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31 ऑटो, 69 एंबुलेंस/ट्रक या अन्य वाहन, 70 का डेटा नहीं: प्रियंका गाँधी के बसों में सामने आया फर्जीवाड़ा

कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार को भेजी गई 1000 बसों की सूची में बड़ा फर्जीवाड़ा निकल कर सामने आया है। प्रियंका द्वारा भेजी गई बसों की सूची में स्कूटर, आटो रिक्शा और तिपहिया वाहनों के साथ एंबुलेंस का नंबर भी शामिल है। इसकी पुष्टि एनआईसी द्वारा की गई।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इन वाहनों का सत्यापन आरटीओ लखनऊ से करवाया। जिसके बाद ये बात साफ हो गया कि प्रियंका गाँधी द्वारा भेजे गए बसों की सूची में से 31 ऑटो थे, 69 एंबुलेंस, ट्रक या फिर अन्य वाहन थे। इसके साथ ही 70 ऐसे वाहनों की लिस्ट दी गई थी, जिसका कोई डेटा ही उपलब्ध नहीं था।

उत्तर प्रदेश के अपर परिवहन आयुक्त (आईटी) विनय कुमार सिंह और लखनऊ के सम्भागीय परिवहन अधिकारी रामफेर द्वारा लिखे गए पत्र में इस बाबत जाननकारी दी गई है। उन्होंने इस संबंध में पत्र लिखते हुए बताया कि गृह विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा आज दिनांक 19.05.2020 को पूर्वाह्न में ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराई गई बसों की सूची सम्भागीय परिवहन अधिकारी, लखनऊ कार्यालय में जाँच कराई गई।

उपलब्ध कराई गई सूची की प्रारंभिक जाँच में कुल 492 वाहनों के विवरण का परीक्षण किया गया। परीक्षण के अनुसार 59 वाहनों की फिटनेस की वैधता की अवधि समाप्त पाई गई एवं 29 वाहनों के इंश्योरेंस समाप्त अथवा अनुपलब्ध पाए गए।

इसके अलावा 3 वाहनों के प्रकरण ऐसे पाए गएस जिनमें वाहन की पंजीकरण संख्या बसों की न होकर अन्य श्रेणी के वाहनों की है।

गौरतलब है कि इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार के लघु उद्योग मंत्री व प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने प्रियंका की भेजी लिस्ट सही नहीं होने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इसमें कई वाहनों के नंबर और डिटेल गलत है और बसों के बजाय दूसरे वाहनों के नंबर हैं।

सिद्धार्थनाथ सिंह ने लखनऊ में इस बारे में जानकारी देते हुए प्राथमिक आधार पर उपलब्ध वाहनों की सूची के बारे में बताते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस इस मौके पर भी अपनी नीयत से बाज नहीं आई और दी गई लिस्ट में कार, ट्रैक्टर, एंबुलेंस और स्कूटर जैसे वाहनों के नंबर हैं। सूची में जिन वाहनों के नंबर दिए गए हैं, उसमें अधिकतर ब्लैकलिस्टेड हैं।

सोमवार (मई 18, 2020) को यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने प्रियंका गाँधी को पत्र लिखकर बताया था कि सरकार ने प्रवासी मजदूरों के संबंध में उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। साथ ही उन्होंने बिना किसी देरी के एक हजार बसों और ड्राइवरों का विवरण माँगा था। 

…जब जेल में महात्मा गाँधी का बेटा और नाथूराम गोडसे की हुई मुलाकात, और फिर लिखना पड़ा उन्हें एक पत्र

‘गाँधी हत्या’ की घटना ने इस देश को नाथूराम गोडसे के नाम से परिचित करवाया। नाथूराम गोडसे आज ही के दिन वर्ष 1910 में महाराष्ट्र के पुणे के पास बारामती में जन्मे थे। एक व्यक्ति का हथियार, दूसरे व्यक्ति की असुरक्षा की भावना हो सकती है।

इसी तरह एक व्यक्ति का सत्य दूसरे व्यक्ति के लिए महज एक परिकल्पना हो सकती है। एक व्यक्ति की सभ्यता दूसरे व्यक्ति के लिए सभ्यता का संघर्ष हो सकता है और इस तरह से एक ही विषय पर दो लोगों की परिभाषाएँ या उनके हिस्से की वास्तविकताएँ भिन्न हो जाती हैं।

नाथूराम गोडसे विकसित समाज के न्याय की अपनी एक परिभाषा पर पहुँचे; वो अपने सही या गलत के फैसले की समझ के साथ मुक्त भी हो गए। लेकिन समाज आज तक भी उस एक विचार में उलझा हुआ है और इस जटिल विषय से मुक्त नहीं हो सका।

इतिहासकारों के अनुसार, नाथूराम गोडसे की बन्दूक से निकली महात्मा गाँधी पर दागी गई वो तीन गोलियाँ समाज के लिए एक अंतहीन जटिल परिभाषा दे गई और आज तक भी यह समाज इस परिमेय के निष्कर्ष तक पहुँच पाने में असफल ही रहा है।

नाथूराम गोडसे का पक्ष आज तक भी महात्मा गाँधी की मौत को ‘वध’ की संज्ञा (गोपाल गोडसे की पुस्तक ‘गाँधी वध क्यों’) देता है जबकि एक दूसरा वर्ग है जो आज तक ‘अहिंसा के महात्मा’ की हत्या के सदमे में नजर आता है। और अब यह अंतहीन विवाद बनकर रह गया है।

नाथूराम गोडसे की पहचान महात्मा गाँधी की मौत से जुड़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन गाँधी को विचार मानने वाले यह सत्य भी कभी स्वीकार नहीं कर सके कि जिस गाँधी को विचार साबित करने का प्रयास वो आज तक करते आ रहे हैं, उसी विचार की हत्या गाँधी की मौत से पहले कई बार मोहम्मद अली जिन्ना और स्वयं गाँधी के चहेते जवाहर लाल नेहरू कर चुके थे।

ऐसी ही कुछ बातें गोपाल गोडसे की पुस्तक ‘गाँधी वध और मैं’ में मिलती हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि गाँधी वध (करने वाला) यदि गँवार, स्वार्थी, भ्रमिस्ट होता तो गाँधी जी के नाम का व्यापार करने वाले दुखी अवश्य होते और फिर क्रुद्ध न होते।

