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19 जिलों के 40000 हिंदू शरणार्थियों की लिस्ट केंद्र को भेज CAA लागू करने वाला पहला राज्य बना UP

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश के कई हिस्सों में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन के बाद अब इस कानून को क्रियान्वित करने का काम शुरू हो गया है। इसी कड़ी में यूपी सरकार ने राज्य के 19 जिलों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आकर रहने वाले हिंदू शरणार्थियों की सूची केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी है। और इसी के साथ यह नागरिकता संशोधन कानून के कार्यान्वयन की प्रक्रिया शुरू करने वाला पहला राज्य बन गया है।

राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए इस रिपोर्ट का नाम दिया गया है- “उत्तर प्रदेश में आए पाकिस्तान, अफगानिस्तान एवं बांग्लादेश के शरणार्थियों की आपबीती कहानी”। इस रिपोर्ट में शर्णार्थियों की निजी कहानियाँ और निजी अनुभव भी समाहित है।

गौरतलब है कि गृह विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को पिछले हफ्ते निर्देश दिए थे कि वह उन शरणार्थियों को चिन्हित करें, जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर यहाँ दशकों से रह रहे हैं। और साथ ही इसकी लिस्ट भी सरकार को सौंपने के लिए कहा था। दरअसल यह सूची इसलिए बनाई जा रही है, ताकि केंद्रीय गृह विभाग को वह भेजकर कानून के दायरे में आने वालों को विधिक रूप से देश की नागरिकता दिलाई जा सके। इस नए कानून पर काम करने वाला उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य होगा।

बताया जा रहा है कि कानून के तहत जिन प्रवासियों को नागरिकता नहीं दी जा सकती है, उन्हें भी चिन्हित कर सूचीबद्ध किया जाएगा। उनकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी। वहीं आँकड़ों के इकट्ठा करने पर यह सामने आया कि यूपी में लगभग 40,000 गैर-मुस्लिम अप्रवासी रहते हैं। जिनमें से ज्यादातर आगरा, रायबरेली, सहारनपुर, गोरखपुर, अलीगढ़, रामपुर, मुजफ्फरनगर, हापुड़, मथुरा, कानपुर, प्रतापगढ़, वाराणसी, अमेठी, झांसी, बहराइच, लखीमपुर खीरी, लखनऊ, मेरठ और पीलीभीत में रहते हैं।

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न पढ़ेंगे, न पढ़ने देंगे! ‘फीस वृद्धि की वापसी तक नहीं होने देंगे रजिस्ट्रेशन’ – JNUSU ने फिर शुरू किया बहिष्कार

जेएनयू में 5 जनवरी को छात्रों के साथ हुई बर्बरता के बाद JNUSU अध्यक्ष आइशी घोष लगातार मीडिया सुर्खियों में हैं। शुक्रवार को उन्होंने इसी संबंध में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और एचआरडी अधिकारी से मुलाकात भी। इस दौरान उन्होंने वीसी पर कई आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने की माँग की थी। जबकि अधिकारी ने उनसे आंदोलन वापस लेने की अपील की थी। जिसके बाद, छात्रसंघ ने शनिवार को छात्रों से कहा था कि वो रजिस्ट्रेशन फीस भर दें। लेकिन छात्रावास की बढ़ी हुई फीस न भरें। ऐसे में जब छात्रों से प्रशासन ने पहले बकाया फीस को भरने को अनिवार्य बताया, तो छात्रसंघ फिर से वीसी पर हमलावर हो गया और तरह-तरह के आरोप लगाने लगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूनियन ने बताया कि उन्होंने शनिवार को विश्वविद्यालय के छात्रों से छात्रावास की बढ़ी फीस को छोड़कर पंजीकरण प्रक्रिया पूरा करने को कहा था। लेकिन, वीसी ने छात्रों के पंजीकरण को रोकने के लिए पहले फी पेमेंट पोर्टल को ब्लॉक किया और फिर ट्यूशन फीस की पेमेंट को रोका। साथ ही छात्रों को निर्देश दिए गए कि उन्हें पंजीकरण से पहले अपने फीस भरनी होगी।

इतना ही नहीं, छात्रसंघ ने कुलपति पर निशाना साधते हुए उनके आरोपों को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि वीसी द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लगाए गए सभी आरोप झूठे हैं। जिनमें वो बता रहे हैं कि कुछ छात्र पंजीकरण करवाना चाहते हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी उन्हें ऐसा नहीं करने नहीं दे रहे। संघ के अनुसार वीसी ने फर्जी जाँच करके 300 छात्रों के रजिस्ट्रेशन कैंसिल किए।

गौरतलब है कि शनिवार को इतना सब होने के बाद रविवार को छात्रसंघ का फिर बयान आया कि यदि प्रशासन शुल्क वृद्धि को निरस्त नहीं करता, तो अगले सेमेस्टर के लिए पंजीकरण का बहिष्कार जारी रहेगा।

हालाँकि, यूनिवर्सिटी के बिगड़े माहौल के बाद प्रशासन ने रजिस्ट्रेशन की आखिरी तारीख को 15 जनवरी तक बढ़ा दिया है और बताया है कि अब तक 4,300 छात्र पंजीकरण करवा चुके हैं। लेकिन JNUSU का कहना है कि जब तक फीस वृद्धि को रद्द नहीं किया जाता और कुलपति जगदीश कुमार को उनके पद से नहीं हटाया जाता, तब तक किसी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है।

