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हलाल का हल्ला: आयुर्वेद व ऋषि-परंपरा को इस्लामी देशों ने अपनाया, समझौता उन्होंने किया, जीत हमारी हुई

बाबा रामदेव के उत्पादों को हलाल सर्टिफिकेट प्राप्त है, ये बात ज़्यादातर लोगों को हजम नहीं हो रही है। हालाँकि सर्टिफिकेट हाल फिलहाल में नहीं लिया गया है, इसे हासिल किए हुए समय गुजर गया, लेकिन मुद्दों की एक प्रकृति ये भी होती है कि वो ज़्यादा भाव नहीं खाते, उन्हें जब उछाला जाए वो उछल जाते हैं। यद्यपि समय ही चीजों को नया-पुराना बनाता है किन्तु ऐसे मामलों में समय की गठरी में कोई नीचे और ऊपर की तह नहीं होती। इसलिए पुराना उछला या नया उछला ये ज्यादा मायने नहीं रखता।

लॉकडाउन की फुर्सत उस उछाल को और भी अधिक ऊँचाई, विस्तार और स्वीकार्यता प्रदान करती है। लॉकडाउन ने आजकल हमें भी इतनी फुर्सत दे रखी है कि जब ये उछला तो हमने भी इसे लपकने के लिए अपनी छलनी लगा दी। उस छलनी में से क्या निकला और क्या अटका यही साझा करने के लिए ये लेख लिखा गया।

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के प्रबंध निदेशक व सह संस्थापक आचार्य बालकृष्ण ने कल अपने ट्विटर व फेसबुक के माध्यम से ‘हलाल का हौवा’ हैशटैग के साथ लिखा- “पतंजलि के हलाल सर्टिफिकेट लेने पर क्या यह हिन्दू संस्था नहीं रही? या उसके उत्पाद शाकाहारी नहीं हैं? स्वदेशी उत्पाद अरब सहित अनेक इस्लामी देशों में निर्यात करने हेतु बरसों पहले लिए गए सर्टिफिकेट के आधार पर हल्ला मचाने वाले राष्ट्रभक्त हैं या षड्यंत्रकारी, यह आप स्वयं विचार करें।” उनके इस कथन से उनके स्पष्टीकरण के बिंदु यानी इस प्रसंग में पतंजलि पर लगे आरोपों और इसके पीछे छिपी किसी गलत मंशा की चिंता छिपी हुई है।

आरोप हैं- हिंदुत्व, शाकाहार और राष्ट्रभक्ति से समझौता। क्या सचमुच पतंजलि ने अपने इन घोषित आदर्शों से समझौता कर लिया? आपातत: यही प्रतीत होता है। इसलिए ज़्यादातर मुद्दों पर जहाँ लोग खुद को ‘हाँ’ और ‘ना’ में बाँट लेते हैं, वहीं इस मुद्दे पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि इस बार उनकी ‘हाँ’ और ‘ना’ ही बँट गई है। हलाल के बारे में पूर्ण जानकारी का अभाव उनके समर्थन और विरोध दोनों को असहज बना रहा है।

इस्लामी शरिया के अनुसार ‘हलाल’ शब्द ‘हराम’ का विपरीतार्थी है। न केवल खान-पान बल्कि पहनना, बोलना या कोई भी कार्य करना हलाल या हराम के अंतर्गत आ सकता है। इसे हम हिन्दू धर्मशास्त्रों के विधि-निषेध के समान समझ सकते हैं। हलाल अर्थात् विधि और हराम मतलब निषेध।

कुछ दिनों पहले हलाल शब्द मांसाहार के प्रसंग में अधिक चर्चा में रहा। इसलिए अधिकतर लोगों को लगता है कि हलाल यानी विशेष इस्लाम अनुमोदित विधि से तैयार कर खाने की मेज तक पहुँचाया गया मांस। कदाचित् इसीलिए लोगों को आशंका हुई कि पतंजलि ने हलाल सर्टिफिकेट लिया है तो इसका मतलब अब वो शायद पूर्ण शाकाहारी नहीं रही।

अरब देशों में हलाल सर्टिफिकेट सभी खाद्य वस्तुओं और दवाई आदि अन्य वस्तुओं के विक्रय पर अनिवार्य है। शरिया के अनुसार जो चीजें मजहब के लोगों को खाने की अनुमति है, वो सब भी हलाल के अंतर्गत आती हैं, चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी। यानी शाकाहार भी हलाल हो सकता है। इसलिए पतंजलि को हलाल सर्टिफिकेट लेने के लिए शाकाहार को त्यागने की आवश्यकता नहीं है। उसे ये सर्टिफिकेट लेने के लिए अपने उत्पादों में कोई परिवर्तन नहीं करना।

देखा जाए तो हलाल का कायदा तो यह भी कहता है कि वस्तु की उत्पादन प्रक्रिया में शुरू से अंत तक सिर्फ मजहब विशेष के लोग ही शामिल होने चाहिए तभी वो वस्तु हलाल यानी उपयोग के लिए स्वीकार्य हो सकती है। क्या वो स्वयं अपने इस उसूल पर कायम हैं? दुनिया भर की सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हलाल सर्टिफिकेट है, तो क्या उन सबने अपनी कंपनियों में और लोगों को हटाकर समुदाय विशेष वालों को काम पर रख लिया? क्या पतंजलि ने ऐसा किया? क्या पतंजलि ने हलाल के लिए अपनी उत्पादन प्रक्रिया में कोई परिवर्तन किया?

आप पतंजलि के अधिकारियों से बात करके देखिए, ऐसा कोई बदलाव किसी भी स्तर पर नहीं हुआ। आप स्वयं देख सकते हैं कि अपने सिद्धांतों से समझौता किसे करना पड़ा। पतंजलि के उत्पाद जैसे पहले थे, वैसे ही अब भी हैं। तो हलाल सर्टिफिकेट से नया क्या हुआ? नया सिर्फ ये हुआ कि भारत की प्राचीन आयुर्वेदिक ऋषि-परम्परा के ज्ञान पर आधारित उत्पादों को इस्लामी देशों ने भी निरापद व अपनाने योग्य माना। क्या इससे किसी का राष्ट्रवाद या धार्मिक भावना आहत होती है?

‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का उद्घोष हमें प्रेरणा देता है कि आर्यत्व यानी मानव मात्र के लिए हितकारी श्रेष्ठ परम्पराएँ व मान्यताएँ विश्व भर में फैले। थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ यही होता भी आया है, किन्तु हमने इसे कभी भी तलवार के बल पर नहीं किया। सदियों से इस भारत धरा ने अनेक क्षेत्रों में उच्च मानदंड स्थापित किए और दुनिया ने उन्हें सराहा, इस धरती की ज्ञान परम्परा का आदर किया और उससे सीखा क्योंकि भारत की मनस्विता ने सार्वभौम लाभ को सर्वोपरि रखा। क्या हम वर्तमान भारतवासी उस परम्परा पर उतना ही विश्वास या आत्मविश्वास रखते हैं, जो उसको सार्वभौम आकार देने के लिए पर्याप्त हो? ये छोटी-छोटी आशंकाएँ उसके मार्ग में अनावश्यक बाधा ही बनेंगी।

‘सर्वे सन्तु निरामया:’ की भावना पर आधारित आयुर्वेद की प्रेरणा से निर्मित वस्तुएँ यदि देश-विदेश में स्वीकार्यता प्राप्त कर लें तो ये देश के लिए भी गौरव की बात होगी। योग-आयुर्वेद की निर्विवाद स्वीकार्यता न तो किसी हिन्दू के लिए चिंता की बात हो सकती है, न ही किसी राष्ट्रवादी के लिए। हाँ जिस दिन हम सस्ती स्वीकार्यता हासिल करने के लिए अपने मानदंडों से समझौता कर लेंगे, उस दिन हमें चिंता ज़रूर करनी पड़ेगी।

अधिकांश लोगों की मुख्य आपत्ति यह भी है कि हलाल सर्टिफिकेट के लिए दी गई फीस इस्लामी कट्टरपंथ को फैलाने में इस्तेमाल की जाती है। इसलिए ये सर्टिफिकेट नहीं लेना चाहिए। लेकिन तब शायद सबसे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि अरब देशों से तेल खरीद कर जो पैसा हम वहाँ पहुंचाते हैं, क्या उस पर ये सवाल नहीं बनता? इसके उलट निर्यात तो पैसा लेकर आता है।

हलाल सर्टिफिकेट की फीस से पता नहीं कितने कारतूस खरीदे जाएँगे, किन्तु वहाँ अपने उत्पाद बेचकर कमाया मुनाफ़ा अपने ही देश में लगेगा, इसमें कोई संशय नहीं। लेकिन इस बात पर सिर्फ यहीं चुप भी नहीं हुआ जा सकता। मांसाहार के मजहबी कायदों को एक तरफ रख भी दें तो सभी शाकाहारी उत्पाद तो अपने आप ही (by default) शरिया के मुताबिक़ हलाल हैं, ऐसी स्थिति में हलाल सर्टिफिकेट की क्या ज़रूरत है? और यदि है भी, यदि मजहबी उपभोक्ता को अपने धर्म के नज़रिए से अतिरिक्त विश्वसनीयता चाहिए भी तो ऐसे उत्पादों पर प्रमाणपत्र बाँटने के लिए फीस वसूल करने का क्या तुक है? और क्या ये फीस इस बात के लिए लगाई जा रही है कि मजहब विशेष के लोग उनका सामान खरीद कर उन पर कोई उपकार कर रहे हैं?

