तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर पिछले दिनों इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गए थे। असल में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन के दौरान मजहबी नारे लगाए जाने को लेकर थरूर ने कह दिया था कि हिंदुत्ववादी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई का फ़ायदा इस्लामिक कट्टरपंथी न उठा पाएँ, इसका ध्यान रखना होगा। यह बात कट्टरपंथियों को बेहद नागवार गुजरी थी।
अब संतुलन बनाने की अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन करते हुए थरूर ने हिंदुत्व को नीचा दिखाने की कोशिश की है। एक इंफोग्राफिक के जरिए उन्होंने यह ‘समझाने’ की कोशिश की है कि हिंदुइज्म और हिंदुत्व समान नहीं है। लेकिन, अपने इस दॉंव में थरूर खुद उलझ गए।
इंफ्रोग्राफिक्स के चौथे प्वाइंट में थरूर ने कहा है कि हिंदुइज्म बहुलतावाद में विश्वास करता है जबकि हिंदुत्व के साथ ऐसा नहीं है। वह समावेशी नहीं है। थरूर ने कहा कि इस मायने में हिंदुत्व इस्लाम और ईसाइयत की तरह है। इस्लाम और ईसाइयत भी बदलाव के हक में नहीं हैं। लेकिन, हिंदुत्व को नीचा दिखाने की कोशिश में उन्होंने इस्लाम और ईसाइयत को भी नीचा दिखा दिखा दिया।
जाहिर है ‘लिबरल’ इससे खुश नहीं हुए।
Don’t dare to drag Islam and Christianity to explain your filth. It’s your shit, own it. https://t.co/l5MV3wKkzZ
हालॉंकि थरूर ने यह नहीं बताया कि वह कौन सी बातें हैं जो लिबरल हिंदुइज्म के बारे में छिपाते हैं। आप यहॉं हिंदुत्व और हिंदुइज्म को लेकर लिबरल गिरोह के प्रोपेगेंडा को समझ सकते हैं।
पिछले दिनों जेएनयू में आंदोलनों और विरोध के नाम पर हुए हिंसक प्रदर्शनों ने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले तो जेएनयू में लगे ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारों ने यहाँ रहने वाले देशद्रोहियों की पहचान कराई थी। लेकिन हाल ही में सीएए के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसक घटनाओं ने यहाँ रहने वाले ‘दंगाइयों’ की पहचान करा दी है।
साथ ही इस बीच जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में एक प्रचलन तेज़ी से उभरा है। जिसमें पहले तो कैंपस में मौजूद मासूस छात्र-छात्राओं की भीड़ को इकठ्ठा किया जाता है और फिर उस भीड़ को हिंसा पर उतारू करने के लिए सुनियोजित तरीके से बरगलाया जाता है। यह कार्य उन तथाकथित और टुटपुंजिए छात्र नेताओं द्वारा किया जाता है जो अपने साथ विरोध प्रदर्शनों में भीड़ इकठ्ठा करने वाले ठेकेदार का तमगा लिए घूमते हैं। अब सवाल खड़ा होता कि यह सब जेएनयू में ही क्यों तो ध्यान में आता है कि पूरे देश से समाप्ति की ओर बढ़ रहे वामपंथियों को साँस लेने की जगह एकमात्र सिर्फ जेएनयू में ही बची है। कहने को तो यहाँ देशहित में भी बहुत सी गतिविधियाँ चलती हैं लोकिन वह किसी को दिखाई नहीं देतीं। दिखाई देता है तो यहाँ सिर्फ हर महीने किसी न किसी को लेकर विरोध-प्रदर्शन और फ़िर उसके नाम पर सड़कों पर उतरकर हिंसा।
देश में विश्वविद्यालयों की स्थापना इसलिए की जाती है कि देश का युवा उसमें उच्च शिक्षा ग्रहण कर सके और ऐसे संस्थानों में विभिन्न कोर्सों की फीस भी इसलिए कम से कम रखी जाती है कि ग़रीब से ग़रीब का बच्चा उसकी ज़द में आकर अपने सपनों को साकार कर देश के सुनहरे भविष्य को गढ़ सके। लेकिन आज देश के उच्च और प्रमुख शिक्षण संस्थान ही वामपंथियों, देशद्रोहियों और अब भीड़ इकठ्ठा करने वाले ठेकेदारों का गढ़ बनते जा रहे हैं। यह सब कोई बीते ज़माने की बात नहीं बल्कि कुछ वर्षों के भीतर ही हमने यह सब होते हुए देखा है।
देश में एक नहीं बल्कि सैकड़ों विश्वविद्यालय हैं जिनमें से किसी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने तो सीएए के खिलाफ़ शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन किया तो किसी के छात्र-छात्राओं ने सीएए के समर्थन में रैली निकाली। लेकिन इनमें से 3 से 4 ही ऐसे विश्वविद्यालय थे जिनमें हिंसक प्रदर्शन हुए। जहाँ विरोध के नाम पर मजहबी नारे लगाए गए। इस बात की जानकारी खुद गृहमंत्री अमित शाह ने एक मीडिया चैनल के कार्यक्रम में दी। जिसमें अमित शाह ने बताया कि देश भर में 224 विश्वविद्यालय हैं जिसमें अगर निजी विश्वविद्यालयों को जोड़ दिया जाए तो यह आँकड़ा 300 के पार हो जाता है। इनमें से 22 विश्वविद्यालय ऐसे हैं जिनमें अपने-अपने तरीके से प्रदर्शन हुआ। लेकिन इनमें से 4 विश्वविद्यालयों में गंभीर और हिंसक प्रदर्शन हुए। जिसमें जामिया मिलिया इस्लामिया, जेएनयू, एएमयू और लखनऊ के नदवा कॉलेज और इंटीग्रल विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से शामिल है।
विरोध के नाम पर जेएनयू में की गई तोड़फ़ोड़ की एक तस्वीर
अब सवाल यह खड़ा होता है कि देश में जब 300 से अधिक विश्वविद्यालय हैं तो इन चार विश्वविद्यालयों में ही क्यों बात बे बात पर हिंसक प्रदर्शन हुए। क्या मान लिया जाए कि यहाँ पढ़ने वाले लोग ज़्यादा विचारवान है या ज़्यादा जागरुक हैं या फिर मान लिया जाए कि यहाँ के लोग पढ़ाई के नाम पर कुछ और ही करते हैं। यह तो आप खुद ही तय करें। क्योंकि यह बात किसी से छिपी नहीं कि देश की संसद पर हमला करने वाले अफ़जल गुरु को फाँसी देने के बाद सबसे पहले उसके समर्थन में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ही मार्च निकाला गया था। यह भी सब जानते हैं कि देश की सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय एएमयू से पढ़ने के बाद मन्नान वानी कैसे आतंकवादी बनता है और अपने ही देश के ख़िलाफ ऐके-47 उठाता है। यह भी सब जानते हैं कि वह जेएनयू ही है जहाँ कितने अफ़जल मारोगे हर घर से अफ़जल निकलेगा, और भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह… इंशा अल्लाह के नारे लगाए गए थे।
