ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) नौकरी से संबंधित हुनर के लिए 49 कोर्स लेकर आई है। ये सारे कोर्स फ्री हैं और ऑनलाइन हैं। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन में खुद को अपग्रेड करने का यह शानदार ऑफर है। इनमें इनमें डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और स्किल कोर्सेज शामिल हैं। इनमें से कुछ कोर्सेज सभी लोगों के लिए खुले हैं, जबकि कुछ विशिष्ट स्ट्रीम के छात्रों के लिए है। इन कोर्स में अप्लाई करने की अंतिम तारीख 15 मई है। इसके रजिस्ट्रेशन के लिए उम्मीदवारों को आधिकारिक वेबसाइट aicte.org पर आवेदन करना होगा।
इस वक्त लॉकडाउन चल रहा है। ऐसे में सभी स्कूल, विश्वविद्यालय, कोचिंग सेंटर्स बंद हैं। छात्रों की पढ़ाई का नुकसान न हो, इसलिए स्कूल और सरकार विभिन्न प्रयास कर रहे हैं। छात्रों के लिए ऑनलाइन क्लासेज लगाई जा रही है। इसी बीच अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) ने एक नई पहल करते हुए विद्यार्थियों के लिए ऑनलाइन माध्यम से 49 फ्री कोर्सेज की सुविधा दे रही है। बता दें कि ये कोर्स अलग-अलग कंपनियों द्वारा ऑफर किए जा रहे हैं।
यह आवेदन ऑनलाइन रस्जिस्ट्रेशन के जरिए कोई भी व्यक्ति कर सकता है। आइए जानते हैं इनमें से कुछ कोर्सेज के बारे में जो सभी स्ट्रीम के लोगों के लिए मददगार है:
UPSC के लिए (NCERT से संबंधित)
UPSC परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए एनसीईआरटी की पुस्तकें आधार का काम करती हैं। इस पाठ्यक्रम में, सिविल सेवाओं में आवश्यक सभी एनसीईआरटी पुस्तकों की मूल अवधारणाओं को जानेंगे और इससे यूपीएससी तैयारी शुरू करने में मदद मिलेगी। इसमें करियर लॉन्चर की यूपीएससी संकाय से संबंधित सर्वश्रेष्ठ 150 घंटे से अधिक की वीडियो कक्षाएँ शामिल हैं।
बैंकिंग की शुरुआती तैयारी
ऐसे लाखों आकांक्षी हैं, जो सरकारी बैंकिंग परीक्षाओं के माध्यम से बैंकिंग में प्रवेश करना चाहते हैं। एंट्रेंस एग्जाम क्लियर करने के लिए सिर्फ नॉलेज की नहीं, बल्कि एग्जाम क्रैक करने की भी जरूरत होती है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक अपने स्कोर को अधिकतम करने के लिए रणनीतियों को विकसित करने के साथ-साथ पर्याप्त संख्या में मॉक टेस्ट देना भी शामिल होता है। करियर लॉन्चर के बैंकिंग मॉक टेस्ट के साथ, आपको अपनी तैयारी के लिए 500 से अधिक ऑल इंडिया मॉक टेस्ट और कई बैंकिंग परीक्षाओं (40 से अधिक परीक्षाओं) के लिए 100 सेक्शनल मॉक टेस्ट प्राप्त होंगे।
इंटर्नशिप का मौका
इसमें छात्र लाइव डेटा और बिल्ड मॉडल पर काम करके मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सीख सकेंगे। यह एक स्व-पुस्तक पाठ्यक्रम है, जो सात मॉड्यूलों में विभाजित है, जहाँ छात्र समय के साथ काम करना सीख सकते हैं।
इंग्लिश पर पकड़ और इंटरव्यू की तैयारी
WordsMaya द्वारा पेश किया गया यह पाठ्यक्रम नि:शुल्क है। इस कोर्स का उद्देश्य अंग्रेजी बोलने और लिखने के साथ-साथ आपके आत्मविश्वास को मजबूत करना भी है। यह व्यक्तित्व विकास और साक्षात्कार प्रशिक्षण भी प्रदान करता है। पाठ्यक्रम में 50 घंटे की चैट-आधारित इंटरैक्टिव ऑडियो-विज़ुअल सामग्री है।
डिजिटल मार्केटिंग
यह कोर्स सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO), सर्च इंजन मार्केटिंग (SEM), कंटेंट मार्केटिंग, ई-मेल मार्केटिंग, सोशल मीडिया मार्केटिंग, वेब एनालिटिक्स और एकीकृत डिजिटल मार्केटिंग जैसी सोशल मिडिया स्किल में आपकी धार को तेज करेगा। इसकी कक्षाओं में पीपीटी, क्लास नोट्स, कैसेट, वीडियो और असाइनमेंट भी शामिल होंगे।
गीतकार जावेद अख्तर अपनी गलतबयानी के कारण जाने जाते हैं। हाल ही में एक टीवी शो के दौरान लेखक तारिक फतह से बहस के दौरान उन्होंने झूठ और भ्रम का पुलिंदा खड़ा कर दिया। उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी का बचाव किया, बख्तियार खिलजी को अलाउद्दीन समझ लिया और उर्दू भाषा को लेकर भी झूठी बातें की। तारिक फतह पर व्यक्तिगत हमले करके उन्होंने अपने उग्र स्वभाव का भी परिचय दिया।
जब तारिक फतह ने कहा कि खिलजी ने नांलदा यूनिवर्सिटी को जलाया तो उनका आशय बख्तियार खिलजी से था। उसके नाम पर ही पटना में बख्तियारपुर शहर का नामकरण किया गया है। लेकिन, जावेद अख्तर का जवाब था कि अलाउद्दीन एक बड़ा डिफेंडर था। यानी, उनको दोनों खिलजियों के बीच कोई अंतर ही नहीं पता था। उन्होंने ये भी दावा किया कि अलाउद्दीन खिलजी सेक्युलर था और वो हजरत निजामुद्दीन औलिया के दरगाह पर नहीं गया था।
सोशल मीडिया पर इतिहासकार ‘ट्रू इंडोलॉजी’ के हैंडल द्वारा एक के बाद उनके फेक दावों के पीछे की सच्चाई बताई गई है। दरअसल, अल्लाउद्दीन खिलजी निजामुद्दीन दरगाह पर गया था। अमीर ख्वार्ड ने अपने ‘शीरत उल औलिया’ में भी इस बात का जिक्र किया है। जावेद अख्तर का ये दावा कि खिलजी निजामुद्दीन दरगाह नहीं गया था, कहीं भी वर्णित नहीं है। फिर कहाँ से उन्होंने ये बातें लाईं?
आज भी अलाउद्दीन खिलजी के हरजत निजामुद्दीन औलिया के दरबार में हाजिरी लगाने की बातें सुनी-सुनाई जाती हैं। जावेद अख्तर ने तो खिलजी को कंधार में किला बना कर भारत की मंगोलों से रक्षा करने वाले करार दिया। ये भी फर्जी दावा है। असल में कंधार उसके साम्राज्य का हिस्सा था ही नहीं। उसका राज्य सिंधु नदी पर ही ख़त्म हो जाता था और पश्चिम में मुल्तान तक ही उसकी सीमा थी। यहाँ तक कि पेशावर भी मंगोलों के कब्जे में था।
Trying to project Khilji as secular, Javed Akhtar claims Khilji refused to go to Dargah of Nuzamuddin Auliya.
उस समय कंधार को तिगिनाबाद के नाम से जाना जाता था और उस पर पूरी तरह मंगोलों का कब्जा था। खिलजी ख़ुद खल्ज का रहने वाला हुआ करता था, जो अफ़ग़ानिस्तान में स्थित था और मंगोल के कब्जे में था। वहाँ के शासक अक्सर पंजाब पर हमले किया करते थे। इसीलिए, ये दावा ही झूठा है कि खिलजी ने भारत को बचाया। यहाँ तक कि खिलजी के अब्बा ख़ुद मंगोलों से बच कर भारत आए थे। अफ़ग़ानिस्तान पर मंगोलों ने कब्ज़ा किया और खिलजी परिवार कुछ नहीं कर पाया। खिलजी ने कभी ‘ग्रेट मंगोल एम्पायर’ को नहीं हराया।
खिलजी का शासन इतना क्रूर था कि हर हिन्दू को अपने उत्पादन का आधा माल उसे देना होता था। कोई हिन्दू गरीब हो या धनवान, उसके जानवरों पर भी टैक्स लगाया जाता था। हिन्दुओं को घोड़े रखने की इजाजत नहीं थी, वो अच्छे कपड़े नहीं पहन सकते थे और वो हथियार भी नहीं रख सकते थे। जावेद अख्तर ने इन बातों को पढ़ कर जवाब तो नहीं दिया लेकिन कहा कि वो भागेंगे नहीं और जवाब देंगे।
Regarding Khiljis “saving” India:
Khilji’s father himself ran away to India to save himself from Mongols.
