुग्गी-झोपड़ियों में ‘मेरी बस्ती, कोरोना मुक्त बस्ती’ अभियान चलाया। इस अभियान के अंतर्गत भाजपा ने देश के सभी मंडलों में न्यूनतम दो गरीब बस्तियों के सभी घरों में महीने के भोजन सामग्री की किट बाँटी।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहते थे, “राजनीति की धारा बदलनी होगी। प्रदर्शनात्मक राजनीति का मार्ग उचित नहीं है। जनतंत्र की सफलता और दल की सफलता के लिए सामान्य जन का कल्याण ही उद्देश्य होना चाहिए।” उन्होंने कहा है, “राजनीतिक दल का उद्देश्य ‘इदं न मम्’ अर्थात समाज के दीन, दलित, वंचित, जरूरतमंदों के प्रति ममत्व की भावना की प्रतिबद्धता होनी चाहिए, जिससे समाज के कल्याण के मार्ग में परिवर्तन किया जा सके।”

जनसंघ से भाजपा तक पहुँचने की यात्रा के पथ में राजनीतिक दल के रूप में भाजपा की राजनीति का मूल उद्देश्य यही रहा है। कोरोना महामारी के इस आपद काल में भाजपा ने यह देखे बिना कि राज्य में उसके दल का शासन है या नहीं, जिस प्रकार सरकार व प्रशासन का साथी बनकर जनता का दुख हरने में योगदान दिया है, वह दीनदयाल के उसी मंत्र इंद न मम् का प्राकट्य व प्रतिबद्धता है।

अच्छा यह होता कि अन्य राजनीतिक दल भी इस आपद काल में आरोप-प्रत्यारोप का दौर छोड़कर एकाकार होते। यदि ऐसा होता तो आज श्रमिकों के पलायन से दारूण दृश्य उत्पन्न हुए हैं और और इस समस्या के समाधान के बजाय भड़काने व भ्रमित करने की जो राजनीति हो रही है, उससे बचा जा सकता था।

मोदी सरकार द्वारा श्रमिकों को उनके गृह राज्य पहुँचाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाई गई हैं, किंतु दुर्भाग्य से संवेदनहीन राजनीति का कुचक्र इसमें भी प्रवेश कर गया है। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र राजस्थान, दिल्ली आदि प्रदेशों में जिस प्रकार प्रवासी श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार व अव्यवस्था हुई है तथा इन प्रदेशों की सरकारों ने जिस प्रकार संकट काल में ओछी राजनीति कर श्रमिक ट्रेनों की व्यवस्था का लाभ प्रवासी श्रमिकों तक पहुँचाने में न केवल असहयोग किया है, बल्कि प्रवादों के माध्यम से श्रमिकों को प्रदेश को छोड़ने के लिए अमानवीय परिस्थितियाँ उत्पन्न की, वह लोकतंत्र की दलीय व्यवस्था के उद्देश्यों के विरुद्ध है।

एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना महामारी को परास्त करने में भारत को विश्व का नेतृत्वकर्ता बनाने के साथ ही आत्मनिर्भर भारत के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को स्थापित कर एक शक्तिशाली व समर्थ राष्ट्र का भव्य प्रासाद निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं तो वहीं विपक्ष के राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी बनती है कि कोरोना संकट से निपटने में ओछी राजनीति के बजाय जनता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करें।

भारत का लोकतंत्र आशा के प्रकाश में उजाले की ओर बढ़ता रहा है तो यह अपेक्षा अनुचित नहीं होगी कि अब तक जो हुआ वो हुआ, पर अब आगे सभी राजनीतिक दल मिलकर राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य के पथ में सहायक बनेंगे।

बीवी से मसालेदार झालदार सब्जी के लिए कर ली मार, बालकनी से कूद आत्महत्या का किया प्रयास

