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कश्मीरी हिन्दुओं का नरसंहार: नदीमर्ग में 70 साल की महिला से लेकर 2 साल के मासूम तक को मारी गोली

एक इंग्लिश मैगज़ीन को 2018 में रामकिशन धर बताते हैं, “बगल वाली मस्जिद से पंडितों और भारत के खिलाफ ऊँची आवाज में नारें लगने शुरू होते ही हम समझ जाते थे कि हमारा यहाँ से जाने का समय आ गया है।” ऐसा 1989 से लगातार होता रहा और आज कश्मीर घाटी हिन्दुओं से लगभग खाली हो गई है। जम्मू-कश्मीर जिसे धरती का स्वर्ग कहा गया वह हिन्दुओं के लिए नरक बन गया। खुले तौर पर वहाँ एक नहीं, बल्कि कई नरसंहारों को अंजाम दिया गया। इन मामलों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं की गई। ऐसा ही एक दास्ताँ नदीमर्ग नरसंहार की है।

शोपियाँ जिले में नदीमर्ग (अब पुलवामा में) एक हिन्दू बहुल गाँव था, जिसकी कुल आबादी मात्र 54 थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के पैतृक गाँव से 7 किलोमीटर दूर स्थित इस गाँव में 23 मार्च, 2003 की रात सब तबाह हो गया। जब पूरा देश भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की याद में शहीद दिवस मना रहा था, तब नदीमर्ग में हिन्दुओं का नरसंहार हो रहा था। उस दिन 7 आतंकवादी गाँव में घुसे और सभी हिन्दुओं को चिनार के पेड़ के नीचे इकठ्ठा करने लगे। रात के 10 बजकर 30 मिनट पर इन आतंकियों ने 24 हिन्दुओं की गोली मार कर हत्या कर दी। गौर करने वाली बात थी कि 23 मार्च को पाकिस्तान का राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है।

मरने वालों में 70 साल की बुजुर्ग महिला के साथ 2 साल का मासूम बच्चा भी शामिल था। क्रूरता की हद पार करते हुए एक दिव्यांग सहित 11 महिलाओं, 11 पुरुषों और 2 बच्चों पर बेहद नजदीक से गोलियाँ चलाई गई। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि पॉइंट ब्लेंक रेंज से हिन्दुओं के सिर में गोलियाँ मारी गई थी। आतंकी यही नहीं रुके उन्होंने घरों को लूटा और महिलाओं के गहने उतरवा लिए। न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने इस घटना का जिम्मेदार ‘मुस्लिम आतंकवादियों’ बताया। अमेरिका के स्टेट्स डिपार्टमेंट ने भी इसे धर्म आधारित नरसंहार माना था।

आतंकियों को मदद पड़ोस के मुस्लिम बहुलता वाले गाँवों से मिली थी। उस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस के इंटेलिजेंस विंग को संभाल रहे कुलदीप खोड़ा भी मानते हैं कि बिना स्थानीय सहायता के नदीमर्ग नरसंहार को अंजाम ही नहीं दिया जा सकता था। नरसंहार के चश्मदीद बताते है कि आतंकियों ने हिन्दूओं को उनके नाम से पुकारकर घरों से बाहर निकाला था। यानी वे पहले से ही इस योजना पर काम कर रहे थे। आतंकियों ने गाँव का दौरा किया हो, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस प्रकरण में राज्य सरकार की भूमिका भी संदेह वाली बनी रही। उस इलाके की सुरक्षा में लगी पुलिस को हटा लिया गया था। घटना से पहले वहाँ 30 सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिनकी संख्या उस रात घटाकर 5 कर दी गई।

अगले ही महीने इस नरसंहार में शामिल एक आतंकी जिया मुस्तफा को गिरफ्तार कर लिया गया। पाकिस्तान के रावलकोट का रहने वाला यह आतंकी लश्कर-ए-तय्यबा का एरिया कमांडर था। उसने जाँच के दौरान बताया कि लश्कर के अबू उमैर ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। मुस्तफा के मुताबिक वह उन बैठकों का हिस्सा रहा, जहाँ देश भर के हिन्दू मंदिरों पर आतंकी हमले की योजना बनाई गई थी। उसने एजेंसियों को बताया कि वे सभी पाकिस्तान के संपर्क में थे। वहाँ से उन्हें कहा गया था कि जेहाद के लिए 6 आतंकियों को दिल्ली और गुजरात में मुस्लिम युवाओं के बीच भेजना है। सितम्बर 2001 में सीमा पार से मुस्तफा कश्मीर घाटी में घुसा था। वह दूसरे 6 आतंकियों के साथ पुलवामा के आसपास आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता था।

मुस्तफा स्थानीय लोगों से संपर्क से लश्कर में भर्ती होने के लिए युवाओं को उकसा रहा था। हथियारों और वायरलेस के अलावा उसके पास से कुछ दस्तावेज भी बरामद किए गए। उनसे पता चला कि उसे पैसा पाकिस्तान से मिलता था। इस गिरफ्तारी ने पाकिस्तान के उन दावों की पोल खोल दी जिसमें वह भारत में आतंकी गतिविधियों में अपना हाथ होने से इनकार करता रहा है। अमेरिका में असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट्स (दक्षिण एशिया), क्रिस्टीना रोक्चा ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि पाकिस्तान को उसकी जमीन से संचालित आतंकवाद को रोकने के हरसंभव प्रयास करने चाहिए। नदीमर्ग नरसंहार के सभी आतंकी पाकिस्तान से ही आए थे। इसकी पुष्टि बॉर्डर सिक्यूरिटी फ़ोर्स को 18 अप्रैल, 2003 को मिली एक सफलता से हो गई। मुस्तफा के खुलासे के बाद बीएसएफ ने कुलगाम में तीन आतंकियों को मार गिराया। उनमें से एक आतंकी मंजूर ज़ाहिर था जो कि नरसंहार के साथ अक्षरधाम मंदिर हमले में भी शामिल था। लाहौर का रहने वाला मंजूर लश्कर के लिए काम करता था।

