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बिहार सिपाही परीक्षा की 10 तस्वीरें… कुछ भी ठीके नहीं है नीतीश कुमार, चरमरा गया है बिहार!

बिहार में आज (12 जनवरी) को राज्य पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा थी। बड़ी संख्या में अभ्यार्थी परीक्षा देने के लिए अपने परीक्षा केंद्र पहुँचे। लेकिन, हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर इन अभ्यर्थियों ने अच्छा-खासा हंगामा खड़ा कर दिया। हंगामा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रेन में बड़ी संख्या में आम-यात्री और अभ्यर्थी शामिल थे।

हाज़ीपुर में अभ्यर्थियों का बवाल (तस्वीर साभार: ANI)

दुखद है कि प्रशासन और रेलवे की तरफ से इस स्थिति से निपटने के लिए कोई पुख़्ता इंतज़ाम नहीं किया गया और ना ही कोई विशेष ट्रेन चलाई। ऐसा न होने से यात्रियों और अभ्यर्थियों को आवाजाही में काफ़ी दिक्कतें हुईं।

हाज़ीपुर में अभ्यर्थियों का बवाल (तस्वीर साभार: ANI)
हाज़ीपुर में अभ्यर्थियों का बवाल (तस्वीर साभार: ANI)

इसके अलावा, हाजीपुर स्टेशन से गुजर रही राजधानी एक्सप्रेस पर भी अभ्यर्थियों का ग़ुस्सा फूटा। इस दौरान उन्होंने ट्रेन पर जमकर पत्थरबाज़ी की। इससे ट्रेन के शीशे टूट गए और उसमें सवार यात्रियों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।

राजधानी एक्सप्रेस पर अभ्यर्थियों ने की पत्थरबाज़ी

ट्रेन में ज़बरदस्ती घुसने की ज़िद करते हुए अभ्यर्थियों ने बाघ एक्सप्रेस को हाज़ीपुर के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर रोक दिया और ट्रेन में घुसकर तोड़फोड़ की।

अभ्यर्थियों ने बाघ एक्सप्रेस को हाज़ीपुर के प्लेटफॉर्म नंबर चार पर रोक दिया (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)

उत्तर बिहार के विभिन्न ज़िलों में सिपाही भर्ती परीक्षा में भाग लेने जा रहे अभ्यर्थियों ने शनिवार की देर शाम स्थानीय रामाशीष चौक पर जमकर उत्पात मचाया। चौक पर लगे पुलिस के बैरिकेडिंग को तोड़ दिया तथा उसे चौक पर रख कर एनएच को जाम कर दिया। अभ्यर्थियों के उत्पात की सूचना मिलते ही सदर थाना की पुलिस मौके पर पहुँच गई तथा सभी को समझा कर शांत कराया।

अभ्यर्थियों ने शनिवार की देर शाम स्थानीय रामाशीष चौक पर जमकर उत्पात मचाया (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)

परीक्षा को लेकर अभ्यर्थियों में काफ़ी तनाव था और अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए वो ट्रेन में कहीं भी बैठने को तैयार थे, फिर चाहे अंजाम कितना ही बुरा क्यों न हो। बिहार के बेगुसराय की यह तस्वीर नीतीश सरकार से कई सवाल पूछती है।

बेगुसराय में अभ्यर्थी ट्रेन में इस तरह सफर करने को भी तैयार थे (तस्वीर साभार: Dailybihar.com)

दरअसल, कई जगहों से पहुँचे अभ्यर्थियों का कहना था कि सभी अभ्यर्थी परीक्षा देने के लिए अपने-अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे, लेकिन भारी भीड़ को देखकर न तो बस वाला बस रोक रहा था और न ही कोई अन्य वाहन। इस वजह से सभी अभ्यर्थियों को अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए भारी परेशानी उठानी पड़ रही थी। 

मुज्जफरपुर जंक्शन (साभार: दैनिक भास्कर)

बिहार पुलिस की लिखित परीक्षा को लेकर जहानाबाद के साथ ही पटना-गया रेलखंड के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की भीड़ रही।

पटना-गया रेलखंड के विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर भी अभ्यर्थियों और यात्रियों की भीड़ रही (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)

बिक्रमगंज स्टेशन पर शनिवार (11 जनवरी) को ट्रेन में बिहार पुलिस की परीक्षा देने जा रहे अभ्यर्थियों की हालत देख स्थानीय रेलवे स्टेशन पर लोग दाँतों तले ऊँगली दबा ली। बिक्रमगंज को पटना राजधानी से जोड़ने वाली भभुआ-पटना इंटरसिटी ट्रेन शनिवार को जैसे ही स्टेशन पर पहुँची, पहले से ही यात्रियों से खचाखच भरी आ रही इस गाड़ी में चढ़ने के लिए आपाधापी मच गई।

बिक्रमगंज स्टेशन पर यात्रियों से खचाखच भरी आ रही ट्रेन में चढ़ने के लिए आपाधापी मच गई (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)

अपने गंतव्य तक समय पर न पहुँच पाने के डर से सभी अभ्यर्थियों को ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने आने-जाने वाले वाहनों को ज़बरदस्ती रोककर उसमें बैठना शुरू कर दिया। बिहार के अभ्यर्थियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रशासन को इन अभ्यर्थियों की कोई चिंता-फ़िकर ही नहीं है। उनके आने-जाने की न तो कोई व्यवस्था की गई और न ही उन्हें शांत करने का कोई उपाय ही किया गया।

ईरान ने ‘ग़लती’ से अपने ही 82 लोगों को मार डाला, निराश जनरल ने कहा- मुझे भी मर जाना चाहिए

ईरान की एक ग़लती से यूक्रेन इंटरनेशल एयरलाइंस में सवार 176 लोग पलक झपकते ही काल के गाल में समा गए। इस घटना ने उन सभी देशों के नागरिकों को हिला कर रख दिया, जिन देशों के नागरिक इस विमान में सवार थे। घटना की जिम्मेदारी लेने के बाद उसे एक मानवीय भूल बताने वाले ईरान के ही जनरल ने घटना पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि “मुझे भी मर जाना चाहिए।”

अमेरिका द्वारा ईरानी कमांडर सुलेमानी को मौत के घाट उतारने के बाद ईरान के नागरिकों में अमेरिका और ट्रंप के प्रति भारी गुस्सा था। लोग सड़कों पर उतरकर ईरान के राष्ट्रपति से अमेरिका को सबक सिखाने की माँग कर रहे थे। इस पर ईरान के राष्ट्रपति ने अपने नागरिकों को भरोसा दिलाया था कि वह इसका बदला ज़रूर लेगा और उसने अमेरिकी बेस कैम्पों को निशाना बनाते हुए मिसाइल दागे।

