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असम के NRC में 80 लाख घुसपैठिए, जिहादी: SC में APW, कहा- दोबारा से सत्यापित की जाए पूरी प्रक्रिया

असम पब्लिक वर्क्स (APW) नामक एनजीओ ने मंगलवार (18 फरवरी) को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया। इसमें दावा किया गया है कि असम की राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) में करीब 80 लाख विदेशियों के नाम शामिल हैं। कुछ ऐसे जिहादी भी शामिल हैं जो पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं। इसके आधार पर एनजीओ ने राष्ट्रीय नागरिक पंजी की पूरी प्रक्रिया के शत-प्रतिशत पुन:सत्यापन का अनुरोध शीर्ष अदालत से किया है।

एनजीओ के प्रमुख अभिजीत शर्मा ने कहा, “अजहरुद्दीन, रंजीत अली, लुइत जमी-उल जमाल और मुक़द्दर इस्लाम- ये उन गिरफ्तार जिहादियों के नाम हैं, जिन्हें एनआरसी के माध्यम से भारतीय नागरिक घोषित किया गया है। इन चारों जिहादियों के नाम NGO ने पहले ही दे दिया था। चारों ने अधिकारियों को धोखा देकर NRC के तहत भारत की नागरिकता ले ली थी। हम बार-बार इन गलतियों को दर्शा रहे हैं और लगातार अधिकारियों को इन्हें सुधारने के लिए बोल रहे हैं।”

दरअसल, दिल्ली पुलिस ने 25 नवंबर को उपर्युक्त चारों को दिल्ली पर हमले की योजना बनाने और गोलपारा रास महोत्सव में विस्फोट करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। आपको बता दें कि, APW वह संगठन है, जिसकी याचिका पर वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने असम में NRC को अपडेट करने के निर्देश जारी किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, APC ने पिछले साल 31 अगस्त को प्रकाशित NRC सूची को चुनौती देते हुए हलफनामा दायर किया था।

इसके अलावा, हलफनामे में शीर्ष अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि वह एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान होने वाली कथित विसंगतियों और भ्रष्टाचार की जाँच के लिए एक न्यायिक समिति बनाई जाए। ताजा हलफनामे में एपीडब्ल्यू ने एनआरसी के दौरान अनियमितताओं की जॉंच सीबीआई, एनआईए और ईडी जैसी एजेंसियों से कराने की अनुमति देने की भी अपील सुप्रीम कोर्ट से की गई है।

आपको बता दें कि असम देश का पहला और इकलौता राज्य हैं, जहाँ NRC लागू किया गया है। असम में 33 जिले हैं, इनमें से 9 जिलों में मुस्लिम आबादी आधी से ज्यादा है। बताया जाता है कि इन्हीं जिलों में बीते दशकों से बांग्लादेशियों की घुसपैठ काफी हुई है। हालाँकि, NRC की फाइनल लिस्ट को लेकर बहुत से सवाल खड़े हुए हैं।

दरअसल असम सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की फाइनल लिस्ट में 19 लाख लोग अपनी जगह नहीं बना पाए थे। एनआरसी के समन्‍वयक प्रतीक हजारिका ने बताया था कि कुल 3,11,21,004 लोग इस लिस्‍ट में जगह बनाने में सफल हुए हैं। उन्‍होंने कहा कि एनआरसी की फाइनल लिस्‍ट से 19,06,657 लोग बाहर हो गए हैं। एनआरसी बाहर से किए गए लोगों को अब तय समय सीमा के अंदर विदेशी न्यायाधिकरण के सामने अपील करनी होगी। एनआरसी लिस्‍ट को बनाने की प्रक्रिया 4 साल पहले शुरू हुई थी और सरकार ने तय समय के भीतर इस सूची को जारी कर दिया था।

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फेक न्यूज वाले पत्थर-विज्ञानी गंजे ने बताई पत्थर से वॉलेट बनाने के 101 तरीके

पत्थर शब्द सुनते ही हमें पाषाण युग, पुरापाषाण युग और नवपाषाण युग से ले कर ‘पत्थर के सनम तुझे हम ने मोहब्बत का खुदा माना’ और ‘पत्थर के फूल’ की भी याद आती है। फिर पत्थरों से हमें पहाड़ों की याद आती है जिसके बारे में अमर उजाला ने बताया था कि ‘फलाने गाँव की नवयुवतियाँ होतीं हैं सबसे हॉट’ कह कर कई पहाड़ी नवयुवकों के आक्रोश का पात्र बना था। और हिमालय को तो हम सब जानते ही हैं जो कि पहाड़ों का राजा है, वो भी पत्थरों से ही बना है।

हालाँकि, कालांतर में एक कम बालों वाले जीव का भारतभूमि पर अवतरण हुआ और उन्होंने प्रस्तर एवम् शिला विज्ञान में अपने बेडरूम में मनोरंजन हेतु दैनिक कार्य पर रखे निजी हमसफर भालू से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। कहा जाता है कि कई युगों के बीत जाने के पश्चात भी बेरोजगारी झेलते पाषाणविज्ञानी ने कलिकाल में दिल्ली नामक प्रदेश में घुँघराले बालों वाले एक जीव की मदद से सॉल्ट न्यूज नामक संस्था की आधारशिला रखी। देखिए, आधारशिला में भी पत्थर होता है।

इसी समय, भारत के कई प्रदेशों में एक खास तरह के लोगों में पत्थर को ले कर उत्सुकता हुई। हालाँकि, इस कालखंड में जहीर खान से ले कर जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद शमी जैसे लोग अपने हाथों से अपने देश का नाम क्रिकेट नामक क्रीड़ा में ऊपर ले जा रहे थे, परंतु कुछ नवोन्मेषी लम्पटाधीशों द्वारा इन खास तरह के लोगों को हाथ का एक तीसरा इस्तेमाल भी बताया गया।

