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मुस्लिम महिलाओं के गर्भ गिरवा रहा है चीन, 35 साल से कम उम्र की हर औरत से रेप

चीन के शिनजिंग प्रांत में उइगर मुसलमानों की भाँति ही हजारों की संख्या में कजाकिस्तान के मुस्लिमों को भी बंदी बनाकर रखा गया है। कई कार्यकर्ताओं के अनुसार चीन के यातना गृहों में करीब 20 लाख से ज्यादा लोग कैद हैं। इनमें से अधिकतर उइगर हैं। कुछ कजाक मुस्लिमों जैसे अल्पसंख्यक समूह के भी हैं। इन्हें भी उइगर मुस्लिमों की तरह ही प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके कारण कई सुनने में अक्षम हो गए हैं तो कुछ कि यादाश्त चली गई है।इसके अलावा उइगर मुस्लिम महिलाओं की तरह इस समुदाय की महिलाओं का भी पहले बलात्कार होता है और फिर बाद में जबरन इनका गर्भ गिरवा दिया जाता है।

अलजज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, उसके संवाददाता ओसामा बिन जावेद ने कजाकिस्तान के सबसे बड़े शहर अलमाती में चीन से भागकर आए कुछ कजाकियों से मुलाकात की। इस दौरान उसे कई ऐसे सहमे लोग भी मिले, जिन्होंने अपनी पहचान बताने से मना कर दिया। उन्हें डर था कि अगर वे अपना मुँह खोलेंगे तो उनके रिश्तेदारों के साथ चीन के यातना गृह में और ज्यादा अत्याचार होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय तक चीन की हिरासत में बंदी बनकर रहे एक कज़ाकी ने बताया कि डिटेंशन कैंप में उसे ऐसी दवाइयाँ और इंजेक्शन लेने को मजबूर किया गया, जिससे उसका शरीर बर्बाद हो गया। उसके सुनने की क्षमता चली गई। कजाकी व्यक्ति के अनुसार आज उसकी स्थिति ये हो चुकी है कि उसे अब अपने साथ हुआ ज्यादा कुछ तो याद नहीं है, लेकिन चीनी कविताएँ उसे अच्छे से याद हैं। इन्हें पढ़ने के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों को कैंप में मजबूर किया जाता है।

इसके अलावा, चीन के नॉर्थवेस्ट इलाके के डिटेंशन कैंप में अरसे तक बंदी बनाकर रखी गई कजाकी महिलाओं ने बताया कि चीन के प्रशासन ने उनके साथ बहुत बर्बरता की और जबरन उनका गर्भपात करवाया।

सुनिए कजाक महिला की आपबीती (साभार: अलजजीरा)

गुलजीरा मॉडगिन नामक महिला, जिन्होंने कजाक की नागरिकता मिलने से पहले अपने कटु अनुभवों के बारे में कभी जुबान नहीं खोली थी, ने बताया कि यातना गृह में उन्हें जान से मारने की धमकी देकर डराया जाता था। उनको प्रताड़ित किया जाता था। गुलजीरा के अनुसार एक बार हिरासत के दौरान उन्हें मेडिकल चेकअप के लिए भेजा गया। जहाँ वे प्रेगनेंट निकलीं। जब अधिकारियों को ये बात पता चली, तो उनपर गर्भपात का दबाव बनाया गया। जब उन्होंने इससे मना किया तो उन्हें अकेला छोड़ दिया गया और बाद में एक क्लिनिक भेजा गया और टीबी की दवाइयों के नामपर कुछ दवाइयाँ खाने को कहा गया। लेकिन वो समझ गई वो क्या हैं।

यहाँ बता दें कि चीनी बर्बरता और उनके तौर-तरीके देख तुर्की के सदस्यों का कहना है कि चीनी प्रशासन गर्भपात को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। जब भी वह इससे मना करते हैं, तो जबरन उनके साथ ऐसे काम किया जाता है।

वहीं इस संबंध में कई कजाकियों का कहना है कि चीन आतंक से लड़ने के नाम पर मुस्लिमों पर लगातार अत्याचार कर रहा है और हर बार मानवाधिकारों का उल्लंघन भी कर रहा है। लेकिन कोई भी नेता उनके पक्ष में नहीं खड़ा हो रहा। उनकी मुस्लिम होने की पहचान को समय से पहले ही मिटाया जा रहा है और उनके बच्चों को पैदा होने से पहले ही मारा जा रहा है।

इससे पहले डेली मेल ने ऐसी ही दो महिलाओं की आपबीती छापी थी। इन्हें 2009 में शिनजियांग में हिरासत में लिया गया था। 4 साल तक चीनी अधिकारियों की प्रताड़ना झेलने के बाद अब दोनों तुर्की में हैं। इन्होंने बताया था कि चीन में 35 साल से कम उम्र के हर आदमी और हर औरत का बलात्कार किया जाता है। कैंप के गार्ड जिसके साथ रात गुजारना चाहते हैं, उसके सिर पर बैग रखते हैं और फिर खींचते हुए बाहर ले जाते है। फिर पूरी रात उसका बलात्कार होता है।

गौरतलब है कि 2017 में उइगर मुस्लिमों, कजाकी मुस्लिमों, वीगर समुदाय के साथ हो रहे अत्याचारों का खुलासा हुआ था। इसके बाद इस मामले पर कई मीडिया रिपोर्ट्स सामने आईं। जिसमें खुलासा हुआ था कि चीन द्वारा री-एड्युकेशनल कैंपों के नाम पर चलाए जा रहे यातना गृहों में महिलाओं के साथ पहले रेप होता है और फिर उनका जबरन गर्भपात करवाया जाता है। इसके अलावा यहाँ महिलाओं के गुप्तांगों में मिर्ची के पेस्ट लगाए जाने भी बेहद आम हैं।