प्रमाणन की प्रक्रिया में जो खर्च आता है, उसे वो वहन करें जिन्हें इस प्रमाण पत्र की ज़रूरत है। किन्तु आज के व्यापार में सब कुछ बाज़ार आधारित ही है तो स्पष्ट है कि सब कम्पनियाँ सापेक्ष लाभ को देखते हुए इसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की ज़रूरत भी नहीं समझती। फीस की मात्रा को कम समझ कर इस तरह के मनमानेपन को चलने देना कतई सही नहीं है। दुनिया की सभी कंपनियों की ये थोड़ी-थोड़ी फीस इकट्ठी होकर इतनी हो ही जाएगी जो इस आपत्ति को सही ठहरती है कि आखिर उस पैसे का प्रयोग किस काम में होता है? आज नहीं तो कल दुनिया भर की कंपनियों को इसे समझना होगा कि आखिर उन्हें ये फीस किस नाम की देनी पड़ती है।

मुद्दा पतंजलि के हलाल प्रमाणपत्र से शुरू हुआ था तो चलिए इस बारे में कुछ और आपत्तियों का रुख करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं, जिनके पास विरोध के लिए और कोई तर्क नहीं है बस उन्हें पतंजलि के मुनाफे से आपत्ति है। वास्तव में ये एक स्थायी आपत्ति है, जिसकी स्थापना पतंजलि के साथ-साथ ही हो गई थी। जब-जब पतंजलि को मुनाफा होता है तब-तब ये स्थायी विरोध ऐसे उछलता है मानो यही पतंजलि का शेयर सूचकांक हो।

अब पतंजलि को शेयर बाज़ार में तो प्रवेश करना नहीं तो ये भी उतार-चढ़ाव को नोट करने का एक मनोरंजक ज़रिया हो सकता है। तो लोगों को अक्सर ये आपत्ति रहती ही है कि एक संन्यासी बाबा इतनी बड़ी कम्पनी काहे चला रहा है। वास्तव में वो ये नहीं जानते कि बाबा के गेरुए वस्त्रों की सीमा बाबा के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े आदर्शों तक है। कर्म छोड़कर बैठ जाना संन्यास नहीं है, वो तो सबको मरते दम तक करना है। हाँ इतना ज़रूर है कि बाबा का कर्म उनके संन्यास आश्रम के आदर्शों के विरुद्ध न हो, ये देखना उनकी अपनी ज़िम्मेदारी है। और जब कर्मफल से सभी बँधे हुए हैं तो आप अपनी चिंता करें बाबा अपनी चिंता खुद कर लेंगे।

ऐसी आपत्तियाँ अधिकतर वही उठाते हैं जो खुद को संवैधानिक व्यक्तिगत अधिकारों का सबसे बड़ा पैरोकार समझते हैं और ज़्यादातर अपने दोहरे मानदंडों के लिए कुख्यात हैं। उन्हें ये कभी समझ नहीं आएगा कि ऐसे छोटे-छोटे व्यक्तिगत विरोधों के लिए और भी मौके होते हैं। बात जब देश से बाहर की हो, कम से कम तब हम ऐसी मानसिकताओं को कुछ देर के लिए विश्राम दे दें। लेकिन ऐसा करने में समस्या एक और भी तो है। स्वदेशी की पहचान दुनिया में बढ़ रही है, इतना बड़ा श्रेय किसी एक को कैसे दे दिया जाए? अब आपको अनुलोम-विलोम और भ्रामरी की ज़रूरत है। इससे मन शांत होता है और संतोष बढ़ता है।

आपत्ति तो वास्तव में ये होनी चाहिए कि अरब देशों में व्यापार के लिए हलाल सर्टिफिकेट क्यों अनिवार्य है? क्या वहाँ समुदाय विशेष के अलावा अन्य धर्मों के अनुयायी नहीं रहते? क्या उन्हें अपनी पसंद की चीजों को खरीदने का कोई हक़ नहीं है? आयुर्वेद व अन्य चिकित्सा पद्धतियों के वो उत्पाद जो हलाल नहीं हैं किन्तु सेहतमंद हैं, उन्हें इस्तेमाल करने के अरब निवासी भारतीयों के हक़ या अन्य देशों के मूल निवासियों के हक़ को छीनना जायज है? शांतिप्रियता और विश्वबंधुत्व के नाम पर दुनिया के सभी देशों में वहाँ के कानूनों से ऊपर उठ कर छूट लेने वाले समुदाय को क्या अपने देश में अन्य लोगों को ऐसे अधिकार नहीं देने चाहिए?

खैर छोड़िए, कितने हास्यास्पद और महीन मुद्दे हैं ये। इतने महीन कि हमारी मुद्दे लपकने की छलनी के एक ही छेद से ये सब एक साथ पार हो जाएँगे और पता भी नही चलेगा कि किधर गए, सब स्वीकार है। भारत जैसे अत्यंत उदार देश में भी तरह-तरह की आजादियों का शोर मचाने वाले पक्षपाती भोंपुओं का स्वर इन देशों के प्रतिबंधों पर कंठ सुधारक वटी की पूरी डिब्बी खाकर भी आवाज़ नहीं निकल पाएगा।

अंत में यही अपील कि हमें ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ के ‘कुछ बात’ को समझना होगा। इस ‘कुछ बात’ की सबसे बड़ी बात है हमारा समावेशी होना। जब हम अपने देश में अन्य देशों के लोगों और परम्पराओं को खुले मन से स्वीकार कर लेते हैं तो अपने देश की परम्पराओं को अन्य देशों में स्वीकार्यता मिलने पर आपत्ति करना कौन से किस्म की उदारता है?

हम सब जानते हैं कि भारत को पददलित करना दुनिया के किसी देश के वश की बात नहीं, इसे सदैव हमारे आपसी विद्वेष ने उनके लिए संभव बनाया है। अत: भारत और भारतीय संस्कृति के शुभचिंतकों को चाहिए कि जिस संस्कृति से वो इतना लगाव रखते हैं और सचमुच उससे प्रेम करते हैं, उसके लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाएँ। हमारी परम्पराएँ दुनिया में स्वीकार्य हो रही हैं तो उसमें हमारी विजय निहित है। इस विजय पर खुश हों, आशंकित नहीं।

सफूरा जरगर के ऑनलाइन ‘चरित्र हनन’ पर दिल्ली महिला आयोग सक्रिय, स्वाति मालीवाल ने पुलिस से माँगे जवाब

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की छात्रा सफूरा जरगर को ‘बदनाम’ करने के मुद्दे पर दिल्ली महिला आयोग ने संज्ञान लिया है। सफूरा जरगर दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद है और प्रेगनेंट है। 

दिल्ली महिला आयोग ने इस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। दिल्ली महिला आयोग की प्रमुख स्वाति मालीवाल ने इस बाबत पुलिस को एक पत्र लिखा है। इसमें आयोग ने सफूरा जरगर के खिलाफ सोशल मीडिया पर भद्दी टिप्पणियाँ किए जाने के मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर जानकारी मॉंगी है।

पत्र में कहा गया है कि सफूरा को लेकर आपत्तिजनक भाषा लिखने वालों की पहचान की जाए और उन्हें गिरफ्तार किया जाए। साथ ही सोशल मीडिया से इस तरह के पोस्ट को डिलीट करवाने की भी बात कही गई है। स्वाति मालीवाल ने पुलिस से 10 मई तक इस पर जवाब माँगा है।

जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर को फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्व दिल्ली के जाफराबाद इलाके में प्रदर्शन को लेकर पिछले महीने गिरफ्तार किया गया था। बाद में सांप्रदायि​क हिंसा के संबंध में उसके खिलाफ गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था और उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया।

सफूरा को सोशल मीडिया पर उनके बच्चे के पिता को लेकर ट्रोल किया जा रहा है। ट्विटर पर लोग भद्दी टिप्पणियाँ कर रहे हैं और उनकी शादी एवं प्रेगनेंसी पर सावल उठा रहे हैं। आयोग की ओर ने कहा गया है कि सफूरा के खिलाफ सोशल साइट्स पर हल्के कमेंट, गाली-गलौच और चरित्र हनन की कोशिशों की कई शिकायत मिली हैं। इसके बाद दिल्ली महिला आयोग ने दिल्ली पुलिस के साइबर अपराध प्रकोष्ठ को गर्भवती सफूरा जरगर को शर्मनाक तरीके से अपमानित करने को लेकर नोटिस जारी किया है ।

स्वाति मालीवाल ने पुलिस को नोटिस जारी करते हुए लिखा है, “सोशल मीडिया पर उसके और उसके अजन्मे बच्चे के खिलाफ एक निंदनीय अभियान चलाया जा रहा है और भद्दी टिप्पणियाँ की जा रही हैं। उसकी गरिमा को प्रभावित करने वाले और उसके परिवार को धमकी देने वाली कई टिप्पणियाँ भी की गई हैं।” उन्होंने दिल्ली पुलिस से कहा है कि वो सफूरा के खिलाफ ऑनलाइन अभद्र टिप्पणियॉं करने वालों के खिलाफ जल्द से जल्द मामला दर्ज करें।

ज्ञात रहे कि दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों में मीरान हैदर के साथ सफूरा जरगर को साजिश करने के आरोप में आरोपित बनाया गया है। दंगों में 50 से ज्यादा लोग मारे गए थे। दिलबर नेगी जैसों के हाथ-पाँव काटकर नृशंस हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया था और आईबी के अंकित शर्मा को सुनियोजित ढंग से मारा गया था।

