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श्रमिक ट्रेनों के टिकट के पैसे कौन दे रहा? क्या सच में प्रवासी मजदूरों से वसूला जा रहा किराया?

कोरोना वायरस के कहर के बीच अलग-अलग राज्यों में फँसे प्रवासी मजदूरों के घर लौटने को लेकर बीते दिनों बहुत बवाल हुआ। देश में कई जगह प्रदर्शन किए गए कि केंद्र सरकार इन मजदूरों को उनके घर भेजने के लिए बस-ट्रेन का इंतजाम करे। हालाँकि लॉकडाउन के पहले चरण में कोरोना के हालात परखते हुए उन्हें सरकार ने रोके रखा। लेकिन तीसरा चरण शुरू होते ही सरकार ने इन मजदूरों को घर भेजने का इंतजाम किया और श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाई। लेकिन विरोधियों ने इस पर भी सवाल खड़े किए और पूछा कि इस ट्रेन के लिए टिकट के पैसे कौन देगा?

कॉन्ग्रेस जैसी कुछ पार्टियों ने ये भ्रम भी फैलाया कि बेरोजगार और लॉकडाउन में फँसे मजदूरों से केंद्र सरकार रेल टिकट के लिए पैसे वसूल कर रही है। मीडिया गिरोह ने बिना सच्चाई जाने धड़ल्ले से इसे फैलाया। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ये ऐलान कर दिया कि अगर सरकार श्रमिकों के टिकट के पैसे नहीं देना चाहती, तो वे उनके लिए भाड़े का पैसा देंगीं।

ऐसे में उन तथ्यों पर बात करने की जरूरत है जिन्हें लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं और जिनसे विवाद बढ़ा है।

रेलवे ने यात्रियों से भुगतान करने को क्यों कहा?

श्रमिक ट्रेन विशेष आग्रह पर शुरू की गई स्पेशल ट्रेन है। इन्हें प्रवासी मजदूरों को उनके घरों/ राज्यों तक भेजने के लिए स्टार्ट किया गया है। इन ट्रेनों को केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की माँग और मजदूरों के प्रदर्शन को देखकर चालू करवाने का फैसला किया है। इन ट्रेनों की यही खासियत है कोरोना के समय में चालू की गई ये ट्रेनें सार्वजनिक रूप से सबको सेवा देने के लिए नहीं है। ये राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वे अपने राज्य में पंजीकृत मजदूरों को चिह्नित करें, उनकी स्क्रीनिंग कर उन्हें ट्रेन से गृहराज्य भेजें।

सबसे जरूरी बात। इस ट्रेन में सफर करने वालें यात्रियों को अपनी ओर से कोई टिकट नहीं खरीदनी है। इसका जिम्मा सिर्फ़ राज्य सरकार पर है कि वे आपस में कॉर्डिनेट करें और टिकट के पैसों का भुगतान करें। अब चूँकि, ये ट्रेन रेगुलर नहीं है और इन्हें केवल राज्य सरकार के आग्रह पर शुरू किया गया है। इसलिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि मजदूर उन ट्रेनों के लिए टिकट खरीदें। राज्य सरकारें भारतीय रेलवे द्वारा शुल्क के रूप में भुगतान करके ट्रेनों की बुकिंग करेंगी, और यात्रियों को कुछ भी नहीं देना होगा।

केंद्र सरकार इस ट्रेन को चलाने के लिए प्रति यात्री 85% लागत का भुगतान कर रही है और लागत का 15% राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाना है। इसलिए अगर राज्य प्रवासी श्रमिकों को चार्ज करने का फैसला करता है, तो इसके लिए जिम्मेदार राज्य सरकार है, न कि केंद्र सरकार। केंद्र सरकार खुद यात्रियों से टिकट नहीं ले रही है और न ही उन्हें टिकट बेच रही है।

क्या ऐसे राज्य हैं जो श्रमिकों से टिकट का भुगतान करवा रहे हैं?

कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जिन राज्यों ने श्रमिक ट्रेन के लिए यात्रियों को चार्ज किया, उनमें महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान थे। इनमें महाराष्ट्र में शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी की सरकार है। केरल में कम्युनिस्टों की है। राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है।

रेलवे ने श्रमिक ट्रेनों को फ्री क्यों नहीं किया?

15% चार्ज जो राज्य सरकार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार भी इस मामले पर गौर करें। अगर, यात्रा को रेलवे और केंद्र सरकार मुफ्त करवा देंगे तो प्रवासी मजदूरों के अलावा कई ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी जो एक राज्य से दूसरे राज्य में सफर करना चाहते हैं। बीते दिनों हमने ऐसे नजारे महाराष्ट्र में बांद्रा के एक मस्जिद के पास और दिल्ली में आनंद विहार में देखे। अगर 15 प्रतिशत से राज्य सरकार की भागीदारी श्रमिकों को भेजने में रहती है, तो वे इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रवासी मजदूरों की स्क्रीनिंग के बाद उनकी लिस्ट के साथ सामने आएँगे। ताकि उन्हें टिकट मिल सके।