Mongols conquered ancestral Khilji lands in Central Afghanistan. Khilji & his father could do nothing.
Today, no Khiljis there. You find Hazaras with Mongol features.
बात दें कि तारिक फतेह ने बच्चों का नाम तैमूर रखने पर आपत्ति जताई थी तो जावेद अख्तर ने जवाब दिया था कि तैमूर ने कभी दिल्ली में शासन ही नहीं किया। तारिक फतेह ने बाबर और औरंगजेब को मजहब के नाम पर लानत बताया था। जावेद अख्तर ने इस दौरान अश्वमेध यज्ञ की आलोचना की थी और कहा था कि ये साम्राज्यवाद की निशानी थी, जो आज नहीं चल सकती और ग़लत ही लगेगा। इसी तरह मुगलों ने भी जो किया, वो उस वक़्त के हिसाब से ठीक था। उन्होंने तबरेज की मौत को भी मुद्दा बनाया था
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के एक गाँव में चल रहे मनरेगा के कार्यों में मानकों की अनदेखी का एक साधु ने आरोप लगाया तो ग्राम प्रधान के समर्थकों ने साधु के साथ मारपीट की। इसके बाद साधु ने अपमान से झुब्ध होकर जहर खा लिया। अब साधु को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मामला बढ़ता देख अब बरेली पुलिस जाँच में जुट गई है।
जानकारी के मुताबिक बरेली जिले के बिशारतगंज के गाँव बेहटा बुजुर्ग में इन दिनों मनरेगा के तहत विकास कार्य कराए जा रहे हैं। इस बीच गाँव के ही मंदिर पर रहने वाले साधु विजय देव नाथ महाराज ने प्रधान पर अधिक मजदूरों की हाजिरी लगाने और मनरेगा के कार्य में कई तरह से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसे लेकर साधु ने प्रधान से रजिस्टर दिखाने की बात कही। आरोप है कि इसके बाद प्रधान के समर्थकों ने साधु को घेरकर उनके साथ मारपीट शुरू कर दी।
अपने साथ हुई मारपीट की लिखित सूचना साधु ने पुलिस को दी, लेकिन इसके बाद भी पुलिस ने साधु की शिकायत पर कोई एक्शन नहीं लिया। इस पर साधु ने अपने अपमान से क्षुब्ध होकर जहर खा लिया। इसकी जानकारी जैसे ही पुलिस को हुई तो पुलिस ने साधु को तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया। इसके बाद साधु की गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें डॉक्टरों ने जिला अस्पताल में रेफर कर दिया है।
मामले पर थाना प्रभारी निरीक्षक राजेश कुमार का कहना है कि गाँव में राजनीति चल रही है, जिसके चलते बाबा से मारपीट हुई। उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की है। पुलिस को दोनों ओर से तहरीर मिल गई है। मामले में आगे की जाँच के आधार पर ही मुकदमा दर्ज किया जाएगा।
वहीं बेहटा बुजुर्ग के ग्राम प्रधान भगवान दास यादव का कहना है कि बाबा विकास कार्यों में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि 17 अप्रैल को भी साधु विजय देव नाथ महाराज ने गाँव में हो रहे विकास कार्यों की जाँच को लेकर अनशन शुरू किया था, लेकिन क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के आश्वासन पर साधु ने अनशन को समाप्त कर दिया था।
गौरतलब हो कि महाराष्ट्र के पालघर में हुई दो साधुओं के साथ एक ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या के बाद उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भी (अप्रैल 28, 2020) दो साधुओं का शव खून से लथपथ बरामद हुआ था। घटना अनूपशहर के गाँव पगोना में घटी थी। यहाँ स्थित शिव मंदिर के परिसर में सो रहे दो साधुओं पर सोमवार देर रात धारदार हथियार से वार कर इनकी हत्या की गई थी।
हालाँकि पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपित युवक को गिरफ्तार कर लिया था। आरोपित की पहचान मुरारी उर्फ राजू के रूप में हुई थी।
कर्फ्यू में नाकों पर तैनात पुलिस कर्मचारियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। ऐसा ही एक हमला पंजाब के तरनतारन जिले के सीमावर्ती गाँव खालड़ा में लगे नाके पर हुआ। बाइक सवार दो युवकों को जब पुलिस ने कर्फ्यू पास दिखाने के लिए कहा तो आरोपितों ने ASI सरबजीत सिंह पर हमला कर दिया। इस मारपीट का एक वीडियो भी सामने आया है। जिसमें दो युवकों को साफ तौर पर पुलिसकर्मी पर हमला करते हुए देखा जा सकता है।
दो युवकों ने ASI के साथ की मारपीट
दरअसल, थाना खालड़ा की पुलिस टीम अनाज मंडी को जाने वाले रास्ते में कर्फ्यू के दौरान नाकाबंदी की हुई थी। अनाज मंडी में जाने वाले वाहनों को रोककर कर्फ्यू पास चेक किए जा रहे थे। नाके पर तैनात पुलिस पार्टी की अगुआई ASI सरबजीत सिंह कर रहे हैं। इस बीच, बाइक पर सवार दो युवकों चरणजीत सिंह और आकाशदीप सिंह को रोका गया। पुलिस ने उन्हें कर्फ्यू पास व बाइक के कागजात दिखाने को कहा। इस पर दोनों युवक पुलिस से गाली-गलौज करने लगे। आरोपितों ने ASI सरबजीत सिंह के साथ धक्कामुक्की की और उन पर हमला कर दिया।
पुलिस ने दर्ज किया केस
आरोपितों युवकों में से एक ने ASI को धक्का देकर गिरा दिया और फिर उनके साथ मारपीट की। इस दौरान उनकी पगड़ी भी उतर जाती है। हालाँकि, इसके बाद भी ASI उठते हैं और उन दोनों का विरोध करते हैं, लेकिन दोनों आरोपित फरार होने में कामयाब हो जाते हैं। दोनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 35, 186, 188 और 269 के तहत केस दर्ज कर लिया गया है। दोनों की तलाशी की जा रही है। पुलिस उन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लेगी।
पुलिसकर्मियों को बनाया जा रहा निशाना
कोरोना वायरस संक्रमण के खतरों के बीच ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से मारपीट की घटनाएँ सामने आ रही हैं। लॉकडाउन का पालन करवाने वाले पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया जा रहा है। तरनतारन से पहले पंजाब के जालंधर में एक युवक ने चेकपोस्ट पर तैनात पुलिसकर्मी पर कार चढ़ा दी थी। मिल्क बार चौक स्थित चेकपोस्ट पर खड़े पुलिसकर्मी को कार सवार काफी दूर तक घसीट कर ले गया। आरोपित युवक गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने कार चला रहे युवक को रुकने का इशारा भी किया, लेकिन कार को रोकने की बजाए वह काफी दूर तक एएसआई मुल्ख राज को कार की बोनट पर घसीटता ले गया।
पटियाला हमले में तलवार से काटा था ASI का हाथ
इससे पहले पटियाला में निहंगों ने तलवार से हमला कर ASI का हाथ काट दिया था। इस मामले में पुलिस ने आरोपित निहंगों को गिरफ्तार कर लिया है। ASI का हाथ पूरी तरह से अलग हो गया था। पीजीआई में सात घंटे से ज्यादा वक्त तक चले ऑपरेशन में एएसआई हरजीत सिंह का हाथ पूरी तरह से जोड़ दिया गया। अब उन्हें महकमे में प्रमोट भी कर दिया गया है, साथ ही वे अस्पताल से डिस्चार्ज भी हो गए हैं।