कहते हैं कि शिव और शारदा से ले कर बौद्ध दर्शन के केन्द्र रहे, कश्यप मुनि की धरती कश्मीर में नवजात शिशुओं से ले कर प्रौढ़ पुरुषों तक को पत्थर का यह उपयोग बताया गया। उपयोग में यूँ तो सतही तौर पर कोई प्रक्षेपण विज्ञान नहीं था, लेकिन एक खास तरह के स्कूल में पत्थरों के प्रक्षेपण की तकनीक विकसित की गई और उसे पूरे देश में प्रसारित किया गया। वैसे, इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है कि पत्थर प्रक्षेपण की तकनीक भारत से अरब में गई, या अरब से भारत में आई।

इस तकनीक में हाथों के अलावा कपड़े के एक टुकड़े का गले में लटका होना अत्यंत ही आवश्यक या अपरिहार्य बताया गया था। हमने जब एक पाषाण प्रक्षेपण विज्ञानी से इस विषय पर चर्चा की तो उन्होंने बताया, “देखिए अजीत जी ब्रो! थीटा-बीटा वाला हिसाब लगाएँगे, या त्रिकोणमीति का प्रयोग करेंगे तो आप पाएँगे कि रुमाल से शरीर को मदद की जगह उल्टे एयर रेजिस्टेंस यानी वायु प्रतिरोधन से प्रक्षेपण की गति कम ही करता है। परंतु, यहाँ आप जिस बात की सामान्यतः उपेक्षा कर देते हैं वो यह है कि यही रुमाल जब प्रक्षेपक (जिसे बोलचाल की भाषा में पत्थरबाज, या कल से वॉलेटबाज भी कहा जाता है) के नाक पर अटक जाता है, तो उसमें त्वरित आत्मविश्वास का संचार होता है। जैसे कि आप कार चला रहे हैं और आपको विडियो गेम वाला नाइट्रस बूस्ट मिला जाए।”

मैं उनका मुँह ताकने लगा कि ये क्या बेहूदी बात कही जा रही है, लेकिन उन्होंने आगे बताया तो मेरी समझ में पूरी बात आ गई, “मैं आपको तोड़ कर समझाता हूँ अजीत जी ब्रो… नाक पर रुमाल लगाते ही आपका चेहरा छुप जाता है। भीड़ में आप नर हैं या मादा, यह भ्रम भी उत्पन्न हो सकता है। यह भ्रम उत्पन्न न भी हो तो आप विश्व के चार अरब नरों में से कोई भी हो सकते हैं, आपको कोई पहचान नहीं पाएगा। जैसे ही, पहचान का एंगल बाहर जाता है, पत्थर के प्रक्षेपण में व्यक्ति स्वयं को भूल कर, पूरी स्वतंत्रता से, खुले विचारों के साथ अभिव्यक्त कर पाता है।”

“ओह! लाइक दैट!” मैंने जब जवाब दिया तो उन्होंने कहा, “आई नो, राइट…”

यह तकनीक कश्मीर से होते हुए भारत के हर उस इलाके में पहुँच गई जहाँ इस खास तरह के लोग रहते हैं। उन लोगों ने भी अपने घरों में, खास तरह के स्कूलों में, खास तरह के लोगों के साथ इस प्रक्षेपण विज्ञान को साधा। यह तकनीक बच्चे सीखते रहे, अपने घरों पर भी ड्रोन फुटेज के अनुसार पत्थर जमा कर के रखते देखे गए और कई बार ‘बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है’ कह कर उनके गाँवों से गुजरने वाले काँवड़ियों पर भी फेंक कर इसमें महारत पाई।

लेकिन, किन्हीं कारणों से इनके इस वैज्ञानिक उपलब्धि पर कोई चर्चा नहीं हुई। फिर इन लोगों ने ‘अपना टाइम आएगा’ का इंतजार किया जो जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 2019 में प्रतिफलित होता दिखा। यूँ तो जामिया का मतलब यूनिवर्सिटी कहा गया है, लेकिन दिसम्बर के दूसरे सप्ताह में वहाँ इस पुरातन कला का जम कर प्रयोग हुआ। आगजनी हुई, कट्टे चले, दंगे की स्थिति बनी और बाद में एक दिशाहीन बाग का उदय हुआ जिसने हिन्दूघृणा के नए आयाम गढ़े।

यूँ तो पूरा फुटेज तौहीन बाग ही 55 दिन तक खाता रहा, लेकिन तीन दिन पहले कुछ चलचित्रों के जनसामान्य के पास पहुँचने से इस पाषाण क्रीड़ा के ‘इनडोर’ में भी प्रयुक्त होने के प्रमाण मिलने लगे। अमूमन, इतिहासकारों का दावा है कि इसे क्रिकेट की तर्ज पर बाहर ही खेला जा सकता है क्योंकि भीतर में जगह की कमी होती है। परंतु, नए-नए, उच्च गुणवत्ता के चलचित्रों के आम जनता में पहुँचते ही इसके इनडोर में भी होने के दावे होने लगे।

तभी, लम्बे समय से चुटकुलों और इंटरनेट पर घूमते मीमों का फैक्टचेक करता प्राणी अपने भालू के साथ सोशल मीडिया पर प्रकट हुआ और अपने प्रस्तर एवम् शिला विज्ञान की डिग्री दिखाता हुआ अपने सहकर्मियों से बोला, “पत्थर! अबे, ये तो वॉलेट है, वॉलेट!” एक सहकर्मी ने जब इस पर आपत्ति जताई तो कम बालों वाले प्राणी ने कहा, “मैंने कहा कि वॉलेट है, अब इसमें तुम हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, गूगल, एचडी, क्रोमा, फ्लैट, लीनियर, लहसुन आदि छिड़काव करते हुए हजार शब्दों का आर्टिकल लिखो और साबित करो कि वॉलेट है। और हाँ, मार्च आ रहा है, तुम्हारा इन्क्रीमेंट इसी पर निर्भर करेगा कि ये वॉलेट बन पाता है कि नहीं।”