लेकिन दुख तब होता है कि जब देश के ऐसे उच्च संस्थानों में आंदोलनों के नाम पर हिंसक प्रदर्शन किए जाते हों और शिक्षा के नाम पर उसमें अड्डा जमाकर देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाए जाते हों। यह सब यहीं खत्म नहीं होता। एक सवाल इसके आगे भी जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकता है। वह यह कि इन घटनाओं में एक वर्ग तो वह होता है जो सुनियोजित ढंग से शामिल होता है और एक वर्ग वह होता है जो कि जाने-अनजाने में घटनाओं में शामिल तो हो जाता है लेकिन इसके बाद कानूनी कार्यवाई में फँसने के बाद वह अपने आप को निर्दोष बताते हुए पहले तो दर-दर की ठोकरें खाता है और फ़िर अपनी ही आँखों से अपने भविष्य को चौपट होते हुए भी देखता है।
अब बात आती है कि वह कौन छात्र होते हैं जो इतनी आसानी से विरोध के नाम पर हो हल्ला करते हुए पहले तो सड़क तक आते हैं और फ़िर वह छात्र सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाते हुए हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर याद करें तो कुछ ऐसे ही छात्रों की एक भीड़ दिल्ली में गाँधी परिवार से एसपीजी हटाने के विरोध में देखने को मिली थी। जो गाँधी परिवार से एसपीजी हटाने का विरोध तो कर रही थी लेकिन इन विरोध करने वाले अधिकांश छात्रों को ये नहीं पता था कि वह विरोध आख़िर किसका कर रहे हैं और वह वहाँ क्यों इकठ्ठा हुए हैं। इस बात का खुलासा तब हुआ था कि जब एक टीवी पत्रकार ने उनसे पूछा था कि वह किसका विरोध कर रहे हैं और उनकी माँगे क्या हैं।
इस बीच एक छात्र ने तो यहाँ तक कह दिया हमें अपनी सुरक्षा चाहिए और हमें नौकरी भी। हम इसलिए यहाँ आए हुए हैं। वहीं जब वहाँ विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं से पूछा गया कि एसपीजी का पूरा नाम क्या है तो अधिकांश छात्राऐं अपने चेहरे को छिपाती हुई नज़र आईं। खैर, सोचने वाली बात यह कि विश्वविद्यालय में दूर शहरों से पढ़ाई करने के लिए आए छात्र आख़िर कैसे हज़ारों की संख्या में इकठ्ठा हो जाते हैं। वास्तव में ये छात्र विरोध प्रदर्शन के लिए ही हॉस्टल से बाहर आते हैं या फ़िर इसके पीछे का मदसद कुछ औऱ ही होता है? अग़र इनको विरोध ही करना था तो ये छात्र शांतिपूर्ण तरीके से ही सरकार की नीतियों के ख़िलाफ में अपना विरोध जता सकते थे।
जेएनयू में फीस वृद्धि को लेकर हो रहे विरोध में शामिल छात्रों की भीड़ (फ़ाईल फ़ोटो)
लेकिन, विरोध के नाम पर की गई हिंसा किसी दूसरी ओर इशारा करती है। वह यह कि जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थान में कुछ ऐसे ठेकेदार पैदा हुए हैं जो कि भीड़ इकठ्ठा करने का काम करते हैं। यह काम वह किसी समाज सेवा के लिए नहीं बल्कि इसके लिए करते हैं कि वह कैंपस के उभरते हुए तथाकथित छात्र नेता कहला सकें। जिसके बाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्र इन तथाकथित नेताओं के चुंगल में आ जाते हैं। वहीं ये तथाकथित नेता सीधे-साधे छात्रों का फ़ायदा उठाकर उनको भलीभाँति उकसाने और बरगलाने का काम करते हैं। आख़िर देश का भविष्य किस ओर जा रहा है। यह बेहद चिंता का विषय है।
ब्रेव स्टोरी कहेंगे! एसिड अटैक विक्टिम जैसे विषय को छूने के लिए हिम्मत चाहिए। ऐसे विद्रूप चेहरे के साथ पर्दे पर आना अपने आप में एक बेहतरीन जज्बा है। दीपिका पादुकोण को सलाम!
कुछ विषय ऐसे होते हैं जो अपनी पूर्णता में ही प्रतिफलित हों, तभी उनके साथ न्याय हो पाता है। जैसे कि आप किसी जघन्य बलात्कार पीड़िता की कहानी कह रहे हों, तो उसके लिए फिल्ममेकिंग से ले कर, पर्दे पर आने तक और कई बार उसके बाद भी, आप उस विषय के साथ जो भी करते हैं, वो सोच-समझ कर करना होता है।
हमारा समाज ऐसा है कि रूपा गांगुली को सिगरेट पीता नहीं देख पाता और नितीश भारद्वाज को जहाँ देखता, वहीं प्रणाम करने लगता है। यहाँ हम जो विषय उठाते हैं, जो कहानी कहते हैं, और अगर सोच शुद्ध हो तो फिर उसमें छठ के पारण जैसी तन्मयता चाहिए।
सोचिए उस एसिड अटैक विक्टिम के बारे में अब। सोचिए कि दीपिका के एक गलत कदम (विषय के लिए गलत, फिल्म के लिए मास्टरस्ट्रोक) से उन तमाम लोगों को कैसा लग रहा होगा जिसने इस विषय को ले कर उम्मीद बनाई थी। ये एक राजनैतिक विषय नहीं है। ये घोर सामाजिक विषय है।
दीपिका को स्पाइस पीआर की टीम ने कहा कि आपको बस खड़े होना है, पोस्टर पहले से तैयार थे: ‘हीरो इन रील लाइफ़, हीरो इन रीयल लाइफ़’ लिख कर। ट्वीट फ्रेम किए जा चुके थे। दीपिका वहाँ पहुँचती है, इधर ट्विटर पर घंटे भर के भीतर, एक ही टेक्स्ट और पोस्टर के साथ अचानक ‘सपोर्ट दीपिका’ ट्रेंड होने लगता है।
इस सबमें एसिड अटैक गायब हो जाता है। अब वहाँ बस एक फिल्म बची है जिसका प्रमोशन होना चाहिए। जब आप ‘हीरो’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो आपको ध्यान रहना चाहिए कि किसके लिए कर रहे हैं। देखिए कि दीपिका वहाँ जले चेहरे वाली कहानी कहने गई है, या बस कहानी कहने गई है।
मैं ये नहीं कह रहा कि फिल्म वाले प्रमोशन न करें, या वो मुद्दों पर राय न रखें। बिलकुल रखें, बिलकुल प्रमोशन करें, संवैधानिक अधिकार हैं दोनों। लेकिन हाँ, फिर ‘हीरो’ मत बनो समाज के। विशुद्ध व्यवसायी रहो। हमें उससे समस्या नहीं है।
यहाँ जब विचारशून्यता में फाउंडेशन पोत कर, मलिन आत्मा और श्वेत चेहरे के साथ, उन जगहों पर खड़े हो जाते हो, बिलकुल समय देख कर, तब सब साफ़ दिखता है। CAA/NRC तो लम्बे समय से चल रहा है, JNU में फीस वृद्धि का मामला भी डेढ़ महीने से चल रहा है। फिर ये चेहरा, उसी बनावटी दृढ़ता के साथ, क्यों नहीं दिखा?
