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आजम खान के बेटे को SC का झटका, निर्वाचन रद्द करने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार

समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता व रामपुर सीट से सांसद आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम को विधायक पद से अयोग्य घोषित होने के फैसले से फिलहाल राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला आजम का निर्वाचन रद्द करने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी।

बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब्दुल्ला आजम के रामपुर स्वार टांडा विधानसभा से 2017 के निर्वाचन को बीते साल 16 दिसंबर को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए अब्दुल्ला आजम खान की विधायकी रद्द कर कर दी थी कि साल 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी उम्र चुनाव लड़ने के लिए कम थी और वो चुनाव लड़ने के योग्य नहीं थे। इसी को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने उनका निर्वाचन रद कर दिया था।

इसके बाद आजम खान के पुत्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। शुक्रवार (जनवरी 17, 2019) को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए अब्दुल्ला आजम के खिलाफ शिकायत करने वाले बसपा नेता नवाब काजिम अली को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।

दरअसल आजम खान बेटे ने अपना निर्वाचन रद्द होने को लेकर बसपा नेता नवाब काजिम अली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अब्दुल्ला आजम की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवाब काजिम अली को नोटिस दी है। इस पर अब 25 मार्च को सुनवाई होगी। नवाब काजिम अली, अब्दुल्ला के खिलाफ 2017 के चुनाव में स्वार विधानसभा क्षेत्र से बीएसपी के उम्मीदवार थे।

गौरतलब है कि 24 अप्रैल 2017 को हाईकोर्ट में दायर चुनाव याचिका में नवाब काजिम अली खान ने अब्दुल्ला आजम की सीबीएसई बोर्ड की हाईस्कूल की मार्कशीट पेश की थी, जिसमें अब्दुल्ला की जन्मतिथि 01.01.1993 है। इसके हिसाब में वह चुनाव नहीं लड़ सकते थे। हालाँकि, पूरे मामले को लेकर अब्दुल्ला आजम का कहना था कि प्राइमरी में दाखिले के वक्त टीचर ने अंदाज से जन्मतिथि दर्ज की थी। उनकी माँ तंजीन फातिमा ने भी कहा था कि अब्दुल्ला का जन्म 30 सितंबर 1990 को हुआ था। तंजीन फातिमा ने कोर्ट को बताया था कि अब्दुल्ला का जन्म लखनऊ में हुआ था।

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CAA-NRC समर्थन का अनूठा तरीका: UP में कपल ने शादी कार्ड तो पर्वतारोही ने सबसे ऊँची चोटी पर लहराया बैनर

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) व राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर लोग अलग-अलग तरीके से समर्थन जता रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चन्दौसी में एक कपल ने CAA व NRC के समर्थन का अनूठा तरीका निकाला है। कपल ने अपने विवाह के निमंत्रण पत्र में सीएए व एनआरसी के सर्मथन की घोषणा की है।

बता दें कि मोहित मिश्रा और सोनम पाठक 3 फरवरी 2020 को शादी के बँधन में बँधने वाले हैं। कपल ने विवाह आयोजन के लिए तैयार किए गए निमंत्रण कार्ड में वैवाहिक कार्यक्रमों के साथ यह भी विशेष तौर पर छपवाया है, “हम सीएए व एनआरसी का समर्थन करते हैं।” अब यह निमंत्रण कार्ड वितरित किए जा रहे हैं। कपल के परिवार का मानना है कि उन्हें अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार है। इसलिए उन्होंने अपने विचारों को अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए यह तरीका अपनाया है।

इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पदाधिकारी और पर्वतारोही विपिन चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून को अपना समर्थन देने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है। उन्होंने नागरिक संशोधन कानून के समर्थन में दक्षिण अमेरिका स्थित सबसे ऊँचे पर्वत एकोनकागुआ पर CAA समर्थन का बैनर फहराया है।

उन्होंने द प्रिंट को बताया कि वो 1 जनवरी को एकोनकागुआ की चोटी पर पहुँचे थे। वहाँ पर पहुँचने के बाद सबसे पहले उन्होंने तिरंगा लहराया और फिर उसके बाद उन्होंने एक बैनर लहराया। उस बैनर पर लिखा था, “मैं नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करता हूँ।” विपिन चौधरी ने आगे कहा, “मैं दुनिया को बताना चाहता हूँ कि भारतीय CAA को लेकर क्या महसूस करते हैं और मैं अपने देशवासियों से यह भी कहना चाहता हूँ कि हमें CAA का सपोर्ट करना चाहिए।” 

उन्होंने बताया कि जब उन्होंने 18 दिसंबर को अर्जेंटीना के एकोनकागुआ पर चढ़ाई शुरू की थी तो तब तक तब तक नागरिक संशोधन विधेयक पास हो चुका था और उसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो चुके थे। उन्होंने कहा कि वह अपने साथ कानून के समर्थन वाला बैनर लेकर गए थे। उन्होंने वहाँ पर नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन वाला बैनर लहराकर अपनी विचारधारा की प्रतिबद्धता को दोहराया।

मुंबई से नमाज पढ़ने निकला था ‘डॉ. बम’, कानपुर की मस्जिद से निकलते धराया

मुंबई से गुरुवार (जनवरी 16, 2020) को लापता हुआ आतंकी जलीस अंसारी शुक्रवार को कानपुर में पकड़ा गया। इसकी जानकारी उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने दी। उन्होंने कहा कि जलीस अंसारी को कानपुर की एक मस्जिद से बाहर निकलते वक्त गिरफ्तार किया गया। उसे लखनऊ लाया जा रहा है। उन्होंने इसे उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया। फिलहाल उससे पूछताछ जारी है।

