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Covid सेवा: आपदा के बीच डटे हैं RSS के 3.42 लाख स्वयंसेवक, 3.17 करोड़ को भोजन, 50 लाख परिवारों को राशन

कोरोना वायरस संक्रमण आपदा और उससे बचाव के लिए हुए लॉकडाउन के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) लगातार राहत कार्य और जनसेवा में लगा हुआ है। संघ ने अपने सेवा-कार्य से जुड़े आँकड़े पेश किए हैं। संघ ने इसे ‘कोविड सेवा’ नाम दिया है। संघ ने जानकारी दी है कि वह देश भर के 67,336 स्थानों पर एक साथ राहत-कार्य चला रहा है। आरएसएस के 3,42,319 कार्यकर्ता इस काम में लगे हुए हैं।

संघ न सिर्फ़ लोगों के खाने-पीने का प्रबंध कर रहा है, बल्कि उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रख रहा है। संघ ने अब तक 50,48,088 परिवारों को राशन किट मुहैया कराया है। इतनी बड़ी संख्या में परिवारों तक पहुँचना ये बताता है कि आरएसएस देश के दूर-दराज इलाक़ों में भी कमान थामे हुए है। अब तक कुल 3,17,12,767 भोजन पैकेट्स वितरित किए जा चुके हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जगह-जगह पर ब्लड डोनेशन कैम्प भी आयोजित कर रहा है। संघ कार्यकर्ता बढ़-चढ़ कर रक्तदान कर रहे हैं। अब तक 22,446 स्थानों पर ब्लड डोनेशन कैम्पस आयोजित किए गए हैं। लोगों को कोरोना से बचाव के लिए मास्क और सैनिटाइजर्स भी वितरित किए गए हैं। अब तक 44,54,555 मास्क ज़रूरतमंदों के बीच बाँटे जा चुके हैं।

आरएसएस ने अपने बयान में कहा है कि संगठन तभी रुकेगा, जब कोरोना पर भारत को अंतिम विजय नहीं मिल जाती। साथ ही संगठन पोस्ट-कोरोना वर्ल्ड के लिए भी तैयार हो रहा है। संघ ने केंद्र सरकार की उसके कामकाज के लिए तारीफ की है। संघ ने दुनिया भर के कैपिटलिज्म और कम्युनिज्म के ध्वस्त होते आर्थिक मॉडलों के उदाहरण देते हुए कहा कि अब स्वदेशी व्यवस्था का वक़्त आ गया है। ये सेल्फ-रिलायंस का समय है। संघ ने कहा:

“कोरोना से बचाव के लिए नागरिकों को सुविधाएँ देने से लेकर उन्हें जागरूक करने तक, हम सरकार के साथ कदम से क़दम मिला कर चल रहे हैं। हम सरकारी संस्थाओं का सपोर्ट सिस्टम बनने का प्रयास कर रहे हैं। भारत माता के 130 करोड़ बच्चे-बच्चियाँ हमारे भाई बहन हैं। संघ की शाखा की यही शिक्षा हमें पग-पग पर आत्मविश्वास दे रही है। हमारी लोगों से अपील है कि जिस तरह लॉकडाउन में परिवार के बीच नजदीकियाँ बढ़ी हैं, वो टूटनी नहीं चाहिए। परिवार हमारे समाज का आधारभूत संरचना होता है।”

संघ ने आशा जताई कि कोरोना आपदा के बाद हमारे विकास का जो मॉडल है उस पर ज़रूर समीक्षा की जाएगी क्योंकि ताज़ा मॉडल की पोल खोल चुकी है। संगठन ने मोदी सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि जिस तरह फेज बाई फेज लॉकडाउन की घोषणा की गई, उससे लोगों को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहने में मदद मिली। साथ ही संघ ने मंदिरों और मठों व गुरुद्वारों की भी तारीफ की, जो इस आपदा की घड़ी में आगे बढ़ कर काम कर रहे हैं।

इससे पहले हमने जानकारी दी थी कि देश भर में ”सेवा भारती’ के 2.1 लाख स्वयंसेवक काम में लगे हुए हैं। संगठन ने भारत में कुल 1200 संस्थाओं के साथ संपर्क साधा है और उन सभी के साथ मिल-जुलकर काम कर रही है। सेवा भारती संगठन ने पश्चिम दिल्ली की एक चर्च में 250 भूखे लोगों को राशन उपलब्ध करवाया था। संगठन नार्थ-ईस्ट और केरल पर अतिरिक्त ध्यान दे रही है।

रमजान में TV मत चलाओ, इस्लामी नियम से रहो: हिंदू महिला को मजहबी पड़ोसियों ने घेरा, काट डालने की धमकी

अपने घर में टीवी देखने पर असम में एक ग़रीब परिवार की महिला के साथ स्थानीय कट्टरपंथियों ने मारपीट की। पड़ोसियों ने रमजान का हवाला देकर महिला को टीवी चलाने से मना किया। इसके बाद वे धारदार हथियार लेकर एक दर्जन की संख्या में जुट गए और महिला के साथ मारपीट करने लगे। महिला की हत्या की कोशिश भी की गई।

इस मामले में पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है। ऑपइंडिया ने बजरंग दल के स्थानीय पदाधिकारी बिजोय दास से बातचीत की, जो अपने कार्यकर्ताओं के साथ पीड़ित महिला के घर की सुरक्षा में लगे हुए थे। उन्होंने बताया कि पुलिस ने हल्की धाराएँ लगाई हैं, जबकि ये मामला उससे कहीं बड़ा है। बजरंग दल के कार्यकर्ता पुलिस थाने से लेकर घर पर सुरक्षा देने तक, लगातार पीड़ित परिवार की मदद कर रहे हैं।