नदीमर्ग नरसंहार के बाद जम्मू-कश्मीर के हिन्दुओं के मन में बैठ गया कि वे राज्य में सुरक्षित नहीं हैं। बीते दशकों में उनके पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई। भारत के उच्चतम न्यायालय से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। चूँकि यह मामला ‘कई साल पुराना है इसलिए न्यायालय इस पर सुनवाई नहीं कर सकता’। यह कहकर 2017 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने हिन्दुओं के घाटी में वापसी पर दायर पीआईएल को खारिज कर दिया। एक तरफ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ तो दूसरी ओर उन्हें मानसिक तौर पर प्रताड़ित भी किया गया। उनके घर सस्ते दामों में स्थानीय मुस्लिमों को बेच दिए गए। मसलन, जिस हिन्दू के घर को 2.5 लाख में बेचा गया अगर उसकी जगह वह किसी मुस्लिम का होता तो उसकी कीमत 8 लाख होती।

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AMU के वीसी को छात्रों ने भेजा मेल-मैसेज, कहा- उनका धरना सही, पर हमारी परीक्षा तो कराएँ

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में शैक्षणिक व्यवस्था बाधित होने से आम छात्रों की चिंता बढ़ने लगी है। उन्होंने वाइस चांसलर से परीक्षाएँ करवाने की गुहार लगाई है। छात्रों के एक समूह ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर यूनिवर्सिटी की गतिविधियॉं ठप कर रखी है। ये छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर धरना दे रहे हैं। दूसरी तरफ इनके दबाब में एएमयू इंतजािमयाँ द्वारा परीक्षाएँ निरस्त किए जाने से आम छात्र मायूस हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार परेशान छात्रों ने इंतजामियाँ पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि आंदोलनकारी छात्र कह रहे हैं कि सीएए के ख़िलाफ लड़ाई अपेक्षित परिणाम मिलने तक जारी रहनी चाहिए। लेकिन कब तक? परिणाम कब मिलेगा किसी को नहीं मालूम। कब तक इस आंदोलन के चलते यूनिवर्सिटी को बंद रहेगा। परीक्षाओं के साथ भी तो वे आंदोलन जारी रख सकते हैं। 250 से अधिक छात्र-छात्राओं ने कुलपति को मेल व मैसेज के जरिए अपनी परेशानी बताई है।

एएमयू के आम छात्र विश्वविद्यालय के बाबे सैयद गेट पर पिछले करीब 33 दिनों से सीएए के ख़िलाफ जारी धरने से परेशान हैं। 15 दिसंबर को विश्वविद्यालय में हुई हिंसा के बाद इसे 5 जनवरी तक के लिए बंद कर दिया गया था। इसके बाद 13 जनवरी को विश्वविद्यालय को पूर्ण रूप से खोल दिया गया। लेकिन विश्वविद्यालय के खुलते ही आंदोलनकारी छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद एएमयू इंतजामियाँ ने आंदोलनकारी छात्रों के दवाब में आकर सभी कॉलेजों में होने वाली परीक्षाओं को स्थगित कर दिया।

अब आलम यह है कि जो छात्र आगे होने वाली परीक्षाओं की चिंता लिए कक्षा करने जा रहे हैं, उन छात्रों को आंदोलनकारी छात्रों द्वारा जबरदस्ती बाहर निकाला जा रहा है। साथ ही आम छात्रों पर प्रोटेस्ट में शामिल होने का दवाब भी बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं शिक्षक भी आंदोलनकारी छात्रों का समर्थन करते हुए कक्षाएँ नहीं ले रहे हैं। इससे परेशान आम छात्रों का कहना है कि भविष्य में उनको कई प्रतियोगी परीक्षाएँ देनी है। वे ऐसे किसी आंदोलन का हिस्सा नहीं बनना चाहते, जिससे उनके भविष्य पर किसी भी तरह का असर हो।

आंदोलनकारी छात्रों ने शनिवार को CAA के विरोध में बैलून मार्च निकाला। हाथों में पुतला लिए छात्र बाबे सैयद गेट पर चल रहे धरने पर पहुँच गए और देखते ही देखते छात्रों ने वीसी और रजिस्ट्रार के पुतले को आग के हवाले कर दिया। बताया जा रहा है कि एएमयू के इतिहास में पहली बार कुलपति के पुतले का दहन छात्रों द्वारा किया गया है। एएमयू प्रवक्ता प्रोफेसर शाफे किदवई ने कहा, “35 साल से अधिक समय से मैं एएमयू से जुड़ा हुआ हूँ। विरोध-प्रदर्शन तो बहुत हुए, लेकिन कुलपति का पुतला छात्रों ने कभी नहीं फूँका। इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।”

दैनिक जागरण के अलीगढ़ संस्करण में 19 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

दरअसल एएमयू छात्र CAA विरोध के दौरान अलीगढ़ पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई से नाराज हैं। वीसी से छात्रों की नाराजगी इस बात से है कि पुलिस को कैंपस में प्रवेश करने की अनुमति उन्होंने ही दी थी।

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लखनऊ में 6 साल की बच्ची से रेप, गले में चाकू घोंप हत्या: मामू अराफात को फाँसी

लखनऊ में पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा नें 6 साल की मासूम का बलात्कार और हत्या के दोषी अराफात उर्फ बबलू  को फाँसी की सज़ा सुनाई है। साथ ही 40 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। जब फैसला सुनाया गया मृतक बच्ची की माँ और बुआ अदालत में ही थे। जज अरविंद मिश्रा ने जैसे ही आरोपित को दोषी करार देते हुए फाँसी की सज़ा सुनाई तो माँ और बुआ की आँखों से आँसू छलक गए।

दिल दहला देने वाली इस घटना में पुलिस ने भी बेहद सक्रियता दिखाई थी। मात्र 24 घंटे के अंदर आरोपित को गिरफ़्तार कर लिया था। 6 दिन के अंदर जाँच पूरी कर न्यायालय में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। 

फ़ैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ने कहा कि महज़ 6 साल की मासूम बच्ची के साथ जिस तरह की बर्बरता की गई, उसका समाज पर बड़े स्तर पर ग़लत प्रभाव पड़ा। ऐसी जघन्य घटना की वजह से समाज में लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को स्वतंत्रतापूर्वक खेलने की छूट नहीं दे पाते। ऐसा इसलिए क्योंकि लोगों के मन मे हमेशा ये डर बना रहता है कि कहीं उनके बच्चों के साथ कोई लैंगिक या यौन अपराध न कर दे। इस वजह से देश की नई पीढ़ी यानी छोटे बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने अराफात को फाँसी की सज़ा सुनाते हुए इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर मानते हुए कहा कि मृतका घटना के समय महज़ 6 साल की थी। वो किसी तरह का प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं थी। घटना के समय उस बच्ची ने ढंग से दुनिया भी नहीं देखी थी। उसके साथ ऐसा अपराध किया गया जिसकी सभ्य समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती।