अंसारी 90 के शुरूआती दशक से अब तक 50 से ज्यादा जगहों पर बम धमाका कर चुका है। फिलहाल वह 1993 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा था। उसे अजमेर जेल से 21 दिन के
परोल पर छोड़ा गया था। शुक्रवार (जनवरी 17, 2020) को यानी आज उसकी परोल अवधि खत्म हो रही थी और उसे अजमेर जेल पहुँचना था। पेरोल मिलने के बाद वह मुंबई स्थित अपने परिवार से मिलने आया हुआ था।

गुरुवार को उसके बेटे जैद ने पिता के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि जलीस अंसारी तड़के उठा और घरवालों से नमाज पढ़ने की बात कहकर निकला। लेकिन वापस नहीं लौटा।

गौरतलब है कि अंसारी अग्रीपाडा थाने के अंतर्गत मोमिनपुर का रहने वाला है। वह देश के विभिन्न हिस्सों में हुए कई धमाकों में भी सदिंग्ध है। उसे बम बनाने में महारत हासिल है। इसके कारण उसे डॉ. बम भी कहते हैं। वह सिमी और इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों से जुड़ा था और उन्हें बम बनाना सिखाता था। यही कारण है कि उसके गायब होने की जानकारी मिलते ही महाराष्ट्र एटीएस, मुंबई क्राइम ब्रांच समेत अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गई थी।

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कुछ तो परीक्षा, चुनाव में भी इंटरनेट पर लगा देते हैं पहरा, यहाँ तो प्राइम टाइम में प्रोपेगेंडा की आजादी

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार (17 जनवरी 2020) को वकील एहतेशाम हाशमी ने एक जनहित याचिका दायर की। इसके जरिए शीर्ष अदालत से इंटरनेट शटडाउन को असंवैधानिक और अवैध घोषित करने की अपील की गई है। यह तथ्य छिपा नहीं है कि जम्मू-कश्मीर हो या नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भड़की हिंसा के बाद देश के कुछ शहरों में इंटरनेट पर जो पाबंदी लगाई गई थी, वह आतंकी खतरों और सुरक्षा के मद्देनजर किया गया था। आशंका रहती है कि देश के दुश्मन और असमाजिक तत्व इंटरनेट का इस्तेमाल हिंसा को भड़काने के लिए कर सकते हैं।

बावजूद इसके भारत की कथित सेक्युलर मीडिया, वामपंथी-लिबरल गैंग इस मसले को प्रोपेगेंडा की चाशनी में इस कदर लपेट कर परोसता है कि जैसे अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा बिठा दिया गया हो। पिछले महीने इंटरनेट शटडाउन पर एक रिपोर्ट आने के बाद इसी तरह का माहौल बनाने की कोशिश की गई थी। हाल में जब सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी को लेकर टिप्पणी की तो ‘गिरोह’ ने उसे भी गलत तरीके से पेश किया।

अब एक वैश्विक रिपोर्ट आई है जो इस प्रोपेगेंडा को तार-तार कर देती है। जो बताती है कि इंटरनेट की आजादी के मामले में भारत काफी आगे है। न केवल पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी, बल्कि रूस जैसे विकसित राष्ट्रों से भी। भारत में इंटरनेट की आजादी सिंगापुर जैसे अत्याधुनिक मुल्क से लेकर उम्माह का दंभ भरने वाले इस्लामी मुल्कों से भी काफी बेहतर है।

टेक रिसर्च कंपनी कंपैरीटेक ने दुनिया के 181 देशों में इंटरनेट की आजादी को लेकर यह सर्वे किया है। इसमें बताया गया है कि कई अफ्रीकी मुल्कों में चुनाव के वक्त सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया जाता है। मसलन, मॉरीतानिया। इथोपिया और सोमालिया जैसे देश तो स्कूलों में परीक्षा के दौरान भी इंटरनेट पर पाबंदी लगा देते हैं।

इस रिपोर्ट में 10 कारकों के आधार पर देशों की रैंक तैयार की गई है,

  • टॉरेंट रिस्ट्रिक्टिड
  • टॉरेंट बैन
  • पॉर्नोग्राफी रिस्ट्रिक्टिड
  • पॉर्नोग्राफी बैन
  • पॉलिटिरल मीडिया रिस्ट्रिक्टिड
  • पॉलिटिकल मीडिया सेंसर
  • सोशल मीडिया रिस्ट्रिक्टिड
  • सोशल मीडिया बैन
  • वीपीएन रिस्ट्रिक्टिड
  • वीपीएन बैन

इंटरनेट सेंसरशिप 2020 की इस रिपोर्ट में स्कोर के जरिए विश्व के उन देशों के बारे में बात हुई, जो इंटरनेट सेंसरशिप के लिहाज से सबसे खराब पाए गए। जहाँ इंटरनेट इस्तेमाल करने पर इतनी पाबंदी है कि लोग सोशल मीडिया से न केवल दूर हैं, बल्कि ग्लोबल इंटरनेट का इस्तेमाल तक नहीं कर पाते। इनमें नॉर्थ कोरिया, चीन,
रूस, तुर्की, ईरान जैसे देशों का नाम सबसे ऊपर है। इन्हें ‘इंटरनेट सेंसरशिप के लिए सबसे खराब देश’ की सूची में 10/10, 9/10, 8/10 अंक प्राप्त हुए हैं। बता दें इन देशों को ये स्कोर उस देश की जनता द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे सोशल मीडिया, टॉरेंट या वीपीएन के इस्तेमाल और पॉर्न देखने पर आँका गया। पाकिस्तान को 10 में से सात नंबर मिले। पाकिस्तान के अलावा बेलारूस, तुर्की, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और इरिट्रिया को भी 10 में से सात नंबर मिले। सेंसरशिप स्केल में यह नंबर इंटरनेट फ्रीडम के मामले में काफी खराब स्थिति को इंगित करता है।