बता दें, JNUSU का आरोप है कि रविवार को जब छात्र पंजीकरण प्रक्रिया पूरा करने गए, तो उन्हें कहा गया कि उन्हें पहले बढ़ी फीस जमा करानी होगी। जबकि कुछ अन्य को तो इस पंजीकरण प्रक्रिया से निष्काषित कर दिया गया। इस सूची में एक नाम जेएनएसयू के उपाध्यक्ष साकेत मून का भी बताया जा रहा है। जिनका रजिस्ट्रेशन, प्रोटेस्ट में शामिल होने का कारण खारिज किया गया।

मून ने वीसी पर हमला बोलते हुए कहा, “रजिस्ट्रेशन से पहले मुझसे सभी बकाया भरने की बात की जा रही है। जिससे साफ पता चलता है कि मुझे अकादमिक रूप से निष्काषित कर दिया गया है। हालाँकि, मुझे अब तक कोई नोटिस नहीं आया है। जिसका मतलब है कि वीसी पर खुले तौर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्णय की मुखालफत कर रहे हैं।”

बता दें छात्र संघ के साथ बैठक में मंत्रालय ने कहा था कि प्रशासन प्रदर्शन में शामिल हुए छात्रों के प्रति नरम रवैया रखेगा और उन्हें सजा नहीं देगा। इसके अलावा इस बैठक में एचआरडी के सचिव से मिलने के बाद जेएनयूएसयू आइशी घोष ने वीसी को तुरंत पद से हटाए जाने की माँग की थी। साथ ही कहा था, “वो विश्वविद्यालय को चलाने के लायक नहीं है। हमें ऐसा वीसी चाहिए जो नई शुरुआत कर सके और कैंपस में सामान्य माहौल बना पाए।”

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी ने छात्रों के रवैये पर स्पष्ट किया है कि फीस वृद्धि के साथ ही छात्रों को पंजीकरण करवाना होगा और जिन 300 छात्रों ने उपद्रव में भाग लिया, उन्हें पंजीकरण प्रक्रिया से निष्काषित किया जाएगा।

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बिखर गया कॉन्ग्रेस का कुनबा: ममता, मायावती, AAP, शिवसेना सबने किया इनकार – सोनिया अब ‘सुप्रीम’ नहीं!

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शन के बीच मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्ष पूरी तरह तैयार दिख रही थी… लेकिन सिर्फ दिख ही रही थी। उस दिख रही विपक्षी एकता को अब एक और झटका लग गया है, ममता बनर्जी तो खैर पहले दे ही चुकी हैं। अब आज बैठक से पहले ही विपक्ष में बिखराव देखने को मिल रहा है। दरअसल 13 जनवरी को दिल्ली में होने वाली विपक्ष की बैठक में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के बाद अब मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी (BSP), अरविंद केजरीवाल की आम आमदी पार्टी (AAP) और शिवसेना ने भी शामिल होने से इनकार कर दिया है।

बता दें कि यह बैठक कॉन्ग्रेस ने बुलाई है और इस बैठक की अध्यक्षता कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी करने वाली हैं। विपक्षी दलों की यह बैठक आज दोपहर दो बजे होगी, जिसमें नागरिकता कानून और देश के राजनीतिक हालात पर चर्चा होगी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बैठक में जाने से इनकार करते हुए ट्वीटर इस फैसले के पीछे की वजह भी बताई है। मायावती ने सोमवार (जनवरी 13, 2019) को एक के बाद एक ट्वीट किए। 

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “जैसा कि विदित है कि राजस्थान कॉन्ग्रेसी सरकार को बीएसपी का बाहर से समर्थन दिए जाने पर भी, इन्होंने दूसरी बार वहाँ बीएसपी के विधायकों को तोड़कर उन्हें अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है जो यह पूर्णतयाः विश्वासघाती है। ऐसे में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में आज विपक्ष की बुलाई गई बैठक में बीएसपी का शामिल होना, यह राजस्थान में पार्टी के लोगों का मनोबल गिराने वाला होगा। इसलिए बीएसपी इनकी इस बैठक में शामिल नहीं होगी।”

वहीं, दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी ने भी विपक्षी दलों की बैठक में शामिल होने से इनकार कर दिया है। AAP के सांसद संजय सिंह ने कॉन्ग्रेस द्वारा बुलाई गई आज की विपक्षी बैठक में शामिल नहीं होने पर कहा, “ऐसी किसी भी बैठक के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसलिए, ऐसी किसी बैठक में शामिल होने का कोई मतलब नहीं है जिसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है।”

इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पर बंगाल में डर्टी पॉलिटिक्स खेलने का आरोप लगाया था और कहा था, “मैंने सोनिया गाँधी द्वारा 13 जनवरी को नई दिल्ली में बुलाई गई बैठक का बहिष्कार करने का फैसला किया है क्योंकि मैं पश्चिम बंगाल में वामपंथी और कॉन्ग्रेस की हिंसा का समर्थन नहीं करती।” बनर्जी का कहना था कि वाम मोर्चा और कॉन्ग्रेस के दोहरे रवैये को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही उन्होंने अब नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़ने की बात कही थी।

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मस्जिद के अंदर नमाज़ अदा करते समय BJP नेता पर बेरहमी से हमला, चरमपंथी SDPI गुंडों की हरकत

