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दहेज की माँग पर बीबी के चेहरे पर तेजाब फेंककर शौहर मो. नौशाद फरार, पहले से हैं 3 शादियाँ

बिहार स्थित सुपौल में शराब के नशे में धुत नौशाद ने अपनी पत्नी के चेहरे पर तेजाब डाल दिया। सुबह 4 बजे, इस घटना के समय नौशाद की पत्नी सो रही थी और आरोपित नौशाद तेजाब डालने के बाद वहाँ से फरार हो गया।

तेजाब डालने से तड़पती हुई पत्नी को उसके गाँव वालों ने नजदीकी राघोपुर अस्पताल पहुँचाया। राघोपुर अस्पताल के चिकित्सक डॉक्टर अहमद ने भी पीड़ित लड़की के तेजाब से घायल होने की पुष्टि की है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, राघोपुर पुलिस इस मामले में फिलहाल कुछ भी बताने से मना कर रही है।

एसिड अटैक की यह घटना बिहार के सुपौल स्थित राघोपुर थाना इलाके के धोबी टोला की है। रिपोर्ट्स के अनुसार आरोपित मोहम्मद नौशाद लगातार अपनी पत्नी से दहेज की माँग करता था और उसके साथ मारपीट करता था।

मंगलवार (मई 12, 2020) रात वो शराब के नशे में घर पहुँचा था। नौशाद की पीड़ित पत्नी का कहना है कि इसी दौरान उसकी ननद ने नौशाद से उसके चेहरे पर तेजाब फेंकने की बात कही और उसे सुला दिया।

बुधवार सुबह 4 बजे जब पीड़िता सोई हुई थी, उसी समय उनके चेहरे के ऊपर तेजाब डाल दिया और मोहम्मद नौशाद सहित उसका परिवार वहाँ से फरार हो गया। मो. नौशाद की पत्नी ने बताया है कि दहेज की माँग को लेकर गाँव में भी कई बार पंचायत हुई थीं।

ज्ञात हो कि आरोपित मोहम्मद नौशाद की इससे पहले भी कई निकाह हो चुका है और पीड़ित नजराना खातून उसकी तीसरी बीबी बताई जा रही है।

रोहित जायसवाल मामला: देवरिया में है पीड़ित परिवार, थानाध्यक्ष पर कार्रवाई की मॉंग

अपडेट: बिहार के डीजीपी की जॉंच के बाद हम सूचनाओं को अपडेट कर रहे हैं। पीड़ित पिता इस दौरान कई बार अपने बयान से मुकरे हैं। लिहाजा उनकी ओर से किए गए सांप्रदायिक दावों को हम हटा रहे हैं। हमारा मकसद किसी संप्रदाय की भावनाओं का आहत करना नहीं था। केवल पीड़ित पक्ष की बातें सामने रखना था। इस क्रम में किसी की भावनाओं को ठेस पहुॅंची हो तो हमे खेद है।

गोपालगंज के रोहित जायसवाल मामले में पीड़ित परिवार के गॉंव छोड़ देने की खबर है। बिहार के गोपालगंज के कटेया थाना स्थित बेलहीडीह गाँव के राजेश जायसवाल के बेटे रोहित की लाश नदी से मिली थी। वे अपने बेटे की हत्या किए जाने का दावा कर रहे हैं।

पीड़ित परिवार अभी यूपी के देवरिया में रह रहा है। राजेश जायसवाल ने कटेया थानाध्यक्ष पर कार्रवाई की मॉंग की है।

बता दें कि राजेश जायसवाल ने आरोप लगाया था उनके बेटे की हत्या की गई है। पुलिस का पक्ष जानने के लिए ऑपइंडिया लगातार प्रयासरत रहा है लेकिन थानाध्यक्ष अश्विनी तिवारी ने कम से कम 5 बार रिपोर्टर की कॉल को जल्दी-जल्दी में काट दिया। हम अभी भी संपर्क करने में जुटे हुए हैं ताकि पुलिस का पक्ष भी विस्तारपूर्वक सामने लाया जा सके।

ऑपइंडिया ने एक बार फिर से हथुआ डीएसपी से बात कर के पुलिस का पक्ष जानने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने ख़ुद के व्यस्त होने की बात कहते हुए फोन काट दिया। ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया था कि थाना प्रभारी अश्विनी तिवारी ने 22 दिनों तक मृतक रोहित की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दबा कर रखी।

थानाध्यक्ष अश्विनी तिवारी पर भी राजेश और उनकी पत्नी ने दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। राजेश ने ऑपइंडिया से कहा था- “थानाध्यक्ष ने मुझे गाली दी, मेरी पत्नी को गाली दी और मारपीट की। ऐसा व्यवहार किया जाता है क्या? उन्होंने अपनी पैंट खोल कर अश्लील इशारे किए।

उन्नाव में 1000 टन सोने के दबे होने का दावा करने वाले संत शोभन सरकार का निधन, अखिलेश यादव ने जताया दुख

परमहंस स्वामी विरक्तानंद उर्फ शोभन सरकार का बुधवार (मई 13, 2020) को निधन हो गया। उनके देहांत की खबर लगते ही इलाके में शोक की लहर दौड़ गई और कानपुर देहात के शिवली कोतवाली क्षेत्र के बैरी में बने उनके आश्रम में अंतिम दर्शन के लिए भक्त पहुँचने लगे।

शोभन सरकार 2013 में उस वक्त सुर्खियों में आए थे, जब उनके एक सपने के आधार पर उन्नाव के डौंडिया खेड़ा में आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की टीम खजाने की खोज में जुट गई थी।

शोभन सरकार ने दावा किया था कि उन्हें सपने में राजा राम बख्श सिंह के किले में शिव चबूतरे के पास 1000 टन सोने के दबे होने का पता चला है। इसके बाद ही साधु शोभन सरकार ने सरकार से सोना निकलवाने की बात कही थी।

स्थिति तब हास्यास्पद हो गई जब सरकार ने उनके सपने को सच मानते हुए खजाने को खोजने के लिए खुदाई भी शुरू करवा दी। हालाँकि, कई दिनों तक चली खुदाई के बाद भी खजाना नहीं मिला। विहिप नेता अशोक सिंघल ने कहा था कि सिर्फ एक साधु के सपने के आधार पर खुदाई करना सही नहीं है।

खजाने के कई दावेदार भी सामने आ गए थे। राजा के वंशज ने भी उन्नाव में डेरा जमा दिया था। वहीं, ग्रामीणों ने भी उस पर दावा किया था। इसके बाद तत्कालीन केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया था कि खजाने पर सिर्फ देशवासियों का हक होगा। वहीं प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार ने कहा था कि खजाने से निकली संपत्ति पर राज्‍य सरकार का हक होगा।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शोभन सरकार के निधन पर शोक व्यक्त किया है। अखिलेश यादव ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “शोभन सरकार” स्वामी विरक्त आनंद महाराज जी का देहावसान अत्यंत दुःखद! ईश्वर संत आत्मा को शांति एवं उनके लाखों अनुयाइयों को इस कठिन समय में शक्ति प्रदान करे। भावभीनी श्रद्धांजलि!”

