हिंदू हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज का साहस और उनकी शूरवीरता विश्वविख्यात है। भारतीय संदर्भ में छत्रपति शिवाजी महाराज को हमेशा एक ऐसे महानायक के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने इस्लामिक आक्रांताओं के दबाव में कभी स्वराज्य का झंडा झुकने नहीं दिया। जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी मराठाओं की शान को बनाए रखा और औरंगजेब जैसे बर्बर मुगल शासक का सामना कर प्रतिपल नए कीर्तिमान रचे। जाहिर है, आज के समय में अगर उनकी विशेषताओं की तुलना किसी व्यक्ति विशेष से की जाए, तो संदर्भ पूरी तरह बदला हुआ होगा। मसलन उस व्यक्ति विशेष के पास भले ही छत्रपति शिवाजी के समय जैसी वेश-भूषा और हथियार नहीं होंगे, लेकिन उसका संकल्प उतना ही दृढ़ और उसके सामने परिस्थियाँ उतनी ही चुनौतीपूर्ण होंगी, जिन्हें देखते-परखते हुए उस शख्स को छत्रपति के समतुल्य रखा गया।
‘आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’
अभी हाल में जय भगवान गोयल नामक लेखक ने नरेंद्र मोदी पर एक किताब लिखी। जिसका शीर्षक उन्होंने- “आज के शिवाजी नरेंद्र मोदी” दिया। निःसंदेह ही ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें नरेंद्र मोदी में उस समय के छत्रपति के कुछ अंश दिखाई दिए। उन्होंने किताब को लेकर कहा भी, “जिस तरह शिवाजी महाराज मुग़लकाल में अपने स्वाभिमान को बनाए रखते हुए काम करते थे, 70 साल में पहली बार ऐसा कोई प्रधानमंत्री आया है जो उसी तरह काम कर रहा है और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस किताब के बारे में सोचा।” लेकिन, पत्रकार से राजनेता और फिर राजनेता से पत्रकार बने आशुतोष की ‘सत्य हिंदी’ वेबसाइट को यह रास नहीं आया।
सत्य हिंदी ने उठाए आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’ पर सवाल
मोदी नीतियों का अपने वेबसाइट के जरिए पुरजोर विरोध करने वाले सत्यहिंदी ने सवाल उठाया कि क्या शिवाजी की तुलना नरेंद्र मोदी से करना तर्क संगत है? क्या एक शासक के रूप में छत्रपति शिवाजी की नीयत और नीतियाँ वैसी ही थीं जैसी मोदी शासन में दिखाई दे रही हैं? धर्म अथवा जाति से संबंधित अनेक विवादित फ़ैसलों को लेकर आज जिस तरह देश में जगह-जगह बेचैनी व विरोध-प्रदर्शन दिखाई दे रहे हैं, क्या शिवाजी के समय भी यही स्थिति थी? क्या शिवाजी की भी मुस्लिमों के प्रति धारणा ऐसी ही थी जैसी आज के सत्ताधारियों की है?
लेख के शीर्षक में ही मढ़ दिया गया नरेंद्र मोदी पर आरोप
सत्यहिंदी पर प्रकाशित इस लेख का शीर्षक “छत्रपति की मोदी से तुलना; क्या शिवाजी को मुस्लिमों से नफ़रत थी?” दिया गया। जिसे लिखने वाले का नाम तनवीर जाफरी है। जाहिर है सत्यहिंदी के इस लेख के शीर्षक के दो मतलब हैं। एक- जो सवाल कर रहा है कि क्या शिवाजी से मोदी की तुलना का ये मतलब है कि वो शिवाजी मुस्लिमों से नफरत करते थे और दूसरा ये जो दावा कर रहा है कि मोदी मुस्लिमों से नफरत करते ही करते हैं। तभी उनकी तुलना जिससे भी होगी उसकी छवि पर सवाल उठेगा ही उठेगा।
तनवीर अपने लेख मे छत्रपति शिवाजी के जीवन से जुड़े कुछ किस्सों और तथ्यों का जिक्र करते हैं और बताने की कोशिश करते हैं कि शिवाजी महाराज में जो विशेषताएँ थी, वो नरेंद्र मोदी में बिलकुल नहीं हैं। तो आखिर कैसे नरेंद्र मोदी की तुलना हो सकती है। वो बताते हैं छत्रपति शिवाजी धर्मनिरपेक्ष शासक थे। जो दूसरे धर्म की महिलाओं की इज्जत करते थे। दूसरे समुदाय के धर्मस्थलों को युद्ध में निशाना नहीं बनाते थे। उनके करीबी मुस्लिम थे और वे अपने शासन काल में कभी पक्षपात नहीं करते थे।
अब हेडलाइन को ध्यान में रखते हुए अगर पूरे लेख को पढ़ा जाए तो समझ आएगा कि छत्रपति शिवाजी की हर विशेषता पर किस्सा सुनाने वाले लेखक शिवाजी के सभी गुणों का उल्लेख कर प्रधानमंत्री के व्यक्त्तिव को उसके उलट बता रहे हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या वाकई परिस्थियों में और दौर में बदलाव आने के बाद ये सवाल वाजिब है। क्या वाकई तनवीर के सवाल सही है और लेखक जय भगवान गोयल का दृष्टिकोण गलत? शायद नहीं। क्योंकि छत्रपति शिवाजी के समय में जिन उद्देश्यों को लेकर उन्होंने संघर्ष किया और विजय प्राप्त की। आज नरेंद्र मोदी भी देश को बचाए रखने के साथ भारतीय संस्कृति-सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए उसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जिसके कारण उन्हें मीडिया गिरोह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
तनवीर के छिपे सवालों का जवाब
अपने लेख में तनवीर कहते हैं कि मोदी से छत्रपति शिवाजी की तुलना गलत है। क्योंकि छत्रपति धर्मनिरपेक्ष थे। लेकिन, शायद तनवीर भूल रहे हैं कि एक मोदी सरकार को लगातार ऐतिहासिक जीत दिलाकर दूसरी बार सत्ता में बिठाने वाली जनता धर्मनिरपेक्ष देश की जनता है। जिसने लोकतांत्रिक तरीके से नरेंद्र मोदी को अपना प्रतिनिधि चुना।
तनवीर, अपने लेख में छत्रपति शिवाजी से पीएम मोदी की तुलना को गलत साबित करने के लिए मुस्लिम महिला का जिक्र करते हैं। जिसे कैदी बनाकर उनके दरबार में ले आया गया और उन्होंने उस घटना को अपने लिए कलंक कहते हुए लड़की को आजाद किया। लेकिन शायद तनवीर यहाँ भी भूलते हैं कि नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक कानून लाकर उन हजारों महिलाओं को उस घुटन के जीवन से आजादी दिलवाई, जिसे उनपर मजहब के नाम पर थोपा गया और उसके नाम पर प्रताड़ित किया गया।
तनवीर लेख में शिवाजी द्वारा लड़ाई में मस्जिद को नुकसान न पहुँचाए जाने वाले आदेश का जिक्र करते हैं। लेकिन फिर भूल जाते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अपने नेतृत्व में मुस्लिमों के लिए हज का कोटा 2 लाख करवाया। क्या ये मुस्लिम समुदाय के लिए तोहफा नहीं हैं?