85% भुगतान केंद्र कर रहा वहन

आम ट्रेनों की टिकट को यदि कोई देखता है, तो उसे मालूम चलेगा कि उसमें ये साफ लिखा होता है कि उसे चार्ज की गई राशि यात्रा के लिए खर्च की गई लागत का केवल 57% है। मगर, श्रमिक ट्रेनों के लिए, यात्रा के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए केवल 2/3rd सीटें भरी जाएँगी। यानी दाई और बाई ओर की सीटें भरी जाएँगी, लेकिन बीच की सीट खाली रहेगी। इसी प्रकार टॉप और बॉटम बर्थ भी यात्रियों को दिए जाएँगे। मगर मिडिल बर्थ खाली रखा जाएगा। इनके कारण इनका शुल्क घटकर 38% हो जाएगा। ये विशेष ट्रेनें हैं और पूरी तरह से खाली होकर वापस होंगी, इसलिए यात्री की लागत को आधे से विभाजित किया गया है, जो कि 19% होगी। मगर बावजूद इसके भोजन और स्वच्छता जैसी यात्री सेवाओं को ध्यान में रखने के बाद, राज्य सरकारों को कुल लागत का 15% भुगतान करने के लिए कहा गया था, शेष 85% केंद्र सरकार द्वारा वहन किया गया था।

रेलवे ने PM CARES में पैसा क्यों दिया, इसे सब्सिडी पर खर्च क्यों नहीं किया?

बता दें इस दावे को लेकर राहुल गाँधी ने सर्वप्रथम ट्वीट किया और जानबूझकर भ्रम फैलाया। उन्होंने अपने ट्वीट से ऐसे दर्शाया कि पीएम केयर फंड में तो रेलवे ने 151 करोड़ रुपए दान दे दिए थे। मगर जब बात प्रवासी मजदूरों की आई तो वे उनके भुगतान करने के लिए कह रहा है। जबकि सच ये है कि रेलवे द्वारा पीएम राहत कोष में दिया गया फंड उनपर भार नहीं था, जो कहीं भी कैसे भी खर्च किया जाए। इसके अलावा पीएम फंड के लिए रेलवे के कर्मचारियों ने अपनी सैलरी का कुछ हिस्सा दान किया था।

हवाई यात्रा के लिए भुगतान करने को नहीं कहा गया था?

बिलकुल गलत। ऐसा नहीं है कि उनसे भुगतान करने को नहीं कहा गया। उन्हें कहा गया था और जहाँ उन्हें भुगतान करने के लिए नहीं कहा गया, वहाँ सरकार एयर इंडिया या भारतीय वायु सेना के बिल का भुगतान करेंगे। हालाँकि, इस बीच कुछ विमान एयरलिफ्ट की तरह थे, जिनसे वुहान जैसी जगहों से लोगों को आपातकाल में निकाला गया। ।

सोनिया गाँधी अपने कहे अनुसार भुगतान करती हैं, तो उन्हें कितनी राशि रेलवे को देनी होगी?

सरकार श्रमिकों के लिए 34 ट्रेनें चालू करने जा रही है। इसलिए इन ट्रेनों को ऑपरेट करने में 24 करोड़ का खर्चा आएगा। यानी हर राज्य को 3.5 करोड़ रुपए देने होंगे। अगर हम मानते हैं कि रेलवे 100 ट्रेन प्रवासी मजदूरों के लिए चलाएगी तो सोनिया गाँधी को 706 करोड़ रुपए देने होंगे। इस राशि का भुगतान सीडब्ल्यूसी और सोनिया गांधी के निजी खजाने से किया जाएगा, न कि राज्य के सरकारी खजाने से। 

इसलिए यहाँ स्पष्ट होता है कि श्रमिक ट्रेनों को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है वो केवल राजनीति से प्रेरित है। कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियाँ केवल इस स्थिति को और भयावह बनाना चाहती है, ताकि वे गरीब मजदूरों की भावनाओं से खेलकर अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंक सकें।

मास्क पहनने बोला तो सलीम बौखलाया: गैंग के साथ दो सिखों पर चाकू, तलवार, डंडे से मुंबई में जानलेवा हमला

मुंबई के चेम्बूर में फेस मास्क को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि दो व्यक्तियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। कीर्तिसिंह राणा और उनके भाई इन्दर सिंह अपने घर की ओर जा रहे थे, तभी 5 लोगों ने उन्हें टोका और उनके साथ मारपीट की। उन पर चाकू, तलवार और बाँस के डंडों से हमला बोल दिया गया। गंभीर रूप से घायल हुए दोनों भाइयों को अस्पताल ले जाया गया। पुलिस ने एक आरोपित 38 वर्षीय सलीम सिद्दीकी को गिरफ़्तार किया है।

ये घटना तिलक नगर थाना क्षेत्र की है। नागेवड़ी के लोखंडे रोड में दोनों भाइयों पर रविवार (अप्रैल 3, 2020) की रात सवा 8 बजे हमला किया गया। वहाँ के एक पब्लिक टॉयलेट में जब ये विवाद हुआ, तब कई लोग वहाँ मौजूद थे, जिन्होंने दोनों घायलों को अस्पताल पहुँचाया। ये विवाद मास्क पहनने को लेकर हुआ, जिसने बाद में तूल पकड़ लिया। उन दोनों की हत्या का प्रयास किया गया। 4 आरोपित अभी भी फरार हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है।