पैसा किसे प्रिय नहीं है! सॉल्ट न्यूज के कर्मचारी ने बाकायदा, इन सारे शब्दों का प्रयोग करते हुए, बस एक्सीलेरेशन और टॉर्क जैसी बातें नहीं बताईं, बाकी सारा विज्ञान समझा दिया कि लम्बे बालों वाले जामिया लाइब्रेरी में चहलकदमी करते लौंडे के हाथों में वॉलेट ही है। वहीं मेरी टीम के एक एडिटर अजित झा का मानना है कि अगर उचित पैसा और समय दिया जाता तो वो लाइब्रेरी को चम्पारण मीट स्टॉल भी साबित कर सकते थे। मैंने पूछा कैसे, तो उन्होंने ‘ब्रो कोड’ का बहाना बनाते हुए बात को टाल दिया।

तो पत्थर बन गया वॉलेट। रवीश ने भी अपने गुप्त सूटकेस से ‘सॉल्ट न्यूज की जय हो’ वाला कैसेट निकाल कर प्रोफाइल पर बजा दिया। लोग कसमें वादे खाने लगे, कुछ नारियों ने गॉड को याद करते हुए यहाँ तक कह दिया कि ‘सॉल्ट न्यूज’ न होता तो पता नहीं क्या होता।

लेकिन किसी की हाय लग गई गंजे को। दो घंटे के भीतर चलचित्र प्रेमियों ने ऐसे ही कई वॉलेटधारियों को ढूँढ निकाला। इन चित्रों में यह पाया गया कि जामिया के पाषाण प्रक्षेपक अपने वॉलेट से ही हमला कर देते हैं। कई जगह दिखा कि ये लोग ऊपर से नीचे ‘वॉलेट’ फेंकते पाए गए। ये पता नहीं चल पाया है कि ऐसे अजीब आकार के वॉलेट कहाँ मिलते हैं? हमारे गुप्त सूत्र ने बताया कि सॉल्ट न्यूज ऐसे वॉलेट एमेजॉन पर बेचता है।

लाइब्रेरी में इतने वॉलेट देख कर किसी मनचले दिल्ली वाले ने वहाँ ‘कमरे ही कमरे’, ‘गद्दे ही गद्दे’ और ‘फ्लोर ही फ्लोर’ की तर्ज पर ‘वॉलेट ही वॉलेट’ लिख दिया। लेकिन प्रस्तर एवम् शिला विज्ञानी सॉल्ट न्यूज संस्थापक के गंजे सर का एक बाल भी नहीं हिला। उसने मानने से इनकार कर दिया।

ताजा जानकारी के अनुसार, सॉल्ट न्यूज का गंजा अपना संस्कारहीन, मलिन मुख ले कर ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी वालों को लगातार फोन लगा रहा है कि वो अपनी तरफ से ‘वॉलेट’ शब्द के उद्गम की बात कहते हुए यह लिख दें कि ‘वॉलेट शब्द के मूल में वॉल है जिसका अर्थ है दीवार। यूँ तो आज-कल दीवार ईंट से बनती है, परंतु जिस कालखंड से इस शब्द की उत्पत्ति हुई है, तब सिर्फ पत्थरों से ही बनती थी। अतः, वॉलेट शब्द वस्तुतः पत्थर का पर्यायवाची है।’

इस वाक्य के अंत होते-होते ऑक्सफोर्ड वालों ने सॉल्ट न्यूज के गंजे को ऐसा कनटाप मारा कि उसके सर के सातों बाल खड़े हो गए। खबर लिखे जाने तक, वो अपने भालू के साथ बेडरूम में सिसकता देखा गया है।

पहले सुल्तान और अब तापस पॉल, मोदी सरकार के दबाव में मर रहे मेरे लोग: ममता बनर्जी

तृणमूल कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद व वरिष्ठ बंगाली अभिनेता तापस पॉल की मंगलवार (फरवरी 18, 2020) की सुबह मुंबई के एक अस्पताल में हृदय गति रुकने की वजह से मृत्यु हो गई थी। अब उनकी मौत के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को दोषी ठहराया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री अब अपनी ही पार्टी के नेताओं की लाश पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लग गई है। तापस पॉल को दिसंबर 2016 में रोज वैली चिट फंड घोटाले से तार जुड़े होने के कारण सीबीआई ने गिरफ़्तार किया था।

तृणमूल सुप्रीमो ने कहा कि सरकारी जाँच एजेंसियों द्वारा लगातार बनाए जा रहे दबाव और मोदी सरकार की ‘बदले की राजनीति’ के कारण वरिष्ठ अभिनेता व नेता तापस पॉल की मौत हुई है। पॉल की 61 वर्ष की उम्र में मृत्यु हुई थी। रोज वैली चिट फंड घोटाला मामले में वो 1 वर्ष से भी अधिक समय तक जेल में रहे थे। पॉल को श्रद्धांजलि देते हुए ममता ने अपनी पार्टी के एक अन्य नेता पूर्व संसद सुल्तान अहमद का जिक्र करते हुए कहा कि नारदा टेप स्कैम में उनका नाम घसीटे जाने के कारण वो काफ़ी तनाव में थे और इसी कारण उन्हें हार्ट अटैक आ गया।

मुख्यमंत्री कोलकाता के रवींद्र सदन में में तापस पॉल को श्रद्धांजलि दनी पहुँची थीं, जहाँ उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। ममता बनर्जी ने कहा:

“मोदी सरकार के दबाव के कारण कई ज़िंदगियाँ गाल के गाल में समा गई हैं। सरकारी एजेंसियों ने दबाव बना कर तीन लोगों की जान ले ली। पूर्व सांसद सुल्तान अहमद, सांसद प्रसून बनर्जी की पत्नी और अब तापस पॉल- इन सभी की मौत की जिम्मेदार मोदी सरकार है। हमारे नेताओं को जेल भेजा जा रहा है लेकिन सरकारी एजेंसियाँ अब तक ये साबित नहीं कर पाई हैं कि उन्होंने अपराध क्या किया था। अब तक कुछ साबित नहीं हो सका है। अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए। तापस या फिर अन्य नेताओं ने आख़िर अपराध क्या किया था?