लेकिन, इस दौरान एक ग़लती से यूक्रेन का विमान हादसे का शिकार हो गया। जो लोग ईरान में अमेरिका के ख़िलाफ सड़कों पर उतरकर कार्रवाई की माँग कर रहे थे, वही ईरान के नागरिक विमान हादसे के बाद अपने ही राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर गए। वो सुप्रीम लीडर खामनेई से इस्तीफे की माँग करने लगे। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि ईरान के प्रदर्शनकारियों पर वहाँ की सरकार कोई अत्याचार न करे।

दरअसल यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस का एक विमान अचानक से क्रैश हो गया, जिसमें एक-दो नहीं बल्कि 176 लोग पलभर में मौत के मुँह में चले गए। इस घटना पर हर किसी ने दुःख जताया और घटना में पीड़ित देशों ने मामले की जाँच करने की भी माँग की थी। घटना के समय से ही सवालों के घेरे में खड़ा ईरान इस बात से साफ़ इनकार करता रहा कि इस घटना में उसका हाथ है। लेकिन, कुछ ही समय में हकीक़त सभी के सामने आ गई। इसके बाद ख़ुद ईरान के राष्ट्रपति रुहानी ने स्वीकार कर लिया कि एक मानवीय भूल से मिसाइल ग़लत दिशा में चली गई, जिससे विमान हादसे का शिकार हो गया।

इसके बाद ईरान के रेवॉल्यूशनरी गार्ड के कमांडर जनरल आमिर अली हाजीजादेह ने भी हमले की जिम्मेदारी लेते हुए घटना पर गहरा दुःख प्रकट किया। उन्होंने कहा-“ख़बर सुनकर मुझे लगा कि मुझे भी मर जाना चाहिएयह बात उन्होंने ईरान के स्टेट टीवी को दिए एक बयान में कही। हालाँकि, ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई ने मामले में जाँच के आदेश दिए हैं।

वहीं यूक्रेन के प्रधानमंत्री वोलोडाईमिर जेलेंस्की ने ईरान से हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को सज़ा देने की माँग की है। यूक्रेन ने कहा कि इसमें मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा भी दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने ईरान सरकार से आधिकारिक तौर पर भी मांफ़ी माँगने को भी कहा है।

दरअसल, 8 जनवरी को यूक्रेन की राजधानी कीव जा रहे विमान में 176 लोग सवार थे, जो कि ईरान द्वारा दागी गई एक मिसाइल का शिकार हो गया था। ईरान द्वारा गिराए गए इस विमान में सबसे ज्यादा ईरान के ही नागरिक मौजूद थे। इस हादसे में ईरान के 82, कनाडा के 63, यूक्रेन के 11, स्वीडन के 10, अफगानिस्तान के 4 जबकि जर्मनी और ब्रिटेन के 3-3 यात्री मारे गए थे।

JNU छात्रसंघ उपाध्यक्ष के साथ कानाफूसी कर के क्या सेटिंग कर रही है इंडिया टुडे की पत्रकार, वीडियो वायरल

JNU हिंसा और इंडिया टुडे समूह का रिश्ता गहराता ही जा रहा है। एक ओर जहाँ दिल्ली पुलिस इस हिंसा के मामले में लेफ्टिस्ट गुंडों की पहचान भी जारी कर चुकी है वहीं दूसरी ओर इंडिया टुडे और आज तक लगातार ऐसी ‘मनोहर कहानियाँ’ सामने लेकर आ रहे हैं जिन्हें देखकर हर कोई संदेह में आ जाएगा। हालाँकि फैक्ट चेक के बाद इंडिया टुडे की ये सभी कहानियाँ बचकाना और बेबुनियाद ही पाई गई हैं।

क्रोनोलॉजी फर्जी स्टिंग की पोल खुलने के बाद रविवार (जनवरी 12, 2020) की सुबह ही इंडिया टुडे समूह की पत्रकार JNU सर्वर से सम्बंधित एक ‘सनसनीखेज खुलासा’ लेकर आईं लेकिन उस खुलासे की हक़ीक़त यह थी कि इंडिया टुडे के पत्रकारों के सामान्य ज्ञान की जानकारी ही संदेह के घेरे में आ खड़ी हुई।

इसके बाद सोशल मीडिया पर इंडिया टुडे के रिपोर्टर का एक वीडियो शेयर किया जा रहा है जिसमें वो रिपोर्टर JNU कैम्पस में (जैसा कि वीडियो में विरोध प्रदर्शन के माहौल से प्रतीत हो रहा है) इंटरव्यू लेने से पहले उसके साथ कुछ कानाफूसी करते हुए देखी जा रही हैं।

हालाँकि इस वीडियो में आवाज एकदम स्पष्ट नहीं है फिर भी रिपोर्टर और युवक को JNU में सर्वर से सम्बंधित कुछ बात करते हुए सुना जा सकता है।

इस वीडियो को आप यहाँ देख सकते हैं –

इस वीडियो में कुछ बातें जो इंडिया टुडे की रिपोर्टर को कहते सुनी जा सकती हैं उनमें सर्वर और चेहरे पहचाने जाने के बारे में बातें करते सुना जा सकता है। युवक रिपोर्टर से कह रहा है कि सीसीटीवी चल नहीं रहा था तो चेहरा पहचान नहीं पाए लेकिन वीसी ने तो कहा सर्वर सेम है, और मेल जा रहे थे।

इस बातचीत से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि हो सकता है इंडिया टुडे की रिपोर्टर सर्वर सम्बधी मामले की जानकारी लेने गई हो। लेकिन इंटरव्यू लेने से पहले युवक (जिसका इंटरव्यू लेना है) के साथ इंडिया टुडे न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर द्वारा की जा रही गोपनीय कानाफूसी ने इस पूरी थीम पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इस कानाफूसी ने कुछ सवाल पैदा कर दिए हैं।

  1. क्या इंडिया टुडे सिर्फ अपनी बात सही साबित करने के लिए इस मामले को अनावश्यक तूल दे रहा है
  2. क्या सिर्फ अपने द्वारा लगाए गए आरोपों की सही साबित करने के लिए ही छात्रों के मुँह में अपने शब्द डालकर इंटरव्यू लेने की कोशिशें की जा रही हैं?
  3. क्या यूनिवर्सिटी एडमिन्स्ट्रेशन पर पूरा ब्लेम डालने की तैयारी चल रही है?
  4. लाल सलाम एक्टिविस्टों के साथ इस बातचीत की ज़रूरत क्या है?
  5. अगर आपको सच ही जानना है तो कैमरा लो, माइक लो और सवाल पूछो, ये कानाफूसी क्यों?
  6. क्या पत्रकार वामपंथी नेता को कोचिंग दे रही थी, या वामपंथी नेता पत्रकार को कोचिंग दे रहा था?