क्योंकि PR में उसे ‘शीघ्रपतन’ या ‘प्रीमैच्योर इज़ेकुलेशन’ माना जाता है। तब कोई लक्ष्य नहीं सधता। तब आपको कोई हीरो नहीं मानेगा। इनसे तो भले स्वरा भास्कर और जीशान अयूब जैसे लोग हैं जो कम से कम लगातार प्रतिबद्धता तो दिखा रहे हैं जहरीली वामपंथी विचारधारा के प्रति।
किसको क्या देखना चाहिए, क्या नहीं, ये मैं नहीं बता सकता। लेकिन ये ध्यान रहे कि अनभिज्ञता में विवादों की घोड़ी चढ़ने वालों को समाज का प्रतिनिधित्व करने मत दीजिए। साथ ही, याद रखिए कि एसिड अटैक एक भयावह सत्य है हमारे दौर का, उस पर कुछ लोगों ने पानी डाल दिया है।
किसी ने कहा कि दीपिका बहुत जेन्यून तरीके से आई और बिना टीम को बताए जेएनयू पहुँच गई ताकि वो समझ सके कि मुद्दा क्या है। हो सकता है कि समझने गई हो, इसमें कोई समस्या नहीं। हर उस व्यक्ति को हर उस मुद्दे पर जानकारी इकट्ठा करने की आवश्यकता है जो किसी भी बात पर, कुछ भी बोल देते हैं क्योंकि उनके व्हाट्सएप ग्रुप में वो मैसेज आया कि ‘फ्रेंड्स, लेट्स ट्वीट एंड ट्रेंड दिस’।
लोग एक्टर्स से, खिलाड़ियों से, बड़े नामों से हमेशा एक उम्मीद लगा कर बैठते हैं कि वो उनका मार्गदर्शन करें। लेकिन लोग आज के दौर में, जब वो यह भी कह दें कि ‘मुझे इसकी पूरी जानकारी नहीं’ तो भी उस पर धावा बोल दिया जाता है, तो अमूमन अधिकतर लोग विवादों से बचना चाहते हैं। विवादों से ऐसे लोग तभी तक बचते हैं, जब तक उन्हें विवादों की जरूरत नहीं होती।
विवादों की जरूरत उन्हें होती है जो चर्चा में रह कर पैसे कमा सकते हैं। जैसे कि क्रिकेटर चर्चा में रह कर पैसे नहीं कमा सकता। ज्यादा से ज्यादा बिग बॉस में जा सकता है। लेकिन फिल्मी दुनिया के लोग विवादों से खूब कमाई करते हैं। आज के समय में जब फिल्म की लागत के चौथाई से ले कर आधा तक प्रमोशनल बजट का हिस्सा हो जाता है, तब फ्री की पब्लिसिटी के लिए विवादों कि इस देश में कभी थप्पड़ खाया जाता है, कभी बहकी-बहकी बातें की जाती हैं, कभी वैसे मुद्दे पर उस जगह पर खड़े हो जाना होता है जिसके बारे में आपकी पीआर टीम को पता है कि यहाँ से ट्रेक्शन मिलेगा ही।
दीपिका ने वही किया। दीपिका जैसे लोगों का, जब तीन दिन बाद फिल्म रिलीज हो रही हो, कोई भी कदम, उसकी छींक और पिघलते मेकअप को टिशू से पोंछने का तरीका तक तय होता है और आप कह रहे हैं कि दीपिका अपनी इच्छा से JNU चली गई। JNU में हर महीने बवाल होता है, दीपिका भी शायद आती रहती होंगी, लेकिन उन्होंने पूरी फिल्म के दौरान, इस खाली समय में जब देश में कश्मीर हो गया, तीन तलाक हो गया, राममंदिर आ गया, नागरिकता कानून आ गया, NRC पर बवाल हुआ, जामिया में दंगे हुए… तब तक तो गहन चुप्पी थी।
हैदराबाद में बवाल हुआ, कुछ नहीं लिखा। कुछ नहीं बोला। तो क्या इतना आसान है यह मान लेना कि वो कन्सर्न्ड है? वो कन्सर्न्ड होती तो आज के दौर में वो फोन ले कर वीडियो बनाती रहती कि मुझे बताओ कि ये सब क्या हो रहा है, जामिया में क्या चल रहा है, अलीगढ़ में क्या हुआ। अंग्रेजी में इसको साइलेंस ऑफ़ कन्विनिएंस कहा जाता है, कि जब मन किया चुप रहे, जब मन किया बोल पड़े।
कुछ ही देर में खूबसूरत, पोस्टराइज्ड तस्वीरें, जिसे बनाने में समय लगता है, ट्विटर पर ‘बोल्ड इन रील, बोल्ड इन रीयल’ के कैनवस पर उतर आती हैं और हजारों लोग शेयर करने लगते हैं। पीआर एजेंसी घास नहीं छीलती, उनकी पूरी योजना होती है। वो अवसर पा कर अपना काम करते हैं। अगर JNU का यह कांड नहीं होता तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि दीपिका शाहीन बाग में बीस दिन की उम्मी हबीबा को गोद में लिए, 90 साल की असमा से गले लग कर ग्लिसरीन वाले आँसू बहाती रहती।
इसलिए ये तो न कहिए कि ये अचानक हुआ और दीपिका का मन हुआ कि वो जाने कि क्या चल रहा है। शाहीन बाग खत्म हो चुका था, JNU में मीडिया थी, पीआर एजेंसी के लिए सिर्फ जगह बदलनी थी। दीपिका का ट्रैक रिकॉर्ड देख लीजिए कि पद्मावत से दुबई तक, उसने कैसे विवादों को तैयार किया है। उसने दो शब्द भी नहीं बोले, क्यों?
स्टेटमेंट देती तो शायद पता चल जाता कि तैयारी तो जामिया नगर की थी, बोलना CAA/NRC पर था, यहाँ कहाँ ला कर रख दिया! इसलिए कहा गया कि दृढ़ता के साथ एक जगह तन कर खड़ी रहे, वो तस्वीर आइकॉनिक हो जाएगी, फिर बाकी समय में घायलों से भी मिले। नकली पलकों को कर्ल करने के बाद, इंडस्ट्री में इतने समय से होने पर, दो बूँद तो निकाल ही लेगी दीपिका… स्वरा भास्कर से तो वो भी नहीं ह पाया था, लेकिन वो तो अलग मुद्दा है।
मैं आपसे ये नहीं कह रहा कि आप इस फिल्म को मत देखिए। मैं बस यह कह रहा हूँ कि वो चाहते हैं, चर्चा हो और लोगों तक बात पहुँचे। आप इस पर बात ही मत कीजिए। मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मैं ये देख रहा हूँ कि हर बार वो जो चाहते हैं, ये नचनियों की इंडस्ट्री जो चाहती है, वही होता है। जब नचनियों की इंडस्ट्री कहता हूँ तो सोच-समझ कर कहता हूँ क्योंकि यहाँ मुद्दे पर या तो चुप्पी दिखती है, या फिल्म की रिलीज़ का समय देख कर लोग दार्शनिक बन जाते हैं। बात मत कीजिए, विराम दीजिए, बात खत्म हो जाएगी।
नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) को लेकर विपक्ष का हंगामा और उसकी आड़ में हिंसा अब नई बात नहीं रही। कानून को समुदाय विशेष के खिलाफ बताकर यह सब किया जा रहा है। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल लगातार अफवाह फैला रहे हैं कि यह क़ानून भेदभाव वाला है। बता दें कि सीएए के तहत तीनों पड़ोसी इस्लामिक मुल्क़ों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से दिसंबर 2014 तक भारत में आ चुके प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी। विपक्ष का कहना है कि इसमें मुस्लिमों को क्यों शामिल नहीं किया गया? लेकिन, सच्चाई कुछ और है। वास्तविकता ये है कि जो कॉन्ग्रेस आज इसका विरोध कर रही है, कभी इसके समर्थन में थी।
2003 में एक संसदीय समिति की रिपोर्ट आई थी, जिसमें सीएए की अनुशंसा की गई थी। गृह मामलों की इस संसदीय समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी थे, जो आगे चल कर भारत के राष्ट्रपति बने। इसके अलावा उसमें कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल भी शामिल थे। उस संसदीय समिति में कॉन्ग्रेस पार्टी के कई दिग्गज नेता शामिल थे। राज्य सभा के सांसदों की इस रिपोर्ट में क्या था, ये जान कर आप चौंक जाएँगे। इस रिपोर्ट को दिसंबर 12, 2003 को राज्य सभा में पेश किया गया था। ये संसदीय समिति की 107वीं रिपोर्ट थी।
यह रिपोर्ट ‘नागरिकता संशोधन बिल, 2003’ पर तैयार किया गया था। इसमें संसदीय समिति ने अनुशंसा की थी कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को न सिर्फ़ राष्ट्रीय पहचान-पत्र देना चाहिए, बल्कि उन्हें नागरिकता और अधिकार भी दिए जाने चाहिए। इस रिपोर्ट में अपना घर-द्वार छोड़ कर आए अल्पसंख्यकों को अधिकार देने की बात कही गई थी। साथ ही, कॉन्ग्रेस नेताओं से भरी पड़ी इस संसदीय समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा गया था कि पाकिस्तान या बांग्लादेश से आने वाले बहुसंख्यकों (अर्थात, मुस्लिमों) को नागरिकता नहीं दी जानी चाहिए, केवल अल्पसंख्यकों को ही मिलनी चाहिए।
इसी तरह भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भी कभी पड़ोसी इस्लामिक मुल्क़ों से आने वाले अल्पसंख्यक शरणार्थियों को अधिकार व नागरिकता देने की बात संसद में कही थी। उन्होंने कहा था कि उनका ध्यान रखना भारत का कर्तव्य है। आज वही कॉन्ग्रेस इस मुद्दे पर अफवाह फैला रही। हमने 2003 की जिस संसदीय समिति की रिपोर्ट का जिक्र किया, उस समिति में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता मोतीलाल वोरा, अंबिका सोनी, राजद अध्यक्ष लालू यादव और हंसराज भारद्वाज शामिल थे। इससे आज ये पता चल जाता है कि सीएए के विरोध में जो कुछ भी हो रहा है, वो महज राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए किया जा रहा है।
#CAA No explanation is necessary, just have a quick glance at this parliamentary committee report from 2003, especially the names & highlighted portions ??? pic.twitter.com/PQurUMUBRt
इसी तरह एनआरसी पर भी कॉन्ग्रेस आज विरोध कर रही है। जबकि एनआरसी की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत कॉन्ग्रेस के ही कार्यकाल में हुई थी। थोड़ा और पीछे जाएँ तो ख़ुद इंदिरा गाँधी ने घुसपैठियों को निकाल बाहर करने की बात की थी। एनपीआर भी यूपीए-2 के कार्यकाल में अपडेट किया गया। आज कॉन्ग्रेस सहित पूरा विपक्ष इसका भी विरोध कर रहा।
दीपिका पादुकोण की हालिया फिल्म ‘छपाक’ 10 जनवरी को रिलीज होगी। ये फिल्म एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन से प्रेरित है। लक्ष्मी अग्रवाल कौन हैं? क्यों फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार ने फिल्म बनाने के लिए उनकी कहानी चुनी?
मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली लक्ष्मी का जन्म 1 जून 1990 को हुआ था। लक्ष्मी बचपन से ही गायक बनने के सपने देखती थीं। लेकिन, 15 साल की उम्र में उनके जीवन में एक अजीब मोड़ आया, जब 32 वर्षीय नईम की नजर लक्ष्मी पर पड़ी। नईम ने लक्ष्मी से शादी करने की इच्छा जताई। जवाब ‘न’ में मिला। इसके बाद उसने पूरे 10 महीने तक लगातार लक्ष्मी का पीछा किया। वह स्कूल जाती तो नईम रास्ते में उनका इंतजार करता। मन होने पर थप्पड़ मार देता, फब्तियाँ कसता…। शायद वह जानता था कि लक्ष्मी चाहकर भी उसकी बद्तमी़जियों के बारे में घर में नहीं बताएगी। क्योंकि, अगर उसने ऐसा किया तो नईम को कुछ कहने से पहले घर वाले लक्ष्मी का स्कूल जाना छुड़वा देते। उसके सपनों को समय से पहले मार दिया जाता। यह सोच वह अपने परिवार वालों के आगे चुप रही।
एक दिन लक्ष्मी को खान मार्केट जाते हुए नईम का फोन आया और उसने लक्ष्मी से पूछा कि तुम तो जिंदगी में कुछ करना चाहती हो, आगे बढ़ना चाहती, पढ़ना चाहती हो… है न? लक्ष्मी ने इस बार बड़ी सहजता से जवाब ‘हाँ’ में दिया और इसके बाद नईम ने कॉल काट दी। अगले दिन खान मार्केट जाने के रास्ते में लक्ष्मी को नईम और नईम के भाई की गर्लफ्रेंड इंतजार करते मिले। लेकिन, जब उन्हें देखकर लक्ष्मी ने रास्ता बदलने की कोशिश की तो वे उसका पीछा करने लगे। थोड़ी देर में रोड क्रॉस करते हुए वह लड़की उसका रास्ता घेर लेती है और नईम उस पर एसिड डाल देता है।
इस घटना के बाद लक्ष्मी वहीं सड़क पर पड़ी रही। एक टैक्सी ड्राइवर ने उसकी हालत देख गाड़ी रोकी और उसे सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवाया। लक्ष्मी कई महीनों तक अस्पताल में रही और कई सर्जरी हुई। इसके कारण कई महीनों तक वह अपना चेहरा नहीं देख पाई। परिवारवालों ने घर से शीशा फ्रेम हटा दिया था। लेकिन, एक दिन जब उसने शीशे में अपना चेहरा देखा तो डर गईं। आँख, नाक सब गायब हो चुके थे।
एसिड से झुलसने से भी ज्यादा पीड़ा लक्ष्मी को समाज का अपने प्रति रवैया देख हुई। मात्र 16 साल की उम्र में लक्ष्मी आत्महत्या करने की सोचने लगी। लेकिन कहते हैं न मुश्किल घड़ी ज्यादा समय तक नहीं टिकती। साल 2006 में उन्होंने भारत में एसिड बैन को लेकर पीआईएल डाली। केस लंबा चला, लेकिन कई लोगों के सहयोग से वे साल 2013 में इसे जीतने में सफल हुईं। इस जीत के बाद लक्ष्मी ने एसिड अटैक के ख़िलाफ़ कई मंचों से जागरूकता फैलाने का काम किया। लक्ष्मी का आज भी मानना है कि एसिड अटैक के ख़िलाफ़ अब भी बहुत कुछ करना बाकी है।
साल 2014 में 28 वर्षीय लक्ष्मी को इंटरनेशनल वूमेन ऑफ करेज से यूएस के पूर्व प्रेसिडेंट बराक ओबामा की पत्नी मिशैल ओबामा द्वारा नवाजा गया। इस अवार्ड से पहले वो साल 2013 में आलोक दीक्षित और आशीष शुक्ला के अभियान स्टॉप एसिड अटैक से जुड़ चुकी थी। वर्तमान में इसे छाँव फाउंडेशन के नाम से जाना जाता है।
आज लक्ष्मी और आलोक दीक्षित की एक बेटी है। उसका नाम पीहू है। लक्ष्मी की दृढ़इच्छा शक्ति के ही कारण अब एसिड अटैक सर्वाइवर को राइट ऑफ पर्सन विथ डिसेबिलीटी एक्ट, 2016 के तहत कानूनी अधिकार दिए जाते हैं।
डर- एक ऐसा शब्द है, ऐसी भावना है, जिसे किसी के मन में बिठा कर आप अपना काम निकाल सकते हैं। किसी को उसके काल्पनिक दुश्मन का डर दिखा कर उससे काम निकलवाया जा सकता है। पाकिस्तान, अमेरिका को धमका सकता है कि अगर उसने उसका साथ नहीं दिया तो वो चीन के क़रीब हो जाएगा। वामपंथियों की भी यही चाल रही है। वो मुस्लिमों को हिन्दुओं का डर दिखाते हैं और दलितों को कथित सवर्णों का। फिर वो बताते हैं कि इस डर को खत्म कैसे किया जाए? यहाँ हम ये भी सोच सकते हैं कि जिस डर को वामपंथी किसी के मन में बिठाने का प्रयास करते हैं, क्या उसका कुछ भाग उनके मन में भी रहता है? क्या वो अपने X मात्रा में डर को 100X बना कर पेश करते हैं।
राजदीप सरदेसाई के ताज़ा लेख से तो यही लगता है। उनका मानना है कि अगला दशक काफ़ी अशांत रहने वाला है। कारण? क्योंकि 2029 में नरेंद्र मोदी चौथी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे होंगे। सरदेसाई अपने मन में बैठे ‘डर’ को ‘जनता का डर’ और ‘ख़तरनाक भविष्य’ बता कर पेश कर रहे हैं। उनका ये डर और भी गहरा तब हो जाता है, जब वो कल्पना करते हैं कि पीएम मोदी 2029 की जीत के बाद राष्ट्रपति भी बन सकते हैं। लोकतंत्र तार-तार हो गया है और संविधान में बदलाव कर के राष्ट्रपति द्वारा ही सरकार चलाने का प्रावधान किया गया है।
क्या ये सरदेसाई का डर है? या फिर वो एक ‘डर’ का निर्माण कर रहे हैं, कल्पनाओं का आधार पर। वो डर, जिसे दिखा कर वो जनता को बरगला सकते हैं। उन्हें ये भी डर है कि धर्मनिरपेक्ष अर्थात सेक्युलर, इस शब्द को संविधान से निकाल बाहर किया जाएगा। सरदेसाई लिखते हैं कि 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हो रहे हैं, भारत हिन्दू राष्ट्र बन गया है और मोदी ज़िंदगी भर के लिए राष्ट्रपति बन गए हैं। राजदीप सरदेसाई जैसों के लिए ‘डर’ को प्लांट करना कठिन नहीं है। वो शब्दों के साथ खेल कर ऐसा कर लेते हैं। फिर इस ‘डर’ का समाधान क्या है? वही है, जो वामपंथी बताएँगे।