कोरोना वायरस को देखते हुए पूरे देश में लॉकडाउन जारी है। देशव्यापी लॉकडाउन का चौथा चरण 18 मई से शुरू हो गया है और इस बार 2 हफ्तों तक लगाया है जो कि 31 मई को समाप्त होगा। इस दौरान आम लोगों से लेकर सेलेब्स सब अपने घरों में बंद हैं। 

इस बीच सोशल मीडिया पर कई चौंकाने वाली खबरें सामने आती रहती हैं। ऐसी ही एक खबर अहमदाबाद से सामने आई है। जहाँ मसालेदार सब्जी बनाने को लेकर पति-पत्नी में झगड़ा हो गया जिसके बाद पति बालकनी से लटक कर आत्महत्या करने का प्रयास किया।

इस घटना एक वीडियो भी सामने आया है। वीडियो में आप देख सकते हैं कि बहुमंजिला बिल्डिंग के बालकनी में वह शख्स कैसे लटका हुआ है। वह काफी देर तक ऐसे ही लटका रहा। जिसके बाद परिजनों ने जैसे-तैसे उसे ऊपर ​खींचा और उसकी जान बचाई। उस बिल्डिंग के नीचे भी काफी लोग जमा हो गए थे। वो उस शख्स को ऐसा नहीं करने के लिए कह रहे थे।

जानकारी के मुताबिक मामला अहमदाबाद के चांदखेड़ा का बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि यह घटना चांदखेड़ा के केशव अपार्टमेंट में हुई थी। दोनों पति-पत्नी चांदखेड़ा में निम्न आय वर्ग (LIG) के एक फ्लैट में रहते हैं।

चंदखेड़ा के पुलिस निरीक्षक बीके गामर ने बताया, “यह तीन से चार दिन पुरानी घटना है। घटना की कोई शिकायत या आवेदन पुलिस स्टेशन में नहीं किया गया है। यह पति-पत्नी के बीच की लड़ाई थी। पति को खाना अधिक मसालेदार चाहिए था। इसी बात को लेकर पति-पत्नी में काफी देर तक बहस होती रही और फिर पति ने गुस्से में आकर बालकनी से नीचे कूदने की धमकी दी।”

उन्होंने आगे कहा कि चूँकि अभी तक इस घटना को लेकर किसी प्रकार की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, इसलिए मामले में इससे अधिक जानकारी उलब्ध नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों गोरखपुर में एक मजदूर ने तीन मंजिला इमारत की रेलिंग से लटककर आत्महत्या करने का प्रयास किया था, क्योंकि उसकी पत्नी ने उसे कोरोना वायरस महामारी के कारण घर नहीं लौटने की सलाह दी थी।

हालाँकि संयोग से स्थानीय लोगों ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया और फिर पुलिस ने मौके पर पहुँच कर उसकी जान बचा ली। घटना का एक वीडियो भी सामने आया था। वीडियो में पुलिस को एक युवक को रेलिंग से लटकते हुए देखा गया।

भीम आर्मी ने मंदिर पर किया हमला, हिन्दू देवताओं की पूजा करने पर हमें मारा-पीटा: दलित परिवार का आरोप

बिहार के किशनगंज में एक परिवार ने आरोप लगाया है कि हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करने और भगवा ध्वज में आस्था रखने के कारण ‘भीम आर्मी’ ने न सिर्फ़ उन पर हमला किया बल्कि स्थानीय मंदिर में भी तोड़फोड़ मचाई। उधर ‘भीम आर्मी’ की भी स्थानीय यूनिट ने उक्त परिवार के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है। इस मामले में दोनों ही पक्ष दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। ख़ुद को दलितों का संगठन बताने वाले ‘भीम आर्मी’ का मुखिया चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ ‘रावण’ है।

चंद्रशेखर ‘आजाद समाज पार्टी’ का गठन कर के राजनीति में भी कूद चुका है। दिसंबर में उसने अपने राजनितिक दल का गठन किया था। उसी महीने उसे सीएए विरोधी प्रदर्शन में हिंसा फैलाने का आरोप में गिरफ़्तार भी किया गया था। दिल्ली पुलिस ने उसके ख़िलाफ़ ये कार्रवाई की थी। ‘भीम आर्मी’ पर कई मौकों पर हिंसा भड़काने के आरोप लग चुके हैं। किशनगंज वाली घटना मई 13, 2020 की है। सबसे पहले जानते हैं कि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी एफआईआर में क्या आरोप लगाए हैं।

क्या कहना है ‘भीम आर्मी’ का?

