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फैक्ट चेक: केरल को बाढ़ राहत फंड देने पर कौन कर रहा है बदले की राजनीति, India Today या केंद्र सरकार?

इंडिया टुडे ने हाल ही में एक लेख के जरिए केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए लिखा कि केंद्र ने केरल में बाढ़ पीड़ितों को राहत फंड देने में उन्हें राजनीतिक कारणों से नजरअंदाज किया है। इंडिया टुडे ने इस खबर को राजनीतिक रंग देते हुए केंद्र की दक्षिणपंथी भाजपा सरकार पर केरल की ‘लेफ्ट/वामपंथी’ सरकार से बदले की भावना का इस्तेमाल करने के आरोप भी लगाए।

क्या है मामला

इंडिया टुडे की हैडलाइन में लिखा गया था- “केरल सरकार को कोई राहत फंड नहीं, केंद्र ने फिर किया लेफ्ट शासित राज्य को नजरअंदाज।”

यह खबर पहली नजर में हैरान करने वाली लगती है और यह सवाल पैदा करती है कि वर्ष 2019-2020 के लिए तय किए गए 5908 करोड़ रुपए में से केरल के लिए कोई भी मदद राशि क्यों नहीं दी गई। मेनस्ट्रीम मीडिया ने अपना ध्येय वाक्य बनाया हुआ है कि प्रोपेगंडा के बीच में तथ्यों को नहीं आने देना है। लेकिन ऑपइंडिया मेनस्ट्रीम मीडिया के इसी प्रोपेगैंडा की मशीनरी को तोड़ने के लिए काम करता है।

क्या है वास्तविकता

हमने सार्वजनिक प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कुछ तथ्यों को ढूँढा, जिन्हें कि इंडिया टुडे और अन्य समाचार पोर्टल्स भी केंद्र सरकार पर आरोप लगाने से पहले आसानी से जाँच सकते थे। हमने देखा कि पिछली बार केरल में बाढ़ के दौरान केंद्र सरकार को इन्हीं कुछ चुनिंदा मीडिया चैनल्स ने एक विलेन की भूमिका में दिखाया था।

मीडिया गिरोहों द्वारा UAE द्वारा मदद के लिए दी जा रही 700 करोड़ रुपए की मदद (जो कि मात्र एक अफवाह थी) पर वाहवाही तक दी गई और इसके लिए मीडिया गिरोह द्वारा बाढ़ के आपदा प्रबंधन में केंद्र सरकार की मदद को शून्य बताया गया। यह सब वर्ष 2018 की बात है।

केरल में वर्ष 2019 में भी बाढ़ आई थी लेकिन यह वर्ष 2018 के मुकाबले ज्यादा भीषण नहीं थी और इसलिए इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं किया गया। यही वजह थी कि NDRF के फंड को उन राज्यों को दिया गया, जिन्हें इसकी ज्यादा आवश्यकता थी।

आपदा प्रबंधन डिवीज़न की वेबसाइट NDRF को निम्नवत परिभाषित करती है-

यदि SDRF के पास सहायता राशि अपर्याप्त पड़ती है तो आपदा प्रबंधन एक्ट, 2005 के सेक्शन 46 के अंतर्गत निर्मित राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (National Disaster Relief Fund) राज्यों में SDRF (State Disaster Response Fund) को सहायता राशि उपलब्ध करवाता है।

यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि NDRF द्वारा यह फंड दो चरणों में बाँटा जाता है। 10,000 करोड़ रुपए की पहली किश्त की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी, दूसरी किश्त (5908 करोड़ रुपए) हाल ही में सामने आई है, जिस पर कि मीडिया गिरोह अपना षड्यंत्र रच रहा है।

आपदा प्रबंधन के लिए राज्यों को दी गई राशि पर नजर डालने से इस मामले पर पूरा प्रकाश पड़ता है। वर्ष 2019 में केंद्र ने केरल राज्य को 168.75 करोड़ रुपए दिए जबकि केरल की राज्य सरकार ने 56.25 करोड़ रुपए केरल SDRF के लिए तय किए। इसमें से भी केरल सरकार द्वारा सिर्फ 52.275 करोड़ रुपए ही इस्तेमाल किए गए।

जिसका सीधा सा आशय यह है कि केरल सरकार के SDRF के पास 2019 में जारी किए गए फंड का 173 करोड़ रुपए अभी भी शेष है और इस्तेमाल नहीं किया गया है। यहाँ से प्रश्न तो यह उठता है कि केरल की सरकार ने यह फंड अभी तक इस्तेमाल क्यों नहीं किया है? क्या मीडिया गिरोह को यह सवाल नहीं करना चाहिए कि अब केरल सरकार यह फंड इस्तेमाल ना कर के किस बदले की राजनीति कर रही है?

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की वेबसाइट पर थोड़ा सा और गहराई में जाने पर पता चलता है कि केरल सरकार के पास पहले से ही 1 अप्रैल 2019 तक भी 2107 करोड़ रुपए का फंड मौजूद था। यानी, यह राशि 2018 की बाढ़ के समय भी इस्तेमाल नहीं किया गया था, जो कि जान-माल के नुकसान के मामले में 2019 की बाढ़ से भी ज्यादा भीषण थी।

अब केरल सरकार के पास मौजूद वर्ष 2018 के बचे हुए राहत फंड और 2019 के बचे हुए फंड (2280 करोड़ रूपए में से, जो कि केंद्र सरकार द्वारा ही पहुँचाया गया था) पर नजर डालकर देखिए कि बदले की राजनीती कौन सी सरकार कर रही है, केंद्र कि दक्षिणपंथी सरकार या फिर केरल राज्य की वामपंथी सरकार?

जो लोग इस पूरे प्रकरण में भाजपा पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं वो केंद्र द्वारा पहले चरण में 1000 करोड़ रुपए, 3000 करोड़ रुपए और 500 करोड़ रुपए की सहायता राजस्थान, ओडिशा, और आंध्र प्रदेश राज्यों, जो कि गैर-भाजपा शासित राज्य हैं, को देने को किस तरह से नजरअंदाज कर देते हैं? क्या उनके पास दूसरे चरण में गैर-भाजपा शासित मध्य प्रदेश को दिए गए 1749 करोड़ रुपए के फंड और महाराष्ट्र को दिए गए 956 करोड़ रुपए देने के लिए कोई तर्क है?