आप क्रोनोलॉजी समझिए। वो डर का निर्माण करेंगे, डर दिखाएँगे और फिर उसका समाधान बताएँगे। फिर अगले ही पैराग्राफ में सरदेसाई पूछते हैं कि क्या ये सिर्फ़ एक कल्पना भर है? यहाँ वो उदाहरण देने के लिए एक दशक पीछे जाते हैं। अब तक वो एक दशक आगे घूम रहे थे। बकौल सरदेसाई, जनता ने 2009 में हिंदुत्व को नकार दिया था। भले ही उस चुनाव में भाजपा की हार के हज़ार कारण हों, इसे ‘हिंदुत्व की हार’ के रूप में ही देखा जाएगा। सरदेसाई ने फरमान जारी कर दिया है तो बाकी के वामपंथी भी हुआँ-हुआँ करते हुए इसे दोहराएँगे ही। सच है, 2009 में एलके आडवाणी थके-थके लग रहे थे और वाजपेयी संन्यास ले चुके थे।
राजदीप सरदेसाई का लेख इंडिया टुडे में: स्वस्तिक का अपमान
इसके बाद शुरू होता है राजदीप का असली प्रपंच। राजदीप लिखते हैं कि उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता थे, जिनके बारे में धारणा बना दी गई थी कि वो विभाजन पैदा करने वाले नेता हैं। यहाँ ‘वाइब्रेंट गुजरात’ से लेकर ‘डिजिटल शिकायत प्लेटफॉर्म’ तक, सभी चीजें गौण हो जाती है और गुजरात में विकास की बात न कर मोदी को विभाजनकारी इसलिए बताया जाता है क्योंकि ये ‘धारणा’ इन्हीं वामपंथियों ने बनाई थी। 2002 दंगों को रटने वाले राजदीप को ये बखूबी पता है। लेकिन फिर भी, वो लिखते हैं कि मोदी की विभाजनकारी छवि उस समय गठबंधन सरकार चलाने के लिए उपयुक्त नहीं मानी जा रही थी।
आम धारणा वही है, जो वामपंथी लिख दें। राजदीप का यहीं से विलाप प्रारम्भ हो जाता है। वो लिखते हैं कि देखो, 2009 के सारे राजनीतिक विश्लेषण फेल हो गए और आज नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी हस्ती हैं, जिनके इर्द-गिर्द संगठन और सरकार दोनों ही घूम रही है। फिर राजदीप को इस बात से थोड़ी ख़ुशी मिलती है कि मार्च 2017 में 71% भूभाग पर राज करने वाली भाजपा राज्यों में अब मात्र 50% से भी कम पर आ गई है। राजदीप को महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के दोबारा सीएम बनने वाले प्रकरण से भी थोड़ी उम्मीद बँधती है। वे लिखते हैं कि सत्ता का समीकरण तो महज 12 घंटों में भी बदल सकता है।
राजदीप का डर फिर से आकर उनके सिर पर बैठ जाता है क्योंकि राज्यों में भाजपा की हार कैसे-कैसे हुई है, ये उन्हें भी पता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कॉन्ग्रेस ने बहुमत न मिलने के बावजूद सरकार बनाई। जम्मू-कश्मीर 2 केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित हो गया। महाराष्ट्र में राजग को बहुमत मिलने के बावजूद भाजपा को सत्ता से दूर रखा गया। झारखंड में भाजपा के वोट शेयर में वृद्धि हुई है। राजदीप जानते हैं कि भाजपा कमज़ोर नहीं हुई है और यही बात वो लिखते भी हैं कि भले ही राज्यों में भाजपा हार जाए, हिंदुत्व वाली विचारधारा का मुख्यधारा का नैरेटिव बन जाना खतरनाक है और ये आगे बढ़ता जाएगा।
राजदीप ने अभी मोदी का डर दिखाया। हिन्दू राष्ट्र का डर दिखाया। अब वो नया डर ये दिखाते हैं कि भले ही भाजपा और मोदी रहें न रहें, हिंदुत्व तो राजनीति में घुस चुका है। बकौल सरदेसाई, भारत के माध्यम वर्गीय परिवारों को अपनी हिन्दू जड़ों का भान हो चुका है और मुस्लिम-विरोधी प्रोपेगेंडा के प्रभाव में एक पूरी की पूरी जनरेशन बड़ी हो रही है। जैसा कि अपेक्षित है, सीएए विरोध के नाम पर मुस्लिमों की भीड़ द्वारा रेलवे को 250 करोड़ का नुकसान पहुँचाए जाने और जुमे की नमाज के बाद सार्वजनिक सम्पत्तियों को तोड़फोड़ कर दंगा करने वालों के बारे में उन्होंने कुछ नहीं लिखा।
किसने चलाया एंटी-मुस्लिम प्रोपेगेंडा? पीएम मोदी तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं। अगर मीडिया ने चलाया तो राजदीप भी इसके बराबर के दोषी हुए। दरअसल, राजदीप चाहते हैं कि हम इस पर बात करें कि एंटी-मुस्लिम प्रोपेगेंडा किसने चलाया। लेकिन वास्तविकता ये है कि ऐसा कोई प्रोपेगंडा बड़े स्तर पर है ही नहीं और जनता आज सोशल मीडिया के ज़माने में वो सब देख रही है, जो हो रहा है। हर घटना का सही चित्रण जनता तक पहुँच रहा है। ऐसे में राजदीप जैसों का किरदार सीमित रह गया है और यही उनके पिनपिनाने का कारण भी है।
“अयोध्या, काशी और मथुरा में मंदिरों का निर्माण शुरू हो जाएगा। विहिप और आरएसएस इन कार्यों में लगी होगी। 2024 में एक भव्य राम मंदिर खड़ा हो जाएगा। शिक्षा व्यवस्था हिंदुत्व के अनुसार चलेगी। अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय को फंडिंग नहीं मिलेगी। मंदिरों की सुरक्षा के लिए एक अलग मंत्रालय बनेगा।” एक साँस में इतने सारे झूठ बोलने की काबिलियत राजदीप और उनके गैंग में ही हो सकती है। कल्पना की चाशनी में झूठ मिला कर डर के साथ परोसने पर वो काम कर जाता है। राजदीप ने भी यहाँ झूठा डर दिखाया। किसने अल्पसंख्यक मामलों मंत्रालय की फंडिंग रोकी है?
जरा वास्तविकता तो देख लें। माइनॉरिटी अफेयर्स मिनिस्ट्री को 2016-17 के बजट में 3800 करोड़ रुपए मिले थे। अगले वर्ष यह बढ़ कर 4195 करोड़ रुपया हो गया। 2018-19 और 2019-20 में ये बढ़ कर 4700 करोड़ हो गया। 2013 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय को 3511 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया था। यानी मोदी सरकार के अंतर्गत पिछले 6 वर्षों में मंत्रालय को मिलने वाली धनराशि में 1200 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ है। लेकिन नहीं, मोदी तो बजट हटा देगा। क्यों हटा देगा? क्योंकि राजदीप ने लिख दिया।
Thanks to PM Sh @narendramodi & FM Sh @arunjaitley for record increase of Rs 505 cr in 2018-19 Budget for Minority Affairs Ministry. Ministry’s Budget, which was Rs 4195 cr during last Budget, has now been increased to Rs 4700 cr.