पीड़ितों ने बताया कि समीररूद्दीन अली और मोबिदुल रहमान ने महिला पर वार किया। साथ ही उन्होंने गाली-गलौज भी की। ये घटना असम के शिबसागर जिले में स्थित नाज़िरा कसबे की है, जहाँ उक्त महिला चाय की दुकान चलाती है। ये घटना तब हुई, जब वह शुक्रवार (मई 1, 2020) को दुकान से लौटने के बाद घर में टीवी देख रही थी। टीवी की साउंड भी ज्यादा नहीं थी और पड़ोसियों का घर भी वहाँ से कुछ दूरी पर स्थित है।

तब भी आसपास के लोग वहाँ जुट कर ये कहने लगे कि ये रमजान का पाक महीना चल रहा है, टीवी मत चलाओ। पीड़िता का नाम जाह्नोबी गोगोई है। 39 वर्षीय गोगोई के साथ गाली-गलौज करते हुए मजहबी पड़ोसियों ने कहा कि उन्हें टीवी की वजह से संध्या नमाज में दिक्कतें आ रही हैं। उन्होंने चेताया कि अगर महिला ने स्थानीय लोगों द्वारा रमजान महीने के लिए तय किए गए नियमों का पालन नहीं किया तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

दो लोगों के गाली-गलौज के बाद ये मामला तब हिंसक हो गया जब वहाँ आसपास के कई लोग जुट गए और महिला को मार डालने की बातें करने लगे। कोई रेलवे ट्रैक पर फेंक देने की बातें कर रहा था तो कोई काट डालने की धमकी दे रहा था। एक आरोपित ने तो गला दबा कर मार डालने की कोशिश की। एक ने धारदार हथियार लेकर काट डालने की धमकी दी। पीड़िता ने बताया कि वह चाय-नाश्ते की दुकान चला कर किसी तरह अपना गुजर-बसर करती है।

पुलिस को ईमेल से भेजी गई शिकायत की कॉपी

कोरोना आपदा के बीच उसके पति भी बेरोजगार हैं और 8 साल के बच्ची के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी महिला पर ही है। घर में संसाधन का भी अभाव है। महिला ने बताया कि लॉकडाउन में थोड़ी ढील के बाद उसने अपना चाय-नाश्ते की दुकान फिर से खोली थी। कई दिनों से घर में आमदनी नहीं आ रही थी। अब रमजान में इस तरह का विवाद खड़ा होने के बाद परिवार पूरी तरह डरा हुआ है।

इस घटना के बाद पीड़ित महिला आवेदन लिखवाने के लिए एक व्यक्ति के पास गई। डर के माहौल में उसे ये नहीं पता चला कि जिस व्यक्ति के पास वो आवेदन लिखवाने गई है वो भी समुदाय विशेष से ही है। जब पीड़िता ने अपनी बात लिखवानी शुरू की तो उसने जान-बूझकर उसमें छेड़छाड़ कर दी। घटना को कम कर के लिख दिया और मजहाबी कट्टरपंथियों द्वारा किए गए अत्याचार को छिपा दिया। इससे थाने में भी भ्रम का माहौल पैदा हो गया।

राष्ट्रीय बजरंग दल का बयान और घायल महिला

थाने में पुलिस को लगा कि महिला बोल कुछ और रही है और आवेदन में कुछ और है। राष्ट्रीय बजरंग दल के डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी बिजोय दास व अन्य लोगों ने मिल कर वीडियो फुटेज और अन्य सबूत पुलिस को सौंपे। पुलिस ने उन्हें सलाह दी कि वो ये वीडियोज डिलीट कर लें क्योंकि इसके वायरल होने से सांप्रदायिक तनाव फैलने का डर है। हालाँकि, ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान नाज़िरा थाना पुलिस ने कहा कि केस रजिस्टर किया जा चुका है और आरोपितों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा रही है।

स्थानीय मीडिया ने भी इस ख़बर को अपने हिसाब से ही दिखाया। पूरी बात नहीं दिखाई गई। महिला ने बताया कि वो तो टीवी पर गाने वगैरह भी नहीं देख रही थी, वो बस समाचार देख रही थी। असल में जाह्नोबी हिन्दू हैं लेकिन उन्होंने दूसरे मजहब में शादी की थी। शादी के बाद पति ने भी स्वेच्छा से हिन्दू धर्म अपना लिया था। इसके बाद से ही वे लोग स्थानीय लोगों की नज़र में चढ़े हुए हैं।

ये इलाक़ा कॉन्ग्रेस पार्टी का गढ़ भी माना जाता है, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया का परिवार यहाँ दशकों से प्रभावी रहा है। फ़िलहाल उनके बेटे देबब्रत यहाँ से विधायक हैं। हालाँकि, ये इलाक़ा जोरहाट लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता हैं, जहाँ से भाजपा के तोपोन गोगोई सांसद हैं। लेकिन, इससे पहले 1991 से लेकर 2014 तक लगातार 23 साल यहाँ से कॉन्ग्रेस बिजोय कृष्णा हांडिक जीतते रहे थे।