तनवीर अपने लेख में शिवाजी के विश्वासपात्रों में उनके निजी सचिव मुल्ला हैदर का जिक्र करते हैं। लेकिन मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री मुक्तार अब्बास नकवी और प्रवक्ता शहनवाज हुसैन जैसे लोगों को भूल जाते हैं। जो मुस्लिम होने के बावजूद ईमानदारी के साथ भाजपा से जुड़े हुए और समय-दर समय पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त भी करते हैं।
मोदी सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों का रोडमैप
इन सभी बिंदुओं के अलावा मोदी सरकार ने बहुत से ऐसे काम किए हैं। जो प्रधानमंत्री को भले ही शिवाजी जितना महान न बना पाए। लेकिन एक ऐसी प्रधानमंत्री की छवि जरूर देते है। जिन्होंने वाकई धर्म-जाति-ऊँच-नीच से उठकर देश के लिए काम किया।
उनके नेतृत्व में ही बीते 11 जून को मौलाना आजाद नेशनल एजुकेशन फाउंडेशन की 112वीं गवर्निंग बॉडी की बैठक में केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों का रोड मैप सामने रखा। जिसमें ड्रॉप-आउट बच्चों को ब्रिज कोर्स करवा कर मेनस्ट्रीम एजुकेशन में लाया जाने की बात उठाई गई। साथ ही मुख्यधारा में लाने के लिए वहाँ हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स और साइंस की शिक्षा दिए जाने की बात कही गई। मोदी सरकार के काल में ही अल्पसंख्यक वर्ग के पांच करोड़ छात्रों को अगले 5 साल में छात्रवृत्तियाँ देने की भी योजना तैयार हुई, ताकि अल्पसंख्यक बच्चे इसमें भाग ले पाएँ। इसके अलावा समुदाय विशेष की वक्फ प्रॉपर्टी का विकास करने की योजना भी मोदी सरकार ने ही बनाई।
इतने सबके बावजूद बीते दिनों सीएए-एनआरसी को लेकर विरोध के नाम पर समुदाय विशेष के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी कुंठा और नफरत जमकर निकाली। तनवीर जैसे अन्य कई बुद्धिजीवियों ने सरेआम सड़कों पर उनके पोस्टर जलाए, उनके ख़िलाफ़ नारे लगाए गए, उनके मरने-मारने तक की बातें हुईं। लेकिन किसी ने भी एक बार नरेंद्र मोदी सरकार के उन कार्यों पर नजर नहीं डाली। जिसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार ने सिर्फ़ अल्पसंख्यक समुदाय को समाज में ऊपर उठाने के लिए किया।।।।
कश्मीर का मतलब है वह जमीन जहाँ से पानी को निकाल दिया गया हो। ब्रह्मा के पौत्र और मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि ने इस भूमि से वराहमुला (बारामुल्ला) की पहाड़ियों को काट कर जल को रास्ता दे कर ब्राह्मणों को बसाया था। कश्मीर के मुख्य शहर को कश्यपपुर भी कहा जाता था जिसका रिकॉर्ड हेकेटेइयस और हेरोडोटस के लेखन में क्रमशः कसपेपीरोस और कसपातायरोस, एवम् टोल्मी के समय में ‘कस्पेरिया’ के नाम से मिल जाता है।
यूँ तो कश्मीर में मानवीय सभ्यता आज से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व से शुरु हो जाती है, जिसके पौराणिक, वैदिक और प्रागौतिहैसिक प्रमाण उपलब्ध हैं जहाँ वैदिक काल में उत्तर कुरुओं को कश्मीर में बसने का जिक्र आता है। अगर ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें तो कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ में पौराणिक काल से ले कर बारहवीं शताब्दी तक के शासकों की चर्चा है।
सिकंदर के समकालीन, 326 ईसा पूर्व में अभिसार कश्मीर का राजा था। उसके बाद यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बना और बौद्ध स्तूप और शिव मंदिरों ने कश्मीर में जगह बनाई। फिर कनिष्क का शासनकाल आया, जब बौद्ध और हिन्दू धर्म की शिक्षा का केन्द्र बन कर कश्मीर की ख्याति चीन तक पहुँच चुकी थी। उसके बाद हूणों ने कश्मीर को जीत लिया, फिर कारकोटा साम्राज्य आया, तत्पश्चात उत्पलों का शासन चला। नवीं से 11वीं शताब्दी तक शैव दर्शन पर यहाँ खूब कार्य हुआ।
उसके बाद लोहार वंश के जनविरोधी शासन के कारण वहाँ पहली बार मुगलों के आगमन का रास्ता खुला। चौदहवीं शताब्दी आते-आते इस्लाम कश्मीर घाटी का बहुसंख्यक मजहब बन चुका था। संस्कृत साहित्य गायब कर दिया गया और सुल्तान सिकंदर ने ‘बुतशिकन’ की उपाधि ले कर इस्लामी आतंक की नींव रख दी थी। फारसी ने आधिकारिक भाषा की जगह ले ली। 16वीं शताब्दी में हुमायूँ के सेनापति ने हमला बोल कर कश्मीर को कब्जे में लिया, लेकिन अकबर के काल तक इसे सीधे तौर पर मुगलों ने शासन में नहीं लिया था। शिया, शाफी और सूफियों की प्रताड़ना का सिलसिला हुमायूँ के दौर में खूब चला। बाद में औरंगजेब ने आतंकी शासकों की परंपरा कायम रखी और मजहबी भेदभाव के साथ-साथ हिन्दुओं और बौद्धों से मुगलिया उगाही जारी रखी।
लगभग चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद 19वीं शताब्दी में कुछ समय तक कश्मीर सिखों के शासन में रहा जब पंजाब के रंजीत सिंह ने इसे अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया। 1846-1947 तक डोगरा राजाओं ने कश्मीर पर राज किया। 1901 में कश्मीर घाटी में समुदाय विशेष का प्रतिशत 93.6 था, हिन्दू 5.4% थे। कहने को तो कथित अल्पसंख्यकों का यह प्रतिशत सौ सालों में बहुत बदला नहीं है, जो कि अब 95% से ज्यादा है, लेकिन कश्यप ऋषि के द्वारा वराहमुला की पहाड़ी को काट कर ब्राह्मणों को बसाने वाले कश्मीर में तीस साल पहले जो हुआ, वो धार्मिक नरसंहार हिन्दुओं को भूलना नहीं चाहिए।
तीस साल पहले के कुछ किस्से
25 जून 1990 गिरिजा टिकू नाम की कश्मीरी पंडित की हत्या के बारे में आप जानेंगे तो सिहर जाएँगे। सरकारी स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम करती थी। इस्लामी आतंकियों के डर से वो कश्मीर छोड़ कर जम्मू में रहने लगी। एक दिन किसी ने उसे बताया कि स्थिति शांत हो गई है, वो बांदीपुरा आ कर अपनी तनख्वाह ले जाए। वो अपने किसी मुस्लिम सहकर्मी के घर रुकी थी। इस्लामी आतंकी आए, उसे घसीट कर ले गए। वहाँ के स्थानीय मुस्लिम चुप रहे क्योंकि किसी काफ़िर की परिस्थितियों से उन्हें क्या लेना-देना। गिरिजा का सामूहिक बलात्कार किया गया, बढ़ई की आरी से उसे दो भागों में चीर दिया गया, वो भी तब जब वो जिंदा थी। ये खबर कभी अखबारों में नहीं दिखी।
4 नवंबर 1989 को जस्टिस नीलकंठ गंजू को दिनदहाड़े हायकोर्ट के सामने मार दिया गया। उन्होंने आतंकी मकबूल भट्ट को इंस्पेक्टर अमरचंद की हत्या के मामले में फाँसी की सजा सुनाई थी। 1984 में जस्टिज नीलकंठ के घर पर बम से भी हमला किया गया था। उनकी हत्या कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या की शुरुआत थी।
7 मई 1990 को प्रोफेसर के एल गंजू और उनकी पत्नी को मजहबी आंतंकियों ने मार डाला। पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया। 22 मार्च 1990 को अनंतनाग जिले के दुकानदार पी एन कौल की चमड़ी जीवित अवस्था में शरीर से उतार दी गई और मरने को छोड़ दिया गया। तीन दिन बाद उनकी लाश मिली।