लेकिन हाँ, राजदीप की सोच देखिए। वो 2029 की भविष्यवाणी करते हुए लिखते हैं कि भारत पीओके पर कब्ज़ा करने का प्रयास करेगा लेकिन वो सफल नहीं होगा। राजदीप को जानना चाहिए कि पीओके को भारत ‘Capture’ नहीं करेगा, बल्कि ‘Regain’ करेगा, जो अभी भी इसी देश का हिस्सा है। राजदीप यहाँ ‘Capture’ की जगह अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग कर सकते थे, वो ‘Take Back’ लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसे अवैध कब्ज़े से छुड़ाना कहते हैं, कैप्चर करना नहीं। जम्मू-कश्मीर अलग हो जाएगा और नॉर्थ-ईस्ट में हिंसा होगी- ये राजदीप के सुनहरे ख्वाब हैं। जिस सरकार ने दशकों पुरानी बांग्लादेश सीमा विवाद की समस्या सुलझा दी, वो कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट गँवा देगी। झूठ, कल्पना, डर और डर का वामपंथी समाधान। 70 वर्ष पुराने भारत-बांग्लादेश सीमा विवाद (कभी ईस्ट पाकिस्तान) को सुलझाया गया।
इसके बाद राजदीप हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान की बात करते हुए लिखते हैं कि इससे नॉर्थ-साउथ के बीच टकराव बढ़ेगा। ये बेतुका इसीलिए है क्योंकि हिन्दू दक्षिण भारत में भी हैं और उत्तर भारत में भी। दक्षिण भारतीय मंदिर अपनी प्राचीन कलाकृतियों व ढाँचों के लिए खासे लोकप्रिय हैं। फिर राजदीप को क्यों लगता है कि हिंदुत्व से दक्षिण भारत में हिंसा होगी? ये कैसा दिवास्वप्न? राजदीप लिखते हैं कि दक्षिण भारत के सभी मुख्यमंत्री मिल कर केंद्र के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल देंगे, क्योंकि उन्हें राजस्व में ज्यादा हिस्सा चाहिए। क्या राजदीप चाहते हैं कि बिहार और यूपी जैसे ग़रीब राज्य हमेशा के लिए ग़रीब बने रहें, क्योंकि वहाँ रोज़गार की कमी है और ज़्याद टैक्स कलेक्शन नहीं हो पाता?
राजदीप सरदेसाई के लेख में एक अच्छी बात ये भी है कि बाकी वामपंथियों की तरह वो भी कॉन्ग्रेस से ख़ासे निराश हैं। भन्नाते हुए उन्होंने लिखा है कि 2029 तक राहुल गाँधी 3 बार इस्तीफा देकर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बन चुके होंगे और प्रियंका गाँधी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा चुका होगा। कॉन्ग्रेस की हालत सचमुच आज ऐसी हो गई है कि राजदीप जैसा कट्टर मोदी-विरोधी भी उस पर अगले 10 साल बाद भी दाँव लगाने को तैयार नहीं है। तो फिर मोदी को चुनौती कौन देगा? राजदीप सरदेसाई देंगे। उनका गैंग देगा। अगर आपको यकीन न हो रहा हो तो उनके अगले शब्द पढ़िए। उन्हें अपने गैंग पर कितना भरोसा है।
हाँ, राजदीप लिखते हैं कि सिविल सोसायटी साथ आकर तानाशाही के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा। राजदीप ने यहाँ ये नहीं बताया कि उसमें कौन लोग होंगे। क्या इस सोसायटी में ‘अवॉर्ड वापसी गैंग’ शामिल होगा? वही गैंग, जो मामला ठंडा पड़ते ही लौटाए हुए रुपए वापस ले लेता है। या फिर उसमें शेरो-शायरी ट्वीट करने वाले लोग शामिल होंगे? या फिर पत्थर फेंकने और ट्रेन जलाने वाले भी सिविल सोसायटी के अंतर्गत ही आते हैं? राजदीप के संघर्ष में कौन लोग शामिल होंगे, उसे आप भी देखिए। यहाँ हम उन्हें परिभाषित करने का भी प्रयास करेंगे।
सिविल सोसायटी: अवॉर्ड वापसी गैंग और शेरो-शायरी ट्वीट करने वाले लोग
प्रबुद्ध जन: झूठे ट्वीट करने वाले और ट्विटर पर गाली-गलौज करने वाले
बेरोज़गार युवक: कुर्ता-पायजामा पहन और इस्लामी टोपी लगा कर ट्रेन जलाने वाले
दुखी किसान: योगेंद्र यादव और नक्सली अखिल गोगोई, जो ख़ुद को किसान नेता कहते हैं
दबा दिए गए समुदाय: मौलवी-मौलाना और चर्च के पादरियों का समूह
राजदीप एक हाइपर-डिजिटलाइज्ड इकोसिस्टम को उम्मीद के रूप में दखते हैं। इसके लिए उन्हें इंग्लैंड का उदाहरण देखना चाहिए। अधिकतर सेलेब्रिटी, वामपंथी पत्रकार और कथित विचारक लेबर पार्टी के जेरेमी कोर्बिन के पक्ष में थे। दुनिया भर से ट्वीट्स आ रहे थे। वो जम्मू-कश्मीर के आतंकियों के समर्थक हैं। दुनिया भर के वामपंथियों के डिजिटल प्रचार-प्रसार के बावजूद कंज़र्वेटिव पार्टी के बोरिस जॉनसन की जीत हुई और लेबर को दशकों की बुरी हार मिली। बोरिस हिन्दू मंदिरों में जाते हैं और गोपूजा करते हैं। इन सबसे क्या पता चलता है? यही कि ‘सेलेब्रिटी बैकिंग’ जनसमर्थन नहीं होता है।
ठीक वैसे ही, भारत में अनुराग कश्यप, स्वरा भास्कर, फरहान अख्तर, ज़ीशान अयूब, राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा और इरफ़ान हबीब सरीखे लोगों ने अगर किसी चीज को नकार दिया तो इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि जनता भी उनके समर्थन में है। 2019 लोकसभा चुनाव ने भी इसकी पुष्टि की है। राजदीप को डर है कि भारत ‘हिन्दू खिलाफत’ बन सकता है। उनके लिए चन्द्रगुप्त मौर्य की ये पंक्तियाँ ठीक रहेंगी, जिसे दिनकर ने ‘मगध महिमा’ में पिरोया है:
भरतभूमि है एक, हिमालय से आसेतु निरन्तर, पश्चिम में कम्बोज-कपिश तक उसकी ही सीमा है। किया कौन अपराध, गए जो हम अपनी सीमा तक?