लेकिन फिर भी चीन की प्रवक्ता वैश्विक स्तर पर इस संबंध में बात करते हुए दावा करती हैं कि उइगर मुस्लिमों की तरह उनके देश में 56 और समूह रहते हैं। वे यहाँ बेहतर जिंदगी जी रहे हैं और अपनी आजादी एवं अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चाइना भी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों से अपने दोस्ताना संबंधों को आनंद ले रहा है।

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111 पन्नों की उस रिपोर्ट के 6 पन्नों में प्रताड़ना की ऐसी कहानियॉं दर्ज हैं कि आप जितनी भी बार पढ़ें रोंगेटे खड़े हो जाते हैं। बात हो रही है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) के प्रोजेक्ट ‘कोशिश’ की उस रिपोर्ट की जिसने 2018 में पूरे देश को झकझोर दिया था। यह रिपोर्ट बिहार के बालिका गृह, बाल गृह, वृद्धाश्रम, अल्पावास वगैरह की सोशल ऑडिट पर थी। मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के यौन शोषण की दास्तानें इसी रिपोर्ट की वजह से सामने आ पाई थी। लेकिन, इस रिपोर्ट में कुल 17 संस्थान थे जिनकी स्थिति बेहद चिंतनीय बताते हुए तत्काल ध्यान देने की जरूरत बताई गई थी। इनमें लड़के-लड़कियों के चिल्ड्रेन होम, शॉर्ट स्टे होम, सेवा कुटीर, स्पेशल एडॉप्शन एजेंसी, ऑब्जर्वेशन होम शामिल थे। इन संस्थाओं का जिक्र GRAVE CONCERNS– INSTITUTIONS REQUIRING IMMEDIATE ATTENTION के साथ किया गया था। इस रिपोर्ट की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी है।

शुरुआती लीपापोती के बाद इस मामले की जॉंच सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर बताया है कि उसने सभी 17 मामलों की जॉंच पूरी कर ली है। 13 मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी गई है। चार मामलों में सबूत नहीं मिल पाए हैं। हलफनामे में जॉंच एजेंसी ने बताया है कि बच्चों का उत्पीड़न रोकने में सरकारी अधिकारी नाकाम रहे। कुल 71 अधिकारियों के खिलाफ एजेंसी ने कार्रवाई करने की सिफारिश बिहार सरकार से की है। इनमें 25 डीएम हैं। साथ ही 52 एनजीओ और निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। उन एनजीओ पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को भी कहा गया है जिनके नाम रिपोर्ट में दर्ज हैं। मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मुख्य मामले में 14 जनवरी को दिल्ली के साकेत कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने की उम्मीद है।

टिस की रिपोर्ट में मोतिहारी के ब्वायज चिल्ड्रेन होम में भयावह शारीरिक और यौन हिंसा की बात कही गई थी। इसका संचालन ‘निर्देश’ नामक एनजीओ करता था। विवरण आप नीचे पढ़ सकते हैं,

ब्वायज चिल्ड्रेन होम, मोतिहारी को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

इस मामले में दो जिलाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा सीबीआई ने की है। ब्वायज चिल्ड्रेन होम (गया) के मामले में 2 डीएम के अलावा एक अन्य सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। साथ ही चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के सदस्यों सहित 13 लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। डीओआरडी द्वारा संचालित इस ब्वायज होम में महिला कर्मचारी लड़कों से गंदी बातें लिखवाती थीं। इस संस्थान के बारे में टिस की रिपोर्ट में कहा गया था,


ब्वायज चिल्ड्रेन होम, गया को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

टिस की रिपोर्ट में शॉर्ट स्टे होम (पटना) में एक लड़की द्वारा आत्महत्या करने की कोशिश किए जाने का जिक्र था। इसके अलावा बताया गया था कि लड़कियों को कपड़ा, दवाइयाँ वगैरह भी नहीं दी जाती। इसको लेकर एक डीएम और दो अन्य अधिकारी पर कार्रवाई को कहा गया है। तीन संस्थाओं को भी ब्लैकलिस्ट करने की सीबीआई ने सिफारिश की है।

शॉर्ट स्टे होम, पटना को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

शॉर्ट स्टे होम, कैमूर में रहने वाली लड़कियों और महिलाओं ने सोशल ऑडिट के दौरान सुरक्षाकर्मी के यौन दुर्व्यवहार को लेकर शिकायत की थी। उन पर फब्तियाँ कसता था और उनके निजी अंगों को छूने की कोशिश करता था। ग्राम स्वराज सेवा संस्थान की ओर से इसे शॉर्ट स्टे होम का संचालन किया जाता था। इस मामले में 7 डीएम और 11 सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए जाँच एजेंसी ने राज्य सरकार से कहा है।


शॉर्ट स्टे होम, पटना को लेकर टिस की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणी

हलफनामे में जिन चार संस्थाओं के खिलाफ सबूत नहीं मिलने की बात कही गई है, उनमें स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी (मधुबनी), स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी (पटना), स्पेशलाइल्ड एडॉप्शन एजेंसी (कैमूर) और सेवा कुटीर (गया) है। सबूत नहीं मिलने के कारण भले इन मामलों में केस नहीं दर्ज किया गया है, लेकिन जॉंच एजेंसी ने यहॉं भी सरकारी अधिकारियों द्वारा लापरवाही दिखाए जाने की बात कही है। इसको लेकर डीएम सहित कई अधिकारियों और संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