नॉर्थ कॉरिया में लोगों के लिए न केवल सोशल मीडिया इस्तेमाल करने, पॉर्न देखने और टॉरेंट इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, बल्कि वहाँ तो सूचना भी सिर्फ़ एक स्त्रोत के जरिए ही पहुँचती है। इसका नाम है- द कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी। इसके बाद इस सूची में चीन है। जिसे इस मामले में 9/10 स्कोर मिला है। यहाँ पश्चिमी सोशल मीडिया, पॉर्न और वीपीएन सब ब्लॉक है। पॉलिटिकल मीडिया पर तो भारी सेंसशिप है। जानकारी के मुताबिक चीन में अगर पत्रकारों को सरकार के ख़िलाफ़ कुछ भी करते हुए देख लिया जाता है तो उन्हें फौरन जेल की सजा सुना दी जाती है।

रूस, तुर्की और ईरान को 8 नंबर मिले हैं। इन देशों में भी पॉलिटिकल मीडिया पर भारी सेंसर लगा है। मगर, अगर इनके बारे में अलग-अलग बात करें तो इन तीनों देशों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर अपने कानून हैं। जैसे रूस में टॉरेंस साइट्स और वीपीएन ब्लॉक है। लेकिन यहाँ पूर्ण रूप से पॉर्न या सोशल मीडिया ब्लॉक नहीं है। रूस में पॉर्न देखना गैरकानूनी नहीं हैं। लेकिन ऐसा कुछ प्रोड्यूस करना जुर्म है। इसके अलावा रूस में प्रतिबंध होने के बावजूद कई सोशल मीडिया साइट्स का लोग इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन इन पर सरकार कड़ी निगरानी और नियंत्रण रखती है। इनके इस्तेमाल के लिए यूजर्स को अपना मोबाइल नंबर रजिस्टर करना पड़ता है। यहाँ बता दें, रूस अपना खुद का इंटरनेट बनाने पर विचार कर रहा है।

इसी तरह ईरान में वीपीएन ब्लॉक हैं। लेकिन यहाँ टॉरेंटिंग को पूर्ण रूप से बैन नहीं किया गया है। इसके अलावा ईरान में पॉर्नोग्राफी बैन है, लेकिन सोशल मीडिया का थोड़ा बहुत इस्तेमाल होता है। यहाँ न्यूज़ मीडिया सेंसरशिप के दायरे में आती है। ईरान के उलट तुर्कीस्तान में सोशल मीडिया ब्लॉक है, लेकिन प़ॉर्न पर, टॉरेंटिंग पर, वीपीएन के इस्तेमाल पर इतना प्रतिबंध नहीं हैं।

इसके बाद बेलारूस, तुर्की, ओमान, पाकिस्तान, यूनाइटिड अरब और इरीट्रिया को इस स्कोर बोर्ड में 7 अंक मिले हैं। क्योंकि इन सभी देशों में इंटरनेट सेंसरशिप के एक जैसे तरीके हैं। इन सभी देशों में पॉर्न बैन है। पॉलिटिकल मीडिया पर प्रतिबंध हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में टॉरेंटिंग बैन है और इरीट्रिया में सोशल मीडिया।

अब जाहिर है कि इस सूची आने के बाद ये तो साफ हुआ कि भारत इंटरनेट सेंसरशिप पर विश्व में सबसे आगे नहीं है। हाँ, ये बात जरूर है कि भारत में पड़ोसी मुल्क और विपक्षियों के भड़काने से परिस्थितियाँ ऐसी उत्पन्न होती है कि चाहते, न चाहते हुए सरकार को कई बार कई इलाकों में इंटरनेट ठप्प करना पड़ता है। वो भी सिर्फ़ इसलिए होता है, ताकि कानून-व्यवस्था के हालात ना बिगड़े। अफवाहों को रोका जा सके। इंटरनेट के जरिए फैलाई जाने वाली अराजकता को नियंत्रित किया जा सके। अभियव्यक्ति की आजादी और सूचना प्राप्त करने का अधिकार छीनने के लिहाज से इंटरनेट बंद नहीं किया जाता।

लेकिन फिर भी जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी को तूल दी गई। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले इस मामले को कोर्ट तक ले गए।बता दें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद राज्य में धारा 144 लागू करने के साथ ही इंटरनेट सेवाएँ बेमियादी तौर पर बंद कर दी गई थीं। साथ ही मोबाइल इंटरनेट, वायरलाइन या लैंडलाइन सर्विस के साथ ही वायर ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाएँ स्थगित की गई थीं। सिर्फ़ इसलिए ताकि वहाँ के लोग किसी बहकावे में न आए। पड़ोसी मुल्क और विपक्षियों के अराजक तत्वों के प्रोपेगेंडा में न फॅंसे।

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर प्राइम टाइम में प्रोपेगेंडा रचने वालों, हिंदू विरोधी घृणा से भरे लिबरल गैंग को आइना दिखाता है। बताता है कि अभिव्यक्ति की यह आजादी उन्हें उस पाकिस्तान में भी नहीं मिलती जो उनके हवाले से अक्सर भारत विरोधी दुष्प्रचारों को हवा देता रहता है।

