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शरिया का जानकार ISIS का सरगना: यजीदी बच्चियों से रेप, उन्हें सेक्स स्लेव बनाने का दिया था हुक्म

आतंकी संगठन ISIS के सरगना अबू बकर अल-बगदादी के खात्‍मे के बाद उसके नए सरगनाओं को लेकर अक्टूबर से ही अलग-अलग रिपोर्टों में विभिन्‍न दावे किए जाते रहे। अब अंग्रेजी अखबार The Guardian ने अपनी रिपोर्ट में खुफ‍िया सेवाओं के हवाले से इस बारे में नया दावा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खुफिया सेवाओं ने ISIS के नए सरगना की पहचान आमिर मोहम्मद अब्दुल रहमान अल मवली अल-सल्बी के रूप में की है।

अखबार ने दो खुफिया सेवाओं के अधिकारियों के हवाले से बताया है कि अब्दुल रहमान आईएस के संस्थापकों में से एक है। उसके इशारे पर ही इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट का खिलाफत कायम होने के बाद यजीदी बच्चियों और महिलाओं से रूह कॅंपा देने वाले अत्याचार अंजाम दिए गए थे। उनसे बार-बार रेप किया गया और उन्हें सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया।

यही नहीं दुनिया के अलग-अलग हिस्‍सों में उसी की देखरेख में ISIS के आतंकी हमलों को अंजाम देते थे। रिपोर्ट के मुताबिक, सल्बी का जन्म इराक के ताल अफरा शहर में हुआ था। तुर्कमेन परिवार के सल्‍बी ने मोसुल यूनिवर्सिटी से शरिया कानून की डिग्री ली है।

गौरतलब है कि अक्टूबर में विशेष अमेरिकी बलों के हमले में आईएस सरगना अबु बकर अल बगदादी के मारे जाने के बाद संगठन ने अपने सरगना के रूप में अबु इब्राहिम अल हाशिमी अल कुरैशी के नाम का प्रस्ताव दिया था। लेकिन कुछ समीक्षकों का मानना है कि बगदादी को मौत के घाट उतारे जाने के बाद ISIS कोई भी बड़ा खतरा नहीं उठाना चाहता है। यही कारण है कि उनके नए सरगना के बारे में कोई भी जानकारी पुख्‍ता तौर पर कहीं भी मौजूद नहीं है।

गार्जियन की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बगदादी के मारे जाने के कुछ ही घंटों के भीतर ही ISIS ने आमिर मोहम्मद अब्दुल रहमान अल मवली अल-सल्बी को अपना नया सरगना चुन लिया था। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि Islamic State की पूर्व घोषणा दुनिया को गुमराह करने के मकसद से की गई हो। बता दें, कुरैशी फिलहाल छद्मनाम है जिसकी पुष्टि अन्य सरगनाओं अथवा खुफिया एजेंसियों ने नहीं की हैं।

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सरकार बनने के 4 घंटे के भीतर केस वापस लेने का फैसला, 21 दिन बाद हत्या कर 7 को जंगल में फेंका

झारखंड में बीते 29 दिसंबर को हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो, कॉन्ग्रेस और राजद की सरकार बनी थी। सोरेन के शपथ लेने के 4 घंटे के भीतर ही पहली कैबिनेट बैठक में पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े मामले वापस लेने का फैसला किया गया था। इस आंदोलन के दौरान जमकर हिंसा हुई थी। अपहरण, गैंगरेप जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया था। बावजूद इसके सियासी फायदे के लिए सरकार ने दर्ज एफआईआर की वापसी फैसला लिया। अब इसका असर दिखना शुरू हो गया। इस फैसले को महीना भर भी नहीं हुआ है कि राज्य में पत्थलगड़ी समर्थकों द्वारा 7 ग्रामीणों की हत्या कर लाश जंगल में फेंक देने की खबर आई है।

घटना पश्चिम सिंहभूम जिले के गुदड़ी की है। यहाँ पत्थलगढ़ी समर्थकों ने इसका विरोध करने वाले बुरुगुलीकेरा ग्राम पंचायत के उपमुखिया समेत सात ग्रामीणों की हत्या कर दी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पत्थलगड़ी समर्थक इन्हें अगवा कर जंगल में ले गए फिर बेरहमी से हत्या कर दी। मृतकों में उपमुखिया और अन्य 6 ग्रामीण शामिल हैं।

घटना मंगलवार (जनवरी 21, 2019) दोपहर की बताई जा रही है, हालाँकि पुलिस को इसकी देर से सूचना मिली। फिलहाल इलाके में भारी संख्या में पुलिस की तैनाती कर दी गई है। मामले की जाँच की जा रही है। झारखंड पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि हर जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। स्थानीय अधिकारियों ने सात लोगों की मौत की पुष्टि की है। झारखंड के एडीजी (ऑपरेशन) मुरारी लाल मीणा ने बताया कि बुरुगुलीकेरा से 3 किमी दूर से सभी शव बरामद किए गए हैं। पूरा इलाका पहाड़ियों से घिरा है।