टिस की रिपोर्ट में मोतिहारी बाल गृह में भी यौन शोषण की बात कही गई थी। रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम में शामिल रही अपूर्वा विवेक ने अगस्त 2018 में इस संवाददाता को बताया था कि जब उनकी टीम निरीक्षण करने पहुँची तो छोटे बच्चों ने बड़े बच्चों द्वारा यौन शोषण की शिकायत की थी। टिस की टीम को इस चिल्ड्रेन होम में करीब 25 बच्चे मिले थे। लेकिन, बाद में जब पुलिस जॉंच के लिए गई तो चार बच्चे ही मिले। बाकी बच्चे अन्य सेंटर में भेज दिए गए थे। इस मामले में सीबीआई ने 2 डीएम के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है।

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CAA के समर्थन की ‘सज़ा’: इक़बाल हॉस्टल वालों ने छात्र का सिर फोड़ा, पप्पू यादव की पार्टी पर आरोप

जहाँ एक तरफ सीएए के विरोधी अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोते हैं और लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन को सही ठहराते हैं, वहीं दूसरी तरफ वो ख़ुद विरोधी विचार रखने वाले लोगों के साथ मारपीट करते हैं। ये उनकी असहिष्णुता नहीं है तो क्या है? पटना कॉलेज में एक छात्र को सिर्फ़ इसीलिए पीटा गया, क्योंकि उसने फेसबुक पर नागरिकता संशोधन क़ानून का समर्थन किया था। उसे इतना पीटा गया कि उसका सिर फट गया। फ़िलहाल पटना के पीएमसीएच में उसका इलाज कर रहे हैं। उसे गंभीर चोटें आई हैं।

पीड़ित छात्र ने इक़बाल हॉस्टल के छात्रों पर मारपीट का आरोप लगाया है। उसने बताया कि जब वो परीक्षा देकर लौट रहा था, तब उसपर हमला किया गया। उसका गुनाह सिर्फ़ इतना था कि उसने सीएए के समर्थन में एक फेसबुक पोस्ट लिखा था। पीड़ित छात्र पीयू छात्र संघ के कोषाध्यक्ष पद का प्रत्याशी भी रह चुका है। पिटाई के बाद वो काफ़ी देर तक बेहोश रहा था। पीएसीएच में उसे गंभीर स्थिति में भर्ती कराया गया था।

फ़िलहाल पीड़ित ख़तरे से बाहर है। उसका सिटी स्कैन किया गया है। पटना यूनिवर्सिटी के कैम्पस में इस घटना के बाद तनाव फैला हुआ है। इस घटना को जेएनयू हिंसा से भी जोड़ कर देखा जा रहा है। जेएनयू में हुई हिंसा के बाद पूरे देश में वामपंथियों का गैंग सड़क पर है। बता दें कि जेएनयू में वामपंथियों के एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की जम कर पिटाई की है। हालाँकि, कुछ छात्र इसे आपसी रंजिश भी बता रहे हैं। पीड़ित छात्र राजनीति शास्त्र विभाग में स्नातक थर्ड इयर का छात्र है। उसे कुछ उपद्रवी छात्रों ने पकड़ लिया और गाली गलौज करने लगे। इसके बाद छात्र अमरेश की जमकर पिटाई कर दी।

‘प्रभात ख़बर’ के पटना संस्करण में छपी ख़बर

इक़बाल हॉस्टल के छात्रों पर ख़ूब गाली-गलौज करने का आरोप भी लगा है। पीड़ित छात्र को लाठी-डंडे से पीटा गया। पिटाई के बाद एबीपीवी में काफ़ी गुस्सा है और स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल है। पीड़ित छात्र के बयान के आधार पर तीन लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने ही छात्र को पिटाई के बाद हॉस्पिटल पहुँचाया था, इसीलिए स्थानीय थाना इस मामले को लेकर पहले से ही अवगत है।

छात्रों का आरोप है कि पप्पू यादव की पार्टी ‘जन अधिकार पार्टी’ से जुड़े छात्र संगठन के गुंडों ने इस घटना को अंजाम दिया है। पप्पू यादव की पार्टी के छात्र नेता आज़ाद चाँद ने एबीवीपी के ख़िलाफ़ भड़काऊ पोस्ट डाला था और उनका ‘इलाज करने’ की धमकी दी थी।

हे मार्क्स बाबा के कॉमरेड, ठण्ड का मौसम तुम्हारी क्रांति के लिए सही नहीं है, रजाई में दुबके रहो

मैंने तमाम राजनैतिक विचारधाराओं का गहन अध्ययन किया है। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि राजनैतिक निबंधकारों का सभी जगह स्वागत होता है, चाहे उनके सब चुनाव अनुमान ग़लत ही क्यों ना लगे हों। राजनैतिक चिंतक बीच-बीच में उसी प्रकार चुनाव में भी उतर जाते हैं जैसे फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सुभाष घई अचानक डिंग-डाँग करते हुए रजत पटल पर अवतरित होते थे और उसी चपलता के साथ सारे बुत उठाने का दावा करते हुए ग़ायब होते हैं मानो लपलपाती हुई लालटेन की लौ क्रूर पवन ने बुझा दी हो।

जब चुनाव हारने के बाद शहद और अदरक के पानी से गरारे कर के मृदु स्वर में निस्पृह भाव से ये नरपुँगव मतदाता को गरियाते हुए कॉलर पकड़कर झँझोड़ने का विचार प्रकट करते हैं तो उस स्वर में ऐसा स्नेह होता है कि मनुष्य मात्र का हृदय बोल पड़ता है- जान ले लें ज़ालिम। बहरहाल, कुल जमा निष्कर्ष यह है कि व्यंग्यकारी बड़ी बेगैरती का काम है, इसे इंदिरा जी के बाद से किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। विश्लेषकों का अलग है, फंड मिला तो चुनाव लड़ लिए, हार गए तो पुन: विश्लेषक हो गए। यह सब देख कर मैंने खूब राजनैतिक विचारधाराओं का जम कर अध्ययन किया और जम के गर्म पानी के गरारे लिए।