परमादरणीय रवीश कुमार, भारत का दिल छोटा नहीं, आपकी नीयत में खोट है

बात रवीश कुमार के ‘सूत्रों’, ‘कई लोगों से मैंने बात की’, ‘मुझे कई मैसेज आते हैं’, वाली पत्रकारिता की

रवीश कुमार इतना ज्ञान क्यों बाँच रहे हैं? एंकर तो आप भी बना दिए गए हैं, मैनेज तो आप भी हो रहे हैं

छात्रों ने कुलपति राकेश भटनागर पर लगाए धाँधली के गंभीर आरोप: शहर में लगे ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी’ के पोस्टर

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में एक के बाद एक नए विवाद सामने आ रहे हैं। हाल ही में फिरोज खान की नियुक्ति का विवाद किसी तरह शांत ही हुआ था कि विश्वविद्यालय में एक दूसरे विवाद ने जन्म ले लिया है। BHU के छात्रों ने विश्वविद्यालय में चल रही नियुक्तियों में धाँधली और भेदभाव का आरोप कुलपति राकेश भटनागर और BHU प्रशासन पर लगाया है। इतना ही नहीं इस बार विवाद परिसर से निकलकर शहर भर में चर्चा का विषय है हालाँकि JNU, जामिया, AMU में उलझा देश अभी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहा है लेकिन छात्रों ने विश्वविद्यालय के वीसी पर गँभीर आरोप लगाते हुए उनके ख़िलाफ शहर भर में होर्डिंग्स और पोस्टर चस्पा कर दिए हैं। पोस्टर-होर्डिंग्स पर वीसी को हिंदी विरोधी बताते हुए लिखा है, ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी’ और उनसे इस्तीफे की माँग की है।

शहर भर के प्रमुख चौराहों पर होर्डिंग्स लगने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। इस बार विश्वविद्यालय के छात्रों ने वीसी राकेश भटनागर के ख़िलाफ मोर्चा खोलते हुए चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए हैं, जिसमें बड़े अक्षरों में लिखा है ‘BHU वीसी हिंदी विरोधी।’

छात्रों ने आरोप लगाया है कि वीसी हिन्दी भाषी छात्रों के साथ भेदभाव कर रहे हैं और हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, हमारे मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। यहाँ तक कि भर्ती प्रक्रिया में वह अपने JNU के छात्रों को वरीयता दे रहे हैं। बता दें कि BHU के कुलपति राकेश भटनागर JNU के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं उन पर BHU का कुलपति रहते हुए अधिकांश नियुक्तियों में JNU, वामपंथ और अँग्रेजी को वरीयता देने जैसे कई गंभीर आरोप छात्रों ने पहले भी लगाए हैं।

इतना ही नहीं शहर भर में दीवारों पर भी पोस्टर चस्पा किए गए हैं, जिनमें वीसी पर वही आरोप दोहराए गए हैं, जोकि होर्डिंग्स में आरोप लगाए गए हैं। साथ ही छात्रों ने वीसी से इस्तीफा देने की माँग की है। जानकारी के मुताबिक इस काम को विश्नविद्यालय के प्रदर्शनकारी छात्रों ने देर रात तक पूरा किया गया। सुबह जब राहगीरों ने देखा और पढ़ा तो सभी दंग रह गए और देखते ही देखते शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।

बीएचयू वीसी के ख़िलाफ़ वाराणसी की दीवारों पर लगाए गए पोस्टर (साभार- अमर उजाला)

दरअसल पिछले महीने इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए एक साक्षात्कार चल रहा था। आरोप है कि इस साक्षात्कार में वीसी ने धाराप्रवाह अँग्रेजी नहीं बोलने वाले केंडीटेड्स को बाहर कर दिया था, जिसके बाद से कई छात्र वीसी के ख़िलाफ विरोध करते हुए उनसे इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। साथ ही छात्रों ने माँग की है कि नियुक्ति प्रक्रिया की जाँच अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में कराई जानी चाहिए।

इतना ही नहीं शुक्रवार को आयोजित दो दिवसीय पुरातन छात्र सम्मेलन में भी छात्रों नें वीसी के ख़िलाफ लिखे पोस्टरों को हाथ में लेकर लहराना शुरू कर दिया। इस बीच समागम में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया, जिसे संभालने के लिए प्रॉक्टर टीम ने वीसी का विरोध कर रहे कई छात्रों को हिरासत में ले लिया। हिरासत में लेने के बाद इन छात्रों से क़रीब 4 घंटे तक प्रॉक्टर ऑफिस में बैठाए रखा गया और बाद में हिदायत देकर छोड़ दिया गया। BHU के छात्रों ने ही ऑपइंडिया को बताया कि इन दिनों विश्वविद्यालय में 200 शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया चल रही है।

‘पुरातन छात्र समागम’ में वीसी का विरोध करते छात्र (साभार- दैनिक जागरण)

वहीं विश्वविद्यालय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि हमें हाल ही में इंस्‍टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा मिला है। इसके तहत बीएचयू को वैश्विक रैंकिंग में लाना है, जिसके लिए ऐसी फैकल्‍टी की तलाश करनी हो जो ग्‍लोबल लैंग्‍वेज यानि कि अँग्रेजी की अच्‍छी समझ रखता हो।

गौरतलब है कि BHU में प्रोफेसर फिरोज़ ख़ान की संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में नियुक्ति किए जाने के बाद से कुलपति राकेश भटनागर पूरे देश में चर्चा में आए थे। उस समय भी फिरोज खान को SVDV में नियुक्त करने के लिए 10 में से 10 मार्क्स दिए गए थे तब छात्रों ने अन्य 8 को 0-2 मार्क्स दिए जाने पर आपत्ति जताई थी तब भी नियुक्ति में धाँधली के आरोप लगाए गए थे।