‘स्वराज्य मैग’ में प्रकाशित स्वाति गोयल शर्मा की ख़बर के अनुसार, भीम आर्मी की तरफ से 27 वर्षीय दीपचंद रविदास ने मामला दर्ज कराया है। वो ‘भीम आर्मी एकता मिशन’ का टाउन अध्यक्ष है। उसका आरोप है कि 13 मई को साढ़े 3 बजे ठाकुरबाड़ी रोड मंदिर के पास उस पर तलवार से हमला बोल दिया गया। उसका ये भी आरोप है कि जब उसकी बहन उसे बचाने आई तो हमलावरों ने उसकी बहन पर भी हमला किया।

उसने कुल 8 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराई है। इनमें से 7 दलित हैं, जबकि एक अमित त्रिपाठी उर्फ़ चिंटू सामान्य वर्ग का है। पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट सहित कई अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है। आरोपितों में 55 वर्षीय ग्यानी राम और उनके चार में से तीन बेटे भी शामिल हैं। उनके नाम हैं- संतोष, श्याम और वीरेंद्र राम। कहा गया है कि घटना के समय वहाँ पुलिस का एक जवान भी मौजूद था।

मंदिर पक्ष का क्या कहना है?

28 वर्षीय संतोष राम ने भी दिलीप चंद राम सहित 4 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। संतोष का बयान कहता है कि 13 मई को साढ़े 4 बजे कुछ लोग स्थानीय शिव मंदिर के भीतर घुस गए और जम कर तोड़फोड़ मचाने लगे। शिव मंदिर के बगल में ही संतोष का घर भी है। उनका आरोप है कि लोहे की छड़ें, ईंटें और पत्थर लेकर मंदिर में घुसे हमलावरों ने मंदिर को वहाँ से हटाने की माँग की। साथ ही उन्होंने पवित्र शिवलिंग को भी तोड़ डालने की कोशिश की।

संतोष का कहना है कि जब उनके परिवार ने इस पर आपत्ति जताई तो उन पर भी हमला किया गया और हत्या का प्रयास किया गया। प्राथमिकी में दर्ज बयान के अनुसार, हमलावरों ने संतोष के पिता, बहनों और भाइयों पर हमले किए। चार लोगों सहित कुछ अज्ञात के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में सेक्शन 295 (धार्मिक स्थल में तोड़फोड़) भी लगाया गया है।

क्या कहती है पुलिस?

इस मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी अरविन्द कुमार यादव ने ‘स्वराज्य मैग’ की स्वाति गोयल शर्मा से बातचीत करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के दो-दो लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में दोनों ही पक्षों द्वारा प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती है। उन्होंने बताया कि अब जाँच के बाद ही पूरी सच्चाई सामने आएगी। यादव ने बताया कि जाँच चल रही है। इससे आगे उन्होंने इस मामले के सम्बन्ध में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।

वीरेंद्र राम का क्या कहना है?

वीरेंद्र राम के दो घायल भाई संतोष और गुड्डू फ़िलहाल हॉस्पिटल में हैं और उनका इलाज चल रहा है। उन्होंने ‘भीम आर्मी’ के आरोपों को नकारते हुए कहा कि सबसे पहले उन पर और उनके परिजनों पर हमला हुआ। उन्होंने बताया कि हमलावर किसी तरह उनसे पहले प्राथमिकी दर्ज कराने में सफल रहे। उन्होंने बताया कि भीम आर्मी के लोग हमेशा उनकी हिन्दू पूजा-पद्धति में आस्था का मजाक बनाते हैं। उनका भाजपा को वोट देना भी उनलोगों को पसंद नहीं आता। वीरेंदर ने बताया:

“वो बार-बार कहते हैं कि तुमलोग भी ‘भीम आर्मी’ में शामिल हो जाओ। वो कहते हैं कि हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करना बंद करो और बाबासाहब भीमराव आंबेडकर की पूजा करो। हमने उन्हें कितनी बार बताया कि बाबासाहब के प्रति हमारी पूर्ण श्रद्धा है। वो हमारे क़ानूनी भगवान हैं जबकि हमारे सांस्कृतिक भगवान तो हमेशा श्रीराम और हनुमान ही रहेंगे। जब हम ऐसा कहते हैं तो वो हमें गालियाँ बकते हैं। 10 मई को भी वो मंदिर में घुस कर भगवा ध्वज उखाड़ फेंकने को कह रहे थे।”

वीरेंद्र कहते हैं कि उन्होंने तो सार्वजनिक रूप से उनलोगों का समर्थन भी किया था क्योंकि वो भी उनके ही ‘समाज’ के हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि तुम्हें ये दिखाना पड़ेगा कि तुम ‘झूठे भगवानों’ में विश्वास नहीं रखते हो और इसके लिए तुम्हें ये शिवलिंग तोड़ना पड़ेगा। इसके बाद वीरेंद्र गुस्से में वहाँ से निकल गए। उन्होंने कहा कि अगर यही शर्त है तो वो उनलोगों का कभी समर्थन नहीं कर सकते। उन्होंने बताया कि 14 अप्रैल को मंदिर के बगल में ही अम्बेडकर जयंती मनाई गई, जहाँ दूसरे मजहब के कई लोगों को भी बुलाया गया था।

वीरेंदर बताते हैं कि जब लोगों ने भीम आर्मी को कम्युनिटी रूम में अम्बेडकर जयंती मनाने को कहा तो वो लोग गुस्सा हो गए और कहने लगे कि मंदिर में लगी सभी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की जगह अम्बेडकर की प्रतिमा लगाओ। बकौल वीरेंद्र, उनलोगों ने गाली-गलौज शुरू कर दिया, जिसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया। वीरेंद्र का कहना है कि उन्हें सिर्फ़ उनकी धार्मिक आस्था के लिए मारा-पीटा गया है। उन्होंने अमित त्रिपाठी पर लगे एससी-एसटी एक्ट पर भी दुःख जताया।

उन्होंने बताया कि अमित ने ही उनके घायल भाइयों को अस्पताल पहुँचाया था। वीरेंद्र बताते हैं कि अमित का इस झगड़े से कोई लेनादेना नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके रिश्ते-नाते में भी कुछ लोग ‘भीम आर्मी’ से जुड़े हुए हैं।

आलिया सिद्दीकी से दोबारा हो गई हूँ अंजना किशोर पांडे: नवाजुद्दीन की बीवी ने भेजा तलाक का नोटिस

बॉलीवुड में अपने किरदार में दम भरने के कारण पहचान बनाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी के पारिवारिक जीवन को लेकर आई खबर ने कल (मई 18, 2020) सबको हैरान कर दिया।

दरअसल, बॉम्बे टाइम्स ने सोमवार शाम को बताया कि नवाजुद्दीन को उनकी पत्नी आलिया की ओर से लीगल नोटिस भेजा गया है। जिसके मुताबिक अब वह नवाज से तलाक व मेंटेनेंस चाहती हैं।

बॉम्ब्से टाइम्स से बात करते हुए नवाज की पत्नी ने कहा, “कई बाते हैं जो मैं इस वक्त पब्लिक में नहीं लाना चाहती। लेकिन हम दोनों के बीच प्रॉब्लम्स की शुरुआत शादी के तुरंत बाद करीब दस साल पहले ही शुरू हो गई थीं।”