केरल में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमले कम होने का नाम नहीं ले रहे। अब राज्य भाजपा के सचिव एके नजीर की बेरहमी से पिटाई की गई। नजीर पर तब क्रूरतापूर्वक हमला किया गया, जब वह इडुक्की जिले के थूकुप्पलम क्षेत्र की एक मस्जिद में नमाज़ अदा कर रहे थे। हमले में वह बुरी तरह घायल हो गए। जिसके बाद उन्हें पास के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ अभी उनका इलाज चल रहा है।

जानकारी के मुताबिक एके नजीर पर चरमपंथी इस्लामी संगठन सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (SDPI) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के कार्यकर्ताओं के एक समूह ने हमला किया था। बताया जा रहा है कि नजीर को थुकुप्पलम की जुमा मस्जिद के अंदर गए हुए एक मिनट भी नहीं हुआ था कि उनकी पिटाई शुरू कर दी गई। नजीर इससे पहले भारतीय जनता पार्टी की ‘जन जागृति’ रैली में शामिल हुए थे, जिसका मकसद लोगों को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के बारे में जानकारी देना था और इसको लेकर देश भर के कई हिस्सों में इस तरह की रैली निकाली गई। रैली खत्म होने के बाद नजीर मस्जिद में आए थे।

हमले के दौरान चरमपंथी संगठन के कार्यकर्ताओं ने बीजेपी नेता नजीर को पीछे से लात मारी और फिर 15 मिनट तक उन पर फर्नीचर से हमला किया, जिसके बाद मस्जिद के इमाम ने हस्तक्षेप किया और उन्हें बचाया। एक पार्टी कार्यकर्ता ने दावा किया कि हमलावर एसडीपीआई कार्यकर्ताओं ने कहा कि जो लोग नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन करते हैं, उन्हें जिंदा नहीं बख्शा जाएगा। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन फिलहाल हमलावरों की पहचान नहीं की जा सकी है।

बता दें कि SDPI एक चरमपंथी इस्लामी राजनीतिक संगठन है, जो केरल और भारत के अन्य कई हिस्सों में कई सांप्रदायिक हमलों के पीछे है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो कि SDPI का जन्मदाता है, वो देश के कई हिस्सों में हुए CAA विरोधी हिंसक प्रदर्शन के पीछे था।

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‘गाय को छूने से दूर होती है नकारात्मकता’ – गौभक्त बनीं जेब भरने वाली कॉन्ग्रेसी मंत्री, लोगों ने कहा – भाजपाई

बीते दिनों ‘जेबें भरने’ की बात कर चर्चा में आने वाली महाराष्ट्र सरकार की मंत्री यशोमति ठाकुर एक बार फिर अपने हालिया बयान के कारण खबरों में हैं। इस बार यशोमति ठाकुर ने गाय को लेकर अपना बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि गायों को छूने से इंसान के भीतर से नकारात्मकता दूर होती है। डर यह है कि खबर से ज्यादा कहीं उनकी खबर लेने को कॉन्ग्रेस आलाकमान कोई फरमान न जारी कर दे!

उद्धव सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री ने रविवार (जनवरी 12, 2019) को राज्य में निकाय चुनाव प्रचार के दौरान अमरावती में वोटरों के बीच सभा को संबोधित करते हुए गाय पर अपना बयान दिया। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी संस्कृति में ऐसा कहा जाता है कि किसी गाय को छूने से हमारी नकारात्मकता दूर हो जाती है।

पीटीआई से बात करते हुए महराष्ट्र सरकार में मंत्री ने रविवार को कहा, “गाय एक पवित्र जीव है। इसके अतिरिक्त, चाहे वो गाय हो या कोई अन्य जानवर, उनको छूने से हमें एक प्रेम भरी अनुभूति होती ही है। इसमें मैंने गलत क्या कहा?”

गौरतलब है कि यशोमति के इस भाषण के बाद उनके शब्दों के लिए उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया जा रहा है। उनके भाषण की एक क्लिप सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है। साथ ही लोग इस पर काफी चर्चा कर रहे हैं और यशोमति को भाजपाई करार दे रहे हैं।

बता दें कि अभी हाल ही में यशोमति के अन्य भाषण का एक और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था। जिसके बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें जमकर ट्रोल किया था। इस दौरान वीडियो में यशोमति मंत्री बनने के बाद जेब गर्म करने की बातें करती नजर आईं थी। उन्होंने कहा था कि हम अभी-अभी मंत्रीपद की शपथ लेकर आए हैं और हमारी जेबें अभी गर्म नहीं हुई हैं।

महाराष्ट्र की एक सभा के दौरान यशोमति ठाकुर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, “आप सभी को पता है कि पहले हर तरह के खेल खेले जा चुके हैं। पहले हमारी सरकार नहीं थी और अब जब हमनें शपथ ले ली है, लेकिन अब तक अपनी जेब नहीं भरी है।”

इस दौरान उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए भी बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था, “जो लोग विपक्ष में हैं उनकी जेबें काफी गहरी हैं। अगर वे आपके पास आएँ और अपनी जेब का कुछ हिस्सा दें तो उसे मना मत कीजिए। घर आई लक्ष्मी को कौन मना करता है, लेकिन वोट सिर्फ कॉन्ग्रेस को ही दीजिए।”

मैं मंत्री बन गई हूँ, लेकिन अभी हमें अपनी जेबें भरनी बाकी है: महाराष्ट्र सरकार में कॉन्ग्रेसी मंत्री

‘बाप की संपत्ति नहीं है कि आग लगा दोगे, हम तुम्हें लाठियों से मारेंगे, गोली मारेंगे और जेल में डाल देंगे’