‘पीड़ित’ मुस्लिम ड्राइवर निकला बॉलीवुड एक्टर: फ़िल्म निर्देशक ने खोली The Quint के ‘ड्रामे’ की पोल

‘द क्विंट’ ने एक वीडियो जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि इसमें दिखने वाला शख्स एक ड्राइवर है जो उबर के लिए काम करता है। इसमें वो काफ़ी नाटकीय ढंग से रोते हुए कहता दिख रहा है कि वो मुस्लिम है और एनआरसी के बारे में सोचते ही उसकी रूह काँप उठती है। वो आगे बताता है कि न उसके पास ज़मीन-जायदाद है और न ही कोई कागज़, तो उसे चिंता हो रही है कि वो अपनी नागरिकता कैसे साबित करेगा? इसका नाम इरशाद अहमद बताया गया है। ‘द क्विंट’ से बातचीत में उक्त इरशाद ने बताया कि नागरिकता साबित न करने पर उसके साथ क्या होगा, ये सोच कर उसे डर लग रहा है।

वहीं फ़िल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने ‘द क्विंट’ के इस वीडियो की पोल खोल कर रख दी। उन्होंने बड़ी जानकारी देते हुए बताया कि ये व्यक्ति इरशाद अहमद बॉलीवुड में बतौर जूनियर एक्टर काम करता है। ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ जैसी फ़िल्मों का निर्देशन कर चुके अग्निहोत्री ने बताया कि ‘द क्विंट’ ने इस पूरे ड्रामे की साज़िश पहले ही रच ली थी। अर्थात, एक स्क्रिप्ट तैयार कर के उस ड्राइवर को पीड़ित दिखा कर उससे अभिनय करवाया गया और दर्शकों को इसे सच बता कर परोस दिया गया। जबकि सबकुछ एक ड्रामा है।

‘हेट स्टोरी’ और ‘चॉकलेट’ जैसी फ़िल्में निर्देशित करने वाले विवेक अग्निहोत्री ने ‘द क्विंट’ को चुनौती दी कि वो ये साबित करे कि उसने उक्त शख्स को रुपए देकर अभिनय नहीं करवाया है। उन्होंने चुनौती दी कि वो उनकी बात को काटने के लिए सबूत पेश करे। हालाँकि, अभी तक ‘द क्विंट’ ने इसे नकारा नहीं है। लोगों ने प्रोपेगंडा पोर्टल को जम कर लताड़ लगाई और कहा कि वो फ़िल्मी स्क्रिप्ट बना कर वीडियो शूट कर रहा है और वास्तविकता के रूप में जनता को बेच रहा है।

और सबसे बड़ी बात तो ये है कि ओला और उबर जैसी कंपनियों के लिए काम करने के लिए ड्राइवरों को कागज़ात दिखाने होते हैं। उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस भी चाहिए होता है। ऐसे में, ‘कोई कागज़ न होने’ की बात करने का कोई तुक नहीं बनता।

यही सवाल भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी उठाया कि इरशाद ने आखिर कौन से डाक्यूमेंट्स दिखा कर ड्राइविंग लाइसेंस हासिल किया? विवेक अग्निहोत्री ने स्वामी को बताया कि ये एक अभिनेता है, जिससे ‘द क्विंट’ ने अभिनय करवाया।

अब देखना यह है कि इस खुलासे के बाद ‘द क्विंट’ अपनी पोल खुलने के बाद माफ़ी माँगता है या नहीं। चूँकि बॉलीवुड के ही निर्देशक बता रहे हैं कि उक्त फ़र्ज़ी ‘पीड़ित’ उनकी इंडस्ट्री में काम करता है, फिर भी ‘द क्विंट’ की चुप्पी चौकाने वाली है। वैसे ये सारा ड्रामा और एजेंडा उस NRC के नाम पर चलाया जा रहा है जिसका अभी तक कोई अस्तित्व ही नहीं है। न एक भी सिंगल ड्राफ्ट बाहर आया है।

NRC पर RJD में भी फूट: विधायक फराज़ फातमी ने कहा- पता नहीं रैली क्यों निकाल रहे तेजस्वी

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के मसले पर बिहार के मुख्य विपक्षी दल में फूट पड़ती दिख रही है। पार्टी के स्टैंड को लेकर एक अल्पसंख्यक विधायक ने ही आपत्ति जताई है। NRC के विरोध में RJD की रैली पर फराज़ फातमी ने एतराज जताया है। उन्होंने कहा है, मुझे नहीं पता कि वे (तेजस्वी यादव) एनआरसी के खिलाफ रैली क्यों निकाल रहे हैं। राज्य में इसे लागू नहीं किया जाएगा यह सरकार कह चुकी है।”

तेजस्वी राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री और राजद विधायक दल के नेता हैं। पार्टी में बगावती सुर ऐसे वक्त में उठे हैं जब पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद चारा घोटाले में दोषी करार दिए जाने के कारण जेल में बंद हैं। सीएए और एनआरसी के खिलाफ तेजस्वी की प्रतिरोध यात्रा 16 जनवरी से निकलेगी। इतना ही नहीं फराज ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्य का सबसे बड़ा चेहरा बताकर भी सियासत गर्म कर दिया है। उन्होंने कहा, “बिहार में नीतीश कुमार से बड़ा कोई चेहरा नहीं है। 2020 में भी वही सरकार बनाएँगे।”

फराज ने ये बातें बुधवार को JDU के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह द्वारा आयोजित दही-चूड़ा भोज में शामिल होने के बाद कही। वे दरभंगा के केवटी से विधायक हैं। उनके पिता अली अशरफ फातमी राजद के वरिष्ठ नेता और केंद्र में मंत्री रह चुके हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने राजद छोड़ जदयू का दामन थाम लिया था। ताजा बयान से फराज ने भी अपने तेवर जाहिर कर दिए हैं।