उसी दिन श्रीनगर के छोटा बाजार इलाके में बी के गंजू के साथ जो हुआ वो बताता है कि सिर्फ इस्लामी आतंकी ही इस लम्बे चले धार्मिक नरसंहार की चाहत नहीं रखते थे, बल्कि स्थानीय कट्टरपंथियों का पूरा सहयोग उन्हें मिलता रहा। कर्फ्यू हटा था तो बी के गंजू, टेलिकॉम इंजीनियर, अपने घर लौट रहे थे। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनका पीछा किया जा रहा है, हालाँकि घर के पास आने पर उनकी पत्नी ने यह देख लिया। उनके घर में घुसते ही पत्नी ने दरवाजा बंद कर दिया। दोनों ही घर के तीसरे फ्लोर पर चावल के बड़े डब्बों में छुप गए।
आतंकियों ने छान मारा, वो नहीं मिले। जब वो लौटने लगे तो मजहबी पड़ोसियों ने उन मजहबी आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि वो कहाँ छुपे थे। आतंकियों ने उन्हें बाहर निकाला, गोलियाँ मारी, और जब खून चावल में बह कर मिलने लगा, तो जाते हुए आतंकियों ने कहा, “इस चावल में खून को मिल जाने दो, और अपने बच्चों को खाने देना। कितना स्वादिष्ट भोजन होगा वो उनके लिए।”
12 फरवरी 1990 को तेज कृष्ण राजदान को उनके एक पुराने सहकर्मी ने पंजाब से छुट्टियों में उनके श्रीनगर आने पर भेंट की इच्छा जताई। दोनों लाल चौक की एक मिनि बस पर बैठे। रास्ते में मजहबी मित्र ने जेब से पिस्तौल निकाली और छाती में गोली मारी। इतने पर भी वो नहीं रुका, उसने राजदान जी को घसीट कर बाहर किया और लोगों से बोला कि उन्हें लातों से मारें। फिर उनके पार्थिव शरीर को पूरी गली में घसीटा गया और नजदीकी मस्जिद के सामने रख दिया गया ताकि लोग देखें कि हिन्दुओं का क्या हश्र होगा।
24 फरवरी 1990 को अशोक कुमार काज़ी के घुटनों में गोली मारी गई, बाल उखाड़े गए, थूका गया और फिर पेशाब किया गया उनके ऊपर। किसी भी मजहबी दुकानदार ने, जो उन्हें अच्छे से जानते थे, उनके लिए एक शब्द तक नहीं कहा। जब पुलिस का सायरन गूंजा तो भागते हुए उन्होंने बर्फीली सड़क पर उनकी पीड़ा का अंत कर दिया। पाँच दिन बाद नवीन सप्रू को भी इसी तरह बिना किसी मुख्य अंग में गोली मारे, तड़पते हुए छोड़ा गया, मजहबियों ने उनके शरीर के जलने तक जश्न मनाया, नाचते और गाते रहे।
30 अप्रैल 1990 को कश्मीरी कवि और स्कॉलर सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके पुत्र वीरेंदर कौल की हत्या बहुत भयावह तरीके से की गई। उन्होंने सोचा था कि ‘सेकुलर’ कश्मीरी उन्हें नहीं भगाएँगे, इसलिए परिवार वालों को लाख समझाने पर भी वो ‘कश्मीरी सेकुलर भाइयों’ के नाम पर रुके रहे। एक दिन तीन ‘सेकुलर’ आतंकी आए, परिवार को एक जगह बिठाया, और कहा कि सारे गहने-जेवर एक खाली सूटकेस में रख दें।
उन्होंने प्रेमी जी को कहा कि वो सूटकेस ले लें, और उनके साथ आएँ। घरवाले जब रोने लगे तो उन्होंने कहा, “अरे! हम प्रेमी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। हम उन्हें वापस भेज देंगे।” 27 साल के बेटे वीरेन्द्र ने कहा कि पिता को अँधेरे में वापसी में समस्या होगी, तो वो साथ जाना चाहता है। “आ जाओ, अगर तुम्हारी भी यही इच्छा है तो!” दो दिन बाद दोनों की लाशें मिलीं। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी। पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे, हड्डियाँ तोड़ दी गईं थीं। पिता-पुत्र की आँखें निकाल ली गईं थीं। फिर दोनों को रस्सी से लटकाया गया था, और उनकी मृत्यु सुनिश्चित हो, इसके लिए गोली भी मारी गई थी।
मुजू और दो अन्य लोगों को मजहबी आतंकियों ने किडनैप किया और कहा कि कुछ लोगों को खून की जरूरत है, तो उन्हें चलना होगा। आतंकियों ने उनके शरीर का सारा खून बहा दिया और उनकी मृत्यु हो गई। 9 जुलाई 1990 को हृदय नाथ और राधा कृष्ण के सर कटे हुए मिले। 26 जून 1990 को बी एल रैना जब अपने परिवार को जम्मू लाने के लिए कश्मीर जा रहे थे, तो आतंकियों ने घेर कर मार दिया। 3 जून को, आतंकियों ने उनके पिता दामोदर सरूप रैना की हत्या घर में घुस कर की थी। उन्होंने पड़ोसियों से मदद माँगी, ‘मजहबी’ ही थे, नहीं आए।
अशोक सूरी के भाई को गलती से मजहबी आतंकियों ने उठा लिया। उसे खूब पीटा, टॉर्चर किया और पूरे शरीर को सिगरेट से जलाने के बाद, अधमरे हो जाने पर, बताया कि वो तो उसके भाई के मारना चाहते थे। उसे छोड़ दिया गया। वो किसी तरह घर पहुँच कर भाई को भाग जाने की सलाह देने लगे। भाई ने सलाह नहीं मानी। आधी रात को वो आतंकी घर में आए, लम्बे चाकू से गर्दन काटी और मरने छोड़ कर चले गए।
सोपोर के चुन्नी लाल शल्ला इंस्पेक्टर थे। कुपवाड़ा में पोस्टिंग होने पर उन्होंने दाढ़ी बढ़ा रखी थी कि उन्हें आतंकी पहचान न सकें। एक दिन आतंकी खोजते हुए आए और उन्हें पहचान नहीं पाए, और वापस जाने लगे। उनके साथ ही एक मजहबी सिपाही भी काम करता था। उसने आतंकियों को वापस बुलाया और बताया कि दाढ़ी वाला ही शल्ला हैं। आतंकी कुछ करते उस से पहले उनके मजहबी सहकर्मी ने छुरा निकाला और पूरा दाहिना गाल चमड़ी सहित छील दिया। चुन्नी लाल अवाक् रह गए। तब मजहबी सिपाही ने कहा, “अबे सूअर! तेरे दूसरे गाल पर भी जमात-ए-इस्लामी वाली दाढ़ी नहीं रखने दूँगा।” फिर छुरे से दूसरी तरफ भी काट दिया गया। उसके बाद आतंकियों के साथ मिल कर चुन्नी लाल के चेहरे पर हॉकी स्टिक से ताबड़तोड़ प्रहार किया गया और फिर आतंकियों ने कहा, “दोगले, तेरे ऊपर गोली बर्बाद नहीं करेंगे हम।” रक्त बहते रहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
28 अप्रैल 1990 को भूषण लाल रैना के साथ जो हुआ वो मजहबी आतंकियों की क्रूरता सटीक तरीके से बयान करता है। अगले दिन अपनी माँ के साथ घाटी छोड़ने की योजना थी, सामान बाँध रहे थे। मजहबी आतंकियों की एक टोली आई और रैना के सर में नुकीला छड़ घोंप कर हमला किया। उसके बाद उन्हें खींच कर बाहर निकाला गया, कपड़े उतार कर एक पेड़ पर कीलें ठोंक कर लटकाने के बाद वो उन्हें तड़पाते रहे। भूषण बार-बार कहते रहे कि वो उन्हें गोली मार दें, आतंकियों ने इंतजार किया, गोली नहीं मारी।
25 जनवरी 1998 की रात को वन्धामा गाँव के 23 कश्मीरी हिन्दुओं की हत्या पूर्वनिर्धारित तरीके से की गई। एक बच्चा जो बच गया, उसने बताया कि आतंकी आर्मी की वर्दी में आए, चाय पिया, और अपने वायरलेस सेट पर संदेश का इंतजार करने लगे। जब खबर आ गई कि सारे कश्मीरी पंडितों के परिवार को एक साथ फँसा लिया गया है, तब एक साथ क्लासनिकोव रायफलों से उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उसके बाद हिन्दुओं के मंदिर तोड़ दिए गए और घरों में आग लगा दी गई।
अगर सिक्खों की बात करें तो कई सिक्खों को उनके परिवार के साथ 1990 से 1992 के बीच इसी क्रूरता से मारा गया। इनमें कई जम्मू कश्मीर पुलिस के सिपाही या अफसर भी शामिल थे। ऐसे ही 1989 से 1992 के बीच छः बार ईसाई मिशनरी स्कूलों पर आतंकियों ने बम धमाके किए।
ये कहानियाँ आज क्यों?
