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‘एक बूँद ऊँगली पर रख कर देखो…’ – एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी ने फैज़ल को TikTok वीडियो पर लताड़ा, दीपिका चुप

एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल ने फैज़ल सिद्दीकी के टिक-टॉक (TikTok) वीडियो के ख़िलाफ़ कड़ा विरोध दर्ज कराया है। हालाँकि, फिल्म ‘छपाक’ में लक्ष्मी अग्रवाल का किरदार अदा करने वाली दीपिका पादुकोण की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं।

लक्ष्मी अग्रवाल ने कहा कि फैज़ल सिद्दीकी अपने आप को क्या समझता है? लक्ष्मी ने कहा कि फैज़ल एसिड अटैक को प्रमोट कर रहा है और कह रहा है कि एक लड़की ने मना किया तो उसके ऊपर एसिड फेंक दो।

फैज़ल सिद्दीकी के 1.35 करोड़ फॉलोवर्स की ओर इशारा करते हुए लक्ष्मी ने कहा कि जहाँ एक तरफ उन्हें इतनी बड़ी संख्या में लोग फॉलो करते हैं, वो अपने टिक-टॉक (TikTok) वीडियो के माध्यम से इतने गंदे मैसेज दे रहा है।

उन्होंने पूछा कि क्या फैज़ल को इसका अंदाज़ा भी है कि एक बूँद एसिड से कितना दर्द होता है? उन्होंने अपना चेहरा दिखाते हुए कहा कि क्या वो देख रहे हैं कि एसिड अटैक का क्या नतीजा होता है? लक्ष्मी अग्रवाल ने कहा:

“फैज़ल सिद्दीकी, आप जरा एक बूँद एसिड अपनी ऊँगली पर रख कर देखिए, तब जाकर आपको पता चलेगा कि आखिर एसिड अटैक का दर्द होता कैसा है। आप किस तरीके के क्रिएटर हैं? मैं सोच भी नहीं सकती कि टिक-टॉक (TikTok) ऐसे लोगों को क्रिएटर का दर्जा दे रहा है। अगर आपको फेमस ही होना है तो अच्छे वीडियोज बना कर होइए, ऐसे वीडियो मत बनाइए। हम दिन-रात मेहनत कर के हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहे हैं और आप इसे बढ़ावा दे रहे हैं?”

फैज़ल के TikTok वीडियो का लक्ष्मी अग्रवाल ने दिया जवाब

लक्ष्मी अग्रवाल ने फैज़ल सिद्दीकी से पूछा कि वो अपने वीडियो के माध्यम से कैसी ‘क्रिएटिविटी’ कर रहे हैं? बता दें कि टिक-टॉक (TikTok) पर फैज़ल सिद्दीकी ने एक वीडियो डाला था। फैज़ल के फॉलोवरों की संख्या 1.34 करोड़ है।

इस वीडियो में फैज़ल कहता है- “उसने तुम्हें छोड़ दिया, जिसके लिए तुमने मुझे छोड़ा था?” इसके बाद लड़की के चेहरे पर एक लिक्विड फेंका जाता है और उसका चेहरा पूरा जल जाता है। उसे एसिड अटैक को प्रमोट किया था। इस मामले में फैज़ल सिद्दीकी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है। वकील अभिषेक राजपूत ने एफआईआर की कॉपी ट्विटर पर शेयर की थी।

इसके अलावा चाइनीज सोशल मीडिया ऐप टिक-टॉक (TikTok) पर रेप के महिमामंडन का वीडियो भी वायरल हो रहा है। टिक-टॉक (TikTok) पर वायरल हुए इस वीडियो में दो लड़के अपने कपडे पहन रहे हैं, पैंट की चेन लगा रहे हैं और दूसरी तरफ एक लड़की रोती हुई दिखती है। लड़की भी अपने कपड़े सही कर रही होती है।

मुजीबुर रहमान के इस वीडियो के बैकग्राउंड में राहत फ़तेह अली ख़ान का ‘ब्लड मनी’ फिल्म में गया गाना ‘चाहत’ बज रहा है, जिसके बोल हैं- ‘तेरी रूह पे, तेरे जिस्म पे- बस हक़ है इक मेरा।‘ वीडियो को लेकर विरोध शुरू हो गया है।

प्रवासी मजदूरों को झारखंड ले जा रही बस का एक्सिडेंट, सोलापुर में ड्राइवर समेत 4 की मौत

महाराष्ट्र के सोलापुर से 17 प्रवासियों को झारखंड लेकर जाने के लिए निकली बस आज (मई 19, 2020) सुबह सड़क हादसे का शिकार हो गई। इस दुर्घटना में 15 प्रवासी घायल हो गए जबकि बस ड्राइवर समेत 4 लोगों की मृत्यु हो गई। महाराष्ट्र पुलिस ने स्वयं इस घटना की पुष्टि की।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक,आरणी तहसील में डंपर और राज्य परिवहन की बस में बहुत तेज भिड़ंत हुई। हादसा कितना भीषण था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि टक्कर के बाद बस के अगले हिस्से के परखच्चे उड़ गए।

हादसे के समय बस में 17 लोग सवार थे और ये बस, प्रवासी मजदूरों को लेकर महाराष्ट्र के सोलापुर से झारखंड जा रही थी। मगर, इसी बीच बस ने एक ट्रक को पीछे से टक्कर मार दी, जिससे ये हादसा हुआ है। बता दें कि घायल मजदूरों को अस्पताल में भर्ती कराकर उनका इलाज करवाया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि कोरोना वायरस के संकट में सबसे ज्यादा दिक्कतें प्रवासी मजदूरों को आ रही हैं। ऐसे में लॉकडाउन होने के बावजूद भी वे पैदल अपने घर जाने की जद्दोजहद में मजबूर हैं और इसी कारण वे दुर्घटनाओं का शिकार भी हो रहे हैं।

महाराष्ट्र के सोलापुर से पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में भी मजदूरों की मौत की खबर आई थी। उस समय मुजफ्फरनगर-सहारनपुर हाइवे पर पैदल जा रहे प्रवासी मजदूरों को बुधवार देर रात एक तेज रफ्तार बस ने कुचल दिया था। इसमें 6 लोगों की मृत्यु हो गई थी।

इस तरह की एक और भयावह घटना मध्य प्रदेश के गुना जिले में हुई। यहाँ 14 मई की सुबह 3 बजे एक ट्रक हादसे में 50 प्रवासी मजदूर घायल हो गए और 8 लोगों की मौत हो गई। मिली जानकारी के अनुसार प्रवासी मजदूर कंटेनर में सवार होकर महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश जा रहे थे। यह कंटेनर गुना कैंट थाना के समीप विपरीत दिशा से आ रही बस से टकरा गया। दुर्घटना में घायल हुए लोगों का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।

दलित युवक की हत्या: फतेहपुर में चाचा ने ही कुल्हाड़ी से काट डाला सिर, पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध का था शक