बिग BC का नया चुटकुला: ‘कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी ही नहीं, पूरी सरकार चिंतित है’

लोकसभा चुनावों में अपनी वामपंथी पलटन और मीडिया गिरोह के बलबूते बेगूसराय से ‘सांसद’ बनने के सपने देखने वाले कन्हैया कुमार को नतीजों वाले दिन जमीन पर मुँह के बल गिरना पड़ा था। 4 लाख वोटों से हारे थे ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सरगना। स्थिति ये थी कि चुनाव प्रचार तक में लोग उनका चेहरा नहीं देखना चाहते थे। वो तो स्वरा भास्कर जैसे मौक़ापरस्त कलाकारों का भला हो, जिन्होंने कैंपेनिंग में पहुँचकर लोगों को इकट्ठा कर लिया। वरना जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं को अपनी मम्मी कसम खाकर लोगों को यकीन दिलवाना पड़ रहा था कि कन्हैया कुमार वाकई अच्छा आदमी है।

खैर, ये सब पुरानी बातें हैं। लोकसभा चुनाव के बाद तो कन्हैया कुमार कई मसलों को लेकर चर्चा में आए। आजकल उन्हें सीएए/एनआरसी के प्रदर्शनों में देखा जाता है। उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि ट्विटर पर उन्हें हर बात पर दुत्कार मिलती है। लेकिन, इतने सबके बावजूद उनके गिरोह के लोगों की हिम्मत देखिए, वो आज भी कन्हैया कुमार के लिए जनसंपर्क का काम कर रहे हैं। इसी सूची में एक नाम बिग बीसी करने वाले बीबीसी का है। जो अपने प्रोपगेंडा के चलते न केवल कन्हैया कुमार की इमेज बिल्डिंग कर रहा हैं, बल्कि अपने पाठकों को ये सूचना दे रहा है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार, कन्हैया कुमार की बढ़ती लोकप्रियता से चिंता में है।

जी हाँ। रॉयटर्स का हवाला देकर बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि नरेंद्र मोदी के एक क़रीबी ने उन्हें खुद जानकारी दी है कि युवाओं और वोटरों के बीच कन्हैया कुमार की लोकप्रियता से मोदी सरकार चिंतित है।

अब ये खुद सोचिए, क्या सच में! गिरोह की लाख कोशिशों के बाद भी जिस प्रधानमंत्री को भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री होने का तमगा प्राप्त हो, उन्हें या उनकी सरकार को कन्हैया कुमार की लोकप्रियता चिंता में डालेगी। क्या सच में! जनता की भलाई में जुटी सरकार जेएनयू के कन्हैया कुमार की लोकप्रियता को लेकर शोक मनाएगी। क्या वाकई! जो व्यक्ति देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन चुके हों, जिनके नेतृत्व के गुणगान अमेरिका, रूस करे। जिनकी प्रतिबद्धता का लोहा उनके निर्णयों में दिखे, जिन्हें मुस्लिम देश अपने मुल्क में बुलाकर सम्मान दें। उन्हें या उनकी सरकार को कन्हैया कुमार के बढ़ते कद की फिक्र सताएगी? शायद नहीं और बिलकुल नहीं। इसलिए बिग बीसी को समझ जाना चाहिए कि हर कोई कन्हैया कुमार की तरह डॉक्टर की डिग्री हासिल करने के बाद प्रदर्शनों का ठेका नहीं उठाता, तो वो तो प्रधानमंत्री मोदी हैं। जिनके आत्मविश्वास ने उन्हें दोबारा देश का प्रधानसेवक बनाया।

लेकिन, इतने सबके बावजूद बिग बीसी की नीयत को देखकर लगता है कि वो मानकर चल रहे हैं कि उनके लेख छापने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में खलबली मच गई है। उनके सभी नेता अपनी कमियों पर सोच-विचार कर रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री करीब तीन दिनों से सो नहीं पाए हैं और अमित शाह को भाजपा के कोर ग्रुप की मीटिंग करते देखा गया है क्योंकि शाहीन बाग में कन्हैया के जाने के बाद अब सरकार गिरना तय है।

मगर रुकिए! जरा इसी रिपोर्ट पर उन ट्विटर यूजर्स का रिएक्शन देखिए। जिन सोशल मीडिया यूजर्स के लिए बीबीसी ने इतना प्रोपगेंडा तैयार किया, वो कैसे अपने विवेक से उसी को तार-तार कर रहे हैं।

बीबीसी के इस ट्वीट पर सोशल मीडिया यूजर्स न केवल कन्हैया कुमार की खिल्ली उड़ा रहे हैं, बल्कि बीबीसी की रिपोर्ट के लिए उसे हमेशा की तरह धिक्कार रहे हैं। उसे तलवे चाटने वाला चैनल बता रहे हैं। डूब मरने की बात कर रहे हैं। गद्दार कह रहे हैं। साथ ही ये भी कह रहे हैं कि चिरकुट चिलगोजे को बिहार ने उसकी औकात बता दी। अब बारी बीबीसी की है।

बता दें, सोशल मीडिया यूजर्स का पूछना है, “अभी चार महीने पहले कन्हैया कुमार की जमानत जब्त हुई है बेगूसराय में! कौन सी लोकप्रियता से मोदी चिंतित हैं जमानत जब्त वाली।”