बच्ची की माँ का कहना था कि उन्हें इतने कम समय में दोषी को सज़ा सुनाए जाने की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि सरकार के निर्देश पर पुलिस ने जो काम किया है उसे वो पूरी ज़िंदगी कभी नहीं भूलेंगी। उन्होंने बताया कि उनके पति दिहाड़ी मज़दूर हैं। पिछले दो दिनों से ख़राब मौसम के चलते बच्ची के पिता काम पर नहीं जा सके थे। 200 रुपए उधार लेकर उन्होंने बच्ची की माँ और बुआ को दिए थे, तब वह कोर्ट पहुँच पाईं।

फाँसी की सज़ा पाए अराफात ने बच्ची के साथ जो बर्बरता की थी, वो बहुत भयावह थी। हैवानियत की हद पार करते हुए पहले बच्ची का बलात्कार किया और फिर उसके गले में चाकू घोंपकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद उसने बच्ची को अपने घर के तख़्त के नीचे छिपा दिया। बच्ची अराफात को मामू कहती थी।

मासूम बच्ची के परिजन वो दिन कभी नहीं भूल पाएँगे जब उसके साथ ऐसी घिनौनी हरक़त को अंजाम दिया गया था। 15 सितंबर 2019 को अराफात बच्ची को टॉफ़ी दिलाने के बहाने अपने घर ले गया था। वहाँ ले जाकर उसने बच्ची का बलात्कार किया और फिर उसके गले में चाकू घोंपा। इतने पर भी उसकी दरिंदगी ख़त्म नहीं हुई, उसने बच्ची का गला दबाया, जिससे वो निश्चिंत हो सके कि वो सच में मर गई है।

अरफात इतना शातिर था कि मासूम की हत्या करने बाद वो उसके पिता के साथ उसे ढूँढ भी रहा था, जिससे उस पर किसी को कोई शक़ न हो। अराफात के जघन्य अपराध का ख़ुलासा होने के बाद जब पता चला कि बच्ची उसी के घर में हैं, तो पुलिस और परिजन बच्ची को ट्रामा सेंटर ले गए, जहाँ डॉक्टर्स ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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अम्मी का मर्डर कर पूरी रात लाश के साथ सोया सोहेल, सुबह गहने बेच गर्लफ्रेंड के लिए खरीदी चूड़ियाँ

बीते महीने मुंबई पुलिस को एक महिला की लाश मिली थी। इस महिला की पहचान 53 वर्षीय बदरुन्निशा मुहम्मद शफी शेख के तौर पर की गई है। उसकी हत्या की गुत्थी पुलिस ने सुलझा ली है। बदरुन्निशा की हत्या उसके 33 साल के बेटे सोहेल शेख ने ही की थी।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अम्मी की हत्या करने के बाद सोहेल पूरी रात लाश के साथ सोया रहा। सुबह दरगाह जाकर माफी मॉंगी। फिर अम्मी के जेवर बेचकर जो पैसे मिले उससे गिरवी रखी अपनी स्कूटी छु​ड़ाई और बचे हुए पैसों से गर्लफ्रेंड के लिए चूड़ियॉं खरीदी।

सोहेल ने पुलिस को बताया कि 28 दिसंबर की रात बहस होने के बाद उसने अपनी अम्मी का कत्ल कर दिया था। शराब के नशे में सोहेल गला दबाकर अम्मी की हत्या की फिर शव के टुकड़े कर फेंक दिए। उसने बताया कि वह बेरोजगार था और उसे शराब पीने की लत थी। कुछ महीने पहले पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी। इस बात को लेकर अम्मी से अक्सर उसकी बहस हो जाती थी।

उसने बताया कि हत्या के बाद रात भर अम्मी की लाश के साथ सोता रहा। पछतावा होने के बाद दरगाह जाकर माफी मॉंगी। अगले दिन 40 हजार रुपए में मॉं के जेवर बेचे। पैसों से पहले स्कूटी ली। फिर 25 हजार रुपए लेकर चेंबूर गया और गर्लफ्रेंड के लिए चूड़ियॉं खरीदी।

सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल कर पुलिस सोहेल के घर पहुॅंची। पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर पूछताछ की तो वह टूट गया और अपना जुर्म कबूल कर लिया। उसने बताया कि हत्या के बाद शव ठिकाने लगाने का उसे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। फिर क्राइम आधारित टीवी शो से उसे शव को टुकड़े-टुकड़े कर फेंकने का विचार आया। अम्मी की लाश के उसने टुकड़े किए और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर फेंक दिया।

पीड़िता का धड़ 30 दिसंबर को विद्याविहार में किरोड रोड से बरामद हुआ था। अगले दिन घाटकोपर में कूड़े के डिब्बे से रेक्जिन शीट में लिपटे पैर बरामद हुए। 4 जनवरी को पुलिस को सांताक्रुज-चेंबूर लिंक रोड पर एक पुल के नीचे से सिर मिला। उन्होंने बताया कि तीनों स्थलों पर लगे सीसीटीवी फुटेज से शेख की पहचान हुई। बाद में उसके पड़ोसियों ने बताया कि उसकी मॉं कई दिनों से लापता है। शेख ने अपनी बहन को बताया कि मॉं दिल्ली गई है।

पुलिस ने बताया कि आरोपी शेख 2018 तक कुवैत में नौकरी करता था। वहॉं से लौटने के बाद से वह बेरोजगार था। नौकरी न मिलने पर मॉं से बहस करता रहता था। वह शराब भी पीने लगा था। उसकी अम्मी ब्यूटीशियन का काम करती थी। साथ ही पड़ोस में टिफिन सर्विस भी देती थी।

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एक गाँव, 200 सिख परिवार: सूरज ढलते ही घुसे 50 जिहादी, घरों से निकाला और लाश की ढेर लगा दी

दिसंबर 2000 में भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने दो पाकिस्तानी आतंकवादियों को गिरफ्तार किया। उनमे से एक आतंकी सियालकोट का रहने वाला मोहम्मद सुहैल मलिक था। वह अक्टूबर 1999 में चोरी-छुपे भारत में घुसा था। सेना की एक चौकी और बस पर हुए आतंकी हमलों में शामिल, सुहैल का न्यूयॉर्क टाइम्स के एक पत्रकार ने जेल में इंटरव्यू लिया। इसमें उसने खुलासा किया कि छत्तीसिंहपुरा नरसंहार की घटना में वह भी शामिल था। जिसका उसे कोई खेद नहीं हैं, क्योंकि उसे ऐसा करने के लिए कहा गया था।