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस ने कहा कि मोदी सरकार ने तापस पॉल पर दबाव बना कर उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी थी, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। हालाँकि, भाजपा ने तृणमूल के आरोपों को नकारते हुए कहा कि वरिष्ठ अभिनेता ने अपने पापों का फल भोगा और अब उन्हें बंगाल की सत्ताधारी पार्टी ‘बलि का बकरा’ बना रही है।

साल 2014 में सीपीएम की महिलाओं के लिए ‘रेप करवा दूँगा‘ बयान के कारण तापस काफी विवादों में रहे थे। उस समय कॉन्ग्रेस और लेफ्ट समेत सभी पार्टियों ने उन पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उनकी पत्नी नंदिनी को इस बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी पड़ी थी।

बंगाल: मदरसों पर ममता बनर्जी मेहरबान, मजहबी शिक्षा लेने को हिंदू बच्चे मजबूर

ममता के बंगाल में मेरी किसी भी दिन की जा सकती है हत्या: पद्म पुरस्कार विजेता काजी मासूम अख्तर

बम बनाते हुए फूटने से TMC नेता मुस्ताक शेख ने गँवाए दोनों हाथ, बीजेपी की CAA-समर्थन रैली में फोड़ना था लक्ष्य

शरद पवार से आर-पार के मूड में उद्धव ठाकरे, बता दिया- देशद्रोह के मामले में घुटने नहीं टेकेंगे

भाजपा की स्वभाविक साझेदार शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनाकर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने राज्य का सुपर सीएम बनने के सपने बुन रखे थे। उन्होंने सोचा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भले सरकार का चेहरा रहें, लेकिन पर्दे के पीछे से बागडोर उन्हीं के हाथों में रहेगी। महाराष्ट्र कैबिनेट के मलाईदार विभागों को झपट उन्होंने इसकी बानगी भी पेश की थी।

लेकिन, भीमा-कोरेगॉंव के मसले से उनके सारे मंसूबे धरे के धरे रह गए। उन्होंने नाराजगी भी दिखाई, आनन-फानन में अपने मंत्रियों की बैठक भी बुलाई। बावजूद इसके उद्धव इस मसले पर दबाव में आते नहीं दिख रहे हैं। इस मामले में अब तक उद्धव ने जो स्टैंड दिखाया है उससे जाहिर है कि सत्ता में साझेदारी को लेकर भले वे सहयोगी कॉन्ग्रेस और एनसीपी के दबाव में आ जाएँ, लेकिन देशद्रोह के मामले में वे घुटने टेक खुद को कमजोर पड़ते नहीं दिखा सकते।

यही कारण है कि तीन महीने पुरानी गठबंधन सरकार के मतभेद एल्गार परिषद और भीमा-कोरेगाँव की हिंसा मामले में जाँच को लेकर खुलकर सामने आ गए हैं। उद्धव ठाकरे ने एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने को मँजूरी दे देशद्रोह और सामान्य हिंसा के मामले के बीच एक लकीर खींचने का काम किया है। ऐसा कर उन्होंने संदेश दिया है कि वे देशद्रोह के मामले में नहीं झुकेंगे। दूसरी तरफ पवार इस बात पर अड़े हैं कि इसकी जाँच एसआईटी से भी समानांतर रूप से करवाई जाए।

गौरतलब है कि इससे पहले एल्गार मामले पर पवार सहित एनसीपी के ज्यादातर नेता SIT जाँच पर अपनी सहमति दे चुके थे। लेकिन, उद्धव ठाकरे का पक्ष जानने के बाद वह इस बात से नाराज हैं कि मुख्यमंत्री ने एनआईए जाँच को मंजूरी क्यों दी?

बता दें, शरद पवार ने एल्गार परिषद की जाँच एनआईए से करवाने के उद्धव के फैसले पर कड़ी आलोचना की थी। शरद पवार ने एनआईए एक्ट की धारा 10 का हवाला देते हुए यह माँग की थी कि एनआईए जाँच के अलावा राज्य सरकार एल्गार परिषद केस की समानांतर जाँच कराए।

यहाँ साफ कर दें कि एल्गार परिषद की जाँच NIA को सौंपने और भीमा-कोरेगॉंव हिंसा की जाँच एसआईटी से कराने के उद्धव के फैसले के पीछे माना जा रहा है कि वह इसके जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी पार्टी देशद्रोह के मुद्दे पर नहीं झुकेगी। इसके चलते ही उन्होंने एल्गार परिषद और भीमा-कोरेगाँव को अलग-अलग मामला बताते हुए साफ किया है कि एल्गार परिषद का केस देशद्रोह की साजिशों से संबंधित है इसलिए सरकार को इसे NIA को सौंपने में कोई ऐतराज नहीं है।