आलिया ने बताया, “2 महीने के लॉकडाउन ने उन्हें आत्ममंथन के लिए काफी वक्त दे दिया। शादी में सेल्फ-रिस्पेक्ट काफी जरूरी है। वो मेरी खत्म हो चुकी है, मेरे पास नहीं बची है। मुझे ऐसे महसूस करवाया गया जैसे मैं कुछ हूँ ही नहीं। मैंने हमेशा अकेला महसूस किया।”

आलिया के मुताबिक नवाज का भाई शमास भी इन सबके पीछे एक वजह है। उनका कहना है, “मैंने वापस अपना नाम अंजना किशोर पांडेय कर लिया है। मैं नहीं चाहती कि कोई बार-बार ये याद दिलाए कि मैं किसी और की पहचान का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रही हूँ।”

आलिया ने कहा कि उन्होंने फिलहाल भविष्य के बारे में ज्यादा नहीं सोचा है। जो होगा देखा जाएगा। लेकिन वह यह शादी अब और नहीं चाहतीं। समझौते का कोई सवाल ही नहीं। इतना ही नहीं आलिया अपने दोनों बच्चों की कस्टडी भी चाहती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने बच्चों को बड़ा किया है और अपने पास रखना चाहती हैं।

वहीं आलिया के वकील ने बॉम्बे टाइम्स को बताया, “हमने नवाज सिद्दीकी को 7 मई को ईमेल व व्हॉट्सअप के जरिए लीगल नोटिस भेजा है। लॉकडाउन के कारण हम उसे पोस्ट नहीं कर सकते थे। हमारी मुअक्किल श्रीमती सिद्दकी ने भी उन्हें नोटिस भेजा है। पर अभी तक उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया। नोटिस में मेंनटेंनेंस और डायवोर्स की बात है। हालाँकि हम यह नहीं बता सकते कि नोटिस में क्या है क्योंकि आरोप काफी गंभीर हैं और सिद्दीकी के परिवार के लिए यह संवेदनशील मामला है।”

बॉम्बे टाइम्स के मुताबिक, उन्होंने इस संबंध में नवाजुद्दीन के घर वालों से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन वे फिलहाल इन बातों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं।

गौरतलब है कि नवाजुद्दीन को लेकर खबरे हैं कि वे इस समय उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना में पहुँचे हुए हैं। उनके भाई का कहना है कि वे अपनी माँ को घर छोड़ने आए हैं। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि वे वहाँ ईद मनाने गए हैं।

बता दें कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मुंबई से यूपी तक जाने के लिए प्रशासन से जरूरी परमिशन ली थी। नवाज के भाई शमास सिद्दीकी ने इस परमिशन की एक कॉपी भी सोशल मीडिया पर शेयर की है।

उन्होंने ट्वीट कर रहा है कि उनकी मां काफी बीमार हैं और इसलिए उनका परिवार मुंबई से सफर करके होम टाउन पहुँचा है। परमिशन लेटर में भी लिखा है कि नवाज का परिवार स्वास्थ्य कारणों से सफर कर रहा है।

ऑटो और कार से मजदूरों को घर भेजेंगी प्रियंका गाँधी… 1000 बसों की सूची में ब्लैकलिस्ट किए गए वाहन भी

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी के कार्यालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को उन बसों की लिस्ट भेजी थी, जो पार्टी के मुताबिक वो मजदूरों के लिए मुहैया कराने वाली हैं। अब बसों की सूची में भी नया घपला सामने आ रहा है। प्रियंका गाँधी की तरफ से बसों की जो सूची भेजी गई है, उसमें ऑटो रिक्शा तक के नंबर हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मजदूरों को कॉन्ग्रेस ऑटो से सैकड़ों किलोमीटर भेजेगी? कॉन्ग्रेस ने दावा किया था कि श्रमिकों के लिए बसों की लिस्ट भेज दी गई है और अब यूपी सरकार पर है कि वो आगे का काम करें।

कॉन्ग्रेस ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से पूछा था कि इन बसों को कहाँ और किस समय पहुँचाना है, इस सम्बन्ध में बताया जाए। सोशल मीडिया पर काफ़ी यूजर्स ऐसा दावा कर रहे थे कि इन बसों की सूची में कई ऑटो के नंबर भी हैं।