श्रीनगर से 70 किलोमीटर दूर दक्षिण में अनंतनाग जिले के छत्तीसिंहपुरा गाँव में 200 सिख परिवार रहते थे। 20 मार्च, 2000 की रात गाँव में बिजली नहीं थी। स्थानीय निवासी रेडियो पर अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पाँच दिन की भारत यात्रा की खबरें सुन रहे थे। शाम को 7 बजकर 20 मिनट पर 40 से 50 आतंकवादी गाँव में आए और उन्होंने जबरन सिख लोगों को घरों से बाहर निकालना शुरू कर दिया। कुछ आगे समझ आता कि अचानक उन्होंने अपनी ऑटोमेटिक बंदूकों से गोलियाँ दागनी शुरू कर दी। अगले ही पल 35 लाशों का ढेर लग गया और बाद में एक व्यक्ति ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। सामूहिक नरसंहार के इस तांडव में सभी लाशें सिख समुदाय के लोगों की थी।

सुरक्षा सलाहकार रहे बृजेश मिश्र ने दावा किया कि यह काम लश्कर-ए-तय्यबा और हिज्बुल मुजाहिद्दीन का है। बर्बरता की उस रात निहत्थे सिखों को दो समूहों में खड़ा किया गया था। उनमें से एक आतंकी पास के ही गाँव का रहने वाला था। उसे एक सिख ने पहचान लिया। गोलीबारी से पहले उसने आतंकी से पूछा ‘चट्टिया तू इधर क्या कर रहा है’? दरअसल चट्टिया एक आतंकी मोहम्मद याकूब का उपनाम था। इस वाकए के दो दिनों के अन्दर ही
याकूब सुरक्षा बलों के हत्थे चढ़ गया। हिरासत में उसने बताया कि वह मुजाहिद्दीन के साथ काम करता हैं। नरसंहार वाले दिन वह लश्कर के एरिया कमांडर अबू माज के साथ छत्तीसिंहपुरा आया था। छह फीट लंबा पाकिस्तानी अबू माज ही लश्कर के चार आतंकियों शाहिद, बाबर, टीपू खान और मसूद को लेकर आया था। कश्मीरी मुजाहिद्दीन आतंकियों को इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी गुलाम रसूल वानी उर्फ सैफुल्ला के पास थी।

उस रात के चश्मदीद रहे अरविन्द सिंह और बाबू सिंह ने अप्रैल 2000 में फ्रंटलाइन मैगजीन को बताया कि वे सभी आतंकवादी थे और उन्हें उर्दू भी आती थी। साल 2012 में मुंबई हमलों का साजिशकर्ता आतंकी अबु जिंदाल ने भी ऐसा ही एक खुलासा किया। जाँच एजेंसियों की पूछताछ में उसने बताया कि छत्तीसिंहपुरा नरसंहार को लश्कर-ए-तय्यबा ने अंजाम दिया था। अब तक यह पक्का हो चुका था कि इस नरसंहार की साजिश पाकिस्तान में रची गई। लश्कर और हिज्बुल के अड्डे पाकिस्तान में हैं। सभी आतंकी जिन्होंने 36 निहत्थे सिखों को मार डाला, उन्हें ट्रेनिंग भी सीमा पार से मिली थी।

नरसंहार के अगले दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्री अब्दुल सत्तार ने दोनों आतंकी समूहों के समर्थन में बयान दिए। भारत के खिलाफ गतिविधियों के लिए सत्तार पूरे दक्षिण एशिया में बदनाम रहे हैं। वे भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे और 1992 में पाकिस्तान लौटने पर विदेश मंत्री बनाए गए। गौर करने वाली बात है कि वे यूएसएसआर में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके थे। यह वही समय था जब अफगानिस्तान से मुजाहिद्दीन का रुख जम्मू-कश्मीर को तरफ होने लगा। भारत के इस सीमावर्ती राज्य से अल्पसंख्यकों को मारने और भगाने का सिलसिला भी 90 के दशक में सामने आया।

उस तरफ नरसंहार के पाँचवें दिन एक नया मोड़ आया। पुख्ता खबर मिली थी कि अबू माज की यूनिट के आतंकी छत्तीसिंहपुरा से 9 किलोमीटर दूर छिपे हुए हैं। सभी का सम्बन्ध छत्तीसिंहपुरा नरसंहार से था। कार्रवाई के लिए राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों के साथ राज्य पुलिस को भी शामिल किया गया। दोतरफा गोलीबारी में सेना ने बहादुरी से 5 आतंकियों को मार गिराया। इन आतंकियों के पास गोला-बारूद और बंदूकें भी बरामद की गई। यह सफलता सिख पीड़ितों के लिए मरहम की तरह थी। हालाँकि, 20 मार्च के जिम्मेदार और असल साजिशकर्ता अभी भी पाकिस्तान की जमीन पर खुले घूम रहे हैं।

छत्तीसिंहपुरा के आसपास सुरक्षा की जिम्मेदारी 7 राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) के जवानों को दी गई थी। इसमें अधिकतर पंजाब रेजिमेंट के सिख जवान ही भर्ती थे। एक समय में इस इलाके में आतंकी गतिविधियाँ चरम पर थी। इन जवानों ने पूरी तरह से उस पर रोकथाम लगाई हुई थी। आज भी कश्मीर घाटी में आतंकवाद के खिलाफ राइफल्स को सबसे सफल माना जाता है। पिछले साल 44 आरआर के जवानों ने 19 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था। इसकी 65 बटालियन पाँच टुकड़ियों में जम्मू-कश्मीर में तैनात है, जोकि आईएसआई द्वारा खड़े किए गए आतंकी समूहों के खात्मे के काम कर रही है।