दोनों घायलों का घाटकोपर स्थित राजावाड़ी हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने बताया है कि इंदरसिंह की हालत ज्यादा गंभीर है। उन्हें सिर और पीठ पर गहरी चोटें आई हैं। पीड़ित कीर्तिसिंह के बयान के आधार पर पुलिस ने इंडियन पैनल कोड के तहत हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया। पुलिस ने पाया है कि रविवार की सुबह आरोपितों के साथ दोनों भाइयों की कहासुनी हो गई थी, जो शाम को मारपीट में बदल गया। नीचे ट्वीट में आप घायल को देख सकते हैं (चेतावनी: ये वीडियो खौफनाक है):

सलीम अपने साथियों के साथ बिना फेस मास्क के खुला घूम रहा था। कोरोना वायरस संक्रमण के बीच सरकार ने फेस मास्क को अनिवार्य कर दिया है। पीड़ित दोनों भाइयों ने उन लोगों को मास्क पहनने को कहा, इससे सलीम और उसके दोस्त नाराज़ हो गए। शाम को उन्होंने दोनों भाइयों पर हमला बोल दिया। दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमिटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने घायल का वीडियो शेयर कर सिखों पर हुए हमले की निंदा की है।

महबूबा के डिटेंशन पर अब्दुल्ला व इल्तिजा परेशान, किया ट्वीट पर ट्वीट: हंदवाड़ा बलिदानियों पर चुप्पी

जम्मू-कश्मीर में पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती समेत 3 नेताओं की सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत डिटेंशन अवधि 3 महीने बढ़ने के बाद मुफ्ती की बेटी इल्तिजा मुफ्ती तथा एक और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह खासे परेशान दिखे। दोनों ने खुलकर सरकार के इस फैसले का सोशल मीडिया पर विरोध किया। हालाँकि, इस पहले कश्मीर के हंदवाड़ा में दो आतंकी हमले भी हुए लेकिन दोनों नेताओं ने इस पर चुप्पी साधे रखी और जिस सक्रियता से पूर्व मुख्यमंत्री के लिए संवेदना व्यक्त की, उस सक्रियता से वीरगति प्राप्त हुए जवानों को श्रद्धांजलि देना भूल गए। उमर अब्दुल्ला ने तो इस संबंध में 3 मई को एक ट्वीट किया भी, लेकिन महबूबा मुफ्ती के ट्विटर अकॉउंट, जिसे उनकी बेटी इल्तिजा चलाती हैं, वो बिलकुल शांत रहा।

हंदवाड़ा में आतंकियों ने 3 मई (रविवार) को पहला हमला किया। उस दिन देश के 5 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। मगर, महबूबा के ट्विटर अकाउंट से उनकी बेटी इल्तिजा भारत में समुदाय विशेषपर हो रहे कथित अत्याचार पर यूएई का एक बयान शेयर करती रहीं। इसके अलावा उन्होंने लॉकडाउन के बीच कश्मीर में इंटरनेट की माँग और एक शव को स्ट्रेचर पर ले जाते बेबस परिवार का वीडियो शेयर किया। उन्होंने शाम तक लद्दाख बीजेपी अध्यक्ष के इस्तीफे की खबर पर भी अपनी टिप्पणी की। पर हंदवाड़ा पर बिलकुल चुप रहीं।

दूसरी ओर, उमर अब्दुल्ला ने मुफ्ती के डिटेंशन अवधि 3 महीने बढ़ने की खबर सुनने के बाद लगातार 3 ट्वीट किए। जिसमें उन्होंने इस फैसलों को क्रूर बताया और नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर को दशकों पीछे कर दिया है। मगर, उन्होंने भी इस बीच हंदवाड़ा घटना में आतंकवाद के ऊपर कुछ टिप्पणी करना जरूरी नहीं समझा।

हाँ, उमर अब्दुल्ला ने 3 मई को एक ट्वीट करके बलिदान हुए जवानों के घरवालों को सांत्वना जरूर दी। लेकिन आतंकियों और आतंकवाद पर उनकी शांति लोगों को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा देती रही। बता दें कि 3 मई से लेकर अब तक उमर अब्दुल्लाह लॉकडाउन, लॉकडाउन में शराब बिक्री, पीएम केयर फंड पर सवाल, महबूबा मुफ्ती से जुड़े कुछ ट्वीट कर चुके हैं। लेकिन किसी में भी कश्मीर में पसरे आंतकवाद पर कोई बात नहीं की है।

गौरतलब है कि हंदवाड़ा में बीते दिनों 48 घंटों में 2 बार हमले हुए थे। पहला हमला रविवार 3 मई को हुआ था। जिसमें कर्नल-मेजर समेत 5 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे और 2 आतंकी मार गिराए गए थे। इसके बाद सोमवार को फिर हमला हुआ था। इसमें सीआरपीएफ के 3 जवान बलिदान हो गए थे जबकि 1 आतंकी मार गिराया गया था। दूसरा हमला सोमवार को उस समय हुआ था जब 4 मई की शाम काजियाबाद में सीआरपीएफ जवान पट्रोलिंग ड्यूटी पर जा रहे थे, तभी उन पर आतंकियों ने फायरिंग की थी।

मजदूरों को मुफ्त ट्रेन नहीं… सांसदों का चुपके से बढ़ा दिया भत्ता, अब मिलेगा ₹49000/महीना: योगेन्द्र यादव के झूठ का Fact Check