इन कहानियों को अभी कहने का मतलब क्या है? इन कहानियों को अभी कहने का मतलब मात्र यह है कि इसमें से 99% कहानियों के पात्रों का नाम आपको याद भी नहीं होगा। इसलिए, इन्हें इनके शीशे की तरह साफ दृष्टिकोण में मैं आपको बताना चाहता हूँ कि शाब्दिक भयावहता जब इतनी क्रूर है तो उनकी सोचिए जिनके साथ ऐसा हुआ होगा। ये किसी फिल्म के दृश्य नहीं हैं जहाँ नाटकीयता के लिए आरी से किसी को काटा जाता है, किसी की खोपड़ी में लोहे का रॉड ठोक दिया जाता है, किसी की आँखें निकाल ली जाती हैं, किसी के दोनों गाल चाकू से चमड़ी सहित छील दिए जाते हैं, किसी के तिलक लगाने वाले ललाट को चाकू से उखाड़ दिया जाता है…
ये सब हुआ है, और लम्बे समय तक हुआ है। इसमें वहाँ के वो मजहबी भी शामिल थे, जो आतंकी नहीं थे, बल्कि किसी के सहकर्मी थे, किसी के पड़ोसी थे, किसी के जानकार थे। सर्वानंद कौल सोचते रहे कि उन्होंने तो हमेशा उदारवादी विचार रखे हैं, उन्हें कैसे कोई हानि पहुँचाएगा, लेकिन पुत्र समेत ऐसी हालत में मरे जिसे सोच कर रीढ़ की हड्डियों में सिहरन दौड़ जाती है।
ये आतंकी बनाम हिन्दू नहीं था, बल्कि ये मुस्लिम बनाम गैर-मुस्लिम था। आतंकी ही होते तो बाजार में घसीटे जा रहे लाश पर कोई मजहबी कुछ बोलता, आतंकियों को घेरता, पत्थर ही फेंक देता। ऐसा नहीं हुआ। चार सौ सालों के इस्लामी शासन के बाद कश्मीर के गैर-मुस्लिम सिमट कर 6% रह गए थे। 1990 की जनवरी से जो धार्मिक नरसंहारों का दौर चला और विभिन्न स्रोतों के मुताबिक तीन से आठ लाख कश्मीरी हिन्दू पलायन को मजबूर हुए।
आज शाहीन बाग के कुछ मजहबी शांतिप्रिय तख्तियाँ लिए उनके प्रति सहानुभूति जता रहे हैं। यह सहानुभूति नहीं है, यह अपने मतलब के लिए तिरंगे से ले कर राष्ट्रगान और संविधान पर थूकने वाले लोगों द्वारा चली गई एक बारीक चाल है। इनकी धूर्तता देखिए कि इनके पोस्टरों में कश्मीरी हिन्दुओं के लिए कथित सहानुभूति तो है, लेकिन जिन्होंने ऐसी नृशंस हत्याएँ की, उन कट्टरपंथियों के लिए एक भी शब्द नहीं?
क्या कश्मीरी हिन्दू किसी उल्कापिंड के गिरने से कश्मीर छोड़ आए थे? क्या उनके मंदिरों पर उत्तरी कोरिया के इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलों के नाभिकीय हथियारों से हमला हुआ था! क्या उनके घर दीवाली की पटाखेबाजी में जल गए थे? क्या उनके सिर में घुसा लोहे का रॉड किसी कश्मीरी भालाफेंक एथलीट का जैवलिन था? क्या भूषण रैना को पेड़ में कीलों से टाँगने की कोशिश रोम के लोगों ने की थी कि यह देखा जाए कि तीन दिन बाद पुनर्जीवित होता है कि नहीं?
तो वो लोग, जो स्वार्थ के कारण, आज कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने की कोशिश कर रहे हैं, कम से कम अपने गिरेबान में तो झाँके कि ये सब वो बस इसलिए कर रहे हैं क्योंकि शाहीन बाग से पहले एक खास विचारधारा के लोगों ने देश के कई हिस्सों में तो आगजनी और पत्थरबाजी की है, पेट्रोल बम फेंके हैं और कट्टे चला कर 19 लोगों की जानें ली हैं, उनसे देश का ध्यान हट जाए।
वो जानते हैं कि शाहीन बाग की नौटंकी करते रहने से जामिया नगर के बसों में लगाई गई आग को लोग भूल जाएँगे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI के 150 मजहबी लोग घुस आए थे। लोग यह भी भूल जाएँगे कि वहाँ ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे लगे थे। लेकिन उन्हें भूलना नहीं चाहिए। वो तुम्हें ‘शाहीन बाग में आज ये हुआ’ दिखाते रहेंगे, लेकिन तुम जामिया नगर की आग, उत्तर प्रदेश में 19 मौतें, बंगाल में 250 करोड़ की प्रॉपर्टी के नुकसान, लखनऊ के परिवर्तन चौक की आगजनी, मस्जिदों से बाहर निकल कर पत्थरबाजी और पेट्रोल बम पर सवाल पूछते रहना। नहीं पूछोगे, तो ये वामपंथी मीडिया तुम्हें ही आतंकी बना कर भुना लेगी।
आपको इनकी दोगलई की दाद देनी चाहिए कि कश्मीर के दो-तीन नारे, जो विशुद्ध रूप से हिन्दुओं को भगाने के लिए ही बने थे, वो जामिया में लगते रहे, शाहीन बाग में लगते रहे, और इनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा बाँटने के पोस्टर हाथ में ले लिए! ‘ला इलाहा इल्लिल्लाह’ और ‘आज़ादी‘ तो हिन्दुओं से घृणा दर्शाने के कश्मीरी नारे हैं। तुम वो नारे भी लगा रहे हो, और कश्मीरी हिन्दुओं का दुख बाँटने का भी दावा करते हो?
हम वापस आएँगे
आज हजारों कश्मीरी हिन्दुओं ने ये कहा है कि ‘हम वापस आएँगे’। लेकिन उनके ऐसा कहने भर से उनकी वापसी संभव नहीं हो जाती। वो अगर यह सोच रहे हैं कि शाहीन बाग के धूर्त प्रपंचियों की तरह उनके स्वागत में घाटी के मुस्लिम तख्तियाँ ले कर खड़े मिलेंगे, तो यह उनकी मूर्खता है। सरकार ने कैम्प तो लगाए थे न इन हिन्दुओं के लिए, उस पर पत्थरबाजी किसने की?
ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने पड़ोसी बी के गंजू के चावल के कंटेनर में छिपे होने की बात घर छोड़ कर वापस जाते आतंकियों को बताई थी। और ऐसे पड़ोसियों ने एक बार नहीं, कई बार अपने पड़ोसी होने के इस धर्म को निभाया जब हिन्दुओं की हत्या करने आए आतंकियों को इन्होंने प्रत्यक्ष सहयोग से ले कर, मौन सहमति तक दी। इसलिए आप यह तो भूल ही जाएँ कि इस्लामी शासन के शुरुआत से ही गायब हुए संस्कृत को फारसी से बदल देने वाले लोगों की संतानें ‘स्वागतम्-स्वागतम्’ करती लाल चौक पर आएँगीं।
इनकी वापसी का रास्ता इतना आसान नहीं है। इस्लाम का इतिहास और वर्तमान बड़ा ही स्पष्ट रहा है, जिस भी इलाके में ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए इनके पास घृणा के अलावा और कुछ नहीं। अगर सिर्फ मुस्लिम ही रहे, तो भी इसी कश्मीर ने 16वीं शताब्दी में इन्हीं मुस्लिमों को आपस ही में शिया, शाफी, और सूफी को प्रताड़ित करते देखा है। म्याँमार में बौद्धों को वहाँ के कट्टरपंथियों ने हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया! उदाहरण असंख्य हैं, इसलिए 95% से ज़्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले इस इलाके में हिन्दुओं को पुनर्स्थापित करना लगभग असंभव कार्य है।
अगर ये हिन्दू वापस जा कर, सर्वानंद कौल की तरह ‘सेकुलर’ राग गा कर, ये सोचने लगेंगे कि तीस साल में वहाँ के मुस्लिमों में बदलाव आ गया होगा, और वो उनकी कविताएँ सुन कर भावुक हो जाएँगे, तो वो भूल जाएँ। भूल इसलिए जाएँ कि हिन्दुओं की सहिष्णुता और उदारवाद को इस्लामी आतंकियों ने सदियों से रौंदा है, उसका फायदा उठाया है। जैसा कि के के मुहम्मद कहते हैं कि भारत अगर एक धर्मनिरपेक्ष और शांत समाज है, जिसमें बीस करोड़ मुस्लिम भी हैं, तो ये सिर्फ हिन्दुओं की वजह से है।
हिन्दुओं को वहाँ बसने के लिए पुराने तरीके त्यागने होंगे। उन्हें यह याद रखना होगा कि उनके मंदिरों पर जब लाउडस्पीकर लगे थे, और वहाँ से न सिर्फ इस्लामी शब्द कहे गए थे, बल्कि यह भी गूँज रहा था कि इनके मर्दों को जाने दो, हमें सिर्फ हिन्दू औरतें चाहिए। इन्होंने उन लड़कियों और स्त्रियों के साथ हर बार एक ही दुष्कृत्य किया है, और उसका पाप वहाँ के हर उस मजहबी को ढोना ही पड़ेगा जो इस त्रासदी पर चुप रहता है।
शाहीन बाग की नौटंकीबाज़ मजहबी औरतों को हर उस हिन्दू का नाम, उनकी हत्या की तारीख, उनकी हत्या का पूर्ण विवरण, हत्या का कारण और उनकी बहू-बेटियों की स्थिति के पोस्टर हाथ में ले कर पूरी दिल्ली में फैल जाना चाहिए और कहना चाहिए कि कट्टरपंथियों के इन कुकर्मों के लिए उनका पूरा समुदाय शर्मिंदा है। अगर इससे एक डिग्री कम भी कुछ कर रहे हैं ये लोग, तो ये बस स्टंट है अपने पिछले पापों को छुपाने का।
मैं नहीं जानता कश्मीरी हिन्दू वापस कब जाएँगे, कैसे जाएँगे। लेकिन मैं यह बात अवश्य जानता हूँ कि कश्यप ऋषि की धरती पर, शारदा और शिव की भूमि पर, जबरन बसे हुए कट्टरपंथी इन हिन्दुओं के लिए पलक-पाँवड़े तो नहीं बिछाएँगे। अगर ये सत्ता के संरक्षण में उस धरती पर कदम रख कर, अपने काष्ठगृहों को दोबारा उठाने की कोशिश करेंगे, तो हाथ में पेट्रोल बम और माचिस ले कर घूमते मजहबी आतंकियों का कोई जत्था, उसे जलाने से बिलकुल नहीं हिचकेगा।
उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब उनकी बेटी को कोई खींच कर ले जाएगा, सामूहिक बलात्कार करने को बाद, बढ़ई की आरी से दो हिस्सों में काट देगा, और लाश दो जगह मिलेगी, तब सेना या पुलिस ये सब होने के बाद मदद को आएगी। क्योंकि सरकारी और न्यायिक प्रक्रिया तो इसी तरह से चलती है। लेकिन ऐसा होने ही न पाए, उसके लिए कश्मीरी हिन्दू क्या करेगा?
तब सवाल यह उठता है कि अगर वो इस बार भी पेट्रोल बम, माचिस, सरिया, क्लासनिकोव, चाकू और बमों से तुम्हारा स्वागत करते हैं, तो हिन्दू इस बार क्या करेगा? मेरे ख्याल से वापस जाने वाले हिन्दुओं को इज़रायल के यहूदियों की कहानी पढ़नी चाहिए। खास कर, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाली।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हॉस्टल फीस में वृद्धि को लेकर लंबे समय से हंगामा हो रहा है। इस बीच JNU के कुलपति एम जगदीश कुमार ने बताया कि 8500 छात्रों में से 82% छात्रों ने नई हॉस्टल फीस भरकर विंटर सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन करा लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि बाक़ी छात्र भी जल्द ही नई हॉस्टल फीस के अनुसार रजिस्ट्रेशन करा लेंगे, क्योंकि अभी विलंब शुल्क के साथ इसका विकल्प उपलब्ध है।
M Jagadesh Kumar, JNU Vice Chancellor: Out of 8500 students at JNU, 82% of students have cleared their hostel dues for winter registration as on Monday. Remaining students are also expected to complete their registration process since registration is still open with a late fee. pic.twitter.com/Q60qAMcVar
इससे पहले, JNU के कुलपति जगदीश कुमार ने गुरुवार (जनवरी 16, 2019) को बताया था कि 8500 स्टूडेंट्स JNU में पढ़ते हैं और इनमें से 6450 हॉस्टल में रहते हैं, बाकी डे-स्कॉलर्स हैं और 95 प्रतिशत डे स्कॉलर्स ने भी अपनी बकाया सेमेस्टर फीस जमा कर दिया। वीसी जगदीश कुमार ने कहा था, “कैंपस के हॉस्टल में रहने वाले 65% से अधिक छात्रों ने अपने बकाया शुल्क का भुगतान कर दिया है। कुछ छात्र जो इस बीच अपने घर चले गए थे वे भी वापस कैंपस में लौट रहे हैं।” उन्होंने शुल्क का भुगतान करने वाले अन्य छात्रों की संख्या में वृद्धि होने की संभावना जताई थी।
इसके साथ ही प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की आखिरी तारीख को भी दो दिन आगे बढ़ा दिया था। जगदीश कुमार ने अपने बयान में कहा था, “15 जनवरी को विंटर सेमेस्टर के लिए रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख थी, जिसकी वजह से फीस काउंटर्स पर छात्रों की भारी भीड़ जमा रही। कई स्टूडेंट्स तारीख बढ़ाने की गुजारिश के साथ हमारे पास पहुँचे। जिसके बाद उनकी सुविधा को देखते हुए रजिस्ट्रेशन की तारीख आखिरी बार 2 दिन के लिए बढ़ा दिया गया।”
JNU प्रशासन के अनुसार, सभी स्कूलों और केंद्रों ने अपना टाइम टेबल घोषित कर दिया गया है। JNUSU के नेतृत्व में आंदोलन और बहिष्कार के बारे में बात करते हुए विश्वविद्यालय के वीसी जगदीश कुमार ने कहा था कि सभी स्कूलों और केंद्रों ने अपना टाइम टेबल घोषित कर दिया है और वे उन छात्रों के लिए परीक्षा आयोजित करने पर काम कर रहे हैं, जो पिछला सेमेस्टर पास नहीं कर पाए थे। उन्होंने बताया था कि विश्वविद्यालय छात्रों के शैक्षणिक हितों को देखते हुए वह सभी कोशिशें कर रहा है जिससे कि छात्र अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर दिल्ली समेत देश के कई शहरों में लगातार विरोध हो रहा है। CAA और NRC को लेकर कई नेताओं के समर्थन और विरोध में बयान सामने आ रहे हैं। इसी बीच राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस नेता (NCP) और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री जितेंद्र आव्हाड ने CAA और NRC को लेकर विवादित बयान दिया है।
#WATCH Jitendra Awhad,NCP in Thane:Main Delhi ke takht se poochta hoon,ab tu maangega mujhse saboot mere deshvasi hone ka?Toh sun,jab tera baap sar jhukakar angrezon ke talwe chaat raha tha,tab mera baap phansi ke takht ko choomke inquilab zindabad ke naare laga raha tha.(18.01) pic.twitter.com/WOwKP167xQ
एनसीपी नेता ने केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा, “मैं दिल्ली के तख्त से पूछता हूँ, अब तू माँगेगा मुझसे सबूत मेरे देशवासी होने का, तो सुन, जब तेरा बाप सर झुकाकर अंग्रेजों के तलवे चाट रहा था, तब मेरा बाप फाँसी के तख्त को चूमके इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहा था।”