वैसे सीएए और एनआरसी को लेकर विपक्षी दलों के भीतर मतभेद की यह पहली घटना नहीं है। राजद की सहयोगी कॉन्ग्रेस को भी कई राज्यों में इस स्थिति से जूझ रही है। मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह और हरदीप सिंह डांग पार्टी के स्टैंड का विरोध कर चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने कहा था कि अब दूसरे मजहब के लोग भी इसका विरोध नहीं कर रहे। वहीं, डांग ने कहा था कि CAA पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है, जो बहुत ही अच्छी बात है। गोवा में भी कॉन्ग्रेस के चार नेताओं ने इस मसले पर पार्टी छोड़ दी थी। इन नेताओं का कहना था कि पार्टी अल्पसंख्यकों खासकर, समुदाय विशेष को बरगलाने की कोशिश कर रही है।

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जामिया के दंगों की तैयारी बहुत पहले हो चुकी थी, हर शुक्रवार को लगता है डर: जामिया के छात्र ने खोले कई राज़

ऑपइंडिया ने जामिया के कुछ छात्रों से बातचीत की, जिन्होंने यूनिवर्सिटी में हुई दंगेबाजी के पीछे बड़ी साज़िश का पर्दाफाश किया। उनमें से एक ने उन छात्रों की तरफ़ से ऑपइंडिया से बातचीत की लेकिन डर का आलम ये है कि वो छात्र अपना चेहरा दिखाने को राज़ी नहीं हुआ। इसीलिए, आप इस इंटरव्यू को देख सकते हैं लेकिन उस छात्र का चेहरा नहीं देख सकते। वामपंथी व कट्टर इस्लामिक ताक़तों के कारण इन छात्रों में भय का माहौल है। उस छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि दिसंबर में परीक्षाओं के दौरान ही सीएए को लेकर चर्चा शुरू हुई, तब जामिया में भी माहौल बनाया जाने लगा।

जामिया के छात्र ने बताया कि बाकी प्रदर्शनों व अबकी हुए विरोध प्रदर्शनों में ख़ासा अंतर था, जो एक भयंकर ट्रेंड की तरफ़ इशारा कर रहा था। उसने बताया कि इन धरनों में 600-700 की संख्या में छात्र आते थे और उन्हें भड़काया जाता था। इस्लामी मजहबी नारे लगाए गए और कलमा पढ़ा गया। इसी तरह फिलिस्तीन के कट्टरपंथी संगठन के नारे ‘इन्तिफादा’ का प्रयोग किया गया। जामिया के छात्र ने बताया कि ऐसे नारे सारे प्रदर्शनों में लगाए गए और जामिया के छात्रों ने ही लगाया। यहाँ तक कि लड़कियों ने भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

उसने आयशा-लदीदा की ब्रांडिंग की सजिश की भी बात की। उसने बताया कि जामिया शिक्षक संघ ने संसद तक मार्च की योजना बनाई, जैसा जामिया में आज तक कभी नहीं हुआ था। छात्र ने कहा कि जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने एक कमिटी बना कर सीएए और एनआरसी के विरोध के लिए कमिटी बनाई। यानी, जामिया में न सिर्फ़ उपद्रवी छात्र, बल्कि शिक्षक भी ये तय कर रहे थे कि सीएए का विरोध कैसे हो। छात्र ने एक और बात बताई, जिसकी मीडिया में चर्चा नहीं हुई। जामिया में वीसी ऑफिस के ऊपर फिलिस्तीन का झंडा लगाया गया। इस काम में पूर्व-छात्र, शिक्षक और गार्ड्स भी शामिल हैं।

जहाँ झंडा लगाया गया, वहाँ सभी को आने-जाने की अनुमति नहीं है, आईडी कार्ड्स दिखाने होते हैं- लेकिन फिर भी वो ऐसा करने में कामयाब हो गए। छात्र ने बताया कि संसद भवन तक मार्च करने के रास्ते में “कॉमरेड, बैरिकेड तोड़ो” का नारा लगाते हुए बैरिकेड तोड़ने के लिए लोगों को भड़काया गया। छात्र ने कहा कि कई बाहरी लोग भी इसमें शामिल हुए और सभी ने मिल कर पत्थरबाजी की। पत्थरबाजी में न सिर्फ़ बाहरी लोग बल्कि छात्र भी शामिल थे। पुलिसकर्मियों की पीटा गया, एक को बाथरूम में बंद कर दिया गया।

उक्त छात्र ने ऑपइंडिया को बताया कि छात्रों को वहाँ के नक़्शे का पूरा पता था लेकिन पुलिस थी, इसका फायदा उठाया गया। छात्र ने कहा कि उकसाने के लिए और मोदी सरकार से बदला लेने के लिए ‘नामर्द’ शब्द तक का भी उपयोग किया गया। उसने कुछ नेताओं का भी नाम लिया, जिन्होंने मेडिएशन के नाम पर दंगे भड़काने का काम किया। बकौल छात्र, इसमें आसिफ मोहम्मद ख़ान अमानतुल्लाह ख़ान जैसे नेताओं ने लोगों को भड़काने का काम किया। जामिया में आम आदमी पार्टी के छात्र विंग की भी अच्छी-ख़ासी उपस्थिति है। उसने बताया कि इंडियन मुस्लिम लीग के नेता कहते हैं कि वो भारतीय बाद में हैं और मुस्लिम पहले हैं। अब तो वहाँ हर शुक्रवार को डर लगता है कि कब क्या हो जाए।

इस तरह की मानसिकता पढ़े-लिखे लोगों में है, ये नेता हैं, अनपढ़-गँवार नहीं। जामिया ने सरकार से अपील करते हुए कहा था कि सीएए को वापस ले लिया जाए। इससे पता चलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी उनलोगों से मिला हुआ है। साथ ही कई छात्र नेताओं ने आसपास के इलाक़ों में मुस्लिमों को भड़काने की बात कही। लेकिन, साथ ही वो विक्टिम कार्ड भी खेलते रहे। कई व्हाट्सप्प ग्रुप्स बना कर हिंसा की साज़िश रची है। ‘जिहाद’ के लिए हॉकी-बैट लेकर चले और पुलिसवालों को ‘तोड़ देने’ की बातें की गईं।