गाँधी की मौत की खबर न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार में

गाँधी के विरोधाभास, जो अंत तक उनके साथ रहे

गाँधी की मृत्यु से जन्मा हर इतिहास विचारों और सिद्धांतों की मृत्यु का इतिहास ही माना जाता है, इसलिए यह जिक्र करना जरूरी है कि एक उदारवादी मोहम्मद अली जिन्ना का आजादी की लड़ाई के दौरान अचानक से कट्टरपंथी में तब्दील हो जाना भी कोई संयोग नहीं था। यह कोई छुपी हुई बात भी नहीं है कि किस तरह से खिलाफत आन्दोलन में महात्मा गाँधी के नजरिए से जिन्ना बेहद नाराज और असमंजस की स्थिति में थे।

वजह यह थी कि खिलाफत आंदोलन को मोहम्मद अली जिन्ना किसी भी तरह से राजनीतिक मुद्दा नहीं मानते थे। बावजूद इसके, जिन्ना ने इस मामले में दिलचस्पी जरूर ली, लेकिन जिन्ना इसका साथ देने से मुकर गए। मुस्लिमों के बड़े पैरोकार और प्रसिद्ध वकील मोहम्मद अली जिन्ना नहीं चाहते थे कि धर्म के मामले से राजनीति को जोड़ा जाए।

जिन्ना और गाँधी के व्यक्तित्व के विरोधाभास से अंग्रेज हुकूमत तक अच्छी तरह परिचित थी। जिन्ना को जहाँ वो एकांत प्रिय और बेहद होशियार जानती थी, वहीं महात्मा गाँधी के विचारों की अस्थिरता को वो भाँप चुके थे।

महात्मा गाँधी के विचारों के विरोधाभास का शिकार होने वाले एक या दो नाम नहीं थे। जिन्ना से शुरू हुआ यह सफर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तक जारी रहा। लेकिन भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के प्रति उनके मन में हमेशा ही एक स्नेह रहा। जबकि जिन्ना से लेकर नेताजी तक सब किनारे लगा दिए गए।

ऐसे भी कई उदाहरण हैं जब नेहरू से गाँधी का वैचारिक मनमुटाव रहा, लेकिन अन्य लोगों की तुलना में गाँधी ने खुद को कभी नेहरू से अलग भी नहीं पाया।

वहीं, कॉन्ग्रेस के भीतर मौजूद दक्षिणपंथियों को ठिकाने लगाने के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गाँधी की हत्या को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इसका सबसे पहला नतीजा तब देखने को मिला था जब वर्ष 1950 में दक्षिणपंथी विचारधारा के माने जाने वाले पुरुषोत्तम दास टंडन को हटाकर जवाहर लाल नेहरू स्वयं ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बन बैठे।

गाँधी जी की हत्या के ठीक अगले दिन महाराष्ट्र में हुई चितपावन ब्राह्मणों की हत्या ने ही इस बात की पोल खोलकर रख दी थी कि खुद कट्टर गाँधीवादी, गाँधी के सिद्धांतों के कितने करीब थे।

गोडसे ने भी गाँधी को फैसला लेने में असमर्थ व्यक्तित्व वाला बताया था। ‘गाँधी वध और मैं’ पुस्तक के अनुसार भी यही कहा गया है कि महात्मा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के लिए बहुत अच्छा काम किया था, लेकिन भारत आकर सही-गलत जैसे फैसले करने लगे थे। गोडसे का कहना था कि गाँधी खुद को न्यायाधीश मानते थे और इसी विचारधार के चलते वह दो रास्तों पर खड़े रहते थे।

वास्तव में जिस गाँधी के विचार को देश का प्रगतिशील वर्ग आज तक भुनाने की कोशिश करता आया है, उसकी हत्या पहले भारत के विभाजन में और उसके बाद प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस में महात्मा गाँधी की परिस्थितियों से पलायन के वक्त ही हो गई थी।

नाथूराम ने कहा कि इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते, या तो कॉन्ग्रेस को गाँधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गाँधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गाँधी के बिना आगे बढ़ना होता।

व्यक्तिगत कारणों से नहीं की थी हत्या

लेकिन गोडसे ने मौत के अपने आखिरी पलों तक भी गाँधी के प्रति द्वेष प्रकट नहीं किया। स्पष्ट था कि गाँधी पर गोडसे के बन्दूक तानने के पीछे उनके व्यक्तिगत कुछ नजरिए थे और गाँधी की मौत उन्हीं नतीजों की परिणति बना।

नाथूराम गोडसे से बरामद पिस्तौल

गोडसे ने गाँधी की हत्या को लेकर एक जरूरी कारण यह भी कहा था कि वो मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करते, क्योंकि उनकी नीतियाँ मुस्लिमों के पक्ष में थीं। गोडसे ने कहा, “लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूँ कि ये नीतियाँ केवल गाँधी की मौजूदगी के चलते ही थीं।”

गोपाल गोडसे की पुस्तक ‘गाँधी वध और मैं’ में ऐसे ही कई प्रसंग हैं, जिनमें जिक्र किया गया है कि गाँधी की हत्या पूर्ण रूप से एक राजनीतिक हत्या थी, ना कि किसी सत्ता की अभिलाषा या द्वेष का परिणाम।

गाँधी के बेटे से गोडसे की मुलाकात

नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की किताब ‘गाँधी वध और मैं’ में बताया गया है कि जब गोडसे संसद मार्ग थाने में बंद थे, तब उन्हें देखने और मिलने वहाँ कई लोग जाया करते थे। इन्हीं में से एक थे महात्मा गाँधी के बेटे देवदास गाँधी!

इस किताब के अनुसार, नाथूराम गोडसे ने उन्हें जेल की सलाखों से देखकर ही पहचान लिया था। उन्होंने देवदास गाँधी से कहा, “मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूँ। हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक। जहाँ गाँधी की हत्या हुई, मैं भी वहाँ मौजूद था। आज तुमने अपने पिता को खोया है। मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुँचा, इसका मुझे भी बड़ा दुख है। मेरा विश्वास करो, मैंने यह काम किसी निजी रंजिश के कारण नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव।”

देवदास ने तब पूछा, “तब, तुमने ऐसा क्यों किया?” जवाब में नाथूराम ने कहा, “केवल और केवल राजनीतिक वजह से।”

इस मुलाकात के बाद देवदास गाँधी ने नाथूराम को एक पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा, “आपने मेरे पिता की नाशवान देह का ही अंत किया है और कुछ नहीं। इसका ज्ञान आपको एक दिन होगा, क्योंकि मुझ पर ही नहीं संपूर्ण संसार के लाखों लोगों के दिलों में उनके विचार अभी तक विद्यमान हैं और हमेशा रहेंगे।”