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में रविवार (मई 17, 2020) को तब खलबली मच गई थी, जब एक दलित युवक की सिर कटी लाश मिली। अब पता चला है कि उसके चाचा ने ही अपने दो साथियों की मदद से कुल्हाड़ी से उसकी हत्या कर दी थी।

उक्त युवक का नाम प्रदीप है, जो खेत में बोई हरी सब्जियों की रखवाली करता था। एसपी प्रशांत वर्मा ने ख़ुद घटनास्थल पर पहुँच कर जायजा लिया था। वहाँ से एक मोबाइल फोन और शराब की बोतल बरामद हुई थी।

दरअसल, चाचा को शक था कि प्रदीप का उसकी पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध है। ‘दैनिक जागरण’ में मंगलवार को प्रकाशित ख़बर के अनुसार, कई ग्रामीण पिछले 6 महीनों से उसे ये कह कर ताना देते थे कि प्रदीप उसकी पत्नी के साथ ग़लत हरकत करता है, जिससे उसे शर्मिंदगी महसूस होती थी।

ये घटना फतेहपुर स्थित मालवा थाना क्षेत्र के चक्की गाँव की है। प्रदीप स्नातक का छात्र था और उसके पिता धनीराम पासवान शिक्षक हैं।

प्रदीप उर्फ़ बनता की हत्या रविवार को खेत में स्थित एक झंडी में की गई थी। पिता ने संदेह जताया था कि उसके पारिवारिक भाई राजोल पासवान ने ही इस अपराध को अंजाम दिया है। फतेहपुर पुलिस ने उसे कड़ाई से पूछताछ की तो उसने सब उगल दिया।

कुल्हाड़ी को बरामद कर तीन आरोपितों को जेल भेज दिया गया है। 5 महीने पहले राजोल का अपनी पत्नी के साथ झगड़ा हुआ था, जिसके बाद वो मायके चली गई थी। तब से वो अब तक लौटी नहीं थी।

कुछ दिनों पहले रजोल के साथी संजय और प्रदीप में कहासुनी भी हुई थी। उस वक़्त दोनों ने एक-दूसरे को देख लेने की धमकी दी थी। प्रदीप के पिता आगरा के चौरंगाहार स्थित सार्वजनिक अन्तर कॉलेज में पदस्थापित हैं।

22 वर्षीय प्रदीप फतेहपुर शहर के शांतिनगर स्थित ठाकुर युगराज प्रताप महाविद्यालय का छात्र था। ग्रामीणों ने पहले शक जताया था कि जुआ खेलने के क्रम में हत्या की गई हो सकती है। वो खेत में बोई, तरोई, लौकी, भिंडी, ककड़ी और खीरा के फसल की रखवाली करता था।

दैनिक जागरण के फतेहपुर संस्करण में प्रकाशित ख़बर

‘अमर उजाला’ के अनुसार, हत्या के बाद सभी आरोपित घूम-घूम कर अफ़सोस भी जाहिर कर रहे थे। प्रदीप के पिता ने कुछ दिनों पूर्व ही ढाई बीघे की खेत खरीदी थी। विवेक सिंह गौतम से ये खरीददारी हई थी लेकिन सबकुछ प्रक्रिया के तहत शांतिपूर्ण ढंग से हुआ था, कभी कोई विवाद जन्मा ही नहीं।

प्रदीप की माँ सुखरानी देवी अभी तक सदमे में है। पुलिस ने मृतक के मोबाइल फोन को भी सर्विलांस पर लगा कर जाँच की थी।

कोर्ट में बैठी जनता अगर न्याय करती तो गोडसे निर्दोष घोषित होते: याचिका की सुनवाई करने वाले जज खोसला

‘गाँधी हत्या’ की अगली सुबह गाँधीवादियों ने एक बार फिर गाँधी के विचारों की हत्या की। महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के इशारों पर चितपावन ब्राह्मणों की बड़े स्तर पर हत्या कर दी गई। यह नरसंहार आजादी के बाद का पहला नरसंहार था।

आजाद भारत का पहला नरसंहार – चितपावन ब्राह्मणों की हत्या

जनवरी 30, 1948 को नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गाँधी को गोली मारते ही उनकी जाति के लोगों पर महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में भयानक हमले कर दिए गए। इस कत्लेआम का मुख्य मकसद महात्मा गाँधी की मौत का बदला उनकी (गोडसे की) जाति के चितपावन ब्राह्मणों को मौत के घाट उतारना था।

यह भी उल्लेखनीय है कि महादेव रानाडे, गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और वीर सावरकर जैसे नाम इसी चितपावन ब्राह्मण जाति से सम्बन्धित हैं। महिलाओं और बच्चों तक को शिकार बनाया गया। इस कत्लेआम में 20 हजार के करीब मकान और दुकानें जला दी गईं। नरसंहार में वीर सावरकर के भाई नारायण दामोदर सावरकर भी मारे गए थे।

ब्राह्मणों का यह भीषण नरसंहार इसलिए भी इतिहास के सबसे खतरनाक कत्लेआमों में से एक है क्योंकि यह एकदम सुनियोजित तरीकों से कर बिना किसी साक्ष्य के चुपचाप दफन भी कर दिया गया। यह नरसंहार महाराष्ट्र के कॉन्ग्रेसी नेताओं की देखरेख में हुआ था, इसमें भी कोई संदेह नहीं था।

तकरीबन 1000 से 5000 चितपावन ब्राह्मणों को निर्ममता से रात के अंधेरों में मौत के घाट उतार दिया गया। यह भी दावा किया जाता है कि मारे गए लोगों की संख्या कुछ स्थानों पर 8000 से भी ज्यादा थी।

कोनराड एल्स्ट (Koenraad Elst) अपने अध्ययन Why I Killed the Mahatma: Uncovering Godse’s Defence में लिखते हैं कि गाँधी की हत्या का बदला लेने का यह रक्तपात किस प्रकार शुरू हुआ।

कोनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि गाँधी के समर्थकों ने हिंदू महासभा, आरएसएस और सबसे बढ़कर, चितपावन ब्राह्मणों को मारा। हत्या के तुरंत बाद न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में बंबई (मुंबई) नरसंहार में पीड़ितों की संख्या दी गई थी। बताया गया कि बच्चों को अनाथ करके सड़क पर फेंक दिया गया। कई लोगों को रास्तों में, होटलों में उनका नाम पूछकर मार दिया गया। कई चितपावन परिवारों के घरों के दरवाजे बाहर से बंद करके आग के हवाले कर दिया गया।

एल्स्ट का मानना था​ कि मौत का आँकड़ा कई सौ से अधिक हो सकती थी, लेकिन दुख की बात है कि इस पर कोई जाँच ही नहीं की गई। उन्होंने कहा कि इसे जातिवादी रंग देकर भुला दिया गया।

चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार की तुलना 1984 में हुए सिख नरसंहार से करते हुए इसे उस से भी कहीं वीभत्स बताया। उन्होंने कहा कि चितपावन ब्राह्मणों की हत्याओं पर किसी ने भी गौर नहीं किया, क्योंकि वे गोडसे के जाति के लोग थे।