शोभन सरकार के भक्तों के मुताबिक उन्हें किसी ने नहीं देखा है। इनका असली नाम परमहंस विरक्तानंद है। लोग सम्मानपूर्वक उनके नाम के साथ ‘सरकार’ जोड़ते हैं।

इनका जन्म कानपुर देहात के शुक्लन पुरवा में हुआ था। पिता का नाम पंडित कैलाशनाथ तिवारी था। कहते हैं कि शोभन सरकार को 11 साल की उम्र में वैराग्य प्राप्त हो गया था। कपड़े के नाम पर वह सिर पर साफा बाँधते थे। गेरुए रंग की लंगोट पहनते थे और बदन पर अंगवस्त्र होता था।

लॉकडाउन में उज्जैन से पद यात्रा पर निकाल रहे 2 कॉन्ग्रेसी विधायक सहित 7 गिरफ्तार, हाथ-पैर पकड़कर पुलिस ने गाड़ी में बैठाया

मध्य प्रदेश के उज्जैन में दो कॉन्ग्रेसी विधायकों और 5 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इन सभी को प्रदेश में लागू धारा 144 सहित कर्फ्यू के उल्लंघन की धाराओं में केस दर्ज कर जेल भेजा गया।

दरअसल, तराना से कॉन्ग्रेस विधायक महेश परमार और आलोट विधानसभा से विधायक मनोज चावला अपने 5 कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ उज्जैन से भोपाल तक की पदयात्रा पर निकले थे। वो भगवान महाकाल के दर्शन कर भोपाल तक की पैदल यात्रा निकालना चाह रहे थे, मगर पुलिस ने परमिशन न होने की वजह से दोनों कॉन्ग्रेसी विधायकों और कार्यकर्ताओं को महाकाल के मंदिर से आगे जाने से रोक दिया

उनका कहना था कि वो कोरोना के चलते किसानों और मजदूरों की समस्याओं को लेकर महाकाल शिखर दर्शन कर उज्जैन से भोपाल पदयात्रा कर राज्यपाल को पत्र देने जा रहे थे। जब पुलिस ने उन्हें आगे जाने से रोका तो वो लोग वहीं पर बैठकर धरना देने लगे।

पुलिस ने उनसे काफी आग्रह किया कि वो नियमों का पालन कर वापस लौट जाएँ, मगर वो अपनी जिद पर अड़े रहे। जब काफी मशक्कत के बाद भी कॉन्ग्रेसी विधायक और कार्यकर्ता ने पुलिस की बात नहीं मानी तो प्रशासन ने धारा 144 सहित कर्फ्यू के उल्लंघन की धाराओं में केस दर्ज कर दोनों कॉन्ग्रेसी विधायक और उनके समर्थकों वीरेंद्र सिंह, निजाम काजी, सोनू शर्मा, अजीत सिंह को केंद्रीय भेरूगढ़ जेल भेज दिया

कॉन्ग्रेसी नेता तो जेल जाने के लिए भी तैयार नहीं थे, वो धरना पर से उठने के लिए तैयार ही नहीं थे। जिसके बाद पुलिस ने हाथ-पैर पकड़कर उन्हें जबरन पुलिस वैन में बैठाया। वो लगातार उनसे कह रहे थे कि उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है, चाहे तो वह उन्हें गोली मार दें, लेकिन वह पैदल यात्रा निकाल कर ही रहेंगे। जेल में भी कॉन्ग्रेसी विधायक और कर्यकर्ता भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले अमरोहा से कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके और उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के सचिव सचिन चौधरी को धारा 144 के उल्लंघन करने के मामले में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। सचिन चौधरी पर हंगामा करने का आरोप लगा था।

मलेशिया की फोटो से भारत में फैलाया जा रहा झूठ: पत्रकार रोहिणी सिंह के प्रोपेगेंडा का फटा ढोल

कोरोना महामारी के समय में केंद्र सरकार को बदनाम करने के लिए मीडिया गिरोह ने अफवाहों का कारोबार तेज किया हुआ है। इसी क्रम में कल पत्रकार रोहिणी सिंह ने अपने ट्विटर पर एक पोस्ट शेयर किया और उसे ऐसे दर्शाया जैसे वह भारत में लागू किए गए लॉकडाउन का दुष्परिणाम है।

दरअसल, रोहिणी सिंह ने मलेशिया की दुकानों में रखे चमड़ों के प्रोडक्ट्स की कुछ तस्वीरें शेयर की, जिन पर नमी के कारण पड़े धब्बे साफ दिख रहे थे। यूँ तो ट्वीट में पत्रकार रोहिणी सिंह ने यह दावा नहीं किया है कि ये भारत की ही तस्वीरें हैं, परंतु संदर्भ को देखते हुए इशारा यही प्रतीत होता है कि उस स्थिति को भारत की स्थिति बता कर आलोचना की कोशिश की जा रही है।

बस फिर क्या? उन्होंने मलेशिया की इस खबर का इस्तेमाल अपना प्रोपेगेंडा चलाने के लिए किया और तस्वीरों के साथ ट्वीट में ऐसा लिखा, जिससे देशव्यापी लॉकडाउन पर सवाल किए जाने लगे।

उन्होंने लिखा, “इन सामानों को देखिए, अगर लोगों को लॉकडाउन से पहले थोड़ा समय दिया जाता तो शायद वे लोग अपने सामानों को सुरक्षित रख पाते।”

अब हालाँकि, ये ट्वीट रोहिणी के ट्विटर से डिलीट किया जा चुका है। लेकिन झूठ फैलाने के कारण लोग उनके ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर कर रहे हैं और उन्हीं के गिरोह के प्रतीक सिन्हा को इसका फैक्ट चेक करने को बोल रहे हैं। साथ ही ये भी कह रहे है कि अगर ऑल्ट न्यूज इसका फैक्ट चेक करेगा तो उनके पैसे कट जाएँगे।

वास्तविक खबर

कोरोना महामारी के कारण 50 दिन के लॉकडाउन से जूझते हुए मलेशिया में व्यापारियों ने हाल में अपना कारोबार दोबारा चालू किया। मगर, इस बीच उन्हें एक नई परेशानी से जूझना पड़ा। 

दरअसल, संक्रमण का प्रभाव रोकने के लिहाज से 50 दिन तक जो दुकानें वहाँ बंद रहीं, उन दुकानों में रखे-रखे चमड़ों के प्रोडक्ट्स पर धब्बे पड़ गए। जिसके कारण कुछ व्यापारियों ने वहाँ इसे देखकर हताशा जताई। वहीं कुछ व्यापारी सकारात्मक होकर इसके समाधान पर बात करते नजर आए।