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स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रविवार (जनवरी 19, 2019) को पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों ने ग्रामीणों के साथ एक मीटिंग की थी। बैठक में कुछ ग्रामीणों ने पत्थलगड़ी का विरोध किया था। इससे दो गुटों में विवाद हो गया और फिर मारपीट भी हुई थी। तभी से दोनों गुटों में तनाव हो गया और अब इस वारदात को अंजाम दिया गया।

दैनिक जागरण के रांची संस्करण में प्रकाशित खबर

झारखंड के पूर्व डीजीपी गौरी शंकर रथ ने दैनिक जागरण को बताया, “पत्थलगड़ी से संबंधित मुकदमे वापस लिए जाने का फैसला सरकार का नीतिगत फैसला है। जिस आंदोलन में रक्तपात हुआ हो, भीड़ हिंसक रही हो, पथराव हुआ हो, तीर-धनुष चले हों, वैसे मुकदमे वापस नहीं होने चाहिए। इससे ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ेगा जो भविष्य के लिए चुनौती पैदा करेंगे।”

प्रभात खबर में प्रकाशित खबर

गौरतलब है कि पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत खूँटी से ही हुई थी। झारखंड में आदिवासी हितों के नाम पर राजनीति करने वाले हेमंत सोरेन ने चुनाव से पूर्व ही स्पष्ट कह दिया था कि उनकी सरकार बनते ही पत्थलगड़ी हिंसा के आरोपितों पर से सभी केस हटा लिए जाएँगे और उन्होंने किया भी। मसलन वो दोपहर 2:19 पर शपथ लेते हैं और 5: 45 शाम में कैबिनेट की पहली मीटिंग में ही FIR वापसी का फैसला लेते हैं।

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कश्मीरी हिन्दू मुसलमानों से माफ़ी क्यों माँगे? अजीत भारती का वीडियो | Why’d Kashmiri Hindus say sorry to Muslims?

कश्मीरी पंडितों की जब हम बात करते हैं तो उसके दो पहलू हैं। एक पहलू कश्मीरी पंडित या कश्मीरी हिंदू है, तो वहीं दूसरे पहलू पर कभी बात नहीं होती। हम इनके दु:ख के बारे में बात करते हैं, लेकिन मुसलमानों के आतंक की बात नहीं करते। जबकि उल्टा होना चाहिए। इनका दु:ख तो ये जी ही रहे हैं, लेकिन जिन पर चर्चा होना चाहिए कि इन मुसलमानों ने क्या किया? उसका क्या? उस पर बात क्यों नहीं होती?

इसी तरह से एक पक्ष को चर्चा से गायब किया जाता है। आतंकियों के अपराधों पर, उसके दुष्कृत्यों पर हम कभी चर्चा नहीं करते। इसी तरह से एजेंडा पेश किया जाता है कि हम तो कश्मीरी पंडितों के साथ हैं, लेकिन क्या तुम मुसलमान आतंकियों के खिलाफ हो?

रवीश लिखते हैं, “इंसाफ का इंतजार लंबा हो ही गया है और शायद आगे भी हो, लेकिन चुप्पी उनके भीतर चुप रही।” रवीश इंसाफ दोगे कैसे इन लोगों को? जब तुम बात ही नहीं कर रहे हो कि किसने इनके साथ अपराध किया है, तो इंसाफ दोगे कैसे?

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

टुकड़े-टुकड़े गैंग का अगला RTI: ऊँट के मुँह में आखिर जीरा डाला किसने था और क्यों? गृह मंत्री जवाब दें

महाराष्ट्र के कथित एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने गृह मंत्रालय में एक आरटीआई दाखिल किया, जिसमें उन्होंने पूछा कि ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का क्या अस्तित्व है? सबसे पहले तो सवाल पूछने वाले के पास कितना खाली समय रहा होगा, ये सोचने वाली बात है। अब किसी के घर में बिल्ली आकर छींका फोड़ दे, तो इसका जवाब देने के लिए अमित शाह से थोड़े न पर्ची लिखवाया जाएगा? ख़ैर, गोखले के बारे में बताना आवश्यक है कि वो आदमी एक नंबर का गालीबाज है और तार्किक बहस के दौरान माँ-बाप तक पहुँच जाना उसकी ख़ासियत है। ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को लेकर गृह मंत्रालय का अपेक्षित जवाब आया।

ध्यान में रखने वाली बात है कि अमित शाह लम्बे समय तक भाजपा अध्यक्ष भी रहे हैं और देश के गृह मंत्री तो हैं ही। बस दिक्कत इस बात की है कि मूर्ख एक्टिविस्ट ये नहीं सोच पाते कि कौन सी बात वो एक भाजपा नेता की हैसियत से बोल रहे हैं और कौन सा बयान गृह मंत्रालय की तरफ़ से आधिकारिक रूप से दे रहे हैं। पीएम मोदी अपने हर भाषण में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं। तो क्या मुझे पीएमओ में आरटीआई दायर करनी चाहिए कि क्या ये भारत सरकार का आधिकारिक नारा है?