शाहीन बाग़ में चल रहे विरोध प्रदर्शन पर भी जामिया के छात्र ने अपनी राय रखी। उसने बताया कि जेएनयू के एक छात्र शर्जील इमाम ने शाहीन बाग़ में भड़काऊ भाषण दिया। इमाम ने कहा कि मुस्लिमों की इतनी भी औकात नहीं है क्या कि 500 शहरों में चक्का जाम कर सके? ऐसे कई भड़काऊ बयान दिए गए। उक्त छात्र ने बताया कि जेएनयू के वामपंथियों ने जामिया वालों को बुला कर सीएए विरोधी प्रदर्शन व अभियान में उनकी मदद ली। छात्र ने जानकारी दी कि एक उपद्रवी मुस्लिम छात्र ने इजरायल के झंडे भी जलाए। शायद ये भारतीय विदेश मंत्रालय की इमेज को ख़राब करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। उस छात्र का नाम कासिम उस्मानी है, जो आप के स्टूडेंट विंग सीवाईएसएस के नेता है।

साथ ही छात्र ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि आखिर जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज पुलिस को क्यों नहीं दी जा रही? उसने बताया कि इससे सबसे ज्यादा घाटा पढ़ने वाले छात्रों को हुआ है। वो इंटर्नशिप व ट्रेनिंग के लिए नहीं जा पा रहे। इससे प्लेसमेंट्स में दिक्कतें आ रही हैं क्योंकि कम्पनियाँ हिंसा के कारण जामिया की ग़लत इमेज बन रही है। गाँव वालों ने जामिया के छात्रों को भगा दिया। परीक्षाओं की तारीख अब तक 3 बार आगे बढ़ाई जा चुकी है। प्रॉक्टर ने भी उपद्रवी छात्रों की ही बात मानी और परीक्षाओं की तारीख बढ़ा दी।

उक्त छात्र ने बताया कि रोज़ कई नेता आ रहे हैं और भड़काऊ भाषण देकर छात्रों को उकसा रहे हैं। लाइब्रेरी और रीडिंग हॉल कई दिनों से बंद हैं। उसने हिंसा वाले दिन की बात करते हुए कहा कि पुलिस ने जब पत्थरबाजी को नियंत्रित करने के लिए कैम्पस में प्रवेश किया, तब लाइब्रेरी में उपद्रवियों ने टेबल-कुर्सी वगैरह को दरवाजे पर रख दिया ताकि पुलिस को रोका जा सके। अपनी ही लाइब्रेरी में तोड़फोड़ की गई। उसने आरोप लगाया कि जामिया की वीसी ने ख़ुद गर्ल्स हॉस्टल में कहा था कि सीसीटीवी फुटेज पुलिस को दे दिया जाए तो जामिया के छात्र पकड़े जाएँगे।

जामिया के छात्र से बातचीत (हम उसका चेहरा नहीं दिखा सकते)

दरअसल, अगर उक्त छात्र के बयान को मानें तो बाहरी लोगों ने छात्रों को भड़काया कि पुलिस अगर अंदर आ गई तो उन्हें पीटेगी। इसके बाद फेक न्यूज़ फैलाया गया कि जामिया के छात्र मारे गए हैं। ऐसा इसीलिए किया गया ताकि आसपास के लोगों को हिंसा के लिए भड़काया जा सके। यह भी अफवाह फैलाई गई कि पुलिस गर्ल्स हॉस्टल में घुस गई। उसने बताया कि सच्चाई ये है कि कुछ उपद्रवी ही गर्ल्स हॉस्टल में घुस गए थे, जहाँ बाहरी लड़कियों तक को जाने की अनुमति नहीं है।

कुल मिला कर उक्त छात्र से बात करने के बाद ये पता चला कि विभिन्न संगठनों के वामपंथी व इस्लामी नेता अनुच्छेद 370, राम मंदिर, तीन तलाक़ और सीएए को लेकर छात्रों को भड़काने में लगे हैं। और ये सब एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है।

CAA विरोध में हिन्दूघृणा वाले 30 पोस्टर: अजीत भारती की राय | Ajeet Bharti on Hinduphobic Posters in CAA Protest

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिन्दूघृणा के कई पोस्टर और नारे लगाए गए। इसमें इनकी हिन्दुओं के खिलाफ घृणा साफ तौर पर झलकती है। विशुद्ध इस्लामिक नारों के जरिए ये भी साफ कर दिया गया कि ये राजनैतिक नहीं, बल्कि समुदाय विशेष की लड़ाई है। इसमें अल्लाह को खींचा गया, हिन्दुओं से आजादी की बातें हुईं।

इन्हें देश के विचार और कल्पना से कोई मतलब नहीं है। इन्हें तो बस गजवा ए हिंद से मतलब है।समुदाय का राज होगा, काफिरों को काटा जाएगा। ये इनके लिए अपराध नहीं है। इसके लिए कोई सजा नहीं है। एक मुस्लिम रैली में ब्राह्मण को ‘कसाई’ बताया जाता है। एक मुस्लिम टोपी पहने शख्स धमकी देते हुए लिखता है कि ज्यादा पुराने डॉक्यूमेंट्स मत माँग लेना मोदी, कहीं हमलोग हिन्दुस्तान के मालिक ना निकल जाए। CAA विरोध के नाम पर हिन्दूविरोधी एजेंडा चलाया गया।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

AAP की शिक्षा क्रांति! 12वीं में घट गए बच्चे, 10वीं के नतीजे 13 साल में सबसे बदतर