गोडसे और गाँधी की धर्म निरपेक्षता

एल्स्ट का मानना था कि यदि गोडसे और गाँधी के जीवन मूल्यों की तुलना करें तो नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी से कहीं ज्यादा धर्म निरपेक्ष थे।

नाथूराम गोडसे की भतीजी और गोपाल गोडसे की पुत्री हिमानी सावरकर का कहना था कि गोडसे कोई सरफिरे इन्सान नहीं थे बल्कि गोडसे ने गाँधी की हत्या पूरे होशो-हवास में की थी और उसके पीछे उनके निजी कारण नहीं बल्कि पूर्ण रूप से राजनीतिक कारण थे।

हिमानी सावरकर का मानना था कि उन्हें धीरे-धीरे यह बात पता चली कि गोडसे सिरफिरे इन्सान बिल्कुल भी नहीं थे। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिमानी सावरकर ने कहा, “वो एक अख़बार के संपादक थे। उन दिनों उनके पास अपनी मोटर गाड़ी थी। उनका और गाँधी जी का कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं था।

वो पुणे में रहते थे जहाँ देश विभाजन का कोई असर नहीं हुआ था। वो फिर भी गाँधी को मारने गए, उसका एकमात्र कारण यही था कि वो मानते थे कि पंजाब और बंगाल की माँ-बहनें मेरी भी कुछ लगती हैं और उनके आँसू पोछना मेरा कर्तव्य है।”

नाथूराम के बयान पर सरकार ने लगा दी थी रोक

महात्मा गाँधी की हत्या के आरोप में नाथूराम गोडसे सहित 17 अभियुक्तों पर मुकदमा चला था। सुनवाई के दौरान नाथूराम गोडसे ने अदालत में अपना पक्ष रखा था। गोडसे के इस बयान पर सरकार ने रोक लगा दी थी, लेकिन नाथूराम के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने लंबी लड़ाई लड़ी और इस वक्तव्य पर लगी रोक को हटवाया।

1968 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा इस पर रोक हटा दी गई। उनका पूरा बयान ‘मैंने गाँधी को क्यों मारा’ (Why I Assassinated Gandhi) में शामिल किया गया है। इसमें गोडसे ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने गाँधी को मारा था और उनके पास ऐसा करने के कारणों की एक बड़ी लिस्ट मौजूद थी।

उन्होंने कहा था कि मजहब विशेष के लोग अपनी मनमानी कर रहे थे। ऐसे में या तो कॉन्ग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी और आदिम रवैए के स्वर में स्वर मिलाए अथवा उनके बिना काम चलाए।

गोडसे ने कहा था कि महात्मा गाँधी ने समुदाय विशेष को खुश करने के लिए हिंदी भाषा के सौंदर्य और सुन्दरता के साथ बलात्कार किया। वह मानते थे कि गाँधी के सारे प्रयोग केवल और केवल हिंदुओं की कीमत पर किए जाते थे। गोडसे ने अपने बयानों में इस बात का जिक्र किया था कि जिस भारत माता को वह पूजा की वस्तु मानते थे, उसके साथ ऐसा व्यवहार देखकर उनका मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया था।

नाथूराम गोडसे ने अपनी पुस्तक Why I Assassinated Gandhi में लिखा –

“मैं कहता हूँ कि मेरी गोलियाँ एक ऐसे व्यक्ति पर चलाई गई थीं, जिसकी नीतियों और कार्यों से करोड़ों हिंदुओं को केवल बर्बादी और विनाश ही मिला। ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, जिसके द्वारा उस अपराधी को सजा दिलाई जा सके, इसलिए मैंने इस घातक रास्ते का अनुसरण किया। मैं अपने लिए माफ़ी की गुजारिश नहीं करूँगा, जो मैंने किया उस पर मुझे गर्व है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तोलकर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्याँकन करेंगे।”

इसके अलावा गोडसे ने गाँधी को मारने के कारणों में जलियाँवाला से लेकर भगत सिंह की फाँसी, जिन्ना के सामने गाँधी का समर्पण, अब्दुल रशीद द्वारा स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या बताया था। गोडसे रशीद को लेकर रखे गाँधी के विचारों से बेहद आहत थे।

गोडसे ने कहा था कि 1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कहकर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा दोनों धर्मों की एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926 में अब्दुल रशीद को भाई मानते हुए अपने लेख में गाँधी ने कहा –

“हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए। मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ। समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है। …ये हम पढ़े, अध-पढ़े लोग हैं, जिन्होंने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया। स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमें आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा।”

अदालत में चले ट्रायल के दौरान नाथूराम गोडसे ने कहा था कि महात्मा गाँधी और वीर सावरकर के विचारों ने उनके जीवन पर व्यापक असर डाला है और वो गाँधी का सम्मान करते थे। गोडसे ने कहा –

“गाँधी जी ने देश की जो सेवा की है, मैं उसका आदर करता हूँ। उन पर गोली चलाने से पूर्व मैं उनके सम्मान में इसीलिए नतमस्तक हुआ था। किंतु जनता को धोखा देकर पूज्य मातृभूमि के विभाजन का अधिकार किसी बड़े से बड़े महात्मा को भी नहीं है। गाँधी जी ने देश को छल कर देश के टुकड़े कर दिए।”

‘अगर अदालत में उपस्थित दर्शकों को ज्यूरी का दर्जा दे दिया जाता…’

ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ नाथूराम गोडसे की याचिका की सुनवाई करने वाले जस्टिस जीडी खोसला ने अपनी किताब – ‘द मर्डर ऑफ महात्मा’ (‘द मर्डर ऑफ द महात्मा’)में इस सुनवाई के दौरान के अनुभव और नाथूराम गोडसे के तर्क और आशंकाओं को विस्तार से विश्लेषित करते हुए लिखा है –

“जब उसने (गोडसे) बोलना बंद कर दिया, तो दर्शकों और श्रोताओं के बीच एक गहरी चुप्पी छा गई। कई महिलाएँ आँसू बहा रही थीं, पुरुष खाँस रहे थे और अपने रूमाल तलाश रहे थे। अचानकर से सुनाई देने वाली खाँसी की आवाज उस सन्नाटे को और भी गहरा बना देते थे। मुझे लग रहा था कि मैं किसी तरह के मेलोड्रामा में भाग ले रहा हूँ या किसी हॉलीवुड फीचर फिल्म के दृश्य में हूँ…।”

“…एक या दो बार मैंने गोडसे को टोका और कहा कि वह जो कह रहा है वह अप्रासंगिक है, लेकिन मेरे सहकर्मी उसे सुनना चाहते थे और दर्शकों का मानना था कि इस सुनवाई का सबसे जरूरी हिस्सा गोडसे का भाषण ही था। प्रभाव और प्रतिक्रिया के अंतर को देखने के लिए उठी जिज्ञासा ने मुझे एक लेखक बनाया। मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं था कि यदि दर्शकों की भावनाओं को उस दिन की सुनवाई का आधार बना दिया जाता तो गोडसे को दोषमुक्त ठहरा दिया जाता।”

गाँधी की मौत से जुड़े कुछ रहस्य, जो आज भी बरकरार हैं

खैर, यह भी अब एक तथ्य है कि नेहरूवादी साहित्य के दावे से हटकर महात्मा गाँधी ने मरने से पहले ‘हे राम’ नहीं कहा था और ना ही उनकी पोस्टमॉर्टम हुई थी। 2019 में गाँधी की हत्या की जाँच की माँग करने वाली एक याचिका को खारिज कर दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि हत्या की जाँच की जरूरत थी क्योंकि इस बात पर कुछ अस्पष्टता थी कि क्या गाँधी की हत्या के लिए नाथूराम गोडसे ने चौथी गोली चलाई थी?