स्ट्रेटटाइम्स के अनुसार, पिनांग के पुलाऊ तिकस के एक शॉपिंग मॉल में कोल्ड वियर स्टोर के मालिक, चोंग ने बताया कि ये सब ह्यूमिडिटी के कारण हुआ होगा। उन्होंने कहा कि मॉल का तापमान एयर कंडीशनिंग पर निर्भर करता है, कभी-कभी यह ठंडा हो जाता है। इससे आसपास की हवा में नमी अचानक बढ़ जाती है और धब्बे पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है।

चोंग के मुताबिक, कुछ वॉलेट, चमड़े के बैग और हैंडबैग में उन्हें ये परेशानी देखने को मिली है। इन धब्बों के पड़ने से दुकान में रखा नया सामान भी कम आकर्षित लगने लगा है। लेकिन इससे उनका काम प्रभावित नहीं होगा। वे कहते हैं कि केवल साफ कपड़े पर थोड़े से तेल का इस्तेमाल करके वो इन सभी प्रोडक्ट्स को साफ कर सकते हैं।

ऐसे ही, मिस ले नाम की अन्य महिला दुकानदार ने बताया कि जब 2 महीने बाद उन्होंने अपनी दुकान खोली तो उन्हें अधिकतर सामानों पर धूल जमी मिली। उन्होंने बताया कि उनके कुछ सामान जो डिस्प्ले पर रखे थे, उनमें उन्हें धूल ज्यादा मिली, क्योंकि दुकानें बंद होने के बाद वह उस जगह को साफ करने में असमर्थ थे। मगर वे प्रोडक्ट जो उन्होंने कागजों में लपेट कर रखे थे, वे सुरक्षित हैं।

उन्होंने कहा, हमारे ज्यादातर प्रोडक्ट शुद्ध चमड़े के नहीं होते। वे या तो आर्टिफिशियल चमड़े (PU Leather) के होते हैं या फिर पीवीसी चमड़ों के। इसी लिए उनमें धब्बे कम पड़ते हैं। 

भारत से होती तस्वीर तो क्या होता?

मलेशिया में व्यापारी कोरोना से आई इस परेशानी को बेहद आम बात मानकर चल रहे हैं। लेकिन भारत में मीडिया गिरोह के लिए ये तस्वीरें झूठ फैलाने का साधन बन गई हैं। सोचिए, जिन धब्बों को हटाने को लेकर मलेशिया के व्यापारी आम युक्तियाँ बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है, उस खबर को लेकर रोहिणी सिंह ने कैसे अपने फॉलोवर्स को बरगलाया कि देखते ही देखते इस पर 400 लोगों ने बिना सच्चाई जाने लाइक कर दिया।

सवाल उठता है अगर वास्तविकता में ये तस्वीर भारत के किसी कोने से आती, तो क्या ये अजेंडा ट्वीट डिलीट करने मात्र से खत्म होता? नहीं। तब शायद इसे पूरे राष्ट्र की परेशानी बताया जाता और इस प्रकार दर्शाया जाता जैसे मोदी सरकार द्वारा लॉकडाउन का फैसला कोरोना के समय में लिया गया सबसे गलत निर्णय है, जिसने व्यापारियों को नुकसान झेलने पर मजबूर कर दिया है।

चीन ने कोरोना संक्रमण की जानकारी विश्व से छिपाने के लिए बनाया था WHO पर दबाव: CIA का दावा

पूरे विश्व में इस समय भारी तबाही मचाने वाले कोरोना वायरस को लेकर पहले ही चीन संदेह के घेरे में है। ऐसे में अब अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने दावा कर दिया है कि उसी के कारण WHO ने समय रहते कोरोना के प्रति दुनिया को सचेत नहीं किया।

इस बात का खुलासा न्यूजवीक की रिपोर्ट के जरिए हुआ है। इस रिपोर्ट का नाम ‘UN-China: WHO Mindful But Not Beholden to China’ है। खबर के अनुसार, नाम न बताने कि शर्त पर दो CIA ऑफिशियल ने इस रिपोर्ट को कन्फर्म किया है।

दरअसल, इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी (US) खुफिया एजेंसी CIA के पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि चीन के दबाव की वजह से ही वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने वक़्त रहते दुनिया के देशों के लिए कोरोना वायरस की चेतावनी जारी नहीं की। 

CIA के मुताबिक चीन ने WHO को धमकी दी थी कि अगर उसने जल्दबाजी में कोई अलर्ट जारी किया तो वो उसे कोरोना संक्रमण की जाँच में शामिल नहीं करेगा।

WHO को दी इस धमकी के पीछे का उद्देश्य PPE, मास्क और अन्य मेडिकल सामनों की जमाखोरी करना बताया जा रहा है। डेली मेल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक जब तक WHO ने चेतावनी जारी नहीं की तब तक चीन दुनिया भर के देशों से महामारी के नाम पर PPE, मास्क, दस्ताने और अन्य ज़रूरी सामान मँगाकर इकठ्ठा करता रहा। मगर जैसे ही ये संक्रमण दुनिया में फैला उसने इन उपकरणों को उच्च दामों में बेचना शुरू कर दिया।

जानकारी के अनुसार, चीन द्वारा WHO पर ये दबाव जनवरी में बनाया गया। इस समय तक वहाँ पर करीब 80,000 केस कोरोना के सामने आ चुके थे और इटली व स्पेन में कोरोना की संख्या बढ़नी तेजी से शुरू हो गई थी। लेकिन, ऐसे हालातों को जानते हुए WHO ने कोरोना की जाँच में बने रहने के लिए इससे जुड़े खतरों को दुनिया को बताने में देर की।

बता दें, सिर्फ CIA ही नहीं, बल्कि जर्मन इंटेलीजेंस एजेंसी ने भी अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद WHO चीफ टेडरॉस एडनॉम से बातचीत की और उन्हें कोरोना संबंधी जानकारी न देने के लिए प्रभावित किया। जबकि, WHO ने इस दावे को खारिज किया है और कहा कि ऐसी कोई बातचीत नहीं हुई।

जर्मन ख़ुफ़िया एजेंसी BND के मुताबिक, जिनपिंग के कहने पर ही कोरोना के इंसानों से इंसानों में फैलने की बात को 15 दिन तक छिपाया गया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद WHO चीफ टेडरॉस एडनॉम से इस बारे में बातचीत की और उन्हें सभी जानकारी देने से रोका।

बताया जा रहा है कि ताइवान की लैब ने 10 जनवरी को ही WHO को बता दिया था कि वायरस इंसानों से इंसानों में फ़ैल रहा है। लेकिन फिर भी टेडरॉस ने 21 जनवरी को जिनपिंग से मुलाकात की और उनके कोरोना रोकने में उनके प्रयासों को सराहा। 28 जनवरी को टेडरॉस और जिनपिंग की मुलाकात के बाद 30 जनवरी को WHO ने कोरोना को पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया।