योगेंद्र यादव ने दावा किया है कि सरकार ने ‘चुपचाप’ सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र भत्ते (Salary Allowance) में बढ़ोतरी कर दी है। ‘स्वराज इंडिया’ के संस्थापक ने आदेश की प्रति शेयर करते हुए ऐसा दावा किया। उन्होंने लिखा कि जब सरकार को मजदूरों के लिए मुफ्त में ट्रेनें चलानी चाहिए थी, उसने ‘चुपके से’ सांसदों को मिलने वाले निर्वाचन क्षेत्र भत्ते को बढ़ा कर 49,000 रुपए कर दिया है। ये आदेश अप्रैल 7, 2020 को आया।

हालाँकि, इस दौरान योगेंद्र यादव ये बताना भूल गए कि सांसदों के भत्ते को कितने रुपए से बढ़ा कर 49,000 रुपए किया गया है। अगर वो ये बात बता देते तो उनकी पोल खुल जाती। इसीलिए, उन्होंने आदेश की एक कॉपी शेयर कर दी और लोगों को भ्रम की स्थिति में डालने के उद्देश्य से झूठ फैलाया। योगेंद्र यादव इससे पहले भी सीएए और एनआरसी को लेकर ऐसी हरकतें कर चुके हैं। अजीबोगरीब पोल प्रेडिक्शन तो उनका पेशा ही है, जो सच ही नहीं होता।

अब आते है सच्चाई पर। दरअसल, सांसदों को पहले निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (Salary Allowance) के रूप में 70,000 रुपए मिलते थे, जिसमें 30% की कटौती की गई। कटौती के बाद उनका भत्ता 21,000 रुपए कम हो गया और अब ये 49,000 रुपए प्रति महीने आएगा। संसद की जॉइंट कमिटी ने ये सिफारिश की थी, जिसे राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने स्वीकार कर लिया था।

इस आदेश को ‘Members of Parliament (Constituency Allowance) Amendment Rules, 2020’ नाम दिया गया है। अब आते हैं इससे पहले के भी एक फ़ैसले पर। कंस्टिटूएंसी अलाउंस से पहले MPLADS फण्ड (सांसद निधि) को भी सस्पेंड कर दिया गया था। अगले दो साल तक ये सस्पेंड रहेगा। यानी 2020-21 और 2021-22 में सांसदों को सांसद निधि की रकम नहीं दी जाएगी। ये रकम कोविड-19 से लड़ने में ख़र्च होगी। कई लोगों द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बावजूद योगेंद्र यादव ने अपना ट्वीट डिलीट नहीं किया।

इससे सरकार के पास 7900 करोड़ रुपए बचेंगे, जिसे कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया में डाला जाएगा। ये रकम कोरोना आपदा के बीच जनता की भलाई के लिए ख़र्च होगी। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सभी राज्यों के राज्यपालों से स्वेच्छा से ‘पे कट’ का फ़ैसला लिया और इसे सामाजिक दायित्व बताया। एक ख़बर के अनुसार, सरकार हर महीने एक सांसद पर औसतन 2.7 लाख रुपए ख़र्च करती है। संसद में फिलहाल कुल 795 सदस्य हैं, जिनमें से 545 लोकसभा में हैं और 250 राज्यसभा में।

फ़रवरी 2020 में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ एक इवेंट में मंच साझा करते हुए मंच से ही योगेंद्र यादव ने यह कह सनसनी फैला दी थी कि, “भारत हिंदी, हिन्दू , हिन्दुस्तान से नहीं बनेगा, हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान देश को तोड़ देगा… आज यह करने की कोशिश हो रही है।” राम मंदिर पर फ़ैसले को लेकर उन्होंने कहा था कि राम मंदिर कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ भारत में सेक्युलर पॉलिटिक्स की परीक्षा होगा। 

बॉयज लॉकर रूम: 17 साल के छात्र ने 11वीं मंजिल से कूद की आत्महत्या, पुलिस पता लगा रही ‘कनेक्शन’

गुरुग्राम की DLF फेज 5 के कार्ल्ट्न एस्टेट (DLF Carlton Estate) सोसायटी में 17 साल के एक नाबालिग ने 11वीं मंजिल से कूदकर कल आत्महत्या कर ली। ये मामला सेक्टर 53 थाना क्षेत्र का है। मृतक शहर के नामी स्कूल में 12वीं कक्षा का छात्र था। पुलिस संदिग्ध परिस्थितियों को देखते हुए इस मामले में जाँच कर रही है। पुलिस इस बात का भी पता लगा रही है कि कहीं बच्चे का कनेक्शन बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) नाम के इंस्टाग्राम ग्रुप से तो नहीं था, जिसका अभी हाल में खुलासा हुआ।

जानकारी के मुताबिक दिल्ली की साइबर सेल इस मामले की पड़ताल में लड़के का फोन जब्त कर लिया है और उसे फॉरेंसिक जाँच के लिए लैब भी भेज दिया है। साइबर सेल लड़के के सभी सोशल मीडिया अकॉउंट की भी छानबीन कर रही है।

बताया जा रहा है कि लड़के ने आत्महत्या करने से पहले कोई सुसाइड नोट भी नहीं छोड़ा और लड़के के माता-पिता ने भी कहा कि इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। मगर, फिर भी मामले की सच्चाई जानने के लिए पुलिस हर एंगल से जाँच कर रही है। फिलहाल पुलिस ने प्राथमिक कार्रवाई के बाद लड़के के शव को परिजनों को भी सौंप दिया है।