इससे पहले जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी के सदस्य मीरान हैदर को भी दिल्ली पुलिस ने 2 अप्रैल को गिरफ्तार किया था। उसको उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के संबंध में षड्यंत्र रचने के आरोपों के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। मीरान हैदर राष्ट्रीय जनता दल की यूथ विंग की दिल्ली शाखा का अध्यक्ष है।

टीपू सुल्तान पर भी शिवसेना का बदला ‘सिलेबस’: कभी कहा था हिन्दुओं का संहारक, अब दे रही विनम्र श्रद्धांजलि

शिवसेना को महाराष्ट्र की सत्ता में बने रहने के लिए ‘घोड़ा-चतुर’ करते हुए दिन गुजारने पड़ रहे हैं। उसने साबित कर दिया है कि उसकी राजनीतिक विचारधारा महज सत्ता की दिशा के ही अनुकूल रहती है। शिवसेना ने अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे नई फजीहत टीपू सुल्तान को लेकर कमाई है।

दरअसल, सुल्तान फतेह अली खान सहाब यानी कि टीपू सुल्तान (Tipu Sultan) की मौत मई 04, 1799 को हुई थी। लेकिन मुद्दा टीपू की मौत नहीं बल्कि शिवसेना नेताओं द्वारा टीपू को दी जा रही श्रद्धांजलि वाले पोस्टर हैं।

सोशल मीडिया पर आज एक ऐसा ही पोस्टर सबके बीच चर्चा का विषय बना हुआ है

उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र की सत्ता की चाह में पहले बाल ठाकरे की विरासत और विचारधारा के साथ समझौता किया और अब वह तुष्टिकरण की राह पर चल पड़ी है। शिवसेना ने उस कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करना स्वीकार किया जिसे लेकर बाला साहब ठाकरे हमेशा आक्रामक ही नजर आते थे। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार के समय वर्ष 2010 में बाल ठाकरे ने शिवेसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में एक आर्टिकल में लिखा था- “मुंबई सभी की है, लेकिन इटेलियन मम्‍मी की नहीं हो सकती।”

शिवसेना की आज ऐसी दुर्गति हुई है कि कुछ माह पहले वो इसी सोनिया गाँधी की कॉन्ग्रेस के पीछे गठबंधन की भीख माँगती देखी गई और मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र को कॉन्ग्रेस के हाथों सौंप दिया।

यही नहीं, बाल ठाकरे अक्सर कहा करते थे कि कॉन्ग्रेस को हिन्दुत्व शब्द से ही एलर्जी है और नेहरू-गाँधी परिवार सिर्फ कथित अल्पसंख्यकों को साधकर ही देश में राजनीति करता चला आ रहा है।

टीपू सुल्तान पर शिवसेना के विचार

महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने से पहले शिवसेना के विचार टीपू सुल्तान को लेकर एकदम उलट थे। यहाँ तक कि शिवसेना के नेता कर्नाटक सरकार तक को भी टीपू को लेकर किसी फैसले पर आसानी से नहीं छोड़ते थे।

2015 को ऐसी ही एक घटना में शिवसेना के सांसद अरविंद सावंत ने टीपू सुल्तान और मराठा नरेश छत्रपति शिवाजी के बीच तुलना पर भी आपत्ति जताई। तब उन्होंने कठोर स्वरों में कहा था, “टीपू सुल्तान एक निर्दयी शासक था जिसने हिंदुओं का जनसंहार किया और जिसका इस्लाम के अलावा किसी भी दूसरे धर्म के अस्तित्व में विश्वास नहीं था। उसने मंदिर और गिरिजाघर ध्वस्त कराए। और वे कहते हैं कि वह एक अच्छा शासक था?”

सावंत ने इस बात पर हैरानी जताई कि आजादी के इतने सालों बाद अचानक टीपू सुल्तान को याद किया जा रहा है और इसे कर्नाटक सरकार की विभाजनकारी नीति है बताया था। उनका कहना था कि यह मजहब या हिंदुओं का नहीं बल्कि देशभक्ति का सवाल है।

शिवसेना का सॉफ्ट हिंदुत्व के बाद तुष्टिकरण का मार्ग

महाराष्ट्र की सत्ता के लिए एक ओर जहाँ शिवसेना ने सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति को अपनाया है वहीं उसकी नजर में अब तुष्टिकरण ही सत्ता में बने रहना का एकमात्र जरिया बनता जा रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र के पालघर में हुई 2 साधुओं और उनके ड्राइवर को मॉब लिंचिंग को भी उद्धव ठाकरे सरकार ने महज ग़लतफ़हमी साबित करने का प्रयास किया है। यही नहीं, साधुओं की हत्या पर मौन सोनिया गाँधी से सवाल करने वाले रिपब्लिक भारत के संस्थापक अर्नब गोस्वामी के खिलाफ भी नफरत की भावना से केस चलाए गए और अनावश्यक पूछताछ की जा रही है।

मजहब विशेष के प्रति उद्धव ठाकरे की बदलती राय का अंदाजा महाराष्ट्र में सरकारी स्कूल और कॉलेज में समुदाय विशेष को 5% आरक्षण दिए जाने को लेकर उद्धव कैबिनेट द्वारा दिक्खाई गई हरी झंडी से भी लगाया जा सकता है।

खैर, टीपू सुल्तान अब निकल चुके हैं लेकिन ऐसे अभी कई अवसर आने बाकी हैं जब शिवसेना को अपनी ही कही बातों से पीछे हटना पड़ सकता है। राजनीति में यह इतनी बड़ी बात तो नहीं मानी जा सकती है लेकिन यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि शिवसेना ने अपने हर उस मूलभूत विचार से समझौता कर लिया है, जिसने कभी उसे आधार देने का काम किया था।

जादवपुर यूनिवर्सिटी में ‘बॉयज लॉकर रूम’: जहाँ गूगल ड्राइव से लड़कियों की नग्न तस्वीरें होती रहीं सर्कुलेट

दिल्ली में विवादित इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) का खुलासा होने के कुछ ही घंटों बाद कोलकाता से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया। कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय के कुछ पूर्व छात्रों पर इसी तरह की अश्लील और आपत्तिजनक चैट करने का आरोप है।

इसका खुलासा तब हुआ, जब ‘Aiyoobrows’ नामक ट्विटर यूजर ने सोमवार (मई 4, 2020) को इसको लेकर एक के बाद एक कई ट्विट्स किए। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि यूनिवर्सिटी के छात्रों का एक ग्रुप गूगल ड्राइव (Google Drive) के जरिए महिलाओं की नग्न और अर्धनग्न तस्वीरों को सर्कुलेट कर रहा है। उन्होंने बताया कि इस ड्राइव का इस्तेमाल 2016 से ही हो रहा है।

इस मामले में उन्होंने सौर्यदीप बसाक और इमान कल्याण घोष नामक दो लड़कों का नाम बताया। उन्होंने बताया कि ड्राइव सौर्यदीप बासक का है और इमानकल्याण का भी इसमें बराबर का हिस्सेदार है। उन्होंने कहा कि उन्हें यकीन है कि इसमें और भी लोग शामिल हैं, लेकिन उन्हें उन लोगों का नाम नहीं मालूम है। एक अन्य ट्विटर उपयोगकर्ता @SadMandalorion ने ‘Aiyoobrows’ के आरोपों पर कहा कि जब बाद में ‘Aiyoobrows’ इसका खुलासा करना चाहती थी तो उनसे पीड़ितों द्वारा कहा गया कि वो ऐसा न करें, क्योंकि इससे आगे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ये तस्वीर पीड़ितों के साथ धोखेबाजी करके प्राप्त की गई थी।

उन्होंने कुछ और पुरुषों के नाम भी लिए, जो कथित तौर पर महिलाओं की नग्न तस्वीरें शेयर करने में शामिल थे।

महिलाओं के स्क्रीनशॉट की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में सर्कुलेट हो रही हैं, जहाँ पीड़ित इस घटना के बारे में बता रही हैं। 2015 में अपने साथ हुई एक घटना के बारे में बात करते हुए, एक महिला ने आरोप लगाया है कि वह ओडिशा में अंतरराष्ट्रीय MUN (मॉडल संयुक्त राष्ट्र) में भाग ले रही थीं, जहाँ बसाक ने कथित तौर पर उसे खुद की तस्वीर भेजने के लिए कहा था। कथित तौर पर बसाक ने उन्हें अपने लिंग की तस्वीर भेजी। फिर उसने (दबाव के कारण), अपनी इंटिमेट तस्वीर भेज दी। महिला ने सोचा था कि वह इसे बाद में डिलीट कर देगा। लेकिन वह यह जानकर हैरान रह गईं कि उसकी तस्वीर Google ड्राइव में थी और सर्कुलेट हो रही है।

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सर्कुलेट हो रहे एक और स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि किसी ने उनकी इंटिमेट तस्वीरों को शेयर करने के लिए झाँसे में लेने की कोशिश की थी। जब उनके साथ यह घटना हुई थी, उस समय वह 12 वीं में थी, यानी कि नाबालिग थी।