बता दें, रिपोर्ट्स में ये भी बताया गया है कि चीन के दवाब में WHO ने जो जानकारी देने में देरी दिखाई, उसी की वजह से यूरोप और एशिया के देशों को ट्रैवल बैन, लॉकडाउन औप अन्य सुरक्षा के कदम उठाने में करीब 6 हफ्ते की देरी हुई।

गौरतलब है कि इससे पहले अमेरिका ने WHO पर चीन के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को मिलने वाले फंड पर रोक लगा दी थी और कहा था कि कोरोना वायरस के चीन में उभरने के बाद इसके प्रसार को छिपाने और गंभीर कुप्रबंधन में संगठन की भूमिका की समीक्षा की जा रही है।

कोरोना वैक्सीन में नैनो-चिप लगा कर समुदाय विशेष की नस्ल खत्म करना चाहता है बिल गेट्स: पाकिस्तानी विश्लेषक ज़ैद हामिद

पाकिस्तान में कोरोना वायरस और इसके इलाज के लिए बन रही वैक्सीन को लेकर अजीबोगरीब दावे हो रहे हैं। पाकिस्तानी विश्लेषक ज़ैद हामिद ने एक न्यूज़ चैनल पर बात करते हुए कहा कि ‘वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन’ व अन्य संस्थाओं ने कोरोना वायरस को लेकर जानबूझ कर खौफ और दशहत फैलाया, जिसके तहत पूरी दुनिया को बंद कर दिया गया। हामिद ने कहा कि इस वायरस को लैब में बनाया गया, ताकि इस्लाम को ख़त्म करके यहूदियों का राज कायम किया जा सके। उन्होंने इसे बायोलॉजिकल हमला करार दिया

ज़ैद हामिद से जब पूछा गया कि चूँकि ये वायरस चीन से शुरू हुआ है, इसीलिए क्या इसमें वह भी शामिल है तो उन्होंने कहा कि इसे पूरी दुनिया में एक साथ फैलाया गया और अमेरिका के दुश्मनों को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में फ्लू से हर साल 80 हजार लोग मरते हैं और पाकिस्तान में तो फ्लू से एक भी आदमी नहीं मरता। उन्होंने दावा किया कि लोग इस बात से हैरान हैं कि पाकिस्तान और भारत में इतने ज्यादा लोग क्यों नहीं मरे।

‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ की बात करते हुए कहा कि बिल गेट्स वैक्सीन बना रहे हैं क्योंकि दुनिया को तब तक लॉकडाउन रखना है, जब तक ये तैयार नहीं हो जाती। उनका इंटरव्यू ले रहे एंकर ने भी दावा किया कि बिल गेट्स की वैक्सीन में ट्रांसपेरेंट नैनो ट्रैकर लगा होगा। ज़ैद ने कहा :

“ये बात डॉक्युमेंटेड है, इसके साक्ष्य हैं कि नैनो टेक्नोलॉजी के तहत वैक्सीन के अंदर छोटे-छोटे ट्रैकर लगे होंगे। मुस्लिमों के अंदर से खुदाई रूह निकाल दिया जाएगा, इस्लाम का जज्बा ख़त्म कर दिया जाएगा- ऐसा बिल गेट्स ने एक ख़ुफ़िया प्रेजेंटेशन में कहा था। इस बात से आज तक कोई इनकार नहीं कर सका। पहले से सैटेलाइट्स से लेकर सारी चीजें बना कर रखी गई हैं, स्पेस में इतने रॉकेट भेजे हैं, ये सब एक प्लान के तहत हो रहा है।”

पाकिस्तानी विश्लेषक ने की लोगों के मनोरंजन की व्यवस्था

ज़ैद ने अजोबोग़रीब दावा करते हुए कहा कि आगे ये नियम बना दिया जाएगा कि बिना वैक्सीन लिए समुदाय विशेष को कहीं एंट्री नहीं मिलेगी। उन्होंने दावा किया कि आजकल हॉस्पिटल जाने वाले हर आदमी को कोरोना साबित कर दिया जा रहा है। ये भी दावा किया कि बिल गेट्स और WHO डॉक्टरों को रुपए दे रहा है, ताकि मरीजों को कोरोना पॉजिटिव साबित किया जा सके। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को कोई वैक्सीन की ज़रूरत नहीं है, इंटरनेशनल सिस्टम से हटना पड़ेगा।

ज़ैद ने दावा किया कि एक बार आइसोलेट हो जाएँ तो किसी भी इंटरनेशनल निर्देशों का पालन करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि बिल गेट्स की वैक्सीन दुनिया भर के समुदाय विशेष के लोगों को गुलाम बना देगी। उन्होंने कहा कि वैक्सीन तो बस एक आगाज है, जिसके तहत समुदाय विशेष की नस्ल ही ख़त्म कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि कोरोना 50 तरह के हैं, दुनिया के हर इंसान को ये हो चुका है और ये जुकाम का ही एक दूसरा नाम है।

हमारे घर और मंदिर जलाए जा रहे, पश्चिम बंगाल पुलिस उलटा हमें ही मार रही: तेलिनीपाड़ा के हिन्दुओं ने सुनाई व्यथा

पश्चिम बंगाल में एक इलाका है- तेलिनीपाड़ा। ये हुगली जिले के चंदर नगर में आता है। वहाँ से सांप्रदायिक हिंसा की ख़बर आई है। हिन्दुओं को धारदार हथियार लेकर खदेड़ा गया है, उनके घर जलाए गए हैं और उन्हें प्रताड़ित किया गया है- ऐसा वहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति ने आरोप लगाया है।

कई भाजपा नेताओं ने भी यही आरोप लगाए हैं। पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने एक के बाद एक वीडियो शेयर कर ममता बनर्जी की आलोचना की थी।

स्थानीय व्यक्ति ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि तेलिनीपाड़ा में हिन्दू और दूसरे मजहब के लोग, दोनों ही रहते हैं। वो विक्टोरिया जूट मिल के पास का इलाका है। वहाँ के उर्दी बाजार में कोरोना वायरस का एक मामला आया था, जिसमें पति-पत्नी शामिल थे। उनका इलाज कोलकाता में चल रहा है।

इस केस के आने के बाद उनसे जुड़े 20 लोगों को क्वारंटाइन सेंटर में भेजा गया। टेस्टिंग की संख्या में इजाफा हुआ और वहाँ से 3-4 किलोमीटर दूर कथित अल्पसंख्यकों के प्रभाव वाले तेलिनीपाड़ा में भी टेस्टिंग चालू हुई।

स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि वहाँ के मिठाई का दुकानदार कोरोना पॉजिटिव पाया गया। इसके बाद उसे भी इलाज के लिए भेजा गया। पुलिस ने इलाके को कन्टेनमेंट जोन घोषित कर दिया। वहाँ पुलिस ने बैरीकेडिंग की और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अन्य लोगों से अपील भी। लेकिन स्थानीय युवक ने बताया कि समुदाय विशेष वालों का आना-जाना कम नहीं हो रहा है और वो अभी भी रमजान के महीने में लगातार लॉकडाउन को धता बताते रहते हैं।