पश्चिम बंगाल के बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने रविवार (जनवरी 12, 2019) को विवादित बयान देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले लोगों को उत्तर प्रदेश की तरह गोली मार दी जाएगी। उन्होंने कहा कि जो लोग भी सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाएँगे, उन पर गोलियों और लाठियों से हमला किया जाएगा और फिर जेल में बंद कर दिया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार ने इन प्रदर्शनकारियों की पिटाई करके बिलकुल सही काम किया है।

पश्चिम बंगाल के नादिया जिले में एक जनसभा को संबोधित करते हुए दिलीप घोष ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर राज्य में CAA को लेकर विरोध के दौरान रेलवे संपत्ति और सार्वजनिक परिवहनों को नष्ट करने वालों पर लाठीचार्ज नहीं करने पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि क्या ये आग लगाने वालों के बाप की संपत्ति है। ये करतादातों के पैसों से बनी सरकारी संपत्ति को कैसे नष्ट कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश, असम और कर्नाटक की सरकारों ने ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्वों पर गोली चलाकर बिलकुल ठीक काम किया।

बंगाल भाजपा अध्यक्ष ने कहा, “दीदी (ममता बनर्जी) की पुलिस ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि वह उनके वोटर्स हैं। यूपी, असम और कर्नाटक की हमारी सरकारों ने ऐसे लोगों को कुत्तों की तरह गोलियाँ मारी है।” वहीं घुसपैठियों को लेकर उन्होंने कहा, “तुम यहाँ आते हो, हमारा खाना खाते हो, यहाँ रहते हो और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हो। क्या यह तुम्हारी जमींदारी है? हम तुम्हें लाठियों से मारेंगे, गोली मारेंगे और तुम्हें जेल में डाल देंगे।”

उन्होंने बंगाली हिंदुओं के हितों से खिलवाड़ करने वाले, उनको नुकसान पहुँचाने वालों की पहचान करने का आह्वान किया। भाजपा नेता ने दावा किया कि भारत में दो करोड़ मुस्लिम घुसपैठिए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अकेले पश्चिम बंगाल में एक करोड़ घुसपैठिए हैं और ममता बनर्जी उन्हें बचाने की कोशिश कर रही हैं।

बता दें कि पिछले दिनों देश के दूसरों हिस्सों के साथ-साथ बंगाल में भी नागरिकता संशोधन कानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप (NRC) के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हुए थे। इस दौरान बंगाल में कई ट्रेनों में आग लगा दी गई थी। इसके अलावा कई अन्य जगहों पर भी तोड़-फोड़ और आगजनी की गई थी। 

भारत बंद के दौरान बंगाल में रेल पटरी को उड़ाने की साजिश, बसों पर पथराव: देखें Video

CAA विरोध के नाम पर अब बंगाल को जलाएगा PFI, ममता के सांसद अबू ताहिर भी होंगे साथ!

बंगाल में लगातार तीसरे दिन हिंसा: अकरा रेलवे स्टेशन पर दंगाइयों का उत्पात, टॉयलेट में छिप कर्मचारियों ने बचाई जान

प्रोपेगेंडा का Outlook: जब मोदी घृणा से कीबोर्ड तड़-तड़ाए तो पन्ने फड़-फड़ फड़फड़ाए

प्रोपेगेंडा। यानी, दुष्प्रचार। एक ही झूठ सौ बार बोलो। हजार बार बोलो। पहले से ज्यादा जोर से बोलो। लगातार बोलो। इतना चिल्लाओ की अंत में वह सच लगने लगे। यह वामपंथियों का पुराना और आजमाया हुआ हथियार है। लेकिन, आपने कभी सोचा है कि ये प्रोपेगेंडा होता कैसा है? देखने में कैसा लगता है? इसे पढ़कर और सुनकर कैसा महसूस होता है?

वक्त है प्रोपेगेंडा के ‘आउटलुक’ से साक्षात्कार का है। वो भी मोदी घृणा के चाशनी में डूबा हुआ। उत्तेजना ऐसी कि आप गहरी नींद से जाग उठें, दरवाजे पर खड़े क्रांति कुमार का इस्तकबाल करने के लिए। नशा ऐसा घुमड़-घुमड़ घुमड़े कि आप निगमबोध घाट तक दौड़ आएँ यह सोच कर कि धू-धू कर जलते राष्ट्रवाद, दक्षिणपंथ, मोदी, भाजपा, हिंदुत्व सब एक साथ दिख जाएँगे।

एक पत्रिका है आउटलुक। अंग्रेजी में साप्ताहिक तो हिंदी में पाक्षिक। हिंदी आउटलुक का टैग लाइन है ‘सच को समर्पित’। इसी ‘सच’ के दर्शन कराती है, आउटलुक हिंदी की ताजा कवर स्टोरी। कवर स्टोरी रिपोर्ताज कम, कहानी ज्यादा लगती है। प्रोपेगेंडा के परफेक्ट स्क्रिप्ट के माफिक। शब्दों के चुनाव पर करीने से ध्यान दिया गया है ताकि आप सुध-बुध खोकर राजपथ पर क्रांति को उतरते देखने के लिए पहुँच जाएँ।