स्थानीय मीडिया की ख़बरों में कहा गया है कि समीरउद्दीन मूल रूप से बांग्लादेशी है और एनआरसी में उसका नाम भी नहीं आया था। इसके बाद से वह और भी बौखलाया हुआ है। उनलोगों की कॉन्ग्रेस में गहरी पैठ है और मजहब विशेष के स्थानीय लोग किसी भी बात को लेकर कॉन्ग्रेस नेताओं के पास ही जाते हैं। हमने स्थानीय सांसद से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई।

जफरुल इस्लाम को पद से हटाने को लेकर हाई कोर्ट में याचिका, हिंदुओं को दिखाया था अरब का धौंस

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफरुल इस्लाम खान को उनके पद से हटाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इसमें कहा गया है कि खान ने अपने सोशल मीडिया पेज पर भड़काऊ और देशद्रोही बयान दिया था। याचिका पर 11 मई को सुनवाई होगी।

जफरुल इस्लाम के खिलाफ देशद्रोह का मामला पहले ही दर्ज किया जा चुका है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट में हिंदुओं को अरब का धौंस दिखाया था।

रिटायर बैंक अधिकारी सुभाष चंद्र द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि 2 मई को, एक शिकायत के आधार पर, दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने जफरुल इस्लाम खान के खिलाफ धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास और भाषा के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच देशद्रोह और घृणा की भावनाओं को बढ़ावा देने के आरोप में आईपीसी की धारा 124A और 153A के तहत FIR दर्ज किया था।

अलख आलोक श्रीवास्तव द्वारा दायर किए गए याचिका में कहा गया है कि FIR दर्ज होने के बावजूद जफरुल इस्लाम खान ने 3 मई को कहा कि उन्होंने न तो अपना ट्वीट डिलीट किया है और न ही इसके लिए माफी माँगी है। वह अपनी बात पर अब भी कायम हैं। खान ने कहा था, “कुछ मीडिया हाउस ने इस तरह से रिपोर्ट किया कि मैंने अपने ट्वीट के लिए माफी माँगी और उसे डिलीट कर दिया है। मैंने अपने ट्वीट के लिए माफी नहीं माँगी है और न ही उसे डिलीट किया है। मैंने ट्वीट के लिए नहीं बल्कि मेडिकल इमरजेंसी के समय ट्वीट करने के लिए खेद जताया था। वो ट्वीट अभी भी मेरे ट्विटर और फेसबुक अकाउंट पर उपलब्ध हैं।” 

याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्पष्ट है कि वे जान-बूझकर भड़काऊ और देशद्रोही बयान दे समाज में असंतोष और दरार पैदा करना चाहते हैं। याचिका में आगे दावा किया गया कि जफरुल इस्लाम, जो कि एक जिम्मेदार पद पर आसीन है, ने ऐसा घृणित बयान देकर देश की एकता और अखंडता को खतरे में डाल दिया है। इन्होंने भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल करने और दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की है। जफरुल खान का बयान तथ्यात्मक रूप से गलत, अपमानजनक और देश विरोधी है।

याचिका में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल से कहा गया है कि वो जफरुल इस्लाम को उनके इस देशद्रोही और घृणित बयान के लिए दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के पद से हटा दिया जाए।

इससे पहले, उच्च न्यायालय में एक और याचिका दायर की गई थी जिसमें जफरुल खान के खिलाफ उनकी भड़काऊ टिप्पणी और हिंदू समुदाय के खिलाफ धमकी भरे बयान के लिए FIR दर्ज करने की माँग की गई थी। इस याचिका को भी 11 मई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। दिल्ली निवासी मनोरंजन कुमार की याचिका में दावा किया गया है कि आयोग के अध्यक्ष ने अपने फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किए हैं जिसमें उन्होंने हिंदू समुदाय को ‘कट्टर हिंदू’ बताया है।

28 अप्रैल को जफरुल इस्लाम ने ट्वीट कर कहा था कि कट्टर हिन्दुओं को शुक्र मनाना चाहिए कि भारत के दूसरे मजहब वालों ने अरब जगत से कट्टर हिन्दुओं द्वारा हो रहे ‘घृणा के दुष्प्रचार, लिंचिंग और दंगों’ को लेकर कोई शिकायत नहीं की है और जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन अरब के लोग एक आँधी लेकर आएँगे, एक तूफ़ान खड़ा कर देंगे।

खान ने पोस्ट में शाह वलीहुल्ला देहलवी, अबू हस्सान नदवी, बहुदुद्दीन खान और ज़ाकिर नाइक को हीरो की तरह पेश किया था। बता दें कि मलेशिया में रह रहे इस्लामी प्रचारक ज़ाकिर नाइक को वापस लाने के लिए भारत सरकार प्रयत्न कर रही है और उसके ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर आतंकियों को भड़काने तक के आरोप हैं। 

पालघर मॉब लिंचिंग: अल्ट्रा-लेफ्ट संगठनों की साजिश, लीपापोती की कोशिश में महाराष्ट्र सरकार

महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों की हत्या के मामले में अल्ट्रा-लेफ्ट लिंक्स की भूमिका सामने आई हैं। बताया जा रहा है कि साधुओं की मॉब लिंचिंग में मुख्य आरोपित का सम्बन्ध अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों से है।

टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि महाराष्ट्र सरकार इसे महज एक गलतफहमी से हुई हत्या साबित करने का प्रयास कर रही है, लेकिन यह अल्ट्रा-लेफ्ट संगठनों द्वारा एक सुनियोजित साजिश के तहत की गई मॉब लिंचिंग थी।