गौरतलब है कि कल दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने इंस्टाग्राम ग्रुप बॉयज लॉकर रूम (Boys Locker Room/Bois Locker Room) पर अश्लील चैट करने के मामले में 15 साल के नाबालिग लड़के को पकड़ा था। नाबालिग के अलावा इस ग्रुप केस में 20 लड़कों के और शामिल होने का मालूम चला था। पुलिस ने पहले सोशल मीडिया पर रजिस्टर फोन नंबर से लड़के के घर का पता लगाया था। फिर उसे उसके घर जाकर पकड़ा था। इस पूरे मामले में पुलिस को साउथ दिल्ली के चार स्कूल और नोएडा के एक स्कूल के बारे में पता लगा था।

बता दें अभी हाल ही में इस ग्रुप का खुलासा एक लड़की की मदद से हाल में हुआ था, जिसने सोशल मीडिया पर इस ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट्स को शेयर करते हुए लिखा, “दक्षिण दिल्ली के 17-18 साल की उम्र के लड़कों का एक ग्रुप है, जिसका नाम ‘ब्वॉयज लॉकर रूम’ (Boys Locker Room/Bois Locker Room) है, जहाँ कम उम्र की लड़कियों की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर आपत्तिजनक बनाया जा रहा था। मेरे स्कूल के दो लड़के इसका हिस्सा हैं।” लड़की ने इस दौरान जिन तस्वीरों को शेयर किया था, उन पर लिखे कमेंट देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि ग्रुप के सदस्य गैंगरेप की योजना बना रहे थे और उस पर चर्चा कर रहे थे।

महिला स्वाथ्यकर्मियों पर हमले, जमातियों को ढूँढ़ रहे आदिवासी और ईसाई: ओडिशा में पुलिस अलर्ट

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के नाला रोड में सोमवार (अप्रैल 4, 2020) को स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। वहाँ कोरोना पॉजिटिव के कांटेक्ट में आए लोगों को लेने जैसे ही स्वास्थ्य विभाग की गाड़ी पहुँची, पत्थरबाजी शुरू हो गई।

नाला रोड में एक 29 वर्षीय महिला को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। उसे राउरकेला स्थित हाइटेक कोविड हॉस्पिटल में भर्ती करने के बाद स्वास्थ्यकर्मी उसके सम्पर्क में आने वालों को क्वारंटाइन करने के लिए पहुँचे थे।

टीम के पहुँचते ही स्थानीय लोगों ने एंट्री और एग्जिट गेट बंद कर पत्थरबाजी शुरू कर दी। इसके बाद पुलिस को एरिया के प्रबुद्धजनों के साथ बैठक करनी पड़ी, तब जाकर मामला शांत हुआ। कहा जा रहा है कि नाला रोड दूसरे समुदाय के प्रभाव वाला इलाक़ा है। इससे पहले इंदौर और भोपाल सहित कई स्थानों से पुलिस और स्वाथ्यकर्मियों पर हमले की ख़बर आ चुकी है। अधिकतर समुदाय विशेष के प्रभाव वाले इलाक़ों में ऐसा हुआ।

केंद्र सरकार द्वारा कड़े नियम बनाए जाने के बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। राउरकेला के कन्टेनमेंट एरिया में 50 आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को ब्लड सैम्पल इकठ्ठा करने के लिए लगाया गया था। उन्होंने म्युनिसिपल कमिश्नर के सामने धरना दिया है। उनकी माँग है कि उन्हें उचित सुरक्षा-व्यवस्था मुहैया कराया जाए। सैम्पल कलेक्शन के दौरान उन पर थूक फेंके जा रहे हैं और केरोसिन डाल कर जलाने की कोशिश भी हो रही है।

जब पुलिस और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने उन्हें आश्वासन दिया कि उन्हें उचित सुरक्षा-व्यवस्था दी जाएगी, तब जाकर उन्होंने अपना धरना ख़त्म किया। सैम्पल कलेक्शन के दौरान इन महिला स्वास्थ्यकर्मियों के साथ गाली-गलौज करने और भद्दी भाषा का प्रयोग करने की भी ख़बर है। ओडिशा सरकार के प्रधान सचिव ने सभी जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखे पत्र में अंदेशा जताया है कि महिला स्वास्थ्यकर्मी हमलों, गालियों और दुर्व्यवहार का शिकार हो सकती हैं।

उन्होंने आशंका जताई है कि अगर ऐसी स्थिति आती है तो राज्य में बड़े स्तर पर धरना-प्रदर्शन चालू हो जाएगा, जिससे क़ानून-व्यवस्था की समस्याएँ उपज सकती हैं। ओडिशा सरकार ने सभी जिलों की पुलिस को इस आलोक में अलर्ट रहने की सलाह दी है। ऐसी घटनाओं को लेकर सूचना इकट्ठी की जा रही है। अधिकारियों से कहा गया है कि वो सतर्क रहें, ताकि आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर हमले रोके जा सकें, जिससे वो नाराज़ न हों।