इस याचिका में यह भी कहा गया था कि दो कथित साजिशकर्ता – गोडसे और नारायण दत्तात्रेय आप्टे- को नवंबर 15, 1949 को फाँसी दी गई थी। इसके ठीक 71 दिन बाद जनवरी 26, 1950 को सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आया था। इसका मतलब यह था कि साजिशकर्ता या उनके परिवार को पूर्वी पंजाब के उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का मौका नहीं मिला था। इस प्रकार, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि “गाँधी हत्या के मुकदमे को अभी तक कानूनी रूप से पूरा नहीं किया गया है”।

TikTok पर अब मुजीबुर का रेप वाला वीडियो, कल था फैजल का एसिड अटैक: NCW अध्यक्ष ने कहा- बैन करे सरकार

चाइनीज सोशल मीडिया ऐप टिक-टॉक (TikTok) पर रेप के महिमामंडन का वीडियो वायरल हो रहा है। टिक-टॉक (TikTok) पर वायरल हुए इस वीडियो में दो लड़के अपने कपडे पहन रहे हैं, पैंट की चेन लगा रहे हैं और दूसरी तरफ एक लड़की रोती हुई दिखती है। लड़की भी अपने कपड़े सही कर रही होती है।

मुजीबुर रहमान के इस वीडियो के बैकग्राउंड में राहत फ़तेह अली ख़ान का ‘ब्लड मनी’ फिल्म में गया गाना ‘चाहत’ बज रहा है, जिसके बोल हैं- ‘तेरी रूह पे, तेरे जिस्म पे- बस हक़ है इक मेरा।‘ वीडियो को लेकर विरोध शुरू हो गया है।

रेप को ग्लोरिफ़ाई करने वाले इस वीडियो को देख कर सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा उबल पड़ा। ट्विटर यूजर आदित्य ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा कि मुजीबुर रहमान और उसके साथियों द्वारा शूट किया गया वीडियो ये दिखाने की कोशिश है कि रेप कितना ‘कूल’ है।

उसे लिखा कि जब मुजीबुर अपनी पैंट की जिप बंद कर करता है, तब उसके हाव-भाव को देखिए। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने तुरंत राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा को टैग कर के इस वीडियो की सूचना दी।

उन्होंने लिखा कि महिला आयोग को इस शर्मनाक वीडियो को देखना चाहिए और एक्शन लेना चाहिए। रेखा शर्मा ने लिखा कि ये उनकी प्रबल सोच है कि टिक-टोक (TikTok) को भारत में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

उन्होंने भरोसा दिलाया कि वो जल्द ही इस सम्बन्ध में भारत सरकार को लिखेंगी। उन्होंने लिखा कि ऐसे आपत्तिजनक वीडियोज न सिर्फ़ युवाओं को एक निरर्थक ज़िंदगी की तरफ धकेल रहे हैं बल्कि वो फॉलोवरों के लिए ही जी रहे हैं और मर रहे हैं।

इससे पहले  टिक-टॉक (TikTok) पर फैज़ल सिद्दीकी ने एक वीडियो डाला था। फैज़ल के फॉलोवरों की संख्या 1.34 करोड़ है। इस वीडियो में फैज़ल कहता है- “उसने तुम्हें छोड़ दिया, जिसके लिए तुमने मुझे छोड़ा था?” इसके बाद लड़की के चेहरे पर एक लिक्विड फेंका जाता है और उसका चेहरा पूरा जल जाता है। उसे एसिड अटैक को प्रमोट किया था। इस मामले में फैज़ल सिद्दीकी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है। वकील अभिषेक राजपूत ने एफआईआर की कॉपी ट्विटर पर शेयर की थी।

महात्मा गाँधी किसी मस्जिद में गीता पाठ कर सकते हैं क्या? आखिर क्यों नाथूराम गोडसे ने पूछा था यह सवाल

जैसा कि हम सबको पता है, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को कर दी थी। मई 19, 1910 को गोडसे का जन्म हुआ था। इस हिसाब से गोडसे के जन्म के अब तक 110 वर्ष हो गए।

मोहनदास करमचंद गाँधी की हत्या के बाद चले अभियोजन में गोडसे को दोषी पाया गया और उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई गई। नाथूराम गोडसे सहित कई लोगों पर उस मामले में मुकदमा चला था।

कहते हैं, महात्मा गाँधी की हत्या के बाद सिर्फ़ संदेह के आधार पर ही हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। इनमें से एक व्यक्ति ऐसे भी थे, जिनसे जवाहलाल नेहरू की पुरानी अदावत थी और उन्होंने उनसे बदला निकालने की भरसक कोशिश की।

जी हाँ, विनायक दामोदर सावरकर को भी महात्मा गाँधी की हत्या में जबरन घसीटा गया। मुंबई पुलिस ने सावरकर सदन पर छापा मारा और उनके घर से 143 फाइलें जब्त कर की गईं, जिनमें 10 हज़ार से भी अधिक पत्र इत्यादि थे।

जाहिर है, गोडसे के बहाने सावरकर को फँसाने की पूरी कोशिश की गई। सावरकर को ऑर्थर रोड जेल में बंद कर दिया गया। ये सब बावजूद इसके हुआ, कि सावरकर ने विज्ञप्ति जारी कर गाँधी की हत्या पर दुःख जताया था।

सावरकर ने महात्मा गाँधी की हत्या के 1 दिन बाद ही इसे वैश्विक महा-त्रासदी का क्षण करार देते हुए कहा था कि उन्हें इस ख़बर की सूचना से गहरा धक्का लगा है। उन्होंने जनता से सामाजिक सद्भाव बना कर रखते हुए केंद्र सरकार के सहयोग की अपील की थी।

वीर सावरकर ने महात्मा गाँधी को महान हस्ती बताया था और लोगों को तोड़फोड़ न मचाने की सलाह देते हुए ख़ुद को शोकग्रस्त बताया था। फ़रवरी के पहले हफ्ते में ही पुलिस की दबिश पड़ी और सावरकर को जेल में डाल दिया गया।

इस मामले में नाथूराम गोडसे का बयान भी जानने लायक है। उन्होंने साफ़ कहा था कि गाँधी की हत्या में सावरकर का कोई हाथ नहीं है। गोडसे ने अदालत में कहा था कि गाँधी की हत्या से सावरकर उतने ही अनभिज्ञ हैं, जितनी आकाश से पृथ्वी अलग है।