साकेत गोखले से जैसे ही ‘ज़ी न्यूज़’ के पत्रकार सुधीर चौधरी ने कहा कि वो ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के बारे में सभी जानकारी देने को तैयार हैं, वो बौखला गया। यही कारण है कि गोखले ने जैसे ही असभ्य भाषा का प्रयोग किया, सुधीर चौधरी ने उसे लताड़ते हुए पूछा कि वो किस पार्टी का कार्यकर्ता है और उसे प्रति आरटीआई कितने रुपए मिलते हैं? वैसे एक बात यहाँ हम भी जोड़ना चाहेंगे, किसी राजनीतिक पार्टी से रुपए लेकर आरटीआई दाखिल करने वाले को ‘दलाल’ की संज्ञा दी जा सकती है लेकिन अगर वो मुफ़्त में ये सब कर रहा है तो फिर उसकी बुद्धि पर तरस खाना चाहिए।

ख़ैर, उपर्युक्त बयान का साकेत गोखले से कुछ लेना-देना नहीं था। गोखले ने एक ही लताड़ के बाद अपनी परवरिश दिखा दी और ‘बाप’ तक पहुँच गए। सुधीर चौधरी को ‘भाजपा के टुकड़ों पर पलने वाला’ करार दिया। साकेत गोखले कहता है कि ऑपइंडिया उससे डरता है और इसीलिए उसका नाम नहीं लेता। ये ऐसी ही बात हो गई, जैसे एनडीटीवी के रवीश कुमार कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें बधाई क्यों नहीं देते। गोखले को ये समझना चाहिए कि उसका नाम ऑपइंडिया अँग्रेजी की रिपोर्ट में इसीलिए नहीं लिया गया क्योंकि वो हमारे लिए महत्व नहीं रखता। वो इस लायक ही नहीं है।

जहाँ तक आरटीआई की बात है कि गृह मंत्रालय ये भी कह चुका है कि महात्मा गाँधी को आधिकारिक रूप से कभी भी राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया गया। खेल मंत्रालय कह चुका है कि उसने कभी हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं किया। चूँकि, उसके पास काफ़ी खाली समय है, गोखले को चाहिए कि वो ऑपइंडिया के पास भी एक निवेदन भेज कर ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के बारे में जवाब माँगे। अगर हमारा मन हुआ तो उसे पूरी सूची विवरण के साथ दी जाएगी। और हाँ, मानहानि भी उस व्यक्ति का होता है, जिसका कोई मान होता है। इस पंक्ति का गोखले से कुछ लेना-देना नहीं है।

यहाँ हम बात कर रहे हैं उस ‘Lesser Known Individual’ की, जो मानहानि की धमकी अपने फटे हुए जेब में लेकर फिरता रहता है। जब एक बार उसके घर के बाहर कुत्ते ने टट्टी कर दी थी, तब उसने न सिर्फ़ गृह मंत्रालय को आरटीआई भेज कर जवाब माँगा बल्कि उस कुत्ते के ख़िलाफ़ ‘रवीश की अदालत’ में एक केस भी दायर कर दिया। इसमें हँसने वाली बात नहीं है क्योंकि आजकल हर बिल को क़ानून बनने के लिए संसद और राष्ट्रपति के अलावा एनडीटीवी की स्टूडियो से भी पास कराना पड़ता है।

कथित एक्टिविस्ट ने ये याचिका क्यों नहीं दायर की कि राहुल गाँधी को आधिकारिक रूप से सरकार ‘पप्पू’ मानती है या नहीं? अरविन्द केजरीवाल का दूसरा नाम ‘एके- 49’ है या नहीं? क्या राहुल गाँधी सच में अपने मुँह में ‘चाँदी की चम्मच’ लेकर पैदा हुए थे? क्या प्रधानमंत्री का सीना सचमुच ’56 इंच’ का है? क्या जीतने वाला पहलवान सचमुच हारने वाले को उसकी जीभ से ‘धूल चटा’ देता है? ऐसे ही लोग शायद इस बात का जवाब ढूँढ़ते फिरते होंगे कि आख़िर ऊँट को जीरा किसने और क्यों खिलाया था? मानहानि की धमकी नामक हथियार लेकर लोगों को सच बोलने से डराने वाले साकेत गोखले को ये भी पता होना चाहिए कि ‘कह कर लेना’ में ‘कहा’ क्या जाता है और ‘लिया’ क्या जाता है?

गोखले के इस डेयरडेविल के बाद एक्टिविस्ट्स की एक नई खेप तैयार हो सकती है, जो आरटीआई की बाढ़ लाकर निम्नलिखित सवाल पूछ सकते हैं:

  • आखिर वो कौन सा आदमी था, जिसने अपने पाँव में पहली बार कुल्हाड़ी मारी थी? उसके इलाज में ‘आयुष्मान भारत योजना’ के तहत मदद मिली थी या नहीं?
  • वो कौन सा व्यक्ति ठगा, जिसने पहली बार किसी की आँखों में धूल झोंकी थी? वो धूल मिट्टी की थी या फिर बालू की?
  • ओबामा की पलकों की लम्बाई और चौड़ाई कितनी थी, जिसे उन्होंने मोदी के स्वागत में बिछा दी थी? क्या मीडिया ने झूठ कहा कि मोदी के स्वागत में अमेरिका ने पलकें बिछा दी थीं?
  • क्या नरेंद्र मोदी ने सचमुच विपक्ष की ईंट से ईंट बजा दी है? किसके ईंट का वजन कितना था? मोदी की ईंट किस मिट्टी की बनी हुई थी?
  • क्या सोनिया ने सोनिया गाँधी ने सचमुच मनमोहन सिंह को 10 साल अपनी ऊँगली पर नचाया? सोनिया ने दसों में से कौन सी ऊँगली का इस्तेमाल किया?