उधर, NCP चीफ शरद पवार ने एसआईटी गठन के मुद्दे पर मुख्यमंत्री से समन्वय की जिम्मेदारी अपने नेता गृह मंत्री अनिल देशमुख को सौंपी है। देशमुख का काम इस बारे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से सलाह कर जल्द ही एसआईटी गठन की घोषणा करना है। इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून CAA को लेकर भी पवार और उद्धव के मतभेद सामने आ चुके हैं। उद्धव ने राज्य में सीएए लागू करने का इशारा करते हुए कहा था, “CAA और NRC दोनों अलग है। NPR भी अलग है। अगर CAA लागू होता है तो इसके लिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है। NRC अभी नहीं है और इसे राज्य में लागू नहीं किया जाएगा।” इसे खारिज करते हुए शरद पवार ने कहा था, “ये महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे का अपना नजरिया है, लेकिन जहाँ तक एनसीपी की बात है, हमने इसके खिलाफ वोट किया है।”

शरद पवार की 2 डिमांड पूरी कर देते मोदी-शाह तो उद्धव ठाकरे नहीं बनते महाराष्ट्र के सीएम

…वो मामला, जिससे ढाई महीने पुरानी ठाकरे सरकार संकट में: NCP और कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता हुए नाराज

महाराष्ट्र के सुपर CM हैं पवार! CAA लागू करने पर उद्धव ठाकरे के बयान को निजी बता किया खारिज

भारत की पहली संस्कृत एनिमेशन फ़िल्म ‘पुण्यकोटि’ का ट्रेलर जारी, जल्द होगी रिलीज

अब तक आपने हिंदी, अंग्रेजी, भोजपुरी, तमिल आदि तमाम तरह की भाषाओं में फिल्मों को रिलीज होते हुए या फिर आए दिन इनके ट्रेलरों को जरूर देखा होगा। भले ही संस्कृत भाषा को विश्व की सबसे पुरानी भाषा माना जाता है, लेकिन शायद ही कभी आपने संस्कृत भाषा में बनी कोई फिल्म देखी हो। अब आप जल्द ही संस्कृत में बनी एक लघु फ़िल्म को देख सकेंगे। यह फिल्म संस्कृत भाषा की पहली एनिमेशन फिल्म होगी, जिसका नाम है ‘पुण्यकोटि’। इसका ट्रेलर सोशल मीडिया पर जारी किया गया है।

जब कोई हिंदी या अंग्रेजी में बनी फिल्म बनकर तैयार होती है, तो उसे बाजार में लाने से पहले उसका प्रचार प्रसार किया जाता है। ताकि अधिक से अधिक लोग उसे देखने के लिए सिनेमा घरों तक जा सकें। इतना ही नहीं फिल्म के प्रमोशन के लिए उसकी पूरी स्टार कास्ट मैदान में उतर जाती है। वहीं दूसरी ओर फिल्म के पोस्टर, बैनर को बाजारों से लेकर प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया और यहाँ तक की सोशल मीडिया पर भी लगा दिया जाता है। इस काम के लिए लाखों नहीं बल्कि करोंड़ो रुपए का खर्चा किया जाता है।

चकाचौंध भरी दुनिया में एक फिल्म ऐसी सामने आती है, जो कि अपनी संस्कृति से तो जुड़ी हुई है, साथ ही वह संस्कृत भाषा का भी बोध कराती है। संस्कृत भाषा में ‘पुण्यकोटि’ नाम से बनी एनिमेशन फ़िल्म का ट्रेलर हाल ही में सोशल मीडिया पर लॉन्च किया गया है। माना जा रहा है कि यह जुलाई माह तक बड़े पर्दे पर आ सकती है। अर्पणा नाम की यूजर ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट करते हुए लिखा, “फ़िल्म का प्रमोशन करने के लिए उनके (पुण्यकोटि टीम) पास पैसा नहीं है। इसलिए यह संदेश देने के लिए वह दोस्तों और सोशल मीडिया पर निर्भर हैं।”

@apparrnnaa नाम की यूजर अपने दूसरे ट्वीट में जानकारी देते हुए बताती हैं, “भारत में ऐसा पहली बार हो रहा है कि जब कोई एनिमेटेड फ़िल्म संस्कृत भाषा में बनी हो। फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक रविशंकर हैं, जो बंगलुरु में इन्फोसिस में काम करते हैं।”

दरअसल भारत की पहली एनिमेशन संस्कृत फ़िल्म ‘पुण्यकोटि’ को रविशंकर वी ने अपने मित्रों और सोशल मीडियो के जरिए क्राउड फंडिंग कर बनाया है। इसे बनाने में 4 से 5 करोड़ रुपए का खर्च आया है। जिसमें संगीत इलैयाराजा ने दिया है। इससे पहले इस मूवी को फ़िल्म समारोहों में भी प्रस्तुत किया जाएगा।

90 मिनट की ‘पुण्यकोटि’ फ़िल्म दक्षिण भारत के एक लोकप्रिय लोक गीत पर आधारित है। इसे दुनिया की सबसे पुरानी भाषा संस्कृत को पुनर्जीवित करने के उद्दश्य से बनाया गया है, जिसमें कुल 35 युवा वर्ग के एनिमेटरों ने अपनी आवाज़ दी है। ‘पुण्यकोटि’ में मानव और पशुओं के बीच के संघर्ष को दिखाया गया है, जो कि लोगों को प्रकृति के साथ सद्भाव से रहना सिखाता है। इस मूवी में रोजर नारायण (हॉलीवुड और भारतीय अभिनेता) जैसे कई कलाकारों ने मुख्य भूमिका के साथ अपनी आवाज़ दी है।

इससे पहले पिछले वर्ष 20 जनवरी को ‘पुण्यकोटि’ नाम के फेसबुक पेज से की गई एक पोस्ट में लिखा था, “पुण्यकोटि का पोस्ट प्रोडक्शन कार्य अंतिम चरण में है और हमारा अगला कदम इस फिल्म को वैश्विक स्तर पर रिलीज करना है। इसके लिए हमारे सभी समर्थक अच्छी खबर का इंतजार करें। हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो वास्तविक कलाकारों को सम्मान दे सकें, जिन्होंने इसे बनाने में अपने 3 से 4 साल दिए हैं। अंग्रेजी की चकाचौंध भरी दुनिया के बीच संस्कृत भाषा में बनी यह फ़िल्म जरूर समाज में एक बेहतर संदेश देगी।”