दिलचस्प बात यह है कि FIR में मुख्य आरोपित वामपंथी पार्टी CPIM ग्राम पंचायत सदस्य है, जिस पर कुल्हाड़ी, पत्थर, लाठी और अन्य धारदार हथियारों से लैस भीड़ इकट्ठी कर साधुओं पर हमला करने के आरोप हैं। उल्लेखनीय है कि सड़क तोड़ना, पेड़ तोडना और सड़कों को अवरुद्द कर हमला करना नक्सलियों के पुराने और जाने-पहचाने तरीके हैं।

‘टाइम्स नाउ’ के इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों ने वामपंथी गुटों के इस हत्या से जुड़े होने के अपने अनुमान को सही बताया है। उनका कहना है कि यही वजह है कि वामपंथी इस घटना के खिलाफ आवाज उठाने वाले रिपब्लिक भारत न्यूज़ चैनल के पत्रकार अर्नब गोस्वामी के पीछे पड़े हुए हैं।

पुलिस के सामने कर दी साधुओं की निर्मम हत्या

महाराष्ट्र के पालघर के गड़चिनचले गाँव में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। पूरी घटना वहाँ मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई। आरोपितों ने साधुओं के साथ एक ड्राइवर और पुलिसकर्मियों पर भी हमला किया। हमले के बाद साधुओं को अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

कोरोना संकट के बीच ₹1610 करोड़ का राहत पैकेज: कर्नाटक में 10 लाख से अधिक ड्राइवर-नाई को मिलेंगे ₹5 हजार

कोरोना महामारी के बीच कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार ने वित्तीय पैकेज जारी करते हुए बुधवार को बड़ा ऐलान किया। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने राज्य के ड्राइवरों और नाइयों को 5-5 हजार रुपए की राशि देने की घोषणा की है। राज्य सरकार के इस फैसले से लगभग 7,75,000 ड्राइवरों और 2,30,000 नाइयों को लाभ मिलेगा।

मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने बताया कि कोरोना के चलते राज्य सरकार ₹1610 करोड़ का वित्तीय पैकेज जारी कर रही है। इस राहत पैकेज के तहत फूल की खेती करने वालों को प्रति हेक्टेयर 25,000 रुपए की राहत मिलेगी। धोबी और नाइयों को एक साथ 5,000 रुपए मुआवजा दिया जाएगा। ऑटो और टैक्सी चालकों को भी एकसाथ 5,000 रुपए की राशि दी जाएगी। निर्माण श्रमिकों को 3,000 रुपए मिलेंगे। उन्हें पहले ही 2 हजार रुपए का भुगतान किया जा चुका है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने बताया कि हमारी सरकार ने लगभग 1 लाख लोगों को 3500 बसों और ट्रेनों से उनके घर वापस भेजा है। इसके अलावा प्रवासी श्रमिकों से आगे प्रदेश में रहने की अपील की है, क्योंकि निर्माण कार्य अब फिर से शुरू हो गया है।

बता दें, राज्य सरकार ने किसानों, लघु, कुटीर एवं मध्यम उपक्रमों (MSME), हथकरघा बुनकरों, फूलों की खेती करने वालों, धोबियों, नाइयों, ऑटो और टैक्सी चालकों समेत अन्य को ध्यान में रखते हुए इस राहत पैकेज का ऐलान किया है। 

गौरतलब है कि कोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए मार्च के आखिरी से लॉकडाउन लागू कर रखा है। हालाँकि, 4 मई से तीसरे चरण में कई तरह की रियायतें दी गई हैं। कर्नाटक में अभी तक कोरोना के 671 पॉजिटिव मामले सामने आ चुके हैं। इसमें से 331 लोग ठीक हुए हैं, जबकि 29 लोगों की मौत हुई है।

अमित मालवीय के खिलाफ FIR पर रोक, राजस्थान हाई कोर्ट ने कॉन्ग्रेस को जारी किया नोटिस

राजस्थान हाईकोर्ट ने भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय पर दर्ज की गई FIR पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने हनुमानगढ़ पुलिस को निर्देश दिया कि पूरी कार्यवाही के साथ FIR के प्रभाव और संचालन पर रोक लगाई जाए। इसके साथ ही अदालत ने कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता और राज्य सरकार को एक नोटिस भी जारी किया, और छह सप्ताह में जवाब माँगा है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस FIR के मामले में उच्च न्यायालय का रुख किया था।

अमित मालवीय के ट्वीट पर की थी FIR दर्ज

मंगलवार (मई 05, 2020) को भाजपा के आईटी विभाग के प्रभारी अमित मालवीय द्वारा कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के खिलाफ एक ट्वीट करने के मामले में राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। हनुमानगढ़ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता मनोज कुमार सैनी द्वारा इस ट्वीट को अपमानजनक बताते हुए शिकायत दर्ज कराई गई थी।

दरअसल इस ट्वीट में अमित मालवीय ने लिखा था- “सोनिया गाँधी का दावा है कि राहुल की चेतावनी के कारण भीलवाड़ा में 22 लाख लोगों का परीक्षण किया? जहाँ कहीं भी राहुल (गाँधी) हैं, क्या अतिशयोक्ति और गणित में गड़बड़ी हो सकती है?”