कवर स्टोरी जेएनयू की हालिया हिंसा और सीएए तथा एनआरसी के विरोध पर आधारित है। आमुख कथा की हेडिंग है- युवा बोले हम देखेंगे। कहानी की शुरुआत इन शब्दों से होती है- नाराज नारों से सारा आकाश तड़-तड़ाने लगे, तो धरती भी धड़-धड़ धड़कने लगती है। देश का कोई भी कोना इन आवाजों से दूर शायद ही ढूँढ़ा जा सके- दिल्ली, मुंबई, बेगलूरू, चेन्नै, चंडीगढ़, अमृतसर, जयपुर, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, कोलकाता, गुवाहाटी… उँगलियों पर गिनती थम सकती है मगर इस फेहरिस्त का सिलसिला नहीं टूटता, न ही विश्वविद्यालयों और आला शिक्षा संस्‍थानों की सूची रुकती है।

कीबोर्ड के तड़-तड़ाने से निकले शब्दों की बाजीगरी का नशा काफूर हो गया हो तो जरा गिनिए देश में कितने यूनिवर्सिटी हैं। नहीं गिन पा रहे तो केंद्रीय गृह​ मंत्री अमित शाह के हालिया बयान को स्मरण कर लीजिए। इसमें उन्होंने बताया है कि देश में 224 यूनिवर्सिटी हैं। इनमें से 3-4 यूनिवर्सिटी में सीएए को लेकर विरोध देखा गया है। ये कौन से यूनिवर्सिटी हैं? इनकी व्याख्या आउटलुक अपनी कहानी में कुछ यूँ करता है- यह कोई कोरी कल्पना भी नहीं, बल्कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिंसक घटनाक्रम तो जैसे इसकी गवाही दे रहे हैं। कवर स्टोरी की आमुख और अन्य कहानियों में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया गया है कि देश के अन्य यूनिवर्सिटी क्यों इससे दूर हैं? यह भी नहीं बताया गया है कि इसी दिल्ली में दिल्ली यूनिवर्सिटी, इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी और आंबेडकर यूनिवर्सिटी भी हैं, जहाँ कोई शोर-शराबा नहीं है। लेकिन, आउटलुक जैसे वामपंथी विषबेल जिनका खालिस एजेंडा प्रोपेगेंडा रचना ही है, वे शायद ही इनकी गिनती यूनिवर्सिटी में करते हों। इनके लिए सेंट स्टीफंस के 50 छात्रों का विरोध ही दिल्ली यूनिवर्सिटी है, क्योंकि ये इनके एजेंडा को सूट करता है। इन्हें सीएए के समर्थन में देश के अलग-अलग शहरों में रोज निकल रही विशाल रैलियाँ नहीं दिखतीं।

अपने प्रोपेगेंडा का तानाबाना बुनने के लिए आउटलुक आगे लिखता है- ऐसे नजारे देश ही नहीं, कई ताकतवर देशों में भी इतिहास बना चुके हैं। सत्तर के दशक के कई महादेशों में फैले छात्र आंदोलनों को ही नहीं, अपने देश में गुजरात के नव-निर्माण आंदोलन की रोशनी में शुरू हुए बिहार छात्र आंदोलन और फिर जेपी आंदोलन की यादें बरबस ताजा हो उठती हैं। फर्क सिर्फ यह है कि उस वक्त चिंगारी फीस और मेस शुल्क में हुई वृद्धि से भड़की थी। इस समय इसके अलावा ‘भारत के बुनियादी विचार’ और संविधान बचाने की टेक भी इससे जुड़ गई है। जाहिर है, इसकी भी वजहें बेबुनियाद नहीं हैं।

यकीनन, ऐसा लिखने की वजह बेबुनियाद नहीं है। विरोध के नाम पर जिस तरह हिंसा के लिए, पुलिस को निशाना बनाने के लिए कॉन्ग्रेस और वामपंथियों ने समुदाय विशेष को उकसाया, उसी तरह ये मीडिया संस्थान शब्दों से उन्हें उकसाने का काम कर रहे। उनके मन में डर को गहरा करने के संविधान और बुनियादी विचार जैसे शब्द पहले शब्दकोष से तराश निकाला गया और फिर कहानी में ठूँसा गया। साथ ही यह सुखद एहसास भी कराया गया है कि तुम लगे रहो इस बार तो मोदी का बोरिया-बिस्तर बँधना ही है।

कवर स्टोरी में आगे लिखा गया है- इसमें नया तत्व तो सिर्फ नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मुद्दों ने जोड़ा है। शिक्षा संस्‍थानों में तो मौजूदा सरकार के पिछले कार्यकाल से ही शोले भड़कने शुरू हो गए थे। जेएनयू में मौजूदा दौर में ही नकाबपोश नहीं उतरे, 2016 में भी नकाबपोशों की वजह से “टुकड़े-टुकड़े गैंग” और “राष्ट्रविरोध” का विमर्श खड़ा हो गया था, मगर नकाबपोशों को आज तक दिल्ली पुलिस नहीं ढूँढ़ पाई।

लेकिन, बड़ी चालाकी से यह बात छिपा ली गई है कि 2016 के जेएनयू के जिस घटनाक्रम का जिक्र किया गया है उसकी फाइल पर दिल्ली की आप सरकार कुंडली जमाए बैठी है। वह कन्हैया कुमार और उसके साथियों के खिलाफ अभियोग चलाने की इजाजत दिल्ली पुलिस को नहीं दे रही है। आगे रोहित वेमुला की खुदकुशी, IIT, IIM के छिटपुट प्रदर्शनों, आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी का हवाला देकर यह बताया गया है कि गुस्सा लंबे समय से घुमड़ रहा था। इसकी आड़ में हिंसक घटनाक्रमों को जायज ठहराने की कोशिश भी की गई है।

