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शिवाजी की तलवार का इंग्लैंड कनेक्शन: सिर्फ 2000 सैनिकों से साम्राज्य खड़ा करने की कहानी

निडर, पराक्रमी, कुशल, प्रबुद्ध, न्यायप्रिय कुछ ऐसे विशेषण हैं जिनका सीधा पर्याय आज भी बच्चे-बच्चे के लिए सिर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज हैं। आज शिवाजी महाराज की जयन्ती के अवसर पर उनके साहस की गाथाओं को पूरा देश याद कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार के मुताबिक सन् 1630 में 19 फरवरी को ही छत्रपति शिवाजी का जन्म शिवनेर दुर्ग में हुआ था। कई कलाओं में माहिर छत्रपति शिवाजी ने एक कुशल राजा बनने की दिशा में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी। उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कारनामे किए थे, जिन्हें सुनकर ही पता लगता है कि रणभूमि में तो क्या आम जीवन में भी कभी उन्होंने अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया। उनमें एक शेर का व्यक्तित्व बचपन से झलकता था।

बाल्यावस्था- जिस अवस्था में बच्चे अपने माँ-बाप के दिखाए रास्ते पर समाज में उठना बैठना-अभिवादन करने के तौर तरीके सीख रहे होते हैं, उस बाल्यावस्था में शिवाजी से जुड़ा एक किस्सा बहुत मशहूर है। कहा जाता है कि शिवाजी के पिता शाहजी अक्सर युद्ध लड़ने के लिए घर से दूर रहते थे। इसलिए उन्हें शिवाजी के निडर और पराक्रमी होने का आभास नहीं था। इसी अनभिज्ञता के साथ एक बार वे शिवाजी को बीजापुर के सुल्तान के दरबार में ले गए।

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वहाँ शाहजी ने तीन बार झुक कर सुल्तान को सलाम किया और शिवाजी से भी ऐसा ही करने को कहा। लेकिन, शिवाजी अपने पिता को देखने के बावजूद अपना सिर ऊपर उठाए सीधे खड़े रहे और उसी सिर को उठाए-उठाए वो वापस अपने दरबार में चले गए। इस घटना के दौरान ऐसा नहीं था कि शिवाजी अपने पिता की बात का अनादर कर रहे थे। बल्कि उन्हें तो केवल एक विदेशी शासक के सामने सिर झुकाना नागवार था। इस वाकये को देखने के बाद शाहजी को भी अंदाजा हो गया था कि उनका बालक अन्य बालकों की तरह एक तय लीक पर चलने वाला बच्चा नहीं है।

छत्रपति शिवाजी की कुशलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने बतौर शासक अपना जीवन शुरू किया, तब उनके पिता ने उनके लिए सिर्फ़ 2000 सैनिक छोड़े थे। लेकिन, कुछ ही समय में उन्होंने इस संख्या को बढ़ाकर 10,000 कर डाला। उन्हें मालूम था कि एक राजा के लिए उसकी सेना कितनी महत्वपूर्ण होती है। वे कभी अपने सैनिकों को शहीद होने के लिए नहीं उकसाते थे। बल्कि उनकी तो अपनी सेना को सलाह होती थी कि हमेशा संगठित होकर सुरक्षित कदम उठाना चाहिए। जिससे सामने वाला परास्त भी हो जाए और खुद पर आँच भी न आए।

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स्वराज का झंडा बुलंद कर इतिहास में मराठाओं के नाम एक पूरा युग स्वर्णिम अक्षरों से लिखवाने वाले शिवाजी महाराज अन्य राजाओं की तरह अपनी सेना को निजी हथियार देकर नहीं रखा करते थे। उन्हें जितना ख्याल अपनी सेना का था, उससे ज्यादा सजग वे अपनी प्रजा के प्रति थे। उनका सोचना था कि सेना को निजी हथियार नहीं दिए जाएँगे, तो बेवजह आम प्रजा को नुकसान नहीं पहुँचेगा। उनका कहना था कि दुश्मन राज से लूटा गया सारा सामान मराठा खजाने में जमा होगा। उनके निर्देश थे, कभी किसी धार्मिक स्थल और उससे जुड़ी सामग्री को कभी नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा।

छत्रपति शिवाजी बचपन से न्यायप्रिय, धर्मनिरपेक्ष और दयालु थे। बताया जाता है मात्र 14 साल की उम्र से वे ऐसे फैसले लिया करते थे कि बच्चे से लेकर बुजुर्ग व्यक्ति तक उनकी छत्रछाया में खुद को सुरक्षित महसूस करते थे। उन्हें लेकर किस्सा मशहूर है कि एक बार शिवाजी के समक्ष उनके सैनिक किसी गाँव के मुखिया को पकड़ कर लाए। मुखिया बड़ी और घनी-घनी मूछों वाला बड़ा ही रसूखदार व्यक्ति था। लेकिन इस बार उस पर एक विधवा की इज्जत लूटने का आरोप साबित हो चुका था। हालाँकि, इस वाकये के दौरान शिवाजी मात्र 14 साल के थे। मगर उनके मन में महिलाओं के प्रति असीम सम्मान था। उन्होंने तत्काल अपना निर्णय सुनाया और कहा- “इसके दोनों हाथ और पैर काट दो” ऐसे जघन्य अपराध के लिए इससे कम कोई सजा नहीं हो सकती। क्या आज किसी 14 साल के बच्चे से ऐसे विवेक और बुद्धि की अपेक्षा की जा सकती है? शिवाजी के राज में महिलाओं को बंदी बनाने की अनुमति नहीं थी और जो महिलाओं का अपमान करता था उसके लिए मुखिया की तरह कड़ा दंड तय था।