जहाँ एक तरफ हम गाँधी जी के बयानों की चर्चा करते हैं, उन्हें पढ़ते हैं, वहीं गोडसे की मानसिकता जानने के लिए उनके द्वारा अदालत में दिए गए बयान काफी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

हरिंद्र श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘सावरकर पर थोपे हुए चार अभियोग‘ में गोडसे के उस बयान का जिक्र किया है। गोडसे ने कहा था कि उन्होंने गाँधी जी को स्वर्ग पहुँचा कर यमदूत का धर्म निभाया है। अदालत में गोडसे ने कहा था:

“गाँधीजी के साथ जो भी किया गया, वो मैंने ही किया है। ये मेरी ही योजना थी। इसमें सावरकर को घसीटना भ्रामक, मिथ्यापूर्ण और शरारती होगा। गाँधीजी की आत्मा को परमात्मा तक मैंने पहुँचाया है, ऐसे में किसी और के सिर पर इसका सेहरा बाँधना मेरे यमदूतत्व की तौहीन होगी। गाँधीजी प्रभु श्रीराम के चरणदास थे, मैंने उन्हें श्रीराम के पास ही पहुँचा दिया। गाँधीजी जीवन भर ‘सत्य के प्रयोग’ करते रहे, मैंने उन्हें सत्य के देवता का दर्शन करा दिया। बेचारे जिंदगी भर अवसादग्रस्त रहे, मैंने उन्हें उनके अवसाद से मुक्ति दिला दी। मैंने गाँधीजी को ठिकाने पहुँचा कर राष्ट्र का कार्य किया है।”

सावरकर एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनसे तमाम आलोचनाओं के बावजूद महात्मा गाँधी भी प्रभावित रहते थे। नाथूराम गोडसे ने भी स्वीकार किया था कि वो सावरकर के विचारों से प्रभावित रहे हैं। गाँधीजी सावरकर द्वारा दलित-उद्धार के लिए किए जा रहे कार्यों के मुरीद थे लेकिन उनके हिंदुत्व की आलोचना करते थे।

सरकारी वकील का कोर्ट में कहना था कि गाँधी की हत्या से पहले सावरकर के घर में जाकर गोडसे ने आशीर्वाद लिया था।

गोडसे का मानना था कि महात्मा गाँधी की कार्यप्रणाली हिन्दू विरोधी और हिन्दू इतिहास के विपरीत है। गोडसे लगातार मजहबी घुसपैठियों द्वारा हिन्दुओं पर किए गए अत्याचार के कारण दुःखी रहते थे और इस बात को वो गाँधी जी को भी समझाना चाहते थे।

गोडसे का कहना था कि इस्लामी घुसपैठिए भारत को ‘दारुल हरब’ बनाना चाहते हैं। उनका मानना था कि लोग मर-कट रहे हैं लेकिन गाँधीजी ‘निर्लज्जता’ से हिन्दू विरोधी कार्यों में समुदाय विशेष का साथ दे रहे हैं।

गाँधीजी की हत्या का नाट्य रूपांतरण फ़िल्म ‘हे राम’ में

नाथूराम गोडसे के भाई और गाँधीजी की हत्या में उम्रकैद की सज़ा भुगत चुके गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक ‘गाँधी वध क्यों‘ में लिखा है कि नाथूराम ने कहा था कि उन्होंने देश की भलाई के लिए ये काम किया है और इंसानों के न्यायालय से ऊपर कोई और अदालत है तो वहाँ उनके इस कृत्य को पाप नहीं समझा जाएगा।

नाथूराम ने कहा था कि उन्होंने ऐसे व्यक्ति पर गोली चलाई है, जिसकी नीतियों से हिन्दुओं पर घोर संकट आए, हिन्दू नष्ट हुए।

गोपाल गोडसे को भी अपने अंतिम दिनों तक गाँधीजी की हत्या पर कोई अफ़सोस नहीं था और वो भारत के विभाजन के लिए उन्हें ही दोषी मानते रहे।

गोपाल गोडसे पुणे में रहते थे और बुढ़ापे तक दिए गए हर इंटरव्यू में उन्होंने गाँधीजी की हत्या के लिए ‘गाँधी वध’ शब्द का प्रयोग किया और साथ ही इसी नाम से एक पुस्तक भी लिखी। इस पुस्तक की शुरुआत में उन्होंने जस्टिस खोसला के एक बयान का जिक्र किया है।

जस्टिस खोसला महात्मा गाँधी की हत्या के बाद हो रही सुनवाई में शामिल थे। उनका कहना था कि अगर अगर जनता को जूरी बना दिया जाता और उन्हें फ़ैसला सुनाने का जिम्मा सौंप दिया जाता तो वो निश्चित ही नाथूराम गोडसे को निर्दोष करार देती और वो भी काफ़ी बड़े बहुमत से। ये बयान बताता है कि गोडसे के विचारों और उनके तर्कों से जनता का एक बड़ा भाग सहमत था। इसीलिए, आज उनके बयानों पर चर्चा तो होनी ही चाहिए।

नाथूराम गोडसे ने अदालत में स्पष्ट कहा था कि वो किसी भी प्रकार की दया नहीं चाहते हैं और न ही वो ये चाहते हैं कि कोई उनके लिए दया की अपील करे। उनका कहना था कि देश के लिए भले ही गाँधीजी ने अनगिनत कष्ट सहे हों लेकिन उन्हें राष्ट्र के विभाजन का अधिकार नहीं था।

उन्होंने अपने अंतिम पत्र में अनुजों को अपने बीमा के रुपयों के मिलने की बात लिखी थी। उनकी अंतिम इच्छा थी कि जब सिंधु नदी पूर्णरूपेण भारत में फिर से बहे, तो उनकी अस्थियाँ उसमें प्रवाहित की जाएँ।

नाथूराम गोडसे को अपने अंतिम दिनों में भी भारत और हिंदुत्व की चिंता खाए जा रही थी। तभी तो उन्हें जैसे ही पता चला कि सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का कार्य होने जा रहा है, उन्होंने 101 रुपए अपने बंधुओं को भिजवाए और उनसे कहा कि इस धनराशि को मंदिर के कलश के लिए भिजवाया जाए।

नाथूराम गोडसे इस बात के लिए भी दुःखी थे कि महात्मा गाँधी के अनशन के कारण भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए न देने के फ़ैसला बदल लिया। कुछ और भी ऐसी बातें थीं, जिसके कारण नाथूराम गोडसे गाँधीजी से नाराज़ थे।

दिल्ली की बंगाली कॉलोनी में एक मंदिर में महात्मा गाँधी ने कुरान का पाठ किया था, जिससे गोडसे विचलित हो गए थे। गोडसे ने इसके विरोध में मार्च भी निकाला था। गोडसे का ये पूछना था कि क्या महात्मा गाँधी किसी मस्जिद में गीता पाठ कर सकते हैं क्या? नाथूराम गोडसे इन्हीं कारणों से गाँधी से खफा थे, जिसके बाद उन्होंने हत्या जैसा कदम उठाया।