दिल्ली की शिक्षा में क्रांति हो गई! यह केवल आम आदमी पार्टी या दिल्ली सरकार का ही दावा नहीं है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें देख विशेषज्ञ बने लोग भी यह कहते सुनाई पड़ते हैं। 8 स्कूलों की मनभावन तस्वीर और बीते एक साल की कुछ गतिविधियों की बातें सोशल मीडिया पर फैलाकर माहौल ऐसा बनाया गया मानों दिल्ली के स्कूलों में कमाल हो गया। दिल्ली के स्कूलों के लिए बनाए गए हवा की मौजूदगी अगले महीने होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी महसूस किया जा रहा है।

सरकारी स्कूलों के साथ काम करने वाले बखूबी जानते हैं कि दिल्ली के सरकारी स्कूल देश के बाकी हिस्सों के स्कूलों से पहले से ही बेहतर हैं। दिल्ली के प्रतिभा विकास विद्यालय की गिनती देश के अच्छे स्कूलों में बीते दो दशकों से होती आई है। जब देश के बाकी हिस्सों में बच्चे पेड़ की छॉंव में बैठ पढ़ते थे, दिल्ली के सरकारी स्कूलों के पास तब भी अच्छे भवन हुआ करते थे। इसलिए दिल्ली के स्कूलों को 5 साल में ही बदतर से विश्व स्तरीय बनाने का दवा हास्यास्पद है। वैसे भी एक चौथाई बजट से महज हजार स्कूल चलाने वाले दिल्ली की तुलना देश के बाकी राज्यों से करने का काम भी एक निहायत बेवकूफ ही कर सकता है। यह कुछ वैसा ही है जैसे बस्तर के स्कूलों की तुलना बोस्टन (अमेरिका) के स्कूलों से की जाए।

दिल्ली के स्कूलों में अभी हाल के महीनों में शिक्षा के नाम पर हुए राजनीतिक प्रयोग को बगैर किसी रिसर्च के सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया और इसे आदर्श शिक्षा मॉडल मानते हुए बाकी जगहों पर लागू करने की वकालत हुई। लेकिन जिस दिल्ली में शिक्षा क्रांति होने की बात लोग करते हैं, वह खूबसूरत तस्वीरों की आड़ में कई ऐसे तथ्य छुपाए हुए है जो मुख्यधारा की चर्चा से गायब है या लोग इससे अनजान हैं।

स्कूली शिक्षा से दूर किए जा रहे लाखों बच्चे

वर्ल्ड क्लास शिक्षा के दावों के उलट दिल्ली के लगभग आधे बच्चे हर साल नौवीं कक्षा में ही फेल कर दिए जाते हैं। कुछ यही हाल 11वीं का है, जहाँ एक तिहाई बच्चे हर साल फेल हो रहे हैं। ऐसी स्थिति देश के किसी राज्य में नहीं है। बात केवल पास-फेल तक सीमित नहीं है। सरकार की अघोषित नीति के तहत फेल हुए बच्चों को दुबारा परीक्षा में बैठने से भी वंचित किया जा रहा है। केवल सत्र 2017-18 में ही 66 फीसदी बच्चों को दुबारा नामांकन नहीं लेने दिया गया और एक लाख से भी अधिक बच्चे स्कूली शिक्षा से बाहर हो गए। सबसे अधिक प्रभावित 10वीं और 12वीं में फेल हुए बच्चे थे, जिनमें से 91 फीसदी बच्चों को दुबारा नामांकन नही मिला। ये बात सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को खुद बताई है।

ये केवल एक सत्र की बात नहीं है। यही हाल 5 साल रहा। शिक्षा क्रांति के नाम पर देश की राजधानी में ही लाखों बच्चों को चुपचाप स्कूली शिक्षा से निकाल दिया गया, लेकिन कहीं आवाज़ नहीं उठी। अगर ऐसी स्थिति किसी और राज्य में होती तो कोहराम मच जाता। बाल अधिकार के झंडेबरदार सरकार से सवाल पूछते। बुद्धिजीवी लेख लिखते। मसला सुप्रीम कोर्ट में होता।

परीक्षा के नतीजे क्या कहते हैं?

12वीं के परिणाम में आंशिक सुधार पर आप सरकार अपनी पीठ खूब थपथपाती है। लेकिन यह नहीं बताती कि जबसे उसकी सरकार बनी है, हर साल 12वीं की परीक्षा में बैठने वाले बच्चे बड़ी तेजी से क्यों घट रहे हैं? दिल्ली सरकार के आँकड़ों को ही देखे तो 2005 से 2014 तक परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की जो संख्या 60,570 से बढ़कर 1,66,257 हो गई थी, वह 2015 के बाद हर साल घटते-घटते 2018 में 1,12,826 तक पहुँच गई! क्या यह एक चिंताजनक स्थिति नहीं है! यही नहीं सरकारी स्कूलों के द्वारा प्राइवेट को पहली बार पछाड़ने का दावा भी गलत है। 2005 में 13 अंकों से पिछड़ने के बाद दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों से न केवल बराबरी की, बल्कि उन्हें 2009 और 2010 में लगातार पछाड़ा भी है। अगर बीते 10 सालों का ही आँकड़ा देखें तो 12वीं के परिणाम कभी 85 फीसदी से कम नहीं रहा।

आप सरकार 12वीं के परिणाम का श्रेय लेना चाहती है। शिक्षकों और बच्चों की मेहनत की बजाए इसे अपनी उपलब्धि बताती है। लेकिन जैसे ही बात 10वीं के ख़राब परिणाम की आती है तो चुप्पी छा जाती है। कोई नहीं बताता कि सरकारी स्कूल के परिणाम प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले में कहीं नहीं टिकते और उनके बीच का फासला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस वर्ष दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परिणाम 71.58 फीसदी और प्राइवेट स्कूलों का 93.12 फीसदी था। पिछले सत्र में यह आँकड़ा क्रमशः 69.32 फीसदी और 89.45 फीसदी था। अंतर साफ़ है। पिछले साल 20 अंक से पीछे थे, इस साल 21 अंकों का फासला है। वर्ष 2001-02 में 45 अंकों से पीछे रहने वाले जिन सरकारी स्कूलों ने 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ दिया था, आज दो सालों से राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम और 13 साल के न्यूनतम परिणाम के आँकड़ें से भी पीछे हैं। बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है।

क्यों घट रहे हैं नामांकन?