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हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले महाराज शिवाजी को इतिहास के पन्नों में धर्मनिरपेक्ष शासक कहा जाता है। लेकिन फिर भी उनके बारे में ये तथ्य मशहूर है कि महाराश शिवाजी हमेशा उन लोगों की मदद करते थे, जो हिंदू धर्म अपनाने के इच्छुक होते थे। यहाँ तक उन्होंने अपनी बेटी की शादी भी एक ऐसे शख्स से करवाई थी, जिसने हिंदू धर्म अपनाया। वे मुगल शासकों से युद्ध केवल हिंदुत्व की रक्षा करने के लिए करते थे। उन्होंने कभी मुस्लिमों से नफरत नहीं की। लेकिन जब बात हिंदुत्व पर आई तो उन्होंने किसी से समझौता भी नहीं किया। उनकी सेना में कई मुस्लिम सैनिक थे।

आदिल शाह और औरंगजेब से जुड़ा किस्सा

शिवाजी की पैतृक जायदाद बीजापुर के सुल्तान द्वारा शासित दक्कन में थी। बीजापुर के सुल्तान आदिल शाह ने बहुत से दुर्गों से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों सौंप दिया था। 16 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शिवाजी को यकीन हो गया था कि हिन्दुओं की मुक्ति के लिए उन्हें संघर्ष करना होगा। शिवाजी ने अपने विश्वासपात्रों को इकट्ठा कर अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी। जब आदिलशाह बीमार पड़ा तो बीजापुर में अराजकता फैल गई। शिवाजी ने इस मौके लाभ उठाकर बीजापुर में प्रवेश करने का फैसला लिया। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने टोरना किले का कब्जा हासिल कर लिया था।

1659 में आदिलशाह ने अपने सेनापति को शिवाजी को मारने के लिए भेजा। दोनों के बीच प्रतापगढ़ किले पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में शिवाजी की विजय हुई। उनकी बढ़ती ताकत को भाँपते हुए मुगल सम्राट औरंगजेब ने जय सिंह और दिलीप खान को शिवाजी को रोकने के लिए भेजा और उनसे एक समझौते पर हस्ताक्षर करने को कहा। समझौते के मुताबिक उन्हें मुगल शासक को 24 किले देने थे। यहाँ बता दें कि कोंढाणा का किला भी इन्हीं किलों में से एक था, जिसकी टीस में सिंहगढ़ का युद्ध शिवाजी की ओर से उनके सेनापति तानाजी ने लड़ा।

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इस 24 किलों वाले समझौते के बाद शिवाजी एक बार आगरा के दरबार में औरंगज़ेब से मिलने के लिए गए। वह 9 मई, 1666 को अपने पुत्र संभाजी एवं 4000 मराठा सैनिकों के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए, परन्तु औरंगज़ेब ने उन्हें वहाँ उचित सम्मान न दिया। जिस पर शिवाजी ने भरे हुए दरबार में औरंगज़ेब को विश्वासघाती कह डाला। इसके बाद औरंगजेब ने उन्हें एवं उनके पुत्र को ‘जयपुर भवन’ में क़ैद कर दिया। लेकिन 13 अगस्त, 1666 को फलों की टोकरी में छिपकर शिवाजी वहाँ से भाग निकले और रायगढ़ पहुँचे। सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था, जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे।

देखते ही देखते उन्होंने मराठाओं की एक विशाल सेना तैयार कर ली थी। जो स्वराज्य के लिए जान देने को तैयार थे। उन्हीं के शासन काल में गुरिल्ला युद्ध के प्रयोग का भी प्रचलन शुरू हुआ। उन्होंने नौसेना भी तैयार की थी। अप्रैल 1680 को बीमार होने पर उनकी मृत्यु हो गई थी।

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आज उनकी हर तस्वीर में उनके हाथ में उनकी तलवार देखने को मिलती है। कहा जाता है कि उनकी तलवार पर 10 हीरे जड़े हुए थे। जो इस वक्त लंदन में हैं। शिवाजी महाराज की तलवार प्रिंस ऑफ वेल्स एडवर्ड सप्तम को नवंबर 1875 में उनकी भारत यात्रा के दौरान कोल्हापुर के महाराज ने उपहार स्वरूप भेंट की थी। लेकिन कभी भी इस तलवार को वापस लाने के कोशिश नहीं की गई।

‘उसे मत मारो, वही तो सबूत है’: हिंदुओं संजय गोविलकर का एहसान मानो वरना 26/11 तुम्हारे सिर डाला जाता

मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की 26/11 हमले से जुड़ी किताब ‘Let me say it now’ आने के बाद आतंकी अजमल कसाब से जुड़े कई पहलू का खुलासा हो रहा है। उस रात पुलिस ने समझदारी दिखाते हुए कसाब को जिंदा न पकड़ा होता तो आज दुनिया 26/11 के उस हमले को हिंदू आतंकवाद का उदाहरण देकर पेश कर रही होती।