ये कुछ सवाल हैं जिनका उत्तर शायद राहुल कँवल ही दे पाएँगे।

यदि यह इंटरव्यू स्क्रिप्टेड नहीं है तो फिर इंटरव्यू से पहले इस तरह की कानाफूसी किस वजह से की जा रही है जैसे किसी परमाणु हथियार का कोड वर्ड लिया जा रहा हो?

सच्चाई जो भी हो, लेकिन JNU प्रकरण में आज तक और इंडिया टुडे समूह की दिलचस्पी हैरान कर देने वाली है।

इंडिया टुडे का एक और झूठ: ‘जेम्स बॉन्ड पत्रकार’ ने लेफ्टिस्ट गुंडों को बचाने के लिए दिया JNU-सर्वर पर ‘ज्ञान’

वामपंथियों की फालतू नारेबाजी, और बर्बाद होता JNU: राहुल कँवल पढ़ें ‘इंडिया टुडे’ की 40 साल पुरानी रिपोर्ट

हमारे कैमरे की सेटिंग ख़राब थी: इंडिया टुडे की JNU हिंसा के फर्जी स्टिंग पर सफाई

‘मारो साले को’ – भीड़ में शामिल लड़की ने दिया आदेश और सब मुझ पर टूट पड़े: JNU का नेत्रहीन छात्र

जेएनयू में रविवार (जनवरी 5, 2020) को बड़ी हिंसा हुई थी, जिसमें वामपंथी गुंडों ने छात्रों के हॉस्टल में घुस कर पिटाई की थी। गीता कुमारी, आईसी घोष और कॉमरेड चुनचुन सहित कई वामपंथी छात्र नेताओं के संदिग्ध वीडियो सार्वजनिक हो चुके हैं। पीड़ित छात्रों में एक नेत्रहीन छात्र भी हैं, जिन्हें सिर्फ़ इसीलिए पीटा गया क्योंकि उनके कमरे के बाहर बाबासाहब आंबेडकर का चित्र लगा हुआ था। उस पीड़ित छात्र का अधिक परिचय हम आपको आगे देंगे लेकिन ये बताना ज़रूरी है कि उसके बयानों से ये स्पष्ट हो जाता है कि हिंसक भीड़ ने चुन-चुन कर एबीवीपी के छात्रों को निशाना बनाया।

ऑपइंडिया ने जनवरी 5, 2020 को जेएनयू कैम्पस में हुई हिंसा को लेकर एक दिव्यांग छात्र सूर्य प्रकाश से बातचीत की। सूर्य प्रकाश नेत्रहीन हैं और जेएनयू में पढ़ते हैं। सूर्य प्रकाश ने बताया कि वो किसी राजनीतिक दल में सक्रिय नहीं है और उन्होंने एक सामान्य छात्र के रूप में ऑपइंडिया के समक्ष अपनी बात रखी। सूर्य प्रकाश ‘संस्कृत अध्ययन केंद्र’ में रिसर्च कर रहे हैं और उनका प्रथम वर्ष चल रहा है। डीयू के सेंट स्टीफेंस से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके सूर्य प्रकाश ने मास्टर्स भी जेएनयू से ही पूरा किया है। वो यूपी के देवरिया जिले के निवासी हैं।

सूर्य प्रकाश ने बताया कि उनके कमरे के बाहर बाबासाहब भीमराव आंबेडकर का चित्र लगा है, जिसे उकेरा गया है। उनके कमरे के भीतर भी आंबेडकर के चित्र लगे हुए थे। उन्होंने बताया कि इन सभी चित्रों से उनका कोई वास्ता नहीं है क्योंकि उनके ही शब्दों में वो ‘चित्रों के संसार से परे आवाज़ की दुनिया में रहने वाले व्यक्ति’ हैं। उन्होंने बताया कि वो पूरी तरह नेत्रहीन हैं। जेएनयू में हुई हिंसा की बात करते हुए सूर्य प्रकाश ने बताया कि वो अपने कमरे में अगस्त 5, 2019 को शिफ्ट हुए थे। वो यूपीएससी की तैयारी भी कर रहे हैं।

कमरे के चित्र व अन्य स्थितियों के बारे में सूर्य प्रकाश ने कहा था कि उनसे पहले जो उनके सीनियर यहाँ रहते थे, उन्होंने ही ये सब लगाया होगा। उन्होंने बताया कि इन्हीं चित्रों की वजह से राजनीति की जा रही है। उन्होंने बताया कि जनवरी 5, 2020 को जेएनयू में एक भीड़ ने आकर लोगों की पिटाई की। उन्होंने आगे जानकारी दी कि उस दिन वो दोपहर को जैसे ही अपने कमरे में आए, तभी शाम 4 बजे एक भीड़ हॉस्टल में घुस गई। भीड़ से लगातार ‘कहाँ हैं एबीवीपी वाले’ और ‘पंडित कहाँ गया?’ जैसे शोर सुनाई दे रहे थे।

सूर्य प्रकाश ने ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान किया बड़ा खुलासा

हॉस्टल वार्डन के हवाले से सूर्य प्रकाश ने बताया कि साबरमती छात्रावास के सामने पुलिस को तैनात कर दिया गया था। उन्होंने अन्य लोगों के हवाले से बताया कि जब भीड़ आई, तब पुलिस वाले वहाँ नहीं थे। उन्होंने बताया कि उनके कमरे के खिड़की के शीशे फोड़ डाले गए। उन्होंने बताया कि शाम 6 बजे वो भीड़ उनके कमरे में घुसी। उन्होंने बताया कि जब भी वो उस घटना को याद करते हैं, उनकी रूह तक काँप जाती है। भीड़ के लोगों ने उनके कमरे के दरवाजे को तोड़ते हुए माँ-बहन की गालियाँ भी बकीं। सूर्य प्रकाश ने बताया कि उन्हें उनके साथियों ने बताया कि उनके कमरे में आंबेडकर का चित्र होने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया।

सूर्य प्रकाश ने वामपंथियों द्वारा की गई हिंसा का विवरण देते हुए आगे बताया कि भीड़ ने उनके कमरे में घुस कर रॉड से खिड़की के शीशे पर जोरदार प्रहार किया। रॉड सीधे उनके सिर पर आकर लगा और उन्हें काफ़ी चोट पहुँची। उन्होंने बताया कि जब ये सब हुआ, तब वो कमरे की कुण्डी बंद कर के अपने लैपटॉप पर पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने बताया कि वो अपने जैकेट की टोपी पहने हुए थे, नहीं तो उनका सिर फूट सकता था। उन्होंने कहा कि जब वो ख़ुद को बचाने की कोशिश करते हुए अपने लैपटॉप को बचा रहे थे, तब तक उन पर ताबड़तोड़ 8-10 रॉड बरसा दिए गए।