जितेंद्र के इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आने के बाद एनसीपी नेता के इस बयान की जमकर आलोचना की जा रही है। उल्लेखनीय है कि विपक्षी पार्टियाँ इस कानून को वापस लेने की माँग कर रही है। साथ ही जहाँ-जहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है, उन राज्यों में इसे लागू नहीं करने का ऐलान किया है। हालाँकि, यह असंवैधानिक है और इस बात को कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने भी माना है।
इससे पहले महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने संशोधित नागरिकता कानून को राज्य में लागू नहीं करने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, “महाराष्ट्र में हमारी सरकार है। कई मुस्लिम भाइयों ने कहा था कि बीजेपी उनके लिए सबसे बड़ी दुश्मन है और इसलिए बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कॉन्ग्रेस को सत्ता में आना होगा। इसी कारण से हमने महाराष्ट्र में सरकार बनाई। जब तक महाराष्ट्र में हमारी सरकार है, हम महाराष्ट्र में सीएए लागू नहीं करेंगे।”
वहीं महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा था कि केंद्र सरकार कानून जरूर बना सकती है, लेकिन उसे लागू करने का जिम्मा पूरी तरह राज्य सरकार के पास होता है। देशमुख ने कहा था, “महाराष्ट्र में हमारी सरकार है और केंद्र सरकार कानून जरूर बना सकती है लेकिन इसे लागू करना या नहीं करना राज्य सरकार के हाथ में होता है।”
बिहार के बहुचर्चित मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम मामले में सोमवार (20 जनवरी) को दिल्ली के साकेत स्थित विशेष कोर्ट ने आरोपितों के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाते हुए उन्हें दोषी करार दिया। कोर्ट ने मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम कांड के मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर समेत 19 आरोपितों को दोषी करार दिया, जबकि एक आरोपित को बरी कर दिया। अब दोषियों की सज़ा पर 28 जनवरी को बहस की जाएगी।
Bihar’s Muzaffarpur shelter home case: The court has listed the matter for argument on quantum of sentence on January 28 https://t.co/pVbhtj1vu6
सोमवार को फ़ैसले की चौथी तारीख थी। आरोपितों के ख़िलाफ़ यह फ़ैसला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ कुलश्रेष्ठ की अदालत की तरफ से सुनाया गया। इस मामले में CBI ने 21 आरोपितों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दाखिल किया था। आरोप-पत्र में आरोपितों के ख़िलाफ़ बलात्कार, आपराधिक साज़िश व बाल यौन शोषण रोकथाम अधिनियम (पॉक्सो) की धारा-6 के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोप सिद्ध होने पर प्रावधान के तहत आरोपितों को कम से कम 10 साल की जेल व अधिकतम उम्रक़ैद की सज़ा हो सकती है।
दोषियों के नाम
ब्रजेश ठाकुर (संरक्षक)
इंदु कुमारी (अधीक्षिका)
मीनू देवी (हाउस मदर)
मंजू देवी (काउंसलर)
चंदा देवी (हाउस मदर)
नेहा कुमारी (नर्स)
किरण कुमारी (हेल्पर)
हेमा मसीह (प्रोबेशनरी अधिकारी)
रवि रोशन (निलंबित सीपीओ- बाल संरक्षण पदाधिकारी)
विकास कुमार (सीडब्लूसी- बाल कल्याण समिति सदस्य)
रोजी रानी (तत्कालीन सहायक निदेशक)
विजय कुमार तिवारी (ब्रजेश का ड्राइवर)
गुड्डू कुमार (रसोईया)
कृष्णा कुमार राम (सफाईकर्मी)
रामानुज ठाकुर (गेटकीपर)
साइस्ता परवीन उर्फ़ मधु (ब्रजेश की क़रीबी)
अश्विनी कुमार (कथित डॉक्टर)
दिलीप वर्मा (सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष)
रामाशंकर सिंह उर्फ़ मास्टर साहब
इनके अलावा, विक्की जोकि मधु का भाँजा है, उसे कोर्ट ने बरी कर दिया और प्रेमिला (कथित डॉक्टर) अभी भी फ़रार है।
दरअसल, बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम मामले में 4 मई, 2019 को CBI ने सुप्रीम कोर्ट में 11 लड़कियों के मर्डर की आशंका जताई थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए हलफ़नामे में सीबीआई ने कोर्ट को बताया था कि जाँच के दौरान दर्ज किए गए पीड़ितों के बयान में 11 लड़कियों के नाम सामने आए थे, जिनकी आरोपितों ने कथित रूप से हत्या की थी। जाँच एजेंसी के मुताबिक़ एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई की गई, जहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद की गई थी।
ग़ौरतलब है कि बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में एक एनजीओ द्वारा संचालित शेल्टर होम में कई लड़कियों का कथित रूप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया गया था और टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के बाद यह मामला सामने आया था। इसके बाद मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी गई थी और एजेंसी ने ब्रजेश ठाकुर समेत 21 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर किया था। फ़िलहाल, मुख्य आरोपित ब्रजेश ठाकुर, साइस्ता परवीन उर्फ़ मधु समेत 20 आरोपित जेल में हैं।
मध्य प्रदेश सरकार राजगढ़ की महिला कलेक्टर निधि निवेदिता और डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं करेगी। प्रदेश के कानून मंत्री पीसी शर्मा ने यह जानकारी दी है। रविवार (जनवरी 19, 2019) को राजगढ़ जिले में महिला कलेक्टर द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई के मामले में कॉन्ग्रेस ने राजनीति करनी शुरू कर दी है।
इस पूरे मामले का एक नया वीडियो सामने आया है, जिसमें भाजपा कार्यकर्ता हाथों में तिरंगा लेकर भारत माता की जय और वंदे मातरम का नारा लगा रहा है। वहीं, राजगढ़ की महिला कलेक्टर निधि निवेदिता उसे रोकने के लिए उसकी कमीज पकड़ कर उसे घसीट रही हैं। इससे पहले एक वीडियो सामने आया था जिसमें डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा ने प्रदर्शनकारियों के साथ हाथापाई शुरू कर दी थी।
#WATCH Madhya Pradesh: Rajgarh Collector Nivedita prevented BJP workers from holding a demonstration in support of #CAA, in Rajgarh. (19.01.2020) pic.twitter.com/QGarsE5APy
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थन में निकाली गई रैली में डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा पहुँची और प्रदर्शनकारियों को पीटना शुरू कर दिया। प्रिया वर्मा ने प्रदर्शनकारियों को वहाँ से हटने के लिए कहा। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर एक-दो थप्पड़ भी रसीद दिए, जिसके बाद वहाँ के हालात बदल गए। इसी दौरान किसी ने उनकी चोटी पकड़कर खींच दी। इस मामले में राजगढ़ पुलिस ने 650 लोगों के खिलाफ मामले दर्ज भी कर लिए हैं, लेकिन इन दोनों अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार कोई एफआईआर नहीं करेगी।
पीसी शर्मा ने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा, “प्रदर्शनकारियों द्वारा हमला किए जाने के बाद दोनों अधिकारी खुद का बचाव कर रहे थे। महिलाओं को अपमानित करना भाजपा और आरएसएस की संस्कृति है। सरकार दोनों अधिकारियों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेगी।”
मप्र के राजगढ़ में भाजपा की गुण्डा गर्दी सामने आ गयी। महिला ज़िला कलेक्टर और महिला एसडीएम अधिकारीयों को पीटा गया बाल खींचे गये। महिला अधिकारीयों की बहादुरी पर हमें गर्व है।
वहीं, इस मामले में मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर महिला अधिकारी की तारीफ की है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “मध्य प्रदेश के राजगढ़ में भाजपा की गुण्डा गर्दी सामने आ गई। महिला जिला कलेक्टर और महिला एसडीएम अधिकारियों को पीटा गया बाल खींचे गए। महिला अधिकारीयों की बहादुरी पर हमें गर्व है।”