कसाब, अकेला आतंकी था जो जिंदा पकड़ा गया था। उसकी गिरफ्तारी के बाद ही मालूम चला था कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई और आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा चाहते थे कि अजमल बतौर समीर चौधरी मरे। ताकि दुनिया हिंदुओं पर ऊँगली उठाए और इस पूरे हमले को भगवा आतंक करार दिया जा सके। अपने इसी इरादे को पूरा करने के लिए उस रात मुंबई में घुसने वाले दसों आतंकियों की कलाई पर भगवा और लाल रंग का कलावा बाँधा गया था। जिससे उनके हिंदू प्रतीत होने में कोई संदेह न रह जाए।

दसों आतंकियों को भारतीय पते के साथ पहचान पत्र मुहैया कराए गए थे। सभी के पहचान पत्रों पर हिंदू नाम था। ऐसे में अजमल कसाब का जिंदा पकड़ा जाना मुंबई पुलिस के लिए एक बड़ी कामयाबी थी। इसके कारण पूरे मामले में कई खुलासे हुए। अब ये बात तो सब जानते हैं कि कसाब को पकड़ने के लिए पुलिस कॉन्स्टेबल तुकाराम ओंबले ने अपने सीने पर 40 गोली खाई थी। उनके बलिदान के कारण ही कसाब को जिंदा पकड़ा जा सका। लेकिन ये बात बहुत कम लोगों को पता है कि उस रात कसाब को जिंदा पकड़वाने में एक पुलिस इंस्पेक्टर संजीव गोविलकर का भी हाथ था।

जी हाँ। उस रात कॉन्स्टेबल तुकाराम ओंबले की बहादुरी और डीबी मार्ग पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर संजीव गोविलकर की समझदारी ने ही कसाब को जिंदा पकड़वाया। दरअसल, जिस समय कसाब को पकड़ने के लिए
तुकाराम आगे बढ़े, उस समय कसाब ने उनपर बिना रुके गोलिया चलाईं। साथी को घायल देख अन्य पुलिसकर्मी भी बौखला गए और उसे मारने के लिए आगे बढ़े। लेकिन तभी, गोविलकर ने उन्हें समझाया और सलाह दी कि उसे मत मारो, वही तो सबूत है।

इसके बाद कसाब की गिरफ्तारी हुई। यदि उस दिन पुलिसकर्मियों ने आवेश में आकर कसाब को गोलियों से छलनी कर दिया जाता, उसे भी वैसे ही मार गिराते जैसे अन्य आतंकियों को ढेर किया था तो शायद यह आजीवन राज ही रहता कि उस रात हिंदुओं की वेशभूषा में इस्लामिक आतंकी आए थे। सीमा पार से आए इन आतंकियों ने 160 लोगों की जान ली थी और 300 से अधिक लोगों को घायल किया था।

हाथ में कलावा, समीर चौधरी नाम की ID: ‘हिंदू आतंकी’ की तरह मरना था कसाब को – पूर्व कमिश्नर ने खोला राज

नमाज, 1.25 लाख रुपए और बहन की शादी… 26/11 हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकी’ कसाब की कहानी

जहाँ बहाया था खून, वहीं की मिट्टी पर सर रगड़ बोला भारत माता की जय: मुर्दों को देख कसाब को आई थी उल्टी

शरजील ने कबूली हिंसा भड़काने की बात, चार्जशीट हुई फाइल: ‘कन्हैया परमिशन’ में फिर उलझाएँगे केजरीवाल?

CAA के नाम पर दिल्ली जामिया नगर इलाके में पिछले वर्ष 15 दिसंबर को हुई हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने जाँच के बाद और शरजील इमाम के कबूलनामे के बाद कोर्ट में चार्जशीट दायर की है। इस चार्जशीट में 100 गवाहों के बयानों और CCTV फुटेजों को भी शामिल किया गया है। इस मामले में अभी तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

दिल्ली पुलिस ने 15 दिसंबर को जामिया नगर इलाके के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में हुई हिंसा को लेकर 15 फरवरी को एक चार्जशीट दायर कर दी थी। चार्जशीट में हिंसा भड़काने और लोगों के एकत्र करने के मामले में शरजील को भी आरोपी बनाया गया है। वहीं दिल्ली पुलिस को हिंसा मामले में की गई जाँच में 3.2 मिमी पिस्टल का एक खाली कारतूस भी मिला है। चार्जशीट में किसी छात्र का नाम शामिल नहीं किया गया है।

वहीं मामले में दिल्ली पुलिस ने अब तक कुल 17 गिरफ्तारियाँ की हैं, जिनमें 9 न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी से, जबकि 8 गिरफ्तारियाँ जामिया इलाके से की गई हैं। इस मामले में PFI की भूमिका के बारे में भी दिल्ली पुलिस जाँच कर रही है।

दिल्ली पुलिस ने आरोपपत्र में कहा है कि जामिया और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी इलाके में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में कुल 97 लोग घायल हुए थे। पुलिस ने यह भी बताया गया है कि इस दौरान 47 पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। घायलों में आम लोगों के अलावा कई छात्र भी शामिल थे। दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को 100 गवाहों की सूची और उनके बयानों की कॉपी के साथ, सीसीटीवी फुटेज, आरोपितों और अन्य संदिग्धों की फोन कॉल डिटेल और कुछ तस्वीरें भी साक्ष्य के तौर पर पेश किया है।