सूर्य प्रकाश ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि हिंसक भीड़ में अधिकतर लोगों ने शराब पी रखी थी। उन्होंने बताया कि वो अपने नेत्रहीन होने की बात करते हुए दया की भीख माँगते रहे लेकिन उन्हें नहीं छोड़ गया। बकौल सूर्य प्रकाश, उनकी मिन्नतों को सुन कर भीड़ में शामिल एक लड़की ने कहा- “मार साले को” और वो उन पर टूट पड़े। उन्होंने कहा कि उनकी पिटाई के बाद भीड़ के लोग कमरा संख्या 156 में जाने की बात कर रहे थे। सूर्य प्रकाश ने अंदेशा जताया कि उस भीड़ का नेतृत्व कोई ऐसा व्यक्ति कर रहा था, जो इस छात्रावास की पूरी डिटेल जनता था। उन्होंने आगे बताया:

“भीड़ का नेतृत्व करने वाले को सब पता था कि इस हॉस्टल के किस कमरे में कौन रहता है। पूरे छात्रावास में फूटे हुए शीशों के टुकड़े फैले हुए थे। भागदौड़ में कई छात्रों को चोटें आईं। दहशत का आलम ये है कि आज भी छात्र अकेले में बाथरूम वगैरह जाने से डर रहे हैं। छात्र अकेले कहीं भी जाने से बच रहे हैं। अभी तक पुलिस ने भी मुझे कोई मदद नहीं दी है। मुझे अब किसी से कोई उम्मीद नहीं है। जेएनयू के हेल्थ सेंटर में मुझे ‘मूव क्रीम’ तक नहीं मिला, जिससे मेरा दर्द कम हो सके। नेत्रहीनता मेरे लिए एक तरह की बाधा है लेकिन मैंने अपने लक्ष्य में इसे आड़े नहीं आने दिया है। आप सोच सकते हैं मुझे कितनी परेशानी हुई होगी।”

सुनसान पड़े जेएनयू में अभी भी डर का माहौल

सूर्य प्रकाश ने बताया कि जेएनयू में कई दिनों से हिंसा की वारदातें हो रही थीं। उन्होंने बताया कि भीड़ के लोग हिंदी और अँग्रेजी में बातें कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भीड़ का जो व्यक्ति नेतृत्व कर रहा था, वो व्यक्ति गुंडों को निर्देशित कर रहा था कि कहाँ हमला करना है और कहाँ नहीं। उन्होंने बताया कि इस कांड में कई ऐसे लोगों के हाथ हैं, जो आसपास के रहने वाले लोग ही हैं। सूर्य प्रकाश ने दावा किया कि भीड़ को आंबेडकर के चित्र से समस्या थी, जिस कारण उन्हें पीटा गया।

बकौल सूर्य प्रकाश, वो संस्कृत पढ़ रहे हैं इसका मतलब ये नहीं है कि वो एबीवीपी से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि हॉस्टल फी बढ़ाने को लेकर हुए आंदोलन से लेकर अन्य प्रदर्शनों तक, उन्होंने कहीं भी हिंसा नहीं लिया। सूर्य प्रकाश ने बताया कि छात्रों को माँ-बाप ने पढ़ाई के लिए भेजा है, आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि ‘जय श्री राम’ या ‘जय भीम’ जैसे नारों से किसी पर राजनीतिक दलों या संगठनों से जुड़ा होने का ठप्पा लगाना सही नहीं है।

(नोट: नेत्रहीन व्यक्ति भी कई ‘Assistive Technology’ के जरिए लैपटॉप और फोन इत्यादि उपकरणों का प्रयोग करते हैं।)

कॉन्ग्रेस क्या तो बचाए… अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन, RaGa को या फिर इंदिरा गाँधी की नाक?

“वही दूरदर्शित, वही निष्ठा, वही इच्छाशक्ति…. इंदिरा इज़ बैक” यानी, इंदिरा वापस आ चुकी है। यह हम नहीं बल्कि आज के दैनिक भास्कर अखबार का पहला पन्ना कह रहा है। कहने वाले सज्जन मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में पर्यावरण एवं लोकनिर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा हैं। सज्जन सिंह यह बातें किसी और के लिए नहीं बल्कि इंदिरा की ही पोती और उन्हीं की नाक के जैसे दिखने वाली प्रियंका गाँधी के लिए कह रहे हैं। वही प्रियंका गाँधी जो कुछ दिन पहले ट्विटर पर अकाउंट से आधी रात को दुर्गा सप्तशती के मन्त्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे’ को ट्वीट कर रहीं थीं।

प्रियंका गाँधी के जन्मदिन की सुबह दैनिक भास्कर अख़बार के पहले पन्ने पर ही इंदिरा गाँधी के साथ उनकी तुलना करते हुए कॉन्ग्रेस के नेता जी द्वारा लिखी गई प्रशंसा तो यही बता रही है कि ट्विटर पर आधी रात को किए गए उनके मन्त्र जाप का असर प्रियंका गाँधी पर जल्द ही होने वाला है। जन्मदिन तो आज स्वामी विवेकानंद का भी है लेकिन मंत्री जी की प्राथमिकताएँ तय हैं, उन्हें पहले इंदिरा गाँधी को इस वसुंधरा पर उतारना है, उसके बाद अन्य कामों पर नजर डाली जाएगी।

नवंबर में ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का भी जन्मदिन था, लेकिन ख़ास बात यह रही कि पूरे गाँधी परिवार ने उन्हें बधाई सन्देश नहीं दिया था। हो सकता है सज्जन सिंह इसी आंतरिक कलह का फायदा उठाना चाह रहे हों।

लेकिन सवाल यह है कि किसी के जन्मदिन पर शुभकामना संदेशों से किसी को क्यों आपत्ति हो सकती है? वो भी तब जब राहुल गाँधी के कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्त होने की खबरें बाजार में चल रही हों। यह तो निश्चित है कि अपनी जमीन तलाश रही कॉन्ग्रेस और उसके नेता अब जल्दी ही किसी दिन इस वंशवाद में डूबी हुई पार्टी के पतन पर फूट पड़ेंगे। लेकिन कॉन्ग्रेस और उसके क्रियाकलापों पर सवाल उठाने पर जब शशि थरूर जैसे नेता को माफ़ी माँगने पर विवश होना पड़ता है तो फिर किसी और की क्या मजाल? बाकी सज्जन तो इंदिरा गाँधी को प्रसन्न करने में व्यस्त हैं ही।