पश्चिम बंगाल में पूर्वी मिदनापुर जिले के लालपुर गाँव में शेख कासमुद्दीन नामक एक स्थानीय निवासी और तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) समर्थक के घर के पीछे से 153 क्रूड बम बरामद किया गया। भगवानपुर पुलिस ने बमों की बरामदगी के साथ ही इस मामले के सिलसिले में चार लोगों को भी गिरफ्तार किया। इसके बाद तीन को प्रारंभिक पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया और कासमुद्दीन को कांथी कोर्ट में पेश किया गया। उसे न्यायाधीश ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उसके घर के पीछे से जो कच्चे बम बरामद किए गए थे, उन्हें भी डिफ्यूज कर दिया गया है।
एगरा के उप-विभागीय पुलिस अधिकारी शेख अख्तर अली ने कहा, “अवैध रूप से जमा किए गए बम बरामद हुए थे और इसमें एक व्यक्ति को गिरफ्तार भी किया गया है। हम आरोपितों से इन कच्चे बमों को जमा करने के पीछे के मकसद के बारे में पूछताछ कर रहे हैं।”
इस घटना ने लालपुर गाँव के निवासियों में दहशत की स्थिति पैदा कर दी है। स्थानीय लोगों ने पुलिस से सवाल किया है कि इतनी बड़ी मात्रा में कच्चे बमों को कैसे उनकी निगरानी में जमा किया गया। कोरोनो वायरस लॉकडाउन के बीच 153 क्रूड बमों की बरामदगी को लेकर पुलिस भी असमंजस की स्थिति में है।
तृणमूल कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं में आपस में झड़प
भगवानपुर ब्लॉक में तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यवाहक सहायक सचिव और भगवानपुर-1 पंचायत समिति के सदस्य हारुन रशीद (बाबूलाल) के समर्थकों के बीच हुए झड़प के बाद क्षेत्र में पुलिस सक्रिय हो गई है। जानकारी के मुताबिक आरोपी शेख कासमुद्दीन इलाके में हारुन रशीद का समर्थक माना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, 11 अप्रैल को दो समूहों के बीच हिंसक लड़ाई हुई, जिसके बाद अजीमुल और अन्य 44 लोगों को गिरफ्तार किया गया। साथ ही झगड़ा रोकने के लिए उन्हें जिला नेतृत्व और ब्लॉक नेतृत्व की तरफ से चेतावनी भी दी गई थी।
भगवानपुर -1 ब्लॉक के तृणमूल अध्यक्ष मदन मोहन पात्रा ने कहा, “पार्टी की ओर से बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद उन्होंने बात नहीं मानी। वे सत्ता के लिए लड़ रहे थे और अशांति पैदा करने के लिए वे बमों को जमा भी कर रहे थे। पुलिस को कानून के अनुसार उनके खिलाफ़ कार्रवाई करने के लिए कहा गया है।”
अवैध आतिशबाजी कारखाने में विस्फोट
गौरतलब है कि इस साल जनवरी में, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के नैहाटी में एक अवैध पटाखा निर्माण कारखाने में हुए विस्फोट में कम से कम चार लोग मारे गए थे और एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था। तब फैक्ट्री का मालिक नूर हुसैन को गिरफ्तार किया गया था और उसके खिलाफ हत्या के साथ-साथ अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
विस्फोट की तीव्रता को देखते हुए तब स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि अवैध पटाखे के कारखाने का उपयोग कच्चे बम बनाने के लिए किया जाता था।
कॉन्ग्रेस पार्टी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स‘ में भारत के रैंक की बातें करते हुए पत्रकारों को न डरने को कह रही है। वही कॉन्ग्रेस, जिसकी सरकार महाराष्ट्र में अर्नब गोस्वामी और ‘रिपब्लिक टीवी’ के पीछे हाथ धोकर पड़ी हुई है। वही कॉन्ग्रेस, जो आपातकाल अर्थात इमरजेंसी के दौरान ये तय करती थी कि मीडिया में क्या छपेगा। कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि भाजपा लोकतंत्र के चौथे खम्भे मीडिया को ध्वस्त करने में जुटी हुई है।
देश का पहला संविधान संशोधन कॉन्ग्रेस ने किया था। जवाहरलाल नेहरू ने प्रेस (ऑब्जेक्शनबल एक्ट), 1951 के माध्यम से मीडिया पर अंकुश लगाया था। इसके अनुसार, अगर किसी अधिकारी को लगे कि कुछ ‘आपत्तिजनक’ प्रकाशित हुआ है तो वो सेशन जज से मीडिया संस्थान के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकता है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के एक लेख के बारे में नेहरू ने कहा था कि उसमें उनकी काफ़ी आलोचना की गई है जो सही नहीं है। उस लेख को लिखने वाले को ही डिसकंटीन्यू कर दिया गया। तब कहाँ गया था ‘प्रेस फ्रीडम’?
कॉन्ग्रेस शायद जून 1975 को भूल गई है, जब उसने आपतकाल लगाया था। इंदिरा गाँधी ने मीडिया से स्पष्ट कहा था कि उसे कुछ सरकारी दिशानिर्देशों का अनुसरण करना होगा। अर्थात, प्रेस को बाँध दिया गया था। संविधान का हनन हो रहा था और अख़बारों पर सेंसरशिप लाद दी गई थी। ‘द गार्डियन’ और ‘द इकनॉमिस्ट्स’ के कॉरेस्पॉन्डेंट तो धमकी मिलने के बाद यूके भाग खड़े हुए। खबरों को सेंसर करने के लिए ‘चीफ प्रेस एडवाइजर’ का पद बनाया गया।
मीडिया को कहा गया कि अगर कुछ भी छापना है तो इसके लिए ‘चीफ प्रेस एडवाइजर’ से अनुमति लेनी होगी। मई 1976 में तो हद ही हो गई, जब 7000 से भी अधिक मीडियाकर्मियों को जेल में ठूँस दिया गया। उनका अपराध इतना ही था कि वो अपना काम कर रहे थे। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नायर को गिरफ़्तार कर लिया गया था। लालकृष्ण आडवाणी ने जेल से निकलने के बाद मीडिया से ये ऐतिहासिक वाक्य कहा था- ‘आपको तो सिर्फ़ झुकने को कहा गया था, आप सब तो रेंगने लगे।‘
हालिया, अर्नब गोस्वामी प्रकरण से क्या जाहिर होता है? पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा पुलिस के सामने नृशंस हत्या कर दी गई और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से सवाल पूछने के कारण पत्रकार अर्नब गोस्वामी को थाने बुला कर उनके साथ 12 घंटे तक पूछताछ की गई। उन पर और उनकी पत्नी पर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने हमले किए सो अलग। देश भर में एफआईआर की झड़ी लगा दी गई। पत्रकारों को असली डर तो कॉन्ग्रेस से ही है।
यहाँ तक कि ‘रिपब्लिक टीवी’ के अन्य पत्रकारों को भी परेशान किया जा रहा है। ख़ुद पर हुए अटैक के बाद अर्नब ने एक पत्र में लिखा था कि कॉन्ग्रेस की इस हमले में भागीदारी है, जिसे पुलिस नज़रअंदाज़ कर रही है। अर्नब ने कहा था कि एफआईआर फॉर्म में सिर्फ़ पकड़े गए यूथ कॉन्ग्रेस के दोनों कार्यकर्ताओं का नाम है, जबकि उनके साथ इस साज़िश में शामिल अन्य लोगों के नाम नहीं हैं। महाराष्ट्र की मशीनरी किसके इशारे पर ये सब कर रही है? अगर कॉन्ग्रेस पाक-साफ़ है तो उसने विरोध क्यों नहीं किया?
India slipped two places in World Press Freedom Index to 142. As we commemorate #WorldPressFreedomDay, we must remember that the BJP is hell bent on destroying this fourth pillar of democracy and we shouldn’t let that happen.