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एक अन्य महिला ने जादवपुर यूनिवर्सिटी और उस गूगल ड्राइव के बारे में बात करते हुए अपना अनुभव साझा किया। इसमें वह  ‘First Year F*ck’ नामक किसी चीज के बारे में बात करती है, जिसमें एक शख्स प्रथम वर्ष के छात्राओं के साथ शारीरिक रूप से इंटीमेट होने की कोशिश करेगा। वह आरोप लगाती हैं कि उसे उसके करीबी दोस्तों द्वारा भरपूर संरक्षण प्राप्त था।

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एक महिला ने 2016 की एक घटना को याद करते हुए बसाक के साथ हुई बातचीत के बारे में बताया। महिला उस समय जादवपुर विश्वविद्यालय में कॉलेज के प्रथम वर्ष में थी। उसने आरोप लगाया कि उसके और बसाक के शराब पीने के बाद, बसाक ने उसे अपने फोन पर ‘प्ले सेक्स गेम’ खेलने के लिए कहा और उसके साथ इंटीमेट होने की कोशिश की, जिसे उसने विनम्रता से मना कर दिया। वह दावा करती हैं कि बाद में फिर बसाक ने उसे नंगी तस्वीर भेजने के लिए मैनुपुलेट करने की कोशिश की।

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एक और स्क्रीनशॉट सामने आया है, जिसमें बसाक एक महिला से यौन संबंध बनाने के लिए कहता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘Aiyoobrows’ को 2018 में भारत में #MeToo आंदोलन के दौरान ड्राइव के बारे में पता चला था। उस दौरान कई महिलाओं और पुरुषों ने अपने साथ वर्कप्लेस पर हुए यौन शोषण के बारे में खुलासा किया था। रिपोर्ट के अनुसार बसाक ने अपने साथ रिलेसनशिप में आई महिलाओं की तस्वीर को सेव करने और फिर उसे अपने ग्रुप में शेयर करने के लिए 2016 में इस ड्राइव की शुरुआत की थी। वो कहती हैं कि उन्हें बहुत बड़ा झटका लगा, जब उन्होंने खुद की तस्वीर भी वहाँ पर देखी। कथित तौर पर जब बसाक ने उनसे काफी सालों तक तस्वीर भेजने के लिए उन्हें मैनुपुलेट किया, तब उन्होंने तस्वीर उसे भेजी थी। मगर उनसे बिना पूछे उनकी तस्वीर को गूगल ड्राइव के जरिए सर्कुलेट होता देखकर उन्हें काफी धक्का पहुँचा है।

रिपोर्ट में आगे गूगल ड्राइव के एडमिन बासक के हवाले से कहा गया है कि यह उसके रोमांटिक अफेयर्स की कहानी है और इसका महिलाओं को अपमानित करने से कोई संबंध नहीं है। बसाक कथित तौर पर टाइम्स ऑफ इंडिया से कहता है कि चूँकि वो कॉलेज में काफी पॉपुलर था, तो उसके काई सारे अफेयर्स और रोमांटिक संबंध थे। उसने कहा कि वह उन दोनों महिलाओं को जानता है, जिन्होंने उसके खिलाफ आरोप लगाए हैं और वह उन दोनों के साथ रिलेसनशिप में था और रिलेसनशिप में रहते हुए उन दोनों के साथ धोखा किया था। वो कहता है कि वो एक सहमति वाला रिलेसनशिप में था और उसने कोई अपराध नहीं किया है। इतना ही नहीं, आगे वह दावा भी करता है कि उसने महिलाओं से प्राप्त फोटो को कभी सर्कुलेट नहीं किया।

एक अन्य शख्स, इमान कल्याण घोष, जिस पर गूगल ड्राइव के अस्तित्व के बारे में जानने का आरोप है, ने दावा किया कि उसे इस बात से घृणा है कि उसने बसाक से कभी पूछताछ नहीं की और ऐसे व्यवहार का समर्थन करने वालों का समर्थन किया।

बॉयज लॉकर रूम

बता दें अभी हाल ही में इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) का खुलासा एक लड़की की मदद से हाल में हुआ, जिसने सोशल मीडिया पर इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स को शेयर करते हुए लिखा, “दक्षिण दिल्ली के 17-18 साल की उम्र के लड़कों का एक ग्रुप है, जिसका नाम ‘ब्वॉयज लॉकर रूम’ (Boys Locker Room/Bois Locker Room) है, जहाँ कम उम्र की लड़कियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर आपत्तिजनक बनाया जा रहा था। मेरे स्कूल के दो लड़के इसका हिस्सा हैं।” लड़की ने इस दौरान जिन तस्वीरों को शेयर किया था, उन पर लिखे कमेंट देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि ग्रुप के सदस्य गैंगरेप की योजना बना रहे थे और उस पर चर्चा कर रहे थे।

गर्ल्स लॉकर रूम

‘बॉयज लॉकर रूम’ के बाद अब कथित तौर पर ‘गर्ल्स लॉकर रूम’ चैट लीक हो गए हैं, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हैं। ‘गर्ल्स लॉकर रूम’ के कथित तौर पर जो चैट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, उसमें कम उम्र की लड़कियाँ लड़कों के प्राइवेट पार्ट्स को लेकर अश्लील बातें और टिप्पणी करती नजर आ रही हैं। इस ‘गर्ल्स लॉकर रूम’ में कथित तौर पर पुरुषों के बारे में अपमानजनक बातें की जाती हैं। महिलाओं के ग्रुप चैट स्क्रीनशॉट में कथित रूप से सिर्फ पुरुषों की आपत्तिजनक तस्वीरें हैं।

टॉप 5 हॉटस्पॉट से निकला इंदौर: मुस्लिमों के उपद्रव, कमलनाथ की सुस्ती के बाद कोरोना संक्रमण से रिकवरी की कहानी

अब तक देश के पाँच सबसे बड़े कोरोना हॉटस्पॉट में से एक रहे इंदौर से आखिरकार अच्छी खबरें आ रही हैं। जिला प्रशासन द्वारा सख्ती से लागू किए गए लॉकडाउन और घर-घर की जा रही स्क्रीनिंग का असर यह हुआ है कि इंदौर का नाम शीर्ष पाँच की सूची से बाहर हो गया है। मरीजों को ठीक करके घर भेजने का औसत देशभर से बेहतर चल रहा है और जाँच में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या का साप्ताहिक औसत प्रतिशत 20 से घटकर 11% तक रह गया है।

ऐसे भी मौके आए पुलिस और कोरोना संक्रमितों के बीच दीवार बनकर खड़ा नजर आया मुस्लिम समुदाय

इंदौर में कोरोना की असली कहानी मार्च के पहले सप्ताह से ही शुरू हो गई थी, जब उमराह (हज़) से आने वाले यात्रियों की वापसी सबसे ज्यादा हो रही थी। फरवरी माह के अंत और मार्च के पहले सप्ताह में दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट पर उतरे इंदौर के हजयात्री जब डोमेस्टिक फ्लाइट्स से इंदौर पहुँचे तो उनमें से ज्यादातर को तो शायद पता भी नहीं था कि वे अपने साथ कोरोना ले आए हैं।

इंदौर हवाई अड्‌डे पर आने वाली अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट्स की स्क्रीनिंग तो सरकार के निर्देश के बाद शुरू हो गई थी, लेकिन इसके पहले बड़ी संख्या में हज यात्री संक्रमण लेकर इंदौर के खजराना, नयापुरा, रानीपुरा, चंदन नगर और टाटपट्‌टी बाखल में दाखिल हो चुके थे।

मुस्लिमों का उपद्रव और कमलनाथ सरकार की बेचारगी

अगर मरीजों की सूची पर नज़र डालें तो सूची में सिर्फ मुस्लिम समुदाय के मरीजों का प्रतिशत ही 70% से अधिक पाया गया है। 23 मार्च की रात तक प्रदेश में काम कर रहे कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस बीमारी को रोकने के लिए क्या किया, इसका जवाब न तो वे न ही उनकी पार्टी आज तक दे पाई है। मार्च के पहले सप्ताह में उन्होंने सिर्फ जिला कलेक्टरों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की, मार्च के मध्य में स्कूल-कॉलेज-मॉल बंद करवाए। अल्पमत में आ चुकी अपनी सरकार को बचाने के लिए कोरोना का हवाला दे विधानसभा का सत्र भी स्थगित करवा दिया।

प्रबंधन में माहिर कमलनाथ की सरकार ने 23 मार्च की रात तक के अपने कार्यकाल में एक भी टेस्टिंग किट, पीपीई किट ऑर्डर नहीं किया था और न ही कोविड अस्पताल अथवा क्वारंटाइन सेंटर ही तैयार करवाए। पिछली सरकार की कुल जमा उपलब्धि बस यहीं तक सीमित है।

बंद के निर्देशों का पालन करने की सलाह देने पर पुलिस को विरोध का सामना करना पड़ा

कॉन्ग्रेस सरकार के समय इंदौर का जिला प्रशासन तो और भी आगे निकला। 22 मार्च को एक दिन के जनता कर्फ्यू के बाद लोग सड़कों पर उतर आए। उन्हें रोकने के लिए तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस कप्तान (डीआईजी) ने कोई प्रयास नहीं किए।

23 मार्च की रात 9 बजे शपथ लेने के तुरंत बाद भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसी रात 10 बजे प्रदेश में कोरोना संकट को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की मीटिंग की और हर जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए। कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान पोस्टिंग पाए कलेक्टर लोकेश जाटव की मन:स्थिति क्या थी इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब देशभर में कर्फ्यू और लॉकडाउन का सख्ती से पालन करवाए जाने की बात हो रही थी, तब कलेक्टर जाटव ने कर्फ्यू तो लगाया, लेकिन सात घंटों की छूट के साथ।