प्रधान सचिव ने सभी जिलों की पुलिस को लिखा पत्र

दरअसल, राउरकेला के आशियाँ कॉलनी में मजहब विशेष के दो लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। प्रधान सच्ची ने कहा है कि इसके बाद से ही सुदूर आदिवासियों, ईसाइयों और मजहब वालों की बहुलता और प्रभाव वाले इलाक़ों में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया है। ट्राइबल समुदायों के बीच ये बात फ़ैल गई है कि लोग अपनी ट्रैवल हिस्ट्री छिपा रहे हैं और मरकज़ के दौरे को लेकर सरकार को सही जानकारी नहीं दे रहे।

अप्रैल 13, 2020 की रात ईसाई और आदिवासी समुदाय के लोग मशाल और टॉर्च लेकर निकले थे, ताकि गाँव में छिपे लोगों को ढूँढ़ा जा सके। उनका कहना था कि दिल्ली स्थित निजामुद्दीन के मरकज से आए तबलीगी जमात के लोग गाँव में छिपे हुए हैं, जिससे कोरोना फैलने का डर है। प्रधान सचिव का कहना है कि उन इलाक़ों में मजहब विशेष के लोगों के भीतर डर बैठ गया है, इसलिए उन्होंने पुलिस गश्ती बढ़ाने की माँग की है।

ओडिशा सरकार की ओर से पुलिस को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि ईसाई और हिन्दू समुदाय दूसरे खास मजहब का पूर्ण बहिष्कार कर रहे हैं। वे न तो उनसे कुछ ख़रीद रहे हैं और न ही उन्हें कुछ बेच रहे हैं। ये बात भी फैली हुई है कि कुछ लोग सब्जियों और फलों पर जान-बूझकर थूक रहे हैं और फिर बेच रहे हैं। उनके बीच ये बात भी फ़ैल गई है कि गाँव के कुओं और लोगों के घर के सामने भी लोग थूक कर भाग जा रहे हैं।

मजहब विशेष के बहिष्कार पर उतरे आदिवासी और ईसाई

ये घटनाएँ राउरकेला और सुंदरगढ़ के इलाक़ों में हो रही है। कहा गया है कि स्थानीय पुलिस इन गतिविधियों से वाकिफ है और इलाक़े में पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ा दी गई है। इस पत्र में कहा गया है कि ख़ास मजहब वालों के मन में ये डर बैठ गया है कि कोरोना के प्रसार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और इसलिए क़ानून-व्यवस्था मुस्तैद रखने के लिए पुलिस को सतर्क रहना होगा।

महान मुगलों का सच्चा इतिहास, जो हिन्दुओं ने बदल दिया: अजीत भारती का वीडियो । Ajeet Bharti satire on Mughals

आज हम बात करेंगे कि मुगलों पर हिंदुओं ने किस-किस तरह के अत्याचार किए। जैसे कि आपको शायद ही पता हो कि रामचरितमानस के असली लेखक कौन हैं। गंगा का बाबर से क्या कनेक्शन है? या फिर गाय भारत में कैसे आई? जानिए महान मुग़लों के बारे में।

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बसंतर की लड़ाई: 1971 की जंग के नायक परमवीर चक्र विजेता मेजर होशियार सिंह दहिया की वीरता की कहानी

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना के 4 जाबाँज सैनिकों को सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया। जिनमें थे अल्बर्ट एक्का (Albert Ekka), निर्मल जीत सिंह सेखों (Nirmal Jit Singh Sekhon), पूना हॉर्स के सेकेण्ड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (Arun Khetarpal), जिन्होंने अपने प्राण गँवा कर सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता का सम्मान प्राप्त किया, और चौथे थे मेजर होशियार सिंह दहिया (Hoshiar Singh Dahiya)

1971 की भारत-पाकिस्तान की जंग भारतीय सैनिकों की वीरता और पराक्रम का एक शानदार उदाहरण है। इस जंग से जुड़े जवानों के बहादुरी के कई किस्से हैं। मेजर होशियार सिंह की वीरता की कहानी इन्हीं में से एक है। बसंतर की लड़ाई में घायल होने के बाद भी उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया और पाकिस्तानी सेना को वापस भागने पर मजबूर कर दिया था।

बसंतर की लड़ाई

भारत-पाकिस्तान युद्ध सन 1971 के दौरान 15 दिसम्बर को गोलन्दाज फौज की तीसरी बटालियन, जिसका नेतृत्व मेजर होशियार सिंह दहिया कर रहे थे, को आदेश दिया गया कि वह शकरगढ़ सेक्टर में बसन्तार नदी के पार अपनी पोजीशन जमा लें। वह पाकिस्तान का अति सुरक्षित सैनिक ठिकाना था और उसमें पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या भी अधिक थी। यानी, दुश्मन यहाँ अधिक मजबूत स्थिति में था।

फिर भी आदेश मिलते ही मेजर होशियार सिंह की बटालियन दुश्मनों की सेना पर टूट पड़ी। लेकिन मीडियम मशीनगन की ताबड़तोड़ गोलीबारी और क्रॉस फायरिंग के कारण इनकी बटालियन बीच में ही फँस गई। फिर भी मेजर होशियार सिंह दहिया विचलित नहीं हुए। उन्होंने बटालियन का नेतृत्व किया और संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते ही गए। आख़िरकार उन्होंने उस स्थान पर कब्जा कर लिया, जिसके लिए उन्हें आदेश मिला था।