दूसरी ओर दिल्ली की साकेत कोर्ट ने देशद्रोह के आरोपित और JNU के छात्र शरजील इमाम को 14 दिन के लिए न्यायायिक हिरासत में भेज दिया है। दरअसल CAA विरोध के नाम पर शरजील ने जामिया और AMU में आयोजित धरने पर भड़ाकाऊ भाषण दिए थे। इन भाषणों के खिलाफ में पाँज राज्यों में मुकदमा दर्ज किए गए। वहीं दिल्ली पुलिस ने पिछले महीने शरजील को बिहार के मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तारी के बाद पुलिस पूछताछ में शरजील ने स्वीकार किया कि उसके वीडियो से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। शरजील ने यह भी कबूल किया कि देश में दंगा भड़काने के लिए उसने युवाओं से सड़कों पर उतरने की अपील की थी साथ ही शरजील ने जामिया में हुई हिंसा में भी अपने साथियों के साथ हिस्सा लिया था।

दिल्ली पुलिस द्वारा कोर्ट में शरजील के खिलाफ चार्जशीट दायर करने के बाद अब सवाल खड़ा होता है कि क्या दिल्ली की केजरीवाल सरकार इसके लिए क्या परमिशन देगी? क्योंकि इससे पहले भी देशद्रोह के आरोपित कन्हैया कुमार और उमर खालिद के खिलाफ चार्जशीट की फाइल को अभी तक केजरीवाल सरकार आगे नहीं बढ़ा सकी है।

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शरजील इमाम के बैंक खातों से मिले विदेशी फंडिंग के संकेत, क्राइम ब्रांच ने शुरू की जाँच

‘मेरे पैसे और गिफ्ट वापस कर दो’ – जिसे मिले सिर्फ 7 वोट, उस कैंडिडेट ने वोटरों से लगाई गुहार

हैदराबाद के निजामाबाद से एक बेहद ही हास्यास्पद मामला सामने आया है। यहाँ के एक राजनेता पशम नरसिमलू ने चुनाव हारने के बाद वोटरों के पास जाकर अजीबोगरीब निवेदन किया। दरअसल इन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वोटरों पर काफी अधिक खर्च किया था, मगर इसके बावजूद वो हार गए। इसके बाद उन्होंने वोटरों से कहा कि वो इमानदारी दिखाते हुए उनके दिए पैसे और गिफ्ट वापस कर दें।

नरसिमलू का कहना है कि वह TRS के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन फिलहाल वह पार्टी से दूरी बनाए हुए हैं, क्योंकि निजामाबाद ग्रामीण के विधायक, बाजीराव गोवर्धन ने पिछले कुछ दिनों में उन्हें दरकिनार कर दिया है। इससे पहले वो DCCB और DCMS के निदेशक के रूप में भी काम कर चुके हैं। इस बार उन्होंने निजामाबाद जिले के इंदलवई गाँव में सहकारी चुनाव लड़ा था, जिसमें वो पराजित हो गए। उन्हें मात्र 7 वोट मिले थे।

इसके बाद उन्होंने गाँव के मतदाताओं से कहा कि चुनावी कैंपेन के दौरान उन्होंने जो रकम उन्हें दी थी, वो वापस कर दें, क्योंकि उन्होंने उनको वोट नहीं दिया। चुनाव का नतीजा सामने आने के बाद नरसिमलू ने एक बड़ी पदयात्रा आयोजित की थी। इस दौरान उन्होंने मतदाताओं के घरों में जाकर उन्हें कैश और गिफ्ट दोनों वापस करने के लिए कहा। और हैरानी की बात है कि कुछ मतदाताओं ने कैश वापस भी कर दिए, जबकि कुछ मतदाताओं का कहना था कि उन्होंने उनसे गैर कानूनी रूप से पैसे या गिफ्ट देने के लिए नहीं कहा था।

जानकारी के मुताबिक नरसिमलू ने चुनाव से पहले सभी वोटर्स को 3000 रुपए और हर महिला वोटर को एक साड़ी दी थी। इसके अलावा सभी पुरुषों व महिलाओं के लिए शराब और सॉफ्ट ड्रिंक का इंतजाम किया गया था। 

चुनाव हारने के बाद उनके पैसे वापस माँगने पर कुछ मतदाताओं ने यह कर कर वापस कर दिया कि वो ऐसा ‘मानवीय आधार’ पर कर रहे हैं, जबकि अधिकांश लोगों ने यह कर मना कर दिया कि उन्होंने पैसे नहीं माँगे थे। उन्होंने एक उम्मीदवार के तौर पर स्वेच्छा से ये रकम और गिफ्ट उन्हें दी थी। दिलचस्प बात यह है कि उनकी पत्नी वर्तमान में इंदलवाई की सरपंच हैं, जबकि नरसिमलू ने खुद लगभग तीन दशकों तक PACS के अध्यक्ष के रूप में काम किया है और वो इस तरह की बातें कर रहे हैं।

डेक्कन क्रॉनिकल से बात करते हुए पासम नरसिमलू ने कहा कि वह मतदाता के फैसले का पालन करेंगे। आगे उन्होंने कहा, “मैंने 1981 से प्राथमिक कृषि सहकारी समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। लेकिन मतदाताओं ने मुझे इस बार हराया। लोग मेरी हार के कारणों को जानते हैं।”

गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण देने के लिए बनेगा कानून: योगी आदित्यनाथ कैबिनेट ने दी मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को केंद्र सरकार की तर्ज पर गरीब सवर्णों को नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून बनाने का फैसला किया। प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की फीस भरपाई का निर्णय भी इस बैठक में लिया गया। बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर के निर्माण परियोजना कार्य को भी इस कैबिनेट बैठक में मंजूर किया गया। इसके अलावा प्रदेश के पूर्व सभी मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगला देने की व्यवस्था को समाप्त कर और गोवंश की रक्षा के लिए संस्थाओं को दोगुनी मदद देने जैसे फैसले भी कल की बैठक के दौरान लिए गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के लिए प्रस्तावित कानून से संबंधित विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी गई। इस विधेयक का नाम यूपी लोक सेवा (आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण) विधेयक-2020 है। इस विधेयक को इसी बजट सत्र में पास कराकर राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। अभी तक यह आरक्षण प्रदेश में केवल शासनादेश के जरिए लागू किया गया था।

इस बैठक में गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए बनाए जाने वाले कानून के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। जैसे कैबिनेट ने चालू वित्तीय वर्ष-2019-20 में प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्र-छात्राओं की फीस भरपाई के लिए 1 अरब 75 करोड़ 37 लाख 42 हजार रुपए देने का फैसला किया ।

कैबिनेट ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के 500 बेड के बाल रोग अस्पताल के लिए 284 करोड़ रुपए लागत की निर्माण परियोजना मंजूर की है। यह संस्थान पूर्वी यूपी में व्याप्त संक्रामक रोगों और जापानी बुखार पर नियंत्रण करने के लिए सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराएगा।

मंत्रिमंडल की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगले देने की व्यवस्था को समाप्त करने का फैसला किया गया। इसके लिए कैबिनेट बैठक में राज्य संपत्ति विभाग के नियंत्रणाधीन भवनों के आवंटन के संबंध में संशोधन विधेयक-2020 के मसौदे को मंजूरी दी गई।

कैबिनेट ने फैसला किया कि अब मंडी परिषद चैरिटेबिल संस्थाओं को निराश्रित गोवंश की रक्षा के लिए आर्थिक मदद 2 फीसदी से बढ़ाकर 4 फीसदी कर सकेंगी।

इसके साथ ही प्रदेश में औद्योगिक या कृषि प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना को प्रोत्साहित करने हेतु तथा कच्चे माल के रूप में प्रयोग किए जाने वाले कृषि उत्पादन या उत्पादन की मार्केटिंग के लिए भी यूपी कृषि उत्पादन मंडी एक्ट-2064 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।

कैबिनेट ने पुलिस आयुक्त गौतमबुद्धनगर के कार्यालय के लिए नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराए गए भवन में बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए 76.96 लाख रुपए नोएडा विकास प्राधिकरण को देने का फैसला किया है। 

10% आरक्षण पर अभी नहीं लगेगी कोई रोक : सुप्रीम कोर्ट

कैबिनेट की मुहरः सामान्य वर्ग को 10% आरक्षण देने वाला तीसरा राज्य बना यूपी

जहाँ बहाया था खून, वहीं की मिट्टी पर सर रगड़ बोला भारत माता की जय: मुर्दों को देख कसाब को आई थी उल्टी

आतंकी के एक हाथ में कलावा और फिर उन्हीं हाथों से थामे एके-47, हिंदू के नाम का पहचान पत्र, और फिर हिरासत में आने पर आसानी से भारत माता की जय बोलना, यह सब दिखने और सुनने में भले ही आसान लग सकता है, लेकिन इसे समझना इतना आसान नहीं था। 26/11 के हमलावरों को हिंदू आतंकवाद साबित करने की यह एक साजिश थी, जो नाकाम हो गई। इस बात का खुलासा तत्कालीन मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने अपने द्वारा लिखी एक किताब में किया है।

राकेश मारिया ने ‘Let Me Say It Now’ नाम की लिखी अपनी एक किताब में एक नहीं बल्कि ऐसे कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। मारिया की किताब ने उन कई रहस्यों से भी परदा उठाया है, जो अभी तक सिर्फ एक राज बने हुए थे। किताब में राकेश मारिया ने लिखा है कि सुबह साढ़े चार बजे वो कसाब से कहते हैं कि वो अपना माथा ज़मीन से लगाए… और उसने ऐसा ही किया। इसके बाद जब कसाब खड़ा हुआ तो राकेश मारिया ने कहा, “भारत माता की जय बोल” कसाब ने फिर ऐसा ही किया। मारिया दोबारा भारत माता की जय बोलने के लिए कहते हैं और ऐसा ही करता है। तब के पुलिस कमिश्नर मारिया कसाब को शव-गृह भी ले गए थे, जहाँ उसे मुर्दों को देख कर उल्टी आ गई थी।

पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने किताब में लिखा है कि कसाब को पाकिस्तानी आकाओं की ओर से हिंदू बनाकर भेजा गया था और मुंबई हमले को हिंदू आतंकी हमले की तरह पेश किए जाने की योजना थी। इसके लिए उसे बेंगलुरु के हिंदू निवासी के तौर पर पेश करने की योजना थी और समीर दिनेश चौधरी नाम का आईडी कार्ड देकर भारत भेजा गया था। इतना ही नहीं, उसके एक हाथ में कलावा भी बांधा गया था, जिससे साफ हो सके कि हमला करने वाले आतंकी हिंदू हैं, लेकिन यह सभी योजना काम नहीं आ सकी और आख़िर में उसकी पहचान पाकिस्तान के फरीदकोट के रहने वाले अजमल आमिर कसाब के तौर पर उजागर हो गई। यहाँ तक कि उसने खुद अपना गुनाह भी कबूल कर लिया था।