अमित मालवीय ने भीलवाड़ा मॉडल पर किया था ट्वीट

CRPC की धारा 482 के तहत भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया कि FIR में भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय द्वारा भीलवाड़ा मॉडल पर सोनिया गाँधी की ओर से उस वक्तव्य को इंगित करते हुए किए गए ट्वीट को आधार बनाया गया था, जिसमें सोनिया गाँधी ने कहा था कि राहुल की चेतावनी के बाद भीलवाड़ा में कोरोना वायरस के 22 लाख का परीक्षण हुआ।

अधिवक्ताओं ने कहा कि यदि उक्त ट्वीट के आधार पर FIR दायर की गई है तो इसमें जेपी नड्डा का कोई रोल नहीं है। दूसरा, यह ट्वीट अमित मालवीय द्वारा उनके निजी ट्विटर हैंडल से किया गया। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया तथा अप्रार्थी संख्या 2, हनुमानगढ़ टाउन पार्षद मनोज कुमार सैनी को नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह में जवाब तलब किया। वहीं, FIR के क्रियान्वयन व प्रभाव तथा इसके तहत समस्त प्रकार की जाँच पर अंतरिम रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।

अमित मालवीय कॉन्ग्रेस द्वारा कोरोना वायरस के दौरान किए गए खोखले दावों का निरंतर खंडन कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने हाल ही में घोषणा कर कहा कि प्रवासियों को उनके घर भेजने व ट्रेन में आने वाले खर्चों का भुगतान कॉन्ग्रेस पार्टी करेगी। इस पर भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सोनिया गाँधी को निशाना बनाते हुए कहा था कि हम नहीं चाहते कि हमारे गाँव इटली जैसे बन जाएँ।

महान मुगलों का जानिए सच्चा इतिहास, हिंदुओं ने उन्हें बदनाम किया: इतिहासकार फख्तर का शोध

पिछले कुछ समय में मुगलों को लेकर हमारे समाज में कई गलत धारणाएँ बनी हैं। इतिहास के पन्ने कुरेद-कुरेद कर उन्हें अत्याचारी और आतताई बताने की कोशिशें हुई हैं। उनके महान कार्यों को तथ्यों से काटकर ऐसा दर्शाया गया है कि उन्होंने भारत में हिंदुओं पर बहुत जुल्म किया। लेकिन हकीकत में क्या आप जानते हैं कि महान मुगलों का सच्चा इतिहास क्या है, जिसे हिंदुओं ने समय के साथ बदल दिया?

आप जानते हैं कि रामचरितमानस के असली रचियता कौन हैं? या जिन गंगा मैया को लेकर कहा जाता है कि उन्हें भागीरथ अपने प्रयासों से धरती पर लाए, उनका बाबर से क्या कनेक्शन है? गाय – जिन्हें हिंदू माँ कहते हैं, वो भारत में कैसे आई? और संस्कृत ने उर्दू से कितने शब्द चुराए? नालंदा में क्या वाकई बख्तियार खिलजी ने आग लगाई? आदि-आदि।

इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए, महान मुगलों का इतिहास सामने लाकर रखने के लिए ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती ने भारतीय इतिहास के बहुत बड़े जानकार लहसुन फख्तर से इस विषय पर बात की। साथ ही नासा के कई सॉफ्टवेयर की मदद लेते हुए उन्होंने सच्चाई का पता लगाया और शोधपरक तथ्य दुनिया के सामने लेकर आए। हमारा दावा है कि इन तथ्यों को जानने के बाद जो भी हिंदू सड़कों पर हीरो बने घूम रहे हैं, उन सबकी अक्ल ठिकाने आ जाएगी।

जैसे नालंदा को लेकर बख्तियार खिलजी को अक्सर बदनाम किया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने उसमें आग लगाई। लेकिन जब हमने इस बारे में इतिहास खंगाला तो मालूम हुआ कि जो बताया गया, सच्चाई उससे बिलकुल अलग है। दरअसल, बख्तियार खिलजी ने जानबूझकर कुछ नहीं किया वो तो उनके घोंड़ों की नाल से निकली चिंगारी ने विकराल आग का रूप धरा था और कुछ काफिरों ने उस समय ये लिख डाला कि उन्होंने खिलजी को हजारों की सेना के साथ नालंदा में आग लगाते देखा।

इसी तरह गंगा को लेकर फैलाए झूठ का भी हमारी पड़ताल में पर्दाफाश हुआ। लोग कहते हैं कि उन्हें भागीरथ धरती पर लाए। मगर क्या किसी ने देखा? नहीं। क्योंकि वास्तविकता तो यह है कि बाबर ने उनकी खोज की और अपना विज्ञान लगाते हुए गंगा की सारी चालाकी समझ ली। उन्होंने उसका पूरा पता लगाया और जहाँ-जहाँ वह बहती थीं, उसका मैप तैयार किया। इसके बाद अपने भारी वैज्ञानिक बुद्धि से ही श्री बाबर जी ने गंगा और जमुना का संगम करवाया।

भारत में गाय को लेकर हिंदू दावा कर देते हैं कि वो उनकी गौमाता हैं। लेकिन क्या आपको मालूम है कि गायों का गाँव-गाँव में मिलना भी मुगल शासकों की रहमदिली ही है। सच यह है कि जब बलात्कारी बाबर और पूरे बलात्कारी मुगलिया खानदान में कोई बच्चा होता, तो वे हर बच्चे के पैदा होने पर एक पहाड़ पर जाते थे (जो अरब के रेतों से छुपा था), और वहाँ पर एक गाय प्रकट होती थी, जिसे वो ले कर आते थे। इसी तरह भारत में गाय आई।