गौरतलब है कि इसके अलावा बीबीसी को ऐसी आधारहीन खबरें चलाने पर लोकप्रियता का असली मतलब समझाया जा रहा है। और यूजर्स कन्हैया के लिए लिख रहे है, “कन्हैया कुमार सिर्फ मीडिया वालों के लिए लोकप्रिय है, आम जनता कन्हैया कुमार का नाम भी सुनना नही चाहती है, लोगों का खून खोल उठता है, लोग उसे देशद्रोही और गद्दार, टुकड़े टुकड़े गैंग का आदमी बुलाते हैं, और यह भी कहते हैं लोग जो देश का नहीं वह किसी का नहीं हो सकता है।”

एक अन्य यूजर बीबीसी और अन्य मीडिया गिरोह को लताड़ लगाते हुए कहता है, “कन्हैया कुमार जैसे देशद्रोही का महिमा मंडन सिर्फ़ BBC न्यूज़, NDTV और कुछ दलाल मीडिया वाले ही करते हैं।”

निर्भया गैंगरेप के दोषी की दया याचिका ख़ारिज: पीड़िता के पिता ने कहा- केजरीवाल ने सत्ता के लिए किया इस्तेमाल

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने निर्भया गैंगरेप के दोषी मुकेश सिंह की दया याचिका खारिज कर दी है। मुकेश ने जनवरी 14, 2020 को सुप्रीम कोर्ट से क्यूरेटिव पिटिशन खारिज होने के बाद राष्ट्रपति से दया की गुहार लगाई थी।

मुकेश सिंह उन 6 आरोपितों में शामिल था, जिन्होंने 2012 में निर्भया गैंगरेप को अंजाम दिया था। छह में से चार
आरोपितों को दिल्ली कोर्ट ने फाँसी की सजा दी थी, जबकि 1 आरोपित राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फाँसी लगा ली थी। वहीं, दूसरे नाबालिग आरोपित को सुधारगृह भेज दिया गया था, जो कि अब रिहा हो गया है।

दिल्ली की पटियालाा हाउस कोर्ट ने मुकेश समेत चार दोषियों को फाँसी देने के लिए 22 जनवरी का डेथ वॉरंट जारी किया था। हालाँकि, बृहस्पतिवार (जनवरी 16, 2020) को कोर्ट ने कहा कि मुकेश की दया याचिका राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास लंबित होने के कारण 22 जनवरी को फाँसी नहीं दी जा सकती है।

निर्भया के पिता ने केजरीवाल पर लगाया राजनीति करने का आरोप

रिपोर्ट्स के अनुसार, निर्भया के पिता का कहना है कि दिल्ली सरकार तब तक सोई रही, जब तक हम लोग आगे नहीं बढ़े। उन्होंने कहा कि आखिर दिल्ली सरकार ने जेल अथॉरिटी से पहले क्यों नहीं कहा था कि आप फाँसी के लिए नोटिस जारी करो। तब तक उन्होंने जेल प्रशासन से कुछ नहीं कहा। निर्भया के पिता ने कहा कि यदि इलेक्शन से पहले कोई फैसला नहीं आता है तो इसके जिम्मेदार अरविंद केजरीवाल होंगे। साथ ही उन्होंने अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाते हुए कहा कि केजरीवाल ने सत्ता में आने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल किया।

निर्भया की माँ ने कहा- दोषियों को फाँसी देने में हो रही है राजनीति

दूसरी ओर, निर्भया गैंग रेप मामले में आरोपितों की फाँसी में हो रही देरी पर पीड़िता की माँ आशा देवी ने बीजेपी और आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जो लोग 2012 में हाथ में तिरंगा लेकर इंसाफ के लिए सड़क पर उतरे थे आज वही लोग राजनीति के लिए निर्भया के दोषियों की फाँसी टाल रहे हैं। कोई कह रहा है कि दिल्ली सरकार फाँसी में देरी कर रही है तो दिल्ली सरकार कह रही है कि दिल्ली पुलिस हमें दे दो।

स्वास्तिक पर लिबरल गैंग कर रहे गुमराह, हिंदू घृणा से भरे Alt News का फर्जी फैक्ट चेक

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध-प्रदर्शन अब हिन्दू-विरोधी प्रदर्शनों में तब्दील होते जा रहे हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में विरोध-प्रदर्शन के दौरान एक पोस्टर भारी विवाद का कारण बन गया। इस पोस्टर में बुर्क़ा पहने और बिंदी लगाए हिन्दू महिलाओं को दिखाया गया। साथ ही पोस्टर के नीचे विघटित स्वरूप में हिन्दुओं का प्रतीक ‘स्वास्तिक’ भी था।

भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा समेत कई लोगों ने इस पोस्टर की व्यापक रूप से आलोचना की। इसके बाद ‘लिबरल गैंग’ ने दावा करना शुरू कर दिया कि पोस्टर में नाज़ी स्वास्तिक को दर्शाया गया है, न कि हिन्दू स्वास्तिक को।

स्व-घोषित फैक्ट-चेकिंग साइट Alt News ने इस मुद्दे पर एक ‘फ़ैक्ट चेक’ किया और दावा किया कि शाहीन बाग के विवादित पोस्टर में जो स्वास्तिक है, वो हिन्दू प्रतीक नहीं है। अपने दावे को सही ठहराने के लिए, फैक्ट चेक में कहा गया कि पोस्टर में प्रतीक यानी स्वास्तिक में चार बिंदु नहीं हैं, जो हिन्दू स्वास्तिक में मौजूद होते हैं।

उन्होंने यह भी दावा किया कि स्वास्तिक का प्रतीक झुका हुआ है, यह नाजी प्रतीक है न कि हिन्दू स्वास्तिक।