इसका अर्थ ये है कि भारत ने आज तक कभी भी न तो किसी देश पर आक्रमण किया है और न ही अपनी सीएमओं का उल्लंघन किया है। खिलाफत के लिए ख़ून बहाने वालों की कोई सीमा नहीं है। वो दुनिया के किसी भी कोने में खलीफा-राज़ के लिए रक्तपात कर सकते हैं। आज़ादी से पहले भारत में भी हुआ था। अब भी होता है। जबकि ‘हिन्दू राष्ट्र’ कोई दस्तावेजी चीज नहीं है, ये एक भावनात्मक प्रतीक है, जो लोगों के आस्था और विश्वास पर निर्भर करता है। ‘हिन्दू राष्ट्र’ प्रेम से आते हैं। खिलाफत तलवार से। हिन्दू राष्ट्र एक सोच है, जबकि खिलाफत जबरदस्ती है। हिन्दू राष्ट्र एक अवधारणा है, जबकि खिलाफत वर्चस्व की खूनी जंग।
राजदीप सरदेसाई अंत में जयप्रकाश नारायण के ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की बात करते हैं। लेकिन, वो ये भूल जाते हैं कि देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक, जेपी के चेले सत्ता से विपक्ष तक फैले हुए हैं। इनमें रामविलास, मुलायम, लालू और देवगौड़ा जैसे अवसरवादियों की भी तादाद है। और हाँ, इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगा कर लोकतंत्र की हत्या की थी। इसके उलट वामपंथियों के ‘लोकतंत्र की हत्या’ के आरोपों के बीच मोदी सरकार दोबारा पहले से भी ज़्यादा प्रचंड बहुमत के साथ चुन कर आई है।
अन्ना हजारे ने 2011 में भी अनशन किया था, उन्होंने 2019 में भी किया। उनका ताज़ा अनशन फ्लॉप रहा, क्योंकि जनता मोदी सरकार से ख़ुश है। 2011 के अन्ना आंदोलन या 1974 के जेपी आंदोलन के समय जनता सरकारों से त्रस्त थी। राजदीप ने इस अंतर को आसानी से छिपा लिया। जेपी की ज़रूरत भारत-भूमि को तभी पड़ती है जब सरकार से जनता नाख़ुश हो और उससे कोई उम्मीद न बची हो। जेपी जैसा महानायक वामपंथी गैंग के नेतृत्व के लिए नहीं आता, बल्कि जनता के लिए आता है। वामपंथियों का नेतृत्व तो अवॉर्ड वापसी गैंग करता है, अंतरराष्ट्रीय पोर्टलों पर अंग्रेजी में लेख लिख कर भारत को बदनाम करने की साज़िश करने वाले उनके नेतृत्वकर्ता हैं।
अंत में बताते चलें कि राजदीप के इस लेख में हिन्दू प्रतीक ‘स्वस्तिक’ का अपमान किया गया है। इसे नाजी सलाम के साथ दिखाया गया है। राजदीप को उम्मीद है कि दिसंबर 2019 की तरह ही देश भर में भयंकर दंगे होंगे और मोदी सरकार अपदस्थ कर दी जाएगी। राजदीप याद रखें कि यूपी में एक-एक पत्थर से हुआ नुकसान दंगाइयों से कैसे वसूला जा रहा है। साथ ही वो ‘डर का माहौल’ बनाने के लिए कल्पना और झूठ का मिश्रण न करें, क्योंकि जनता उनके या उनके गैंग पर भरोसा नहीं करने वाली। अच्छा होगा कि वो आत्मनिरीक्षण करें कि उनके लाख चिल्लाने के बावजूद जनता उनके जैसे लोगों को लग्गतार क्यों नकार रही है?
वाम दल समर्थक 10 ट्रेड यूनियनों के ‘भारत बंद’ के दौरान पश्चिम बंगाल से एक बार फिर अराजक तत्वों द्वारा हिंसा भड़काने और यातायात बाधित करने की खबरें आई हैं। राज्य के उत्तर 24 परगना में हृदयपुर के पास रेलवे ट्रैक से पुलिस ने चार देसी बम बरामद किए हैं। वहीं कूच बिहार में प्रदर्शनकारी एक बस में तोड़फोड़ करते और उसपर पथराव करते नजर आए।
#WATCH West Bengal: A bus vandalised in Cooch Behar during the Bharat Bandh called by ten trade Unions against ‘anti-worker policies of Central Govt’ pic.twitter.com/Cc3ksWndL2
राज्य में उपद्रव की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी। यही कारण है कि सिलिगुड़ी में ड्राइवर सिर पर हेलमेट लगाकर बस चलाते दिखे। बस ड्राइवरों का कहना है कि यहाँ हिंसक प्रदर्शनकारियों से बचाव के लिए उन्हें हेलमेट पहनना पड़ा है।
Siliguri: A North Bengal State Transport Corporation(NBSTC) bus driver wears a helmet in wake of protests during #BharatBandh called by ten trade unions against ‘anti-worker policies of Central Govt’ #WestBengalpic.twitter.com/ZCbe7uRq4m
बताया जा रहा है कि उत्तर बंगाल के कुछ इलाकों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने हड़ताल का विरोध करते हुए रैलियाँ निकाली हैं और लोगों से सामान्य स्थिति बनाए रखने का आग्रह किया है। बर्दवान में टीएमसी कार्यकर्ताओं और एसएफआई के बीच झड़प की भी एक वीडियो सामने आया है। जिसमें दोनों समूह के कार्यकर्ता भारत बंद के दौरान एक दूसरे से लड़ रहे हैं।
#WATCH West Bengal: A clash erupted allegedly between Trinamool Congress (TMC) and Students’ Federation of India (SFI) workers in Burdwan during the Bharat Bandh called by ten trade Unions against ‘anti-worker policies of Central Government’ pic.twitter.com/G9WFzmVUYQ
#WATCH West Bengal: A clash erupted allegedly between Trinamool Congress (TMC) and Students’ Federation of India (SFI) workers in Burdwan during the Bharat Bandh called by ten trade Unions against ‘anti-worker policies of Central Government’ pic.twitter.com/G9WFzmVUYQ
गौरतलब है कि केंद्र सरकार की कथित ‘राष्ट्र विरोधी’ और ‘जन विरोधी’ आर्थिक नीतियों के खिलाफ बुधवार को वाम दल समर्थक 10 ट्रेड यूनियनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है। राहुल गाँधी ने ट्वीट कर भारत बंद को अपना समर्थन दिया है। उन्होंने लिखा, “मोदी-शाह सरकार की जनविरोधी, श्रमिक विरोधी नीतियों ने भयावह बेरोजगारी पैदा की है और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कमजोर किया जा रहा है, ताकि इन्हें मोदी के पूंजीपति मित्रों को बेचने को सही ठहराया जा सके। आज 25 करोड़ कामगारों ने इसके विरोध में भारत बंद बुलाया है। मैं उन्हें सलाम करता हूँ।” राज्य में सीएए के विरोध के नाम पर भी जमकर हिंसा हुई थी।
The Modi-Shah Govt’s anti people, anti labour policies have created catastrophic unemployment & are weakening our PSUs to justify their sale to Modi’s crony capitalist friends.
Today, over 25 crore ??workers have called for #BharatBandh2020 in protest.