आज हिंदू लोग आरोप लगाते हैं कि मुगलों ने भारत में आकर भारत की संस्कृति पर हमला किया। उनके धार्मिक स्थलों को तोड़ा, उनके रहन-सहन, खाने-पीने को बिगाड़ा। लेकिन सच तो यह है कि हिंदुओं ने सिर्फ़ उन्हें लेकर भ्रम फैलाया। पहले उनकी उर्दू से शब्द चुराकर हिंदी बनाई और फिर रामचरितमानस को लेकर कहा कि उसे तुलसीदास जी ने लिखा, जबकि वास्तविकता में इसका निर्माण अकबर जी के रहमोकरम से हुआ था।

अब आगे इसी प्रकार मुगलों का पूरा सच, उनकी दरियादिली जानने के लिए ऑपइंडिया संपादक का शोधपरक वीडियो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देखें।

हिज्बुल, लश्कर, जैश जैसे आतंकी संगठनों की रिपोर्टिंग प्रोपेगेंडा है: तथाकथित पत्रकार सबा नकवी

पत्रकार सबा नकवी ने आतंकियों के ख़िलाफ़ लिखने वालों को कोसा है और आतंकियों का विरोध करने को प्रोपेगेंडा बताया है। साथ ही उन्होंने ऐसे पत्रकारों को नीचा भी दिखाया। बता दें कि भारत के तीन ऐसे फोटोग्राफरों को पुलित्जर प्राइज (Pulitzer Prize) से नवाजा गया है, जो जम्मू कश्मीर में आतंकियों के हिमायती रहे हैं और सेना को बदनाम करने के लिए फोटो क्लिक करते रहे हैं। डार यासीन, मुख़्तार ख़ान और चन्नी आनंद को ये अवॉर्ड मिला।

राहुल गाँधी ने भी इन तीनों को बधाई दी थी। ट्विटर पर आईएनएस की पत्रकार आरती टीकू सिंह ने कहा कि उन पत्रकारों को कोई अवॉर्ड नहीं दिया जाता जो पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा मार डाले गए लोगों के अनाथ बच्चों की व्यथा को दुनिया के सामने लाते हैं। उन्होंने लिखा कि हिज़्बुल, लश्कर और जैश ने बम ब्लास्ट कर के न जाने कितने ही बच्चों को अनाथ बनाया लेकिन उनका दर्द दिखाने वालों को पुलित्जर नहीं मिलता।

उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ऐसे पत्रकारों के लिए कोई लॉबिंग ही नहीं करता, इसीलिए उन्हें अच्छा काम कर के भी अवॉर्ड नहीं दिया जाता। ये पढ़ते ही सबा नकवी बौखला गईं। उन्होंने लिखा कि प्रोपेगेंडा और पक्षपाती पत्रकारिता के लिए कोई केटेगरी ही नहीं होती। बता दें कि इससे पहले राहुल गाँधी ने भी तीनों पत्रकारों को ट्वीट कर के बधाई दी थी। संबित पात्रा ने उन तीनों को तथाकथित पत्रकार बताया है।

भाजपा नेता संबित पात्रा ने राहुल गाँधी को ये याद दिलाया कि पुलित्जर प्राइज की वेबसाइट जम्मू कश्मीर के बारे में क्या सोचती है। इस अवॉर्ड के साइटेशन में लिखा हुआ है कि जम्मू कश्मीर एक विवादित प्रदेश है, ये स्वतंत्र होना चाहिए था लेकिन भारत ने इस पर जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी राष्ट्र के सामने स्पष्ट करे कि उनकी पार्टी जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं या नहीं?

ज्ञात हो कि पुलित्ज़र प्राइज की वेबाइट पर जम्मू कश्मीर को ‘कंटेस्टेड टेरिटरी’ बताया गया है। इसका अर्थ हुआ- विवादस्पद प्रदेश। ये भारत के रुख के एकदम विपरीत है। इसमें अवॉर्ड जीतने वालों की फोटो के नीचे भी जम्मू कश्मीर पर भारत के कब्जे की बात कही गई है। बावजूद इसके सबा नकवी और राहुल गाँधी जैसों का भारत को बदनाम करने और देश को खंडित दिखाने वाले पत्रकारों को बधाई देना और उनका बचाव करना आश्चर्य का विषय है।

पुलित्जर जम्मू कश्मीर को नहीं मानता भारत का अंग

इससे पहले सबा नकवी ने एक पुराना वीडियो शेयर कर यह जताने की कोशिश की थी कि हिंदू भी लॉकडाउन का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्होंने एक मंदिर का पुराना वीडियो शेयर कर के जमतियों का बचाव किया था। हालाँकि पकड़े जाने पर अपना ट्वीट डिलीट कर दिया था। बाद में उन्होंने सब्जी और फल बेचने वालों को लेकर भी एक वीडियो बना कर प्रोपेगेंडा चलाया था। आज सबा नकवी दूसरों को प्रोपेगेंडाबाज बता रहीं।

मारा गया हिजबुल मुजाहिद्दीन का सबसे बड़ा आतंकी: ढेर हुआ रियाज नायकू, हंदवाड़ा के बाद बड़ी कार्रवाई

सेना ने हिजबुल मुजाहिद्दीन के सबसे बड़े आतंकी रियाज नायकू को मार गिराया है। वो हिजबुल का मुखिया था और सारी आतंकी गतिविधयों को संचालित करता आ रहा था। इसे हंदवाड़ा में आतंकियों की करतूतों के बदले में की गई जवाबी कार्रवाई माना जा रहा है। इससे पहले जम्मू कश्मीर के बेगपोरा से भारी गोलीबार की ख़बर आई थी और कहा गया था कि नायकू अपने घर के आसपास ही सेना के शिकंजे में आ गया है।