इंदौर के चिकित्सा विशेषज्ञों की मानें तो यह वह समय था जब सबसे ज्यादा सख्ती की जरूरत थी, लेकिन तब सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक की कर्फ्यू ढील देकर लॉकडाउन का मज़ाक उड़ा दिया गया। अंतत: पाँच दिन बाद भाजपा सरकार को सख्त फैसला लेना पड़ा और पूर्व में नगर निगम कमिश्नर रह चुके मनीष सिंह को कलेक्टर तथा पुलिस कप्तान के तौर पर हरिनारायणा चारी मिश्रा को इंदौर की जिम्मेदारी दी गई।

स्वास्थ्यकर्मियों को धन्यवाद देकर उनका उत्साहवर्धन करती हुई जनता

दोनों ने इंदौर आते ही सबसे पहले कर्फ्यू में छूट को खत्म किया और सख्ती से लॉकडाउन का पालन करवाना शुरू किया। साथ ही लोगों को परेशानी न हो इसलिए नगर निगम के माध्यम से राशन और किराना घर-घर पहुँचाने की व्यवस्था शुरू की। बिना डंडे चलाए की गई इस सख्ती का ही असर यह हुआ है कि जिस टाटपट्‌टी बाखल में सर्वे करने पहुँची डॉक्टरों की टीम पर हमला किया गया था, बाद में उसी इलाके में कोरोना के 37 मरीज निकले और प्रशासन ने उनमें से 34 मरीजों को ठीक कर घर भेज दिया। वर्तमान में इस इलाके से जिन 92 मरीजों को क्वारंटाइन किया गया था, वे सभी के सभी ठीक होकर घर जा चुके हैं।

वहीं, इसके उलट कॉन्ग्रेस अभी भी समाधान के बजाए शासन-प्रशासन की मुश्किलें बढ़ाने का ही काम कर रही हैं। कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान में तो कॉन्ग्रेस ने और भी बड़ा कारनामा यह कर दिखाया कि एक ओर अपनी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी की हाँ में हाँ मिलाई और दूसरी तरफ श्रमिकों को घर भेजने के बदले उनसे रेल का किराया भी वसूल लिया। यही नहीं, इस बात की पोल खुलने से पहले दावा किया गया था कि राजस्थान की राज्य सरकार इन श्रमिकों को अपने खर्चे से घर भेजने का प्रबंध कर रही है।

तबलीगी जमात के मरकज से जुड़े 20 लोग गायब, मौलाना साद के बेटे से क्राइम ब्रांच ने माँगी जानकारी, 2 घंटे पूछताछ

दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज मामले में जाँच में जुटी क्राइम ब्रांच ने मौलाना साद के बेटे को अपने कार्यालय में बुलाकर करीब 2 घंटे पूछताछ की। पूछताछ के दौरान उन्होंने साद के बेटे से 20 लोगों की जानकारी माँगी जो दिल्ली के मरकज में न केवल शामिल थे, बल्कि मरकज़ प्रबंधन टीम का हिस्सा थे।

खबरों की मानें तो क्राइम ब्रांच को अब तक की पड़ताल में पता चला है कि मरकज के 20 ऐसे कर्मचारी हैं जो यहाँ आने-जाने वाले जमातियों की व्यवस्था से जुड़े थे वे केस दर्ज होने के बाद से गायब हैं। अब चूँकि साद का बीच वाला बेटा मुख्यालय की गतिविधियों में अधिक सक्रिय है और यही प्रबंधन से जुड़े 6 पदाधिकारियों के साथ ज्यादा बैठक भी करता था, इसलिए क्राइम ब्रांच ने उसे बुलाकर पूछताछ की और तबलीगी जमात मुख्यालय की गतिविधियों से जुड़े दस्तावेजों के बारे में भी जानकारी माँगी।

पुलिस को 20 लोगों की सूचना उन ट्रैवेल एजेंट से पूछताछ के दौरान मिली, जिन्होंने मरकज आने वाले विदेशी जमातियों के रहने-खाने से लेकर आने-जाने की व्यवस्था की जिम्मेदारी सँभाल रखी थी। अब इन कर्मियों के मोबाइल फोन से लेकर ईमेल आईडी को भी सर्विलांस पर लगाकर महत्वपूर्ण जानकारी पुलिस ने हासिल की है।

इसके अलावा क्राइम ब्राँच ने मौलाना साद की कोरोना जाँच कराने के एक बार फिर निर्देश दिए हैं। पुलिस ने मौलाना के बेटे से साफ कहा कि वह मौलाना की एम्स या मान्यता प्राप्त सरकारी लैब से कोरोना जाँच कराए और क्राइम ब्रांच को रिपोर्ट सौंपे।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली पुलिस ने मौलाना साद के एक आलीशान फार्म हाउस पर छापा मारा था। साथ ही एक ऐसे बैंक अकाउंट का भी पता लगाया था जिससे कथित तौर पर 24 से 48 घंटों के भीतर करोड़ों रुपए ट्रांसफर होते थे। इस अकाउंट को साद का बेटा ही सॅंभालता था।

यहाँ बता दें, क्वारंटाइन पीरियड खत्म होने के बाद भी मौलाना साद अभी तक सबके सामने नहीं आया है। उसका वकील ही उसकी ओर से मीडिया और पुलिस को जवाब दे रहा है। समय के साथ जमात प्रमुख पर क्राइम ब्राँच और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का शिकंजा भी कस रहा है।

वीरगति प्राप्त ASI की बेटी की फोटो ट्वीट कर J&K के पुलिस अधिकारी ने पूछा- इस तस्वीर के लिए कोई पुरस्कार?

जम्मू-कश्मीर में जिन तस्वीरों के लिए पत्रकारिता का बसे बड़ा पुरस्कार मिला है, उन तस्वीरों के जरिए ये दिखाने की कोशिश की गई है कि कश्मीर में भारतीय सेना और सुरक्षाबल ज्यादती कर रहे हैं। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने जम्मू-कश्मीर में ‘जिंदगी की असरदार तस्वीरें’ खींचने पर पुलित्जर पुरस्कार जीतने के लिए बधाई दी है। 

हैरानी की बात है कि सुरक्षाबल आतंकियों से जंग में अपनी जान गँवा देते है, लेकिन उनके लिए कोई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं है। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इम्तियाज हुसैन ने ट्विटर पर एक तस्वीर डाली। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा मारे गए एक ASI की बेटी की बिलखते हुए तस्वीर ट्वीट की।

तस्वीर ट्वीट कर उन्होंने लिखा, “आने वाले समय में इस तस्वीर में मानवता की अंतरात्मा की आवाज़ होनी चाहिए। कश्मीर में 2017 में वीरगति को प्राप्त हुए पुलिस की गमगीन बेटी। इस तस्वीर के लिए कोई पुरस्कार?”

इम्तियाज हुसैन ने जो तस्वीर ट्वीट की है वह जोहरा की है। वह 5 साल की थी, जब उसके पिता अब्दुल राशिद 2017 में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण मारे गए थे। राशिद जम्मू-कश्मीर पुलिस में सहायक उप-निरीक्षक थे। जोहरा की तस्वीरें उस समय वायरल हो गई थीं, लेकिन उन्हें किसी फोटोग्राफी पुरस्कार के योग्य नहीं माना गया, क्योंकि जैसा कि इम्तियाज हुसैन ने उल्लेख किया कि वो उनके नैरेटिव में फिट नहीं बैठता है।

अपने पिता के मारे जाने पर बिलख-बिलख कर रोती जोहरा

हुसैन द्वारा ट्वीट की गई तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी, लेकिन दुर्भाग्य से लेफ्ट लॉबी से सहानुभूति हासिल करने में विफल रही, जो अभी भी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को सामान्य बनाने और सशस्त्र बलों पर अलग-अलग आरोप लगाने में मशगूल हैं।

बता दें कि जिन तस्वीरों के लिए पुरस्कार दिया है, इसमें एक तस्वीर में पत्थरबाजों को हीरो की तरह पेश किया गया है। एक तस्वीर में पाकिस्तान का झंडा लिए लोग दिख रहे हैं। एक तस्वीर में सुरक्षाबलों को तोड़फोड़ करते दिखाया गया है।

एक तस्वीर में सुरक्षा जाँच करते हुए सुरक्षाकर्मियों को ऐसे दिखाया गया है जैसे जाँच कर वे कोई अपराध कर रहे हों। इन्हीं तस्वीरों में 6 वर्ष की एक कश्मीरी बच्ची को भी दिखाया गया जिसके बारे में लिखा गया कि भारतीय सुरक्षाबलों के जवानों द्वारा इस्तेमाल किए गए पैलेट गन से इस बच्ची की दाईं आँख चोटिल हो गई। एक तस्वीर में कश्मीर में उस प्रदर्शन को दिखाया गया जिसमें अलग कश्मीर के सपने का पोस्टर लोग लहरा रहे हैं।

जम्मू कश्मीर के फोटो जर्नलिस्ट चन्नी आनंद, मुख्तार खान और यासीन डार की इन तस्वीरों के जरिए यही कहानी बताई गई है और यही संदेश दिया गया है कि भारत के सुरक्षाबल कश्मीर में गलत कर रहे हैं। भारत विरोधी ऐसा एजेंडा दुनिया को बहुत पसंद आता है और इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि इन तस्वीरों पर पुलित्जर पुरस्कार भी मिल गया है।