मारिया की किताब में यह भी दावा किया गया कि आतंक के आकाओं ने कसाब को बताया था कि भारत में मुस्लिमों को नमाज नहीं पढ़ने दी जाती, लेकिन जब कसाब को मेट्रो सिनेमा के पास एक मस्जिद में ले जाया गया तो वह मस्जिद देखकर बेसुध हो गया। जब उसने अपने लॉकअप से पाँच वक्त की नामज की आवाज सुनी, तो उसे अपनी गलतियों का धीर-धीरे अहसास हो गया।

किताब में लिखा गया है कि इसके बाद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम को कसाब को मारने की सुपारी दी थी, क्योंकि उसे डर था कि अब पाकिस्तान की करतूतें सामने आ सकती हैं। किताब में यह भी जिक्र है कि हमले पर भेजे जाने से पहले कसाब को 1.25 लाख रुपए और एक हफ्ते की छुट्टी मिली थी। इन पैसों को कसाब ने अपनी बहन की शादी के लिए परिवार को दिए थे।

राकेश मारिया ने आतंकी अजमल कसाब से जुड़ा एक और खुलासा किया है कि कसाब की तस्वीर को मुंबई पुलिस ने नहीं बल्कि केंद्रीय एजेंसियों ने लीक किया था, जबकि मुंबई पुलिस तो कसाब की पहचान उजागर ही नहीं होने देना चाहती थी।

गौरतलब है कि कसाब सहित 10 आतंकियों ने समुद्र के रास्ते मुंबई में प्रवेश कर ताज होटल, नरीमन हाउस, छत्रपति शिवाजी समेत कई स्थानों को अपना निशाना बनाया था। इस हमले में 166 बेगुनाह लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 308 से अधिक लोग घायल हुए थे। सेना ने कार्रवाई में कसाब को छोड़कर सभी को मौके पर ही मार गिराया गया था। बाद में कसाब को दोषी पाए जाने पर उसे 21 नवंबर 2012 को पुणे जेल में फाँसी दे दी गई थी। वह पहला विदेशी था, जिसे भारत में फाँसी दी गई थी। 

नमाज, 1.25 लाख रुपए और बहन की शादी… 26/11 हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकी’ कसाब की कहानी

हाथ में कलावा, समीर चौधरी नाम की ID: ‘हिंदू आतंकी’ की तरह मरना था कसाब को – पूर्व कमिश्नर ने खोला राज

बीफ करी और ब्रेड बाँटा कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने, वो भी पुलिस स्टेशन के सामने: ‘गौमांस राजनीति’ शुरू

केरल में एक बार फिर बीफ पॉलीटिक्स शुरू हो गई है। कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को कोझीकोड जिले के मुक्कम पुलिस स्टेशन के सामने बीफ करी और ब्रेड का वितरण किया। कार्यकर्ताओं ने यह प्रदर्शन उस खबर के बाद किया, जिसमें कहा गया है कि केरल पुलिस ट्रेनियों के मेन्यू से बीफ हटा दी गई है। राज्य के कई पुलिस कैंप में प्रशिक्षण शुरू होने के बाद नया मेन्यू जारी किया गया है।

केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (KPCC) के सचिव के प्रवीण कुमार ने बीफ करी-ब्रेड बाँटने के अभियान की शुरुआत की। के प्रवीण कुमार का कहना है कि यह केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति झुकाव को दिखाता है। उन्होंने सीएम के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर लोकनाथ बेहरा को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) बनाया।

कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि गुजरात दंगा मामले में लोकनाथ बेहरा ने पीएम मोदी और अमित शाह को क्लीन चिट दी थी। और अब डीजीपी लोकनाथ बेहरा, पिनराई के साथ मिलकर आरएसएस के एजेंडे को लागू कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस पूरे राज्य में पिनराई के दोहरे रुख का खुलासा करेगी। 

वहीं इस हफ्ते की शुरुआत में केरल पुलिस विभाग ने नए पुलिस ट्रेनी के मेन्यू में से बीफ हटाने की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए आधारहीन बताया था। केरल पुलिस द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “मेस कमेटी, जिसमें प्रशिक्षुओं के प्रतिनिधि और पुलिस अधिकारी शामिल हैं, को निर्देश दिया गया है कि वो अपने-अपने क्षेत्रों में उपलब्ध भोजन के आधार पर स्वस्थ आहार का मेन्यू तैयार करें। इसके पीछे का उद्देश्य यह था कि उन्हें आहार के माध्यम से वो ऊर्जा प्राप्त हो, जो उन्हें चाहिए।”

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जहाँ राम, वहीं शिव… और श्मशान है शिव का निवास स्थान: समुदाय विशेष के ‘कब्रिस्तान प्रपंच’ को संत समिति का जवाब

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार द्वारा गठित राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास की पहली बैठक बुधवार (फरवरी 19, 2020) को राजधानी दिल्ली में में होगी। जिसमें मंदिर निर्माण के मुहूर्त समेत कई विषयों पर विचार किया जा सकता है। यह बैठक सुप्रीम कोर्ट में रामलला के वकील रहे केशवन अय्यंगार परासरण के ग्रेटर कैलाश स्थित घर पर होगी। इस बैठक का मुख्य एजेंडा मंदिर निर्माण की तिथि और तौर-तरीकों के साथ-साथ, नए सदस्यों का चुनाव होगा। इसमें उस सुझाव के बारे में चर्चा की जा सकती है कि मंदिर निर्माण के लिए आम जनता से सहयोग राशि ली जानी चाहिए या नहीं।