‘फिदायीन नहीं बनी तो महेश भट्ट ने कंगना पर फेंके चप्पल, जावेद अख़्तर ने घर बुला धमकाया था’

अभिनेत्री कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल ने फिल्मकार महेश भट्ट और गीतकार जावेद अख्तर को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रंगोली के मुताबिक भट्ट ने एक बार गुस्से में कंगना पर चप्पल फेंके थे, जबकि अख्तर ने उन्हें अपने घर बुलाकर धमकाया था। इनमें से एक घटना कंगना के करियर के शुरुआती दिनों की है, जबकि दूसरी तब की है जब उनका अभिनेता ऋतिक रोशन से झगड़ा चल रहा था।

ऋतिक से अनबन की बात खुद कंगना ने भी कबूली थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि शक्तिशाली रोशन परिवार उनके पीछे पड़ा हुआ है। रंगोली के मुताबिक इस विवाद के दौरान जावेद अख्तर ने कंगना को अपने घर बुलाया। उसे अपने कहे अनुसार चलने की सलाह दी। वे चाहते थे कि कंगना उनकी बात मान ऋतिक से माफ़ी माँग ले। इससे इनकार किए जाने पर उन्हें जावेद अख्तर ने धमकाया था।

असल में पटकथा लेखक से गीतकार और फिर ट्विटर ट्रोल बने जावेद अख्तर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फासिस्ट बताया था। इस पर कमेंट करते हुए एक ट्विटर यूजर ने पूछा कि ये कैसा फासिज्म है, जिसमें लोग देश के पीएम को रोज 5 बार फासिस्ट बोल कर भी खुला घूम रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री से दरख्वास्त करते हुए कहा कि एक बार ऐसे लोगों को फासिज्म का उदाहरण दिखाया जाना चाहिए, जिसके बारे में ये दिन-रात माला जपते रहते हैं। रंगोली ने इसी ट्वीट को कोट करते हुए कंगना वाला वाकया सुनाया।

रंगोली ने इसके बाद फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक महेश भट्ट से जुड़ा एक वाकया भी बताया। महेश भट्ट चाहते थे कि कंगना रनौत उनकी फ़िल्म में फिदायीन यानी आत्मघाती हमलावर का किरदार अदा करें। कंगना को ये रोल पसंद नहीं आया और उन्होंने इनकार कर दिया। महेश इस बात से इतने आग-बबूला हो गए कि उन्होंने कंगना को चप्पल दे मारी।

यह वाकया भट्ट की फ़िल्म ‘धोखा’ से जुड़ी हैं जिसमें वे कंगना को लेना चाहते थे। इसकी कहानी कुछ यूँ थी कि एक मुस्लिम परिवार को भारतीयों द्वारा मार दिया जाता है। उस मुस्लिम परिवार में एक युवती ज़िंदा बच जाती है, जो बाद में आत्मघाती हमलावर बन जाती है। जब यह रोल ऑफर किया गया था कंगना मात्र 18 वर्ष की थीं। उन्होंने इस रोल को नकार दिया तो महेश भट्ट ने उन पर चप्पल चलाया।

इन दो घटनाओं का जिक्र कर रंगोली यह समझाना चाहती थीं कि आखिर असली फासिज्म होता क्या है? जो लोग असली ज़िंदगी में फासिस्ट जैसा व्यवहार करते हैं, वो पीएम मोदी की आलोचना कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रंगोली ने महेश भट्ट की बेटी आलिया को फिल्मफेयर द्वारा वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब दिए जाने वाले फ़ैसले पर भी सवाल उठाया था। रंगोली ने कहा था कि कैसे आलिया भट्ट को एक बुर्के वाली मुस्लिम युवती का किरदार प्ले करने के लिए फ़िल्मफेयर अवॉर्ड दे दिया गया। रंगोली ने बताया कि कंगना अपनी अगली फ़िल्म में एक दलाल का रोल अदा करने वाली हैं, जो गैंगस्टर्स को लड़कियाँ सप्लाई करती थी और तत्कालीन पीएम नेहरू की मित्र थी।

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झूठ पर झूठ: AAP की आतिशी मार्लेना हैरी पॉटर और नेटफ्लिक्स के चक्कर में देश को पागल क्यों बना रहीं

अंग्रेजी में एक कहावत है – Once a liar always a liar. जिसका सामान्य शब्दों में अर्थ होता है कि एक बार झूठ बोलने वाला आदमी कब आदतन झूठ बोलने लगता है, उसे पता ही नहीं चलता। झूठ बोलने और आम आदमी पार्टी का रिश्ता नया नहीं है। बात चाहे मोहल्ला क्लिनिक की सफलता का हो, या फिर दिल्ली की जनता से चुनाव जीतने के लिए किए गए किसी अन्य वादे का, आम आदमी पार्टी निरंतर जनता से झूठ कहती नजर आई है।

झूठ बोलने की इसी आदत का विस्तार अब आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी करना शुरू कर दिया है और यह काम कर रही हैं आम आदमी पार्टी विधायक आतिशी मार्लेना। आतिशी मार्लेना ने ट्विटर पर एक मनोहर कहानी शेयर करते हुए बताया कि किस तरह से उनकी भतीजी ने उनसे ‘नेटफ्लिक्स’ पर हैरी पॉटर फिल्म देखने की सिफारिश की और उन्हें आखिर में यह देखनी ही पड़ी।