अपने इस महती अन्वेषण में मैंने पाया कि हर प्रकार का मौसम हर विचारधारा के उपयुक्त नहीं है। इस प्रकिया में मेरा शोध अभी प्रक्रिया में है। मौसम सर्दी का है और आंदोलनों का बाज़ार गर्म है। ऐसे में मैंने सर्दी में समाजवाद पर अध्ययन किया। दिल्ली की ठंड में मैंने रज़ाई में गुड़िमुड़ि होकर इस पर बहुत सघन शोध किया। ठंड में नहाने के प्रति अरुचि होने के कारण मैं आधा वामपंथी तो हो ही गया हूँ। मैंने यह पाया कि सर्दी का मौसम समाजवाद के लिए सर्वथा अनुचित है। वर्तमान में चल रहे आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में वामपंथ और ठंड के मध्य की तार्किक विसंगति स्पष्ट हो जाती है।

प्रथमतया सर्दी का मौसम सड़क पर धरना प्रदर्शन के लिए अनुकूल नहीं होता है। सर्दियों का समय समाजवाद के शीतनिद्रा में जाने के लिए उपयुक्त होता है। समाजवादी सौंदर्यशास्त्र के साथ भी सर्दियाँ ठीक नहीं जाती। एक अच्छा वामपंथी कम नहाया हुआ, दाढ़ी बढ़ाया हुआ, महँगा कुर्ता पहन कर ग़रीबों के लिए व्यथित भाव लिए दिखता है। ठंड में एक संघी भी ऐसा ही दिखने लगता है, और एक आम इंसान और वामपंथी में भिन्नता नगण्य सा रह जाता है। बचा कुर्ता, सो जैकेटों के बोझ के तले कुर्ते का हुस्न यूँ दम तोड़ देता है कि कुर्ताधारी उसे कहता ही रह जाता है- बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे- और ठंड से किटकिटाते दाँतों से एक बोल नहीं फूटता।

सीएए के ख़िलाफ देर रात में प्रदर्शन करते लोगों का फ़ाईल फ़ोटो

सांप्रदायिक सैनिकों का सेनापतित्व स्वत: ही धारण करके कोई वीर, रणबाँकुरा मैदान में उतर भी आए तो दक्षिणपंथी सरकारों की पुलिस मार्क्स का मुक्कों से और लेनिन का लाठी से देने को तत्पर दिखती है। चाय और समोसे, हीर और राँझा, लैला और मजनू के समान ठंड और लट्ठ का ऐसा अतुलनीय मेल होता है कि उसके परिणाम ऐतिहासिक होते हैं। ऐसे में कॉमरेड मित्रों के पास इसके अतिरिक्त कोई मार्ग बचता नहीं है कि वे ओजस्वी भाषणों द्वारा धर्म की अफ़ीम के नशे में डूबे सैनिकों को ओजस्वी भाषणों का च्यवनप्राश दे कर टीवी चैनलों की ओर निकल लें और मूँगफली खाते हुए सड़क पर होते दँगों को बहस-मुबाहिसों, संपादकीय लेखों के माध्यम से वैचारिक क्रांति का रूप दें।

किसी पिटते हुए युवा के चित्र को या किसी फेरेक्स की चाह में दुखी बालक और टीवी कैमरे की चाह में दुखी उसकी माता को आंदोलन का चेहरा बना कर संवेदना का संचार करें ताकि जनता जलती बसों, ट्रेनों और तमाम विध्वंस को भूल जाएँ, और एक ग्लानि के साथ कहें कि हाँ, धिक्कार है इस लोकतंत्र पर जो इन उद्वेलित हृदयों के आक्रोश को मार्ग देने के लिए चार अतिरिक्त गाड़ियाँ और दो अतिरिक्त ट्रेनें ना उपलब्ध करा सका। वामपंथी आँदोलनस्थल पर पैदल सैनिकों को उत्साह देकर अपने लेखों- भाषणों से ऐसा माहौल खींचता है मानो सरकारी बसें संविधान की रक्षकों उतरे सेनानियों को देख स्वयं बोल उठीं हों कि हे सखि, ऐसे क्रांति के समय में क्या यह धर्मसंगत होगा कि हम अपने स्पीड गवर्नर को धता बताते हुए निकल पड़े जब कि मुख्यमंत्री ही गवर्नर को भाव नहीं दे रहे हैं। हे सखी, क्यों ना हम आत्मदाह ही कर लें।

कॉमरेड जनता को समझा ही लेते हैं कि यह धर्मनिरपेक्ष शाँतिपूर्ण आंदोलन है। यह शुक्रवार को उग्र रूप सिर्फ़ इसलिये पकड़ लेता है क्योंकि माँ संतोषी के भक्त आज कल काफ़ी उग्र रहते हैं। अन्यथा कोई कारण नहीं है। परंतु संघर्ष स्थल से दूर होने के अपरिहार्य संकट आंदोलन के खिंचने की स्थिति में उभरने लगते हैं। जिन्हें धर्म युद्ध बता कर कॉमरेड धरना स्थल में बिठा कर कट लिए होते हैं, वे सैनिक भी उनके प्रचार से चिंतित हो उठते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं शर्मा जी के बेटे का विवाह के नेग के ग्यारह रुपए हम ग़लत पंडाल में घुसकर वर्मा जी के बेटे को थमा आए? ठंड के समय एक और संकट होता है कि अवकाश और त्योहारों का मौसम होता है। विदेश यात्राओं का भी संयोग इसी काल में बनता है।