सवाल यह है कि इंदिरा की नाक यानी प्रियंका गाँधी तो सबको नजर आती हैं, लेकिन किसी को फ़िरोज गाँधी जैसा कोई क्यों नहीं याद आता है? क्या कॉन्ग्रेस अब राहुल गाँधी को भूल जाना चाहती है। कॉन्ग्रेस के भीतर समय-समय पर प्रियंका गाँधी को मुख्य कमान सौंपे जाने की बातें उठती रहती हैं, लेकिन तब कॉन्ग्रेस नेता यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि यह माँग बस कॉन्ग्रेस के छुटभइया नेता ही करते हैं। हालाँकि मणि शंकर अय्यर जैसे नेता भी प्रियंका गाँधी को कॉन्ग्रेस के भीतर मुख्य भूमिका में देखने की अपनी इच्छा कब की जाहिर कर चुके हैं। लेकिन मणि शंकर अय्यर को गंभीरता से लेता ही कौन है?

लोकसभा चुनाव 2019 के समय भी देखा गया था कि प्रियंका गाँधी ने शुरू में तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ खूब हल्ला बोला लेकिन चुनाव के दौरान ही धीरे-धीरे कॉन्ग्रेस अपनी असलियत जानते हुए प्रियंका गाँधी को पीछे धकेलती गई। स्पष्ट था कि खुद कॉन्ग्रेस नहीं चाहती थी कि परिवारवाद की सर्कस के आखिरी जोकर को भी वो एक पहले से ही हारी हुई बाजी में उतार दें।

2019 के लोकसभा चुनाव में ही कॉन्ग्रेस की PR टीम से लेकर कॉन्ग्रेस का मीडिया गिरोह तक प्रियंका गाँधी के लिए मैदान बनाने लगा, इंदिरा 2.0 जैसे जुमले गढ़े गए। लेकिन, आखिर में नतीजा यह हुआ इंदिरा गाँधी के अवतरण में बाधा उत्पन्न हो गई और राहुल गाँधी के सर पर हार का ठीकरा फोड़ दिया गया। और राहुल गाँधी हमेशा की तरह ही हर हार के बाद फिर अज्ञातवास पर निकल गए।

अफवाहों का बाजार फिर से तेज है। राहुल गाँधी के राजनीतिक भविष्य से लेकर कॉन्ग्रेस की आगे की रणनीति अब तय होगी। इसी बीच प्रियंका गाँधी के जन्मदिन पर कॉन्ग्रेस नेताओं के उत्साह से भी कुछ रुझान आने शुरू हो गए हैं। कॉन्ग्रेस की हैसियत इस समय देश में वोट कटुआ पार्टी से अधिक कुछ नहीं है। उदाहरण के लिए अगर दिल्ली चुनाव को ही ले लें, तो कॉन्ग्रेस को इस चुनाव में कोई तीसरा कैंडिडेट तक मानने को राजी नहीं है। होना यह है कि कॉन्ग्रेस आगामी चुनावों में नोटा जैसा विकल्पों से भी पीछे खिसकने वाली है। अब कॉन्ग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वो पहले क्या बचाए- अपनी खोई हुई राजनीति की जमीन या फिर इंदिरा गाँधी की नाक?

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जब JNU में मार कर खदेड़े गए 2 सैन्य अधिकारी: Pak शायरों के भारत विरोधी बयान पर जताई थी आपत्ति

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का विवादों से पुराना नाता रहा है। सन 1980-81 में यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने कुलपति को अपशब्द कहे थे, जिसके बाद 46 दिनों तक इस पर ताला जड़ दिया गया था। यहाँ ‘महिषासुर दिवस’ मनाने से लेकर ‘भारत के टुकड़े’ जैसे नारों तक, कई बार विवाद छिड़ चुका है। केरल में सबरीमाला मुद्दे पर भीषण विरोध प्रदर्शन झेलने वाले वामपंथी अब जेएनयू के रूप में अपना अंतिम गढ़ बचाने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे हैं। दिसंबर 5, 2019 को इसी क्रम में हॉस्टलों में घुस कर एबीवीपी के छात्रों को चुन-चुन कर मारा गया। ये मामला अभी तक गर्म है।

ऐसे में, यहाँ एक घटना का जिक्र करना आवश्यक है, जो ये बताता है कि जेएनयू में एक खास धड़े के छात्रों के भीतर किस कदर अपने ही देश को लेकर विरोधी भावनाएँ भरी हुई हैं। वहीं अगर बात पाकिस्तान की हो तो वो कला और संस्कृति की बातें करते हैं और जम्मू कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख अख्तियार करने से भी नहीं हिचकते। आइए, आपको मई 2, 2000 में संसद में मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूरी के उस सम्बोधन के बारे में बताते हैं, जिसमें उन्होंने एक बड़ी घटना की तरफ़ देश का ध्यान आकृष्ट कराया था। ये घटना जेएनयू में हुई थी।

वो अप्रैल 29, 2000 का दिन था। 1999 में कारगिल युद्ध की यादें लोगों के जेहन में एकदम ताज़ा थीं। जिस तरह से पाकिस्तान ने भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया था, उससे देश अभी तक उबरा नहीं था। भारत की विजय तो हुई लेकिन 522 जवानों को बलिदान देना पड़ा। ऐसे समय में जेएनयू में एक मुशायरे का आयोजन किया गया, जिसमें पाकिस्तान वक्ताओं का भरपूर स्वागत किया गया। भारत में ‘कला की कोई सीमा नहीं होती’ और ‘आर्ट तो मजहब से परे है’ जैसी फ़र्ज़ी बातें करने वालों की कमी नहीं रही है, ये बताना नहीं पड़ेगा। कुछ ऐसा ही उस वक़्त भी हुआ।

उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश, जिसे काट कर नवंबर 2000 में उत्तरांचल के रूप में नए राज्य का गठन हुआ) के गढ़वाल से चुन कर लगातार तीसरी बार सांसद बने खंडूरी ने संसद को बताया कि जेएनयू में 29 अप्रैल, 2000 की शाम सेना के दो जवानों की बेरहमी से पिटाई की गई। उन्होंने कहा था कि ये काफ़ी घृणित घटना है और जिस तरह से देश में सेना के जवानों के साथ व्यवहार किया जा रहा है, वो चिंताजनक है। जेएनयू में जिन दो भारतीय सेना के अधिकारियों को पीटा गया, उनका गुनाह बस इतना था कि उन्होंने मंच से भारत को भला-बुरा कह रहे पाकिस्तानी शायरों की बातों से आपत्ति जताई थी।