पश्चिम बंगाल में पत्रकारों पर हमला कर के उन्हें मारा-पीटा जाता है, कॉन्ग्रेस चुप रहती है। कर्नाटक में कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री रहते उनके ख़िलाफ़ लिखने वाले सम्पादकों पर कार्रवाई की जाती है लेकिन कॉन्ग्रेस साथ में सत्ता की मलाई चाभते रहती है। उस सरकार पर फोन टैपिंग के आरोप लगते हैं लेकिन कॉन्ग्रेस भी इसमें भागीदार होने के कारण चुप रहती है। कुमारस्वामी ने तो बेटे को भाव न दिए जाने पर मीडिया के बहिष्कार की ही चेतावनी दे डाली थी।
अगर ‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ की ही बात की जाए तो इसका रैंक गिराने में कॉन्ग्रेस का सबसे ज्यादा योगदान है। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में थी, तब 2003 में भारत का 120वाँ रैंक था। अगले 10 वर्षों तक सोनिया गाँधी ने पर्दे के पीछे से सरकार चलाई और जब उसका शासन ख़त्म हुआ तो भारत फिसल कर 140वें स्थान पर आ गया। अगर आज रैंक 142 है तो इतना हंगामा क्यों?
In 2003 when BJP was in power, India was ranked 120 in World press freedom Index. By the end of 10 years of Congress Rule, India dropped to 140. #WorldPressFreedomDay
कॉन्ग्रेस जहाँ सत्ता में हो, वहाँ प्रेस फ्रीडम का मुद्दा ही गायब कर दिया जाता है। जहाँ पार्टी विपक्ष में हो, वहाँ उसे पत्रकारों का दर्द नज़र आने लगता है। कॉन्ग्रेस महाराष्ट्र में अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ ‘विच हंट’ पर जाती है लेकिन भाजपा पर बिना किसी घटना का जिक्र किए पत्रकारों को डराने का आरोप लगा देती है।
उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के बारे में कई रिपोर्ट आ चुकी है। उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार एजेंसी केसीएनए के अनुसार पहले यह बताया गया कि एक उर्वरक कारखाने के उद्घाटन में भाग लेने के लिए वो पिछले 21 दिनों में पहली बार सार्वजनिक तौर पर दिखे। इस बीच तानाशाह किम जोंग उन के स्वास्थ्य और संभावित मौत पर बढ़ती अटकलों ने तब तेज़ी पकड़ ली थी, जब वे उत्तर कोरिया के सबसे महत्वपूर्ण दिन यानी अपने दिंवगत दादा की जयंती में उपस्थित नहीं हुए थे।
अब एक नया खुलासा हुआ है। द सन द्वारा प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उत्तर कोरियाई तानाशाह जनता की नज़रों से इसीलिए गायब थे, क्योंकि वह कोरोना वायरस से बचने के लिए कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्वी हिस्से में स्थित वॉनसन में अपने निजी लक्जरी विला में 2000 सेक्स स्लेव्स के साथ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
खबरों के मुताबिक, सैटेलाइट चित्रों के द्वारा किम जोंग उन की अपनी निजी ट्रेन के अलावा लग्जरी नावों को वॉनसन विला के पास तैनात देखा गया है।
वॉनसन में किम जोंग उन का निजी विला
कोरियन तानाशाह ने 2015 में अपने दिवंगत दादा के “प्लेजर स्क्वाड” (टॉप अधिकारियों के मनोरंजन के लिए नाबालिग लड़कियों के दस्ते बनाए जाते हैं, जिन्हें Pleasure Squad कहते हैं) या गुप्त सेक्स मनोरंजन के किप्पुमो को फिर से शुरू कर दिया। द सन ने बताया कि 2000 महिलाओं को किम ने “प्लेजर स्क्वाड” के रूप में विला में रखा है।
पिछला “प्लेजर स्क्वाड” दिसंबर 2011 में पुराने तानाशाह की मौत पर समाप्त कर दिया गया था, लेकिन आधिकारिक तीन साल की शोक अवधि समाप्त होने के बाद, किम ने 2015 में फिर अपना खुद का “प्लेजर स्क्वाड” शुरू किया।
अखबार ने बताया कि उनके अति-संरक्षित महलों की दीवारों के भीतर, उनकी “प्लेजर स्क्वाड” उच्च-रैंकिंग वाले उत्तर कोरियाई अधिकारियों के लिए मनोरंजन प्रदान करती है।
2000 लड़कियों के हरम को “राष्ट्र के कुलीन वर्ग के लिए गाने और नृत्य करने के लिए रखा जाता है- साथ ही वे अलग-अलग तरह के यौन संबंधित चीजों में भाग लेती हैं।” मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, किम को अपने लव ऑफ बूज़ (बढ़िया के शराब के शौक) और बढ़िया भोजन के लिए भी जाना जाता है और “प्लेजर स्क्वाड” को उनके इन सभी सुखों का हमेशा ध्यान रखना होता है।
कुछ लड़कियों के बारे में कहा जाता है कि वे नाबालिग थीं और उन्हें बहुत कम उम्र में सेक्स स्लेव बनने के लिए मजबूर किया गया था। उत्तर कोरिया के ही प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोप लगाया है कि लड़कियों को स्क्वाड का सदस्य बनने से पहले उनके कुँवारी होने की पुष्टि की जाती है, जिसके लिए उन्हें बहुत ही सघन मेडिकल परीक्षण से गुजरना पड़ता है।
उत्तर कोरिया के संस्थापक, किम इल-सुंग का “प्लेजर स्क्वाड”
देश (उत्तर कोरिया) के शाश्वत राष्ट्रपति माने जाने वाले व उत्तर कोरिया के संस्थापक किम इल-सुंग ने अपने शासनकाल के दौरान “प्लेजर स्क्वाड” की शुरुआत की थी। 1970 के दशक के अंत में, उन्होंने अपने अधिकारियों को क्लब में शामिल होने के लिए देश भर से सबसे आकर्षक महिलाओं और लड़कियों को ढूँढ निकालने के लिए भेजा।
किम इल-सुंग का कुँवारी लड़कियों के विषय में एक धारणा थी कि उनके साथ यौन संबंध बनाने से उन्हें लड़कियों की जीवन-शक्ति को अब्ज़ॉर्ब करने में मदद मिलती है। इसके लिए लड़कियों के माता-पिता को सूचित किया जाता था कि उनकी बेटियों को एक महत्वपूर्ण मिशन पर किम इल-संग (Kim il-sung) की सेवा के लिए चुना गया है, और इस मामले में उनकी तरफ से कोई आपत्ति नहीं होती थी। 20 वर्ष की उम्र में अपने यौन कर्तव्यों से “सेवानिवृत्त” होने के बाद उत्तर कोरिया की सेना में उच्च पदस्थ अधिकारी तब उन महिलाओं पर अपनी पत्नी होने का दावा करते थे।
किम जोंग उन के मौत की अफवाहें
रिपोर्ट्स के अनुसार, किम जोंग उन ने 11 अप्रैल को पार्टी पोलित ब्यूरो की अध्यक्षता की। राज्य के मीडिया ने अगले दिन रिपोर्ट किया कि नेता ने लड़ाकू जेट का निरीक्षण किया था। उसके बाद किम देश की मीडिया रिपोर्ट्स से गायब हो गए थे।
15 अप्रैल को अपने दादा के जन्मदिन के समारोह में न पहुँचने पर उनके खराब स्वास्थ्य और संभावित मृत्यु के बारे में अटकलें सामने आईं। उनकी अनुपस्थिति ने लोगों के दिमाग में काफ़ी सवाल पैदा कर दिए। एक ऑनलाइन मीडिया आउटलेट, जिसे उत्तर कोरियाई डिफेक्टर्स द्वारा चलाया जाता है, ने बताया कि तानाशाह का पिछले महीने हृदय का इलाज चल रहा था। इसमें यह भी कहा गया था कि 30 वर्षीय किम को भारी धूम्रपान, मोटापे और थकान के कारण तत्काल उपचार की आवश्यकता थी।
उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में स्थित हंदवाड़ा में आतंकियों के साथ एनकाउंटर के दौरान 5 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए, जिनमें एक कर्नल और एक मेजर रैंक के अधिकारी भी शमिल हैं। इन्होंने एक इमारत में छिपे आतंकियों से लोहा लेने के लिए बाहर से हमला करने के बजाय अंदर जाना मुनासिब समझा, ताकि नागरिकों की जानमाल की क्षति न हो। अब फेसबुक पर कई कट्टरपंथी इस ख़बर पर ‘हाहा’ रिएक्ट करते और जश्न मनाते मिले हैं।