ऑपइंडिया ने इस दावे की पुष्टि के लिए सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की ‘वाहन’ वेबसाइट पर प्रियंका गाँधी द्वारा जारी सूची में से एक गाड़ी के नंबर को ‘Vehicle Registration Status‘ विकल्प में जाकर चेक किया। हमने पाया कि गाड़ी संख्या UP83T1006 बजाज ऑटो लिमिटेड की एक तिपहिया गाड़ी है। स्पष्ट लिखा है कि ये एक ऑटो रिक्शा है, जो मोहम्मद इरशाद के नाम पर पंजीकृत है। ‘वाहन’ वेबसाइट पर हमें उस नंबर के ये डिटेल्स मिले:

सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की वेबसाइट पर गाड़ी के रजिस्ट्रेशन डिटेल्स

जबकि कॉन्ग्रेस का दावा है कि उसने बसों की सूची के साथ-साथ चालक एवं परिचालकों की लिस्ट भी यूपी सरकार को भेज दी है, जो कभी भी सेवा देने के लिए तैयार हैं। कॉन्ग्रेस ने माँग की थी कि उत्तर प्रदेश सरकार जल्द ही इनका संचालन करे और इसकी समय-सारणी व रूट की जानकारी जनसाधारण को उपलब्ध कराए।

प्रियंका गाँधी वाड्रा के निजी सचिव संदीप सिंह ने उत्तर प्रदेश के गृह सचिव अवनीश अवस्थी को पत्र लिख कर गाड़ियों के डिटेल्स भेजे थे।

इतना ही नहीं, बसों के नंबर को खँगालने पर कार के डिटेल्स भी मिले हैं। उदाहरण के लिए सूची में RJ14TD1446 नामक एक गाड़ी भी शामिल है। जब इसका विवरण सर्च किया गया तो पाया गया कि ये भी किसी बस का नंबर नहीं है बल्कि ‘Chevrolet Beat’ नामक कार का नंबर है, जो राजस्थान के गजेंद्र सिंह के नाम पर रजिस्टर्ड है।

कई लोग इस बात से भी नाराज़ दिखे कि इन बसों की सूची में अधिकतर राजस्थान के हैं। लोगों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की आलोचना करते हुए कहा कि अगर सारे बस यूपी ही भेज दिए जाएँगे तो राजस्थान के मजदूरों को घर कैसे पहुँचाया जाएगा?

इसके अलावा कुछ ऐसे भी नंबर हैं, जो रजिस्टर्ड नहीं हैं, ‘वाहन’ पोर्टल पर उन्हें ब्लैकलिस्टेड बताया जा रहा है। ऐसे में ये देखना पड़ेगा कि अगर दिया गया नंबर सही है तो क्या वो अवैध रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है?

बसों की लिस्ट में ब्लैकलिस्ट किए गए नंबर भी

उधर मीडिया में प्रियंका गाँधी का अलग ही बयान चल रहा है। जहाँ एक तरफ उनके दफ्तर की ओर से 1000 बसों की सूची यूपी सरकार को भेजने का दावा किया गया है, वहीं दूसरी तरफ प्रियंका ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1000 बसों को भेजने की बात कहना न सिर्फ़ अमानवीय है बल्कि समय और संसाधन की बर्बादी भी है।

प्रियंका गाँधी ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश सरकार मजदूरों को उनके घर भेजने के लिए सक्रियता नहीं दिखा रही है।

इससे पहले एनडीटीवी के पत्रकार उमाशंकर सिंह ने एक फोटो से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की थी, जिसमें यूपी सरकार की ओर से कॉन्ग्रेस द्वारा भेजे जाने वाली बसों की खबर को उस फोटो के साथ शेयर किया गया, जिस फोटो को हम सभी ने पिछले वर्ष प्रयागराज में लगे कुंभ मेले में सबसे लंबी बस परेड का विश्व रिकॉर्ड बनने के दौरान देखा था।