2018-19 में आई दिल्ली के इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि स्कूलों में नामांकन लगातार घट रहे हैं। सत्र 2013-14 में जहाँ दिल्ली के 992 स्कूलों में 16.10 लाख विद्यार्थी पढ़ते थे, 2017-18 आते-आते स्कूलों की संख्या बढ़कर 1,019 तो हो गई, लेकिन बच्चों की संख्या घटकर 14.81 लाख पर पहुँच गई। इसी दौरान प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,277 से घटकर 1,719 हो गई। लेकिन नामांकित बच्चों की संख्या 13.57 लाख से बढ़कर 16.21 लाख हो गई। सरकारी स्कूल बढ़े, नामांकन नही बढ़ रहे। ये क्या है!

इकॉनोमिक सर्वे इस ओर भी इशारा करती है कि दिल्ली में आज भी अनेकों बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हैं। 2014-15 में दिल्ली के सभी शैक्षिक संस्थानों में स्कूली शिक्षा ले रहे बच्चों की संख्या 44.13 लाख थी, वह 2017-18 में घटकर 43.93 लाख पर आ गई। चिंता की बात है कि दिल्ली की जनसँख्या बढ़ी तो बच्चे कहाँ गए!

निगम के स्कूलों से भेदभाव

दिल्ली सरकार के पास केवल 1,030 स्कूल हैं। वहीं दिल्ली नगर निगम के जिम्मे लगभग 1,700 स्कूल हैं। प्राथमिक कक्षाएँ अब तक नगर निगम के स्कूलों में लगती थी। वहीं माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चे दिल्ली सरकार के स्कूलों में जाते थे। 2017 में एमसीडी चुनाव में जब करारी हार मिली तो अपने अधीन के स्कूलों में घटते नामांकन को रोकने और निगम के स्कूल बंद करने के इरादे से आप सरकार ने बड़ी संख्या में अपने स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन लेना आरंभ कर दिया। 2014-2018 के बीच रिकॉर्ड 319 स्कूलों में प्राथमिक कक्षाएँ शुरू की गई। आज 720 सर्वोदय विद्यालयों में प्राथमिक कक्षा चल रही है। यही नहीं 144 स्कूलों में नर्सरी की पढ़ाई शुरू कर दी गई ताकि दिल्ली नगर निगम के स्कूल धीरे-धीरे खत्म हो जाए। निगम के स्कूलों से राजनीतिक बदला लेने की नीयत से शिक्षकों के वेतन में देरी, स्कूलों के विकास पर ध्यान देने की बजाए उसे ख़राब साबित करने में ही सरकार जुटी रही। इन सबके बावजूद सरकारी स्कूल की बजाए बच्चे प्राइवेट का ही रुख कर रहे हैं।

साइंस, गणित की पढ़ाई का बुरा हाल

जब पूरी दुनिया विज्ञान और तकनीकी के अध्ययन पर जोर दे रही है, आज दिल्ली के एक तिहाई से भी कम सरकारी स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई उपलब्ध है। संसाधन की कमी का बहाना बनाकर आज दो तिहाई स्कूलों में बच्चों को सामाजिक विज्ञान या फिर चुनिंदा स्कूलों में वाणिज्य विषय लेकर पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। गरीब के बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनने का केवल स्वप्न ही देख सकते हैं, उसे पूरा नहीं कर सकते।

दिल्ली में अच्छी शिक्षा की कल्पना में विज्ञान के साथ-साथ गणित भी शामिल नहीं है। 2020 में सीबीएसई ने 10वीं की परीक्षा में बेसिक मैथ को गणित विषय के एक आसान विकल्प के रूप में दिया तो देश भर से 30 फीसदी बच्चों ने इसे चुना। वहीं दिल्ली के रिकॉर्ड 73 फीसदी बच्चों ने बेसिक मैथ चुना ताकि वे गणित में फेल न हो सकें। दिल्ली सरकार ने बजाप्ता सर्कुलर निकाल कर शिक्षकों को कहा कि वे बच्चों को समझाकर बेसिक मैथ लेने को कहें।

शिक्षकों की भारी कमी, गुणवत्ता पर भी सवाल

दिल्ली में विज्ञान, गणित, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू जैसे विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षकों की भारी कमी है। हजारों शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। इनकी भरपाई भारी संख्या में नियुक्त उन अतिथि शिक्षकों से की जा रही है जिनकी गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि 21,135 अतिथि शिक्षकों में से 16,383 शिक्षक नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में न्यूनतम अंक भी नही ला सकें। इस परीक्षा में केवल 1,335 शिक्षक ही अंतिम रूप से चयनित हुए। आप इन्हीं शिक्षकों को स्थायी करने का दावा करती है। केवल शिक्षक ही नही, स्थायी प्राचार्य की कमी से भी दिल्ली के विद्यालय बेहद प्रभावित हैं। आज लगभग दो तिहाई स्कूलों में प्राचार्य के पद खाली हैं। ये स्कूल आधे-अधूरे अधिकार लिए उप-प्राचार्यों के सहारे चल रहे हैं।

बहुचर्चित शिक्षा बजट भी आँकड़ों की बाजीगरी ही है, जो विधानसभा के पटल पर कुछ और जबकि वास्तविक खर्च में कुछ और दिखता है। दिल्ली की आर्थिक क्षमता बढ़ी लेकिन पहले की तरह आज भी दिल्ली कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 2 फीसदी भी शिक्षा के लिए आवंटित नही करता।

500 नए स्कूल, 17000 शिक्षकों की बहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के वादे भूल गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाकर यह बताने की कोशिश हो रही है कि शिक्षा में क्रांति आ गई है। असल मुद्दे गायब हैं! सवाल है इस कथित क्रांति से बच्चों को क्या फायदा हुआ जब आज भी दिल्ली के लाखों बच्चें स्कूली शिक्षा से वंचित किए जा रहे हैं।