अब कवर स्टोरी की अन्य कहानियों की हेडलाइन पर गौर करिए;

इन कहानियों को जब आप पढ़ेंगे तो आउटलुक का एकपक्षीय नजरिया समझते देर नहीं लगेगी। कहानियों को कुछ यूँ पिरोया गया है कि आप मान लें कि जेएनयू हिंसा के लिए एबीवीपी कसूरवार है। उन वायरल वीडियो का जिक्र विस्तार से नहीं किया गया है, जिसमें वामपंथी खेमे के छात्र पत्थरबाजी करते और छात्र संघ की अध्यक्ष उनको रास्ता दिखाते नजर आती है। सहूलियत से यह कहकर उन वीडियो से कन्नी काट ली गई है कि आउटलुक इनकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता। पत्रकारीय संतुलन बनाने के लिए एबीवीपी के एक नेता का दो लाइन का कोट भी डाला गया है। यह भी दावा किया गया है- यह भी अपशकुनी संयोग जैसा है कि महज 20 दिनों के भीतर ही देश के तीन विश्वविद्यालयों में हिंसा का जैसा तांडव हुआ है, उसकी कोई मिसाल इसके पहले बमुश्किल ही ढूँढ़े मिलेगी। शायद, इस कहानी को गढ़ने वाले रिपोर्टर ने अपने प्रतिद्वंद्वी संस्थान इंडिया टुडे की वो रिपोर्ट नहीं पढ़ी होगी, जो आउटलुक के पैदा होने से बरसों पहले लिखी गई थी।

करीब 40 साल पुरानी इंडिया टुडे की उस रिपोर्ट में बताया गया है कि अपनी स्थापना के कुछ सालों के भीतर ही जेएनयू अकादमिक कुचक्र, वैचारिक कलह और छात्रों की अराजकता का गढ़ बन गया था। इसके लिए वामपंथी बुद्धिजीवियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। यह रिपोर्ट इंदिरा गाँधी द्वारा जेएनयू में 46 दिनों तक की गई तालाबंदी के बाद की गई थी।

आउटलुक का प्रोपेगेंडा उसके संपादक के कॉलम ‘आजकल’ में और गाढ़ा हो जाता है। अवाक, स्तब्ध, क्षुब्ध!! संपादक कहते हैं कि जेएनयू के वीसी पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं। उनका यह भी दावा है- जेएनयू में हिंसा का स्वतःस्फूर्त विरोध भी पूरे देश में जारी है। इसमें छात्र ही नहीं, कलाकार और प्रबुद्ध नागरिक भी शामिल हैं। राजनैतिक दल अपनी प्रतिक्रिया अपने तरीके से दे रहे हैं।

संपादक भी सीएए समर्थक बहुसंख्यकों का जिक्र करना जरूरी नहीं समझते। उन कलाकार और प्रबुद्ध नागरिकों का कोई उल्लेख नहीं करते जो प्रोपेगेंडा के खिलाफ खड़े हैं। लेख में यह तो कहा गया है कि राजनैतिक दल अपने तरीके से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, पर यह नहीं बताया गया है कि दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में हिंसा में विपक्षी दल के नेता, वामपंथी और एक समुदाय विशेष के लोग नामजद तक हुए हैं।

वैसे, मोदी और बीजेपी से आउटलुक की घृणा नई नहीं है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में बीजेपी विधायकों की क्रॉस वोटिंग को वह कमलनाथ का मास्टरस्ट्रोक बताती है। लेकिन, गोवा में जब कॉन्ग्रेस विधायक पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो वह लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देने लगती है। इसे जनता के साथ धोखा बताती है, यह कहते हुए कि ये लोग चुनाव कॉन्ग्रेस के निशान और एजेंडे पर जीते थे। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस पर लहोलोहाट होने वाला यह मीडिया संस्थान अयोध्या पर शीर्ष अदालत के फैसले को हैरान करने वाला बताता है।

मोदी से इस संस्थान की घृणा का अंदाजा आम चुनावों से पहले इसकी कवर स्टोरीज को देखकर भी लगाया जा सकता है। मोदी के अंध विरोध में यह संस्थान प्रोपेगेंडा रचने के लिए जमीनी हकीकतों और जनता की आवाज को अनसुना कर देता है। नतीजतन, पाठकों का सच से कोई सारोकार नहीं रह पाता। आम चुनावों के नतीजों से ऐन पहले भी यह संस्थान क्षेत्रीय क्षत्रपों के भरोसे राहुल गाँधी पर दाँव लगा रहा होता है। उससे पहले आउटलुक हिंदी के 22 अप्रैल 2019 संस्करण के कवर पेज की हेडिंग है- नई सियासत सूत्र और सूरमा। कवर पर जिन नेताओं की तस्वीर है, उसमें जयंत चौधरी भी हैं। कुछ जिलों की एक पुश्तैनी पार्टी जो हर दिन सिकुड़ती जा रही है, के नेता में किंगमेकर की छवि देखने की दो ही वजहें हो सकती है। पहला- उस नेता के साथ उस संस्थान या उसके नुमाइंदे की निजी हितें जुड़ी हों। दूसरा- संस्थान प्रोपेगेंडा का ऐसा बादल घुमड़-घुमड़ घुमड़ाना चाहता हो, जिससे पाठक को भी सावन के अंधे की तरह सब कुछ हरा-हरा ही दिखे। फिर एक दिन इसी बहकावे में आकर कोई सुलेमान कट्टा लेकर प्रदर्शन करने निकलेगा और किसी कॉन्सटेबल मोहित के पेट में गोली मार देगा।