जब शाहीन बाग में ठिठरता आंदोलनकारी शैम्पेन ले कर नववर्ष मनाते कॉमरेड को देखता है तो भड़क उठता है। व्याकुल हृदय कह उठता है कि भाड़ में गए तुम्हारे मार्क्स बाबा, अब तो सब बुत उठाए जाएँगे। सहसा ही युद्ध क्षेत्र में तख्ता पलट जाता है। कॉमरेड जब इंस्टाग्राम पर रेसिस्टेंस के फ़ोटो अपनी बिल्ली का आलिंगन लेते हुए डाल कर ठहरते हैं तो पाते हैं कि आंदोलन भूमि में विद्रोह हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता का तंबू जो वे आंदोलनकारियों पर तान के फ्राँस गए थे, उसे चीर कर धार्मिक कट्टरता के संकेत निकल रहे हैं। महीनों खींचे संवैधानिक संघर्ष की मारीचिका जब छँटती है तो समाजवादी बँधु की स्थिति ठंड की भोर में शॉवर के नीचे धकेले उस व्यक्ति की सी हो जाती है जो निर्वस्त्र होकर पाता है कि गीज़र तो चालू ही नहीं था। अब उसके पास इसी ठंडे पानी में नहाने के अलावा कोई चारा नहीं है।

दिल्ली के शाहीन बाग में देर रात पुलिस कार्रवाई के विरोध में बैठे आंदोलनकारियों का फ़ाईल फ़ोटो

इस शोध का निष्कर्ष यही है कि सर्दियाँ समाजवाद के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है। समाजवादियों को जाड़े में मार्क्स बाबा की पुस्तक और बुड्ढे बाबा का गिलास लेकर रज़ाई में रहना चाहिए। प्रिय कॉमरेडों के लिए संघर्ष का शुभ समय ग्रीष्म ऋतु है। अत: हे कॉमरेड, तुम अपने होस्टलों के और कान्फ्रेंस हॉलों के गर्म कमरों में सिधारो और पुन: पोस्टर ले कर तब प्रकट हो जब शीत लहर पलायन पर हो। सर्दियों में समाजवाद पर तब तक मेरा शोध पूर्ण हो कर प्रकाशित हो चुका होगा और मैं एक महान नेता के रूप में तुम्हें पथभ्रमित करने को उपलब्ध हो जाऊँगा।

मैं तब गरारे कर करके तुम्हारे पक्ष में नैरेटिव बुनूँगा और तुम वीर सेनापति की भाँति अपनी सेना का नेतृत्व करना। तुम देखना मैं एक चुनावी चिंतक बन कर उभरूँगा और बीच-बीच में डिंग-डाँग करते हुए चुनाव भी लड़ ज़ाया करूँगा और चुनाव हार कर पुन: निष्पक्ष चिंतक बन ज़ाया करूँगा। एक डूबते हुए व्यंग्यकार के कैरियर की रक्षा के लिए आवश्यक है, हे कॉमरेड, कि तुम सर्दियों में बाहर आने से परहेज़ रखो और हमारे महान लेनिन के महान आंदोलन की सार्वजनिक का-का-छी-छी ना होने दो।

JNU पर वामपंथियों का रवीश ने किया बचाव: अजीत भारती का वीडियो | Ravish ignores Left involvement in JNU violence

रवीश कुमार ने वामपंथियों का जम कर बचाव किया और ABVP, दिल्ली पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठाए। साथ ही ऐसी बातें कीं जैसे कि 5 जनवरी से पहले वहाँ कुछ हुआ ही नहीं!

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

योगी की राह चला JNU प्रशासन: दंगाई छात्रों से वसूल कर होगी विवि को हुए नुकसान की भरपाई

जेएनयू हिंसा मामले में जहाँ एक तरफ़ पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है, वहीं दूसरी तरफ दंगाइयों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन भी सख्त हो गया है। जेएनयू के कुलपति एम जगदीश कुमार ने रविवार (जनवरी 5, 2020) को हुई हिंसा की वारदात पर बयान देते हुए कहा कि वो छात्रों को छात्रों के रूप में ही देखते हैं, ये नहीं देखते कि कौन किस राजनीतिक गुट से जुड़ा हुआ है। जेएनयू में वामपंथी गुंडों ने एबीवीपी के छात्रों को खोज-खोज कर पीटा। पत्थरबाज उपद्रवियों ने डंडों से छात्रों को मारा। हॉस्टल रूम के गेट तोड़ डाले गए। इसके बाद वामपंथियों ने ख़ुद को पीड़ित बताते हुए बचने का प्रयास किया।

वामपंथी छात्र कुलपति का इस्तीफा माँग रहे हैं। उनका कहना है कि कुलपति ने उन्हें बचाने के लिए कुछ नहीं किया। जगदीश कुमार ने कहा कि जेएनयू को गहन चर्चाओं और विचार-विमर्श के लिए जाना जाता है। उन्होंने हिंसा की वारदात को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने बताया कि इस बात की जाँच हो रही है कि हमलावर बाहर आए आए या नहीं। उधर रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने जानकारी दी कि उपद्रवियों ने विश्वविद्यालय की संपत्ति को जम कर नुकसान पहुँचाया है। उन्होंने कहा कि चीजों को तहस-नहस कर डाला गया है।