दरअसल आप की शिक्षा क्रांति, उस खूबसूरत सी दिखने वाली रंगीन बैलून की तरह है, जो बाहर से देखने में मनभावन तो लगती है लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला है। प्रचार तंत्र के साए में वाहवाही बटोरने वाली ये बैलून जब फूटेगी तो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बदल जाने की आस पाले कइयों के भरोसे टूटेंगे। फिलहाल दिल्ली के गरीब लोगों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा एक स्वप्न ही है।

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निर्भया के बलात्कारियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं: दिल्ली सरकार ने कोर्ट को बताई ये वजह

निर्भया गैंगरेप के दोषियों को 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जाएगी दिल्ली सरकार ने जानकारी दी है कि आरोपितों द्वारा दायर की गई क्षमा याचिका के आलोक में तय तारीख को फाँसी नहीं दी जा सकती। हालाँकि, दिल्ली सरकार के वकील ने ये भी कहा है कि दोषी मुकेश द्वारा दायर की गई क्षमा याचिका असामयिक है। बुधवार (जनवरी 15, 2020) को आरोपितों की क्षमा याचिका को उपराज्यपाल कार्यालय को भेजा जाएगा। जब उनकी क्षमा याचिका को नकार दिया जाएगा, उसके बाद उन्हें पुलिस द्वारा 14 दिनों की नोटिस दी जाएगी।

बता दें कि दिल्ली सरकार की तरफ़ से इस मामले में राहुल मेहरा जिरह कर रहे हैं। मेहरा ने अदालत में बताया कि निर्भया के गुनहगारों को 22 जनवरी की तय तारीख़ पर फाँसी नहीं दी जा सकती। उन्होंने कारण बताते हुए कहा कि क्षमा याचिका खारिज होने के बाद 14 दिनों की नोटिस थमाई जाएगी और तब फाँसी दी जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोषियों ने क़ानूनी प्रक्रिया में गड़बड़ी करने और केस को लम्बा खींचने के लिए क्षमा याचिका दाखिल किया है।

बता दें कि निर्भया के गुनहगारों के फाँसी की ‘प्रैक्टिस’ भी की जा चुकी है। उन सभी के परिवारों को उनसे मिलाया जा चुका है। जेल प्रशासन ने बताया था कि उन सबसे पूछा जाएगा कि वो अपने परिवारों से अंतिम बार कब मिलना चाहते हैं। अगर उन्होंने जवाब नहीं दिया तो 20 जनवरी को स्वतः परिवार से अंतिम बार मिलाने की तारीख तय की जाएगी।

गर्भवती शमीमा को ले भारी बर्फबारी में 4 घंटे चलते रहे 100 जवान, PM मोदी भी हुए मुरीद

भारतीय सेना आज यानी 15 जनवरी को अपना 72वाँ सेना दिवस मना रही है। सोशल मीडिया पर तरह-तरह के पोस्ट लिखकर देश के नागरिक सेना के अदम्य साहस के लिए उनकी तारीफ कर रहे हैं। इसी बीच जम्मू-कश्मीर से भी एक ऐसी वी़डियो सामने आई है, जिसे देखने के बाद आपको भी अपनी सेना के जवानों पर गर्व महसूस होगा। साथ ही उन लोगों को भी जवाब मिलेगा, जो वक्त-बेवक्त सेना की कार्रवाई के कारण उनकी आलोचना करते रहते हैं।

जम्मू-कश्मीर की इस वीडियो को भारतीय सेना के चिनार कॉर्पर्स ने अपने ट्विटर अकॉउंट से शेयर किया। इसमें देखा जा सकता है कि सेना के 100 जवानों ने आखिर कैसे चार घंटे तक बर्फ में पैदल चलकर एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाया। गर्भवती महिला का नाम शमीमा है।

जानकारी के अनुसार, सेना के चिनार कॉर्प्स ने मंगलवार को बताया गया कि घाटी में बर्फबारी होने के कारण एक गर्भवती महिला को अस्पताल पहुँचाने में दिक्कत हो रही थी। कमर तक बर्फ गिरी होने के कारण कोई भी साधन उसे लेकर अस्पताल तक नहीं पहुँच सकता था। इसलिए, महिला के परिजनों ने सेना को बुलाया। इसके बाद चिनार कॉर्प्स के 100 जवान, 30 स्थानीय लोगों के साथ मदद के लिए पहुँचे। वे अपने साथ स्ट्रेचर लेकर पहुँचे। गर्भवती को स्ट्रेचर पर लिटाकर जवान 4 घंटे बाद सुरक्षित अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया। अब दोनों स्वस्थ्य हैं।  

गौरतलब है कि सेना की वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस वीडियो को ट्वीट करते हुए सेना के जवानों को सलाम किया और कहा कि जब भी लोगों को मदद की जरूरत पड़ती है, तो आर्मी हर मुमकिन तरीके से उनकी मदद करती है। पीएम मोदी ने इस दौरान शमीमा और उनके बच्चे की अच्छी सेहत की कामना की।

बता दें, ये पहला मौक़ा नहीं है, जब सेना ने इस तरह किसी गर्भवती महिला की मदद के लिए तत्परता दिखाई हो। इससे पूर्व अभी कुछ दिन पहले ही एक मामला कुपवाड़ा जिले से भी प्रकाश में आया था। जहाँ एक गर्भवती महिला तस्लीमा को सेना के जवानों ने न सिर्फ़ नई ज़िंदगी दी थी बल्कि उसके नवजात शिशु को जीवन प्रदान करने में भी एक अहम भूमिका निभाई थी।

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सबरीमाला: पवित्र यात्रा के रास्ते में फेंके माँस के टुकड़े व जानवरों के कंकाल, श्रद्धालुओं में आक्रोश