इस बैठक से पहले अखिल भारतीय संत समिति ने मुस्लिम पक्षकारों के उस आपत्ति को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि 67 एकड़ भूमि के करीब 4 से 5 एकड़ भूमि पर मजहब विशेष की कब्रें थी। इसलिए वहाँ पर राम मंदिर का निर्माण नहीं किया जना चाहिए। यह चिट्ठी अयोध्या जमीन विवाद में मुस्लिम पक्ष के वकील रहे एमआर शमशाद ने 9 मुस्लिमों की तरफ से नव-नियुक्त श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र को पत्र लिखा था। इसका जवाब देते हुए समिति के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि अधिकृत भूमि पर जब राम मंदिर बनेगा तो वहाँ उनके इष्ट देव शिव भी होंगे और सबको पता है कि शिव के निवास का एक स्थान श्मशान भी है, इसलिए मुस्लिम पक्ष को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए

बता दें कि इससे पहले अयोध्या के डीएम अनुज झा ने भी इस चिट्ठी पर जवाब देते हुए कहा था कि फिलहाल राम जन्मभूमि के 67 एकड़ के परिसर में कोई कब्रिस्तान नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि अयोध्या मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इन सभी बातों का जिक्र किया गया था। वकील शमशाद जिस तथ्यों की बात कर रह हैं, वो भी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान सामने आई थी। 9 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में इन सभी तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

इस चिट्ठी में ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए कहा गया था कि साल 1855 के दंगों में 75 मुस्लिम मारे गए थे और सभी को यहीं दफन किया गया था। अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री इस पर कहते हैं कि अब जबकि देश की सर्वोच्च अदालत ने राम मंदिर के पक्ष में निर्णय सुनाया है तब मुस्लिम पक्ष परंपराओं और तर्कों का हवाला दे रहे हैं। अगर मुस्लिम पक्ष इसे सही मानता है तो उसे अन्य विवादित स्थलों से भी अपना दावा छोड़ देना चाहिए, क्योंकि पैगंबर मोहम्मद साहब ने खुद विवादित स्थल पर बनी मस्जिद को तुड़वा कर एक आदर्श पेश किया था। 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सालों बाद 9 नवंबर 2019 को राम मंदिर का मुद्दा सुलझा दिया। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार ने राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट का गठन भी कर दिया।

मगर ऐसा लग रहा है कि राम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू होने से पहले मुस्लिम पक्ष साजिश के तहत एक और भावनात्मक पेंच फँसाने की कोशिश कर रही है। हालाँकि उन्हें इसका माकूल जवाब भी मिल रहा है। एक तरफ जहाँ डीएम ने 67 एकड़ के परिसर में कोई कब्रिस्तान न होने की बात कही तो वहीं संत समिति ने कहा कि अगर है भी तो भी कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि भगवान शिव का एक निवास स्थल शमशान भी है और वो राम के इष्ट हैं। इसलिए उन्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।

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स्कूल ड्रेस में कमल फूल का लोगो बर्दाश्त नहीं: TMC नेताओं ने मचाया हल्ला-हंगामा, प्रशासन ने लिया हटाने का फैसला

पश्चिम बंगाल के एक स्कूल की यूनिफॉर्म पर कमल फूल का लोगो होने के कारण विवाद हो गया। टीएमसी नेताओं ने इस लोगो को यूनिफॉर्म से हटाने के लिए स्कूल के गेट पर जमकर प्रदर्शन किया। विरोध का स्तर इस बीच इतना बढ़ गया कि स्कूल प्रशासन ने कमल के लोगो को अपने स्कूल की ड्रेस से हटाने का फैसला ले लिया।

एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले पर जानकारी देते हुए टीचर इंचार्ज बिजली दास ने बताया कि वे पिछले 11-12 सालों से इस लोगो का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि कमल राष्ट्रीय फूल है। लेकिन अब जब कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं, तो उन्होंने इसे यूनिफॉर्म से हटाने का फैसला किया है। उनके मुताबिक वे अब अपने स्कूल की ड्रेस पर सर्व शिक्षा मिशन के लोगो का इस्तेमाल करेंगे।

टीचर इंचार्ज के मुताबिक, जिन लोगों ने यूनिफॉर्म पर कमल फूल देखकर विरोध किया, उनमें तृणमूल कॉन्ग्रेस के काउंसलर भी शामिल हैं। स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिता ने कमल के लोगो पर कोई आपत्ति नहीं जताई है।

गौरतलब है कि राज्य में इस मामले को आधार बनाकर राजनीति शुरू हो गई है। तृणमूल की सरकार ने इसे भाजपा की चाल बताते हुए स्कूल संचालन समिति के साथ मिलकर अपना प्रचार-प्रसार करने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर भाजपा ने तृणमूल के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

वहीं, विरोध करने वालों में से एक, रेखा सेनगुप्ता का इस मामले पर कहना है कि शिक्षा क्षेत्र राजनीति से मुक्त होना चाहिए। यह राजनीति करने की जगह नहीं है। उनके मुताबिक, हाल ही में उन्होंने यूनिफॉर्म पर कमल का लोगो देखा। बीजेपी का प्रतीक कमल है। इसलिए इसे तुरंत यूनिफॉर्म से हटा दिया जाना चाहिए।