AAP विधायक आतिशी मार्लेना ने ट्वीट के जरिए बताया कि वो कुछ और देखना चाहती थीं, लेकिन एक MLA होने के नाते उन्हें जनता (भतीजी) की बात सुननी पड़ी और आखिर में उन दोनों ने हैरी पॉटर फिल्म देखने का ही फैसला किया। यही नहीं, आम आदमी पार्टी के आधिकारिक अकाउंट ने आतिशी से उनका नेटफ्लिक्स पासवर्ड भी माँग लिया।

लेकिन शायद आतिशी मार्लेना की होशियार भतीजी के साथ-साथ खुद उन्हें भी इस बात की जानकारी नहीं है कि नेटफ्लिक्स पर हैरी पॉटर फिल्म उपलब्ध ही नहीं है।

इसके बाद कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने आतिशी मार्लेना को बताया कि वो हैरी पॉटर फिल्म नेटफ्लिक्स पर नहीं देख सकती क्योंकि यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर मौजूद ही नहीं है।

एक ट्विटर यूजर ने आतिशी के ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा कि आम आदमी पार्टी लीडर अपने फ़ॉलोअर्स को पैदाइशी बेवकूफ समझते हैं।

वहीं, एक ट्विटर यूजर ने आम आदमी पार्टी के आधिकारिक अकाउंट पर भाँग पिए होने का भी आरोप लगाया और कहा कि नेटफ्लिक्स पर यह फिल्म मौजूद नहीं है। ज्ञात हो कि भाँग एक प्रकार का नशा है, जिसका सेवन कानूनन जुर्म भी है।

एक ट्विटर यूजर ने लिखा है कि मजाक करने के बहाने आतिशी मार्लेना ने एक मनगढ़ंत कहानी सामने रखी है।

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₹100 Cr की ‘वन्दे भारत’ ने 1 साल में कमाए ₹92 करोड़: RaGa ने उड़ाया था मजाक, कई बार हुई थी पत्थरबाजी

नई दिल्ली से वाराणसी के बीच चलने वाली ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ ने अपने पहले ही साल में अच्छी कमाई की है। इस ट्रेन को पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखा कर रवाना किया था। एक साल में ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ ने 3.8 लाख किलोमीटर की यात्रा तय की है और 92.29 करोड़ रुपए की कमाई की है। ‘उत्तर रेलवे’ ने मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को जानकारी दी कि ट्रेन में अब तक 100% ऑक्यूपेंसी रही है, जो इसकी सफलता को बयाँ करती है।

ये भारत की पहली स्वदेशी ट्रेन है, जिसे पूर्णरूपेण देश में ही बनाया गया है। इसे फरवरी 15, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया था। ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ ने नई दिल्ली से वाराणसी तक का कमर्शियल रन फरवरी 17, 2019 से शुरू किया था। इस हिसाब से सोमवार (फरवरी 17, 2020) को ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ की पहली सालगिरह थी। नई दिल्ली से वाराणसी के बीच की दूरी को यह ट्रेन 8 घंटे में पूरा करती है। मंगलवार और गुरुवार के अलावे ये सप्ताह के बाकी 5 दिन चलती है।

इस ट्रेन में 16 कोच हैं। ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ के सभी कोच जीपीएस पर आधारित ऑडियो-विज़ुअल पैसेंजर इन्फॉर्मेशन सिस्टम पर काम करते हैं। ट्रेन में वाईफाई की सुविधा है और सीटिंग अरेंजमेंट भी काफ़ी आरामदायक है। इसे ‘उत्तर रेलवे’ के दिल्ली भाग द्वारा कार्यान्वित किया जाता है। अगर पूरे ऑक्यूपेंसी की बात करें तो ट्रेन पिछले एक साल में 112% से भी अधिक ऑक्यूपेंसी के साथ चलती रही है। पिछले साल अक्टूबर में नई दिल्ली से कटरा के बीच भी एक ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ ट्रेन की शुरुआत की गई। इस ट्रेन के कारण दिल्ली और कटरा के बीच की दूरी 8 घंटे घट गई है।

एक भी दिन नहीं हुई कैंसल: ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ के गौरवपूर्ण 1 साल

इस ट्रेन की डिजाइन और निर्माण करने वाली इंटीग्रल कोच फैक्ट्री के सुधांशु मणि ने बताया था कि इसे 100 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया था। यानी, ट्रेन ने अब तक इसमें से 92.29 करोड़ रुपए पहले ही साल में जुटा लिए हैं। बता दें कि ‘वन्दे भारत एक्सप्रेस’ पर तीन बार पत्थरबाजी की गई थी। इसके शुरुआती दिनों में ही उत्तर प्रदेश के टूंडला में पथरबाजी की गई थी।

राहुल गाँधी ने भी इस ट्रेन को लेकर ‘मेक इन इंडिया’ का मजाक बनाया था। केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने उनके बयान की आलोचना करते हुए कहा था कि भारतीय इंजीनियरों की मेहनत का मखौल न उड़ाएँ। पीएम मोदी ने भी भारतीय इंजीनियरों की मेहनत को सलाम करते हुए विपक्षी नेताओं को सलाह दी थी कि वे स्वदेशी सेमी-स्पीड ट्रेन का सम्मान करें।

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100 ‘सर्वश्रेष्ठ’ संस्थानों में देश के 11 विश्वविद्यालय: THE की सूची में भारत का प्रदर्शन सुधरा

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘टाइम्स’ ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शैक्षिक संस्थानों का मूल्यांकन करते हुए एक सूची जारी की है। इस सूची में भारत के लिए भी अच्छी ख़बर है। टाइम्स हायर एजुकेशन (THE: Times Higher Education) के ‘इमर्जिंग इकोनॉमिक्स यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2020’ के अंतर्गत विश्वविद्यालयों की सूची जारी की है। भारत के लिए अच्छी बात ये है कि टॉप-100 में भारत की 11 यूनिवर्सिटी शामिल हैं। ये सूची मंगलवार (फरवरी 18, 2020) को लंदन में जारी की गई