उस दर्दनाक और क्रूर रात की यादें आज भी वहाँ के लोगों के जेहन में जिंदा हैं। उस खौफनाक मंजर को शायद ही कोई भुला सकता हैं। कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह दर्द कैसे झेला गया होगा। साम्प्रदायिक नरसंहार की सबसे बड़ी घटनाओं में से यह एक थी। एकदम बदतर हो चुके हालातों में राज्य में सिखों की आबादी भी कम होती जा रही है। साल 2000 में यह 1 लाख से ऊपर थी जो अब 80 हज़ार से भी कम रह गई है। अगस्त 2010 में आतंकवादियों ने सिखों को घाटी छोड़कर जाने की धमकी दी। हाल में ही इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा की एक सिख छात्रा को जबरदस्ती इस्लाम धर्म में परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया गया। वास्तव में, इन बीते 19 सालों में जम्मू-कश्मीर के सिखों को नरसंहार, धर्म-परिवर्तन, बलात्कार और धमकियों के अलावा कुछ नही मिला।

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देशद्रोह मामले में हाजिर नहीं हुए कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल, गिरफ़्तारी के बाद भेजे गए जेल

अहमदाबाद पुलिस ने कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल को 2015 के एक राजद्रोह के मामले में शनिवार (18 जनवरी) को निचली अदालत में पेश नहीं होने के कारण गिरफ़्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने किया गया। उन्हें 24 जनवरी तक न्यायायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

कोर्ट से वारंट जारी होने के कुछ घंटों बाद ही हार्दिक को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया। DCP राजदीप सिंह जाला ने बताया कि हार्दिक को अहमदाबाद जिले के वीरमगाम तालुका से गिरफ्तार किया गया। यह उनका गृह क्षेत्र भी है।

इसके बाद, हार्दिक पटेल को शनिवार देर रात अहमदाबाद में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहाँ से पटेल को 24 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। बता दें कि अदालत ने सुनवाई के दौरान बार-बार अनुपस्थित होने के कारण पटेल के ख़िलाफ़ वारंट जारी किया गया था।

हार्दिक पटेल को इससे पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जुलाई 2016 में उन्हें जमानत पर रिहा किया गया था। नवंबर, 2018 में हार्दिक पटेल और अन्य आरोपितों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे, लेकिन इसी बीच पटेल ने 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले ही कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया था।

ग़ौरतलब है कि 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में हुई विशाल पाटीदार आरक्षण समर्थक रैली के बाद राज्य में हुई तोड़फोड़ और हिंसा को लेकर यहाँ की क्राइम ब्रांच ने उसी साल अक्टूबर में हार्दिक पटेल सहित कई लोगों पर मुकदमा दर्ज किया था। हिंसा के दौरान आंदोलनकारियों ने कई सरकारी बसों, पुलिस चौकियों और अन्य सरकारी संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया था, जिसमें एक पुलिसकर्मी सहित लगभग दर्जन भर बेगुनाह लोग मारे गए थे। पुलिस ने आरोप पत्र में हार्दिक और उनके सहयोगियों पर चुनी हुई सरकार को गिराने के लिए और हिंसा फैलाने की साजिश रचने का भी आरोप लगाया था।

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वामपंथियों और कॉन्ग्रेसी सरकारों की सिब्बल ने खोली पोल, कहा- CAA लागू करने से मना नहीं कर सकते राज्य

कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के सन्दर्भ में कहा है कि संसद से पारित हो चुके इस क़ानून को लागू करने से कोई राज्य किसी भी तरह से इनकार नहीं कर सकता और ऐसा करना असंवैधानिक होगा। बता दें कि पहले केरल की वामपंथी सरकार और फिर पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार ने विधानसभा में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया था। लेकिन, कॉन्ग्रेस के ही दो बड़े नेताओं के बयान से ज़ाहिर है कि यह केवल राजनीतिक नौटंकी है। इसका कोई महत्व नहीं है।

पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री ने केरल साहित्य उत्सव के तीसरे दिन कहा, “जब CAA पारित हो चुका है तो कोई भी राज्य यह नहीं कह सकता कि मैं उसे लागू नहीं करूँगा। यह संभव नहीं है और असंवैधानिक है। आप उसका विरोध कर सकते हैं, विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर सकते हैं और केंद्र सरकार से (कानून) वापस लेने की माँग कर सकते हैं, लेकिन संवैधानिक रूप से यह कहना कि मैं इसे लागू नहीं करूँगा, अधिक परेशानियाँ पैदा कर सकता है।”

कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने समझाया कि जब राज्य यह कहते हैं कि वह CAA को लागू नहीं करेंगे तो उनका क्या मंतव्य होता है और वह ऐसा कैसे करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्यों का कहना है कि वे राज्य के अधिकारियों को भारत संघ के साथ सहयोग नहीं करने देंगे। उन्होंने कहा, “एनआरसी, एनपीआर पर आधारित है और एनपीआर को स्थानीय रजिस्ट्रार लागू करेंगे। अब गणना जिस समुदाय में होनी है वहाँ से स्थानीय रजिस्ट्रार नियुक्त किए जाने हैं और वे राज्य स्तर के अधिकारी होंगे।”

वहीं, दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि CAA की संवैधानिक स्थिति संदेहास्पद है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया तो वो क़ानून की किताब में क़ायम रहेगा और अगर क़ानून की किताब में है तो उसे सभी को मानना होगा।   

गौरतलब है कि केरल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने CAA के अलावा राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) का विरोध किया है।केरल पहला राज्य हो गया जिसने विधानसभा से नागरिकता क़ानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करके लागू करने से मना कर दिया है। वहीं, पंजाब विधानसभा ने यह कहते हुए प्रस्ताव पास किया कि नागरिकता क़ानून से देश की धर्मनिरपेक्षता को चोट पहुँची है। यह क़ानून समानता के अधिकार का हनन करता है।

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कश्मीर घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए 19 जनवरी प्रलय का दिन माना जाता है, क्योंकि वर्ष 1990 में हालात बिगड़ने के कारण इसी तारीख में कश्मीरी पंडित समुदाय ने कश्मीर घाटी से पलायन करना शुरू कर दिया था। मई 1990 तक करीब पाँच लाख कश्मीरी पंडित जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ कश्मीर से पलायन कर चुके थे, जो स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। इसी के चलते हर वर्ष 19 जनवरी को जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं, वहाँ वह इस तारीख को ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ (प्रलय/बड़ी संख्या में पलायन की तारीख) के तौर पर मनाते हैं।