घाटी में मोबाइल इंटरनेट बंद: 24 घंटे में 4 आतंकी ढेर, रियाज नाइकू ने जान बचाने के लिए खोदी जो सुरंग वही कब्र बना

हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर रियाज नाइकू को मारकर सुरक्षाबलों ने दक्षिण कश्मीर में सक्रिय आतंकियों की कमर तोड़ दी है। जाकिर मूसा के मारे जाने के बाद रियाज घाटी में आतंक का बड़ा चेहरा बन गया था। मूसा के मारे जाने के बाद रियाज ने घाटी में मारे गए आतंकियों को गन सैल्यूट की परंपरा शुरू की थी।

जानकारी के मुताबिक रियाज ने अपने घर तक जाने-आने के लिए सुरंग बना रखी थी। इसकी जानकारी बहुत ही गिने-चुने लोगों को थी, क्योंकि वह किसी पर भरोसा नहीं करता था। सेना ने विस्फोटक से वह घर उड़ा दिया और जो सुरंग उसने जान बचाने के लिए खोदी थी, उसी में उसकी कब्र बन गई। रियाज के सुरंग की खोज के लिए इलाके के आसपास खेतों और रेलवे ट्रैक की खुदाई की गई और सुरंग ढूँढी गईं।

ANI के मुताबिक खुफिया विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “रियाज रमजान के महीने में कश्मीर में बड़ी वारदातों को अंजाम देने की फिराक में था। वह गुट में स्थानीय आतंकवादियों को भर्ती करना चाहता था। सुरक्षाबलों के हाथ एक रिकॉर्डिंग लगी, जिसमें एक आतंकवादी यह कहते हुए सुना गया कि नाइकू खुद कोई बड़ा ऑपरेशन करेगा। इससे इलाके में नाइकू की मौजूदगी के बारे में पहली सूचना मिली।”

नाइकू जम्मू-कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन का चेहरा था। बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भट्ट कश्मीर में आतंकी गतिविधियों का प्रमुख था। अब रियाज के मारे जाने के बाद दक्षिण कश्मीर में हिजबुल का करीब-करीब खात्मा हो गया है। यह सूचना मिलने पर कि नाइकू इलाके में छिपा हुआ है, उसके खात्म के लिए सुरक्षाबलों ने मंगलवार (मई 5, 2020) देर रात अपना अभियान शुरू किया।

रियाज के मारे जाने के बाद भी सेना ने उसकी पहचान सुनिश्चित करने में साढ़े पाँच घंटे लगाए, क्योंकि वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। सबसे पहले उसके शरीर के निशानों को देखा गया, फिर पुलिस ने, उसके बाद सीआरपीएफ ने, फिर सेना ने, उसके बाद आईबी ने और अंत में स्थानीय लोगों से उसकी पहचान कराई गई। उसके बाद रियाज के मारे जाने की सूचना सार्वजनिक की गई।

मुठभेड़ में हिजबुल कमांडर के मारे जाने की सूचना घाटी में फैलते ही सोशल साइट पर इसको लेकर दुष्प्रचार शुरू हो गया है। कश्मीर घाटी में सक्रिय शरारती और राष्ट्र विरोधी तत्व इंटरनेट की विभिन्न सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर लोगों को भड़काते हुए उन्हें मुठभेड़ स्थलों पर जमा करने का प्रयास कर रहे हैं। यह देख प्रशासन ने एहतियात के तौर पर घाटी में इंटरनेट मोबाइल सेवा निलंबित कर दी है।

इस दौरान कश्मीर में वॉयस कॉलिंग को भी बंद कर दिया गया है, ताकि घाटी में किसी भी घटना को लेकर किसी भी तरह की अफवाह ना फैलने पाए। इस ऑपरेशन को जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना के सुरक्षाबलों के द्वारा एक साथ चलाया गया। कर्नल अमन आनंद ने जानकारी दी कि पिछले 24 घंटों में 4 आतंकियों को मार गिराया गया है।

दक्षिणी कश्मीर के हिजबुल कमांडर रियाज नायकू ने जनवरी 2018 में पंचायत चुनाव लड़ने वालों पर एसिड हमले करने की धमकी दी थी। धमकी भरा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गई थीं।

वीडियो में उसने कहा था कि चुनाव में हिस्सा में लेने वाले लोगों को गोली से नहीं मारेंगे बल्कि ऐसी सजा देंगे जिससे उन्हें गलती का अहसास हो। चुनाव में वे ही लोग हिस्सा लेते हैं जो घर वालों पर बोझ होते हैं। यदि उन्हें गोली से मार दिया गया तो एसआरओ के तहत नौकरी मिल जाएगी और आर्थिक मदद भी। इस वजह से ऐसी सजा देनी है जिससे वे अपनी गलती का अहसास कर सकें। 

‘वायर’ के वेणु! मस्जिदों से जिहाद, जकात का पैसा काहे नहीं माँगते? मंदिरों के सोने पर क्यों है तेरी कुदृष्टि?

‘द वायर’ के चतुर चम्पू फाउंडिंग एडिटर एमके वेणु ने कल कुछ सारगर्भित ट्वीट रचे। उन्होंने अपने सुभाषित शब्दों के माध्यम से कहा कि हिन्दुओं के मंदिरों ने करीब 25000 टन सोने को जकड़ रखा है जिसका कुल मूल्य 1.4 ट्रिलियन डॉलर है। साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी को लगभग ललकारते हुए सूक्ति रची कि अगर उनमें राजनैतिक इच्छाशक्ति है, तो वो ये सोना निकलवा कर रिजर्व बैंक को दिलवा दें, ताकि वो इसके बदले रुपए प्रिंट कर सके।

वेणु जैसे घाघ नराधमों के साथ समस्या यह है कि इन्हें और इनके लिब्रांडु गिरोह को हमेशा यह लगता रहता है कि हिन्दुओं के मंदिर इनके एकदम असली वाले, निजी बापों की संपत्ति है, जबकि मस्जिदों, वक़्फ़ या ईसाइयों के चर्चों पर तो सिर्फ उन्हीं का अधिकार है जिस मजहब से उनका वास्ता है।

इसलिए, हर आपातकालीन स्थिति में इन्हें घूम-फिर कर मंदिरों पर सवाल करना ही है। क्या वायर के वेणु के दिमागी तार हिले हुए हैं जो उसे सिर्फ मंदिर ही अभी दिख रहा क्योंकि वहाँ सोना है? मजहब विशेष की कमाई का 10% जकात कहाँ है? जब एक मजहब में कमाई का एक हिस्सा सिर्फ दान और मदद के लिए ही है, तो फिर मस्जिदों से वही अपील क्यों नहीं की गई?

यहाँ लोग योगी सरकार को अपने मस्जिद का लाउडस्पीकर देने को तैयार नहीं कि सरकार किसानों की योजनाएँ बता सके, और हिन्दुओं से उनके घर और मंदिर का सोना माँगा जा रहा है!

हर बार, मस्जिद ऐसे समयों पर चर्चा से गायब क्यों कर दिया जाता है? भयंकर बाढ़ में एक मस्जिद जब अपने दरवाजे खोलता है तो बाकायदा उसकी पूरी फोटोग्राफी होती है, और ऐसे दिखाया जाता है कि मानवता अगर बची है तो बस इस्लाम और मस्जिद में, जबकि यही काम भारत का हर मंदिर, हर आश्रम हर दिन करता है।

कभी सुना है कि बनारस में बंग्लादेशी रिक्शेवाले को फलाँ आश्रम के भंडारे में बैठने नहीं दिया गया? ऐसे आश्रमों में बिना जाति, मजहब, रंग-रूप देखे, लाखों को भोजन दिया जाता है। हर दिन लाखों लोगों के दो समय के भोजन का प्रबंध तो ये मंदिर और आश्रम हर जिले में करते ही हैं, साथ ही, कोरोना के समय में अनगिनत छोटे-बड़े मंदिरों ने अपने स्तर से सरकार की आर्थिक मदद की है।

इसके उलट, कितनी बार सुना है कि मस्जिदों में लोगों को भोजन कराया जाता है? कितनी बार चर्चों के बारे में सुना है कि वहाँ हर रोज खाना बँटता है? गुरुद्वारे और मंदिर हर दिन ये काम अपने पैसों से करते हैं जो वहाँ जाने वाले सिख और हिन्दू दानस्वरूप देते हैं। इसके ऊपर एक बात और कि चर्च और मस्जिदों की फंडिंग पर, उन्हें मिलने वाले चंदे पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता।

मस्जिदें या तो वक्फ की संपत्ति मानी जाती हैं, या इलाके के समुदाय विशेष की। उसके उलट, मंदिरों में मिलने वाले दान आदि को कैसे और कहाँ खर्च करना है, इस पर प्रशासन और सरकार निर्णय लेती है। आपको यह जान कर भी आश्चर्य होगा कि, एक तरह से, मंदिरों की आमदनी से मस्जिदों के इमामों की तनख्वाह और मदरसों की छात्रवृत्तियाँ जाती हैं। जब मस्जिदों के पैसे सरकारों को नहीं जाते, तो उनसे जुड़े लोगों का सरकारी वेतन कहाँ से आता है?