सबरीमाला मंदिर में हर वर्ष की तरह इस बार भी तिरुवाभरणम यात्रा की शुरुआत हुई लेकिन कुछ शरारती तत्वों ने यात्रा के रास्ते में जानवरों के माँस व कंकाल डाल कर सबरीमाला मंदिर के इस जुलूस में बाधा पहुँचाने का प्रयास किया। सबरीमाला के मुख्य देवता स्वामी अयप्पा अपने शरीर पर कई आभूषण धारण करते हैं। इन आभूषणों को प्रत्येक वर्ष पंडालम से लेकर सबरीमाला के मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है। ये यात्रा काफ़ी धूमधाम से होती है और इसमें कई लोग शिरकत करते हैं। इसी कार्यक्रम को तिरुवाभरणम कहा जाता है। पवित्र बक्सों में रख कर आभूषण को ले जाया जाता है।

इन आभूषणों को भगवान अयप्पा के पालक पिता और पंडालम के राजा राजशेखर ने इन गहनों को तैयार किया था। सो भगवान अयप्पा के पालक-पिता भी थे। इस यात्रा को हज़ारों लोग 83 किलोमीटर पैदल चल कर तय करते हैं। इन बक्सों को 12 लोगों द्वारा अपने सिर पर ढोया जाता है। ‘ऑर्गनाइजर’ में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, कुछ शरारती तत्वों ने इस पवित्र प्रक्रिया में विघ्न डालने के लिए यात्रा के रास्ते में जानवरों के माँस व कंकाल फेंक दिए ताकि हिन्दुओं की भावनाएँ आहत की जा सके।

ग्रामीणों ने जब माँस के टुकड़ों व जानवरों के कंकाल को यात्रा के रास्ते में पड़ा हुआ देखा तो अफरातफरी मच गई। लोगों ने जल्दी-जल्दी किसी तरह रास्ते को साफ़ किया। जहाँ ये घटना हुई, वहाँ के रास्ते को धोया गया और सफाई की गई। पंचायत ने 6 जनवरी को ही आदेश पारित किया था कि 13-14 जनवरी को होने वाली इस पवित्र यात्रा के रास्ते में पड़ने वाली माँस की दुकानों को बंद किया जाए। स्थानीय इस्लामी और वामपंथी समूहों ने इस आदेश पर आपत्ति जताई थी। वामपंथियों ने दावा किया था कि ये सब केरल सरकार की ‘प्रगतिशील सोच’ के विरुद्ध है।

कई वामपंथियों ने सोशल मीडिया पर इस आदेश को ‘सेक्युलर विचारधारा’ के ख़िलाफ़ बताया था। वहीं श्रद्धालुओं का कहना है कि इस यात्रा से पहले माँस की दुकानों को बंद रखना एक पुरानी परंपरा है क्योंकि श्रद्धालुओं को शिकायत रहती थी कि रास्ते में ऐसे दुकानों के खुले रहने से कचरों के कारण रास्ता अपवित्र हो जाता था। पंचायत सचिव एस. ज्योति ने बताया कि ग्रामीण तन-मन-धन लगा कर रास्ते को साफ़ करते हैं लेकिन फिर भी माँस के टुकड़ों से इसे अपवित्र करने की कोशिश की गई।

पंचायत के डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि यात्रा शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए ये आदेश जारी किया गया लेकिन कुछ लोग बिना वजह इसे मुद्दा बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये आदेश एक ‘रूटीन अफेयर’ था और इसमें कुछ भी नया नहीं है।

​सिसोदिया ने माँगे ₹10 करोड़, नहीं दिए तो नेताजी को बेच दिया टिकट: AAP विधायक

दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी ने मंगलवार को अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया था। कई नए चेहरों को मौका देते हुए पार्टी उस कुछ विधायकों का पत्ता साफ़ कर दिया है। इसके कारण पार्टी में बगावत तेज हो गई है। पार्टी नेतृत्व पर टिकट बेचने के आरोप भी लगे हैं। जिन विधायकों का टिकट पार्टी ने काट दिया है उनमें एक नाम एनडी शर्मा का भी है। शर्मा बदरपुर से विधायक हैं। आप ने इस बार उनकी जगह राम सिंह नेताजी को टिकट दिया है।

इससे नाराज शर्मा ने आप को देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी करार देते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। मीडिया से बात करते हुए आप विधायक शर्मा ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अ​रविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने 21 करोड़ रुपए लेकर राम सिंह को टिकट दिया है। उन्होंने कहा, “मनीष सिसोदिया ने मुझे अपने घर पर बुलाया और बताया कि राम सिंह 20-21 करोड़ रुपए देकर मेरी विधानसभा सीट से टिकट माँग रहा है। उन्होंने मुझसे 10 करोड़ रुपए माँगे, लेकिन मैं वहाँ से मना करके चला आया।”

शर्मा ने अपने ट्विटर अकॉउंट से भी आम आदमी पार्टी की निंदा की हैं। उन्होंने लिखा, “जिन भूमाफियाओं के खिलाफ लड़ाई में कार्यकर्ताओं ने लाठियाँ खाई। गालियाँ मिली। थाने गए। जेल गए। अपमान सहा। आज, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के त्याग और बलिदान का सौदा कर लिया गया।”

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पार्टी ने जिस नेता को टिकट दिया है, 2015 के चुनाव में उसकी जमानत जब्त हो गई थी। एनडी शर्मा ने कहा कि वह बदरपुर की जनता के साथ खड़े हैं। साथ ही चेतावनी दी कि वह चुनाव मैदान में उतरेंगे। राम सिंह नेताजी हाल ही में कॉन्ग्रेस छोड़ आप में शामिल हुए थे।

गौरतलब है कि एक समय में आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में अपनी जी जान लगाने वाले कुमार विश्वास अब पार्टी से आहत होकर पार्टी से अलग हो चुके हैं। वे एनडी शर्मा के ट्वीट को शेयर करके भी पार्टी पर तंज कस रहे हैं और दिलीप पांडे जैसे लोगों को टिकट देने पर उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। वे दिलीप पांडे को टिकट दिए जाने पर लिखते हैं, “जिन लोगों से हम 2013 में पिटे, हमने संघर्ष किया, 2020 में उन्हें ही बुलाकर टिकट दे दिया। “

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