रजिस्ट्रार ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि जो भी छात्र इन दंगों में शामिल थे और जिन्होंने भी जेएनयू की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है, उन्हें चिह्नित करके इस नुकसान की भरपाई की जाएगी। रजिस्ट्रार ने कहा कि दंगाई छात्रों से ही रुपए वसूल कर नुकसान की भरपाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी एक ‘फ्री स्पेस’ है, जहाँ छात्रों की गतिविधियों पर कोई लगाम नहीं लगाया गया है। उन्होंने कहा कि वो ये नहीं देख रहे कि कौन से छात्र किस गुट के थे। बकौल प्रमोद कुमार, पुलिस की जाँच के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।

जेएनयू प्रशासन ने बताया है कि मंगलवार (जनवरी 7, 2020) से रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया फिर से शुरू हो गई है और इस बार सबकुछ शांतिपूर्ण माहौल में हो रहा है। जेएनयू प्रशासन ने कहा कि अधिकतर छात्र ऐसे हैं, जो पठन-पाठन के कार्य में भाग ले रहे हैं और वो अकादमी कैलेंडर के अनुसार चल रहे हैं। लेकिन, कुछ छात्रों ने उन्हें बाधा पहुँचाने के उद्देश्य से हंगामा किया। बता दें कि यूपी में भी योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दंगाइयों से वसूली कर के सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करने का फैसला किया था। इस फ़ैसले पर अमल भी किया जा रहा है।

NY टाइम्स ने JNU हिंसा पर कहा- लगाए गए थे ‘जय श्रीराम’ के नारे, जावड़ेकर ने कसा तंज- यही हैं सच्चे राम भक्त

फाइनेंशियल टाइम्स के बाद रविवार (जनवरी 5, 2019) को जेएनयू हिंसा पर टुच्ची और निराधार रिपोर्टिंग करने के लिए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आज न्यूयॉर्क टाइम्स का भी सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाया। अपनी रिपोर्ट में एबीवीपी को आरोपित बताकर न्यूयॉर्क टाइम्स वे दावा किया कि विश्वविद्यालय के मुताबिक छात्रों के साथ मारपीट करने वाले लोग एक हिंदू समूह से थे। जबकि वास्तविकता में विश्वविद्यायल अपने प्रेस नोट में ये बात साफ कह चुका है कि विश्वविद्यालय में अराजकता फैलाने वाले छात्र वे थे, जो सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन का विरोध कर रहे थे। इसके अलावा इस रिपोर्ट में बिना किसी जाँच-पड़ताल के ये भी कहा गया कि हमला करने वाले छात्र ‘जय श्री राम’ चिल्ला रहे थे।

हालाँकि, इस रिपोर्ट के सोशल मीडिया पर शेयर होते ही, भारतीय यूजर्स ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स को खूब लताड़ा। लेकिन, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस बार न्यूयॉर्क टाइम्स को व्यंग्यात्मक लहजे में जवाब दिया। प्रकाश जावड़ेकर ने अभिनव प्रकाश नाम के यूजर की प्रतिक्रिया को अपने अकॉउंट से शेयर किया। जिसमें अभिनव ने न्यूयॉर्क टाइम्स के ‘जय श्रीराम’ वाले बिंदु का मजाक उड़ाते हुए लिखा था कि जिसे भारत के किसी पत्रकार ने नहीं सुना, उसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने सुना। हैरानी नहीं होती कि आखिर इनके राष्ट्रपति ही इन्हें फेक न्यूज फैलाने वाला क्यों कहते हैं।

अभिनव के इस ट्वीट को शेयर करते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने व्यंगात्मक लहजे में कहा कि ऐसा लगता है न्यूयॉर्क टाइम्स में ही भगवान राम के सबसे ज्यादा भक्त हैं। जो हर जगह राम को ढूँढ लेते हैं।

इसके बाद, उन्होंने गंभीर होते हुए कहा कि अब वे ननकाना साहिब में हुई हिंसा और धार्मिक रूप से प्रताड़ित किए गए लोगों पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ग्राउंड रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। ताकि जान सकें कि उन्होंने (न्यूयॉर्क टाइम्स) वहाँ कौन से नारे सुने?

गौरतलब है कि इससे पहले अभी बीते दिन ही प्रकाश जावड़ेकर ने विदेशी मीडिया फाइनेंशियल टाइम्स को लताड़ लगाई थी। क्योंकि फाइनेंशियल टाइम्स ने भी रविवार को जेएनयू मेंं हुई हिंसा को कवर करते हुए पूरी खबर को नया एंगल देने का प्रयास किया था और हेडलाइन में दंगा करने वालों के लिए उपद्रवी भीड़ (Rowdy Mob), हिंसक भीड़ (Violent MOB), दंगाइयों (Rioters) की भीड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने की बजाय ‘उत्पातियों’ को ‘राष्ट्रवादियों (nationalist)’ की भीड़ बताया था।

‘UP में हिंसा के लिए वित्तीय मदद कर रही हैं प्रियंका गाँधी’

सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ यूपी में दंगे भड़काने वाली भीड़ का कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय महिला सचिव प्रियंका गाँधी द्वारा लगातार बचाव किया जा रहा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने उनपर बड़ा बयान दिया है।

दरअसल, ईकाई अध्यक्ष ने कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर प्रदेश में हिंसा फैलाने के लिए वित्तीय मदद करने का आरोप लगाया है। स्वतंत्र देव सिंह का कहना है कि प्रियंका गाँधी प्रदेश में हिंसा भड़काने के लिए दूसरे प्रदेशों के दंगाइयों को ला रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा नेता ने बरेली में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अपना बयान दिया। उन्होंने कहा, “प्रदेश में पिछले तीन साल से शांति थी और मैं पूछना चाहता हूँ कि प्रियँका यहाँ दंगा क्यों कराना चाहती हैं? वह यह मध्य प्रदेश या राजस्थान में क्यों नहीं करतीं? वह हिंसा के लिए वित्तीय मदद कर रहीं और दूसरे राज्यों से दंगाइयों को ला रहीं है और शांति भंग करने के लिए उनसे पत्थरबाजी करवा रही हैं।”