मस्जिदों के अंतर्गत चलने वाले मदरसे हों, या चर्चों का मिशनरी स्कूल, उन्हें अल्पसंख्यक होने के नाम पर मजहबी भेदभाव करने की खुली छूट होती है। हम सबने खबरें सुनी हैं कि फलाँ स्कूल में मेंहदी लगाने पर प्रतिबंध है, फलाँ जगह पर तिलक लगाने पर सजा मिली, फलाँ स्कूल में हाथ का कलावा खुलवा दिया गया…

यह भी बात छुपी नहीं है कि सत्तर के दशक से मस्जिदों की फंडिंग मिडिल-ईस्ट के मजहबी देश करते रहे हैं। गरीब से गरीब गाँव में आप मस्जिदों की इमारतें देख लीजिए। इनका सारा जकात अपने लिए, लेकिन हाँ जब आपात स्थिति दिखे तो मंदिरों का सोना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाए।

मंदिर और समाजसेवा

सौभाग्य यह है कि हिन्दुओं के मंदिर वो भी करेंगे। अगर सोना पिघलाने की जरूरत पड़ी तो किसी वेणु के कहने की नौबत नहीं आएगी, लेकिन यहाँ समस्या वेणु जैसे दुरात्माओं से है। हिन्दुओं के मंदिरों की दानपेटी का उद्देश्य ही समाजसेवा है। और हाँ समाजसेवा मतलब समाज की सेवा, न कि जिहाद के नाम पर देह में बम बाँध कर फट जाना। और न ही, समाजसेवा का मतलब है दूसरे मजहब के लोगों को चावल की थैलियों के नाम पर ठग कर कन्वर्ट कराना।

मंदिरों के पैसों पर सरकार और प्रशासन का नियंत्रण होता है और उस पैसों से एक्सक्लूसिवली सिर्फ हिन्दुओं के उत्थान का ही कार्य नहीं होता। ये जो हमेशा बीस करोड़ की धमकी देते हैं कट्टरपंथी नेता, वो अपनी इसी जनसंख्या की ताकत से कभी ये भी कह दें कि बीस करोड़ लोग अगर पाँच-पाँच रुपए भी दे दें, तो सौ करोड़ हो जाएगा। कभी सुना है ऐसा? नहीं, उस बीस करोड़ की याद बस तभी आती है जब इन्हें सौ करोड़ हिन्दुओं को निपटाने के ख्वाब आते हैं।

हिन्दुओं के मंदिरों से जुड़ी कुछ खबरें आपने पढ़ी होंगी, फिर भी एक बार कोविड-19 की इस लड़ाई में उनके योगदान को याद दिलाना आवश्यक है। शिरडी सनातन ट्रस्ट ने 51 करोड़ रुपए दिए, मनसा देवी मंदिर (पंचकुला) ने 10 करोड़ रुपए दिए। पटना महावीर मंदिर, बोधगया, सोमनाथ, अम्बाजी मंदिरों की तरफ से एक-एक करोड़ रुपए का दान किया गया। झंडेवालाँ मंदिर से 30000 लोगों को हर दिन भोजन कराया जा रहा है।

गोरखनाथ मंदिर रोज 200 को भोजन कराता है, 300 अस्पताल बेड्स, 10 वेंटीलेटर की मदद के साथ हज़ारों मास्क व सैनिटाइजर बाँट रहा है। गुजरात भर में फैले 7 स्वामीनारायण मंदिरों ने कुल मिलाकर 1.88 करोड़ रुपए के सहयोग के साथ, 500 बेड का भी इंतजाम किया। काँची ट्रस्ट ने 40 लाख रुपए दिए, वैष्णो देवी ट्र्स्ट के कर्मचारियों ने एक दिन की सैलरी दी और 600 बिस्तरों का आइसोलेशन वार्ड दिया।

देवस्थानम ट्रस्ट कोल्हापुर ने दो करोड़ की राशि से सहायता की। महामाया मंदिर ट्रस्ट ने भी अपने स्तर से छः लाख से ज्यादा का योगदान दिया। मन्नारगुड़ी जीयार स्वामी मठ दो सौ लोगों को हर दिन भोजन उपलब्ध करा रहा है। उसी तरह, रानी सती मंदिर ने दो सौ बेड का आइसोलेशन वार्ड सहयोग हेतु उपलब्ध कराया है। कहीं से खबर आई कि दो पुजारी हैं, और उन्होंने हर दिन अपनी क्षमता के हिसाब से गरीबों के भोजन का जिम्मा उठाया है। वो स्वयं खाना बनाते हैं, बाँटते हैं।

पतंजलि ट्रस्ट ने 25 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की तथा 1500 लोगों की क्षमता वाले आइसोलेशन वार्ड की व्यवस्था की। साथ ही, ये लिबरल गिरोह जिन उद्योगपतियों को कोसते रहते हैं, उन्होंने सैकड़ों करोड़ रुपयों तथा सामग्रियों, सुविधाओं से मदद की है जिनकी बात ये लोग कभी नहीं करते। RSS के लगभग साढ़े तीन लाख स्वयंसेवक 3 करोड़ से ज्यादा लोगों को भोजन और 50 लाख परिवार को राशन बाँट रहे।

‘द वायर’ का संस्थापक संपादक है वेणु जो कि कई करोड़ के बजट से चलता है। इस संस्था ने एक पैसा दान नहीं किया है जबकि इनसे कहीं छोटी संस्था ऑपइंडिया ने एक लाख रुपए अपने स्तर से दिया है। साथ ही, उनके एडिटर्स एवम् अन्य कर्मचारियों ने निजी तौर पर छोटी-छोटी राशि सरकार के सहयोगार्थ दी हैं।

मस्जिदों, चर्चों का क्या है योगदान? थूक, पत्थर और वायरस का प्रसार?

इसके उलट आपने कितनी खबरें पढ़ी हैं जहाँ आपको किसी मस्जिद या चर्च ने मुफ्त भोजन की व्यवस्था की हो? क्या आपने सुना कि मस्जिदों ने सामूहिक तौर पर तय किया कि अगर आवश्यकता पड़े तो इलाके का हर मस्जिद रोगियों के आइसोलेशन वार्ड के रूप में काम में लाया जा सकता है? यहाँ एक मस्जिद ऐसा करेगा, और उसको पूरा गिरोह ऐसे दिखाएगा जैसे भारत ही नहीं दुनिया के हर मस्जिद में वैंटिलेटर लगा कर रोगियों को सँभाला हुआ है, वरना दुनिया तो मिट्टी में मिल जाती।

पूरे कोरोना काल में हमने मस्जिदों के बारे में क्या सुना? एक समय तक, भारत के लगभग तीस प्रतिशत कोरोना मरीज इन्हीं मरकज/मस्जिदों के कारण पाए गए। मस्जिदों में लॉकडाउन के बावजूद लोग पाए गए। मस्जिदों के मुल्लों ने कैमरे पर और माइकों में बोला है कि डॉक्टर तुम्हें ठीक नहीं करेंगे, अल्ला करेगा। प्रशासनिक अधिकारी समझाने गए तो मुल्ला बोल रहा है कि वो तो मस्जिद खुला रखेगा, वो किसी को आने से मना नहीं कर सकता!

मस्जिदों से पत्थरबाजी हुई है, मधुबनी में गोली चली है… ये सब कोरोना के लिए लोगों को खोजने गई टीमों पर हमला हुआ है। तो, मस्जिदों का तो ये योगदान है पूरे कोरोना के युद्ध में। क्या मजहबी नेताओं ने, ख़ास समुदाय को भटकाया नहीं यह कह कर कि कोरोना वाली सुई तुम्हें नपुंसक बना देगी?

कोरोना के इस आपातकाल में तबलीगियों का योगदान भी तो याद रखा जाएगा। उनके थूक, पेशाब और विष्ठा के योगदान को कैसे भूलेगा हिन्दुस्तान! कदाचित् यही कारण है कि अगले ट्वीट में एमके वेणु ये लिखना चाह रहे होंगे कि तबलीगियों के पास विष्ठा और थूक का जो भंडार है, उससे वैक्सीन बनाया जा सकता है। उसकी हलाल पद्धति शायद इस्लामी साइंसदान विकसित कर रहे होंगे फिलिस्तीन में कहीं! वैसे भी, इजरायल वाला या ईसाई देशों वाला वैक्सीन तो कट्टरपंथी मरते दम तक नहीं लेगा।

जिहाद, हलाल और जकात

क्या यह बात किसी से छुपी हुई है कि जिहाद और हलाल इकॉनमी किस स्तर की है? सोना तो वेणु के भी हिसाब से 1.4 ट्रिलियन डॉलर पर खत्म हो जाता है, लेकिन हलाल इकॉनमी अपने आप में दो ट्रिलियन की है, और जिहाद का हम पता नहीं लगा सकते क्योंकि इन लोगों का जकात जिहाद में कितना जाता है, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। जिहाद के अलावा आतंक की फंडिंग में क्या समुदाय विशेष के कुछ लोगों का योगदान नहीं?