ये इलाका पहले भी साम्प्रदायिक तनाव के कारण सुर्ख़ियों में रहा है। वहाँ एक बार अवैध हथियारों की फक्ट्री भी सील की गई थी। कहा जाता है कि वहाँ दूसरे मजहब का अत्यधिक प्रभाव है और समाज-विरोधी गतिविधियाँ लगातार हो रही हैं।

जब वहाँ के स्थानीय हिन्दुओं ने लोगों की आवाजाही रोकने के लिए बैरिकेड लगाना शुरू किया तो कट्टरपंथी भड़क गए। उन्होंने रमजान का हवाला देते हुए कहा कि वो लोग तो इधर से आना-जाना करेंगे ही। इस पर स्थानीय व्यक्ति ने आगे बताया:

“हाल ही में इस बैरीकेडिंग से भड़के कट्टरपंथियों सबसे पहले पुलिस का विरोध किया। इसके बाद जब हिन्दुओं ने अपनी सुरक्षा का ख्याल रखते हुए बैरीकेडिंग शुरू की तो वो और भड़क गए। 3 दिनों पहले इलाके में भारी बारिश हो रही थी। बारिश के बीच ही कई कट्टरपंथी सड़क पर तलवार व अन्य हथियार लेकर निकल आए। बारिश के दौरान ही हिन्दुओं को खदेड़ा गया, उनके घरों पर हमला कर के तोड़फोड़ मचाई गई। कमिश्नर हुमायूँ कबीर ने पीड़ित हिन्दुओं की बात सुनने से इनकार कर दिया। हिन्दुओं की दुकानें भी लूटी गईं। सूरज साव की बर्तन की दुकान लूट ली गई।”

दरअसल, सूरज साव ने अपनी दुकान में लूटपाट होने के बाद पुलिस से इस बात के लिए अनुमति माँगी थी कि वो अपनी दुकान को खाली कर लें क्योंकि उनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है और आगे कुछ और होता है तो वो नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे। पुलिस ने उन्हें इस बात की इजाजत नहीं दी। उनकी दुकान को आग लगा कर जला डाला गया।

ऑपइंडिया ने जब उनसे सम्पर्क किया तो उन्होंने इस बात की पुष्टि की। जल्द ही हम इस सबंध में अलग से विस्तृत रिपोर्ट लेकर आएँगे और उनके साथ क्या कैसे हुआ, ये बताएँगे।

उनकी दुकान के पास ही एक आभूषणों की दुकान है, जिसे जला डाला गया। हिदुओं पर हो रहे इस एकतरफा हमले को देखते हुए स्थानीय भाजपा सांसद लौकेट चटर्जी हरकत में आईं और वो कोलकाता से घटनास्थल के लिए रवाना हुईं। लेकिन, पुलिस ने उन्हें इलाके में नहीं जाने दिया।

लौकेट चटर्जी ने इस बात को भी सोशल मीडिया पर रखा। स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि वहाँ का पार्षद समुदाय विशेष से है और प्रभावशाली है, इसीलिए पुलिस के साथ उसकी मिलीभगत है। कहा गया है कि वहाँ के दूसरे मजहब वालों के किए की हर सज़ा हिन्दुओं को ही मिलती है।

डीएम ने दिया इन्टरनेट बंद करने का आदेश

अचानक से रात में आई पुलिस कुछ हिन्दुओं को उठा कर ले गई और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। उक्त व्यक्ति ने बताया कि उसके भी एक मित्र को इसी तरह रात में ही पुलिस उठा कर ले गई। यहाँ तक कि पुलिस को खदेड़ने वाले कट्टरपंथियों की जगह भी हिन्दुओं को ही निशाना बनाया जाता है।

हालाँकि, पश्चिम बंगाल के लिए ये कोई नई चीज नहीं है लेकिन अब आए दिन ऐसा ही हो रहा है। लॉकेट चटर्जी पुलिस को फोन करती रह गईं लेकिन कमिश्नर ने उनका कॉल नहीं उठाया। स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि इलाके में डर का माहौल बना हुआ है।

लॉकेट चटर्जी ने बताया कि जो जनता काफी दिनों से शांत बैठी है, जो समुदाय कुछ ग़लत नहीं कर रहा- उस पर हमले हो रहे हैं। उनका कहना है कि ये हमले एक ही तरफ़ से हो रहे हैं। सांसद ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की नीति के कारण मालदा जैसी घटना बार-बार दोहराई जाती है।

कैलाश विजयवर्गीय ने भी वीडियो शेयर कर के दावा किया कि एक ही समुदाय के लोगों द्वारा हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। वीडियो में चारों तरफ धुआँ-धुआँ देखा जा सकता है। लोगों ने दूर से भी छत पर जाकर इस घटना को देखा है।

सांसद लॉकेट चटर्जी को पुलिस ने घटनास्थल पर जाने से रोका

स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने 17 मई तक इन्टरनेट वगैरह बंद कर दिया है। ऑपइंडिया ने ये भी पाया है कि सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो शेयर हो रहे हैं, जिनमें वहाँ के समुदाय विशेष द्वारा उन पर अत्याचार होने की बात कही गई है। दिल्ली में भी यही ट्रेंड देखा गया था।

अत्याचार हिन्दुओं पर हुए थे और तमाम मीडिया नेटवर्क मजहब विशेष वालों को निर्दोष साबित करने में लगे हुए थे। इसी तरह यूट्यूब से लेकर ट्विटर तक आपको बंगाल के सम्बन्ध में ऐसे कई वीडियो मिल जाएँगे, जिनमें मजहब विशेष के स्थानीय लोगों ने विक्टिम प्ले किया है। मीडिया के एक ख़ास वर्ग का अटेंशन पाने के लिए ऐसा किया गया है।

स्थानीय व्यक्ति ने ये भी दावा किया कि स्थानीय शीतला माता मंदिर में भी जम कर तोड़फोड़ मचाई गई है। मंदिर में भी लगा दी गई, जिसका फोटो ऑपइंडिया ने निकाला है। हालाँकि, इसका कोई वीडियो अब तक सामने नहीं आया है। हिन्दुओं के एक क्लब को भी जला डाला गया। हिन्दुओं की इमारतों को तोड़ डाला गया।

स्थानीय सांसद लॉकेट चटर्जी से पुलिस ने कहा कि आपको पीड़ितों से मिलने नहीं दिया जाएगा क्योंकि आप वहाँ जाकर राजनीति करेंगी। पुलिस ने उनके जाने से वहाँ माहौल बिगड़ने की बात कही। वहाँ के लोगों ने मेनस्ट्रीम मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगाया है और कहा है कि मीडिया इस पूरे मामले में कोई रूचि नहीं दिखा रहा।