जहाँ भारत के 11 विश्वविद्यालयों ने इस सूची में जगह बनाई है, चीन के सर्वाधिक 30 यूनिवर्सिटी इस लिस्ट में शामिल है। इस मामले में चीन पहले और भारत दूसरे नंबर पर आता है। इस मूल्यांकन में कुल 47 देशों व स्वायत्त प्रदेशों को शामिल किया गया है। पूरी सूची की बात करें तो इसमें 533 विश्वविद्यालयों की रैंकिंग की गई है, जिसमें भारत के 56 विश्वविद्यालय शामिल हैं।

‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस’ को इस सूची में 16वाँ स्थान मिला है, जो भारतीय शैक्षिक संस्थानों में इसे सर्वश्रेष्ठ बनाता है। इसके बाद आईआईटी का नंबर आता है। ‘THE’ के चीफ नॉलेज ऑफिसर फील बैटी ने कहा कि लम्बे समय से इस पर चर्चा होती रही है कि वैश्विक रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों की क्या स्थिति है? उन्होंने कहा कि वैश्विक मंच पर भारतीय शैक्षणिक संस्थानों का परफॉरमेंस इससे पहले दमदार नहीं रहा है। उन्होंने बताया कि विभिन्न प्रयासों के कारण भारतीय संस्थानों की रैंकिंग में उछाल आया है और उच्च-शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो रहा है। उन्होंने 2017 में स्थापित ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस स्कीम’ की भी तारीफ की, जिसके तहत भारत में शैक्षिक संस्थानों की रैंकिंग की जाती है।

इसी स्कीम का कमाल है कि अमृता विश्वपीठम जैसे शैक्षिक संस्थान 51 स्थान तक की छलाँग लगा चुके हैं। प्रतिस्पर्द्धा का भी माहौल बना है और सभी संस्थान शिक्षा-व्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए प्रयास कर रहे हैं। टाइम्स ने अमृता की छलाँग की तारीफ करते हुए कहा कि उसने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। ‘टाइम्स हायर एजुकेशन’ की सूची में आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी बॉम्बे और आईआईटी दिल्ली को क्रमशः 32वें, 34वें और 38वें स्थान पर जगह मिली है।

क्या ISI के हैंडलर और 26/11 के आतंकियों के मददगार थे दिग्विजय सिंह?: हिंदू आतंकवाद पर BJP ने कॉन्ग्रेस को घेरा

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया की नई किताब ने मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमले के कई पन्ने खोले हैं। इन खुलासों के बाद हिंदू आतंकवाद के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस घिरती नजर आ रही है। भाजपा ने उसके नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के हिंदू आतंकवाद पर दिए गए बयान के बाद बहस और भी तेज हो गई है। भाजपा ने उनके बयान पर किया है।

भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा, “हम कॉन्ग्रेस के हिंदू आतंकवाद के विचार और लश्कर, आईएसआई की 26/11 रणनीति के बीच एक संबंध देख सकते हैं। क्या भारत का कोई शख्स आईएसआई को आतंकवादियों को हिंदू पहचान देने के लिए हैंडलर के रूप में मदद कर रहा है? क्या दिग्विजय सिंह हैंडलर के रूप में काम कर रहे थे? कॉन्ग्रेस को इसका जवाब देना चाहिए।”

इससे पहले केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कॉन्ग्रेस पर 26/11 हमले के बाद झूठे हिंदू आतंकवाद मुद्दे को खड़ा करने का आरोप लगाया था। अधीर रंजन ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “जब ‘हिंदू आतंक’ शब्द गढ़ा गया था तब एक अलग पृष्ठभूमि थी। मक्का मस्जिद में विस्फोट हुआ था और प्रज्ञा ठाकुर समेत अन्य को तब गिरफ्तार किया गया था। आतंकवादी हमेशा छलावा करते हैं। वे अपनी वास्तविक पहचान के साथ हमलों को अंजाम नहीं देते हैं। 26/11 के समय UPA सरकार थी जिसने हमले के बारे में सब कुछ बताया। बाद में UPA के शासनकाल में अजमल कसाब को फाँसी दी गई थी।”

दरअसल यह पूरा विवाद मुबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर और 26/11 आतंकी हमले की जाँच करने वाले राकेश मारिया की किताब ‘लेट मी से इट नाउ’ से शुरू हुआ। राकेश मारिया ने अपनी किताब में कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान और उसकी शह पर काम करने वाले आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने मुंबई हमले को हिंदू आतंक’ का रंग देने की गहरी साजिश रची थी। लेकिन आतंकवादी अजमल कसाब के जिंदा पकड़े जाने से उनकी साजिश नाकाम हो गई थी। मारिया ने अपनी किताब में लिखा है, “यदि सब कुछ योजना के अनुसार होता, तो कसाब समीर चौधरी के रूप में मर जाता और मीडिया हमले के लिए ‘हिंदू आतंकवादियों’ को दोषी ठहराती।”

‘उसे मत मारो, वही तो सबूत है’: हिंदुओं संजय गोविलकर का एहसान मानो वरना 26/11 तुम्हारे सिर डाला जाता

हाथ में कलावा, समीर चौधरी नाम की ID: ‘हिंदू आतंकी’ की तरह मरना था कसाब को – पूर्व कमिश्नर ने खोला राज

जहाँ बहाया था खून, वहीं की मिट्टी पर सर रगड़ बोला भारत माता की जय: मुर्दों को देख कसाब को आई थी उल्टी

नमाज, 1.25 लाख रुपए और बहन की शादी… 26/11 हमले के पीछे ‘हिंदू आतंकी’ कसाब की कहानी