स्वतंत्र देव सिंह ने इस दौरान नागरिकता संशोधन कानून को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने कहा, “अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक प्रताड़ित हो रहे थे, लेकिन ना ही नेहरू और न ही मनमोहन सिंह सरकार ने ये कानून लागू किया। पहली बार ऐसा हुआ जब राजनीतिक नेताओं ने ये बड़ा फैसला किया।”

उन्होंने कहा कि अब नागरिकता संशोधन कानून के जरिए अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी, जिससे वह सम्मानजनक जीवन जी सकें। उन्हें पीएम आवास योजना के तहत घर और अन्य योजनाओं का लाभ मिल सके।

ईकाई अध्यक्ष ने सीएए का मतलब समझाते हुए विपक्ष के दावों को खारिज किया और जनता को कहा कि भारतीय मुस्लिम की नागरिकता छीनना नहीं है। उन्होंने आगे कहा, “यहाँ तक कि राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और उन्हें भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए। लेकिन समाजवादी पार्टी को अपने संस्थापक के शब्द याद नहीं, क्योंकि उनके नेता सिर्फ पारिवार के लिए राजनीति करना चाहते हैं।”

JNU में वामपंथी छात्रों का समर्थन करने पहुँचीं दीपिका पादुकोण, मुंबई का फ़िल्मी गैंग भी सड़क पर

फ़िल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने भी जेएनयू हिंसा को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। मुंबई में दीया मिर्ज़ा, अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज सहित कई फ़िल्मी हस्तियों ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। बावजूद इसके कि जेएनयू प्रशासन ने जेएनयू छात्र संगठन की अध्यक्ष आइशी घोष सहित 19 छात्रों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है। दीपिका पादुकोण ने कहा कि उन्हें इस बात से गर्व होता है कि आज लोग बिना डरे अपनी आवाज़ रख रहे हैं। दीपिका के विरोध प्रदर्शन में देखे जाने के बाद कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की।

फ़िल्मी हस्तियाँ लगातार वामपंथी गुंडों को बचाने में लगी है। फ़िल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने तो भाजपा को ही आतंकवादी संगठन करार दिया। कश्यप ने पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को आतंकवादी बताया था। दीपिका पादुकोण ने अब तक इस मामले में चुप्पी साध रखी थी लेकिन अब जेएनयू विरोध प्रदर्शन में उन्होंने भाग लिया है। दीपिका पादुकोण की ‘छपाक’ रिलीज होने जा रही है, जिसमें उन्होंने एक एसिड अटैक पीड़िता का किरदार निभाया है।

जेएनयू हिंसा मामले में लगातार कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। वामपंथी गुंडों के ख़िलाफ़ एक के बाद एक सबूत आ रहे हैं। बावजूद इसके बॉलीवुड का वामपंथी गैंग एबीवीपी पर हिंसा का इल्जाम डाल कर वामपंथी गुंडों को बचाने में प्रयासरत है।

पीएम मोदी के अंधविरोध में बॉलीवुड के लोगों ने जेएनयू के असली गुनहगारों के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोला। अब देखना यह है कि जेएनयू विरोध प्रदर्शन के नाम पर वामपंथी अजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे फ़िल्मी गैंग की अगली प्रतिक्रिया क्या रहती है।

बुर्क़ा होता है मुस्लिम महिला की पहचान, घूँघट से रहती है हिंदू महिला परेशान: BBC की बिग BC

बीते दिनों से शाहीन बाग पर मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में हुआ विरोध प्रदर्शन काफी चर्चाओं में रहा। इस बीच कई मीडिया संस्थान ऐसे दिखे जिन्होंने धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाओं के ऊपर अपनी लगातार कवरेज की और उन्हें SHEORES बनाकर उभारा। सोशल मीडिया पर भी इन महिलाओं को नारी सशक्तिकरण का असली चेहरा बनाकर पेश किया गया। इसी क्रम में अपनी अजेंडापरस्त पत्रकारिता के लिए मशहूर बीबीसी ने कल अपनी एक रिपोर्ट की।

हालाँकि, बीबीसी ने रिपोर्ट में क्या लिखा? इस पर चर्चा करने से पहले ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीबीसी ने अपनी पूरी रिपोर्ट किसके पक्ष में और क्या एंगल रखकर की होगी… लेकिन फिर भी बता दें कि शाहीन बाग पर कवरेज करते हुए बीबीसी ने इस बार इस प्रोटेस्ट का समर्थन कर रही महिलाओं के हिजाब और बुर्के को केंद्र रखा। साथ ही आर्टिकल को हेडलाइन दी गई- “CAA: मुस्लिम लड़कियों का आंचल बना परचम, क्या हैं इसके मायने?”