जब ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को लेकर आरटीआई दायर की जा सकती है तो उपर्युक्त सभी आरटीआई भी उसी बौद्धिक स्तर की है। अपनी एक फटी हुई जेब में मानहानि की धमकी, दूसरे जेब में आरटीआई का परचा, अपने गंदे मुँह में गालियाँ और घुटने में दिमाग रख कर चलने वाले ‘Lesser Known Individual’ को ये पता होना चाहिए कि जिस क़ानून को जनहित के लिए बनाया गया है, उसका मज़ाक नहीं बनाया जाना चाहिए। जनता से जुड़े मुद्दे उठाने चाहिए, जनता का मखौल बनाने वाली बातें नहीं करनी चाहिए। जाते-जाते बता दूँ कि ये एक ‘व्यंग्य’ है, जिसे अँग्रेजी में ‘Satire’ कहते हैं। गोखले चाहें तो ‘फाल्ट न्यूज़’ के पास इसे फैक्ट चेक के लिए भेज सकते हैं।

प्रताड़ना से तंग आकर सिख नेता ने छोड़ा पाकिस्तान, चुनाव लड़ा तो बेटे की हुई थी पिटाई

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति ये है कि आम आदमी तो दूर, नेताओं तक का वहाँ रहना मुश्किल हो गया है। पाकिस्तान के जाने-माने सिख नेता राधेश सिंह उर्फ़ टोनी भाई ने मुल्क़ छोड़ने का निर्णय लिया है। राधेश सिंह को लगातार धमकियाँ मिल रही थीं। ये सिलसिला तभी शुरू हो गया था, जब उन्होंने 2019 आम चुनाव में बतौर उम्मीदवार हिस्सा लिया था। वो पेशवर के रहने वाले हैं और उन्होंने वहीं से चुनाव लड़ा था। बाद में धमकियों से तंग आकर उन्होंने लाहौर का रुख किया।

अब उन्होंने पाकिस्तान छोड़ दिया है। सिंह ने कहा कि अपने परिवार और बच्चों की जान बचाने के लिए उन्होंने ये फ़ैसला किया है। राधेश सिंह ने कहा कि उन्हें ये बताते हुए दुःख हो रहा है लेकिन ये ज़रूरी था। वो फ़िलहाल किसी अज्ञात स्थान पर रह रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि कट्टरपंथी ताक़तें उनका पीछा इतनी आसानी से नहीं छोड़ेंगी। बीबीसी उर्दू से बातचीत करते हुए राधेश सिंह ने कहा:

“अगर बात सिर्फ़ मेरी जान की होती तो मैं किसी भी सूरत में पाकिस्तान नहीं छोड़ता। लेकिन, ये मेरे परिवार और मुझसे जुड़े लोगों की ज़िंदगी का भी सवाल था। इस स्थिति में मेरे पास मातृभूमि छोड़ने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मैं ये नहीं बता सकता कि मैं फ़िलहाल कहाँ रह रहा हूँ। लेकिन हाँ, उचित समय आने पर मैं ज़रूर इसका खुलासा करूँगा।”

दरअसल, राधेश के साथ दिसंबर 2019 में एक घटना हुई थी, जब वो अपने बेटे के साथ बाइक से जा रहे थे। रास्ते में पिस्तौल और डंडों से लैस 4 मुस्टंडों ने उन्हें रोका और धमकियाँ दीं। उन्होंने लाहौर पुलिस से अपने व परिवार की सुरक्षा की गुहार भी लगाई थी। बकौल सिंह, बदमाशों ने उनके जवान बेटे को पकड़ कर उसे ख़ूब मारा। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस में शिकायत किए जाने के बाद उन्हें ख़ुफ़िया एजेंसियाँ भी कॉल कर के धमकियाँ देने लगीं। उनसे शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाया जाने लगा।

राधेश ननकाना साहिब गुरुद्वारा पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमले को लेकर भी दुःख जताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में नफरत का माहौल इतना बढ़ गया कि उन्हें अपने परिवार को लेकर मुल्क़ से बाहर निकलना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि लाहौर में उनके बच्चों का स्कूल में दाखिला तक नहीं हो पाया। जब वो घर खोजने निकले, तो मुस्लिमों व ईसाईयों ने उन्हें घर देने से मना कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सिख होने की वजह से उनके व उनके बच्चों को कोई नौकरी तक नहीं मिल पाती थी।

नहीं सहेंगे राम का अपमान: पहली बार साथ आए दो पुराने विरोधी, तमिल राजनीति में बड़ी हलचल

तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति से इतर वहाँ एक ऐसी जुगलबंदी देखने को मिल रही है, जिससे वहाँ के सियासी पटल पर बड़ा बदलाव आ सकता है। सुब्रह्मण्यम स्वामी आज तक सुपरस्टार रजनीकांत का विरोध करते आए हैं लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब दोनों दिग्गज किसी मुद्दे पर एकमत से आवाज़ उठा रहे हैं। अब तक स्वामी ने रजनीकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा था लेकिन अब उन्होंने कहा है कि रजनीकांत द्वारा पेरियार के ख़िलाफ़ बयान देना यह दिखाता है कि उन्होंने काफ़ी सोच-समझ कर मजबूती से स्टैंड लिया है।

सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि सुपरस्टार को कभी भी किसी भी प्रकार की वैधानिक मदद की ज़रूरत पड़ती है तो वो इस मामले में कोर्ट में उनका पक्ष रखने को तैयार हैं। ख़ुद स्वामी ने स्वीकार किया कि रजनीकांत को लेकर उनके रुख में बदलाव आया है। उन्होंने माना कि पेरियार ने 1971 की एक रैली में भगवान राम व माँ सीता का अपमान किया था और बाद में ‘तुग़लक़’ पत्रिका ने इसे प्रकाशित भी किया था। इससे पहले स्वामी यह कहते आ रहे थे कि रजनीकांत को राजनीतिक मुद्दों की समझ नहीं है।

वहीं सोमवार (जनवरी 21) की शाम को बड़ी ख़बर आई कि रजनीकांत और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने फोन पर एक-दूसरे से बातचीत की है। जहाँ एक तरफ तमिल अभिनेता ने स्वामी को उनके साथ के लिए धन्यवाद दिया, स्वामी ने उन्हें बधाई दी। स्वामी ने फोन पर सुपरस्टार से कहा कि वो इस मुद्दे पर उनके साथ मज़बूरी से खड़े हैं और कोर्ट में भी उनका पक्ष रखेंगे। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने माना कि पेरियार ने द्रविड़ राजनीति के नाम पर हिन्दू देवी-देवताओं का मज़ाक उड़ाया, कई बार उनका अपमान किया और हिंदुत्व के ख़िलाफ़ भली-बुरी बातें कही।

कहा जा रहा है कि ‘दरबार’ की सफलता के बाद रजनीकांत अपने राजनीतिक रुख को लेकर बड़ा ऐलान कर सकते हैं। उनकी फ़िल्म ने अब तक 11 दिनों में बॉक्स ऑफिस पर 223 करोड़ रुपए का कारोबार किया है। तमिलनाडु में 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं। रजनीकांत ने हाल ही में कमल हासन से मुलाक़ात की थी। अब पूरी तमिलनाडु भाजपा उनके बयान के साथ खड़ी हो गई है।

कट्टरपंथियों से किस बात की माफ़ी माँगें कश्मीरी हिन्दू? कि उनकी लड़कियों का गैंगरेप हुआ, निर्मम हत्या की गई?

कश्मीर के इतिहास में 19 जनवरी 1990 वो काला दिन है, जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है। वो रात जब मस्जिदों से आती आवाजों से कश्मीरी पंडित सिहर उठे थे। जब अपनी माताओं-बहनों-बेटियों को बचाने के लिए कश्मीरी पंडित खुद कुल्हाड़ी लेकर उनके सामने खड़े थे। वो रात जब न जाने कितने लोगों ने सिर्फ़ अपने कश्मीरी पंडित होने की सजा पाई थी और अपनी आखों के सामने अपनों को जलते-मरते-कटते देखा था।

बीती 19 जनवरी को उस इस्लामिक बर्बरता के पूरे 30 साल हो गए। जी हाँ, पूरे 30 साल हो गए 4 लाख पंडितों को अपनी सरजमीं से पलायन किए हुए। पूरे 30 साल हो गए उनके घरों की दीवारों को खंडहर बने हुए। पूरे 30 साल हो गए देश-विदेश में जाकर बसे कश्मीरी पंडितों को अपने इंसाफ की लड़ाई लड़ते हुए। इसी 30 साल पूरे होने पर कश्मीरी पंडितों की कहानी बयान करते हुए ‘शिकारा’ नाम की फिल्म अगले महीने यानी 7 फरवरी को सिनेमा घरों में आ रही है। हालाँकि, इस फिल्म को लेकर अभी तक दावा किया जा रहा था कि ये फिल्म उन लोगों की कहानी है, जिन्हें कश्मीर में रातों-रात शरणार्थी बना दिया गया और उनसे उनके जमीन छीन ली गई। लेकिन इस फिल्म निर्देशक के हालिया बयान ने उनके उद्देश्य और निर्देशन पर सवालिया निशान लगा दिया।