कहा जा रहा है कि वहाँ के मजहब के लोग सोशल डिस्टेंसिंग को मानते ही नहीं हैं, इसीलिए हिन्दुओं के भीतर कोरोना का भी डर बैठा हुआ है। वो ख़ुद के बचाव के लिए जब उपाय करते हैं तो स्थानीय कट्टरपंथियों को ये सब रास नहीं आता। वो इसका विरोध करते हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कह चुकी हैं कि लोग अपने घरों में ही रहें और हॉस्पिटलों में भीड़ न जुटाएँ, जिससे पता चलता है कि पश्चिम बंगाल का स्वास्थ्य सिस्टम भी ध्वस्त हो चुका है। ऐसे में लोगों के बीच डर का कायम होना स्वाभाविक है। एक तरफ महामारी का डर और दूसरी तरफ महामारी फैलाने वालों का।

इस घटना के दौरान कई लोगों ने वीडियो भी बनाए। हंगामे के दौरान ही एक व्यक्ति ने वीडियो शूट करते हुए मदद के लिए गुहार लगाई और बताया कि कट्टरपंथी उन पर ईंट-पत्थर और बम चला रहे हैं।

एक व्यक्ति ने आगजनी का वीडियो बनाते हुए कहा कि वहाँ के हिन्दू एकदम मजबूर हो गए हैं और कट्टरपंथियों के अत्याचार को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है, हिन्दुओं की तो बात ही नहीं सुनी जा रही है। अन्य लोगों ने वीडियो बनाते हुए दिखाया कि पुलिस खड़ी है और उल्टा कट्टरपंथियों का साथ ही दे रही है। गोलीबारी की भी बात कही जा रही है।

लाचार लोगों ने वीडियो शूट कर वहाँ की स्थिति से जनता को अवगत कराया और कहा कि अगर हिन्दू अब भी नहीं जागे तो या तो वो इनके हाथों मार दिए जाएँगे, या फिर उन्हें आत्महत्या करना पड़ेगा। लोगों ने मुख्यमंत्री की आलोचना करते हुए कहा, “ममता बनर्जी तो हमारा खूब साथ दे रही हैं। वाह रे बंगाल की सरकार!” लोगों ने स्पष्ट कहा कि पुलिस चूड़ियाँ पहन कर बैठी हुई हैं और कट्टरपंथी गोलीबारी कर रहे हैं।

एक अन्य वीडियों में एक घायल हिन्दू को लोग लेकर जा रहे हैं। उसे गोली लगी हुई है। सभी लोग चिल्ला कर कह रहे हैं कि उसे पुलिस ने गोली मारी है। घायल के इलाज की भी व्यवस्था नहीं की गई और उसे अपने हाल पर छोड़ दिया गया, जिसके बाद लोग उसे उठा कर किसी तरह ले जा रहे हैं। इस वीडियो में भी लोग पुलिस और कट्टरपंथियों के मिले होने की बातें करते दिख रहे हैं।

एक हिन्दू व्यक्ति का तो हाथ ही काट डाला गया, जिसे असह्य पीड़ा हो रही थी। उसके इलाज के लिए भी प्रशासन ने कोई व्यवस्था नहीं की। घटना के 3 दिन बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आँखें खुलीं और उन्होंने दोषियों के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की बात कही है।

तेलिनीपाड़ा हिंसा मामले में अब तक 56 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और पूरे इलाके में धारा-144 लगा दी गई है, जिसके बाद अतिरिक्त जवान वहाँ पर कैम्प कर रहे है। साथ ही तृणमूल सुप्रीमो पॉलिटिक्स खेलने से भी बाज नहीं आईं और उन्होंने दावा किया कि केंद्रीय मंत्री ही यहाँ परेशानियाँ पैदा कर रहे हैं और उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री को अवगत करा दिया है।

समुदाय विशेष के 35 लोग स्वेच्छा से बने हिंदू, TheQuint ने दर्द में लिखा – यह सब रोको, दलित मुस्लिमों को विशेषाधिकार दो

तबलीगी जमात की हरकतों से आहत होकर पिछले दिनों हरियाणा के हिसार और जिंद जिले से कई ऐसे मामले सामने आए, जहाँ समुदाय विशेष के परिवारों ने इस्लाम धर्म का त्याग करके हिंदू धर्म अपनाया और, अपने इस कदम के पीछे स्वेच्छा को कारक बताया।

मगर, ‘द क्विंट’ शायद इस खबर को सुनकर आहत हो गया और उसने इन लोगों के फैसले पर सवालिया निशान लगाते हुए एक लेख प्रकाशित कर डाला।

निलंजन मुखोपाध्याय का ये लेख द क्विंट में कल छपा और इस लेख में द क्विंट के लेखक ने हर बात का केवल ये निष्कर्ष निकाला कि ये फैसला सही नहीं है, इसलिए सरकार को हिंदू धर्म में परिवर्तन पर रोक लगानी चाहिए और अरब देशों की कड़ी प्रतिक्रिया देखकर कोशिश करनी चाहिए कि इस तरह की घटनाएँ न हों।

इससे पहले कि द क्विंट में छपे लेख के निष्कर्ष पर आगे बात करें, हमें संविधान के एक अनुच्छेद के बारे में पढ़ लेना चाहिए। ये आर्टिकल 25 है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 कहता है, “लोक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और भाग 3 के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता है अर्थात कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को मान सकता है और उसका प्रचार-प्रसार कर सकता है।”

इसी प्रकार अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार, “कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से अपना धर्म परिवर्तन कर सकता है किन्तु उसे अन्य व्यक्तियों के धर्म परिवर्तन का अधिकार नहीं है। यदि राज्य को लगता हो कि धर्म परिवर्तन की कोई प्रतिक्रिया लोक व्यवस्था, सदाचार तथा स्वास्थ्य के विरुद्ध है तो राज्य हस्तक्षेप करने का अधिकारी है और यदि चाहे तो जबरन धर्म परिवर्तन के विरुद्ध कानून बना सकता है।”

अब इस बात में संशय नहीं होना चाहिए कि एक धर्म से दूसरे धर्म में स्वेच्छा से परिवर्तित होना भारत में कोई अपराध नहीं है। मगर, बावजूद इस अधिकार के हिंदू धर्म में परिवर्तित होने की प्रक्रिया पर रोक लगाने की सलाह देने वाले लेखक को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि वह इस तरह की भाषा का प्रयोग करके भारत में नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनने की बात कर रहे हैं।

द क्विंट क्या लिखता है, पढ़ लीजिए

लेखक अपने लेख में यह तरीका भी बता रहे हैं कि कैसे दलित मुस्लिमों को अन्य धर्म के दलितों की भाँति विशेषाधिकार देकर हरियाणा में घटने वाली धर्मांतरण की घटनाओं को अन्य जगहों पर रोका जा सकता है। लेखक बताते हैं कि अगर सरकार इन अधिकारों को देने से मना करती है तो इसका साफ मतलब है कि ये उनकी हिंदुत्व स्ट्रैटेजी का एक भाग है।