बीबीसी की खबर

लेख की शुरुआत मजाज की लिखी पंक्तियों से हुईं- “तेरे माथे पर ये आंचल ख़ूब है लेकिन तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।” इसके बाद लेख में बताया गया कि इन पंक्तियों को महिलाएँ अलग-अलग प्रदर्शन में गा रही हैं और पुलिस की क्रूरता के सामने तनकर खड़ी हैं। प्रदर्शन में मुस्लिम महिलाओं के योगदान को, उनकी प्रदर्शन के प्रति प्रतिबद्धता को उभारा गया और साथ ही उनके बुर्के-हिजाब पर भी बात हुई। अपने लेख और उसकी हेडलाइन में बीबीसी ने जिस बखूबी से उन्होंने बुर्के और हिजाब को घुसाया, वो देखने वाला है। बीबीसी लिखता है- “अपने हिजाब और बुर्के में वे (मुस्लिम महिलाएँ) पहचान की राजनीति के ख़िलाफ़ भी संघर्ष कर रही हैं।” इसके बाद आगे सारी बात और कुछ एक मुस्लिम महिलाओं के सीएए के ख़िलाफ़ विचार….

यहाँ गौर देने वाली बात है कि हिजाब और बुर्के से जोड़कर मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष पर अपना लेख लिखने वाला बीबीसी अक्सर हिंदुओं की घूँघट प्रथा का पुरजोर विरोधी रहा है। लेकिन, मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन की बात आते ही, वे यहाँ उन्हें बुर्के या हिजाब से आजाद होकर सामने आने की सलाह नहीं दे रहा। बल्कि मजाज की पंक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उन्हे इस बंधन के साथ ‘लड़ने’ के लिए उकसा रहा है।

गौरतलब है कि बीबीसी की रिपोर्ट्स में हिंदू बनाम मुस्लिम ध्यान रखते हुए एकतरफा पत्रकारिता का फर्क़ पहली बार नहीं झलक रहा। बल्कि यदि बीबीसी की वेबसाइट पर जाकर सर्च बॉक्स में इन दोनों (घूँघट और बुर्का/हिजाब) शब्दों को टाइप किया जाए तो इनके इस पूरे अजेंडे का खुलासा होता है।

बीबीसी की वेबसाइट पर केवल दो कीवर्ड्स डालने के बाद फिल्टर होकर सामने आई खबरों के मात्र टाइटल भर से पता चल जाता है कि बीबीसी के लिए ‘घूंघट’ का तो पर्याय हिन्दू महिलाओं के विकास में बेड़ियों का चेहरा है। जबकि मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का या हिजाब उनकी पहचान है, उनका अधिकार है। जिसे लेकर यदि वे आगे बढ़ने का सफर तय करती हैं, तो वे उसे उपलब्धि की तरह अपनी खबरों में जगह देते हैं। जैसे- ‘पुणे में हिजाब वाली क्रिकेटर्स’, ‘हिजाब वाली महिलाओं का खास सैलून’, ‘हिजाब वाली बाइकर’ आदि-आदि।

बीबीसी में घूँघट बनाम हिजाब पर पत्रकारिता में फर्क़

आधुनिकता के इस दौर में जहाँ निस्संदेह ही हर समुदाय की महिला को अपनी पहचान बनाने के लिए अपने स्तर पर संघर्ष करना पड़ रहा है। वहाँ हिंदू महिलाओं के लिए घूंघट और मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का/हिजाब दोनों ही कुरीतियों और बंधनों का प्रतिबिंब है। जिसे उनके जीवन का अहम हिस्सा बनाकर ऐसे रचा-बसा दिया गया है कि वो चाहकर भी इससे उभर नहीं पा रहीं।

लेकिन, फिर भी यदि आज के समय में देश के कई हिस्सों मे देखा जाए तो मालूम चलेगा कि हिंदू महिलाएँ धीरे-धीरे घूँघट के बंधन को नकार रही हैं। मगर, मुस्लिम महिलाओं का पढ़ा-लिखा तबका अब भी बुर्के और हिजाब को अपनी निजी पसंद कहकर बढ़ावा दे रहा हैं। जिसका हालिया उदाहरण न केवल शाहीन बाग के प्रदर्शन में बैठी घरेलू मुस्लिम महिलाओं के रूप में देखने को मिला, बल्कि जामिया मिलिया इस्लामिया में हुए प्रदर्शन में शामिल छात्राओं के रूप में भी सामने आया।

गौरतलब है कि ऐसी स्थिति में बीबीसी जैसे मीडिया संस्थान, घूँघट और हिजाब पर अपनी अलग-अलग पत्रकारिता कर दोनों समुदायों के बीच समझ की, परिवेश की, अधिकारों की एक गहराई खाईं निर्मित कर रहे हैं। जिसमें शेष हिंदू महिलाएँ तो बढ़ते समाज में अपने विवेक-अपनी बुद्धि के आधार पर सही-गलत को चुनकर बाहर निकलने में सक्षम हो जाएँगी। लेकिन मुस्लिम महिलाएँ, इसे हमेशा अपनी आन-बान-शान समझकर धँसती जाएँगी। वे इस हिजाब को अपनी पहचान बनाकर हमेशा ओढ़े रहेंगी और कट्टरवादियों द्वारा गढ़े समाज में मजहब के नाम पर इनका बचाव भी करेंगी।

सोचिए! एक ओर जहाँ नारी सशक्तिकरण के नाम पर गई जगह अभियान चलाकर महिलाओं को घूँघट से आजादी दिलवाई जा रही है। वहीं, नाइकी जैसी बड़ी कंपनी अपना फायदा साधने के लिए बाजार में मुस्लिम एथलीटों के लिए हिजाब उतार रही हैं और उन्हें अपनी ओर आकर्षित भी कर रही हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि बीबीसी की तरह नाइकी और अन्य कंपनियाँ जानती हैं कि जिन मजहबी ठेकेदारों ने उन्हें बुर्के और हिजाब में बाँधा है, वे उसके बिना न तो उन्हें खुली हवा में सांस लेने देंगे, न बतौर खिलाड़ी दौड़ने देंगे और न ही शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन करने देंगे।