लेकिन दूसरे ही दिन, यानी 16 दिसम्बर को अधिक संख्या में पाकिस्तानी सैनिक आ धमके और लगातार तीन भीषण आक्रमण किए। मेजर होशियार सिंह दहिया और उनके सैनिकों को फिर कठोर अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। मेजर होशियार सिंह एक खाई से दूसरी खाई में बराबर जाते रहे और सैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे।

इस तरह उन्होंने पाकिस्तान के सभी आक्रमण विफल कर दिए। अगले दिन, यानी 17 दिसम्बर को पाकिस्तान ने संख्या में अधिक टैंकों की सहायता से फिर से धावा बोल दिया, फिर भी होशियार सिंह मजबूती के साथ डटे रहे। हालाँकि, वे घायल हो चुके थे फिर भी अपने सैनिकों के बीच जाकर उन्हें प्रोत्साहित करते रहे।

इस दौड़-भाग में दुश्मनों की गोलियों की बौछार से वह और अधिक घायल हो गए। फिर भी उन्होंने अपनी जान की चिन्ता नहीं की और अपने साथियों का मनोबल बढ़ाते रहे। घमासान युद्ध चल ही रहा था कि अचानक एक पाकिस्तानी गोला उनकी मीडियम मशीनगन की एक चौकी के समीप आ गिरा।

इस बीच अनेक सैनिक घायल हो गए, मशीनगन बन्द हो गई। जब एक भारतीय मशीनगन का गनर वीरगति को प्राप्त हुआ तो उन्होंने खुद ही उसे सँभाल लिया। उस दिन दुश्मन के 89 जवान मारे गए, जिनमें उनका कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम राजा भी शामिल था। मशीनगन चलाना बहुत ही आवश्यक था, इस बात को समझकर मेजर होशियार सिंह ने अपने घावों और दर्द की चिन्ता नहीं की और तुरन्त उस चौकी पर पहुँचे और स्वयं मशीनगन चलानी शुरू कर दी।

सैन्य नायक फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के साथ मेजर होशियार सिंह दहिया

उन्होंने कई दुश्मन मार गिराए। इसी पराक्रम के कारण उस दिन भारत को विजय मिली। इसी युद्ध विराम के बाद बांग्लादेश के उदय पर बातचीत शुरू हुई। मेजर होशियार सिंह दर्द से कराह रहे थे, उनका काफी रक्त बह चुका था, फिर भी वे मोर्चा छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। वे वहाँ तब तक डटे रहे जब तक कि युद्धविराम की घोषणा नहीं कर दी गई।

इस लड़ाई के दौरान सेना की समृद्ध परम्पराओं के अनुकूल उत्कृष्ट वीरता, असाधारण युद्ध कौशल और कुशल नेतृत्व का प्रदर्शन करने वाले इस वीर योद्धा का जन्म मई 05, 1936 को हरियाणा के रोहतक जिले के सिसान गाँव में हुआ था।

मेजर होशियार सिंह दहिया वर्ष 1957 में 2 जाट रेजीमेन्ट में भर्ती हुए थे। इन्हें जून 1963 में 3 ग्रेनेडियर्स में कमीशन प्राप्त हुआ। होशियार सिंह लद्दाख तथा राष्ट्रपति भवन में भी सेवारत रहे। मेजर होशियार सिंह ने पूरे समर्पण के साथ देश की सेवा की और ‘ब्रिगेडियर’ के रूप में सेना से रिटायर हुए। 1969 में संयुक्त राष्ट्र मिशन में भाग लेने के लिए ये अपनी यूनिट के साथ कांगो देश गए। मेजर होशियार सिंह दहिया का देहावसान दिसंबर 06, 1998 को हुआ।

गल्फ़ देशों में 10000 से ज्यादा भारतीय कोरोना संक्रमित, भारत चलाएगा बड़े स्तर पर घर वापसी अभियान

खाड़ी देशों (Gulf Countries) में अब तक 10 हजार से ज्यादा भारतीय कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। जबकि अब तक 84 भारतीयों की मौत हो चुकी है। इसी के साथ अब दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमितों की कुल संख्या बढ़कर 36,75,800 हो चुकी है।

मंगलवार (मई 05, 2020) को भारतीय गृह मंत्रालय ने कहा क‍ि विदेशों में फँसे हुए भारतियों को लाने की प्रक्रिया 7 मई से शुरू की जाएगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले सप्‍ताह 7 मई से 13 मई तक विभिन्न देशों में फँसे हुए भारतियों को लाने के लिए इस ऑपरेशन में 64 उड़ानों का संचालन किया जाएगा। सरकार की प्रथम प्राथमिकता खाड़ी देशों में फँसे लोगों को वापस लाने की है।

अभी तक 3 लाख से अधिक लोग सिर्फ गल्फ देशों से ही वापस आने के फॉर्म भर चुके हैं।

भारत कोरोनो वायरस महामारी से फँसे हजारों प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए खाड़ी देशों के साथ काम कर रहा है। इसी के साथ यह आपातकाल के दौरान लोगों को स्वदेश लाने का सबसे बड़ा अभियान बन सकता है।