प्रदर्शनकारी वामपंथी छात्रों का समर्थन करने के लिए मंगलवार (7 जनवरी 2020) को दीपिका पादुकोण जेएनयू पहुँची। हालाँकि भीड़ में नज़र आई दीपिका ने इस दौरान सार्वजनिक तौर पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन इस मामले ने सोशल मीडिया पर तूल पकड़ लिया। वामपंथी खेमा इसके लिए दीपिका पर फ़िदा हो गया। वहीं अधिकतर सोशल मीडिया यूजर्स इसे पीआर स्टंट करार दे रहे। ऐसा क्यों कहा गया? आइए जानें…
लोकतांत्रिक भारत में आम नागरिकों की तरह बॉलीवुड कलाकारों को भी अपनी राजनैतिक राय रखने और किसी एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का पूरा अधिकार है। लेकिन, ये भी सच है कि फिल्म की रिलीज डेट नजदीक आते-आते कलाकार अपनी फिल्म प्रमोशन के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। जैसे शाहरुख खान ने अपनी रईस फिल्म का प्रमोशन करने के लिए मुंबई से दिल्ली आने वाली ट्रेन में सफर किया था। उसी तरह दीपिका ने भी अपनी नई फिल्म ‘छपाक’ के रिलीज से ठीक पहले ये स्टंट किया। वे जेएनयू में छात्रों पर हुई हिंसा के विरोध-प्रदर्शन में पहुँची। लेकिन यहाँ उन्होंने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के दौरान पीड़ित बच्चों से मिलकर पूरा मामला जानने-समझने की बजाए, जेएनयू अध्यक्ष आइशी घोष से और उनके दोस्तों से मिलना उचित समझा।
कुछ पाठक कह सकते हैं कि दीपिका की मंशा को सोशल मीडिया पर जानबूझकर पीआर स्टंट बताकर पेश किया जा रहा है। लेकिन, सच्चाई यही है। इसका खुलासा तब हुआ जब बीबीसी पंजाबी सोशल मीडिया पर प्रदर्शन में पहुँची दीपिका की एक फोटो अपने ट्वीट में डालता है। साभार ‘स्पाइस पीआर’ को देता है। इसके बाद साफ हो गया कि ये रैंडम क्लिक के नाम पर पीआर का हिस्सा है।
गौरतलब है कि दीपिका साल 2019 से स्पाइस पीआर की क्लाइंट हैं और साथ ही अपनी आने वाली फिल्म ‘छपाक’ की को-प्रोड्यूसर भी हैं। प्रदर्शन में पहुँचने के बाद इसका कन्हैया कुमार ने प्रचार भी किया।
More power to you @deepikapadukone and thank you for your solidarity and support. You might be abused or trolled today, but history will remember you for your courage and standing by the idea of India. pic.twitter.com/q9WkXODchL
साथ ही इस पीआर स्टंट के लिए दीपिका को सीमा पार से भी समर्थन मिला है। पाकिस्तान ने उनकी पीट थपथपाई है। पाकिस्तान आर्मी के प्रवक्ता आसिफ गफूर ने खुद ट्वीट कर उनकी प्रशंसा की है।
आसिफ गफूर का ट्वीट
हालाँकि कुछ समय बाद ही गफूर ने अपना ये ट्वीट डिलीट कर दिया। मगर, इससे पहले साफ हो गया कि जेएनयू जाने के पीछे कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी, बल्कि ये सिर्फ़ प्रचार-प्रसार की पैंतरेबाज़ी थी। इस पर दीपिका पादुकोण खरी उतरीं और अब लोग उन्हें ‘वुमेन ऑफ स्टील’ तक कह रहे हैं।
गौरतलब है कि दीपिका के इस कदम के पीछे छिपी मंशा का खुलासा होने के बाद सोशल मीडिया पर कई यूजर्स उन्हें ट्रोल कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि दीपिका पादुकोण से नाराज होने की जरूरत नहीं हैं। वो आज तक जिसके साथ खड़ी दिखाई पड़ी, उसकी नैया डूब गई। पढ़िए ऐसा ही एक कमेंट;
सोशल मीडिया पर वायरल मैसेज
पाकिस्तान से सराहना पाने वाली दीपिका पादुकोण के पसंदीदा नेता भी पड़ोसी मुल्क को खूब भाते हैं। ये हैं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी। राहुल के बयानों का इस्तेमाल पाकिस्तान कई बार वैश्विक मंचों पर भारत को घेरने के लिए कर चुका है। 2010 में डीडी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में दीपिका ने राहुल गॉंधी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने की इच्छा जताई थी। उन्होंने कहा था कि राहुल जो देश के लिए कर रहे हैं वह नौजवानों के लिए क्लासिक उदाहरण है। इस इंटरव्यू में वह बीएसएनएल का एंबेसडर होने से खुद के हुए प्रचार का भी जिक्र करती हैं।
राहुल गॉंधी पर दीपिका के विचार सुने 6:59 से 7:49 के बीच
कॉन्ग्रेस की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पार्टी का सदस्यता अभियान गोवा में बुरी तरह विफल रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में केवल 2600 लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली है। 15 जनवरी तक यहॉं 2 लाख लोगों को सदस्य बनाने का लक्ष्य तय किया गया था। यह बात ऐसे वक्त में सामने आई है, जब पिछले ही हफ्ते चार नेताओं ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन करते हुए पार्टी छोड़ दी थी।
गोवा में कॉन्ग्रेस इस समय सदस्यता अभियान एक एप के जरिए चला रही है। इसके तहत वोटर कार्ड सहित लोगों के अन्य विवरण लिए जा रहे हैं। यह ‘शक्ति एप’ का अपग्रेडेड वर्जन जैसा है। शक्ति एप कॉन्ग्रेस के डाटा एनालिटिक्स हेड प्रवीण चकवर्ती ने 2019 के आम चुनावों से पहले शुरू किया था और कॉन्ग्रेस समर्थकों और उसे मिलने वाली सीटों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था। दिलचस्प यह है कि इसके अपग्रेडेड वर्जन में भी आँकड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जा रहे है। कॉन्ग्रेस के एक सूत्र ने द प्रिंट को बताया कि आधिकारिक तौर पर सदस्यता के आँकड़े 6,000 से 7,000 तक बताए जा रहे। लेकिन, वास्तव में यह संख्या 2,600 के करीब है।
इससे पहले चार नेताओं ने सीएए पर कॉन्ग्रेस के स्टैंड का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी थी। इनमें से तीन ने भाजपा की सदस्यता ले ली है। इन नेताओं ने पार्टी पर नागरिकता कानून को लेकर जनता, खासकर मुसलमानों को बरगलाने का आरोप लगाया था। पिछले साल जुलाई में गोवा में कॉन्ग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा था। 15 विधायकों में से दो तिहाई यानी 10 सत्ताधारी भाजपा में शामिल हो गए थे।
हैदराबाद में गैंगरेप के बाद पशु चिकित्सक महिला को जलाने की घटना के दो महीने भी नहीं हुए हैं कि पश्चिम बंगाल से भी इसी तरह की एक घटना सामने आई है। राज्य के दक्षिणी दिनाजपुर के कुमारगंत में 17 साल की नाबालिग लड़की का शव बरामद किया गया है। सोमवार की सुबह स्थानीयों लोगों ने सफानगर और अशोकग्राम के बीच एक पुलिया के नीचे उसका शव देख पुलिस को जानकारी दी। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके से गुजरते हुए उन्होंने पहले कुछ कुत्तों को माँस के टुकड़े के लिए लड़ते देखा, फिर उन्हें पुलिया पर खून नजर आया। जब उन्होंने पास जाकर देखा तो वहाँ एक शव पड़ा था। जिसे कुत्ते और सियार आधा खा चुके थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मृतका की पहचान गंगारामपुर निवासी के रूप में हुई है। उसका शव घर से करीब 8 किमी दूर पाया गया। रविवार की शाम करीब 4 बजे नाबालिग लड़की अपने घर से बाजार जाने के लिए निकली थी, लेकिन उसके बाद वापस नहीं लौटी। अगली सुबह यानी सोमवार को उसका शव बरामद हुआ। जाँच में शव के हाथ, पाँव, गले पर तेजधार वाले हथियारों के निशान पाए गए। परिजनों ने रेप के बाद लड़की की हत्या कर उसका शव जलाने की आशंका जताई है। हालॉंकि पुलिस ने अभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की है।
लड़की के भाई के मुताबिक, घर से निकलने के कुछ देर बाद ही उसकी बहन का फोन स्विच ऑफ हो गया था। इसके बाद परिवार वालों ने उसे खोजने की बहुत कोशिश की। अगले दिन उसका शव बरामद हुआ और उन्हें पुलिस ने शिनाख्त के लिए बुलाया।
पुलिस मामले की जॉंच कर रही है। तीन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इनकी पहचान महबूर मियॉं, पंकज बर्मन और गौतम बर्मन के तौर पर हुई है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में महबूर मियॉं को इस वारदात का मास्टरमाइंड बताया गया है। तीनों संदिग्ध उसी इलाके के रहने वाले हैं जहॉं लड़की रहती थी। हालॉंकि वे काम बंगाल से बाहर करते हैं। इनमें से एक को लड़की पहचानती थी और आखिरी बार उसे उसके साथ टू व्हीलर पर देखा गया था। इसी आधार पर गिरफ्तारियॉं हुई है। तीनों संदिग्ध 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेजे गए हैं।
पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले पुख्ता तौर पर कुछ भी कहने से बच रही है। लेकिन कई रिपोर्ट्स में और शव की हालत देखकर आशंका जताई जा रही है कि पहले लड़की के साथ रेप किया गया। फिर तेजधार वाले हथियार से उसकी हत्या कर शव को पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया गया।
मृतका के परिजन भाजपा के सदस्य हैं। स्थानीय भाजपा सांसद सुकंता मजूमदार ने ने गुनहगारों के जल्द नहीं पकड़े जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। कुमारगंज से टीएमसी के विधायक ने भी घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए निष्पक्ष जॉंच की मॉंग की है।