आउटलुक जैसे संस्थान सुलेमान की कतार खड़ी करना चाहते हैं। क्यूँकि इससे उनके राष्ट्रवाद और हिंदुत्व विरोधी प्रोपेगेंडा को टिम-टिम टिमाने के लिए ईंधन मिलता है। लेकिन, इस प्रोपेगेंडा के असर क्या होंगे, यह गर्भ में नहीं है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक लोग इनके प्रोपेगेंडा का गुर्दा छील रहे हैं। छीलते रहेंगे। छीलने की रफ्तार जब चरम पर पहुँचेगी तो धुक-धुक धुका रहे इन संस्थानों की फड़-फड़ फड़ाहट खुद-ब-खुद दफन हो जाएगी। हम यह देखेंगे। मैथिली में कहें तो;

हमहूँ देखबै!
देखबे करबै!

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ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग पर अधूरा रह गया चीन का ख्वाब, ‘एक देश दो व्यवस्था’ खारिज

पिछले दिनों हॉन्ग कॉन्ग और अब ताइवान में हुए चुनाव में लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों ने अभूतपूर्व जीत हासिल कर चीन को तगड़ा झटका दिया है। ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग की जनता ने लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों को जबरदस्त वोटों से विजयी दिलाकर साबित कर दिया कि वो लोकतंत्र के समर्थक हैं। ताइवान के मतदाताओं ने स्वशासित द्वीप ताइवान को अलग-थलग करने के चीन के अभियान को सिरे से नकारते हुए अपनी प्रथम महिला नेता और राष्ट्रपति साई इंग वेन को दूसरी बार चुनाव में विजयी बनाया है। ये नतीजे चीन समर्थक शासन के लिए काफी चुभने वाले साबित हुए हैं। हॉन्ग कॉन्ग के चुनाव नतीजों को कमतर बताने और उस पर अविश्वास जताने को लेकर चीन की सरकारी मीडिया ने कई खबरें भी प्रकाशित कीं।

वहीं ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने रिकॉर्ड स्तर पर 80 लाख मतों के साथ विपक्षी कुओमिनटांग पार्टी के खान ग्वो यी को करारी शिकस्त देते हुए एक बार फिर से चीन को आगाह किया कि वह ताइवान द्वीप को बल के प्रयोग से हड़पने का ख्याल त्याग दे। उन्होंने कहा कि यह दुनिया जानती है कि ताइवान के लोगों को स्वतंत्र लोकतांत्रिक मूल्य और जीवन जीने की कला से कितना प्रेम है। साई इंग वेन को दूसरी बार शानदार तरीके से विजयी बनाकर यहाँ के मतदाताओं ने चीनी दखल, उसके अधिनायकवादी दृष्टिकोण और विस्तृत चाइना की अवधारणा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

इसी तरह नवंबर में हॉन्ग कॉन्ग में जिला परिषद चुनाव में लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों ने शानदार प्रदर्शन किया था। इन उम्मीदवारों ने विरोधियों पर अभूतपूर्व बढ़त बना कर साफ कर दिया था कि देश की जनता लोकतंत्र समर्थकों के साथ है। हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र समर्थकों ने कुल 452 सीटों में से 278 सीटें पर विजय हासिल करके नया इतिहास रच दिया। इनकी तुलना में चीन समर्थक उम्मीदवार केवल 42 सीटों पर ही जीत हासिल कर सके थे। ताइवान में साई इंग वेन की जीत पर हॉन्ग कॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जोशुआ वोंग ने भी खुशी जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर ताइवान की जीत पर खुशी जाहिर करते हुए इसे ‘हॉन्ग कॉन्गवासियों के लिए अनमोल पल’ बताया।

बता दें कि ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग दो ऐसे देश हैं, जिस पर चीन अपना कब्जा जताना चाहता है। चीन सन 1949 के गृह युद्ध के बाद से ही ताइवान पर अपना अधिकार जताता आ रहा है। साई ने आशा जताई कि बीजिंग अब यह समझ गया होगा कि प्रजातांत्रिक ताइवान को किसी डंडे के जोर पर कब्जाया नहीं जा सकता है। एक ओर जहाँ ताइवान खुद को स्वतंत्र और संप्रभु मानता है, वहीं चीन का मानना है कि ताइवान को किसी भी तरह चीन में शामिल होना चाहिए। चीन इसके लिए बल प्रयोग करने के लिए भी तैयार है।

चीन यह दावा करता आ रहा है कि वह बल प्रयोग से ताइवान को पुनर्गठित करने में सक्षम है। लेकिन अब उसे ये ख्याल छोड़ देना चाहिए। ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग पर कब्जा करके चीन एक ग्रेटर चीन का सपना देख रहा था। मगर दोनों देशों की जनता ने लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों को जीत दिलाकर चीन के अरमानों पर पानी फेर दिया है। यहाँ के मतदाताओं ने हॉन्ग कॉन्ग की तरह ही चीन के ‘एक देश दो सिस्टम’ की राजनीतिक व्यवस्था को खारिज कर दिया है।

ताइवान की अपनी चुनी हुई सरकार, संविधान और सेना है। इसके बावजूद चीन आज भी ताइवान को एक सार्वभौमिक सरकार के रूप में मान्यता देने से कतराता आया है, बल्कि ताइवान को मान्यता दिए जाने पर उस से संबंध तोड़ने की चेतावनी देता आ रहा है। चीन किसी भी उस देश के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखता जो ताइवान को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देता है। हालाँकि कई देशों के साथ ताइवान के व्यापारिक संबंध भी हैं।