ये दोनों सैनिक कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ चुके थे। उस शाम जेएनयू में एक मुशायरे का आयोजन किया गया था। दर्शक दीर्घा में बैठे कलाप्रेमियों में से कुछ को तब गहरा धक्का लगा, जब उन्होंने पाया कि शायरों में अधिकतर पाकिस्तानी हैं। इसके बाद पाकिस्तानियों ने भारत को खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी और कारगिल युद्ध को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की। ऐसे में उस युद्ध में जान हथेली पर रख कर मातृभूमि के लिए लड़ने वाले दो सैन्य अधिकारियों को ये सब बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने अपनी सीट से खड़े होकर आपत्ति जताई।

बकौल बीसी खंडूरी, जैसे ही जेएनयू के लोगों ने देखा कि दोनों सैनिकों ने पाकिस्तानी शायरों की आपत्तिजनक टिप्पणियों का विरोध किया है, वो उनकी पिटाई करने लगे। पीड़ित सैनिकों में से एक ने कहा- “मैं भारतीय सेना का अधिकारी हूँ। किसी भी राजनीतिक दल से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। कृपया मेरे साथ दुर्व्यवहार न करें। मैं किसी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं हूँ।” इतना कहने के बाद अधिकारियों ने अपना आईडी कार्ड दिखाया, जिसके बाद छात्र और भी उग्र हो गए। बता दें कि दोनों अधिकारी उस समय भी सेना में कार्यरत थे और रिटायर नहीं हुए थे।

इतना सुनते ही जेएनयू के लोग और भी उग्र हो गए और उन्होंने उनकी पहचान जानने के बावजूद उनकी ख़ूब पिटाई की। तमाशबीन लोग कारगिल युद्ध में भारत की सेवा करने वाले सैन्य अधिकारियों की पिटाई को देखते रहे। ये घटना रात के 1 बजे हुई। पाकिस्तानी टीवी चैनलों ने उसके अगले दिन सुबह 8 बजे इस ख़बर को चलना शुरू कर दिया। जेएनयू के कारण पाकिस्तान को ख़ुश होने का मौक़ा मिला। खंडूरी का सवाल था कि क्या ये चीजें पूर्व-नियोजित थीं? पाकिस्तान के पास ये सूचना इतनी जल्दी कैसे पहुँची? ग़ौरतलब हो कि दोनों अधिकारियों को पीट-पीट कर धक्का देते हुए मुशायरे से बाहर खदेड़ दिया गया था।

मेजर जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूरी ने मई 2, 2000 को संसद में इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था

ग़ौर करने वाली बात है कि उस वक़्त फेसबुक और ट्विटर का कोई अस्तित्व नहीं था। सोशल मीडिया के दोनों महारथी कम्पनियाँ लॉन्च नहीं हुई थीं। ऐसे में पाकिस्तान तक जेएनयू के एक मुशायरे की ख़बर पहुँचना खंडूरी के संदेह को बल देता है। 5 बार सांसद रह चुके बीसी खंडूरी फिलहाल भाजपा के वयोवृद्ध नेता हैं। वो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। तब उन्होंने संसद में सवाल उठाते हुए कहा था:

“ये ऐसी घटना है, जो अब तक हमारे देश में नहीं हुई थी। जहाँ एक तरफ़ हम कारगिल के वीरों को सम्मान देने की बात करते हैं और राष्ट्रवाद की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसी कारगिल युद्ध के दो वीरों को जेएनयू में सिर्फ़ इसीलिए पीटा जाता है क्योंकि उन्होंने पाकिस्तानी शायरों की भारत-विरोधी टिप्पणी को बर्दाश्त नहीं किया। मैं सरकार से इस मामले की उच्च-स्तरीय जाँच की माँग करता हूँ। जेएनयू के 10 प्रोफेसरों ने गंभीर सवाल दागे हैं। उनका पूछना है कि जब सेमेस्टर की परीक्षाएँ चल रही हैं, ऐसे में इस मुशायरे के आयोजन की क्या ज़रूरत आन पड़ी?”

दरअसल, उस वक़्त जेएनयू के कई प्रोफेसरों ने आवाज़ उठाई थी। उन्होंने पूछा था कि आख़िर इस सेमिनार का आयोजन किसने किया था? बीसी खंडूरी ने जेएनयू के प्रोफेसरों के हवाले से दावा किया था कि इस मुशायरे के आयोजन में 1 लाख रुपए ख़र्च किए गए थे। अगर रुपए के अंतरराष्ट्रीय भाव को देखें तो आज के समय में ये रक़म और भी ज़्यादा हो जाती है। प्रोफेसरों को इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिला कि आयोजन के लिए फंड्स कहाँ से आए थे?

सबसे बड़ी बात तो ये कि इतने बड़े मुशायरे में सुरक्षा व्यवस्था का कोई बंदोबस्त नहीं था। अगर वहाँ पुलिस की मौजूदगी होती तो शायद देश के दो सैन्य अधिकारियों को जेएनयू के लोगों द्वारा पिटाई नहीं की जाती। तब दिल्ली के सांसद साहिब सिंह वर्मा ने भी इस घटना पर आपत्ति जताते हुए इसे गंभीर मसला करार दिया था। उत्तर-पूर्व मुंबई के तत्कालीन सांसद किरीट सोमैया ने भी उनके सुर में सुर मिलाया। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस नेता प्रियरंजन दाशमुंशी ने भी पूछा था कि इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री ख़ामोश क्यों हैं? उन्होंने भी इसे गंभीर आरोप बताया था।

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हिज़्बुल के 2 और जैश का 1 आतंकी ढेर: J&K में आतंकियों और सेना के बीच हुई मुठभेड़

जम्मू-कश्मीर के त्राल में आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच सुबह तड़के शुरू हुई हुई मुठभेड़ में तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया है। सेना और जम्मू-कश्मीर पुलिस की टीम ने मिलकर हिज़्बुल मुजाहिदीन के दो आतंकियों उमर फैयाज लोन, आदिल बशीर मीर व जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी फैजान को ढेर किया।

जानकारी के अनुसार, भारतीय सेना को ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी कि पुलवामा में तीन आतंकी छिपे हुए हैं। इस जानकारी के आधार पर सेना की राष्ट्रीय राइफ़ल्स, जम्मू-कश्मीर पुलिस और CRPF के जवानों ने मिलकर त्राल क्षेत्र में एक बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू किया। इस मुठभेड़ में दोपहर के क़रीब 2 बजे के आसपास तीनों आतंकियों को मार गिराया गया। 