Alt News Swastika

Alt News के लेख का स्क्रीनशॉट

बता दें कि तथाकथित फैक्ट-चैक साइट द्वारा किया गया दावा पूरी तरह से झूठा और निराधार है। ज़ाहिर तौर पर इसका उद्देश्य CAA के विरोध-प्रदर्शनों में देखे गए पोस्टर की मंशा को छिपाना है। Alt News के दावों के विपरीत, चार बिंदु स्वास्तिक का अभिन्न हिस्सा नहीं है और यह अक्सर उनके बिना खींचा जाता है। लेकिन, कभी-कभी डॉट्स (बिंदु) लगाया जाता है।

स्वास्तिक को कई हिन्दू मंदिरों के डिजाइन का हिस्सा बनाया गया है और एक सरसरी नज़र से देखने पर पता चलेगा कि स्वास्तिक में हमेशा डॉट्स मौजूद नहीं रहते। उदाहरण के लिए, नीचे दी गई इमेज को देख सकते हैं जो दिल्ली के लक्ष्मीनारायण मंदिर की है, इसे बिड़ला मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। इसमें ओम प्रतीक और दो स्वास्तिकों को उकेरा गया है, लेकिन स्वास्तिकों में कोई डॉट यानी बिन्दु नहीं है।

swastika on Birla temple
बिडला मंदिर, दिल्ली

इसी तरह, सिंधु घाटी सभ्यता से हड़प्पा में पाए गए स्वास्तिक मुहरों में भी कोई बिंदु नहीं होता था। सच्चाई यह है कि पुराने और नए हिन्दू मंदिरों पर अंकित बिंदु के बिना स्वास्तिक प्रतीक को खोजना कोई बड़ी बात नहीं है। इसके प्रमाण सरलता से मिल जाएँगे। लेकिन, Alt News ने इसके लिए थोड़ा-सी भी ज़ेहमत उठाना गवारा नहीं समझा। इसलिए, स्वास्तिक में चार बिंदु होने का Alt News का दावा झूठा है।


Indus Valley Swastika Seals

इसी तरह, स्वास्तिक के प्रतीक को अधिकतर स्थानों पर बिना बिंदुओं के सीधे चित्रित किया गया है। वहीं, कुछ हिन्दू स्थानों में 45 डिग्री झुके हुए प्रतीकों को देखना भी कोई बड़ी बात नहीं है। एक शिव मंदिर की निम्नलिखित इमेज में तीन स्वास्तिक हैं, वो भी बिना बिंदुओं के और इनमें से एक झुका हुआ भी है।

Shiv Mandir swastika
swastika

Another temple with tilted swastika

इन सबके मद्देनज़र यह बात ध्यान रखने वाली है कि स्वास्तिक प्रतीक का कोई एक सटीक आकार या रूप नहीं है। यह कई सभ्यताओं से जुड़ा एक बहुत प्राचीन प्रतीक है। इसलिए, इसका रूप हमेशा एकसमान नहीं होता। इसके अलावा, जैसे हिन्दू धर्म किसी एक पुस्तक, एक ईश्वर का धर्म नहीं है, यह भी एक प्रतीक का धर्म नहीं है। परिणामस्वरूप, स्वास्तिक को हिन्दू संस्कृति में अलग-अलग रूप से दर्शाया जा सकता है, जिसमें बिना बिंदुओं वाला स्वास्तिक और झुका हुआ स्वास्तिक भी शामिल है।

लेकिन, अगर किसी वजह से किसी स्वास्तिक में बिंदु न हों तो इसका मतलब ये कतई नहीं है कि वो हिन्दुओं का प्रतीक चिन्ह नहीं है। यह एक बड़ी विडंबना है कि जो लोग हिन्दुओं के लिए अपने मन में घृणा रखते हैं वो बताते हैं कि कौन-सा प्रतीक हिन्दुओं का है और कौन-सा नहीं।

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पुलिस पर पत्थरबाजी के लिए बच्चों को उकसाया, SIT ने 33 पर दर्ज किया मामला

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हुई हिंसा की जाँच कर रही विशेष जाँच दल (SIT) ने 33 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। आरोप है कि इन्होंने बच्चों को पुलिसकर्मियों पर पथराव करने के लिए उकसाया था। बता दें कि इन सभी 33 आरोपितों पर पहले भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे और उन्हें जेल भेजा गया था।

जानकारी के मुताबिक इन आरोपितों ने एंटी-सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में बच्चों को पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंकने के लिए उकसाया था। जाँच एजेंसी ने आरोपितों पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की धाराएँ लगाईं हैं। 

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रविकांत यादव की अदालत ने एसआईटी को 33 आरोपितों के खिलाफ अतिरिक्त आरोप लगाने की अनुमति दी। वहीं मुजफ्फरनगर में 20 दिसंबर 2019 को भड़की हिंसा के कुछ आरोपितों के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे वकील वकार अहमद ने कहा, “एसआईटी ने हिंसा के 33 आरोपितों के खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 के एक अतिरिक्त सेक्शन जोड़ा है।”

उल्लेखनीय है कि झड़प के दौरान कई बच्चों को पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंकते और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाते हुए देखा गया था। इस दौरान कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। पुलिस के अनुसार, इस तरह की हिंसक गतिविधि को लेकर नगर कोतवाली और सिविल लाइंस पुलिस स्टेशनों में 47 मामले दर्ज किए गए। जिसमें 250 से अधिक लोगों के नाम थे। बता दें कि पुलिस ने मामले में अब तक 80 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है।

एक अन्य वरिष्ठ वकील चंद्रवीर सिंह ने कहा कि आरोपितों पर जुवेनाइल एक्ट, 2015 की धाराओं को लागू किया गया, क्योंकि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में इस तरह के अपराधों के लिए मामला दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है।