गोपल गोडसे ने अपनी पुस्तक में इस बात का जिक्र किया कि देवदास गाँधी शायद इस उम्मीद में नाथूराम गोडसे से मिलने गए कि उन्हें कोई डरावनी शक्ल वाला, गाँधी के खून का प्यासा कातिल नज़र आएगा, लेकिन नाथूराम सहज और सौम्य थे। उनका आत्म विश्वास बना हुआ था, देवदास ने जैसा सोचा होगा, उससे एकदम विपरीत।

वास्तविकता से गाँधी का पलायन

जिन्ना की जिद और सर सैयद अहमद खान की परिकल्पनाओं ने भारत-पाकिस्तान बँटवारे को आखिरकार अंजाम दे डाला। देशभर में व्यापक स्तर पर दंगे हुए। इससे पहले यह देश मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के खिलाफ की गई ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ के रक्तरंजित इतिहास का गवाह देख चुका था।

लेकिन गाँधी जी ने अपनी निजी विचारधारा के सम्मुख धृतराष्ट्र बनना स्वीकार किया। इतिहासकारों की मानें तो गाँधी जी किसी भी तरह से विवाद को खत्म करना चाहते थे। यही वो समय था जब गाँधी जी ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि उसे पाकिस्तान को उसके हिस्से के 50 करोड़ रुपए का भुगतान करना चाहिए।

गाँधी जी ने अपनी परिचित शैली में इसके लिए भी आमरण अनशन शुरू कर दिया। आखिरकार उनकी जिद के आगे सरकार झुकी और पाकिस्तान को 50 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया।

नाथूराम गोडसे के साथ ही एक बड़े वर्ग ने मुस्लिमों द्वारा की गई विभीषिका को जानने के बाद गाँधी जी की इस जिद को बेहद गैर जरूरी माना था और इसके परिणाम भी तुरंत ही कश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद के रूप में तब दिखे थे, जो आज तक देखे जा रहे हैं।

गोडसे ने महसूस किया कि देशवासियों का पहला दायित्व हिंदुत्व और सिर्फ हिंदुओं के लिए होना चाहिए। वह मानते थे कि यदि 30 करोड़ हिंदुओं (तब) की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा की गई तो भारत अपने आप सुरक्षित होगा।

‘गाँधी वध और मैं’ में लिखा गया है कि जब आजीवन हिन्दू विचारों की पैरवी करने का दावा करने वाले महात्मा गाँधी ने मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा, तो गोडसे को लगा कि अब गाँधी नाम के विचार को शून्य हो जाना चाहिए। इसके आगे जो हुआ, वह सब इतिहास है।

इंदौर: फातिहा पढ़ने कब्रिस्तान गए यूनुस कबाड़ी पर हुई FIR तो विरोध में पत्थरबाजों ने बनाया पुलिस को निशाना

मध्य प्रदेश के इंदौर में लॉकडाउन के नियमों का उलंघन कर फातिहा पढ़ने कब्रिस्तान गए यूनुस कबाड़ी को गिरफ्तार करने गई पुलिस पर पत्थरबाजी का मामला सामने आया है। उसी शख्स को छुड़वाने सैंकड़ो की संख्या में ‘पुलिस हाय-हाय’ के नारे लगाते हुए समुदाय विशेष के लोग के थाने पहुँचे और पुलिस पर पत्थरबाजी की। यही नहीं, पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन करने महिलाएँ भी बड़ी संख्या में सड़क पर उतर आईं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने जब अपने बचाव में पिस्टल निकाली तो पथराव करने वाले युवक और महिलाएँ वहीं गलियों में छुप गए। पुलिस ने अब तक इस मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार किया है। पथराव की इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और इसके आधार पर पुलिस अब आऱोपितों की पहचान कर रही है।

मध्य प्रदेश के इंदौर में कोरोना की रोकथाम में जुटी पुलिस को समुदाय विशेष की भीड़ ने एक बार फिर पत्थरबाजी का निशाना बनाया है। इंदौर के रावजी बाजार इलाके में आज मंगलवार (मई 19, 2020) को पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंके गए।

दरअसल, यह मामला गत 15 मई से शुरू हुआ जब इस इलाके में रहने वाला मोहम्मद यूनुस उर्फ यूनुस कबाड़ी लॉकडाउन का पालन ना करते हुए कब्रिस्तान में फातिहा पढ़ने गया।

जब पुलिस को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने युनूस के खिलाफ बंद के नियमों का उल्लघंन करने पर केस दर्ज किया। धारा 188 के तहत केस दर्ज होने के बाद से से ही यूनुस कबाड़ी गायब हो गया था।

आज जब कुछ पुलिसकर्मी उसे गिरफ्तार करने गए तो यूनुस के पक्ष के लोगों ने पुलिस का विरोध शुरू कर दिया। पुलिस ने लॉकडाउन जारी होने की बात कह कर घरों में वापस जाने की अपील की तो लोग हंगामा करने लगे और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।

विरोध कर रहे लोगों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि वो ज्यादती कर रहे हैं। देखते ही देखते वहाँ पर बच्चे, युवक और महिलाओं की बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई।

ये देखकर पुलिस ने निकट के थानों से भी पुलिसबल बुलाया और कुछ ही देर में भीड़ ने पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। रावजी बाजार पुलिस पर हमले का यह वीडियो वायरल हो गया है।

इंदौर में लगातार हुए हैं पुलिस और डॉक्टर्स पर हमले

उल्लेखनीय है कि इंदौर मध्य प्रदेश का सबसे ज्यादा प्रभावित शहर रहा है। शुरुआत से ही इस इलाके में डॉक्टर और पुलिस के दलों पर पत्थरबाजी, थूकने और ह्म्मले के कई मामले सामने आते रहे हैं।

इससे पहले इंदौर के टाटपट्टी बाखल इलाके में डॉक्टर्स की टीम पर हमला किया गया था। रानीपुरा में भी कोरोना वारियर्स के साथ अभद्रता थूकने के मामले सामने आए थे।

इंदौर में आरोपित यूनुस कबाड़ी की गिरफ्तारी के विरोध में लोगों द्वारा पुलिस पर पथराव का वीडियो

कश्मीरी अलगावादी नेता का बेटा हिजबुल कमांडर जुनैद हुआ ढेर, पुलवामा का आतंकी तारिक शेख भी मारा गया

श्रीनगर के कानेमजार नवाकदल इलाके में भारतीय सुरक्षाबल को आतंकियों के ख़िलाफ़ शुरू किए गए एक ऑपरेशन में सफलता मिली है। यहाँ डाउनटाउन इलाके में सुरक्षाबलों ने हिजबुल मुजाहिद्दीन के 2 आतंकियों को मार गिराया है।