देश-दुनिया में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के संगठन कश्मीर में वापसी के लिए 30 साल से आंदोलनरत हैं। उन्होंने सरकार से इस दिशा में सकारात्मक क़दम उठाने की माँग की। कश्मीर समिति दिल्ली के अध्यक्ष समीर चंगू का कहना है कि हमारा तो सबकुछ लुट गया। परिवार-रिश्तेदार और पड़ोसी सब। पीड़ा तो थी ही ज़बरदस्त गुस्सा भी था। लेकिन, हम उनकी तरह जवाब नहीं दे सकते थे। हमने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। हमेशा संविधान के दायरे में रहकर ही बात की।

कश्मीरी समिति दिल्ली का इतिहास कश्मीरी सहायक समिति के तौर पर आज़ादी के कुछ साल बाद का है। एमएन कौल और हृदय नाथ कुंजरू भी इससे जुड़े हुए थे। ऑल इंडिया कश्मीरी समाज इसी संगठन से निकला है। संगठन कोशुर समाचार नाम से मासिक पत्रिका भी निकालता है।

19 जनवरी को जनसंहार के विरोध में हर साल जंतर-मंतर पर होलोकॉस्ट डे मनाया जाता है। दिल्ली-एनसीआर के सैकड़ों कश्मीरी पंडित यहाँ जुटते हैं और अपना दर्द बयाँ करते हैं। वह दुनिया को बताते हैं कि आखिर उस रात धरती का जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ कैसा अत्याचार हुआ।

यह स्मरण रहे कि सन ’65 का युद्ध जम्मू कश्मीर राज्य को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाने के उद्देश्य से लड़ा गया था किंतु पाकिस्तान इस उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया था क्योंकि तब तक कश्मीर में पाकिस्तान परस्ती और अलगाववाद का बीज नहीं बोया जा सका था। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अगस्त 1965 में अमानुल्लाह खान और मकबूल बट ने पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर में ‘नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ नामक अलगाववादी आतंकी संगठन बनाया था।

इस संगठन ने जून 1966 में मकबूल बट को ट्रेनिंग देकर नियन्त्रण रेखा के इस पार भेजा। छह सप्ताह बाद ही पुलिस से हुई एक मुठभेड़ में मकबूल बट ने सी० आई० डी० सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। दो वर्ष बाद अगस्त 1968 में मकबूल बट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। किन्तु उसी वर्ष दिसम्बर में मकबूल बट अपने एक साथी के साथ जेल तोड़कर नियन्त्रण रेखा के उस पार भाग गया। वह 1976 में लौटा और इस बार उसने कुपवाड़ा में बैंक डकैती का असफल प्रयास किया और पकड़ा गया।

डकैती के प्रयास में उसने बैंक मैनेजर की हत्या की जिसके लिए उसे पुनः फाँसी की सजा हुई। मकबूल बट के पकड़े जाने के बाद उसके साथी आतंकवादी इंग्लैंड चले गये जहाँ उन्होंने 1977 में ‘जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) नामक संगठन बनाया। इसी संगठन से संबद्ध ‘नेशनल लिबरेशन आर्मी’ ने मकबूल बट को जेल से छुड़ाने के लिए फरवरी 1984 में भारतीय उच्चायुक्त रवीन्द्र म्हात्रे का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। इस घटना के पश्चात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने तत्काल मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी थी।

मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के बाद के घटनाक्रम

सन 1984 में जिस दिन मकबूल बट को फाँसी दी गई थी उस दिन कश्मीर घाटी के लोगों पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की स्थापना को अभी एक दशक भी पूरा नहीं हुआ था। इस संगठन को अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते घाटी के लोगों में अपनी पैठ बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। मकबूल बट को फाँसी दिए जाने के दो वर्ष पश्चात् सन 1986 में फारुख अब्दुल्लाह को हटाकर गुलाम मोहम्मद शाह जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनाये गए।

शाह ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए जम्मू स्थित न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस विचित्र निर्णय के विरुद्ध जम्मू के लोग सड़क पर उतर आये जिसके फलस्वरूप दंगे भड़क गये। अनंतनाग में पंडितों पर भीषण अत्याचार किया गया, उन्हें बेरहमी से मारा गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया और उनकी संपत्ति व मकान तोड़ डाले गये। सन 1987 से जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की गतिविधियों में तेजी आई।

बाद के सालों में अलगाववादियों की दुष्प्रचार मशीनरी ने एक सुनियोजित षड्यंत्र रचकर पंडितों के विरुद्ध वैमनस्य फैलाना प्रारंभ कर दिया। यही कारण था कि जिस मकबूल बट को 1984 में कोई जानता नहीं था फरवरी 1989 में उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आये थे। विश्वभर में सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘सैटेनिक वर्सेज़’ का विरोध चरम पर था जिसकी आग कश्मीर तक भी पहुँची। परिणामस्वरूप 13 फरवरी को श्रीनगर में दंगे हुए जिसमें कश्मीरी पंडितों को बेरहमी से मारा गया।

पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या का उद्देश्य

पं० टिकालाल टपलू पेशे से वकील और जम्मू कश्मीर बीजेपी के अध्यक्ष थे। पं० टपलू आरंभ से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे तथा उदारमना व्यक्ति थे। पं० टपलू ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी परंतु पैसे कमाने के लिए उन्होंने इस पेशे का कभी दुरुपयोग नहीं किया। वकालत से वे जो कुछ भी कमाते उसे विधवाओं और उनके बच्चों के कल्याण हेतु दान दे देते थे। उन्होंने कई मुस्लिम लड़कियों की शादियाँ भी करवाई थीं। पूरे हब्बाकदल निर्वाचन क्षेत्र में दोनों ही समुदाय के लोग पं टपलू का सम्मान करते थे तथा उन्हें ‘लाला’ अर्थात बड़ा भाई कह कर सम्बोधित करते थे।

उनकी यह छवि अलगाववादी गुटों की आँखों का काँटा थी क्योंकि पं० टिकालाल टपलू उस समय कश्मीरी पंडितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता थे। वास्तव में अलगाववादियों को घाटी में अपनी राजनैतिक पैठ बनाने के लिए कश्मीरी पंडितों के समुदाय को हटाना जरुरी था जो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करते। इसीलिए जम्मू कश्मीर लिबेरशन फ्रंट ने पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार के विविध हथकंडे अपनाये। कश्मीर घाटी के कुछ लोकल अखबारों ने पंडित टिकालाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू समेत कई प्रतिष्ठित पंडितों के विरुद्ध दुष्प्रचार सामग्री प्रकाशित करना आरंभ कर दिया था।