सोचिए! हिपोक्रेसी की सीमा क्या होती है। एक देश में जहाँ सदियों तक हिंदुओं पर अत्याचार करके उन्हें दूसरे मजहब में परिवर्तित कराया जाता रहा और जबरन इस्लाम कबूल कराया जाता रहा। आज वहीं, जब विशेष समुदाय के लोग हिंदू धर्म में परिवर्तित होने लगे, तो बुद्धिजीवियों को इतनी परेशानी होने लगी कि वे इस पर बाकायदा विमर्श चाहते हैं और सरकार से भी उम्मीद करते हैं कि अरब देशों के डर से वह देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार उनसे छीन लें। ताकि देश में समुदाय विशेष की आबादी पर कोई आँच न आए।

लेखक अपने लेख में भाजपा से जुड़े सरपंच तक का जिक्र कर देते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात पर संदेह उत्पन्न करना होता है कि जो दावे किए जा रहे हैं कि हरियाणा के गाँवों में लोगों ने अपनी मर्जी से धर्म स्वीकारा है, वे हो सकता है सही नहीं हो।

लेखक देश के सामने आने वाली नई चुनौतियों का उल्लेख करते हैं और समझाते हैं कि ऐसी हरकतों से वैश्विक समुदाय हमें खतरे में डाल सकता है। उनका मानना है कि देश में वर्तमान सरकार दलित मुस्लिमों पर ध्यान नहीं देती और अपने समर्थकों के साथ मिलकर इस विषय पर विवाद करती है।

हैरानी है कि लेखक इतने बड़े बुद्धिजीवी हैं कि द क्विंट के मुताबिक वे ‘The Demolition: India at the Crossroads’ और ‘Narendra Modi: The Man, The Times’ के लेखक भी हैं। बावजूद इतनी उपलब्धियों के, उनके लिए 40 परिवारों का हिंदू धर्म में परिवर्तित होना बड़ा विषय है। लेकिन इनके लिए ये विचार का विषय नहीं है कि जाकिर नाइक जैसे लोग धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर भारत में रहकर धर्म-परिवर्तन को बढ़ावा देते रहे और युवाओं को बरगलाते रहे और किसी ने उसे कुछ नहीं बोला।

इनके लिए ये लेख लिखने का विषय नहीं है कि आज भी मिशनरी के लोग भेष बदल-बदलकर धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे कई हिंदू ईसाई धर्म अपना रहे हैं। इनके लिए सवाल खड़ा करने वाली बात ये है कि आखिर जिन लोगों ने स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन किया, वो इस्लाम धर्म छोड़कर ही क्यों किया और हिंदू धर्म में ही क्यों किया?

इनका मानना है कि सरकार को अपने नागरिकों के अधिकारों में संशोधन अरब देशों की प्रतिक्रिया देखकर करनी चाहिए। इनका यह भी मानना है कि विचार इस बात पर नहीं करना चाहिए कि देश के नागरिकों को विकल्प कैसे मुहैया कराएँ, बल्कि इस बात पर करना चाहिए कि आखिर कैसे ‘शरिया’ जैसे कानूनों को लागू करके इस्लामी देशों को खुश किया जाए। ताकि सेकुलरिज्म की आड़ में कट्टरपंथ का झंडा भारत में फिर बुलंद हो और हिंदुओं को जबरन इस्लाम धर्म कबूल करवाने में कोई दिक्कत न आए।

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है जब हिंदू धर्म को अपनाने को लेकर मीडिया गिरोह में इस प्रकार का लेख प्रकाशित हुआ हो। पिछले वर्ष 2019 में त्रिपुरा में 98 ईसाइयों ने हिंदू धर्म कबूला था, तब भी बीबीसी में सच्चाई को उजागर करता एक लेख छपा था। लेख में ‘अधिकतर लोगों’ का हवाला देकर दावा किया गया था कि इस धर्म परिवर्तन के पीछे ‘बैल की हत्या’ एक महत्तवपूर्ण कारण है। जिसकी वजह से हिंदू संगठन के लोगों ने ईसाइयों को पीटा था और अन्य लोगों ने डर से हिंदू धर्म अपना लिया था।

मुस्लिम वैज्ञानिक ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ और PM वाजपेयी ने रचा था इतिहास, सोनिया ने दी थी संयम की सलाह

भारत ने 1998 में 11-13 मई को एक के बाद एक 5 न्यूक्लियर ब्लास्ट (परमाणु परीक्षण) कर के पूरी दुनिया को चौंका दिया। अमेरिका के सीआईए से लेकर पाकिस्तान तक हतप्रभ रह गए। कुल 5 परमाणु उपकरणों की जबरदस्त टेस्टिंग की गई। इसी आलोक में देश हर साल 11 मई को ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस’ के रूप में मनाता आया है।

दुनिया में जो 8 परमाणु शक्ति-सम्पन्न (सार्वजनिक) देश हैं, आज भारत भी उनमें से एक है। इस बार भी ‘नेशनल टेक्नोलॉजी डे’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तक सबने देश को बधाई दी और ‘ऑपेरशन शक्ति’ को याद किया।

ये वही भारत है, जहाँ नेहरू काल में सैन्य क्षमता और तकनीक को जम कर नज़रअंदाज किया जाता था। स्वतंत्रता के बाद तो नेताओं में इस बात को लेकर भी एकमत नहीं था कि भारत को पूर्णरूपेण परमाणु शक्ति मिशन की ओर बढ़ना चाहिए या फिर नहीं

भारत की आज़ादी के 2 साल पहले ही जापान स्थित हिरोशिमा और नागासाकी में अमेरिका ने परमाणु बम गिरा कर पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। महात्मा गाँधी ने परमाणु के प्रयोग को नैतिक रूप से अस्वीकार्य करार दिया था।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इन चीजों में यकीन नहीं रखते थे लेकिन उनके समय भी भविष्य को ध्यान में रख कर इस क्षेत्र में छोटे-बड़े डेवलपमेंट्स होते रहे। नेहरू को तब तक अक्ल नहीं आई जब तक भारत को 1962 में चीन के हाथों बुरी पराजय नहीं मिली लेकिन तब तक बहुत देर भी हो चुकी थी।

1962 के बाद जवाहरलाल नेहरू को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। तब संसाधन-विहीन भारतीय सेना ने अदम्य साहस और पराक्रम के साथ मजबूत दुश्मन का मुकाबला किया था। हाँ, इन मामलों में इंदिरा गाँधी की सोच ज़रूर अपने पिता से अलग थी।