सबसे पहले बात करते हैं ‘जी न्यूज़’ की ख़बर की, जिसमें जवानों के वीरगति को प्राप्त होने की सूचना दी गई। इस ख़बर पर समुदाय विशेष के दर्जनों लोगों ने ‘हाहा’ रिएक्शन दिया, जिनमें गुल खान, मोहम्मद इरफ़ान, आसिफ जमाल, मलिक मुस्तफा, सेहरिश खान, दानिश राशिद और नाइमा बुखारी जैसे कई शामिल हैं। जमाल पंजाब के फगवाड़ा स्थित एलपीयू से पढ़ा हुआ है, तो मुस्तफा पंजाब के पटियाला में पढ़ता है। इनमें से कुछ श्रीनगर और पुलवामा के हैं। कई पाकिस्तानी भी हैं।
हंदवाड़ा में मुठभेड़ के बाद भारतीय जवानों के बलिदान पर जश्न मनाते कट्टरपंथी
अगर ‘जी न्यूज़’ के ही दूसरी ख़बर की बात करें तो इसमें भी श्रीनगर के सोहैल अहमद और आसिफ मंजूर समेत 31 ने ‘हाहा’ रिएक्शन दिया है। इनमें से कई ने अपना नाम उर्दू में लिख रखा है। इस पोस्ट में जवानों के वीरगति को प्राप्त होने के बारे में विस्तृत सूचना दी गई थी। जश्न मनाने वालों में सुहैल, आदिल, अब्दुल्ला, इक़्तिदार, मशरिक़, हामिद, फैज़ान, फरहान, फ़ारूक़ और फरीद सहित कई शामिल हैं।
दिल्ली के जाफराबाद का शफीक अंजुम भी इस ख़बर के बाद जश्न मनाता पाया गया। ‘इंडिया टुडे’ ने हंदवाड़ा मुठभेड़ की सूचना से सम्बंधित ख़बर पोस्ट की थी। शफीक ने लिखा, ‘5 कुत्ते मारे गए। वाह! सुबह-सुबह ही अच्छी ख़बर मिल गई। मेरे स्वतंत्रता सेनानियों ने तो कमाल ही कर दिया।‘ शफ़ीक़ के फेसबुक कमेंट्स और उसके प्रोफाइल डिटेल्स को नीचे संलग्न की गई ट्वीट में देखा जा सकता है:
Shafiq Anjum who says he lives in Jafradbad, Delhi was seen celebrating the killing of Indian soldiers in #Handwara encounter. pic.twitter.com/n0PwIWi760
इसी तरह ‘एबीपी न्यूज़’ ने भी जब इस घटना की ख़बर पोस्ट की, ‘हाहा’ रिएक्शन देने वाले आ पहुँचे। यहाँ भी मलिक शाकिर, आदिल खान, आकिब खान, तामजामुल इस्लाम और मुहम्मद इक़बाल सहित 30 सभी अधिक लोगों ने ‘हाहा’ रिएक्ट किया, जिसमें इक्के-दुक्के को छोड़ कर लगभग सभी समुदाय विशेष के प्रतीत हो रहे हैं। इसमें हैदराबाद का आन और सैयद सलीम शामिल है, वहीं कश्मीर का सलीम बिन युसूफ और सज़्ज़ाद सहित कई हैं।
उधर पाकिस्तानी ट्विटर हैंडलों ने इस घटना की तुलना अभिनन्दन प्रकरण से की। बता दें कि शनिवार (मई 2, 2020) की रात वहाँ 12 घंटों तक मुठभेड़ चली। सभी जवान चंजमुल्ला क्षेत्र में फँसे हुए थे। उनकी मुठभेड़ पाकिस्तान से घुसपैठ कर के आए आतंकियों से हुई।
रात भर संशय के माहौल के बाद अब उन जवानों के वीरगति को प्राप्त होने की ख़बर आई है। उन जवानों में एक जम्मू कश्मीर पुलिस से हैं और एक दूसरे सिक्यॉरिटी फोर्स के। शनिवार दोपहर 3:30 बजे सशस्त्र बलों और आतंकियों के बीच फायरिंग चालू हुई थी। हंदवाड़ा उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में स्थित है। इससे 1 दिन पहले उरी में पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन किया था, जिसमें 2 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
03 मई, 1939 को 81 साल पहले आज ही के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की घोषणा की थी। इसकी स्थापना के पीछे के घटनाक्रम में त्रिपुरी अधिवेशन की सबसे अहम भूमिका मानी जा सकती है।
त्रिपुरी अधिवेशन ने मानो नेहरू से लेकर महात्मा गाँधी और तमाम अन्य नेताओं को देश में और समकालीन नेताओं की दृष्टि में उनकी स्थिति का सटीक आकलन करा दिया था। महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार भी सुभाष चन्द्र बोस के करिश्माई व्यक्तित्व और उनकी लोकप्रियता से अच्छी तरह से परिचित थी। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार ने खुद को हमेशा नेहरू का ज्यादा करीबी माना और वह सुभाष चन्द्र बोस से दूरियाँ बनाकर रखीं।
उस पर सुभाष चन्द्र बोस के ओजस्वी भाषण! महात्मा गाँधी की नाराजगी के बावजूद जबलपुर के तिलवाराघाट में हुए कॉन्ग्रेस के 52वें अधिवेशन में नेताजी को पूरी बुलंदी के साथ अध्यक्ष चुना गया था। महात्मा गाँधी की ओर से उम्मीदवार रहे, पट्टाभि सीतारमैया को 203 मतों से करारी हार मिली। यह हर हाल में अविश्वसनीय थी। इस पर जबलपुर में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा त्रिपुरी अधिवेशन में दिए भाषण ने उनकी रणनीति और उनकी कार्यप्रणाली स्पष्ट कर दी थी।
अध्यक्ष चुने जाने पर अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस ने अपने भाषण में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के समकालीन नेताओं में बढ़ रही सत्ता की चाह और उनकी भटकती हुई नीति के बारे में स्पष्ट रूप से चर्चा की, जिसने हार से पहले से ही बौखलाए महात्मा गाँधी से लेकर जवाहर लाल नेहरू, सबको चिंतित कर दिया।
अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस अधिवेशन में नेता जी का भाषण
सुभाष चन्द्र बोस ने जबलपुर में दिए इस भाषण में स्वराज्य के प्रश्न को उठाया और कहा कि यही समय है जब ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दे दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के प्रति हमारे निष्क्रिय बर्ताव और हमारे ऊपर संघीय सरकार लादने का समय बीत चुका है। भाषण का एक हिस्सा कुछ इस तरह से है-
“सर्वप्रथम सत्ता के लोभ के कारण हमारे प्रबंध में जो भ्रष्टाचार घुस आया है, उसे कठोरता से दूर करना होगा। बंधुओं! कॉन्ग्रेस का वर्तमान वातावरण धूमिल हो चुका है और मतभेद उभर आए हैं। फलस्वरूप हमारे अनेक मित्र खिन्न-चित्त और हतोत्साहित हैं। किन्तु मैं अपरिवर्तनीय आशावादी हूँ। आप जिस मेघ को देख चुके हैं, वह गुजरता मेघ है। मुझे अपने देशवासियों के देशप्रेम पर विश्वास है। हमें भरोसा है शीघ्र ही हम इन कठिनाइयों पर विजय पाएँगे। हमारे कार्यकताओं में एकता कायम हो जाएगी।”
जनवरी 29, 1939 को जबलपुर में हुए त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ नेताजी सुभाषचंद्र बोस
कट्टर गाँधीवादियों से बढ़ता हुआ मतभेद
लेकिन सुभाष चन्द्र बोस जानते थे कि कॉन्ग्रेस के नेताओं के बीच सत्ता की चाह में शुरू हुआ संघर्ष अब विराम नहीं लेने वाला है। बावजूद इसके वे सदैव ही महात्मा गाँधी के सम्मान में खड़े नजर आए। जबकि गाँधी ने बोस की लोकप्रियता को उनकी दुस्साहस की राजनीति बताया। वो यह भी अच्छे से जानते थे कि जवाहरलाल नेहरू पर गाँधी जी का वरदहस्त है। सुभाष चन्द्र बोस चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ तुरंत बड़ा संघर्ष छेड़ दिया जाए।
उन्होंने त्रिपुरी में ही यह आह्वाहन कर साबित कर दिया था कि वो राष्ट्रव्यापी संघर्ष को आवश्यक मानते थे और इस में किसी भी प्रकार की देरी के पक्ष में नहीं थे। लेकिन वो यह भी जानते थे कि कॉन्ग्रेस के माननीय सदस्य यह नहीं चाहते, इसी कारण स्पष्ट वक्ता सुभाष चन्द्र बोस उनकी राष्ट्रभक्ति पर भी संदेश जताते थे।