आतंकियों ने पं० टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की रणनीति बनाई। पं० टपलू को आभास हो चुका था कि उनकी हत्या का प्रयास हो सकता है इसीलिए उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित दिल्ली पहुँचा दिया और 8 सितम्बर 1989 को कश्मीर लौट आये। चार दिन बाद चिंक्राल मोहल्ले में स्थित उनके आवास पर हमला किया गया। यह हमला उन्हें सचेत करने के लिए था किंतु वे भागे नहीं और डटे रहे। महज दो दिन बाद 14 सितम्बर को सुबह पं० टिकालाल टपलू अपने आवास से बाहर निकले तो उन्होंने पड़ोसी की बच्ची को रोते हुए देखा। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि स्कूल में कोई फंक्शन है और बच्ची के पास पैसे नहीं हैं।

पं० टपलू ने बच्ची को गोद में उठाया, उसे पाँच रुपये दिए और पुचकार कर चुप करा दिया। इसके बाद उन्होंने सड़क पर कुछ कदम ही आगे बढ़ाये होंगे कि आतंकवादियों ने उनकी छाती कलाशनिकोव की गोलियों से छलनी कर दी। सन 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर करने के लिए की गयी यह पहली हत्या थी। पंडितों के सर्वमान्य नेता को मार कर अलगाववादियों ने स्पष्ट संकेत दे दिया था कि अब कश्मीर घाटी में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा’ ही चलेगा।

टिकालाल टपलू की हत्या के बाद काशीनाथ पंडिता ने कश्मीर टाइम्स में एक लेख लिखा और अलगाववादियों से पूछा कि वे आखिर चाहते क्या हैं। अगले दिन इसका जवाब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने यह लिख कर दिया कि या तो कश्मीरी पंडित भारत राज्य को समर्थन देना बंद करें और अलगाववादी आन्दोलन का साथ दें अथवा कश्मीर छोड़ दें।

पं टपलू की हत्या के मात्र सात सप्ताह बाद जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गयी। सन 1989 तक पं० नीलकंठ गंजू- जिन्होंने मकबूल बट को फांसी की सजा सुनाई थी- हाई कोर्ट के जज बन चुके थे। वे 4 नवंबर 1989 को दिल्ली से लौटे थे और उसी दिन श्रीनगर के हरि सिंह हाई स्ट्रीट मार्केट के समीप स्थित उच्च न्यायालय के पास ही आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी थी। इस वारदात से डर कर आसपास के दूकानदार और पुलिसकर्मी भाग खड़े हुए और खून से लथपथ जस्टिस गंजू के पास दो घंटे तक कोई नहीं आया।

कुछ दिनों बाद अमिराकदल के पास स्थानीय लड़के जस्टिस गंजू की हत्या का जश्न मनाते दिखाई दिए। आतंकियों ने जस्टिस गंजू से मकबूल बट की फाँसी का प्रतिशोध लिया था। साथ ही मस्जिदों से लगते नारों ने कश्मीर के लोगों को यह भी बता दिया था कि ‘ज़लज़ला आ गया है कुफ़्र के मैदान में, लो मुजाहिद आ गये हैं मैदान में।’ अर्थात अब अलगाववादियों के अंदर भारतीय न्याय, शासन और दंड प्रणाली का भय नहीं रह गया था।

पं० टिकालाल टपलू और जस्टिस गंजू की हत्या के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्लाह कोरा दिलासा मात्र देते रहे और मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते रहे।   

दिसंबर 8, 1989 को मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वी पी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी। अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के पाँच अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। यासीन मलिक और जेकेएलएफ को आज भी उनके किए की सज़ा नहीं मिल पाई है। हाँ, आज यह खबर आई कि सीबीआई ने वो केस फिर से खोला है।

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हमें हिंदू औरतें चाहिए… कश्मीर की हर मस्जिद से 19/1/1990 की रात आ रही थी यही आवाज

90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं पर हुआ हत्याचार एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जिसे चाहकर भी भुला पाना असंभव है। रातों-रात खुद को बचाने के लिए कश्मीर में अपना घर, संपत्ति छोड़कर भागे लोगों के मन में आज भी उस रात की टीस बाकी है, जब उन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी का शिकार होते अपनी आँखों के सामने बर्बरता से अपने लोगों को जिंदा जलते-मरते देखा और जिन्हें इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते 30 साल हो गए।

बीते साल 14 नवंबर 2019 को ऐसी ही अनगिनत कहानियों को अपने दिल में समेट कर भारतीय स्तंभकार सुनंदा वशिष्ठ टॉम लैंटॉस एचआर द्वारा आयोजित यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक के लिए वॉशिंगटन डीसी पहुँचीं थीं। हालाँकि वहाँ जाने से पहले ही उन्होंने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दे दी थी कि आयोजन में वह सिर्फ़ कश्मीर से जुड़ी उन कहानियों के बारे में बात करने वाली हैं, जिन्हें लोगों ने कभी नहीं सुना होगा या फिर जिन्हें बताने से हमेशा बचा गया। लेकिन जब उन्होंने वहाँ बोलना शुरू किया और कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचारों की आवाज बनीं… तो मानो जैसे सब सिहर गए।

बतौर कश्मीर के हालातों की चश्मदीद, उन्होंने आयोजन में बोलना प्रारंभ किया। इस दौरान घाटी में पसरे इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण उन्होंने कश्मीर की तुलना सीरिया से की। उन्होंने 30 साल पहले का समय याद करते हुए कहा कि उन लोगों ने ISIS के स्तर की दहशत और बर्बता कश्मीर में झेली है। इसलिए उन्हें खुशी है कि आज इस तरह मानवाधिकारों की बैठक यहाँ हो रही हैं, क्योंकि जब मेरे जैसों ने अपने घर और अपनी जिंदगी सब गँवा दी थी, तब पूरा विश्व शांत था।

अपना गुस्सा जाहिर करते हुए सुनंदा वशिष्ठ ने लोगों से पूछा कि आखिर तब मानवाधिकार के वकील कहाँ थे, जब हमारे अधिकार हमसे छीने गए।

“कहाँ थे वो लोग जब 19 जनवरी 1990 की रात घाटी के हर मस्जिद से एक ही आवाज आ रही थी कि हमें कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए, लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के।”