बस, खाली बस, 10 बजे, लखनऊ, गाजियाबाद… 1000 बसों के फेर में उलझीं प्रिंयका गाँधी, कर रहीं लेटरबाजी

कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 हजार बसें चलाने की अनुमति मिलने के बाद भी प्रियंका गाँधी ने यूपी सरकार पर राजनीति करने का आरोप लगाया है।

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने यूपी के एडिशलन चीफ सेक्रेट्री को लिखे पत्र में ये आरोप मात्र बस की डिटेल्स पूछे जाने पर लगाया है।

NDTV द्वारा शेयर ट्वीट के अनुसार, कॉन्ग्रेस महासचिव ने अपने पत्र में इस बात का उल्लेख करते हुए हैरानी जताई कि जिस समय में हजारों मजदूर सड़कों पर पैदल चल रहे और यूपी के बॉर्डर पर हजारों की भीड़ पंजीकरण केंद्रों पर उमड़ी हुई है। उस समय वे उनसे 1000 बसों को लखनऊ में सुबह 10 बजे हैंडओवर करने की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं।

उन्होंने लिखा, “1000 बसों को लखनऊ भेजना न सिर्फ़ समय और संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि हद दर्जे की अमानवीयता है और एक घोर गरीब मानसिकता की उपज है। माफ कीजिएगा, मगर आपकी सरकार की यह माँग पूरी तरह से प्रेरित लगती है। ऐसा लगता नहीं है कि आपकी सरकार विपदा के मारे हमारे यूपी के श्रमिक भाई-बहनों की मदद करना चाहती है।”

अब, हालाँकि, खुद को प्रवासी मजदूरों का हितैषी बताने वाली  प्रियंका गाँधी ने ये बातें जिस संदर्भ में लिखीं, उन्होंने इसका उल्लेख भी किया और उसी बीच अवनीश अवस्थी की ओर से लिखे दो पत्र भी सामने आए।

एक में प्रियंका गाँधी अपने पत्र के जरिए ये बताती दिखीं कि यूपी सरकार उनकी बसों को खाली लखनऊ भेजने की शर्त रख रही है।

वहीं, अवनीश अवस्थी के एक पत्र में बसें हैंडओवर करने की बात कहीं भी सामने नहीं लिखी दिखी। जिसके कारण यूजर्स हैरानी में रह गए कि प्रियंका गाँधी किन संदर्भों में बात कर रही हैं।

वहीं दूसरे पत्र में उन्होंने समस्त बसों सहित उनका फिटनेस सर्टिफिकेट एवं चालक के ड्राइविंग लाइसेंस के साथ ही परिचालक का पूर्व विवरण सुबह 10 बजे तक माँगा है। 

अब इसी पत्र के शुरुआती शब्दों को हाईलाइट करके प्रियंका गाँधी के समर्थक उनका सोशल मीडिया पर समर्थन कर रहे हैं और उनके आरोपों के ख़िलाफ़ सवाल पूछने वालों को जवाब दे रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले कल उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रियंका गाँधी के प्रवासी मजदूरों को लिए एक हजार बसें चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। यूपी के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने प्रियंका गाँधी को पत्र लिखकर बिना किसी देरी के एक हजार बसों और ड्राइवरों का विवरण माँगा था।

इस संबंध में सरकार के अपर मुख्य सचिव ने प्रियंका गाँधी को चिट्ठी लिखते हुए सरकार की सहमति की जानकारी दी थी। पत्र में आगे लिखा गया था कि प्रियंका अविलंब 1000 बसों की सूची और उनके चालक/परिचालक की डिटेल्स को सरकार को उपलब्ध कराएँ, जिससे कि इनका उपयोग प्रवासी मजदूरों के लिए हो सके।

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय की तरफ से कॉन्ग्रेस और प्रियंका गाँधी पर निशाने साधते हुए 4 सवाल किए गए थे। इन सवालों में योगी आदित्यनाथ कार्यालय की ओर से बसों को लेकर सवाल पूछे गए थे और प्रश्न उठाया गया था कि जब उनके पास 1000 बसें उपलब्ध थी, तब आखिर क्यों उन्होंने श्रमिकों को ट्रक में भरकर भेजा।

बता दें कि सरकार की ओर से मंजूरी मिलने से पहले कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने यूपी सरकार पर आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार श्रमिकों की मदद करने और उनके लिए किसी की सहायता लेने के लिए तैयार नहीं है। वह बसों की व्यवस्था करने की उनकी पेशकश को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

मगर, जब कल सरकार ने इस माँग को स्वीकार लिया व बसों का ब्यौरा माँगा, तो उन्होंने लोगों को सरकारी भाषा में उलझा दिया और अपने यूपी सरकार पर लगाए अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए लेटरबाजी करके लोगों का ध्यान भटका दिया।

अब पंजाब में संत की निर्मम तरीके से हुई हत्या, आश्रम से मिला महा योगेश्वर मुनि का सड़ा-गला शव

देश के अलग-अलग हिस्सों में एक के बाद एक संतों को निशाना बनाया जा रहा है। इस बार खबर पंजाब से आई है, जहाँ एक संत की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। पुलिस ने संत महा योगेश्वर मुनि देशम का सड़ा-गला हुआ शव उनके ही आश्रम से बरामद किया है। योगेश्वर मुनि अग्नि अखाड़ा काली कमली वाले ऋषिकेश से जुड़े हुए थे। फिलहाल पंजाब पुलिस मामले की जाँच में जुट गई है।

खबरों के मुताबिक पंजाब के काठगढ़ थाना क्षेत्र में स्वराज माजदा फैक्ट्री के सामने नूरपुरबेदी स्थित डेरा ऋषि मुनि देशम आश्रम में रविवार (17 मई, 2020) को संत महा योगेश्वर महाराज का शव मिला। इसकी जानकारी उस समय हुई कि जब पनियाली कलाँ का रहने वाला एक शिष्य जगदीश लाल आश्रम में उनके लिए भोजन लेकर पहुँचा था।

जगदीश लाल के मुताबिक वह आश्रम में पहुँचा तो उसे आश्रम के अंदर से बदबू आ रही थी, उसने अंदर जाकर देखा तो कमरे में सारा सामान बिखरा हुआ था, जबकि संत महाराज का शव सड़ा हुआ जमीन पर पड़ा हुआ था। इसकी जानकारी तत्काल पुलिस को दी गई।

कुछ ही देर में सूचना पर थाना काठगढ़ की पुलिस मौके पर पहुँची गई। इसके बाद पहुँची फारेंसिक टीम ने मौके से सबूत एकत्रित किए। इसी के साथ पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। वहीं पुलिस ने संत के भाई दिनेश कुमार के बयानों के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया है। संत के भाई ने बताया कि लॉकडाउन और राज्य में लागू कर्फ्यू के कारण आश्रम पर श्रद्धालुओं का आवागमन बेहद कम हो गया था।