विधु विनोद चोपड़ा, जो खुद एक कश्मीरी पंडित होने की बात कहते हैं और जिन्होंने फिल्म के ट्रेलर रिलीज के समय अपने अनुभवों के आधार पर उस रात की सच्चाई को फिल्म के जरिए दिखाने का दावा किया था। लेकिन, उन्होंने अभी अपना हालिया बयान देकर सबको हैरान कर दिया। दरअसल, विधु ने कहा कि ये फिल्म प्रेम के बारे है। उनके मुताबिक उस रात को अब 30 साल बीत गए हैं। इसलिए कश्मीरी मुस्लिमों और पंडितों को एक दूसरे से माफी माँग लेनी चाहिए और दोबारा से दोस्त बनकर एक दूसरे के साथ प्रेम में डूब जाना चाहिए।

अब विधु विनोद चोपड़ा के इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूल पकड़ लिया और कश्मीरी पंडितों ने खुलकर इसका विरोध किया। देखते ही देखते कई लोग सोशल मीडिया पर अपने कड़वे अनुभवों को साझा कर कर रहे हैं। साथ ही उन लोगों की हकीकत भी बता रहे हैं। जो आज भी कश्मीरी पंडितों को खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि अगर वे लौटे तो उन्हें 90 के दशक से दुगना-तिगुना बर्बरता झेलनी होगी।

अब इसमें गलती विधु विनोद चोपड़ा की नहीं है। जो खुद को एक कश्मीरी पंडित बताते हैं और फिल्म इंडस्ट्री में पसरे तथाकथित सेकुलरिज्म के लिहाज से ऐसे बयान देते हैं। गलती उस निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की है। जिसने उन चार लाख पीड़ितों की कहानी को सबसे पहले बड़े सिनेमा पर दिखाने का जिम्मा उठाया। फिर अपने कश्मीरी पंडित होने का दावा कर हिंदुओं की सहानुभूति जुटाई। और फिर फिल्म की रिलीज का समय नजदीक आते ही अपने सेकुलरिज्म का कार्ड खेल दिया।

यहाँ बतौर कश्मीरी पंडित विधु चाहते तो निजी स्तर पर कोई भी बयान देते। किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। वो चाहते तो कश्मीर के मुस्लिमों के गले लग जाते या दोबारा जाकर उनके बीच बस जाते, कोई उन्हें कुछ नहीं कहता। क्योंकि ये उनका निजी फैसला और मत होता। लेकिन इस प्रकार 4 लाख लोगों के साथ हुई बर्बरता का प्रतिनिधित्व करते-करते उसपर ‘प्रेम’ शब्द की लीपा-पोती करना देश के किसी भी उस शख्स को स्वीकार्य नहीं है। जिसने उस रात मस्जिदों से आते अल्लाह-हू-अकबर और आजादी जैसे नारों के पीछे छिपे नापाक मनसूबों को महसूस किया। जिसने उस नफरत में अपनों को खोया और जिसने मानवता के धरातल पर कश्मीरी पंडितों के लिए दशकों से आवाज़ उठाई ।

शिकारा फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा का कहना है कि अब उस घटना को 30 साल बीत चुके हैं। इसलिए अब सब भूलकर आपस में दोबारा मिल जाना चाहिए और मुस्लिमों को हिंदुओं से एवं हिंदुओं को मुस्लिमों से माफी माँगनी चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों वो ये नहीं बताते? यहाँ मुस्लिमों को हिंदुओं से क्यों माफी माँगनी चाहिए ये बात समझ आती है, लेकिन हिंदुओं को विधु जी, मुस्लिमों से क्यों माफी माँगनी चाहिए? ये बात समझ नहीं आती। क्या इसलिए कि मुस्लिमों ने उनकी लड़कियों के साथ बलात्कार किया। या इसलिए कि उन्होंने अपने पड़ोस में रहने वाले मुस्लिमों पर विश्वास किया।

कश्मीर में इस्लामिक बर्बरता का शिकार हुई वैसे तो अनगिनत कहानियाँ हैं लेकिन 25 जून 1990 गिरिजा टिकू नाम की कश्मीरी पंडित की हत्या की कहानी किसी की भी रूह कँपा दे। सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट एक ऐसी महिला जिसने मुस्लिम आतंकियों के डर से कश्मीर छोड़ कर जम्मू में घर बसाया। लेकिन एक दिन उसे किसी ने बताया कि स्थिति शांत हो गई है, तो वो बांदीपुरा आ कर अपनी तनख्वाह ले जाए। मुस्लिम सहकर्मी पर विश्वास कर वह उसके घर रुकी। मगर, उसी रात मुस्लिम आतंकी आए, उसे घसीट कर ले गए। इस दौरान वहाँ के अन्य स्थानीय मुस्लिम चुप रहे क्योंकि किसी काफ़िर की परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना-देना। गिरिजा का सामूहिक बलात्कार किया गया, बढ़ई की आरी से उसे दो भागों में चीर दिया गया, वो भी तब जब वो जिंदा थी। ये खबर कभी अखबारों में नहीं दिखी और न ही इसपर कभी चर्चा हुई।

ऐसी ही न जाने कितनी कहानियाँ है जिन पर बहुत कम चर्चा हुई है। लेकिन आज विधु कहते हैं कि सब कुछ भुलाकर उन लोगों से कश्मीरी पंडितों को गले मिल लेना चाहिए, प्रेम करना चाहिए और सब भुला देना चाहिए। एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार कहते हैं कि निर्देशक ने वर्षों की इस चुप्पी को तोड़ने के लिए सिर्फ एक सॉरी की गुज़ारिश की है, उन्होंने बहुत ज्यादा तो नहीं माँगा।