गाँधी जी की नाराजगी
1938 के अंतिम माह से सुभाष बोस और कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं के बीच दरार पैदा होनी शुरू हो गई थी। इसके पीछे एक वजह नेताजी द्वारा गैर-कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में अन्य दलों को साथ लेकर साझा सरकार बनाने की राय भी थी। वह ऐसा इसलिए करना चाहते थे ताकि बंगाल की सांप्रदायिक शक्तियों को नियंत्रित कर कमजोर किया जा सके, लेकिन महात्मा गाँधी को उनका यह प्रस्ताव अज्ञात कारणों से पसंद नहीं आया और उनके इस मत का विरोध करते हुए कहा कि वो इस प्रयास के पक्ष में नहीं हैं। नेता जी के प्रति उनका नजरिया यहीं से बदलता गया और मतभेदों का सिलसिला शुरू होने लगा। उस समय सुभाष चन्द्र बोस कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रांतीय कॉन्ग्रेस समिति के भी अध्यक्ष थे।
नेता जी की दूसरी बार और अविश्वसनीय जीत ने सबको हैरान कर दिया और महात्मा गाँधी के साथ ही उनके अन्य सहयोगियों ने भी नेता जी को सबक सिखाने की ठानी। इसके बाद वह समय आया जब महात्मा गाँधी ने एक प्रकार का विक्टिम कार्ड खेलते हुए फरवरी 04, 1939 को एक वक्तव्य में पट्टाभि की हार को अपनी हार बता दिया और कहा कि मुझे यह स्पष्ट हो गया है कि कॉन्ग्रेस प्रतिनिधि अब उनके सिद्धांतों और नीतियों के खिलाफ हैं।
लेकिन महात्मा गाँधी के इस बयान ने सुभाष चन्द्र बोस को निराश किया। सुभाष चन्द्र बोस ने जवाब में कहा- “मेरे लिए यह निराशाजनक होगा कि मैं अन्य लोगों का विश्वास जीतने में तो सफल रहा लेकिन भारत के सबसे महान व्यक्ति का विश्वास जीतने में असफल रहूँ।”
बोस, गाँधी
त्रिपुरी संकट
क्या यह एक संयोग नहीं है कि भारत के जिस इतिहास में, जिस त्रिपुरी संकट को हम पढ़ते हैं, उसमें गाँधी के तब के विचारों को कहीं भी स्थान नहीं दिया गया है। जबकि, यह स्पष्ट है कि जिसे नेहरूवादी इतिहासकारों ने त्रिपुरी संकट का नाम दिया था, वह संकट तो असल में महात्मा गाँधी और कट्टर गाँधीवादियों पर था।
गाँधी जी सुभाष की जीत से आहत ही नहीं बल्कि बेहद निराश थे। उन्होंने यह हार अपने निजी गौरव पर ले ली थी। गाँधी जी के साथ ही उनके करीबी और सहयोगी भी नेता जी के वर्चस्व से निराश थे।
सुभाष बोस कॉन्ग्रेस प्रतिनिधियों की ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा और निष्क्रियता पर कई बार सवाल उठाए थे। वह अक्सर कहते थे कि पुरातनपंथी कॉन्ग्रेसी ब्रिटिश सरकार से समझौता चाहते हैं ना कि आजादी। जबकि इसके विपरीत सुभाष चन्द्र बोस अंग्रेजों के खिलाफ बने हुए माहौल को इस्तेमाल कर उनका उग्रता से दमन कर देना चाहते थे।
नेहरू की भूमिका और नेहरू के भय
यह वो समय था, जब देश में राजनीतिक गतिविधियाँ तेजी से बदल रहीं थीं। वहीं, सुभाष चन्द्र बोस ने त्रिपुरी के समय नेहरू से भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा लीं थीं। वह अंत तक भी सोचते रहे कि नेहरू गाँधी का नहीं बल्कि उनका साथ देंगे। यही वजह थी, जिस कारण नेताजी पंडित नेहरू की नीतियों को विरोधाभासी और व्यक्तिवादी नीतियाँ बताते थे।
नेहरू के प्रति अपनी निराशा को व्यक्त करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा कि उन्हें नेहरू ने निजी तौर पर नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा – “इस संकट में किसी ने हमें इतनी चोट नहीं पहुँचाई है जितनी पंडित नेहरू ने, कितनी दयनीय स्थिति है कि नेहरू त्रिपुरी में मेरे खिलाफ खुले प्रचार में उन पुराने बारह महारथियों के साथ थे।”
ये बारह महारथी वो थे, जिन्होंने गाँधी जी के पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताते हुए घोषणा के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था। गाँधी जी ने कहा था कि जो लोग सुभाष के तरीकों से सहमत नहीं हैं, तो वे कॉन्ग्रेस से हट सकते हैं। इसके बाद कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था।
इस प्रकरण के बीच सुभाष चन्द्र बोस ने लंदन में रहने वाले अपने भतीजे अमिया बोस को अप्रैल 17, 1939 को एक पत्र में लिखा- “नेहरू ने मुझे अपने व्यवहार से बहुत पीड़ा पहुँचाई है। अगर वे त्रिपुरी में तटस्थ भी रहते, तब पार्टी में मेरी स्थिति बेहतर होती। कॉन्ग्रेस में नेहरू की स्थिति बेहद कमजोर हुई है। यहाँ तक कि त्रिपुरी सत्र में जब वो बोल रहे थे, तब उनके खिलाफ हूटिंग तक की गई।” इस प्रकार कॉन्ग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन के बाद से नेहरू ने सुभाष चन्द्र बोस से दूरियाँ बनानी शुरू कर दीं थीं।
लेकिन त्रिपुरी से पहले तक भी सुभाष चन्द्र बोस, नेहरू के प्रति बेहद आदर का भाव रखते थे। जून 30, 1936 से लेकर फरवरी, 1939 तक पत्र भेजने के रिकॉर्ड भी उपलब्ध हैं। सभी पत्रों में नेताजी ने नेहरू जी के प्रति बेहद आदर का भाव दिखाया है।
त्रिपुरी के बाद सुभाष चन्द्र बोस स्पष्ट तौर पर जवाहर लाल नेहरू की भूमिका से आहत थे। नेहरू उस चुनाव में तटस्थ बने रहे और यह जताते रहे कि वो मध्यस्थता कर के अन्य नेताओं के बीच सुभाष चन्द्र बोस को सम्मान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि वो उस समय सुभाष चन्द्र बोस के साथ खड़े नहीं रहे, जब उहें इसकी ज्यादा आवश्यकता थी।
यह भी सत्य है कि ब्रिटिशर्स ने सुभाष चन्द्र बोस और नेहरू के सम्बन्धों में फूट डालने के हर सम्भव उपाय किए थे। यह बात ब्रिटेन के गृह सचिव ने फरवरी 21, 1929 को लंदन में ब्रिटिश अधिकारियों को भेजी अपनी एक रिपोर्ट में कलकत्ता में कॉन्ग्रेस के सत्र के बाद कही थी।
हार के बदले गाँधी जी का विक्टिम कार्ड
अप्रैल 29, 1939 को कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमिटी की बैठक से पहले बोस और गाँधी जी के बीच कई पत्राचार हुए, लेकिन इनके परिणाम कभी भी संतोषजनक नहीं रहे। इसी तारीख को जवाहर लाल नेहरू और बोस की मुलाक़ात भी हुई, गाँधी जी ने भी उनसे भेंट की। नेहरू चाहते थे कि सभी कार्यकर्ताओं को एक मत यदि कोई कर सकता है तो वो महात्मा गाँधी थे।
इन तीनों दिग्गजों की मुलाक़ात का फिर भी कोई परिणाम नहीं निकला। अब सुभाष चन्द्र बोस त्यागपत्र देने का मन बना चुके थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस को अपना त्यागपत्र सौंपा और अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि वो इस पद पर नहीं रहना चाहते। हालाँकि नेहरू ने उन्हें त्यागपत्र के बारे में फिर से विचार करने की भी राय दी।