बड़ी खबर ये है कि इनमें से 1 आतंकी अलगाववादी संगठन तहरीक-ए-हुर्रियत के प्रमुख मोहम्मद अशरफ सहराई का बेटा जुनैद भी था। 

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी दिलबाग सिंह ने इस संबंध में सूचना देते हुए बताया, “कल रात के ऑपरेशन में, दो आतंकवादी मारे गए। उनकी पहचान श्रीनगर के जुनैद अशरफ खान (जुनैद सहराई) और पुलवामा के तारिक अहमद शेख के रूप में की गई है। जुनैद हुर्रियत के चेयरमैन मोहम्मद अशरफ खान का सबसे छोटा बेटा है।”

उल्लेखनीय है कि साल 2018 में जब मो अशरफ ने हुर्रित प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी की जगह पार्टी प्रमुख की जगह ली थी, उसी समय उनका बेटा भी जुमे की नमाज के बाद श्रीनगर से गायब हो गया था। इसके बाद उसकी तस्वीर सीधे सोशल मीडिया पर बंदूक के साथ नजर आई थीं।

कहा जा रहा है कि जुनैद हिजबुल मुजाहिद्दीन का शीर्ष कमांडर भी था। इसके अलावा उसने कश्मीर यूनिवर्सिटी से ही एमबीए की पढ़ाई की थी। लेकिन साल 2018 में आतंकी संगठन से जुड़ने के बाद वह काफी दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस एनकाउंटर के बाद सुरक्षाबल ने मौके से कई हथियार और गोला बारुद जब्त किए हैं। अधिकारियों ने बताया कि आतंकवादियों की गोलीबारी में सीआरपीएफ का एक जवान और जम्मू कश्मीर पुलिस का एक कर्मी जख्मी हुआ है।

पुलिस ने बताया कि आतंकवादियों की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने के बाद सोमवार (मई 18, 2020) रात को पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरू किया गया था, जिसके बाद मुठभेड़ शुरू हुई।

रियाज नायकू, ताहिर मोहम्मद भट, जुनैद सहराई (तस्वीर साभार: अमर उजाला)

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि आतंकियों के साथ मुठभेड़ देर रात करीब 2 बजे शुरू हुई थी। मगर, करीब 5 घंटे तक इस दौरान कोई गोली नहीं चली। इसके बाद सुबह करीब 8 बजे एक बार फिर आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ शुरू हो हुई। उन्होंने बताया कि एहतियात के तौर पर शहर में बीएसएनएल पोस्टपेड सेवा को छोड़ कर सभी मोबाइल इंटरनेट और सभी मोबाइल फोन सेवाएं बंद कर दी गई हैं।

गौरतलब है कि पिछले दो हफ्तों में कश्मीर में सुरक्षाबलों को कई बड़ी कामयाबी मिली है। 6 मई को जहाँ सुरक्षाबलों ने पुलवामा में हिजबुल के कश्मीर कमांडर रियाज नायकू को मार गिराया था। वहीं, इसके बाद 16 मई की रात हुए डोडा में हुए एनकाउंटर में खोत्रा गाँव में ताहिर के होने की सूचना मिली थी। जिसके बाद सुरक्षाबलों की कार्रवाई में 17 मई को वह भी मारा गया

जब श्रमिक ट्रेन में गर्भवती महिला को शुरू हुई प्रसव पीड़ा, रेलवे की सहायता से दुनिया में आई नन्ही जान

लॉकडाउन के कारण अलग-अलग राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों को केंद्र सरकार इस समय रेलवे की मदद से उनके गृह राज्य सकुशल भिजवाने के लिए श्रमिक ट्रेंने चलवा रही है।

ऐसे में सफर के दौरान इन यात्रियों को कोई दिक्कत न आए, इसके लिए रेलवे की ओर से इनका पूरा-पूरा ख्याल रखा जा रहा है। इस बात का ताजा उदाहरण 16 मई को हुई एक घटना भी है, जब श्रमिक ट्रेन में सफर करने के दौरान एक गर्भवती महिला को रेलवे के कारण नया जीवन मिला।

जी हाँ, वैसे तो आमतौर पर किसी भी महिला के जीवन में प्रसव एक ऐसा अनुभव होता है जिसमें भले ही स्त्री को असीम पीड़ा से गुजरना पड़े लेकिन वो उसका मलाल कभी नहीं करती। मगर सच यह भी है कि कई बार उचित स्वास्थ्य सुविधा न मिलने के कारण इस वेदना को झेलते हुए स्त्रियाँ अपनी जान तक गवाँ बैठती है।

कुछ ऐसी ही स्थिति 16 मई को 9 माह की गर्भवती फूलकुमारी के लिए बन पड़ी थी। वो भी तब, जब वह अहमदाबाद से गोंडा जाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यात्रा कर रही थी।

इस यात्रा के दौरान सब ठीक था, लेकिन जैसे ही गाड़ी कानपुर सेंट्रल के प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर रुकी। तो उसे अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। महिला की बिगड़ती हालत देखते हुए प्लेटफार्म नंबर 6 पर उपस्थित सीआईटी श्री बलिराम ने वाणिज्य निरीक्षक विजय शर्मा को उसकी हालत से अवगत कराया।

इसके बाद विजय शर्मा ने उपमुख्य यातायात प्रबंधक कानपुर से निर्देश प्राप्त कर फौरन महिला को प्लेटफॉर्म पर उतरवा लिया और रेलवे ने डॉक्टरों की मदद से महिला की सफल एवं सुरक्षित डिलीवरी कराने में संपूर्ण सहयोग दिया।

नतीजन माँ ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया व जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित बच गए। हालाँकि बच्ची के जन्म के बाद, महिला को 7:20 बजे कानपुर शहर के डफरिन अस्पताल में आगे की देखरेख के लिए सकुशल भेज दिया गया। जहाँ उनका पूरा ख्याल रखा गया।

इस वाकए का जिक्र करते हुए रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी अपने ट्विटर पर एक ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा, “रेलवे की सहायता से नन्हीं सी जान आई दुनिया में: अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए रेलवे ने आज तक अनेकों उदाहरण पेश किए हैं। कानपुर स्टेशन पर श्रमिक स्पेशल ट्रेन में जा रही महिला ने एक शिशु को जन्म दिया, जिन्हें रेलवे द्वारा समय पर सभी प्रकार की सहायता पहुँचाई गई।”