कश्मीर घाटी में आतंक-निरोधी अभियान की ये सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जा रही है। इस कार्रवाई को सेना, सीआरपीएफ और राष्ट्रीय राइफल्स ने मिल कर अंजाम दिया। उन्हें सूचना मिली थी कि रियाज अपने घर आया हुआ है, जिसके बाद घेराबंदी की गई। इसके बाद हुई मुठभेड़ में रियाज मारा गया। जुलाई 2016 में अनंतनाग में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद रियाज ने ही हिजबुल की कमान संभाली थी।

नायकू के बारे में मीडिया में कहा जा रहा है कि वो पहले गणित का शिक्षक था। इसी तरह बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कह कर प्रचारित किया गया था। उसके ऊपर 12 लाख रुपए का इनाम भी था। वो 33 वर्ष की उम्र में आतंकी बन गया था। ज़ाकिर मूसा जब हिजबुल से अलग हो गया था तो इसी ने इस आतंकी संगठन को फिर से खड़ा किया था। इस बार वो अपने बीमार माँ को देखने आया था। आज से दो साल पहले सद्दाम पोद्दार को मारा गया था।

इससे पहले हंदवाड़ा एनकाउंटर में पाकिस्तान के रहने वाले टॉप लश्कर आतंकी हैदर को सुरक्षाबलों ने मार गिराया था। भारतीय सेना के हाथ रविवार (मई 3, 2020) को ये बड़ी कामयाबी हाथ लगी थी। इसके कुछ दिनों बाद भारत ने कहा था कि वो पाकिस्तान के उन सभी क़दमों का कड़ा विरोध करता है, जिनके तहत वो अपने कब्जे वाले भारतीय प्रदेशों की स्थिति में बदलाव लाने के लिए उठा रहा है। भारत ने पाकिस्तान को तुरंत अपने अवैध कब्जे वाले प्रदेशों को खाली करने को कहा था।

श्रमिक ट्रेनों के टिकट के पैसे कौन दे रहा? क्या सच में प्रवासी मजदूरों से वसूला जा रहा किराया?

कोरोना वायरस के कहर के बीच अलग-अलग राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों के घर लौटने को लेकर बीते दिनों बहुत बवाल हुआ। देश में कई जगह प्रदर्शन किए गए कि केंद्र सरकार इन मजदूरों को उनके घर भेजने के लिए बस-ट्रेन का इंतजाम करे। हालाँकि लॉकडाउन के पहले चरण में कोरोना के हालात परखते हुए उन्हें सरकार ने रोके रखा। लेकिन तीसरा चरण शुरू होते ही सरकार ने इन मजदूरों को घर भेजने का इंतजाम किया और श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाई। लेकिन विरोधियों ने इस पर भी सवाल खड़े किए और पूछा कि इस ट्रेन के लिए टिकट के पैसे कौन देगा?

कॉन्ग्रेस जैसी कुछ पार्टियों ने ये भ्रम भी फैलाया कि बेरोजगार और लॉकडाउन में फँसे मजदूरों से केंद्र सरकार रेल टिकट के लिए पैसे वसूल कर रही है। मीडिया गिरोह ने बिना सच्चाई जाने धड़ल्ले से इसे फैलाया। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ये ऐलान कर दिया कि अगर सरकार श्रमिकों के टिकट के पैसे नहीं देना चाहती, तो वे उनके लिए भाड़े का पैसा देंगीं।

ऐसे में उन तथ्यों पर बात करने की जरूरत है जिन्हें लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और जिनसे विवाद बढ़ा है।

रेलवे ने यात्रियों से भुगतान करने को क्यों कहा?

श्रमिक ट्रेन विशेष आग्रह पर शुरू की गई स्पेशल ट्रेन है। इन्हें प्रवासी मजदूरों को उनके घरों/ राज्यों तक भेजने के लिए स्टार्ट किया गया है। इन ट्रेनों को केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की माँग और मजदूरों के प्रदर्शन को देखकर चालू करवाने का फैसला किया है। इन ट्रेनों की यही खासियत है कोरोना के समय में चालू की गई ये ट्रेनें सार्वजनिक रूप से सबको सेवा देने के लिए नहीं है। ये राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वे अपने राज्य में पंजीकृत मजदूरों को चिह्नित करें, उनकी स्क्रीनिंग कर उन्हें ट्रेन से गृहराज्य भेजें।

सबसे जरूरी बात। इस ट्रेन में सफर करने वालें यात्रियों को अपनी ओर से कोई टिकट नहीं खरीदनी है। इसका जिम्मा सिर्फ़ राज्य सरकार पर है कि वे आपस में कॉर्डिनेट करें और टिकट के पैसों का भुगतान करें। अब चूँकि, ये ट्रेन रेगुलर नहीं है और इन्हें केवल राज्य सरकार के आग्रह पर शुरू किया गया है। इसलिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि मजदूर उन ट्रेनों के लिए टिकट खरीदें। राज्य सरकारें भारतीय रेलवे द्वारा शुल्क के रूप में भुगतान करके ट्रेनों की बुकिंग करेंगी, और यात्रियों को कुछ भी नहीं देना होगा।

केंद्र सरकार इस ट्रेन को चलाने के लिए प्रति यात्री 85% लागत का भुगतान कर रही है और लागत का 15% राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाना है। इसलिए अगर राज्य प्रवासी श्रमिकों को चार्ज करने का फैसला करता है, तो इसके लिए जिम्मेदार राज्य सरकार है, न कि केंद्र सरकार। केंद्र सरकार खुद यात्रियों से टिकट नहीं ले रही है और न ही उन्हें टिकट बेच रही है।

क्या ऐसे राज्य हैं जो श्रमिकों से टिकट का भुगतान करवा रहे हैं?

कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जिन राज्यों ने श्रमिक ट्रेन के लिए यात्रियों को चार्ज किया, उनमें महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान थे। इनमें महाराष्ट्र में शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी की सरकार है। केरल में कम्युनिस्टों की है। राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है।

रेलवे ने श्रमिक ट्रेनों को फ्री क्यों नहीं किया?

15% चार्ज जो राज्य सरकार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार भी इस मामले पर गौर करें। अगर, यात्रा को रेलवे और केंद्र सरकार मुफ्त करवा देंगे तो प्रवासी मजदूरों के अलावा कई ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी जो एक राज्य से दूसरे राज्य में सफर करना चाहते हैं। बीते दिनों हमने ऐसे नजारे महाराष्ट्र में बांद्रा के एक मस्जिद के पास और दिल्ली में आनंद विहार में देखे। अगर 15 प्रतिशत से राज्य सरकार की भागीदारी श्रमिकों को भेजने में रहती है, तो वे इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रवासी मजदूरों की स्क्रीनिंग के बाद उनकी लिस्ट के साथ सामने आएँगे। ताकि उन्हें टिकट मिल सके।

85% भुगतान केंद्र कर रहा वहन

आम ट्रेनों की टिकट को यदि कोई देखता है, तो उसे मालूम चलेगा कि उसमें ये साफ लिखा होता है कि उसे चार्ज की गई राशि यात्रा के लिए खर्च की गई लागत का केवल 57% है। मगर, श्रमिक ट्रेनों के लिए, यात्रा के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए केवल 2/3rd सीटें भरी जाएँगी। यानी दाई और बाई ओर की सीटें भरी जाएँगी, लेकिन बीच की सीट खाली रहेगी। इसी प्रकार टॉप और बॉटम बर्थ भी यात्रियों को दिए जाएँगे। मगर मिडिल बर्थ खाली रखा जाएगा। इनके कारण इनका शुल्क घटकर 38% हो जाएगा। ये विशेष ट्रेनें हैं और पूरी तरह से खाली होकर वापस होंगी, इसलिए यात्री की लागत को आधे से विभाजित किया गया है, जो कि 19% होगी। मगर बावजूद इसके भोजन और स्वच्छता जैसी यात्री सेवाओं को ध्यान में रखने के बाद, राज्य सरकारों को कुल लागत का 15% भुगतान करने के लिए कहा गया था, शेष 85% केंद्र सरकार द्वारा वहन किया गया था।

रेलवे ने PM CARES में पैसा क्यों दिया, इसे सब्सिडी पर खर्च क्यों नहीं किया?

बता दें इस दावे को लेकर राहुल गाँधी ने सर्वप्रथम ट्वीट किया और जानबूझकर भ्रम फैलाया। उन्होंने अपने ट्वीट से ऐसे दर्शाया कि पीएम केयर फंड में तो रेलवे ने 151 करोड़ रुपए दान दे दिए थे। मगर जब बात प्रवासी मजदूरों की आई तो वे उनके भुगतान करने के लिए कह रहा है। जबकि सच ये है कि रेलवे द्वारा पीएम राहत कोष में दिया गया फंड उनपर भार नहीं था, जो कहीं भी कैसे भी खर्च किया जाए। इसके अलावा पीएम फंड के लिए रेलवे के कर्मचारियों ने अपनी सैलरी का कुछ हिस्सा दान किया था।

हवाई यात्रा के लिए भुगतान करने को नहीं कहा गया था?

बिलकुल गलत। ऐसा नहीं है कि उनसे भुगतान करने को नहीं कहा गया। उन्हें कहा गया था और जहाँ उन्हें भुगतान करने के लिए नहीं कहा गया, वहाँ सरकार एयर इंडिया या भारतीय वायु सेना के बिल का भुगतान करेंगे। हालाँकि, इस बीच कुछ विमान एयरलिफ्ट की तरह थे, जिनसे वुहान जैसी जगहों से लोगों को आपातकाल में निकाला गया। ।

सोनिया गाँधी अपने कहे अनुसार भुगतान करती हैं, तो उन्हें कितनी राशि रेलवे को देनी होगी?

सरकार श्रमिकों के लिए 34 ट्रेनें चालू करने जा रही है। इसलिए इन ट्रेनों को ऑपरेट करने में 24 करोड़ का खर्चा आएगा। यानी हर राज्य को 3.5 करोड़ रुपए देने होंगे। अगर हम मानते हैं कि रेलवे 100 ट्रेन प्रवासी मजदूरों के लिए चलाएगी तो सोनिया गाँधी को 706 करोड़ रुपए देने होंगे। इस राशि का भुगतान सीडब्ल्यूसी और सोनिया गांधी के निजी खजाने से किया जाएगा, न कि राज्य के सरकारी खजाने से। 

इसलिए यहाँ स्पष्ट होता है कि श्रमिक ट्रेनों को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है वो केवल राजनीति से प्रेरित है। कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियाँ केवल इस स्थिति को और भयावह बनाना चाहती है, ताकि वे गरीब मजदूरों की भावनाओं से खेलकर अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंक सकें।