नेहरू की बात का समर्थन जयप्रकाश नारायण ने भी किया लेकिन सुभाष चन्द्र बोस अब निश्चय कर चुके थे और वह अपने त्यागपत्र से वापस नहीं हटने वाले थे। हालाँकि इसके बाद महात्मा गाँधी ने सुभाष चन्द्र बोस के साथ अपने विवादों पर सिद्धांत और विचारों का हवाला दिया था और कहा कि स्वराज्य पाने के उनके और सुभाष चन्द्र बोस के तरीके भिन्न हैं। गाँधी के मनमुटाव को दूर करने के लिए रविन्द्रनाथ ठाकुर ने भी पत्र लिखकर भ्रांतियों को दूर करने के प्रयास किए लेकिन गाँधी जी पर इसका भी कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा।
लेकिन सुभाष चन्द्र बोस की जीत और उनके त्यागपत्र देने तक महात्मा गाँधी और उनके सहयोगियों ने हर वो प्रयास किए, जिससे पार्टी में महात्मा गाँधी का वर्चस्व बना रहता। इस प्रकार सुभाषचन्द्र बोस के इस्तीफ़े ने देश में एक बार फिर से गाँधीवादियों को अपना वर्चस्व साबित करने का मौका दिया। यही वो वजह बनी, जिसने फॉरवर्ड ब्लॉक की नींव भी रखी।
फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना
अप्रैल 29, 1939 को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के बाद आखिरकार मई 03, 1939 को सुभाष चन्द्र बोस ने कॉन्ग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कॉन्ग्रेस अभी तक वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा था और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना के कुछ दिन बाद ही सुभाष चन्द्र बोस को कॉन्ग्रेस से ही निकाल दिया गया। कॉन्ग्रेस के भीतर जितने भी वामपंथी संगठन थे, फॉरवर्ड ब्लॉक उन सबका प्रतिनिधि बना।
जून 22, 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक का पहला अधिवेशन नागपुर में आयोजित किया गया और इसमें फ़ॉरवर्ड ब्लॉक को एक सोशलिस्ट पार्टी घोषित किया गया। इसी तारीख को फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का आधिकारिक स्थापना दिवस भी तय किया गया। अधिवेशन में फॉरवर्ड ब्लॉक ने अपना नारा दिया – “All Power to the Indian People” फॉरवर्ड ब्लॉक के झंडे में एक बाघ के साथ वामपंथी चिन्ह भी था, जिसका सीधा संदेश सभी वामपंथी दलों को एक झंडे के नीचे एकत्रित करना था।
पहले अधिवेशन के कुछ मूल बिन्दुओं में से एक यह भी था कि सत्ता के मोह में कॉन्ग्रेस द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को समाप्त करना और निहित स्वार्थों से कॉन्ग्रेस को मुक्त कर उसे अधिक गतिशील और जीवंत बनाना। सुभाष चन्द्र बोस की अभूतपूर्व नेतृत्व क्षमता के चलते देखते ही देखते फॉरवर्ड ब्लॉक देशभर में लोकप्रिय हो गया और इससे बड़ी तादाद में लोग जुड़ने लगे। लोगों ने बोस के क्रांति के बीहड़ मार्ग को अपनाया।
फॉरवर्ड ब्लॉक ने सबसे ज्यादा महत्व भारत के देशी राज्यों में स्वतंत्रता आन्दोलन को तीव्र करने पर दिया। इस सबके बीच कट्टर गाँधीवादी सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता और सफलता से बौखलाते गए। फॉरवर्ड ब्लॉक कॉन्ग्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि कॉन्ग्रेस में ही जीर्ण विचारधारा से त्रस्त कुछ प्रगतिशीलों और वामपंथी शक्तियों का मोर्चा था, जिसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की माँग की थी।
यह भी स्पष्ट करना जरुरी है कि फॉरवर्ड ब्लॉक का वामपंथ आज के वामपंथ से एकदम भिन्न था। यह मासूम और निर्दोषों के रक्तपात की क्रांति के बजाए ब्रिटिश राज के दमन का संदेश लिए हुए क्रांतिकारियों का संगठन था, जिनकी भर्ती बाद में आजाद हिन्द फ़ौज में की गई।
अगस्त 1939 को फॉरवर्ड ब्लॉक के मुखपत्र के रूप में ‘फॉरवर्ड’ नामक साप्ताहिक पत्रिका जारी की गई, जिसमें फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की नीतियों को देशभर में पहुँचाया जाने लगा। ब्रिटिश सरकार इन सब कामों से इतनी आतंकित हुई कि उसने सुभाष चन्द्र बोस की रैलियों को अनुमति देनी बंद कर दी। हालाँकि इसी समय गाँधी और नेहरू खुलकर अपनी जनसभाएँ आयोजित कर सकते थे। अब तक बोस ब्रिटिश सरकार से प्रत्यक्ष मुकाबले में खड़े हो चुके थे।
बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गई। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतन्त्रता संग्राम को और अधिक तीव्र करने के लिए जन जागृति शुरू करने का काम किया।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के अंतरराष्ट्रीय अभियान
सितम्बर 03, 1939 को मद्रास में सुभाष चन्द्र बोस को ब्रिटेन और जर्मनी में युद्ध छिड़ने की सूचना मिली। हिटलर की सेना ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया। यही वो अवसर था, जिसकी तलाश बोस को एक लम्बे समय से थी। उन्होंने तुरंत घोषणा की कि भारत के पास सुनहरा मौका है और उसे अपनी मुक्ति के लिए अभियान तेज कर देना चाहिए।
सितम्बर 08, 1939 को युद्ध के प्रति पार्टी का रुख तय करने के लिए सुभाष चन्द्र बोस को विशेष तौर से कॉन्ग्रेस कार्य समिति में निमंत्रित किया गया। बोस अपनी निष्ठा के पक्के थे, उन्होंने अपनी राय के साथ यह संकल्प भी दोहराया कि अगर कॉन्ग्रेस यह काम नहीं कर सकती है तो फॉरवर्ड ब्लॉक अपने दम पर ब्रिटिश राज के खिलाफ़ युद्ध शुरू कर देगा।वह जानते थे कि स्वराज्य को लेकर कॉन्ग्रेस के संकल्प आज भी क्षीण हैं।
फॉरवर्ड ब्लॉक ने देशभर में अपने अभियानों से ब्रिटिश सरकार को मजबूर कर दिया था। प्रतिक्रिया में फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्यों को गिरफ्तार किया जाने लगा। बोस को भी कई बार गिरफ्तार किया गया लेकिन वह जेल में अनशन कर बाहर निकल आए।
ब्रिटिश सरकार सुभाष चन्द्र बोस की क्षमता से अनजान नहीं थी। बोस के खिलाफ खुलकर गिरफ्तारी और नजरबंदी के आदेश दिए जाने लगे। इसी बीच नवम्बर 29, 1939 को प्रेजिडेंसी जेल में किया गया उनका ऐतिहासिक अनशन भी हुआ। उन्हें रिहा किया गया, फिर नजरबंद किया गया। यहीं से सुभाष चन्द्र बोस के ब्रिटिशर्स की आँखों में धुल झोंककर विदेश चले जाने और आगे की कहानी शुरू हुई। उन्होंने मुसोलिनी से लेकर हिटलर तक से मुलाकात की। वो किसी भी तरह से भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाने के पक्षधर थे। आजाद हिन्द रडियो के जरिए वो निरंतर क्रांतिकारियों से जुड़े रहे और अपने दिशा-निर्देश उन तक पहुँचाते रहे।
जर्मन तानाशाह हिटलर और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
एक आयरिश इतिहासकार यूनन ओ हैल्पिन का कहना है कि जब नेताजी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की तो ब्रिटेन की सरकार ने उन्हें ख़त्म करने का आदेश दिया। हैल्पिन का कहना था कि ब्रिटेन की ख़ुफ़िया सेवा के अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि मध्य पूर्व से होकर जर्मनी जाने की कोशिश कर रहे सुभाष चन्द्र बोस को बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाए। हालाँकि, वो कभी इसमें कामयाब नहीं हो सके। नेताजी की मौत के बजाए 1945 में उनके गायब होने की चर्चा को ही इतिहासकारों ने ज्यादा महत्व दिया है।
कितने कामयाब रहे सुभाष?