उल्लेखनीय है कि ये पहला मामला नहीं है। जब रेलवे में सफर करने के दौरान किसी महिला के लिए ऐसी स्थिति बनी हो, और रेलवे उसके लिए वरदान बना हो। फूलकुमारी की ही तरह पिछले साल एक अन्य महिला भी कोंकण कन्या एक्सप्रेस में सफर करते हुए प्रसव पीड़ा के कारण विचलित हो उठी थी। उस समय भी पीयूष गोयल ने जच्चा-बच्चा के सकुशल होने की खबर सोशल मीडिया पर दी थी और विषम परिस्थितियो में प्रसव कराने पर भारतीय रेलवे के सहयोग से संचालित होने वाली “1 रुपए क्लिनिक” को बधाई दी थी।

‘नीचता पर उतरे’ कॉन्ग्रेस IT सेल के गौरव पांधी, मालिनी अवस्थी ने कहा- ‘घिनौनी’ बातों का दें प्रमाण या कार्रवाई को रहें तैयार

कॉन्ग्रेस आईटी सेल के गौरव पांधी ने एक बार फिर से एक महिला को नीचा दिखाने काम किया है। दरअसल, कॉन्ग्रेस का राष्ट्रीय समन्वयक होने का दावा करने वाले पांधी ने इस बार लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी की पहचान और कमाई को लेकर उनके पति को नीचा दिखाने का काम किया है।

गौरव पांधी ने ट्वीट करते हुए लिखा, “यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी गरीब प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बीजेपी के शाखाब्वॉय की तरह की तरह काम कर रहे हैं। कहीं वो ऐसा इसलिए तो नहीं कर रहे क्योंकि उनकी पत्नी मालिनी अवस्थी ने यूपी सरकार के लिए सैकड़ों शो करती हैं और भाजपा से करोड़ों कमाती हैं? उनके बैंक अकाउंट स्टमेंट बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं होंगे!”

इस तरह से कॉन्ग्रेस आईटी सेल के समन्वयक ने एक महिला की अस्मिता और उनकी खुद की पहचान को बड़ी ही बेशर्मी के साथ तार-तार करने की कोशिश की। हालाँकि, मालिनी अवस्थी इस पर चुप नहीं बैठी और उन्होंने इसका करारा जवाब देते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी।

मालिनी अवस्थी ने गौरव पांधी पर करारा पलटवार करते हुए ट्वीट किया, “अपनी इस बात का प्रमाण दो या फिर वैधानिक कार्यवाही के लिए तैयार रहो गौरव पांधी। एक स्त्री के 48 वर्षों के परिश्रम को दुर्भावना से देखने वाले, तुम्हारी घिनौनी राजनीति के तरकश में तीर कम पड़ गए तो इस नीचता पर उतर आए? मेरे पति के चरित्र व ईमानदारी की मिसाल पूरे प्रदेश में दी जाती है।”

दरअसल, अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने सोमवार (मई 18, 2020) को प्रियंका गाँधी को पत्र लिखकर बताया कि सरकार ने प्रवासी मजदूरों के संबंध में उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। साथ ही उन्होंने बिना किसी देरी के एक हजार बसों और ड्राइवरों का विवरण माँगा था।

मगर प्रवासी श्रमिकों के नाम पर राजनीति करने वाली प्रियंका गाँधी ने जब बसों की लिस्ट भेजी, तो नया ही घपला सामने आया। प्रियंका गाँधी की तरफ से बसों की जो सूची भेजी गई है, उसमें ऑटो रिक्शा तक के नंबर हैं। प्रियंका की हुई इस फजीहत के बाद से सभी कॉन्ग्रेसी बिलबिलाए हुए हैं।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब गौरव पांधी ने किसी महिला के ऊपर इस तरह की टिप्पणी की हो। इससे पहले उन्होंने केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी को नीचा दिखाने की कोशिश में अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी का मजाक बनवा दिया था।

पांधी ने ट्विटर पर स्मृति ईरानी का मजाक उड़ाने की कोशिश करते हुए उन्हें भारत के इतिहास का सबसे ‘मूर्ख’ और ‘बेवकूफ’ सांसद बताया था। हालाँकि, स्मृति ईरानी की हाजिरजवाबी से राहुल गाँधी का ही मजाक बन गया था।

मैं तुम्हें ऑटो-रिक्शा और स्कूटर भेजूँगी, तुम उन्हें बस समझना: गाँधी (प्रियंका) 2.0

नेहरू जी ने इस देश को बसें दीं, लेकिन आजादी के इतने वर्ष बाद केंद्र की फासिस्ट सरकार ने उन बसों के साथ क्या किया? बसें ऑटो-रिक्शा में तब्दील कर दी गईं। जो नहीं बनीं, उन्हें बलपूर्वक कार और दुपहिया वाहन बना दिया गया।

यह सब इसी देश में हुआ है, ये बात और है कि यह कारनामा प्रियंका गाँधी वाड्रा ने किया है। लेकिन ध्यान देने की बात ये है कि ये सब तब हुआ जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार है और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार।

इंदिरा 2.0

हुआ ये है कि कोरोना महामारी के दौरान किसी भी तरह मीडिया में बने रहने की कोशिश में लॉकडाउन की वजह से कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने श्रमिकों के लिए 1000 बसों के संचालन के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से अनुमति माँगी थी। सीएम योगी ने इसकी ‘परमिशन’ भी दे दी।

लेकिन कॉन्ग्रेस द्वारा भेजी गईं इन बसों की सूची में कई बाइक, स्कूटर, ऑटो-रिक्शा और एम्बुलेंस के नंबर निकल आए हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की बेटी, जिन्हें इंदिरा-2.0 भी कहा जाता है, यानी प्रियंका गाँधी द्वारा जारी सूची में ऑटो-रिक्शा के साथ-साथ कई ऐसे वाहन भी हैं, जो ब्लैकलिस्टेड हैं।

जनता शॉक्स प्रियंका रॉक्स

कुछ लोग इसे चारा घोटाले की ही तर्ज पर किया जा रहा बस-घोटाला साबित करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह घोटाला नहीं बल्कि एक चमत्कार है। बसों की जगह ऑटो-रिक्शा बरामद होने से मीडिया, श्रमिक, सोशल मीडिया सभी लोगों में दहशत का माहौल है जबकि गाँधी परिवार ऐसे चमत्कारों का अभ्यस्त है।

आखिरी बार जब गाँधी परिवार ने कोई चमत्कार कर दिखाया था, तब प्रियंका के भाई राहुल गाँधी एक तरफ से आलू डालकर दूसरी तरफ से सोना निकाल रहे थे। अब अगर प्रियंका गाँधी एक तरफ से बस भेजकर दूसरी तरफ से मोटरसाइकिल, ऑटो-रिक्शा निकाल रही हैं तो फिर लोगों को इस से आखिर क्या समस्या है?