इससे पहले, IGP कश्मीर विजय कुमार ने तीन आतंकियों के मारे जाने की पुष्टि करते हुए कहा था कि आतंकवादी घाटी में आतंकवाद फैलाने में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया था कि आतंकवादियों के निशाने पर सुरक्षाबल तो रहता ही है, लेकिन वो घाटी के युवाओं को कट्टरवाद का नशा पिलाकर अराजकता और हिंसा करने के लिए उन्हें उकसा रहे हैं।  

ख़बर के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आतंकियों को ढेर करने के बाद सेना ने गुलशनपोरा इलाक़े में भी सर्च ऑपरेशन चलाया। इससे पहले, पुलिस ने शनिवार (11 जनवरी) को दक्षिण कश्मीर से दो आतंकवादियों को गिरफ़्तार किया था। इनमें से एक टॉप हिज़्बुल आतंकवादी नावेद बाबू था, जिसके बारे में पता चला था कि वो शोपियाँ में ट्रक चालक की हत्या में शामिल था। इसके अलावा, सुरक्षाबल पर हमला करने का ज़िम्मेदार भी वही था। 

ख़बर में सूत्रों के हवाले से लिखा गया कि कश्मीर में आतंकियों ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब वो दो से तीन आतंकियों के ग्रुप में विभाजित होकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं, जबकि पहले वो छ: से सात के ग्रुप में विभाजित होते थे।

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‘…उस रात सेना के जवान न आते तो घर में जश्न नहीं मातम होता’ – गर्भवती तस्लीमा और भाई फैज ने बताया फरिश्ता

भारत का इतिहास सेना के जवानों के अदम्य साहस का गवाह है। सीमा पर अपने कर्तव्यों का वहन करना तो सेना बख़ूबी जानती ही है, लेकिन जब कोई शख़्स मौत के गाल में समाने ही वाला हो और ऐन मौक़े पर सेना का जवान उसे बचाकर नई ज़िंदगी दे, तो वो जवान किसी फ़रिश्ते से कम नहीं होता।

ऐसा ही एक ताज़ा मामला जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले का है, जहाँ एक गर्भवती महिला तस्लीमा को सेना के जवानों ने न सिर्फ़ नई ज़िंदगी दी बल्कि उसके नवजात शिशु को जीवन प्रदान करने में भी एक अहम भूमिका निभाई। तस्लीमा के भाई ने बताया कि वो अपनी गर्भवती बहन को लेकर अस्पताल जा रहे थे, लेकिन भारी बर्फ़बारी के चलते रास्ता बंद हो गया और रात का अँधेरा ज़िंदगी का अँधेरा बनने लगा। कड़ाके की ठंड में भाई-बहन को लगा कि अब उनके जीवन का अंत शायद यहीं हो जाएगा। 

दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार, तस्लीमा और उनके भाई ने हिम्मत जुटाकर किसी तरह से निकटवर्ती सैन्य शिविर में सम्पर्क साधा। अपने चारों तरफ बर्फ़ ही बर्फ़ नज़र आने की वजह से दोनों भाई-बहन को हर समय यही लग रहा था जैसे मौत के फ़रिश्ते कभी भी उन्हें लेने आ सकते हैं। लेकिन, इसी बीच वहाँ सेना के जवान डॉक्टर के साथ पहुँच गए, जिन्हें देखकर तस्लीमा और उनके भाई की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने उनकी (जवान) तुलना ज़िंदगी देने वाले फ़रिश्ते से कर दी।

तस्लीमा के भाई ने बताया कि वहाँ पहुँचे डॉक्टर ने पहले तो उनकी बहन को प्राथमिक उपचार दिया और फिर जवानों की मदद से स्ट्रेचर पर उनकी बहन को तीन किलोमीटर तक बर्फ़ पर पैदल चलकर और फिर एंबुलेंस के ज़रिए उपज़िला अस्पताल सोगाम पहुँचाया। वहाँ पहुँचने पर डॉक्टर्स ने कहा कि उनकी बहन का ऑपरेशन करना होगा और इसके लिए उन्हें बनिहाल के अस्पताल में ले जाना पड़ेगा। इस दौरान एक अन्य गर्भवती महिला को भी बनिहाल अस्पताल ले जाना था। इसके बाद दोनों गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस में अस्पताल ले जाया गया। वहाँ पहुँचने के बाद तस्लीमा ने एक स्वस्थ्य बच्चे को जन्म दिया। 

अपने नवजात भाँजे को खिलाते और झूमते हुए तस्लीमा के भाई फैज ने उस अँधेरी रात का ज़िक्र करते हुए कहा कि अगर उस दिन सेना के जवान न आते तो उनके घर में जश्न मनाने की बजाए मातम मनाया जा रहा होता।

सेना और स्थानीय लोगों के बीच रिश्ते के बारे में एक सवाल के जवाब में फैज ने कहा कि एक समय था जब उनका इलाक़ा जिहादियों का पनाहगाह था, लेकिन अब वहाँ जिहादी नहीं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अब वहाँ सेना के जवान हैं। उन्होंने कहा, “जिहादियों ने हमारे स्कूल और अस्पताल जला दिए, लेकिन भारतीय सेना ने हमारे लिए स्कूल और अस्पताल बनवाए हैं। वो हमारे बच्चों को स्कूल पहुँचा रहे हैं, मैं ज़्यादा क्या कहूँ, सबूत तो यह नवजात भी है।”

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7 साल के बॉयफ्रेंड साबिर को पाने के लिए पति की हत्या, अवैध संबंध को लेकर होता था विवाद

क्राइम ब्रांच दिल्ली पुलिस द्वारा एक ऐसी घटना को सुलझाया गया है, जिसमें पत्नी ने ही अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर पति की सुपारी देकर हत्या करवाई। पुलिस ने इस मामले में मृतक दिलशाद की पत्नी बिलकिस और उसके प्रेमी साबिर को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों के अवैध संबंध थे, जिसका दिलशाद विरोध करता था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गत दिसंबर 29, 2019 को सुंदर नगरी निवासी महिला बिलकिस ने थाने में अपने पति मोहम्मद दिलशाद की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। स्थानीय पुलिस के साथ ही क्राइम ब्रांच दिलशाद की तलाश में जुटी थी। इसी जाँच में क्राइम ब्रांच को जानकारी मिली कि मोहम्मद दिलशाद की हत्या उसकी पत्नी बिलकिस ने ही अपने प्रेमी के साथ मिलकर करवाई है। आरोपित बिकलिस घरेलू सहायिका का काम करती है, जबकि उसका बॉयफ्रेंड साबिर एक सैलून में काम करता है।