असल में ताइवान के बदले सुरों में चीन को खुली बगावत की बू करीब दो महीने पहले आई। जब नवंबर में गोल्डन हॉर्स फिल्म समारोह में सम्मानित फिल्म निर्देशक फू यू ए ने अपने भाषण में ताइवान को स्वतंत्र देश माना। इससे वहाँ उपस्थित चीन समर्थकों ने हंगामा किया। तब राष्ट्रपति इंग विन ने हस्तक्षेप किया और साफ-साफ कहा कि ताइवान चीन का हिस्सा नहीं है। इसके बाद चीन के कान खड़े हो गए। तब से दोनों चीन देशों के बीच तनाव है।

हॉन्ग कॉन्ग में भी चीन विरोधी उम्मीदवारों की हार ने चीन के होश उड़ा दिए। मतदान के दिन लोगों की लंबी लंबी कतारों से ही पता चल गया था कि हॉन्ग कॉन्ग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर काफी उत्साह है। दरअसल यह चुनाव इस बात की जाँच के लिए भी था कि आम लोग यहाँ चल रहे चीन विरोधी आंदोलन को कितना समर्थन देते हैं। अब इन परिणामों से इस आंदोलन पर भी मुहर लग गई है।

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अजमल ने आशीष बन कर 23 साल की चाची का किया रेप, 17 वर्षीय भतीजी को बनाया गर्भवती, गिरफ़्तार

मुंबई में 26 वर्षीय व्यक्ति को एक नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। आरोप है कि अजमल लश्कर ने 17 साल की किशोरी का बलात्कार किया, जिसके बाद वो गर्भवती हो गई। वह मूल रूप से असम का है लेकिन फिलहाल मुंबई में रह रहा था। अजमल को रविवार (जनवरी 12, 2020) को मुंबई पुलिस ने गिरफ़्तार किया। अजमल ने नाबालिग की 23 वर्षीय चाची के साथ भी बलात्कार किया था। उसने धोखे से एक सेक्स टेप रिकॉर्ड कर लिया था और उसे वायरल करने की धमकी दे रहा था।

आरोपित अजमल ने चाची-भतीजी से जान-पहचान करने के लिए छद्म हिन्दू नाम का सहारा लिया। उसने उन दोनों को अपना नाम आशीष दुबे बताया। आरोपित से दोनों की मुलाक़ात एक पार्टी के दौरान हुई थी। उसने शादी का झाँसा देकर महिला के साथ बलात्कार किया और उसे फ़िल्मा लिया। बांगुर पुलिस स्टेशन में आरोपित से पूछताछ की गई।

अजमल को पश्चिमी मुंबई स्थित खार से गिरफ़्तार किया गया। उसके ऊपर बलात्कार और पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। अजमल नाबालिग को धमकी दे रहा था कि वो उसकी चाची के साथ शूट किए गए अंतरंग वीडियो को वायरल कर देगा।

नाबालिग के माता-पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस आगे की कार्रवाई कर रही है। पॉस्को एक्ट के तहत आरोपित को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई जा सकती है।

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एक्स-NDTV वाली को अब शंख से है समस्या! लगता है कुएँ में हिन्दूघृणा वाली भाँग मिला दी गई है

देश के मीडिया गिरोह के हालात यह हैं कि अगर वर्तमान सरकार के अंदर यह घोषणा हो जाए कि जहर पीना मना है तो ये ख़ुशी-ख़ुशी जहर पीने के फायदे गिनना शुरू कर देंगे। ऐसा ही एक उदाहरण दिल्ली एयरपोर्ट पर शंख की आकृति लगाए जाने के बाद देखने को मिल रही है।

हिन्दू धर्म के पवित्र शंख की एक बड़ी आकृति दिल्ली एयरपोर्ट पर लगाए जाने के बाद कई लोगों ने इसके साथ तस्वीरें सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर पोस्ट कीं।

यह देखने के बाद एक्स NDTV पत्रकार और वर्तमान में हिन्दुस्तान टाइम्स में कार्यरत हिन्दूफोबिया से ग्रसित सुनेत्रा चौधरी अपने जहर को छोड़ने से खुद को नहीं रोक पाई और सस्ती लोकप्रियता के लिए इस प्रतिमा को कारपेट से भी गंदा बता दिया।

ये वहीं सुनेत्रा चौधरी हैं, जो हूमाँयु के मकबरे के साथ अपने बेटे की तस्वीर डालते हुए इसे दिल्ली शहर की कुछ चुनिंदा खूबसूरत चीजों में से एक बता चुकी हैं।

यह शंख IGI एयरपोर्ट दिल्ली में विगत अक्टूबर में लगाया गया था। जो अपने अक्ष पर खूबसूरती से लगातार घूमता रहता है।

सुनेत्रा चौधरी द्वारा शंख की तुलना कारपेट से करने से नाराज ट्विटर यूज़र्स ने तुरंत जवाब भी दिए-

लाज़िम है वो NDTV नहीं देखेंगे: चैनल ने लेफ्ट को बताया JNU फसाद की जड़, वामपंथियों ने कहा- धोखा

NDTV के पत्रकार को ननकाना साहिब पर कट्टरपंथियों के हमले से दिक्कत नहीं, CAA समर्थकों को मुद्दा मिलने की चिंता