भाई-बहन

ऐसे चमत्कार कर दिखाने की यह प्रतिभा उसी सभ्यता की विरासत है, जिस सभ्यता की छुच्छी में कभी नेहरू जी ने आग लगाई थी। लेकिन गोदी मीडिया ने मन बना लिया है। गोदी मीडिया नहीं चाहती कि गाँधी परिवार अब किसी चमत्कार को अंजाम दे। यह चमत्कार की आवाज दबाने की फासीवादी ताकतों की साजिश नहीं तो फिर और क्या है?

कुछ दिन पहले ही आम आदमी के प्रायोजित प्रोपेगेंडाबाज ध्रुव राठी का कहना था कि भारत का दक्षिणपंथ रचनात्मक नहीं है और उसमें कल्पना की अच्छी क्षमता नहीं है। इसके साथ ही ध्रुव राठी ने लेफ्ट विंग को बेहद प्रतिभाशाली और रचनात्मक भी कहा था। वास्तव में प्रियंका गाँधी ने बसों को ऑटो-रिक्शा में तब्दील कर तुरन्त साबित कर दिया कि ध्रुव राठी गलत नहीं थे।

लालू ने तब किया था चमत्कार, जब ऐसा करना ‘कूल’ नहीं था

ऐसे समय में, जब दुनिया से चारा घोटाले की स्मृतियाँ धूमिल होने लगी थीं, प्रियंका गाँधी ने इस ऐतिहासिक काम को अपनी प्रेरणा बनाकर एक बेहतरीन संदेश दिया। यदि लोगों को ध्यान हो तो चारा घोटाले के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने यह कारनाम तब कर लिया था, जब ऐसा करना ‘कूल’ नहीं था।

लालू ने उस समय ट्रक के नंबर की जगह स्कूटर और मोपेड के नम्बर से फर्जी बिल डाले थे। लालू ने भैंसों और तमाम मवेशियों को स्कूटर और मोपेड आदि पर ढोकर भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘किफायती’ शब्द का आविष्कार किया था।

हालाँकि, लालू फिर भी लालू थे। लेकिन ऐसे में यदि प्रियंका गाँधी इस विरासत में नई जान फूँकने और इसे जीवित रखने का प्रयास कर रही हैं तो राष्ट्रवादी ताकतें उन्हें ऐसा करने से भला रोक क्यों रही हैं?

आज देश में भय का ऐसा माहौल है कि बसें खुद को रिक्शा बताने को मजबूर हैं। बसों को यह भय है कि बहुसंख्यक ऑटो-रिक्शा के बीच उनकी हर सीट का रंग तलाशा जाएगा। ऐसे में अगर बसें खुद को ऑटो-रिक्शा ना बताएँ तो करें क्या? बसों के साथ इस समय देशभर में जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखकर बस यही कहा जा सकता है कि –

रवीश कुमार जी वाह! KFC में बैठकर ...

भुज की मस्जिद से देर रात मुस्लिमों से हथियार उठाने की अपील करने वाले अब्दुल्ला लुहार को PASA के तहत जेल

मजाकुर ममद अब्दुल्ला लुहार नाम के एक शख्स को समाज-विरोधी गतिविधियों की रोकथाम (PASA) के तहत सूरत की लाजपोर जेल में भेज दिया गया। बता दें कि अब्दुल्ला लुहार को महीने की शुरुआत में भुज की एक मस्जिद में देर रात घुसने माइक से अजान देकर भड़काऊ अपील करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

गौरतलब है कि अब्दुल्ला लुहार 7 मई 2020 को इमाम-ए-रब्बानी नामक मस्जिद में देर रात करीब 2:30 बजे घुस गया और लाउडस्पीकर से असमय अजान दी। मस्जिद से बेवक्त अजान देकर अपील की गई, “मुस्लिमों अब जागो, हथियार उठाओ और अपने घर से बाहर आओ।”

लुहार ने अपील किया, “मैं कच्छ का राजा हूँ। मुस्लिमों को जाग जाना चाहिए और हथियार उठाकर अपने घरों से बाहर आना चाहिए।” इसकी जानकारी मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुँचकर उसे गिरफ्ताार कर लिया।

स्वराज्य इंटर्न हर्षिल मेहता के अनुसार, बाद में उसके खिलाफ आईपीसी और महामारी रोग अधिनियम की धारा 153, 153A / B, 188, 504, 269 और 270 के तहत FIR दर्ज की गई थी।

घटना को लेकर ताजा जानकारी देने के लिए स्थानीय कच्छ क्राइम ब्रांच ने 14 मई 2020 को एक बयान जारी किया था। इसमें कहा गया था कि कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर लॉकडाउन जारी होने के बावजूद, मजाकुर ममद अब्दुल्ला लुहार ने मस्जिद में प्रवेश किया और माइक्रोफोन पर बेवक्त अजान दिया और सांप्रदायिक कलह को भड़काने की कोशिश की।

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प्रेस विज्ञप्ति में आगे कहा गया है कि लुहार ने लोगों को बाहर आने और संक्रमित होने के लिए उकसाया था और इसलिए उसके खिलाफ समाज विरोधी गतिविधियों (PASA) के तहत मामला दर्ज किया गया है। साथ ही उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया था। क्राइम ब्रांच ने बताया कि आरोपित को सूरत की लाजपोर जेल भेज दिया गया है।

Press release by Local Crime Branch, Kutch, image shared by @MehHarshil on Twitter

गौरतलब है कि देश में कोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम के लिए जारी लॉकडाउन में किसी भी स्थान पर लोगों का एकत्र होना प्रतिबंधित है। धार्मिक स्थलों पर भी जुटान की मनाही है।

कई राज्यों में स्थानीय प्रशासन कोरोना के प्रति मुस्लिम समुदाय में जागरुकता फैलाने के लिए मस्जिद के मौलवियों और इमामों के साथ समन्वय बनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में बिना समय के अजान देना सांप्रदायिक हिंसा को भड़का सकता है।

Zee न्यूज़ के एंकर अमन चोपड़ा ने मौलाना को सिखाया ‘धर्मनिरपेक्षता’ का पाठ, एक तरफा तहजीब कब तक निभाए हिन्दू?