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केरल के गवर्नर को राजदीप सरदेसाई ने बताया ‘भाजपा एजेंट’, अपने ही टीवी शो में हो गए ज़लील

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) पारित होने के बाद से ही विवाद का मुद्दा रहा। इसके ख़िलाफ़ देशभर में जगह-जगह हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए। इस मुद्दे पर ‘लिबरल गैंग’ भी छटपटा रहा है, जो अपनी भड़ास किसी न किसी रूप में निकालता रहता है। इसी कड़ी में, फर्ज़ी ख़बरों के प्रचारक राजदीप सरदेसाई ने गुरुवार (16 जनवरी) को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को CAA के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए अपने शो में आमंत्रित किया। इस दौरान उन्होंने केरल के राज्यपाल को ‘भाजपा का एजेंट’ और ‘रबर स्टाम्प’ तक कह डाला। जवाब में आरिफ मोहम्मद ने भी उनकी जमकर क्लास ली।

दरअसल, नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करने के केंद्र के फ़ैसले को लेकर कम्युनिस्ट शासित राज्य केरल में सरकार और राज्यपाल के बीच विवाद चल रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच CAA के ख़िलाफ़ केरल सरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई। राज्यपाल ख़ान ने केरल सरकार को इस बात के लिए फ़टकार लगाई थी कि CAA को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले उनकी सलाह क्यों नहीं ली गई।

राजदीप सरदेसाई ने केरल विवाद पर अपने शो का प्रीमियर करते हुए, आरिफ मोहम्मद खान को ‘रबर स्टाम्प’ कहकर उनका अपमान किया। शो के दौरान सरदेसाई ने दावा किया कि राज्य सरकार द्वारा CAA के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले उन्हें (खान) दरकिनार कर दिया गया था, इसलिए वो राज्य सरकार से नाराज़ थे।

राज्यपाल ने राजदीप सरदेसाई के दावे पर पलटवार करते हुए सम्मानपूर्वक कहा कि वो किसी से नाराज़ नहीं थे। उन्होंने कहा कि वह संवैधानिक रूप से राज्य के प्रमुख हैं और राज्य सरकार को सलाह देना उनका अधिकार है। आरिफ मोहम्मद खान ने सवालिया लहजे में पूछा, “अगर राज्य सरकार मुझे बताए बिना सुप्रीम कोर्ट में चली जाती है, तो मैं अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग कैसे करूँ?”

इसके अलावा, राज्यपाल खान ने देश की संसद द्वारा पारित क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित करने के लिए भी केरल सरकार को फटकार लगाई। उन्होंने कहा कि यह मसला राज्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। खान ने कहा, “कानून का विरोध करने के लिए राज्य सरकार ने जो समय और धन खर्च किया उसका उपयोग प्रदेश के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए न कि अपनी राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए।”

राजदीप सरदेसाई ने चिड़चिड़ाते हुए पूछा कि क्या आरिफ मोहम्मद खान केरल सरकार के ख़िलाफ़ जाकर अपने अधिकार का प्रयोग कर रहे थे? खान ने इसके जवाब में कहा कि महत्वपूर्ण मुद्दे पर राज्य सरकार को सलाह देना उनका संवैधानिक अधिकार है और राज्य सरकार राज्यपाल से कोई जानकारी छिपा नहीं सकती।

शो के दैरान राजदीप सरदेसाई ने राज्यपाल खान को ‘रबर स्टाम्प’ कहकर उनका अपमान करना जारी रखा, इस पर खान ने गहरी आपत्ति जताई। सरदेसाई ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को ‘भाजपा एजेंट’ बताया और CAA के मुद्दे पर एक अलग रुख़ अपनाने के लिए उन पर हमला किया।

राजदीप सरदेसाई की असम्मानजनक टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि पत्रकार के तौर पर उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अभद्र है। भाजपा का एजेंट कहे जाने पर खान ने कहा कि उनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति ने की थी न कि भाजपा ने।

सवाल पूछने की आड़ में, सरदेसाई ने केरल के राज्यपाल का न सिर्फ़ अपमान किया बल्कि लाइव शो में उन्हें भाजपा का एजेंट कहकर उनके प्रति अपनी व्यक्तिगत घृणा भी व्यक्त की। इस लाइव शो के विषय को हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा बनाकर देश की जनता के बीच धार्मिक विभाजन पैदा करने की कोशिश करने पर मोहम्मद आरिफ खान ने राजदीप सरदेसाई की क्लास भी लगाई।

बता दें कि आरिफ मोहम्मद खान और CAA के लिए उनके समर्थन को बदनाम करने वाले सरदेसाई ने CAA के ख़िलाफ़ हो रहे जानलेवा विरोध-प्रदर्शनों को ’शांतिपूर्ण’ बताकर फ़र्ज़ी दावे किए थे। जबकि सच्चाई यह है कि CAA के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे मुस्लिम, संसद द्वारा कानून पारित किए जाने के बाद से ही उग्र हो गए थे। मुस्लिम मॉब ने शहरों को जला दिया और बड़े पैमाने पर हिंसा की।अप्रत्याशित रूप से, राजदीप सरदेसाई ने मुस्लिम भीड़ के कृत्यों को शांतिपूर्ण रवैया बताकर उनके अपराधों पर पर्दा डालने की कोशिश की।

केरल विधानसभा में पास हुआ ‘CAA विरोध प्रस्ताव’ गैरकानूनी और असंवैधानिक: आरिफ मोहम्मद खान

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