बात ये है कि प्राथमिकताएँ हिली हुई हैं। मंदिर भूखों को भोजन कराता है, मस्जिद नमाज की जगह है। मंदिर दान के पैसे सरकार को देता है, मस्जिद नमाज की जगह है। मंदिर आइसोलेशन वार्ड उपलब्ध कराता है, मस्जिद नमाज की जगह है। मंदिर अपने दान की राशि सरकार के नियंत्रण में खर्च करता है, मस्जिद नमाज की जगह है।

वेणु को बैठ कर ये भी शोध करना चाहिए कि वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति कितनी है इस देश में। वो तो फाइनेंसियल एक्सप्रेस का मैनेजिंग एडिटर रह चुका है, उसको पता करना चाहिए कि देवबंदियों की कुल संपत्ति-संसाधन का ब्यौरा कितना है। पता करके तब लिखना चाहिए कि ये पैसा मजहब विशेष वालों को पीएम केयर्स फंड में दे देना चाहिए। उसके अगले दिन ये एमके वेणु अपने घर में बैठ कर पत्थर गिन रहा होगा।

वक़्फ़ के पास हर बड़े शहर की प्राइम लोकेशन पर दसियों एकड़ जमीनें हैं, जकात का अथाह पैसा है। वो सब कहाँ जा रहा है? मस्जिदें जकात के पैसों को समाज की मदद के लिए क्यों नहीं खर्च कर रही? वो क्यों जकात को सीधे प्रधानमंत्री के फंड के लिए नहीं देना चाह रहे? सिर्फ इसलिए कि भारत दारुल-इस्लाम नहीं, दारुल-हर्ब है? काफिर सत्ता में हैं, तो समाज की बेहतरी के लिए मस्जिद जकात का पैसा नहीं देगा, मजहब देखने लगेगा?

लेकिन जो मंदिर वैसे ही भंडारा, लंगर चलाते हैं, जिस पर सरकारों का ही नियंत्रण होता है, वो अब सोना भी निकाल के दे दें? वो तो कहते हैं न कि ताजमहल हमारा है, कुतुबमिनार हमारा है? तो ऐसा करो कि वक्फ की तमाम ऐसी संपत्तियों को बेच कर दे दो पैसा इस लड़ाई के लिए, किसी को बुरा नहीं लगेगा। कोई उद्योगपति खरीद ही लेगा।

बात मंशा की है, सोच की कालिमा की है

वेणु जैसे लोग अधम श्रेणी में गिने जाते हैं। वेणु जैसे लोग सेलेक्टिव बातें करते हैं। स्वयं इनसे कोई देह का मैल माँग ले, तो वो पूछ देंगे कि इससे हिन्दुओं का फायदा तो नहीं हो जाएगा? जवाब हाँ रहने पर, हथेली पर मसल कर, अपना मैल खा जाएँगे। इसलिए जब इनके स्थान-विशेष में समस्या होती है, मीठा-मीठा दर्द उठता है तो इन्हें हिन्दुओं के मंदिर और उसके भीतर का सोना याद आता है।

जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा कि आवश्यकता पड़ी तो सरकार को बोलना नहीं होगा कि मंदिर अपने दान-पात्र खोले, मंदिरों के पुजारी स्वयं ही वो बात बोल देंगे। मौलाना साद और किसी स्वामी जी में फर्क यही है कि मुल्ले साद को लगता है कि कोरोना के समय में मस्जिदों में आने से कोरोना चला जाएगा और इस चक्कर में पूरे देश में कोरोना तबलीगियों के साथ पहुँच जाता है। वहीं, मंदिर के पुजारी गेट बंद कर के घोषणा करते हैं कि रामनवमी और दुर्गा पाठ अपने घरों से कीजिए, इधर बिलकुल मत आइए।

क्योंकि किसी एक को भले लगता हो कि पूरी दुनिया का ज्ञान, इतिहास, वर्तमान और भविष्य एक ही किताब में है, लेकिन बाकी लोग दूसरी किताबें भी पढ़ते हैं, कॉमन सेंस का भी प्रयोग करते हैं, नर्सों के इंजेक्शन में नपुंसकता की दवाई नहीं देखते, सरकार के आदेश को गम्भीरता से लेते हैं।

ऐसे ही पुजारी, ऐसे ही मठाधीश, ऐसे ही साधु-संत स्वयं आएँगे और कहेंगे कि हमारे पास का सोना लीजिए और अर्थव्यवस्था को सही कीजिए। मंदिरों का कोष आदि काल से राजकोष के खाली होने पर वैकल्पिक रूप में उपलब्ध होते थे। उसका काम ही यही है कि जब समाज को इसकी आवश्यकता हो, उसके द्वार खोले जाएँगे। लोगों को अपना लाउडस्पीकर देने पर आपत्ति हो जाती है, लेकिन हिन्दू कभी भी, एक आपात अवस्था में, ऐसे सवाल नहीं करेगा।

लेकिन बात तो मंशा की है। वेणु इरादतन एक खल चरित्र का जीव है। वो ऐसे विचार किसी विशिष्ट उद्देश्य से लाता है। उसका लक्ष्य है नैरेटिव चलाना, प्रपंच बाँटना जहाँ लोग सोचने लगें कि ‘सही बात है, मंदिरों के पास इतना सोना है तो वो तो रखा-रखा बेकार ही हो रहा है’। वेणु के वचन भले ही पुष्पित लगें, लेकिन यह जीव घाघ प्रवृत्ति का और विलक्षण धूर्तता का स्वामी है। इसी कारण से, इसकी बातों को उसी शैली और शब्दों में काटना आवश्यक है।

UP: कोरोना वॉरियर्स पर हमला करने पर 7 साल तक की सजा, ₹5 लाख तक जुर्माना

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में बुधवार को हुई बैठक में ‘उत्तर प्रदेश लोकस्वास्थ्य एवं महामारी रोग नियंत्रण अध्यादेश 2020’ कैबिनेट से पास हो गया है। इसके मुताबिक स्वास्थ्यकर्मियों, सभी पैरा मेडिकल कर्मियों, पुलिस कर्मियों और सफाईकर्मियों के साथ ही शासन की तरफ़ से तैनात किसी भी कोरोना योद्धा से की गई अभद्रता या हमले पर 6 माह से लेकर 7 साल तक की सजा होगी। 50 हजार से 5 लाख रुपए तक जुर्माना भी देना पड़ेगा।

इस कानून के तहत उन लोगों पर भी कार्रवाई होगी जो कोरोना के समय में चिकित्सकों, सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों पर थूकते हैं और अपनी हरकतों से प्रशासन की नाक में दम कर देते हैं। इस कानून के तहत कोरोना वारियर्स के खिलाफ समूह को उकसाने या भड़काने पर भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसा करते पकड़े जाए जाने पर 2 वर्ष से 5 वर्ष तक की सजा का और 50 हजार से 2 लाख तक का जुर्माने का प्रवधान है।

बता दें आज बुधवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई बैठक में कोरोना वारियर्स के लिए इस अध्यादेश को मंजूरी मिली। उत्‍तर प्रदेश महामारी कानून 2005 के अंतर्गत लाए गए इस अध्‍यादेश को उत्तर प्रदेश महामारी रोग नियंत्रण अध्यादेश 2020 का नाम दिया गया। इसके साथ ही राज्य और जिला स्तर पर महामारी नियंत्रण प्राधिकरण गठित करने का निर्णय लिया गया है। जहाँ राज्य स्तर पर मुख्य सचिव और जिले में जिलाधिकारी प्राधिकरण के अध्यक्ष होंगे।

नए अध्यादेश के अनुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य महामारी नियंत्रण प्राधिकरण बनेगा, जिसमें मुख्य सचिव सहित 7 अन्य अधिकारी सदस्य होंगे। दूसरा 3 सदस्यीय जिला महामारी नियंत्रण प्राधिकरण होगा, जिसका अध्यक्ष डीएम होगा। राज्य प्राधिकरण महामारी के रोकथाम नियंत्रण से संबंधित मामलों में सरकार को परामर्श देगा, जबकि जिला प्राधिकरण जिले में विभिन्न विभागों के क्रियाकलापों के साथ समन्वय स्थापित करेगा।

कोरोना महामारी को देखते हुए क्वारंटाइन का उल्लंघन करने पर या अस्पताल से भागने पर 1-3 साल की सजा और जुर्माना 10 हजार से 1 लाख तक का होगा। ऐसे ही अस्पतालों और क्वारंटाइन सेंटर्स में अश्लील एवं अभद्र आचरण करने पर 1 से 3 साल की सजा और 50 हजार से 1 लाख तक का जुर्माना होगा। बता दें कि इस कानून में लॉकडाउन तोड़ने और इस बीमारी को फैलाने वालों के लिए भी कठोर सजा का प्रावधान है।

खबरों के अनुसार, अगर कोई भी व्यक्ति कोरोना से संक्रमित होने के बावजूद अपनी जानकारी छिपाएगा तो उसपर भी कार्रवाई होगी। इसके लिए 50 हजार से लेकर 1 लाख तक का जुर्माना लगेगा। वहीं अगर मरीज जान-बूझकर सार्वजनिक परिवहन से यात्रा आदि करता है तो उसके लिए 1 से 3 साल की सजा और 50 हजार से 2 लाख कर जुर्माना देना पड़ सकता है।

बता दें, बीते दिनों कोरोना वॉरियर्स पर लगातार जानलेवा हमले होते देखा सीएम योगी ने कहा था कोरोना महामारी के खिलाफ जारी जंग में एक तरफ स्‍वास्‍थ्‍यकर्मी, सुरक्षाबल, अन्‍य सरकारी कर्मचारी और विभिन्‍न संगठनों के कर्मी लगातार प्रयासरत हैं। वहीं, दूसरी तरह, कुछ लोग कोरोना वाहक बनकर मेडिकल स्‍टाफ और सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर रहे हैं।

मुख्‍यमंत्री योगी ने इन घटनाओं को गंभीर अपराध बताते हुए कहा था कि इसे बर्दाश्‍त नहीं किया जाएगा। इसे रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने महामारी अधिनियम-1897 में प्रमुख संशोधन करने का निर्णय लिया है।