सोमवार (मई 18, 2020) को जी न्यूज के प्रोग्राम ‘ताल ठोक के’ के एंकर अमन चोपड़ा ने एक मौलाना को ‘धर्मनिरपेक्षता’ का पाठ पढ़ाया। दरअसल, प्रोग्राम में चर्चा हाल ही में कर्नाटक के दावणगेरे जिले में हुई सांप्रदायिक घटना पर आधारित थी, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को हिंदू दुकानों से कपड़े खरीदने के लिए कट्टरपंथी निशाना बनाते हैं, धमकी देते हैं और गाली-गलौज करते हैं।

चोपड़ा ने प्रोग्राम की शुरुआत करते हुए मौलाना नदीमुद्दीन से कहा कि वो इस्लामिक कट्टरपंथियों ने जो हरकत की है उसकी निंदा करें। जी न्यूज एंकर अमन चोपड़ा को वीडियो में कहते हुए सुना जा सकता है, “गंगा-जमुनी तहजीब की जिम्मेदारी सिर्फ एक समुदाय की थोड़ी न है, ताली दोनों हाथों से बजेगी।”

उन्होंने आगे कहा, “हमने आम तौर पर देखा, जब हम मिलते हैं तो सलाम, अस्सलाम वालेकुम, सब कुछ कहते हैं, लेकिन क्या आप लोग राम-राम कहते हैं? आप लोग नहीं कहते हैं। हमने मंदिरों इफ्तारी भी देखी है और नमाज भी देखी है। लेकिन मस्जिदों में हवन-पूजा होता है क्या? लंगर होता है क्या? नहीं होता। एक हाथ से ताली नहीं बजेगी न।”

इसके बाद एंकर अमन चोपड़ा मौलाना से बार-बार राम-राम और जय श्री राम बोलने के लिए कहते हैं, लेकिन जब वो नहीं बोलते हैं तो फिर एंकर बार-बार इस्लामिक अभिवादन करके उन्हें समझाते हैं कि वो सांप्रदायिक नहीं है, वो उनका अभिवादन कर सकते हैं, तो फिर वो राम-राम बोलकर क्यों नहीं कर सकते।

बार-बार बोलने के बाद भी जब मौलाना नहीं बोलता है, तो फिर अमन चोपड़ा कहते हैं, “दो हाथों से ताली बजाइए न, मिलकर भी रहना है, गंगा-जमुनी तहजीब भी दिखानी है, आप नहीं बोलेंगे। ताली दो हाथों से बजती है, एक हाथ से नहीं बजती, गंगा जमुनी तहजीब पर भाषण देना बहुत आसान होता है। एक सेकेंड में जुबान बंद हो जाती है आपलोगों की।”

गौरतलब है कि पिछले दिनों कई सारे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे, जिसमें हिंदू दुकान से सामान खरीदने पर मुस्लिम महिलाओं के साथ मुस्लिम भीड़ को गाली-गलौज करते हुए देखा जा सकता है।

वीडियो में देखा जा सकता है कि रमजान के पवित्र महीने में जैसे ही हिंदुओं के स्वामित्व वाली एक लोकप्रिय कपड़े की दुकान ‘बीएस चन्नबसप्पा एंड संस’ से बुर्का-पहने महिलाएँ बाहर निकलती हैं कि मुस्लिमों की भीड़ उन पर आक्रामक हो जाती है। उनको चारों तरफ से घेर लिया जाता है और सवाल-जवाब किए जाते हैं।

उनके हाथ से कपड़ों की थैली भी छीन ली जाती है और कपड़े रखकर थैली को फेंक दी जाती है। शायद इसलिए क्योंकि उस थैली का रंग ‘भगवा’ था। वीडियो में महिलाओं को आक्रामक मुस्लिम भीड़ से जाने देने की विनती करते हुए देखा जा सकता है।

इसी तरह, एक अन्य मुस्लिम भीड़ ने दावणगेरे शहर के एक अन्य हिस्से में इसी तरह एक दुकान पर खरीददारी के लिए गई दो महिलाओं और एक बच्चे को धमकी दी। वीडियो में देखा जा सकता है कि उर्दू में बात कर रहे एक शख्स बुर्का पहने महिला और उसके बच्चे को कपड़े की दुकान में प्रवेश नहीं करने के लिए धमकाता है।

मई 19, 1961 की त्रासदी: जब 11 बंगालियों ने मातृभाषा के लिए अपनी जान गँवा दी थी

असम के सिलचर में राज्य की सरकारी भाषा के रूप में असमिया के अलावा बांग्ला को भी शामिल करने की माँग को लेकर आज ही के दिन वर्ष 1961 में आंदोलन हुआ था। सिलचर रेलवे स्टेशन पर मई 19, 1961 को आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोली चलाई थी, जिसमें 11 लोग मारे गए थे।

वामपंथी इकोसिस्टम की देन से आज के बंगाल के लिए इस तारीख का महत्त्व शायद उतना स्पष्ट ना हो लेकिन आजादी के बाद के भारत का सबसे बड़ा बंगाली भाषा आंदोलन था जब पूर्वी पाकिस्तान के ग्यारह शरणार्थी हिंदुओं ने अपने भाषा और संस्कृति के लिए अपनी जान गँवाई थी।

अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए जान गँवा देने की पहली घटना ढाका में फरवरी 21, 1952 को हुई थी और दूसरी घटना मई 19, 1961 को सिलचर रेलवे स्टेशन पर घटी थी।

लेकिन एक ओर जहाँ 21 फरवरी के आते ही बंगाली भाषा-प्रेमी और उनके वामपंथी समर्थक थामने मुश्किल हो जाते हैं। वहीं 19 मई को इनके पास संवेदनाओं की तंगी देखने को मिलती है। दरअसल, कथित तौर पर बांग्ला भाषा के मान की रक्षा के लिए ढाका में फरवरी 21, 1952 को चार लोगों ने जान दी थी। लेकिन 21 फरवरी की घटना वास्तव में एक भाषा आंदोलन की आड़ में पूर्व और पश्चिम के बीच संसाधनों के लिए संघर्ष मात्र था।

ये लोग अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स में बांग्लादेशी झंडे लगाने से लेकर ‘यूनाइटेड बंगाल’ के नक्शे दिखाने और यहाँ तक ​​कि भारत-बांग्लादेश क्रिकेट मैचों में बांग्लादेश का समर्थन करने के बीच ये लोग भाषाई रूढ़िवाद और देशद्रोह के बीच एक बहुत ही महीन रेखा बाकी रह जाती है