जानकारी के लिए बता दें नियमों के अनुसार, स्कूल यूनिफॉर्म में मोटो होता है और स्कूल इसके बगल में अपने स्वयं के लोगो का उपयोग करने का हकदार है। शर्त ये होती है कि लोगो को पंजीकृत किया जाना चाहिए और इसका उपयोग केवल ड्रेस पर नहीं बल्कि अन्य संबंधित सामग्री पर भी किया जाना चाहिए। लेकिन विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का आरोप है कि स्कूल ने कमल के लोगो का उपयोग केवल यूनिफॉर्म पर किया। हालाँकि, आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक स्कूल प्रिंसिपल ने गलती को स्वीकार किया है और इसे बदलने का फैसला किया है।

नमाज, 1.25 लाख रुपए और बहन की शादी… 26/11 हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकी’ कसाब की कहानी

लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों द्वारा 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर किए गए आतंकी हमले में मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया ने खुलासा किया है कि जीवित पकड़ा गया आतंकी अजमल आमिर कसाब ऐसी योजना बनाकर आया था कि यह हमला एक हिंदू आतंकी साजिश लगे। कलाई पर लाल कलावा बाँधे और फर्जी पहचान पत्रों के जरिए वह मरने के बाद खुद की पहचान बंगलुरू के समीर चौधरी के रूप में करवाने की तैयारी में था। इससे मीडिया में यह प्रचारित किया जाता कि मुंबई पर हिंदू आतंकियों ने हमला किया है। लेकिन वह जीवित पकड़ा गया और उसके आकाओं की यह चाल विफल हो गई।

मुंबई आतंकी हमले को ‘हिंदू आतंकवाद’ के रूप में पेश करने की लश्कर की योजना का ब्यौरा देते हुए मारिया ने लिखा, “यदि सब कुछ योजना के अनुसार होता, तो कसाब चौधरी के रूप में मर जाता और मीडिया हमले के लिए ‘हिंदू आतंकवादियों’ को दोषी ठहराती।” हालाँकि उसकी यह योजना धरी की धरी रह गई।

इसके साथ ही मारिया ने अपनी किताब में खुलासा किया कि मुंबई पर हमला करने के लिए कसाब को मिशन पर भेजे जाने से पहले एक हफ्ते की छुट्टी और 1.25 लाख रुपए (पाकिस्तानी रुपए) दिए गए थे। कसाब ने वह पैसे अपनी बहन की शादी के लिए अपने परिवार को दे दिया था। इतना ही नहीं कसाब को पाकिस्तान में बैठे उसके आकाओं ने इस तरह ब्रेन वॉश किया था उसे भारत मे हर कोई दुश्मन लगे और जिहाद कर मरने के बाद जन्नत नसीब हो।

इसके बाद उसका मानना था कि हिंदुस्तान में मुस्लिम बुरे हालात में हैं। उन्हें नमाज नहीं पढ़ने दी जाती, मस्जिदों में ताले लगे होते हैं। लेकिन, जब उसने लॉकअप में पाँचों वक्त की नमाज सुनी, तो हैरान रह गया। ये उसकी कल्पना के बाहर की चीज थी। एक दिन जाँच अधिकारी कसाब को लेकर मेट्रो जंक्शन के नजदीक वाले मस्जिद में गए, जहाँ सैकड़ों की संख्या में लोग सड़क पर नमाज पढ़ रहे थे। यह देखकर कसाब को विश्वास ही नहीं हुआ।

वहीं इस किताब पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “पहली बात तो ये कि मारिया ने ये सब बात अभी क्यों बोला। जब वो पुलिस कमिश्नर थे, तब उन्हें ये सब बातें बोलनी चाहिए। वास्तव में सर्विस रूल्स के अनुसार, अगर कोई जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के पास है तो उन्हें उसके ऊपर एक्शन लेना चाहिए था। मेरे ख्याल से बहुत गहरी साजिश रची गई थी कॉन्ग्रेस द्वारा, UPA द्वारा। झूठ और फरेब का एक और नमूना उस समय हमने देखा था, जब उन्होंने पूरी तरीके से झूठा हिंदू टेरर… चिदंबरम साहब के कहने पर खड़ा करने की कोशिश की थी।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं निंदा करता हूँ कॉन्ग्रेस का और सभी उन लोगों का, जिन्होंने हिंदू टेरर के झूठे आरोपों से उस समय देश को गुमराह करने की कोशिश की थी। उसका खामियाजा उन्हें 2014 में और 2019 में… देश की जनता ने उन्हें पूरी तरह से हराया। मैं समझता हूँ टेरर का कोई धर्म नहीं होता। टेररिस्ट, टेररिस्ट होता है और झूठे आरोपों पर कुछ लोगों को जो फँसाने की कोशिश कॉन्ग्रेस ने की थी, उसकी हमारी सरकार घोर निंदा करती है।”

भाजपा नेता राम माधव ने कहा, “पुस्तक के माध्यम से एक बड़ा खुलासा हुआ है। इसमें बताया गया है पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा की गई साजिश सफल नहीं हो सकी, लेकिन कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं और अन्य लोगों द्वारा इसे सफल बनाने की कोशिश उस समय किए गए थे। कुछ बुद्धिजीवियों ने मुंबई आतंकवादी हमले को आरएसएस से जोड़ने का प्रयास किया था, उन्हें कॉन्ग्रेस नेताओं का समर्थन प्राप्त था।”

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