इंदिरा गाँधी के समय ही 1974 में ‘स्माइलिंग बुद्धा’ नामक प्रोजेक्ट के अंतर्गत भारत ने परमाणु परीक्षण किया और तत्कालीन पीएम गाँधी ने इसे शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण करार दिया था। हालाँकि, उस समय न्यूक्लियर हथियारों को भविष्य के लिए टाल दिया गया था। तब भी भारत ने ये दिखा दिया था कि वो अपनी रक्षा करने में सक्षम है।

1971 में पाकिस्तान की बुरी हार और बांग्लादेश के गठन के साथ भारत पहले ही जता चुका था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेहरू युग से अलग राह पकड़ ली गई है। लेकिन असली धमाका हुआ अटल बिहारी वाजपेयी के काल में।

पाकिस्तान भी चुप नहीं बैठा हुआ था। 80 के दशक के बाद से ही उसने अपना परमाणु मिशन शुरू कर दिया था। इसीलिए, तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने दुनिया से कुछ भी नहीं छिपाया और सार्वजनिक घोषणा करते हुए बताया कि भारत ने परमाणु परीक्षण किया है।

5 टेस्टिंग में से 1 फ्यूज़न बम था और बाकी फिजन बम थे। इनमें से 3 का परीक्षण 11 मई को किया गया और बाकी 2 का 13 मई को। हालाँकि, इसके बाद अमेरिका और जापान ने भारत पर ज़रूर आर्थिक प्रतिबंध लगाए लेकिन प्रधानमंत्री वाजपेयी झुकने वालों में से न थे। भारत उस वक़्त छठा देश था, जो परमाणु शक्ति-सम्पन्न बना।

परमाणु परीक्षण के कुछ ही दिनों बाद सोनिया गाँधी ने बयान दिया था कि असली ताकत संयम दिखाने में होती है, शक्ति के प्रदर्शन में नहीं। वो बुरी तरह ग़लत थीं।

उधर पाकिस्तान और चीन अमेरिका की ही मदद से अपनी रक्षात्मक तकनीक में लगातार वृद्धि कर रहे थे, बैलिस्टिक मिसाइल्स की खेप बढ़ाते जा रहे थे और ये स्पष्ट था कि भारत के संयम को इसकी कमजोरी बना दिया गया था। भारत की आर्थिक वृद्धि को प्रतिबंधों के बावजूद रोका नहीं जा सका। आज भारत इस परीक्षण के 22 साल बाद एक बड़ी ताकत बन कर उभरा है।

ग्लोबल ताकतें जाम छलकाते बुद्धिजीवियों की चर्चाओं से नहीं चलती। अगर भारत नहीं दिखाता कि वो समय आने पर किसी भी प्रकार से अपनी रक्षा करने और फिर जवाबी वार करने में सक्षम है, तो शायद आज पाकिस्तान और चीन के अड़ंगों के कारण न तो हम आर्थिक विकास पर ध्यान दे पाते और न ही दुनिया में एक सुपर पॉवर के रूप में उभर पाते।

साम्राज्यवादी चीन और अवैध परमाणु परीक्षण करने वाले उत्तर कोरिया के विपरीत भारतीय वामपंथियों ने उल्टा भारत के परमाणु शक्ति-सम्पन्न बनने पर आपत्ति जताई थी। यही लोग चीन की तारीफ करते नहीं थकते।

आखिर भारत क्यों न करता परमाणु परीक्षण? पाकिस्तान के वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान 80 के दशक के मध्य से ही लगातार दावा करते आ रहे थे कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम है। वो यहाँ तक कहते थे कि अगर युद्ध होता है तो पाकिस्तान इसका पहले इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा। यही कारण था कि भारत को इस दिशा में आगे बढ़ना पड़ा।

कारगिल युद्ध का नाम लेकर वाजपेयी सरकार को कोसा जाता है कि वहाँ परमाणु क्यों नहीं काम आया। ये बेहूदा लॉजिक है। निम्न स्तर पर होने वाले छद्म युद्धों में सेना और रक्षात्मक रणनीति ही काम आती है। ऐसा नहीं है कि सीमा पर हुई झड़प में कोई परमाणु बम फोड़ दे।

क्या आपको पता है कि भारत के परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया थी? अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड शेल्बे ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि ये पिछले 10 वर्षों में खुफिया एजेंसियों की सबसे बड़ी विफलता है। DRDO के तत्कालीन चीफ एपीजे अब्दुल कलाम ने स्पष्ट कह दिया था कि ये परीक्षण आत्मरक्षा के लिए है, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है।

कलाम ने अपने बयान को पुष्ट करने के लिए इतिहास का उदाहरण दिया था। उन्होंने गिनाया था कि पिछले 2500 सालों में भारत ने किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया लेकिन अलग-अलग साम्राज्यों ने ज़रूर भारतीय उपमहाद्वीप पर न जाने कितनी बार हमले किए।

पोखरण के ऊपर अमेरिका के 4 सैटेलाइटों की नज़र रहती थी। वो तकनीकी रूप से इतने सक्षम थे कि भारतीय सैनिकों की वर्दी पर लगे निशानों को भी गिन लें। उन्हें ‘बिलियन डॉलर स्पाइज’ कहा जाता था। और नीचे कौन थे? नीचे थे भारतीय सेना के ‘रेजिमेंट 18 इंजीनियर्स’।

भारतीय खेमे को पता था कि क्या करना है। उन्होंने डेढ़ साल केवल रिसर्च करने में लगाया था कि कैसे और क्या कुछ किया जाएगा। वैज्ञानिक रात को काम करते क्योंकि उस समय सैटेलाइट्स को प्रकाश की कमी की वजह से नीचे की चीजों का उन्हें स्पष्ट विवरण नहीं मिल पाता था। सुबह होते ही सारी चीजों को यथावत रख दिया जाता था।

वैज्ञानिकों को नकली नाम तक दिए गए थे। वो पोखरण में सेना की वेशभूषा में काम किया करते थे। एपीजे अब्दुल कलाम का नाम मेजर जनरल पृथ्वीराज रखा गया था। राजगोपाला चिदंबरम का नाम नटराज रखा गया था। वो वैज्ञानिक अक्सर मजाक में कहा करते थे कि ये कोड वाले नाम तो उनके फिजिकल कैल्कुलशन्स से भी ज्यादा कॉम्प्लेक्स हैं।

मिशन की गोपनीयता का इतना ध्यान रखा गया था कि वाजपेयी, कलाम और चिदंबरम के बीच हुई बैठक के बारे में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस तक को नहीं पता था। गोपनीयता का परिणाम ही था कि भारत ने इतिहास रच दिया।

अमेरिका के CIA को तो तब तक इसकी भनक नहीं लगी, जब तक पीएम वाजपेयी ने ख़ुद टीवी पर सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की। 3 दिनों में तत्कालीन वाजपेयी सरकार और वैज्ञानिकों ने जो किया, वो आज भी भारत को बेखौफ बनाता है जबकि पाकिस्तान कोरी धमकियों तक ही सीमित है।