एक संकीर्ण बंगाल-समर्थकों का समूह, जो हिंदी भाषी प्रदेशों को उनकी जीवन शैली के लिए अक्सर गंदी गलियाँ देता है, ये सब करने में सबसे आगे हैं, लेकिन जब 19 मई की बात आती है, तो इन लोगों की चुप्पी देखने लायक होती है।

हो सकता है कि ओछे और दिखावा परस्त लेफ्टिस्ट के लिए बंगाली नाम कमला भट्टाचार्य के नाम में रफीक या जब्बार के अरबी नामों जैसा ‘आकर्षण’ नहीं हैं।

1961 में 19 मई को क्रूर और सशस्त्र पुलिस बल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए मारे गए लोगों में कमला भट्टाचार्य सचिंद्र पाल, चंडीचरण, सुनील सरकार, सुकोमल पुरकायस्थ, कनई लाल नेगी शामिल थे। ग्यारह ऐसे लोगों ने अपनी भाषा के लिए अपना बलिदान दिया।

जब पाकिस्तानी शासक बांग्ला भाषा को दबाने और अपनी भाषा को लागू करने की कोशिश कर रहे थे, उस समय इन लोगों ने विरोध किया और अपनी मातृभाषा के लिए लड़ाई लड़ी; वे अपनी मातृभाषा के लिए मर गए।

बंगाली भाषा आंदोलन की उत्पत्ति इस प्रकार है। 1826 में असम को अंग्रेजों ने बंगाल प्रेसीडेंसी के हिस्से के रूप में प्रशासित किया। इस निर्णय के कारण बहुभाषी असम में एक प्रशासनिक भाषा के रूप में बंगाली का उपयोग हुआ, जो मूल आसामी के बीच नाराजगी का कारण था।

1874 में, असम को एक अलग प्रांत के रूप में बनाया गया। हालाँकि, गोलपारा, सिलहट और कछार के बंगाली भाषी जिले भी इसका एक हिस्सा थे। भारत के विभाजन के दौरान, मुस्लिम बहुमत के कारण, अंग्रेजों ने सिलहट के भाग्य को एक जनमत संग्रह पर छोड़ दिया गया।

असम कॉन्ग्रेस बंगाली भाषी आबादी से छुटकारा पाना चाहती थी। केंद्र में मौजूद फैसला लेने में असमर्थ सरकार के अपने पाँव वापस खींचने के कारण, मुस्लिम लीग द्वारा बड़े पैमाने पर मतदान से छेड़छाड़ और धाँधली का नतीजा यह हुआ कि सिलहट, सिलहट रेफरेंडम में पाकिस्तान को उपहार स्वरुप दे दिया गया था। सिलहट से हजारों बंगाली हिंदू शरणार्थी विभाजन के बाद कछार तक आ गए थे।

आखिरकार 1960 को वो दिन आया जब असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद चालिहा ने राज्य विधानसभा में एक विधेयक पेश किया, जिसमें असमिया को राज्य की एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित करने की माँग की गई।

चूँकि, बंगालियों के अलावा, वर्तमान के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर मेघालय के आधुनिक राज्यों के जातीय समूह भी तब असम का हिस्सा थे, इस विधेयक का विरोध करीमगंज के विधायक रणेंद्र मोहन दास ने इस आधार पर किया था कि ऐसा कर के बाकी की आबादी पर एक तिहाई की भाषा को लागू किया जा रहा है।

जब यह विवादास्पद बिल पारित किया गया, तो इसने आग में तेल डालने का काम किया। बंगाली हिन्दुओं के खिलाफ चलाया गया अभियान बंगाल खेड़ा में एक बार फिर ब्रह्मपुत्र घाटी में फैल गया, जिससे गोरेश्वर में बंगाली हिंदुओं का भीषण नरसंहार हुआ।

असम सरकार ने जब असमिया को राज्य की एकमात्र राजभाषा बनाने की घोषणा की तो बराक घाटी में बांग्लाभाषियों ने भाषा आंदोलन शुरू कर दिया।

अप्रैल 14, 1961 को संकल्प दिवस मनाया गया जिसमें मणिपुरियों जैसे गैर-बंगाली भाषाई समूहों द्वारा भी बड़े पैमाने पर सहमती दी गई। 19 मई के दिन, सिलचर रेलवे स्टेशन में एक सत्याग्रह का आह्वाहन किया गया और ट्रेनें रोक दी गईं।

पुलिस बलप्रयोग के बाद भी प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर नहीं कर सकी और अर्धसैनिक बलों की मदद की जरूरत पड़ गई। असम राइफल्स ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं और इसमें ग्यारह लोगों ने एक किशोर युवती सहित, अपनी मातृभाषा के लिए मौत को स्वीकार किया।

ये सभी पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली हिंदू शरणार्थी थे। इसके कारण कछार, पड़ोसी त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। कोलकाता मैदान और सुबोध मल्लिक स्कवॉयर में बड़े स्तर पर आंदोलन हुए। शिलांग के खासी जैसे गैर-बंगाली भाषाई समूहों ने भी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। महान स्वतंत्रता सेनानी उल्लासकर दत्ता ने भाषा शहीदों में से प्रत्येक को एक गुलदस्ता भेजा।

इस पूरे दबाव के फलस्वरूप, असम सरकार को सर्कुलर वापस लेना पड़ा और असम अधिनियम XVIII, 1961 की धारा 5 के अनुसार, बराक घाटी में बंगाली को आधिकारिक दर्जा दिया गया था। इस आंदोलन के दीर्घकालिक प्रभाव के रूप में, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और मेघालय ने अंततः अलग राज्य का दर्जा हासिल किया।

19 मई को महज असमिया-बंगाली टकराव के संकीर्ण नजरिए से नहीं बल्कि एक बहुभाषी राज्य में सभी भाषाओं के समान अधिकारों के लिए संघर्ष के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके अलावा, उन बलिदानियों को उचित श्रेय दिया जाना चाहिए जो शरणार्थी होने के बावजूद अपनी भाषा से प्रेम के लिए लड़े और प्राण न्यौछावर कर दिए।

ये अवैध घुसपैठिए और उनके संरक्षक 1961 में हैलाकांडी में अपने समकक्षों की तरह ही सीएए विरोध प्रदर्शनों में भाग लेकर अशांत पानी में मछली मारने जैसे प्रयास कर रहे हैं।  आज भी यही सवाल पूछा जाना चाहिए कि मातृभाषा के लिए मरने वालों में 19 मई की तारिख को बलिदान देने वालों के साथ  21 फरवरी वाला न्याय क्यों नहीं? रफ़ीक या जब्बार ही क्यों, कमला भट्टाचार्य क्यों नहीं?