हत्या का मामला दर्ज होने के बाद आरोपितों को पकड़ने के लिए ACP मनोज पंत के नेतृत्व में इंस्पेक्टर आशीष कुमार दुबे, राजीव कक्कड़, SI पंकज, विनीत कुमार, अजीत सिंह, ASI अजय कुमार, कॉन्स्टेबल ललित आदि की टीम गठित की गई। जनवरी 09, 2020 को पंचकुइयाँ रोड निवासी साबिर अली को गिरफ्तार कर लिया और फिर मृतक दिलशाद की पत्नी बिलकिस को भी दबोच लिया गया। आरोपित साबिर ने पुलिस को बताया कि उसके दिलशाद की पत्नी बिलकिस से सात वर्ष से संबंध थे।

मृतक दिलशाद भी पहले परिवार के साथ पंचकुइयाँ इलाके में रहते थे। वहीं, पत्नी के अवैध संबंध की जानकारी के बाद वह बाद में सुंदर नगर इलाके में रहने लगे थे, लेकिन फिर भी साबिर लगातार बिलकिस से मिलता रहता था। दिलशाद इसका लगातार विरोध करता था।

पकड़े जाने के बाद आरोपितों ने बताया कि बॉयफ्रेंड साबिर से संबंध रखने के कारण दिलशाद अपनी पत्नी बिलकिस से मार-पीट भी करते थे। जिस कारण बिलकिस और साबिर ने मिलकर उनकी हत्या की योजना बनाई। साबिर पर आरोप है कि उसने बिलकिस के पति दिलशाद को रास्ते से हटाने के लिए रोहित नामक कॉंट्रैक्ट किलर को एक लाख रूपए की सुपारी दी थी।

सुपारी किलर के साथ मिलकर दिलशाद को मारने के लिए बनाया प्लान

साबिर ने रोहित के साथ मिलकर दिसंबर 27, 2019 को शादी पंडाल में पान की दुकान लगाने के बहाने से दिलशाद को द्वारका इलाके में बुलाया। रास्ते में साबिर और रोहित ने तार से दिलशाद का गला घोट कर हत्या कर दी। साबिर और बिलकिस की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब फरार आरोपित रोहित की तलाश कर रही है।

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‘शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी खा रहे बिरयानी, मना रहे पिकनिक’ – जाम से परेशान स्थानीय लोग सड़क पर

अगर सीपीआई नेता कन्हैया कुमार की मानें तो शाहीन बाग़ की प्रदर्शनकारी महिलाएँ इतिहास रच रही हैं। वहाँ हो रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के बाद कन्हैया ने कहा कि ये ‘शानदार आंदोलन’ संविधान बचाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने यहाँ तक दावा कर दिया कि इस आंदोलन के बारे में आने वाली पीढ़ियाँ किताबों में पढ़ेंगी। उन्होंने लोगों से सोशल मीडिया पर अपील की थी कि वो भी आएँ और इस आंदोलन में हिस्सा लेकर इतिहास को बनता हुआ देखें। कन्हैया कुमार से एक सवाल तो बनता है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ जब किताबों में इसके बारे में पढ़ेंगी तो क्या उसमें बिरयानी की रेसिपी भी शामिल होगी?

ऐसा नहीं है कि यह कोई व्यंग्य है। दरअसल, शाहीन बाग़ के स्थानीय लोग ही अब इस आंदोलन से परेशान हो चुके हैं। इन प्रदर्शनकारियों की वजह से उन्हें ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मुस्लिम महिलाओं के धरना-प्रदर्शन के कारण यह क्षेत्र रोज़ाना भीषण जाम से जूझ रहा है। लोगों को आने-जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अब इस विरोध-प्रदर्शन के ख़िलाफ़ भी जाम से परेशान स्थानीय लोगों ने एक विरोध-प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगाया कि वो लोग यहाँ पिकनिक मना रहे हैं।

स्थानीय लोगों ने कहा कि एनआरसी क़ानून अभी आया भी नहीं है और इसके ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन के कारण उन्हें प्रतिदिन भीषण ट्रैफिक जाम की समस्या झेलनी पड़ रही है। सड़क पर उतरे आम लोगों ने बताया कि नौकरी करने वाले स्थानीय लोगों को जाम की वजह से नोएडा जाने में 5 घंटे लग जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरिता विहार और मथुरा रोड जाने में 3 घंटे लग रहे है, जो वहाँ से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर है। क्रोधित स्थानीय जनता ने कहा कि चंद लोगों ने सरकार के साथ-साथ उन्हें भी परेशान कर रखा है।

सड़क पर सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के ख़िलाफ़ ख़ासा जनाक्रोश देखने को मिला। एक व्यक्ति ने ‘इंडिया टीवी’ से बात करते हुए बताया कि इसके लिए दिल्ली पुलिस और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जिम्मेदार हैं। उक्त पीड़ित व्यक्ति ने कहा कि अपने घर में बैठ कर हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति कर रहे केजरीवाल को यहाँ की सड़क खुलवानी चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या जनता ने केजरीवाल को चुन कर नहीं भेजा है? एक व्यक्ति ने कहा कि पिछले 26 दोनों से न सिर्फ़ यातायात व्यवस्था बल्कि शिक्षा व्यवस्था भी ठप्प हो गई है। उसने पूछा कि क्या किसी को यहाँ के हिन्दुओं की भावनाओं का कोई ख्याल नहीं है? उसने आगे कहा:

“यहाँ विरोध प्रदर्शन नहीं हो रहा है। सरकार के ख़िलाफ़ धरना के नाम पर लोग अंडे खा रहे हैं। पिकनिक मना रहे हैं। बिरयानी खा रहे हैं लोग। लगता है अब हिन्दुओं को अपनी सुरक्षा का इंतजाम ख़ुद करना पड़ेगा। कोई हमारी नहीं सुन रहा है। इसीलिए, हमें सड़क पर उतरना पड़ रहा है। कालिंदी-कुंज रोड को पिकनिक स्पॉट बना दिया गया है।”

वहीं एक महिला ने बताया कि धरना-प्रदर्शन कर रहे लोग यूपी से आए हैं और स्थानीय नहीं है। महिला ने दावा किया कि रुपए देकर लोगों को विरोध प्रदर्शन के लिए बुलाया गया है। ऐसे में कन्हैया कुमार से सवाल तो बनता है, जो कह रहे हैं कि पूरा हिंदुस्तान अब एक शाहीन बाग़ है। क्या वामपंथी नेता चाहते हैं कि पूरे देश में विरोध प्रदर्शन के नाम पर पिकनिक मनाई जाए और आम जनता को परेशान किया जाए?

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शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

हे मार्क्स बाबा के कॉमरेड, ठण्ड का मौसम तुम्हारी क्रांति के लिए सही नहीं है, रजाई में दुबके रहो