विदेशों में फँसे अपने नागरिकों को भारत लाने के लिए कुछ ही दिनों में, भारत ने सैन्य जहाजों और अपनी राष्ट्रीय एयरलाइन की तैनाती शुरू करने की योजना बनाई है। घर वापसी के पहले चरण में भारत जून के मध्य तक 1,92,000 भारतियों को घर ला सकती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, एक भारतीय अधिकारी का कहना है कि लोगों को नौकरी छूटने, काम की वीज़ा अवधि समाप्त होने, मेडिकल की आपात स्थिति, फँसे हुए छात्रों और पर्यटकों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार प्राथमिकता दी जाएगी।

भारत लौटने पर यात्रियों को आरोग्य सेतु ऐप पर रजिस्टर भी करना होगा। लौटने के बाद सभी की मेडिकल जाँच की जाएगी और जाँच के बाद संबंधित राज्य सरकार उन्हें अस्पताल में या क्वारंटाइन में दो हफ्ते के लिए रखेगी।

उड़ान भरने से पहले विदेशों में फँसे हुए भारतीयों की मेडिकल स्क्रीनिंग की जाएगी और उन्हीं लोगों को यात्रा की अनुमति दी जाएगी, जिनकी जाँच निगेटिव आएगी। यात्रा के दौरान इन सभी यात्रियों को स्वास्थ्य मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी किए गए सभी प्रोटोकॉल का पालन करना होगा।

जैश-ए-मोहम्मद ने 400 आतंकियों को कश्मीर घाटी पर हमले के लिए पाक की मदद से अफगान कैंप में किया प्रशिक्षित

जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाने वाले आतंकी समूह जैश-ए-मोहम्मद ने अफगानिस्तान में अपने प्रशिक्षण शिविरों में 400 आतंकवादियों को तैयार किया है, जिन्हें कश्मीर घाटी में भेजे जाने से पहले तालिबान यूनिट्स के साथ तैनात किया गया है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने बताया कि पिछले महीने 12 अप्रैल को जब अफगानिस्तान फोर्स आतंक रोधी मिशन पर थी, तो गिरफ्तार किए गए आतंकियों से प्रारंभिक पूछताछ में उन्हें एक आतंकी कैंप के बारे में पता चला था। हालाँकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि वहाँ पर आधा दर्जन से अधिक आतंकी कैंप थे।

दिल्ली और काबुल में आतंकवाद विरोधी अधिकारियों ने बताया कि तालिबान के अफ़गानिस्तान सुलह ज़ाल्मे ख़ालिज़ाद के लिए अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि के साथ 29 फरवरी के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद जैश-ए-मोहम्मद ने इन शिविरों में 400 लड़ाकों को तैयार किया था।

काबुल में एक आतंक रोधी अधिकारी ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा, “पूर्वी अफगानिस्तान में खोस्त से जलालाबाद के बीच और कंधार प्रांत में पाकिस्तान की सीमा से सटे इलाकों में भी जैश कैडर को तालिबान इकाइयों के साथ तैनात किया गया है।”

अधिकारियों ने कहा कि तालिबान और जैश-ए-मोहम्मद के बीच आपसी तालमेल है। कुछ खुफिया रिपोर्टों में कहा गया है कि लश्कर-ए-तैयबा ने जैश शिविरों में प्रशिक्षण के लिए अपने कैडर भी भेजे हैं। जिन्हें पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस द्वारा सहायता दिया जा रहा है।

अफगान फोर्स द्वारा गिरफ्तार किए गए जैश के एक ऑपरेटिव्स में से एक जरार ने पूछताछ के दौरान बताया कि फोर्स द्वारा तहस-नहस किए गए ट्रेनिंग बेस को ‘पाकिस्तान के सैन्य कर्मियों द्वारा प्रशिक्षित, सुसज्जित और समर्थित बनाया जा रहा था।’ उनमें से कई ने बताया कि पाकिस्तानी सेना की तरफ से उन्हें हर तरह की मदद की जाती है, ताकि वो बच सके। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के निवासी के रूप में पहचाने जाने वाले ज़ेरार उनमें से एक था। उसे 15 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था।

मौलाना मसूद अजहर द्वारा स्थापित आतंकवादी समूह को उसके छोटे भाई मुफ्ती अब्दुल रऊफ असगर द्वारा चलाया जा रहा है। काबुल में राजनयिकों का कहना है कि मसूद अजहर के बड़े भाई, इब्राहिम अजहर को मध्य अफगानिस्तान में गजनी शहर में देखा गया है, संभवत: तालिबान के साथ संबंधों को गहरा करने के प्रयास के संदर्भ में वो वहाँ गए हों।

गौरतलब है कि पिछले दिनों NIA ने आतंकी और जैश-ए-मोहम्मद के ओवर ग्राउंड वर्कर शाकिर बशीर मागरे को कश्मीर से गिरफ्तार किया था। शाकिर ने पुलवामा के आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार को शरण और हमले के लिए अन्य सहायता उपलब्ध कराई थी।

आदिल अहमद डार ही वो आतंकी था जो कार में सवार होकर सुरक्षाबल के काफिले में जा घुसा था। शाकिर ने खुलासा किया कि उसने आदिल अहमद डार और एक और अन्य सहयोगी मोहम्मद उमर फारूक को साल 2018 के आखिरी से फरवरी में किए हमले तक अपने घर में शरण दी थी। शाकिर ने कार में रखे विस्फोटक को तैयार किया। लेथपोरा स्थित दुकान से वह सीआरपीएफ काफिले की मूवमेंट पर नजर रखता था।