सुभास चन्द्र बोस की अद्भुत नेतृत्व क्षमता, उनका देशप्रेम और उनका संघर्ष आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का काम करता है। उनका व्यक्तित्व करिश्माई था। 1930 में सुभाष चन्द्र बोस कारावास में ही थे कि चुनाव में उन्हें कोलकाता का महापौर चुन लिया गया। उन्होंने भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी को देश हित में और औपनिवेशिक राज के ख़िलाफ़ एकजुट कर प्रेरित किया था।
बचपन से ही स्वामी विवेकानंद और अरविन्द घोष उनकी प्रेरणा रहे। जब उनके साथ के अन्य नेता बस नाम पाने की जद्दोजहद में लगे थे, तब सुभाष चन्द्र बोस ने सिर्फ और सिर्फ त्याग किया – पहले इंडियन सिविल सर्विस (ICS) की नौकरी का, फिर वर्चस्व का, फिर अपनी आजादी का और आखिर में अपनी पहचान तक भी देश के लिए कुर्बान कर दी।
नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाए गए मुकदमे ने सुभाष चन्द्र बोस के वर्चस्व में और वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गए विधिवत दुष्प्रचार और तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ-साथ कट्टर गाँधीवादियों द्वारा सुभाष चन्द्र बोस के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देने वाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को ‘सुभाष’ का नाम देने में गर्व महसूस करने लगीं। उनकी कीर्ति का परिचय यह था कि घर-घर में महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का चित्र दिखाई देने लगा।
कॉन्ग्रेस को हमेशा ही सुभाष चन्द्र बोस की क्षमता का पता था
वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस की लोकप्रियता से सर्वाधिक चिंतित पंडित जवाहर लाल नेहरू ही थे। शायद यही वजह है कि नेहरू ने कभी भी सुभाष चन्द्र बोस की मौत की खबरों पर यकीन नहीं किया।
अनुज धर की किताब ‘इंडियाज बिगेस्ट कवर-अप’ में इस बात का खुलासा भी है कि नेहरू आजादी के कई वर्ष बाद भी नेताजी की जासूसी करते रहे। 1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद भी 1968 तक नेताजी के परिजनों पर खुफिया एजेसियों की नजर रखी गई।
किताब में खुलासा किया गया है कि नेताजी के सबसे करीबी भतीजे अमिया नाथ बोस 1957 में जापान गए थे और जब इस बात की जानकारी जवाहर लाल नेहरू को मिली तब उन्होंने नवंबर 26, 1957 को देश के विदेश सचिव सुबीमल दत्ता से कहा कि वे टोक्यो में भारतीय राजदूत की ड्यूटी लगाएँ और यह पता करें कि अमिया नाथ बोस जापान में क्या कर रहे हैं? यही नहीं, उन्होंने इस बात की भी जानकारी देने को कहा था कि अमिया बोस भारतीय दूतावास, या जहाँ तथा कथित रूप से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की अस्थियाँ रखी गई हैं, वहाँ गए थे या नहीं?
गाँधी को दिया राष्ट्रपिता का दर्जा
जुलाई 06, 1944 को आज़ाद हिन्द रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधी जी को सम्बोधित करते हुए नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान नेताजी ने महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहा और महात्मा गाँधी ने उन्हे ‘नेताजी’ कहा था। निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उन्होंने गाँधी जी का आशीर्वाद और शुभकामनाएँ माँगीं। गाँधी जी का कहना था कि आखिर सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी जिद को सच कर दिखाया।
स्वतंत्र भारत की घोषणा
सुभाष चन्द्र बोस ने भारत के आजाद होने के लिए अंग्रेजों की घोषणा का इन्तजार नहीं किया बल्कि अक्टूबर 21, 1943 को आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वयं स्वतंत्र भारत की समानांतर सरकार की स्थापना कर भारत को स्वतंत्र घोषित किया। इस सरकार को कई अन्य देशों ने अपनी स्वीकार्यता दी।
1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था।
वर्ष 1946 के नौसेना विद्रोह में नेताजी की झलक थी। इस विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। कुछ इतिहासकार यह भी बताते हैं कि अंग्रेजों को भारत से अब कुछ नहीं चाहिए था, सिवाए सुभाष के!
ऑल इंडिया रेडियो आर्काइव्स से सुभाष चन्द्र बोस के एक भाषण के अंश –
नोट – इस लेख में वर्णित तथ्य आजाद हिन्द फ़ौज के आधिकारिक डॉक्यूमेंट, सुभाष चन्द्र बोस के पत्र एवं भाषण और उनकी जीवनियों से लिए गए हैं।
कोरोना वॉरियर्स को सलामी देने के लिए भारतीय वायुसेना ने कोलकाता के अस्पतालों के ऊपर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाने की योजना बनाई थी, लेकिन वहाँ पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की इजाजत नहीं मिलने के कारण ये संभव नहीं हो सका। बाकी देश भर में योजनाबद्ध तरीके से यह सलामी दी गई। पूरे देश में 23 स्थानों पर वायुसेना ने फ्रंटलाइन वॉरियर्स को धन्यवाद देते हुए पुष्पवर्षा की।
भारतीय वायुसेना ने अपने अंदाज़ में कोरोना वॉरियर्स को सलामी दी है, उन्हें धन्यवाद दिया है। भारतीय सेना के तीनों अंगों ने मेडिकल कर्मचारियों, पुलिस, सफाईकर्मियों और नागरिकों को कोरोना वायरस आपदा के बीच देशहित में योगदान देने के लिए धन्यवाद दिया। वायुसेना ने फूल बरसाए और फ्लाईपास्ट के जरिए धन्यवाद ज्ञापन किया। श्रीनगर के डल झील के ऊपर से उड़ान भर के भी धन्यवाद दिया गया।
दिल्ली एनसीआर के ऊपर से भी रविवार (मई 3, 2020) को एरियल सैल्यूट देने की योजना बनाई गई है, जो सुबह 10:30 में ही होना था लेकिन मौसम के कारण इसमें थोड़ी देरी की गई। चडीगढ़ के सुखना झील के ऊपर से दो हरक्यूलस स्पेशल ऑपरेशन्स ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ने सलामी दी। पंचकूला में सरकारी अपस्ताल के सामने भारतीय सेना के बैंड ने सलामी दी। गोवा के पणजी स्थित मेडिकल कॉलेज में नौसेना के हेलिकॉप्टर ने सलामी दी।
#WATCH IAF’s Su-30 aircraft flypast in Mumbai to express gratitude towards medical professionals and all frontline workers in fighting COVID19 pic.twitter.com/aQcX1ypKbs
भारतोय सेना के एयरक्राफ्ट्स ने दिल्ली राजपथ के ऊपर से भी सलामी दी। वहाँ नेशनल वॉर मेमोरियल के ऊपर भी फूलों की वर्षा की गई। मुंबई में भी इसी तरह का भव्य नजारा देखने को मिला। वहाँ मैरीन ड्राइव के ऊपर से उड़ान भरी गई।
दिल्ली एनसीआर के अलावा मुंबई, जयपुर, गुवाहाटी, अहमदाबाद, पटना, लखनऊ और श्रीनगर में भी भारतीय वायुसेना ने कोरोना वॉरियर्स को धन्यवाद देने के लिए फ्लाईपास्ट किया। सीडीएस विपिन रावत ने दिल्ली में नेशनल वॉर मेमोरियल पर पूरी क्रिया के अनुसार वीरगति को प्राप्त जवानों को भी श्रद्धांजलि दी।