उस रात की पीड़ा को जाहिर करते हुए सुनंदा ने आगे पूछा, “इंसानियत के रखवाले उस समय कहाँ थे जब मेरे दादाजी रसोई की चाकू और जंग लगी कुल्हाड़ी लेकर हमें मारने के लिए हमारे सामने केवल इसलिए खड़े थे, ताकि वो हमें उस बर्बरता से बचा सकें, जो जिंदा रहने पर हमारा आगे इंतजार कर रही थी।”

बैठक में उन्होंने बताया था कि उनके लोगों को आतंकियों ने उस रात केवल 3 विकल्प दिए थे। या तो वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ, या फिर धर्मांतरण कर लें या फिर उसी रात मर जाएँ। सुनंदा वशिष्ठ के अनुसार उस रात करीब 4 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने दहशत में आकर अपनी घर- संपत्ति सब जस का तस छोड़ दिया और खुद को बचाने के लिए वहाँ से भाग निकले।

उनके मुताबिक, आज 30 साल बाद भी वह कश्मीर स्थित उनके घर नहीं जा पाती। क्योंकि वहाँ उनका स्वागत ही नहीं होता। उन्हें आज भी वहाँ अपनी आस्था मानने की आजादी नहीं है। उनके घर को दूसरे समुदाय के लोगों ने घेर लिया है और घरों पर सिर्फ कब्जा नहीं हुआ बल्कि उन्हें जलाया जा चुका है।

कश्मीर पर बात करते हुए उन्होंने उस अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल को भी याद किया, जिसका मजहब इस्लाम न होने के कारण ISIS ने उसका सिर कलम कर दिया था, लेकिन फिर भी उसके आखिरी शब्द थे- “मेरे पिता एक यहूदी थे, मेरी माता एक यहूदी थी और मैं भी एक यहूदी ही हूँ।”

इस दौरान अपनी तुलना डेनियल पर्ल से करते हुए सुनंदा ने उनके आखिरी शब्दों को अपनी स्थिति बयान करने के लिए इस्तेमाल किया और कहा, “मेरे पिता एक कश्मीरी हैं, मेरी माता कश्मीरी हिंदू हैं और मैं भी एक कश्मीरी हिंदू ही हूँ। ”

इस बैठक में आपबीती सुनाते हुए भारतीय स्तंभकार ने दावा किया कि कश्मीर में उनका और उनके लोगों का पूरा जीवन कट्टरपंथ इस्लाम के कारण बर्बाद कर दिया गया। वे इस दौरान गिरिजा टिक्कू जैसी औरतों का भी जिक्र करती नजर आईं, जिनका अपहरण करके क्रूरता के साथ मार दिया। जिनके साथ सामूहिक बलात्कार हुए और जिन्हें टुकड़ों में काटकर फेंक दिया गया। उन्होंने बीके गंजू जैसे लोगों के बारे में भी बात की। जिन्हें अपने पड़ोसियों पर विश्वास करने के बदले सिर्फ़ विश्वासघात मिला। जिन्हें कंटेनर में ही गोली मार दी गई और उनकी पत्नी को खून से सने चावल (वो भी पति के ही खून से सने) खाने को मजबूर किया गया।

बता दें कि सुनंदा द्वारा यूएस कॉन्ग्रेस की बैठक में कही गई इन बातों के लिए उन्हें खूब सराहा गया था। स्वयं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उनके वीडियो को शेयर कर उन्हें शाबाशी दी थी। उन्होंने लिखा था कि ये वो आवाज है, जो सुनी जानी चाहिए।

50 से ज्यादा धमाकों में शामिल रहे जलीस से पहले भी कानपुर से पकड़े जा चुके हैं आतंकी

उत्तर प्रदेश का कानपुर देश की आज़ादी के समय क्रांतिकारियों का गढ़ रहा। लेकिन, बीते कुछ सालों में इस शहर से कई आतंकी पकड़े जा चुके हैं। शुक्रवार को ही कानपुर की ही एक मस्जिद से मुम्बई बम धमाकों के मास्टर माइंड डॉक्टर जलीस अंसारी को यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार किया। 50 से ज्यादा धमाकों में शामिल रहा यह आतंकी परोल पर जेल से बाहर आया था। परोल खत्म होने से पहले ही वह मुंबई से गायब हो गया और अगले दिन कानपुर में पकड़ा गया।

उसने पुलिस को बताया कि अपने 30 वर्ष पुराने दोस्तों से मदद लेने के लिए वह कानपुर आया था। इसमें से एक की मौत हो गई थी और दूसरा अब कानपुर में नहीं रहता। कानपुर से पकड़ा गया जलीस पहला आतंकी नहीं है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी के एजेंट भी यहॉं से पकड़े जा चुके हैं। आतंकी संगठनों के लिए फंड इकट्ठा करने वाले रमेश शाह के तार भी इस शहर से जुड़े थे।

दैनिक जागरण के कानपुर संस्करण में 18 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

सात मार्च 2017 को कानपुर में आइएस के खुरासान मॉड्यूल की गतिविधियाँ पुलिस के सामने आई थी। उसी दिन भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में धमाका हुआ था और जाजमऊ के गिरोह का नाम सामने आया था। जाँच में इस गिरोह के सदस्य आइएस के खुरासान मॉड्यूल के एजेंट निकले। दो दिन बाद ही एटीएस ने इनमें से एक आतंकी सैफुल्लाह को लखनऊ में मुठभेड़ में मार गिराया था।

इससे पहले सितंबर 2009 को आइएसआइ एजेंट इम्तियाज सचेंडी से पकड़ा गया था। सितंबर 2009 में बिठूर से आइएसआइ एजेंट वकास गिरफ्तार किया गया। सितंबर 2011 को आइएसआइ एजेंट फैसल रहमान उर्फ गुड्डू को एटीएस ने रेलबाजार से गिरफ्तार किया। जुलाई 2012 में सेंट्रल स्टेशन से फिरोज पकड़ा गया। अप्रैल 2014 में पटना में विस्फोट के एक संदिग्ध को पनकी स्टेशन के पास एटीएस ने पकड़ा।

कानपुर शहर से पकड़े गए इन आतंकियों से एक बात तो साफ़ है कि आतंकियों को शहर में पनाह ही नहीं, बल्कि वैचारिक और आर्थिक रूप से सपोर्ट भी मिल रहा है। बीते दिनों शहर में सीएए के विरोध के नाम पर पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके गए थे।

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