राजगढ़ की घटना ने सिद्ध किया है कि मध्यप्रदेश में अराजकता अब बर्दाश्त के बाहर हो गई है। मैं स्वयं, मेरे साथ पूर्व मुख्यमंत्री श्री @ChouhanShivraj,राष्ट्रीय महासचिव श्री @KailashOnline व नेता प्रतिपक्ष श्री @bhargav_gopal 22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएंगे
इधर, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कलेक्टर के खिलाफ राजगढ़ जाकर FIR दर्ज कराने की बात कही। उन्होंने ट्वीट किया, “राजगढ़ की घटना ने सिद्ध किया है कि मध्य प्रदेश में अराजकता अब बर्दाश्त के बाहर हो गई है। मैं स्वयं, मेरे साथ पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव 22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएँगे।”
22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएंगे। @OfficeOfKNath सरकार @BJP4MP के कार्यकर्ताओं के साथ ज्यादती कर रही हैं। उसे लगता है कि @BJP4MP का कार्यकर्ता डर के मारे आंदोलन करने बाहर नहीं निकलेगा। तो कांग्रेस यह मतिभ्रम दूर कर ले। हमारा कार्यकर्ता डरने वाले नही है। https://t.co/ntjPEpH5zs
— Gopal Bhargava (Leader of Opposition) (@bhargav_gopal) January 20, 2020
नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने भी इस बाबत ट्वीट करते हुए लिखा, “22 जनवरी को कलेक्टर के खिलाफ FIR दर्ज कराने राजगढ़ जाएँगे। कमलनाथ सरकार बीजेपी सरकार के साथ ज्यादती कर रही है। उसे लगता है कि बीजेपी कार्यकर्ता डर के मारे आंदोलन करने बाहर नहीं निकलेगा। हमारा कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है।”
दक्षिण कश्मीर के शोपियाँ इलाके में अपने आतंकरोधी अभियान पर गंभीरता से एक्शन लेते हुए सुरक्षाबल ने सोमवार (जनवरी 20, 2020) को घंटों चली मुठभेड़ के बाद हिजबुल के 3 आतंकियों को ढेर कर दिया। मारे गए तीन आतंकियों में एक नाम आदिल डार का भी है। जो कुछ समय पहले एसपीओ की नौकरी छोड़ आतंकवादी बना था और पूर्व विधायक अहमद डार के घर से सुरक्षाकर्मियों की राइफल लेकर फरार हो गया था। आदिल के अलावा मारे गए अन्य दो आतंकियों की पहचान जहाँगीर और वसीम वानी के रूप में हुई। सुरक्षाबल ने इनके पास से भारी तादाद में हथियार व गोला बारूद बरामद किए।
जानकारी के अनुसार इस मुठभेड़ में मिली कामयाबी के बाद भी सुरक्षाबल शांत नहीं बैठे हैं। आसपास के इलाकों में तलाशी अभियान जारी है। उन्हें शक है कि इलाके में कई अन्य आतंकी भी छिपे हो सकते हैं।
एसपीओ से आतंकी बना आदिल डार (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)
गौरतलब है कि बीते दिनों दक्षिण कश्मीर से आतंकी नवीद के पकड़े जाने के बाद शाेपियाँ में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच यह पहली मुठभेड़ थी। जिसमें इलाके की पुलिस ने सेना और सीआरपीएफ के जवानों के साथ मिलकर सफलता हासिल की।
बता दें, इलाके में तीन आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिलने के बाद आज़ सुबह-सुबह ये तलाशी अभियान शुरू किया गया था। अभियान के दौरान सेना को सामने से आता देख आतंकियों ने छिपकर उनपर फायरिंग की और वहाँ से भागने का प्रयास किया। लेकिन इसी बीच जवानों ने खुद को सुरक्षित करते हुए जवाबी कार्रवाई में फायरिंग शुरू की। आतंकी भी इस दौरान सरेंडर को तैयार नहीं हुए। नतीजतन घंटों चली मुठभेड़ के बाद सुरक्षाबल ने तीनों आतंकियों को मार गिराया। तलाशी में इनके पास से भारी तादाद में हथियार व गोला-बारूद बरामद हुए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शोपियाँ के एसएसपी संदीप चौधरी ने खुद तीनों आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया, “तीनों आतंकी वाची क्षेत्र में छिपे हुए थे। उन्हें सरेंडर करने का पूरा मौका दिया गया। लेकिन वे लगातार हमपर फायरिंग कर रहे थे। इसलिए हमें भी जवाबी फायर करना पड़ा। मुठभेड़ के दौरान स्थानीय नागरिकों को नुकसान न पहुँचे इसके लिए मुठभेड़ स्थल के आस-पास के घरों में रहने वाले लोगों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया गया था।”
पिछले कुछ समय से भारत विरोधी रुख अपनाने वाले मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने सोमवार को कहा है कि वह भारत के खिलाफ किसी तरह की जवाबी कार्रवाई नहीं करेंगे। ज्ञात हो की महातिर कश्मीर मुद्दे से लेकर नागरिकता कानून (CAA) को लेकर भारत की तीखी आलोचना कर चुके हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने सोमवार (जनवरी 20, 2020) को स्पष्ट किया कि उनका देश अपने पाम ऑइल के आयात का बहिष्कार किए जाने पर भारत के खिलाफ कोई जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा। उन्होंने यह माना कि भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के सामने मलयेशिया कहीं नहीं टिकता है, इसलिए जवाबी कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता है।
मुस्लिम बहुल मलेशिया के 94 वर्षीय मलेशियाई पीएम ने कहा, “हम जवाबी कार्रवाई करने के लिहाज से बेहद छोटे हैं। हमें इससे उबरने का तरीका और साधन ढूँढना होगा।”
गौरतलब है कि मलेशिया ने विवादित इस्लामिक धर्मगुरु जाकिर नाइक का स्थायी निवासी का दर्जा खत्म करने से भी मना कर दिया है। मलेशिया के इस फैसले को लेकर भी भारत नाराज है। जाकिर नाइक पर भारत में धर्म के नाम पर हेट स्पीच देने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। वह मलेशिया में पिछले तीन सालों से रह रहा है।
खाद्य तेल खरीद रोककर भारत ने दिया था मलेशिया को झटका
मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में खाद्य तेल के सबसे बड़े खरीददार भारत ने मलेशिया से तेल के आयात पर रोक लगा दी। इस मामले पर महातिर के भारत की नीतियों के खिलाफ हमलावर होने से जोड़कर देखा जा रहा था।
मलेशिया के प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निष्प्रभावी किए जाने और नागरिकता कानून में संशोधन किए जाने पर भारत सरकार की आलोचना की थी। जिसके जवाब में भारत ने इस महीने से मलेशिया के पाम ऑइल का आयात रोक दिया। मलेशिया दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पाम तेल उत्पादक देश है, ऐसे में उसके सबसे बड़े आयातक के बहिष्कार से बहुत बड़ा झटका लगा है।
भारत पिछले पाँच सालों में मलेशिया से खाद्य तेल खरीदने वाला शीर्ष खरीदार रहा, लेकिन अब मलेशिया के लिए तेल बेचना मुश्किल हो गया है। मलेशिया की अर्थव्यवस्था में तेल निर्यात की अहम हिस्सेदारी है।
मलेशियाई महातिर मोहम्मद ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के विरोध में भी पाकिस्तान का साथ दिया था। मलेशियाई पीएम ने कहा था कि भारत ने कश्मीर पर कब्जा कर रखा है। 27 सितंबर 2019 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने अपने बयान में कहा था, “संयुक्त राष्ट्र के संकल्प के बावजूद, कश्मीर पर हमला कर कब्जा किया जा रहा है। इस कार्रवाई के पीछे कुछ वजहें हो सकती हैं लेकिन फिर भी ये गलत है। इस समस्या का समाधान शांतिपूर्वक तरीकों से ही होना चाहिए।”
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने UAE बेस्ड एनआरआई कारोबारी सीसी थम्पी को मनी लॉन्डरिंग के मामले में गिरफ्तार किया है। सीसी थम्पी को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के जीजा और प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा का करीबी माना जाता है। थम्पी दुबई में रहकर भारत की कई डिफेंस डील करवाने का भी आरोपित है। थम्पी दुबई सहित भारत के कई लोकेशन पर अवैध संपत्ति बना चुका है।