हमें सोचना होगा कि आखिर एक शख्स, जिसने 1990 में इस्लामिक बर्बरता में अपने घर को लुटते देखा, अपनी मौसी की आवाज खोई। वो आज क्यों कश्मीरी पंडितों पर हुए बर्बर अत्याचार पर फिल्म ‘शिकारा’ बनाते हुए एक भी बार तल्ख नजर नहीं आए। ऐसा इसलिए नहीं कि वो उन अनगिनत कहानियों से अनभिज्ञ हैं। बल्कि ऐसा सिर्फ़ इसलिए ताकि समुदाय विशेष के लोग उनकी ये फिल्म देखने के बाद उन्हें एक निश्चित विचारधारा का न मानें, उनकी टीस को महसूस न करें और उनकी आने वाली फिल्मों पर कभी कोई आपत्ति न जताए।

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टेरर फंडिंग से जुड़े अवैध इ-टिकटिंग रैकेट का पर्दाफाश: गुलाम मुस्तफा गिरफ़्तार, हामिद फरार

भारतीय रेलवे ने अवैध टिकट ख़रीद-बिक्री पर करारा प्रहार करते हुए एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया है। आरपीएफ ने एक ऐसे रैकेट पर शिकंजा कसा, जो अवैध टिकट की दुनिया में पाँव पसारे हुए था। इस मामले में मदरसा से शिक्षित एक आरोपित को गिरफ़्तार किया गया है, जिसने ख़ुद से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की पढ़ाई की और फिर अवैध कारगुजारियों में लग गया। वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इस अवैध टिकटिंग रैकेट के तार टेरर फंडिंग से जुड़े हैं।

इस रैकेट का आतंकियों से क्या रिश्ता है, अधिकारीगण ये पता लगाने में जुटे हैं। आरोपित गुलाम मुस्तफा को भुवनेश्वर से गिरफ़्तार किया गया। उसके पास से भारतीय रेलवे के 563 व्यक्तिगत आईडी कार्ड्स मिले हैं। उसने 2400 एसबीआई शाखाओं की सूची व उनका पूरा विवरण अपने पास रखा हुआ था। यह भी पता चला है कि उसने 600 क्षेत्रीय व ग्रामीण बैंकों में अकाउंट खोल रखे थे। पिछले 10 दिनों से आईबी, स्पेशल ब्यूरो, ईडी और एनआईए गिरफ़्तार आरोपित से पूछताछ में लगी हुई है।

मदरसा शिक्षित गुलाम मुस्तफा के तार न सिर्फ़ आतंकियों की फंडिंग से जुड़े हैं बल्कि मनी लॉन्डरिंग का एंगल भी निकल कर सामने आ रहा है। इस रैकेट के सबसे बड़े सरगना का नाम हामिद अशरफ है। हामिद अशरफ ही इस गैंग का मुख्य कर्ताधर्ता है और पूरी साज़िश को अंजाम देने वाला मास्टरमाइंड भी वही है।

जाँच एजेंसियाँ हामिद अशरफ की तलाश में लग गई है। वो भी एक सॉफ्टवेयर डेवलपर है। 2019 में गोंडा के एक स्कूल में हुए बम धमाके में भी उसका हाथ सामने आया था। फ़िलहाल उसके दुबई भाग जाने की आशंका जताई जा रही है। हामिद अवैध टिकटिंग रैकेट के सहारे प्रति महीने 15 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त किया करता था।

कमलनाथ के मंत्री ने कॉन्ग्रेस के ही किसान नेता को बेइज्जत कर दफ्तर से बाहर निकलवाया, वीडियो वायरल

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार अपनों की ही नाराजगी झेल रही है। ताजा मामला राज्य किसान कॉन्ग्रेस के महासचिव शैलेंद्र वर्मा की है। वह हरदा कलेक्ट्रेट में किसी बात की शिकायत लेकर राज्य सरकार में मंत्री पीसी शर्मा के पास गए थे। मगर उन्ही के मंत्री ने उन्हें उठवाकर हरदा कलेक्ट्रेट से बाहर करवा दिया।

वो कमलनाथ सरकार में राज्य के कानून और कानूनी मामलों के विभाग के राज्य मंत्री पीसी शर्मा के सामने अपनी बात रखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने जैसे ही उन्होंने अपनी बात रखनी चाही, कमलनाथ के मंत्री ने उन्हें कलेक्ट्रेट परिसर से जबरन उठवाकर बाहर करवा दिया। इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है।