वहीं मामले को लेकर अब पुलिस जाँच में जुट गई है। पुलिस हत्या के पीछे आश्रम की भूमि पर कब्जे और उसमें चोरी की नीयत आदि पहलुओं को लेकर भी जाँच कर सकती है, क्योंकि आश्रम के पास तीन एकड़ की भूमि है।

थाना प्रभारी परमिंदर सिंह ने बताया कि संत का शव गल चुका था और यह कत्ल कुछ दिन पहले का हुआ था। लूटपाट से और दरवाजे की तोड़फोड़ से यह लुटेरों का काम लगता है। पुलिस ने संत के भाई के बयानों के आधार पर मामला दर्ज किया।

जानकारी के मुताबिक 85 वर्षीय संत अबदूत महायोगेश्वर पिछले 40 सालों से भी ज्यादा समय से इस आश्रम रह रहे थे, जो कि हिमाचल के जिला मंडी के सरकाघाट के रहने वाले थे। वह अग्नि अखाड़ा काली कमली वाले ऋषिकेश से जुड़े हुए थे।

आपको बता दें कि इससे पहले भी महाराष्ट्र के पालघर 16 अप्रैल, 2020 को 2 साधुओं सहित 3 लोगों की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस घटना का वीडियो 3 दिन बाद सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था, जिसके बाद लोगों को सच्चाई पता चली थी।

संतों की मॉब लिंचिंग पर अखिल भारतीय संत समिति ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इसकी सीबीआई जाँच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की थी।इसके बाद उत्तर प्रदेश में भी एक साधु की हत्या की गई। कुछ इसी तरह अब पंजाब में एक संत की हत्या की घटना सामने आई है।

मुंबई पुलिस के अमोल कुलकर्णी के लिए घातक साबित हुई उद्धव सरकार की उदासीनता, एंबुलेंस न मिलने से हुई मौत: पत्रकार का खुलासा

देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। महाराष्ट्र इस वायरस से सबसे अधिक संक्रमित राज्य है। यहाँ के पुलिसकर्मियों के बीच भी कोरोना का व्यापक प्रसार देखने को मिला। अब तक एक हजार से अधिक पुलिसकर्मी इसकी चपेट में आ चुके हैं।

अब ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ में काम करने वाले पत्रकार ने प्रशासन द्वारा कोरोना वायरस के फ्रंटवर्करों के प्रति महाराष्ट्र की उद्धव सरकार की उदासीनता को लेकर चौंकाने वाला खुलासा किया है।

महाराष्ट्र टाइम्स के जर्नलिस्ट विजय चोरमारे ने मुंबई पुलिस अधिकारी अमोल कुलकर्णी के साथ हुए गलत व्यवहार को उजागर करने के लिए फेसबुक का सहारा लिया। उन्होंने बताया कि अमोल कुलकर्णी धारावी के शाहूनगर में तैनात थे, जहाँ कोरोना के मामले धड़ल्ले से बढ़ रहे हैं।

विजय चोरमारे का फेसबुक पोस्ट

वो यहाँ पर कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए तैनात थे, मगर दुर्भाग्यवश कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए वो भी इसकी चपेट में आ गए, जिसके बाद उन्हें होम क्वारंटाइन की सलाह दी गई। चोरमारे ने आरोप लगाया कि जब कुलकर्णी की हालत बिगड़ गई, तो उन्होंने हेल्पलाइन नंबर 108 पर कॉल किया, लेकिन कोई सरकारी एम्बुलेंस उन्हें लेने के लिए नहीं आई।

इसके अलावा कुलकर्णी के सहयोगी, स्वयं पुलिस अधिकारी भी अपने दोस्त को अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस का इंतजाम नहीं कर पाए। लगभग आधे घंटे तक इंतजार करने के बाद एक निजी एंबुलेंस उन्हें अस्पताल ले गई।

विजय चोरमारे का फेसबुक पोस्ट

हालाँकि, यह आधे घंटे की देरी भी पुलिस अधिकारी के लिए काफी घातक साबित हुई, क्योंकि उनकी हालात लगातार बिगड़ती जा रही थी। और फिर बाद में वही हुआ, जिसका अंदेशा था। हॉस्पिटल ने उन्हें सुबह में मृत घोषित कर दिया

चोरमारे आगे पोस्ट में बताते हैं कि चूँकि कुलकर्णी कोरोना वायरस से संक्रमित थे, इसलिए उनके मृत घोषित करने के साथ ही तुरंत उनके शव को धोकर एक बैग में पैक कर दिया गया। हालाँकि उनके डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह कोरोना वायरस बताने की जगह हाई ब्लड प्रेशर और डाइबिटीज बताया गया।

जब कुलकर्णी के दोस्तों को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अस्पताल के अधिकारियों से मौत का कारण कोरोना वायरस लिखने के लिए कहा, मगर अस्पताल प्रशासन ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। इसके बाद पुलिस अधिकारी कुलकर्णी के दोस्तों ने शिरला के विधायक मानसिंह फतसिंह राव नाइक से मदद मांँगी। मानसिंह फतसिंह ने महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए कहा। तब जाकर कुलकर्णी के डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह COVID-19 अपडेट किया गया।

विजय चोरमारे का फेसबुक पोस्ट

कुलकर्णी की एक बेटी और पत्नी है। उनका भी कोरोना वायरस टेस्ट करवाया गया है। रिजल्ट आना अभी बाकी है। फिलहाल दोनों होम क्वारंटाइन में हैं।

कुलकर्णी का अंतिम संस्कार नगर निगम द्वारा किया गया था। कोरोना वायरस लॉकडाउन की वजह से कुलकर्णी का कोई भी रिश्तेदार उनके गाँव से उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका। अमोल के बेस्ट फ्रेंड ने उन्हें अंतिम सलामी दी।

यहाँ तक कि जिन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अंतर्गत कुलकर्णी काम कर रहे थे, वो लोग भी उनसे मिलने अस्पताल नहीं गए। वो गृह मंत्री अनिल देशमुख के साथ पुलिस स्टेशन गए, जहाँ उन्होंने सहायक पुलिस निरीक्षक को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

हालाँकि, इस पूरे प्रकरण ने राज्य में प्रशासन की विफलता और राज्य में कोरोना वायरस संकट से निपटने में अक्षमता की पोल खोल कर रख दी है। जब राज्य का प्रशासन कोरोना वायरस से संक्रमित फ्रंटलाइन वर्करों को उचित सुविधा नहीं दे सकती है, तो फिर इस बीमारी से संक्रमित हजारों नागरिकों को किस तरह की सुविधा मिलती होगी, ये तो कल्पना से परे है।

चोरमारे कहते हैं, “दोस्तों, यह एक बड़े से गाड़ी की एक छोटे से हिस्से की कहानी है। अमोल एक बड़ी सिस्टम का एक हिस्सा था जिसका उद्देश्य नागरिकों को सुरक्षित रखना और उन्हें सहायता प्रदान करना था। “Covid Warriors” के रूप में फ्रंट-लाइन योद्धाओं को महिमामंडित करने का कोई मतलब नहीं है, जब उन्हें आवश्यक सहायता और समर्थन नहीं दिया जाता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। यह घिसी-पिटी कहानी एक प्रतिनिधि तस्वीर है कि राज्य प्रशासन अपने Covid Warriors के साथ कैसा व्यवहार करता है।”