यह मामला विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के कथित तौर पर उल्लंघन का है। ईडी ने 2017 में कारोबारी पर एक हजार करोड़ रुपए का कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था। दुबई के कारोबारी को इससे पहले एजेंसी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ड वाड्रा और हथियार विक्रेता संजय भंडारी के साथ कथित संबंधों पर पूछताछ के लिए भी तलब कर चुकी है। थम्पी के खिलाफ फेमा (FEMA) के कारण बताओ नोटिस के तहत जिन कंपनियों के खिलाफ जाँच चल रही है उनमें हॉलीडे सिटी सेंटर प्राइवेट लिमिटेड, हॉलीडे प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड और हॉलीडे बेकल रिजॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल है। उनके ऊपर 288 करोड़ रुपए को लेकर जाँच चल रही है।
Enforcement Directorate (ED) has arrested CC Thampi of Holiday Group. He & his 3 companies, Holiday City Centre, Holiday Properties and Holiday Bekal Resorts were under ED investigation, under Foreign Exchange Management Act,1999 for an aggregate amount of Rs. 288 crores pic.twitter.com/zuNWOVPI8A
फरवरी 2019 में रॉबर्ट वाड्रा से सीसी थम्पी के साथ उनके संबंधों को लेकर पूछताछ की गई थी। प्रवर्तन निदेशालय को शक है कि 2009 में हुए एक पेट्रोलियम करार के लिए एक शारजाह स्थित कम्पनी के माध्यम से डील फाइनल किया गया था। इस कम्पनी के संयुक्त अरब अमीरात स्थित एनआरआई व्यवसायी सीसी थम्पी द्वारा नियंत्रित होने की बात सामने आई थी। वाड्रा से सीसी थम्पी और संजय भंडारी के साथ लंदन में बेनामी संपत्ति रखने के बारे में भी पूछताछ की गई थी। संयुक्त अरब अमीरात में थम्पी की स्काईलाइट्स नाम की कम्पनी है और भारत में स्काईलाइट्स प्राइवेट लिमिटेड के वाड्रा के साथ सम्बन्ध की बात सामने आई है। राजस्थान के बीकानेर में एक अवैध ज़मीन सौदे को लेकर भी ये कम्पनी प्रवर्तन निदेशालय के रडार पर है। इसकी जाँच चल रही है।
सीसी थम्पी पर विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम के उल्लंघन का मामला चल रहा है। यह मामला सैंकड़ों करोड़ रुपयों की हेराफेरी से जुड़ा है। ईडी ने पिछले साल 288 करोड़ रुपए से अधिक के सौदों में दिल्ली-एनसीआर और उसके आसपास कृषि और अन्य भूमि के अवैध अधिग्रहण के लिए उसे कारण बताओ नोटिस दिया था। सीसी थम्पी, रॉबर्ट वाड्रा और संजय भंडारी ‘क़रीबी दोस्त’ हैं।
Opindia.com ने राहुल गाँधी और एचचएल पाहवा के बीच जमीन सौदे को लेकर खुलासा किया था, जिसमें निम्नलिखित तथ्य सामने आए थे:-
1. राहुल गाँधी ने कथित रूप से कम कीमत पर एचएल पाहवा से जमीन खरीदी।
2.रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा भी एचएल पाहवा से जमीन खरीदी गई थी। कई मामलों में, एचएल पाहवा द्वारा इन्हीं ज़मीनों को बढ़े हुए मूल्य पर वापस खरीदा गया था। वो भी तब जबकि पाहवा का कैश बैलेंस निगेटिव में था।
3. इस खरीद को साफ-सुथरा दिखाने के लिए, एचएल पाहवा ने सीसी थम्पी से पैसे लिए थे।
4. सीसी थम्पी और संजय भंडारी करीबी दोस्त हैं। उनके बीच कई वित्तीय लेनदेन भी हुए थे।
5. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है और रॉबर्ट वाड्रा का करीबी दोस्त भी। उसे रक्षा सौदे और पेट्रोलियम सौदे में कमिशन (किकबैक) भी मिला था।
6. कमिशन (किकबैक) की इसी राशि से संजय भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा से बेनामी संपत्ति खरीदी थी, यहाँ तक कि उसने इन संपत्तियों के नवीनीकरण (रेनोवेशन) के लिए भी भुगतान किया था।
7. इस संपत्ति को फिर सीसी थम्पी को बेचा गया था।
8. फिलहाल ईडी थम्पी के साथ रॉबर्ट वाड्रा की निकटता की जाँच कर रहा है।
9. ये सभी सौदे कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान हुए थे।
10. संजय भंडारी एक हथियार डीलर है। 2012 से 2015 के बीच राफेल सौदे में ऑफ़सेट पार्टनर बनने की पैरवी संजय भंडारी कर रहा था लेकिन राफेल बनाने वाली कंपनी दसौं ने उसे अपने साथ करने से मना कर दिया था।
11. 126 राफेल जेट की खरीद से संबंधित फाइल रक्षा मंत्रालय से गायब हो गई थी और बाद में इसे सड़क पर पाया गया था। आरोप है कि भंडारी ने फाइल चुराई थी। आरोप यह भी है कि भंडारी महत्वपूर्ण फाइलों की फोटोकॉपी करता था और जिन डिफेंस कॉन्ट्रैक्टरों के साथ उसके संबंध अच्छे थे, उन्हें वो कॉपी उपलब्ध करवाता था।
12. अरुण जेटली ने आरोप लगाया था कि जब कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान राफेल को अंतिम रूप दिया जा रहा था, तो यूरोफाइटर के बारे में बैकरूम बातें हुआ करती थीं।
13. ऐसी अफवाहें भी हैं कि राहुल गाँधी जर्मनी में यूरोफाइटर के प्रतिनिधियों से मिले थे।
इन तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना आसान है कि रॉबर्ट वाड्रा की तरह राहुल गाँधी भी हथियार डीलर संजय भंडारी से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। संजय भंडारी जो न केवल गाँधी परिवार का करीबी है, बल्कि राफेल सौदे में जिसे दसौं ने फटकार भी लगाई थी। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में संजय भंडारी को कथित तौर पर रक्षा और पेट्रोलियम सौदों में कमिशन (किकबैक) भी मिला था।
ऑपइंडिया के खुलासा के बाद इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि ईडी ने राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के साथ एचएल पाहवा की लैंड डील को लेकर पूछताछ की थी और साथ ही पाहवा को ईडी ने समन भी किया था। अब सीसी थम्पी की गिरफ्तारी के बाद न केवल रॉबर्ट वाड्रा, बल्कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की मुसीबतें भी बढ़ सकती हैं।
CAA और NRC के विरोध में ऐसे प्रकरण भी सामने आ रहे हैं जिन्हें देख या सुनकर अपनी हँसी रोक पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। कहीं कोई किसी की चोटी खींच कर झगड़ा शुरू कर रहा है, तो कहीं कोई ‘500 रुपए लेकर’ शाहीनबाग़ में चल रहे विरोध में शामिल होने की बात कर रहा है।
ऐसा ही एक वीडियो सामने आया है जिसमें आरजेडी (RJD) के राज्यसभा सांसद अशफाक करीम की भाषण देते समय पैंट खुल गई। दरअसल, अशफाक करीम सीएए और एनआरसी के विरोध में भाषण दे ही रहे थे कि तभी उनकी पैंट खुल गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, RJD के राज्य राज्यसभा सांसद अशफाक करीम ने CAA और NRC के विरोध में खड़े होकर भाषण देना शुरू ही किया था और भाषण देते हुए महज 17 सेकेंड ही बीता था कि उनकी पैंट ही खुलकर गिर गई। इस प्रकरण के दौरान भी अशफाक करीम एक हाथ में माइक थामे हुए उसी जज्बे के साथ भाषण देते रहे और दूसरे हाथ से नीचे गिरे पैंट को सरका कर अपनी जगह पर लाने की कोशिश करने लगे।
अररिया — आरजेडी के राज्यसभा सांसद असफाक करीम CAA के विरोध में सभा को संबोधित कर रहे थे और अचानक ???
हालाँकि, इस दुखद घटना के बावजूद भी RJD सांसद ने धैर्य नहीं खोया और पैंट को वापस यथास्थान पकड़कर भाषण देते रहे। भले ही आस-पास मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान आ गई। इस दौरान राज्यसभा सांसद अशफाक करीम के पास खड़े एक शख्स ने सांसद महोदय की पैंट को ऊपर तोंद तक वापस चढ़ाने में मदद करते हुए भी नजर आए।
बताया जा रहा है कि यह वीडियो 4 दिन पहले का है जब बिहार विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष तेजश्वी यादव वहाँ पहुँचने वाले थे और CAA-NRC के विरोध में अपना भाषण देने वाले थे। ‘हम है भारत संस्था’ द्वारा बनाए गए सभा स्थल पर वे इससे पहले लोगों को संबोधित कर रहे थे।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कई लोगों ने रिएक्ट किया कि, हम भी देखेंगे। कई लोगों ने इसे दुःखद भी बताया।