आप वीडियो में देख सकते हैं कि कॉन्ग्रेस किसान नेता शैलेन्द्र वर्मा ने पीसी शर्मा को कुछ फोटो दिखाते हुए कहा, “हम लोग निवेदन कर-करके परेशान हो गए हैं। आप लोगों के गुंडे हमारी पिटाई कर रहे हैं।” इसी दौरान मंत्री भड़क गए और डाँटते हुए बोले, “भगाओ इसको यहाँ से।” इसके बाद किसान कॉन्ग्रेस के नेता बोले- “नहीं सर ऐसे नहीं चलेगा। यह कौन-सी बात होती है, आप ऐसे नहीं चिल्ला सकते हैं, मेरे साथ यह अन्याय हो रहा है।” इसके बाद सुरक्षा कर्मियों ने वर्मा को खींचकर बाहर निकालने की कोशिश की। इस पर वर्मा चिल्लाकर बोले, “मुझे मार क्यों रहे हो? मैं जान दे दूँगा। मैं किसानों के लिए लड़ रहा हूँ, पीसी शर्मा हाय-हाय।”

लेकिन किसी ने भी उनकी पूरी बात नहीं सुनी। बाद में शैलेश वर्मा ने आरोप लगाया, “मंत्री जी ने मुझे डाँटा और जेल में बंद करने को कहा। वो सरकार का हिस्सा हैं, उनसे उम्मीद है कि वो हमारी चिंताओं और मुद्दों को सुनें। मैं किसान कॉन्ग्रेस का राज्य महासचिव हूँ, इसके बाद भी वो मेरे साथ इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं।”

बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया, “कॉन्ग्रेस के मंत्री तानाशाही पर उतर आए हैं। स्वयं को राजा समझने लगे हैं। सत्ता का इन पर ऐसा नशा छाया है कि ये अपनों की भी आवाज नहीं सुन पा रहे हैं तो औरों की क्या सुनेंगे? जल्द ही इन्हें समय सबक सिखाएगा।” 

इस वीडियो को देखकर समझा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस सरकार में अपनी ही पार्टी के पदाधिकारी के साथ यह कैसा व्यवहार किया जाता है। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के विधायक और नेता ने अपनी पार्टी के खिलाफ आरोप लगाया है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही पार्टी के विधायक मुन्नालाल गोयल ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाकर विधानसभा के सामने धरने पर बैठ गए थे। उनका कहना है कि वह सरकार को चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादों की याद दिलाना चाहते हैं। उन्होंने कहा था, “मैंने मुख्यमंत्री को भी लिखा था लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसलिए हम यहाँ बैठे हुए हैं।”

साईं बाबा जन्मस्थान: शिरडी के दबाव में CM उद्धव ने वापस लिया बयान, कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा- जाऊँगा कोर्ट

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने साईं बाबा के जन्मस्थान को लेकर दिया गया अपना बयान वापस ले लिया है। ऐसा उन्होंने शिरडी में श्रद्धालुओं के विरोध प्रदर्शन के बाद किया। शिरडी को वर्षों से साईं बाबा का जन्मस्थान माना जाता रहा है लेकिन पाथरी के लोगों का मानना है कि बाबा का जन्म वहाँ हुआ था। मुख्यमंत्री उद्धव ने एक बयान में पाथरी को जन्मस्थान बता दिया। इसके बाद शिरडी में विभिन्न संगठनों ने बंद का आयोजन किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री को अपने बयान से पीछे हटना पड़ा।

अब बयान वापस लेने के बाद शिवसेना प्रमुख फिर से घिर गए हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस विधायक ने सीएम के निर्णय के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। पाथरी के विधायक सुरेश वारपुडकर ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री शिरडी के दबाव के आगे झुक गए हैं। उनका कहना था कि उद्धव को शिरडी और पाथरी से एक-एक प्रतिनिधिमंडल को बुला कर मामले पर विचार-विमर्श करना चाहिए था, फिर कोई फ़ैसला लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि पाथरी के विकास के लिए लिए 100 करोड़ रुपए की माँग की गई थी, जिसकी घोषणा भी हुई।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस विधायक ने ये भी कहा कि अगर उद्धव ठाकरे उनकी बात नहीं सुनते हैं तो वो अदालत जाएँगे क्योंकि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि साईं बाबा का जन्म पाथरी में ही हुआ था। वहीं एनसीपी ने भी कहा है कि मुख्यमंत्री दोनों तरफ़ की बात सुनें। एनसीपी नेता बाबूजानी दुर्रानी ने कहा कि वो इस मामले में सीएम से मिलेंगे। वहीं शिवसेना भी पाथरी में बंद बुला रही है क्योंकि सांसद संजय जाधव ने कहा है कि साईं बाबा का जन्मस्थान पाथरी ही है। शिवसेना सांसद ने कहा कि अगर शिरडी ने सरकार पर दबाव बनाया है तो वो भी दबाव बनाने के लिए तैयार हैं।

शिवसेना की स्थानीय यूनिट पूरे पाथरी में और फिर परभनी में बंद बुलाने की योजना बना रहे हैं। शिरडी और पाथरी के बीच फँसे शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने अपना बयान क्या वापस लिया, पाथरी में उनकी पार्टी सहित अन्य सहयोगी दलों के नेता भी उनके ख़िलाफ़ खड़े हो गए हैं। शिरडी में कई दिनों तक व्यापक विरोध प्रदर्शन चला, जिसके बाद उद्धव को अपना बयान वापस लेना पड़ा था।