उन्होंने आगे कहा, “इस प्रकार प्रशासन द्वारा COVID-19 से पीड़ित एक पुलिस अधिकारी का इलाज किया गया। जब राज्य प्रशासन के किसी कर्मचारी के साथ ऐसी उदासीनता बरती जाती है, तो ऐसे प्रशासन द्वारा आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? इसलिए यह असामान्य नहीं है कि लोग चिलचिलाती धूप में अपनी पीठ पर बैग रखकर अपने मूल स्थानों की ओर भाग रहे हैं। अब आप तय कीजिए कि आप अपने प्रियजनों को मुंबई में रहने और अपने भाग्य का इंतजार करने के लिए कहेंगे या उन्हें अपने गाँव लौटने के लिए कहेंगे?”

‘गौमांस खा, तब जाकर तू पक्की मुस्लिम बनेगी’, हिंदू महिला ने पति नफीस पर लगाए प्रताड़ना, धर्मांतरण के दवाब का आरोप

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें एक महिला खुद को नेहा खान बताती है। वीडियो में महिला को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि उसका पति उसे प्रताड़ित करता है।

नेहा बताती हैं कि वह हिन्दू है और उसका पति मुस्लिम है। वह दिल्ली के बुराड़ी में रहती है। उन्होंने दो साल पहले नफीस खान नाम के शख्स के साथ शादी की थी। शादी के डेढ़ महीने बाद से ही नफीस ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

नेहा ने आरोप लगाया कि उसका पति उसके साथ हर वक्त मारपीट करता रहता है। ठीक से खाने के लिए नहीं देता है और साथ ही उसके साथ धार्मिक आधार पर अत्याचार करता है, उसे जबरन गौमांस खाने के लिए मजबूर करता है।

जर्नलिस्ट सौम्यदीप्त ने ट्विटर पर इस वीडियो को शेयर किया है।

ऑपइंडिया ने इस बाबत नेहा के वकील करुणेश शुक्ला से संपर्क किया। उन्होंने हमें बताया कि पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 323 और 506 के तहत FIR दर्ज कर ली है। बताया जा रहा है कि जब नेहा ने इस मामले में FIR दर्ज करवाने की कोशिश की थी, तो बुराड़ी पुलिस ने मना कर दिया था, लेकिन वकील के हस्तक्षेप के बाद FIR दर्ज कर लिया गया है। यह FIR 14 मई को दर्ज की गई।

FIR registered in the matter

बुराड़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR में कहा गया है कि नेहा खान ने मार्च 2018 में नफीस खान से शादी की थी। यह एक प्रेम विवाह था। 9 महीने बाद उसकी बेटी पैदा हुई थी। वह FIR में कहती है कि उसे शादी के बाद पता चला कि उसका पति पहले से ही शादीशुदा था।

नेहा कहती है कि शादी के कुछ ही महीनों बाद नफीस ने उसके साथ लड़ाई-झगड़ा और मारपीट करना शुरू कर दिया। लेकिन वो अपनी शादी बचाने के लिए इन सारे कष्टों को झेलती रही। आगे FIR में नेहा दावा करती है कि बेटी के जन्म के बाद से नफीस ने उसके साथ और भी अत्याचार करना शुरू कर दिया।

नेहा खान का कहना है कि नफीस खान ने उसे जान से मारने की धमकी दी। वो दावा करती है कि अप्रैल में नफीस ने उसे बड़ी बंदूक दिखाकर जान से मारने की धमकी दी। वह कहती है कि FIR दर्ज करने के एक सप्ताह पहले भी नफीस ने उसे बंदूक दिखाकर जान से मारने की धमकी दी थी। साथ ही वह आरोप लगाती है कि नफीस उसे और उसकी बेटी को पूरा खर्च भी नहीं देता है।

The FIR registered in the matter

वकील करुणेश शुक्ला ने हमें बताया कि नेहा खान तब से अपने माता-पिता के घर गई हैं। नफीस खान फिलहाल कहाँ है, इसके बारे में वकील करुणेश को पता नहीं है। वकील ने हमें बताया कि उन्हें नेहा के पति के परिवार की तरफ से लगातार धमकियाँ दी जा रही हैं।

उन्होंने हमें यह भी बताया कि उन्हें पाकिस्तान से भी धमकियाँ मिल रही हैं। भद्दी-भद्दी गालियाँ दी जा रही हैं। उनकी जान को खतरा है।

एडवोकेट करुणेश ने बताया, “नफीस ने शादी से पहले नेहा से कहा था कि वो अपना पूजा-पाठ जारी रख सकती है, उसे इससे कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद से उसने उसे गाय का मांस खाने के लिए मजबूर करने लगा। नफीस उसे नमाज और कुरान पढ़ने के लिए कहता था और मना करने पर उसे मारता-पीटता था।”

महिला का जो वीडियो वायरल हुआ है, उसमें भी वो इनमें से काफी सारी बातों को दोहराती है। साथ ही वीडियो में वो यह भी बताती है कि उसके पति का भाई आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ा हुआ है। वो कहती है कि उसका पति उसे घर से बाहर निकालने की धमकी देता है और साथ ही कहता है कि उसकी कब्र वहीं पर खोद देगा।

एक अन्य वीडियो में वह न्याय की गुहार लगाती हुई कहती है कि उसके पति के खिलाफ कार्रवाई की जाए। वो कहती है कि जब उसने रोजा रखने और नमाज पढ़ने से मना कर दिया तो नफीस ने उसके साथ मारपीट की। इसके साथ ही वह यह भी कहती है कि पहली बार जब वह प्रेगनेंट थी, तो नफीस ने उसका लिंग परीक्षण करवाया था। डॉक्टरों ने जब बताया कि लड़का है, तो उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन जब दूसरी बार लड़की हुई तो उसे और ज्यादा प्रताड़ित करने लगा।

नेहा वीडियो में कहती है कि उसके पति ने कहा, “तू अभी पक्की मुस्लिम नहीं बनी है, गौमांस खा, भैंस का मांस खा, तब जाकर तू मुस्लिम बनेगी।” वह कहती है कि इस बात को लेकर उसके पति ने उसकी बहुत पिटाई की। नफीस ने उसका बिजली का बिल भरने से मना कर दिया।

इसके साथ ही मुहल्ले में पानी पहुँचाने वालों को भी मना कर दिया कि वो उसके घर पानी न पहुँचाए। नफीस ने उसे FIR वापस लेने की भी धमकी दी है। साथ ही वीडियो में नेहा कहती है कि नफीस उसे ये भी धमकी देता है कि वो तो पैसों के दम पर बाहर निकल जाएगा, वो क्या करेगी। एडवोकेट ने हमें बताया कि मामले में फिलहाल पूछताछ जारी है।